सन् 1888 ईस्वी।
(इस समय तीर्थराम जी की आयु साढ़े पन्द्रह वर्ष के लग भग थी)
†सुना गया है और कुछ इस पत्र से भी स्पष्ट होता है कि इस विद्यार्थी को शिष्यवृत्ति कुछ पक्षपात से कमेटी से मिली थी, पर कौलेज में प्रविष्ट होने के पश्चात् यह निरुद्योगी और आलसी पाया गया जिस से कौलेज के अध्यापकों ने इस विद्यार्थी के विरुद्ध रिपोर्ट करदी, तिस पर इसने कौलेज में पढ़ना छोड़ दिया ॥ *मास्टर चन्दूलाल जी गुजरांवाले के हाई स्कूल में प्रथम सैकंड मास्टर थे और तीर्थराम जी को पढ़ाया करते थे जिस से वह तीर्थराम जी की विद्याशक्ति और योग्यता से पूरे २ परिचित थे। अब वह म्यूनिसिपल कमेटी गुजरांवाले के मंत्री नियत हुए थे, और कमेटी की ओर से जो शिष्य वृत्ति विद्यार्थियों को मिलती थी उस के देने का अधिकार इन को होगया था, इस लिये इस पत्र में तीर्थराम जी से उन के नाम का वर्णन हुआ॥
(11) छात्र-वृत्ति की चिन्ता। मार्च 1889
श्री महाराज सच्चिदानन्द स्वरूप, सर्वशक्तिमान्, नित्य, अनन्त, विभु, अखंड, शुद्ध, बुद्ध, एक रस, आदिपुरुष अनिर्वाच्य जी! मैं आप को नमस्कार करता हूं। आप का कृपा पत्र कल मिला था, मुझे खांसी* ने तंग कर रक्खा है। औषधि भी बड़े किये हैं और भोजन पाप भी पांचवां डंग (वार वा काल) है, और एक ही स्थान पर बैठा भी नहीं रहता हूं क्योंकि प्रति दिन कौलेज जाता हूं, और भूख का नाम तक नहीं। छात्र-वृत्ति नहीं मिली। आप दयादृष्टि रक्खा करें। मैं आप का दास हूं ॥ आप का दास तीर्थराम।
(12) छात्रवृत्ति का मिलना। 16 मार्च 1889
श्रीमहाराज सच्चिदानन्द इत्यादि (पुर्वोक्त) मैं आप को सब कुछ अर्पण करता हूं। मैं यहां पहुंच गया हूं। मुझे वज़ीफा (छात्रवृत्ति) मिल गया है। आप दया रक्खा करें ॥ आपका दास तीर्थराम
*इस पत्र व अन्य कई एक पत्रों से स्पष्ट होता है कि तीर्थराम जी की शारीरक स्थिति नीरोग नहीं रहती थी बल्कि सारे विद्याध्ययनकाल तक वह नित्य रोगी ही रहे और ऐसी रोगी अवस्था में भी वह विद्या में सर्वोपरि उन्नति करते गये ॥
(13) कुसंग का त्याग ।. 21 अप्रिल 1889
श्रीमहाराज इत्यादि (पूर्वोक्त), मैं आपको सब कुछ अर्पण करता हूं, आप दया रक्खा करें। निःसन्देह कुसंग मनुष्य का नाश करदेता है। आप मुझे जिस प्रकार कहें, मैं उसी प्रकार करूंगा। कहो तो उस लड़के को आज ही जवाब देदूं, और कहो तो अभी कुछ काल तक न जवाब दूं (अर्थात् न निकालूं)। आप यदि शीघ्र दर्शन दें तो मुझे अति आनन्द हो। आप की सीहर्फ़ियां (कवितायें) अति सुन्दर अक्षरों में आपके लिये लिखवाई हुई यहां पड़ी हैं ॥ आपका दास तीर्थराम
(14) प्रार्थना का भाव। 28 मई 1889
सत्यं ज्ञानमनन्तं (ब्रह्म) आनन्दामृत शान्ति निकेतन, मंगलमय शिवरूपम् अद्वैतम् अतुलम् परमेशम् शुद्धम- पापाविद्धम्, मैं आपको सब कुछ अर्पण करता हूं, आप दया रक्खा करें। आपका पत्र कोई नहीं मिला, चित्त उस ओर रहता है............ 'शुद्ध करो मेरे मन को (प्रभु जी) !
