# सन् 1886 ईस्वी
(1) तीर्थराम जी की गुरु भक्ति । 24 मई 1886
रहनुमा-ए-सालिकाँ व पेशवा-ए-आरिफ़ां सलामत ! ग्राम वैरोके (अर्थात्-मुसुत्तशओं के मार्गदर्शक और ब्रह्मवेत्ताओं में शिरोमणि ! प्रणाम) आप का कृपा पत्र मुझे वैरोकी के मेले से एक दिन पहिले मिला था। उसमें लिखा था कि "मेले को आवेंगे", इस वास्ते मैं भी मेले को गया, पर मुझे दर्शन न हुए। यहां
* सन् 1886 ईस्वी में तीर्थराम जी की आयु साढ़े वारह (12॥) वर्ष के लगभग थी। इस काल में वह गुजरांवाले नगर के हाईस्कूल की मिडल (मध्यम) कक्षा में अध्ययन करते थे। यहां यह विचारनीय है कि इस बाल्यावस्था में भी तीर्थराम जी की अपने गुरु जी के साथ कैसी तीव्र भक्ति थी ॥ † वैरोके में तीर्थराम जी का शायद ससुराल्य (ससुराल) था। वज़ीराबाद से लगभग तीन मील की दूरी पर यह ग्राम है। बाल्यावस्था में ही तीर्थराम जी का विवाह हुआ था जबकि वह अपने ग्राम में "मुराली वाला" की छोटी पाठशाला (प्राइमरी) में ही पढ़ते थे। अब .
लफ़ाफ़े नहीं मिलते, इस लिए पत्र में विलम्ब हुआ। आज केवल इस कार्ड निमित्त वज़ीराबाद आया हूं। मैं तो यहां से ही आपके चरणों में उपस्थित हो जाता, परन्तु किसी न किसी कारण से सदा रुक गया। मैं यहां अति उदास रहता हूं......... यदि कोई अपराध हुआ हो तो क्षमा करें। आप का दास— तीर्थराम
† सन् 1888 ईस्वी (इस समय तीर्थराम जी की आयु चौदह वर्ष और पांच मास थी) (2) तीर्थराम जी की एंट्रेन्स (प्रवेश) परीक्षा 20 मार्च 1888
जनाब महाराज बरगज़ीदह-ए-साधुवां व चीदह-ए-आरिफ़ां जी। (अर्थात् श्री सन्त शिरोमणि व परम ज्ञानी जी महाराज) हाथ जोड़े सादर प्रणामोत्तर प्रार्थना है, कि आज सोम- वार के दिन हमारी अंग्रेजी की परीक्षा हुई है। पर्चे (परीक्षा
किसी आवश्यक कार्यार्थ तीर्थराम गुजरांवाले से वहां गये थे। और यह शायद पहिली वार ही भगतजी से किंचित् अलग हुए थे। और भगतजी को मिले अथवा गुरु धारण किये अभी थोड़ा काल ही हुआ था। पर वह भी गुरुभक्ति जो बाल्यावस्था में भी इतनी उमड़ी कि केवल कार्ड लिखने निमित्त उसे इतनी दूर ले आई और बालक का भक्तिक हृदय प्रकट किये बिना न रही ॥ † इस वर्ष एंट्रेन्स इम्तिहान (प्रवेश परीक्षा) देने को तीर्थराम गुजरांवाल से लाहौर गये थे और वहां से अपने प्रति दिन का समाचार गुरुजी को देते रहे। यहां विचारनीय बात यह है कि इतनी छोटी सी आयु में तीर्थराम जी को अपने गुरु जी पर इतना भारी विश्वास व पूर्ण श्रद्धा थी कि प्रत्यक कार्य की पूर्ति वे अपने गुरु जी महाराज की कृपादृष्टि वा दया के आश्रय ही रखते थे और बिना उन की आज्ञा के कोई काम भी करना नहीं चाहते थे।
पत्र) न तो अति कठिन थे न अति सुगम। अच्छा जो आप करेंगे, हो जायगा। और हमारी परीक्षा सर्व प्रकार से 26 मार्च तक समाप्त होजायगी। जबकि मंगल या बुधवार होगा। आप की दया चाहिये, कृपा पूर्वक शुभचिन्तना करनी और कृपा दृष्टि रखनी। यह शरीर आप का सेवक (दास वा गुलाम) है। आप का दासः— तीर्थराम लाहौर.