* 29 मई 1889 से लेकर 30 अगस्त 1898 तक सारे पत्रों के आरम्भ में तीर्थराम जी ने अपने गुरु जी को "सत्यंज्ञानमनन्तम्ब्रह्म", इत्यादि उपमा स सम्बोधन करके लिखा है, पर प्रत्येक पत्र के आरम्भ में बार बार यह संबोधन लिखना उचित और आवश्यक नहीं समझा गया इसलिये उसके स्थान पर केवल "सम्बोधन पूर्वोक्त" ऐसा शब्द लिख दिया गया है ॥
पापी मन मम रकत न रोके। धीर धरो नहीं छिन (क्षण) को शुद्ध करो मेरे मन को" आपका दास तीर्थराम
(15) गुरुभक्ति का उदाहरण। 3 जून 1889
सम्बोधन पूर्वोक्त, आपका एक पत्र बहुत काल के पश्चात् मिला, बड़ा हर्ष हुआ.......... कुछ दिनों से लाला अयोध्यादास की वृत्ति बदल गयी हुई थी। वह एक भाई सुजान सिंह* के चेले (शिष्य) के पीछे लगा हुआ था, और उस शिष्य ने उसे यह कहा हुआ था कि मैं तुझको साक्षात् परमेश्वर दर्शाता हूं। इस कारण से लाला अयोध्यादास उसके पीछे लगा हुआ था, परन्तु अब मैं ने लाला जी का चित्त उस ओर से नितान्त हटा दिया है और वह आपके चरणों में दृढ़ हो गया है। महाराज जी ! मैं आपको हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूं कि आप इस सप्ताह (अर्थात् शनिवार को) अवश्य यहां पधारें ॥ आप का चरणसेवक तीर्थराम।
(16) निज-इच्छा विरुद्ध भी गुरु आज्ञानुसरण का भाव। 16 जुलाई 1889
सम्बोधन पूर्वोक्त,
*भाई सुजान सिंह गुजरांवाले में एक प्रसिद्ध मस्त और उन्मत्त सन्त थे।
हमें इस सप्ताह (अर्थात् शनिवार) को आशा है छुट्टियां होंगी, और नीरजनाभ मेरे साथ हमारे ग्राम में आना बड़ा चाहता है। आप यदि मुझे कहें तो मैं उसे लाऊंगा, नहीं तो न लाऊंगा। मैं आपके कहे पर चलूंगा। वह भाड़ा (किराया) अपने पास से देगा, और थोड़ा काल वहां रहकर उसका वापस चले आने का विचार है। मेरे पास वह पढ़ने के लिये रहना चाहता है। आप शीघ्र लिखें कि मैं उसे लाऊं या न लाऊं ॥ आप का दास तीर्थराम
(17) 22 जुलाई 1889
सम्बोधन पूर्वोक्त मैं आप का सेवक हूं, मेरे अपराधों को क्षमा करा करो। आप के दो पत्र मिले, बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। मैं नीरजनाभ को कदापि साथ न लाऊंगा। मैं आप का आज्ञाकारी हूं ॥
(18) तीर्थराम जी की अधीनता। 23 जुलाई 1889
सम्बोधन पूर्वोक्त आप के दो पत्र आज और मिले। मैं बड़ा ही पापी और अपराधी हूं। आप मेरे मन को शुद्ध करें, क्योंकि सब कुछ आप ही करने वाले हैं। मेरे पिता भी आप हैं, भाई भी और सब सम्बन्धी भी आप ही हैं। मुझ पर रहम (दया)
नीरजनाभ एक ब्राह्मण लड़का था जो तीर्थराम जी की रसोई बनाया करता था और साथ इसके बनसे विद्याध्ययन भी किया करता था। गुरु जी को इस लड़के का आचरण अच्छा प्रतीत नहीं होता था, इस लिये इसकी संगति से तीर्थराम जी को रोकते थे। परन्तु तीर्थराम
किया करो क्योंकि "अज़ खुर्दा ख़ता व अज़ बज़ुर्गा ख़ता" (छोटों से अपराध और बड़ों से क्षमा) चली आती है। मनुष्य से अपराध भी हो जाते हैं। मैं आप का दास हूं, जिस प्रकार कहोगे, उसी प्रकार करूंगा। आप का दास तीर्थराम
(19) अन्तःकरण की कोमलता। 24 जुलाई 1889
सम्बोधन पूर्वोक्त, आप का एक और पत्र आज मुझे मिला। मैं तो आप के संकेत (इशारे) को भी अत्यन्त स्पष्ट समझ जाता हूं, आप फिर मुझे वार २ क्यों ताकीद (अनुबोध) करते हैं?। मैं ने तो अब नीरजनाभ से बोलना भी छोड़ दिया है। मुझ पर आप क्रुध क्यों होते हैं ! मेरा आप के बिना कोई ठिकाना नहीं। मुझ पर दया दृष्टि करो। मुझ पर यदि आप प्रसन्न होंगे तो भी मैं आप का हूं, और यदि क्रुद्ध (नाराज़) होंगे तो भी मैं आप के चरणों में पड़ा रहूंगा। मुझ पर करुणा करो ॥ आप का दास तीर्थराम
सन 1890 ईस्वी (इस वर्ष तीर्थराम जी की आयु साढ़े सोलह वर्ष के लगभग थी)
जी को यह गरीव और भोलाभाला दिखाई देता था, इस लिये इसे पढ़ाने तथा अन्य प्रकार से सहायता देने में तत्पर रहते थे। तथापि वह अपने चित्त के अनुसार बिना गुरु की आज्ञा के कुछ नहीं करना चाहते थे इस लिये इस के विषय में उन्होंने ने पत्र द्वारा गुरु जी से आज्ञा मांगी ॥
(20) निरभिमानता । 11 फरवरी 1890
सम्बोधन पूर्वोक्त, हमारी वार्षिक परीक्षा के प्रवेश-शुल्क (इम्तिहान के दाख़ले) के लिये गुरुवार और शुक्रवार नियत हुए हैं। इन दिनों में से चाहे किसी दिन प्रवेश-शुल्क (दाख़ले) कौलेज में दे दें। मैं ने अभी लाला......से रुपये नहीं लिये ॥ अब महाराज जी ! मुझे बड़ी चिन्ता लगी हुई है, क्यों- कि मुझे अपने आप पर किंचिन्मात्र भी विश्वास (भरोसा) नहीं। मैं बड़ा अयोग्य (नालायक़) हूं। यदि मेरी छात्र-वृत्ति इस वार न लगी तो मेरे चित्त को अति खेद होगा। आप साक्षात् परमेश्वर हैं, सब कुछ कर सकते हैं, सब कुछ जानते हैं। किंबहुना आप की उपमा मेरी लेखनी की आवश्यकता नहीं रखती। अब बात यह है कि अभी तो समय है, यदि आप की सम्मति में मुझे इस वर्ष प्रवेश-शुल्क (दाखला) भेजना उचित हो तो मैं भेज देता हूं, नहीं तो अगले वर्ष परीक्षा दे दूंगा। मैं आप का सेवक हूं, आप ने उत्तर विचार कर शीघ्र लिखना। मुझे अपनी प्रवीणता (हुश्यारी) और परि- श्रम पर कुछ विश्वास नहीं। पर हां यदि आप सहायता दें, तो मुझे सब कुछ आशा हो सकती है, मुझे इस वर्ष छात्र- वृत्ति मिल सकती है !! इतना काल वीता, आप का पत्र कोई नहीं आया, क्या कारण है ? अब मुझे आप ने भुला दिया है ? जब किसी के मन्द (बुरे) दिन आते हैं, तो ऐसा ही होता है। आप का दास तीर्थराम
(21) तीर्थराम जी को वार्षिक परीक्षा का प्रवेश पत्र भरना। 12 फरवरी 1880
संबोधन पूर्वोक्त, मैं आप के चरणों में सब-कुछ अर्पण करता हूं, आप दया रक्खा करें। कल तक मैं ने यह समझा हुआ था कि परीक्षा में प्रवेश होना अथवा न होना मेरे वश (इख़्तयार) में है, पर यह बात नहीं निकली। आज साहिब ने सब से पूर्व मुझ से फ़ार्म (प्रवेश पत्र) पर नाम लिखवा लिया है। और जब फ़ार्म पर नाम लिखा गया तो प्रवेश शुल्क (दाख़ला) अवश्य देना पड़ेगा। और परीक्षा में अवश्य जाना पड़ेगा। इस लिये मैं आज लाला ‥‥‥‥ से रुपये कल प्रवेश-शुल्क (दाख़ला) देने के लिये ले आया हूं। अब आप ने अवश्य दया करनी। मेरे अपराधों को क्षमा करना, मुझ पर दया रखनी, मैं आप का दास हूं॥ आप का दास तीर्थराम
(22) बुरे स्वभाव वाले पड़ोसी से उपराम (परहेज़) 8 मार्च 1880
संबोधन पूर्वोक्त, ‥‥‥‥‥‥आज दो बजे हमारे पास का मकान वेश्याओं ने ले लिया है और वह आज ही इस मकान में आना चाहती हैं. इस लिये अभी थोड़े काल के लिये हम आज ही कोई और मकान किराया पर ले लेंगे। फिर जब आप आयेंगे तो
अन्य किसी अच्छे मकान की योजना (तज्वीज़) कर लेंगे‥‥ मैं आप का सेवक हूं। आप अवश्य शीघ्र पधारें। आप मुझ पर क्रुद्ध (नाराज़) क्यों हैं? मैं तो आप का दास हूं। दास तीर्थराम
(23) परमेश्वर का दया और शान्तस्वरूप गुण। 10 मार्च 1880
संबोधन पूर्वोक्त, न तो आप ही आते हैं और न पत्र ही भेजते हैं। न मालूम मैं ने क्या अपराध किया है जो मेरी ओर से आप का चित्त इस प्रकार खिंच गया (अर्थात् उपराम होगया) है। परमेश्वर के गुणों में से दयास्वरूप और शान्तस्वरूप होना एक बड़ा भारी गुण है। फिर आप मेरे प्रमादों (भूलों) की उपेक्षा (दर गुज़र over-look) क्यों नहीं करते? मुझे प्रतीत होता है कि आप को मेरे विषय कोई बुरी बात ईश्वर की ओर से प्रतीत हुई है, इस लिये आप मेरे साथ अब बोलते नहीं, जिस से कोई यह न कहे कि तीर्थराम भगत जी का (सेवक) था और फिर अपनी वांछा (मुराद) को प्राप्त न हुआ। पर महाराज जी! आप लोगों के कथन पर ध्यान मत दें। मेरी तो यह दशा है कि:-
"गर वख्तानी है दरस्त, व अर वरानी है दरस्त जाय दीगर मन नदानम, है सरस्त व है दरस्त"
(तात्पर्य) यदि आप बुलायं वा सत्कार करें तो आप का ही द्वार है और यदि तिरस्कार करें तो भी आप का ही द्वार है। मैं और स्थान नहीं जानता, मेरा यह सिर है और आप का यह द्वार है।
आनां कि ख़ाक रा वनज़र कीमिया कुनद्। आया बुवद कि गोशये चश्मे वमा कुनद्॥ (अर्थ):- जो हम भूलें वचन उचारे, क्षमा करो अपराध हमारे॥ आप का दास तीर्थराम
(24) ऐफ़-ए की वार्षिक परीक्षा। 20 मार्च 1880
संबोधन पूर्वोक्त, आज हमारी फ़ारसी की परीक्षा होगयी है। परसों गणित-शास्त्र की जिसे मैथेमैटिक्स भी कहते हैं परीक्षा होगी। गणित शास्त्र सब से कठिन विषय है और सब से अतिगूढ़ है। आप दया रक्खें। आप की सहायता बिना कुछ हो नहीं सकता। दास तीर्थराम