(3) 23 मार्च 1888
जनाब महाराज, सत्गुरुजी, बरगज़ीदह-ए साधुवां व चीदह-ए-आरिफ़ां जी। (अर्थात् सन्तशिरोमणि व परम ज्ञानी श्री गुरुजी महाराज !) सविनय हाथ जोड़े नमस्कारोत्तर विदित हो कि आज हम अंग्रेजी फ़ारसी तथा उर्दू भाषा की परीक्षा से निपट चुके हैं, अब त्वारीख़ (इतिहास), जुग्राफ़िया (भूगोल), रियाज़ी (अंकगणित), अलजबरा (बीजगणित), और साइन्स (विज्ञान) आदि विषय शेष रह गये हैं जो अति कठिन हैं। आप की कृपा चाहिये, दयादृष्टि रखनी, मैं आप का दास हूं। कृपापूर्वक यह चिन्तन करना कि जैसे मैं चाहता हूं वैसे परीक्षापत्र पर्चे लिख आऊं ॥ ॐ ॥ आप का दासः— तीर्थराम लाहौर.
(4) एंट्रेन्स (प्रवेश) परीक्षा का परिणाम और कालेज प्रवेश । 18 मई 1888
श्री सद्गुरु जी महाराज भगत साहिब ! मुझ पर खुश रहो। मैं सोमवार के दिन मिशन कौलेज में प्रविष्ट होगया हूं और एक मकान वच्छोवाली में एक रुपया मासिक किराया पर लिया है। उस मकान का मालिक महताब राय मिश्र है, इस लिये मुझे पत्र उस के पते पर लिखा करें। मुझे छात्र वृत्ति (वज़ीफा) नहीं मिली, और न मैं प्रथम वर्ग में पास हुआ हूं। मेरा नम्बर पंजाव में अठतीसवां है। यहां मिशन कौलेज में साढ़े चार रुपये फ़ीस है, इति। विशेष सादर प्रणाम। आप का दासः— तीर्थराम लाहौर।
(5) तीर्थराम जी की एकान्त-प्रीति (इस पत्र से स्पष्ट हो रहा है कि तीर्थराम जी इस छोटी सी आयु में भी कैसे एकान्त प्रेमी और विरक्त थे) 10 जून 1888
श्रीमहाराज श्री भगत जी साहब ! आप की नित्य कृपा वनी रहे। मत्था टेकना, विनती है कि दो तीन दिन हुए आप का कृपा पत्र पहुंचा, जिस में मेरे समाधि* में न जाने का कारण
*समाधि से तात्पर्य महाराजा रणजीत सिंह जी की समाधि है जो लाहौर में किले के समीप बनी हुई है। इस में कुछ कोठरियें रहने के लिये खाली थीं और बहुत थोड़े मासिक किराये पर मिलती थीं। भगत जी ने वहां रहने के लिये लिखा था, पर जब वहां एकान्त न देखा तो नगर के अन्दर तीर्थराम जी ने रहना स्वीकार किया जिस का कारण भगत जी के पत्र के उत्तर में अब वह देते हैं।
पूछा है। सो सब से मुख्य हेतु यह है कि वहां ऐसा एकान्त स्थान और स्वतंत्रता नहीं है जो यहां पर है। इसके अति- रिक्त और भी कई कारण हैं जो आप के सन्मुख कहे जावेंगे। मुझ पर दयादृष्टि रक्खा करो ॥ ॐ ॥ आप का दीन दास तीर्थराम, एफ, ए-क्लास मिशन कौलेज लाहौर
(6) तीर्थराम जी का हिन्दी भाषा सीखना । 16 अक्तूवर 1888
श्री महाराज भगत जी साहिव, मैं आप को वारम्वार प्रणाम करता हूं, आप की पत्रिका ने कृतकृत्य कर दिया। परमात्मा अब इस कार्य को सम्पूर्ण करे। अब मैं (हिन्दी) भाषा लिख पढ़ सकता हूं। आप कृपा दृष्टि रक्खा करें ॥ ॐ ॥ आप का दास तीर्थराम।
(7) तीर्थराम जी को छात्र वृत्ति की नित्य लगन 14 नवम्बर 1888
श्री महाराज सच्चिदानन्द स्वरूप, पूर्ण ब्रह्म, सर्वज्ञ, विभु, नित्य जी, मैं आप के चरणों में सब कुछ अर्पण करता हूं, आप की पत्रिका पहुंची, बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। अब हमारी
*(नोट-इस मास से जुलाई सन् 1889 के सारे पत्र हिन्दी भाषा में लिखे गये थे)।
त्रैमासिक परीक्षा इस सोमवार को आरम्भ होगी। आप की दया चाहिये। आप ने चाहा तो छात्र-वृत्ति* मिल जायेगी ॥ आप का दास तीर्थराम।