(25) 23 मार्च 1880
संबोधन पूर्वोक्त, आज के परीक्षा पत्र बड़े कठिन आये थे। परसों हमारी साइन्स (विज्ञान-शास्त्र) की परीक्षा है, जो कि महा कठिन विषय है॥ दास तीर्थराम
(26) 25 मार्च 1880
संबोधन पूर्वोक्त, आज हमारी विज्ञान-शास्त्र (साइन्स) की परीक्षा हुई,
प्रायः सब प्रश्न ही, पुस्तक से बाहर थे। परसों अंग्रेज़ी व साइन्स (विज्ञान-शास्त्र) की मुखपरीक्षा (ओरल) होगी। विज्ञान-शास्त्र की मुखपरीक्षा अत्यन्त कठिन है, कारण यह कि यदि उस में कोई उत्तीर्ण (पास) न हो तो सारे विज्ञान-शास्त्र में फ़ेल (अनुत्तीर्ण) गिना जाता है। अंग्रेज़ी की मुखपरीक्षा भी कठिन ही हुआ करती है। आप अवश्य मेरा ध्यान रक्खा करें। दास तीर्थ राम,
(27) तीर्थराम जी को उग्र ज्वर। 16 अप्रिल 1880
संबोधन पूर्वोक्त, अभी हमारी परीक्षा का परिणाम नहीं निकला, कदाचित् (शायद) आज या कल निकल आवे। कल मंगलवार मैं अति बीमार होगया था। दस बजे दिन को उग्र (सख़्त) ज्वर चढ़ गया, और सिरपीड़ा तथा कमर-पीड़ा उस से अतिरिक्त थे। न मेरे पास कोई मनुष्य मात्र था। यह उग्र ज्वर लगभग रात के बारह बजे तक रहा। अब आराम है। ‥‥‥आप दया करें। मैं आप का सेवक हूं। यह पत्र लिख चुकने के पश्चात् आप का एक पत्र मिला, बड़ा हर्प हुआ। दास तीर्थराम
(28) दृढ़ निश्चय समान कोई पदार्थ संसार में नहीं। 4 मई 1880
संबोधन पूर्वोक्त, आज आप की बहुत ही राह ताकी। आपका बड़ा ही
इन्तज़ार किया), पर आप नहीं आये। मन को अति दुःख हुआ। यदि आप ने न आना था तो पत्र ही भेज देते। सो आप ने वह भी नहीं किया। चित्त में विचार उठ रहे हैं कि क्या कारण जो आज नहीं आये, शायद चचा जी (पिताजी) नहीं मिले या शायद आपकी अथवा उनकी प्रकृति में कुछ बिगाड़ है, अथवा और क्या अकस्मात विघ्न पड़ गया। एक दृढ़ निश्चय के समान संसार में अन्य कोई वस्तु नहीं। दास तीर्थ राम,
(29) डाक्टर रघुनाथ मल की सहायता 13 मई 1880
संबोधन पूर्वोक्त, आज सायंकाल की गाड़ी से चचाजी (पिताजी) के चले जाने का विचार है। आज मौसा (पं॰ रघुनाथ मल) जी ने पचास रुपये भेज दिये हैं। आज मैं पुस्तकों के लिये लिख देता हूं, आप पत्र लिखते रहा करें। सेवक तीर्थराम,
________________________ *पंडित रघुनाथ मल जी तीर्थराम जी के मौसा (मासड़) थे। वह हांसी हिसार आदि प्रान्त में असिस्टैण्ट सर्जन थे। जब तीर्थराम जी ने प्रवेश (एन्ट्रेन्स) परिक्षा पास की, तो उन के पिता निर्धन होने के कारण उन्हें आगे पढ़ाना नहीं चाहते थे बल्कि किसी दफ़्तर में नौकर होने के लिये विवश करते थे। पर तीर्थराम जी नौकरी के लिये उद्यत नहीं होते थे, किन्तु आगे पढ़ने पर उत्सुक थे। तीर्थराम जी के इस उत्तम आशय को पालन कराने में जिन सज्जनों ने सहायता की उन में पंडित रघुनाथ मल जी मुख्य थे॥
*पुस्तकों से तात्पर्य यहां बी. ए. श्रेणि की पुस्तकों से है, क्योंकि इस काल तक तीर्थराम जी बी. ए. में प्रविष्ट हो चुके थे।
(30) रुपयों का खोया जाना और काले सर्प की पूँछ का ऊपर आ पड़ना। 14 मई 1880
संबोधन पूर्वोक्त, आप का पत्र आये बहुत काल होगया है। आप शीघ्र कृपा करें। जब मैं इस मकान में आया था सब सामान तो बाहर की कोठरी में रक्खा था, पर सन्दूक भीतर की कोठरी में। उस सन्दूक में पचास रुपये पं॰ रघुनाथ मल वाले और सात रुपये जो छात्रवृत्ति* के मिले थे रक्खे थे। पचास रुपये चाचा जी (पिता जी) अपने हाथ से रख गये थे, और सात रुपये उन से पहिले एक कागज़ में बन्द करके मैं ने आप रक्खे थे। कल मैं ने सोचा कि वह सात रुपये कागज़ से निकाल कर उन पच्चास रुपयों के साथ मिलाकर रखदूं। पच्चास रुपये तो वहां पड़े हुए पाये किन्तु सात रुपये न निकले। उस समय तो मैं ने सन्दूक बन्द करके ताला लगा दिया। फिर सायंकाल को सोचा कि पुनः देखूं। कोठड़ी का द्वार खोलते ही एक काले सर्प की पूँछ बड़े ज़ोर से मेरे ऊपर आन पड़ी। मैं डरकर बाहर दौड़ आया, और एक मनुष्य से कोठड़ी को ताला लगवा कर ऊपर कोठे (छत) पर जा बैठा। आज सन्दूक को कोठड़ी के भीतर से बाहर निकलवाया है, और बाहर के कमरे में रक्खा है। किन्तु सन्दूक का कोना २ सब पुस्तकें बाहर निकाल कर देखा है, तथापि उन सात रुपयों का पता तक नहीं मिला।
________________________ * छात्र-वृत्ति से तात्पर्य म्यूनिसिपल कमेटी गुजरांवाले की छात्र-वृत्ति है, सरकारी छात्र-वृत्ति से नहीं॥
महाराज जी! मैं ने सन्दूक तथा कोठड़ी दोनों को चिना ताला लगाये कदापि नहीं छोड़ा, पर यह बड़े आश्चर्य की बात हुई है। महाराज जी! जिस सर्प का मैं ने वर्णन किया है उस से अतिरिक्त एक या दो अन्य सर्प भी साथ के तवेले (अश्वशाला) में अवश्य रहते हैं क्योंकि उस मकान में मैं सपों के चलने की रगड़ के चिन्ह बहुधा पाता हूं। आप दया रक्खा करें और मुझ को भुला न दें॥
यद्यपि इस मकान में सर्प तो अवश्य हैं, पर प्रति दिन मकान के बदलने में अति कष्ट होता है, इसलिये मैं अभी इस मकान से उपराम नहीं हुआ। आप कृपा रक्खा करें, मैं आप का सेवक हूं। दास तीर्थराम
(31) कर्तव्य-निष्ठा। 21 मई 1880
संबोधन पूर्वोक्त, कल आप का एक पत्र मिला था। बड़ा हर्प प्राप्त हुआ। पुस्तकों के विषय में तो कल मैं ने आप को लिख ही दिया था, आने के विषय में यह है कि मुझे आप की आज्ञा से तो किञ्चित् इन्कार नहीं, परन्तु कार्य इतना अधिक है कि यदि मैं अपने कर्तव्य पालन में त्रुटि न करूं तो सिर खुजलाने को भी अवकाश नहीं मिलता। आगे जैसा आप लिखेंगे, वैसा ही करलूंगा। आप का दास तीर्थराम
(32) कालेज के काम (अर्थात् अभ्यास) का भार। 6 जून 1880
संबोधन पूर्वोक्त, आप ने पत्र में विलम्ब क्यों किया है? मेरी ओर से कोई फ़र्क़ (विभेद वा विच्छेद) नहीं है। मैं सत्य कहता हूं कि आज कल हमें बड़ा ही (अभ्यास का) काम होता है, इसलिये मैं नहीं आ सका। अब हमें नाम मात्र तो दो छुट्टियां मिली हैं, परन्तु काम इतना है कि दो सप्ताह में भी कठिनतापूर्वक पूर्ण हो सकता है। अन्ततः अधूरा काम करना पड़ता है। आप ने कोई और ख़्याल मन में न लाना। मैं आप का दास (गुलाम) हूं। आप अब आ जायं। आप का दास तीर्थराम
(33) ऐनक की आवश्यकता। 11 जून 1880
संबोधन पूर्वोक्त, पिछले आदित्यवार में अपने साहिब की चिट्ठी लेकर आँखें दिखाने गया था। तब आँखें देखने वाले साहिब (डाक्टर) ने मुझे एक पत्र लिख दिया था, वह पत्र मैं ने बम्बई भेजा है। वहां से मुझे पाँच रुपये की ऐनकें जो मेरे योग्य हों आयेंगी। इस शनिवार हमारी गणित की परीक्षा है। यहां वर्षा बड़ी हुई है, इस लिये मेरे मुख का स्वाद कल से किञ्चित् कम कड़ुवा है, और भूख भी कुछ अधिक है॥ आप का दास तीर्थराम
(34) नेत्रों की दूरदृष्टि में कमी। 25 जून 1880
संबोधन पूर्वोक्त, मैं उस डाक्टर के पास गया था जिस ने मुझे ऐनकों के लिये बम्बई पत्र लिख दिया था। उस ने मेरी ऐनकों को अपने सन्दूक की ऐनकों के साथ मिलाया तो यह वही ऐनकें निकलीं जो लिखी थीं। मैं ने डाक्टर जी से कहा कि मैं इन से अच्छे प्रकार पढ़ क्यों नहीं सकता। वह कहने लगे कि यह पढ़ने के लिये नहीं हैं, दूर से देखने के लिये हैं। और तुम्हें अभी पढ़ने के लिये ऐनकें नहीं ख़रीदनी चाहिये। महाराज जी! इन से मैं दूर से भली प्रकार देख सकता हूं। कालेज का बोर्ड अच्छा दिखाई देता है। हमारे कालेज के साहिब ने भी कहा कि जिस प्रकार तुम्हें वह डाक्टर कहे उसी प्रकार कर। इस लिये मैं ने अभी ऐनकें वापस नहीं कीं। आप की क्या सम्मति है॥ आप का दास तीर्थराम
(35) ज़ाहरदारी (अर्थात् बाह्य आचार वा बर्ताव) पर आभ्यन्तर अवस्था को प्रधानता। 24 जून 1880
संबोधन पूर्वोक्त, महाराज जी! आप मुझ पर क्रुद्ध (नाराज़) हैं, पर मैं जानता हूं कि इस क्रोध का कारण इस से अतिरिक्त और कोई नहीं है कि आप ने मेरे हृदय को नहीं देखा, केवल बाह्य आचरण तथा व्यवहार को देख कर ही आप मेरे विषय बुरे अनुमान कर बैठे हैं। यदि आप मेरे हृदय को देखें तो मैं आशा करता हूं कि आप क्रुद्ध न हों।