(8) तीर्थराम जी का संस्कृत सीखना। 25 नवम्बर 1888
श्री महाराज सच्चिदानन्द स्वरूप, सर्वव्यापक, सर्व- घटपूर्ण, सर्व शक्तिमान् जी, मैं आप के चरणों में अपने आप को अर्पण करता हूं। मैं और दो तीन अन्य विद्यार्थियों ने एफ-ए की परीक्षा के लिये कौलेज के पंडित जी से संस्कृत आरम्भ की है। केवल दो तीन पुस्तकें हैं, यदि तब तक तय्यार हो गई तो परीक्षा में ले लूंगा। यदि न हुई तो न लूंगा। पुरुषार्थ करूं तो कुछ वात ही नहीं, पर मैं आप की आज्ञा बिना कुछ करना नहीं चाहता। केवल आप की आज्ञा का भूखा हूं और आप की कृपा दृष्टि का चाहने वाला। मुझे उत्तर ज़रूर भेजना ॥ आप का दास तीर्थराम।
(9) तीर्थराम जी की शारीरिक दशा। 26 नवम्बर 1888
श्री महाराज सच्चिदानन्द स्वरूप, पूर्ण ब्रह्म, सर्व शक्तिमान्, सर्वज्ञजी, मैं आप के चरणों में सब कुछ अर्पण करता हूं।
*इस छात्र-वृत्ति से अभिप्राय म्युनिसिपल कमेटी गुजरांवाले की
आप की कोई पत्रिका नहीं आई...... आप के दर्शनों को जी (चित्त) बड़ा चाहता है। आप खुशी रक्खा करें। हमारी परीक्षा अब केवल कल मंगलवार को होगी। मेरी शारीरक दशा ऐसी है कि यदि एक दिन शौच आता है तो तीन दिवस तक नितान्त नहीं आता ॥ आप का दास तीर्थराम लाहौर
(10) वार २ छात्र-वृति की उत्कण्ठा। (तात्पर्य वना होने के कारण पत्र फ़ारसी में लिखा गया) 28 नवम्बर 1888
श्री महाराज सच्चिदानन्द स्वरूप, पूर्ण ब्रह्म, सर्व शक्तिमान् जी, मैं आप के चरणों में सब कुछ अर्पण करता हूं। आप के दो पत्र एक मेरे नाम और दूसरा लाला अयोध्या दास* के नाम आज मंगलवार को मिले। अत्यन्त हर्ष प्राप्त हुआ। हमारी परीक्षा आज समाप्त होगयी है। वह विद्यार्थी...
छात्र वृत्ति है जो इस लिये नियत थी कि जो छात्र उन के हाई स्कूल गुजरांवाले में एेटेंस परीक्षा में उतने नम्बर पा ले कि जो सरकारी छात्रवृत्ति पाने वाले विद्यार्थियों के नम्बरों के लग भग हों उसे दी जाय ! *लाला अयोध्यादास जिला गुजरांवाले के एक कस्बे (शेरखां जंडियाला) के रहने वाले हैं। जब तीर्थराम जी लाहौर में पढ़ते थे तो उस समय यह लाला जी लाहौर में शेखुपरे के राजा हरवंश के वकील थे। आज कल अपने ग्राम में स्थित हैं, और बड़े शुद्धात्मा, सत्संगी और सज्जन पुरुष हैं। यह भी तीर्थराम जी के साथ अति स्नेह रखते थे और इन की भक्ति व श्रद्धा भी भगत धन्नाराम में वैसी ही थी जैसी कि तीर्थराम जी की। इस लिये तीर्थराम जी ने अपने पत्र में इन के विषय वर्णन किया है।
जिसे कमेटी से छात्र-वृत्ति (वज़ीफा) मिली थी अब पढ़ना छोड़ बैठा है। सुना गया है कि कमेटी का मंत्री भी मास्टर चन्दूलाल* होगया है। इस लिये मैं आप की सेवा में प्रार्थना करता हूं कि आप लाला सरदारीमल आदि के द्वारा लाला शंकरदास आदि के सन्मुख मेरे (छात्रवेतन के) विषय कुछ विचार करें। और शिष्यवृत्ति का मेरा अधिकार भी है क्योंकि जिन विद्यार्थियों को सरकार से शिष्यवृत्ति मिली थी उन के पीछे मेरा ही नाम परीक्षावलि में आता है। मैं इस शनिवार को आप के चरणों में उपस्थित हूंगा। आप मुझ पर दयादृष्टि रक्खा करें। मैं आप का दास हूं। इति, विशेष सादर प्रणाम ॥ ॐ ॥ आप का दास तीर्थराम।