आप ने यह अनुमान न करना कि यदि मेरी ओर से किसी बाह्य सन्मान तथा सेवा में कोई त्रुटि हो गयी है, तो उस का कारण आप की ओर से मेरे चित्त का विमुख हो जाना है। यह बात कदापि नहीं है, क्योंकि मैं प्रत्येक कार्य में आप की सहायता का आकांक्षी हूं, और अपने चित्त में सर्वदा आप का ध्यान रखता हूं। प्रथम तो अभ्यास अथवा और किसी उत्तम कार्य की ओर चित्त लगने में आप की सहायता की आवश्यकता है, फिर उस कार्य के उद्योग में आवश्यक पदार्थों की प्राप्ति के लिये आप की सहायता चाहिये। तत्पश्चात् यदि उस कार्य में परिश्रम किया जाये तो उस के सफल होने में भी आप की सहायता की आवश्यकता है। संक्षेप से यह कि प्रत्येक कार्य में आप की सहायता की आवश्यकता है।
यदि किसी बाह्य व्यवहार तथा सेवा में त्रुटि हुई है, तो उस का कारण ऐसा है:- दृष्टान्त रूप से, यदि मैं पढ़ने में परिश्रम करूं और उस पढ़ने में केवल स्वार्थ ही दृष्टिगोचर हो और आप की ओर से चित्त हटा लूं तो निःसन्देह यह बड़ी बुरी बात है। पर मेरी ऐसी दशा नहीं है। मैं अगर परिश्रम करता हूं तो मेरे चित्त में (मैं बिल्कुल सत्य कह रहा हूं, आप ने कोई और अनुमान न करना) किञ्चित् अपना रस (स्वार्थ) भी दृष्टि में रहता है, परन्तु विशेषतः यह ख़्याल होता है कि यह पढ़ना आप का काम है। यदि मैं अच्छा पढ़ूं (अभ्यास करूं), तो मानो आप की अधिक आज्ञा पालन की है, और आप की सेवा विशेष करके की है। और आप के विरुद्ध अंशमात्र भी कोई काम नहीं कर रहा। अब यदि पढ़ने की ओर मैं अधिक ध्यान दूं और आप की बाह्य सेवा में किसी प्रकार से यदि त्रुटि हो जाये (पर
मैं सत्य कहता हूं कि मेरा मन नितान्त पूर्ववत् है बल्कि पूर्व से भी बहुत भले प्रकार आप का आज्ञाकारी है) तो चाहे बाह्य-द्रष्टा की दृष्टि को मेरी त्रुटि का अनुमान हो, परन्तु अन्तर्द्रष्टा की दृष्टि को स्पष्ट प्रतीत होरहा है कि मैं पहिले से भी अधिक आप की सेवा कर रहा हूं। चाहे अब यह प्रतीत हो रहा है कि मेरा ख़्याल आप की (बाह्य सेवा इत्यादि की) ओर कम है, परन्तु बाह्य रूप से मेरा यह कम ख़्याल आप की ओर प्रतीत होना अन्त में मुझे ऐसा योग्य कर देगा कि आप की सेवा लक्षगुण अच्छी करूं, यदि आप मेरी बाह्य-चेष्टा पर क्रुद्ध (या असन्तुष्ट) न हो जायें और मेरे परिश्रम (जो कि आप का काम है) के सफल होने में सहायता दें, क्योंकि अन्त में मैं आप की सहायता का दीन हूं। यह कहावत प्रसिद्ध है "हिम्मते मर्दां मद्दे-ख़ुदा" जिस का अर्थ मैं यह करता हूं कि मनुष्यों के यत्न में ईश्वर की सहायता की आवश्यकता है॥
मेरा यह पढ़ना (अध्ययन करना) आप का बहुत बड़ा काम है। बर्ताव (सत्कार तथा सेवा आदि) के कामों को भले पुरुष इतना बड़ा काम नहीं समझते। इस लिये आप का बहुत बड़ा काम करने में (अर्थात् पढ़ने में) यदि आप के किसी छोटे (बाह्य सन्मानादिक) काम में त्रुटि हो जाये, तो क्षमा करदें॥
फिर यह कि कई पुरुष होते हैं जो केवल मन से अधिक सेवा कर सकते हैं और कई बाह्य पदार्थों से। परन्तु मैं चाहे किसी बाह्य-पदार्थ से आप की सेवा न कर सकूं, पर मन से तो आप का बड़ा आज्ञाकारी हूं।
जो विद्यार्थी घरों से पढ़ने आते हैं वे (पढ़ने में अधिक प्रवृत्त रहने के कारण) अपने पिता माता को पत्र तक भी
बहुत कम लिखते हैं। उनका (इस प्रकार) आपने माता पिता की ओर अधिक ख़्याल होना तो दूर रहा, परन्तु उन के माता पिता भी कभी यह अनुमान नहीं करते कि हमारा पुत्र हमारे विरुद्ध हो गया है। वे समझते हैं, हमारा ही काम कर रहा है॥
यदि आप यह कहें कि एक दूसरे के बाह्य सत्कार की ओर अधिक ध्यान न देने से प्रेम में त्रुटि हो जाती है, तो यह बात मेरे विषय में नितान्त नहीं, क्योंकि मैं तो मन में आप का बड़ा ही ध्यान करता रहता हूं। प्रत्येक कठिन स्थान में आप याद रहते हैं। और यह एक प्रकार का आभ्यन्तर मिलाप होता है (चाहे बाह्य दृष्टि से आप को प्रतीत न हो)। साथ इसके मेरा आप का सम्बन्ध पिता पुत्र का है जिस के टूटने का प्रलयकाल (क़यामत) में भी भय (सन्देह) नहीं होता। आप और कुछ अनुमान न करें, मेरा मन तो सदा साफ़ (शुद्ध) है॥
फिर यह कि जो अनुचित काम मनुष्य से होता है, उस के कारण दो हो सकते हैं:- प्रथम मूर्खता या अज्ञानता, द्वितीय उस के मन की अपवित्रता वा मलिनता। जब मेरे से कोई अनुचित व्यवहार प्रतीत हो, तो आप यह विचारें कि उस का कारण क्या है। यदि पहिला कारण हो (केवल जो कारण मेरे अनुचित कामों में सर्वदा होता है), तो आप इस को दूसरा कारण समझ कर मुझ पर क्रुद्ध (या असन्तुष्ट) न हो जाया करें। बल्कि चाहिये कि यदि किसी से कोई अनुचित बर्ताव, अज्ञानता से हो जाये, तो उस पुरुष को उस की अज्ञानता का बोध करादें, पर उसे यह न कहें कि "तेरा मन शुद्ध नहीं है, और तू मलीन चित्त वाला है, या तेरा हमारी ओर चित्त बुरा है"।
अब यदि कोई और कारण आपके क्रोध (असन्तुष्टता) का है तो वह अवश्य लिखदें क्योंकि जब तक मनुष्य को कारण न बताया जाये वह क्या जाने कि कोई क्यों नाराज़ (रुष्ट) है। यह अवश्य कृपा करनी कि अपने मन का क्रोध एक पत्र में प्रकट कर भेजना, और मेरी मूर्खता पर मुझे सूचना देनी। आप अवश्य मेरे विषय में बुरा अनुमान जो आप के चित्त में है हटा दें॥
पत्र के भारी हो जाने के भय से मैं इसे समाप्त करता हूं, और विश्वास करता हूं कि आप इतने (लेख) से ही मेरी आभ्यन्तर दशा से सुबोध होजायेंगे, और कृपा पत्र लिखेंगे॥ ॐ॥ आप का दास तीर्थराम
(36) धार्मिक विषयों में अनुराग 4 जुलाई 1880
संबोधन पूर्वोक्त, अभी पंडित रघुनाथ मल जी ने रुपये नहीं भेजे। महाराज जी! आप एक दो पैसे वाले लफ़ाफ़े में लिखें कि आप जब लाहौर में आये थे तो बावा† जवाहरदास के साथ आप का क्या संवाद हुआ था, क्योंकि उसने यहां यह प्रसिद्ध कर रक्खा है कि भगत जी ने इस बात के सिद्ध करने में मेरे साथ सम्वाद किया था "कि जो मनुष्य मरता है (चाहे वह कौन हो), उसको अपने पाप पुण्य का फल कुछ नहीं मिलता, चाहे वह भले कर्म करे, चाहे बुरे, वह मुक्त हो जाता है"।
________________________ † जवाहरदास एक उदासी साधु थे जो प्रायः गुजरांवाले जिले में घूमते रहते थे और कभी कभी लाहौर आ जाया करते थे।
क्या आप ने सचमुच इस बात (विषय) के सिद्ध करने में उसके साथ संवाद किया था। परन्तु मैं आशा करता हूं कि बावा जी ने आप के कथन का तात्पर्य नितान्त नहीं समझा होगा। इस लिये उन्होंने झूठ मूठ यह बात प्रसिद्ध करदी है, और मुझे अयोध्या दास ने कहा है कि बावा जी ने यह बात प्रसिद्ध की हुई है*।
(37) कुल्फी न खाने की प्रतिज्ञा। 8 जुलाई 1880
संबोधन पूर्वोक्त आप का कृपा पत्र कोई नहीं आया, क्या कारण है?, आप अवश्य पत्र लिखें। आज पं॰ रघुनाथ मल जी के दस रुपये भेजे हुए मुझे मिले हैं, परन्तु यह बड़ी शीघ्र ही ख़र्च हो जायेंगे। पुस्तकों पर बड़ा ख़र्च आता है। मैं व्यर्थ ख़र्च नितान्त नहीं करता। जिस दिन आप के सन्मुख मैंने कुल्फियां खाई थीं, उस दिन से मैं ने नित्य के लिये कुल्फी खानी नितान्त छोड़ दी है। आप दया रक्खा करें। आप का दास तीर्थराम,
(38) गुरु जी के रोष (ख़फ़गी) को दूर करने की अत्यन्त चिन्ता। 12 जुलाई 1880
संबोधन पूर्वोक्त आप लिख तो दिया करें कि हम इस बात पर रुष्ट हैं
________________________ *भगत जी महाराज से अभी मालूम हुआ कि उन्होंने साधारण पुरुष के विषय में ऐसा नहीं कहा था केवल इतना कहा था कि ज्ञानी को, चाहे वह किसी जाति का हो, किसी कर्म का लेप नहीं होता, वह मर कर मुक्त हो जाता है।
(जब रोप का कारण मालूम न हो और केवल इतना ही मालूम हो कि आप रुष्ट हैं, तो बड़ा खेद होता है)। मैं बारंबार आप को ध्यान दिलाता हूँ कि यदि कोई अनुचित काम मुझ से हुआ है, तो वह जान बूझ कर कदापि नहीं हुआ होगा। उस का कारण मेरी अज्ञानता होगी। आप क्षमा करदें। क्या वह पत्र जिस में मैं ने चावा जवाहरदास के चिप्रय में कुछ लिखा था आप के रोप का कारण है? यदि ऐसा है, तो आप रुष्ट न हों क्योंकि वह सारा पत्र अयोध्यादास के कहने पर था, मुझे उस से कुछ सम्बन्ध नहीं। चाहे आप कोई बात कहें मुझ को आप पर किञ्चित् आपत्ति (पत्तराज़) नहीं। इस लिए अब तो एक पत्र लिखो। और भविष्य में इस प्रकार तुच्छ तुच्छ बातों पर रुष्ट होना कुछ कम करदें तो अति कृपा होगी। जब मैं आप के कहने मात्र से मान जाता हूं, तो रुष्ट क्यों होना? जब छड़ी से काम चल जाये, तो डंडे की क्या आवश्यकता है?
आप का दास तीर्थराम,
(36) छात्रकाल में मन का उद्वेग। 12 जुलाई 1880
संबोधन पूर्वोक्त,
आप का एक पत्र मिला, बड़ा आनन्द हुआ। हमें छुट्टियां पहिली अगस्त या उससे दो तीन दिन पहिले को होंगी...... मैं परमेश्वर से या आप से प्रार्थना करता हूं कि किसी प्रकार छुट्टियों में मैं बड़ा परिश्रम करूं, किसी प्रकार से कालक्षेप न हो, और मेरा परिश्रम यथार्थ रीति से हो, और परमेश्वर उस परिश्रम को सफल करे। क्योंकि मैं अपने आप को बड़ा ही अयोग्य (नालायक़) समझता हूं, और
वास्तव में मैं भी बड़ा ही अयोग्य। इसलिये जो मेरा संकल्प है उस का तात्पर्य यही है कि किसी प्रकार से मैं परिश्रम अधिक करूं, और लक्ष्य नहीं। मैं आशा करता हूं कि मुझे ऐसे संकल्प में अवश्य सहायता देंगे। मेरी अवस्था पर अवश्य तरस (दया) करो...... मैं चाहे यहां रहूं चाहे वहां रहूं,आप का तो दास हूं। इस समय जो मेरा संकल्प है वह मैं लिख देता हूं। यदि यह बदल गया तो भी लिखूंगा। संकल्प पड़ा हो, आप ने यह न अनुमान करना कि आप के विरुद्ध है, क्योंकि मेरे प्रत्येक संकल्प से मुख्य उद्देश्य यह होता है कि आप के साथ प्रीती (सत्कार) और भी अधिक हो। मेरा लक्ष्य उस के विरुद्ध नहीं होता। अब संकल्प यह है:- "कि पहिले कुछ दिन अर्थात् सात या आठ दिन के लगभग तो नितान्त लाहौर में ही रहूं, और उन दिनों में अपने पिछले पढ़े हुए (अधीत पाठ) का अभ्यास (पुनरावर्तन) करूं (यदि हांसी न जाना पड़ जाये, तो)। तदपश्चात् गुजरांवाले कुछ दिन रह कर देखूं कि पढ़ा जाता है या नहीं। पांच चार दिन बैरोके रहने का भी संकल्प है, और कुछ दिन मुरालीवाले साथ इसके हांसी जाने का भी विचार है, क्योंकि मासड़ (मौसा) ने लिखा था। यदि वहां एकान्त स्थान मिल गया तो वहां ही शायद अधिक दिन अर्थात् एक मास के लगभग रह पडूं। और पिछली (अन्तिम) छुट्टियां फिर लाहौर में आकर काटूं॥ परन्तु रघुनाथ* शरण के लिये मैंने एक अति उत्तम बात सोची है जिससे वह अच्छा भी हो जाय और अध्यापक की भी उसे कम ज़रूरत पड़े। आप से यही मांगता हूं कि मेरा किसी प्रकार से कालक्षेप न हो।...... अब और बात लिखता हूं। अब तक हांसी से मैं 70) सत्तर
* रघुनाथ शरण भगत धन्नाराम जी की बुआ का लड़का था।
रुपये मंगा चुका हूं, तीस और मंगवाने हैं। वह इस लिये नहीं मंगाये थे कि उनसे जो पुस्तकें खरीदनी थीं वह भारत वर्ष में नहीं मिल सकती थीं, परन्तु अब भारतवर्ष के ग्रन्थ विक्रेता (बुकसैलर) के पास थोड़े दिनों तक वह पुस्तकें विलायत से आ जानी हैं, और मेरी श्रेणि के सब विद्यार्थी उन पुस्तकों को छुट्टियों से पहिले खरीद लेंगे जिससे छुट्टियों में उन्हें अपने घर देखें। इस लिये मैं भी उचित समझता हूं कि रुपये मंगा लूं। यों ही पुस्तकें आयें, खरीद लूं। उन पुस्तकों पर तीस रुपये से कुछ कम लगेगा। बीस रु० के लगभग लगेंगे। बाक़ी के रुपये आप की दौलत हैं। थोड़े से मुझे भी दे देने। आप लिखें कि रुपये अभी मंगाऊं या नहीं। ॐ॥
आप का दास तीर्थराम
(40) लाहौर में छुट्टियां व्यतीत करने के विषय में अति उत्तम युक्तियां और उदाहरण 18 जुलाई 1880
संबोधन पूर्वोक्त,
हमें छुट्टियां प्रथम अगस्त से होंगी। आज 18 जुलाई है। मैं आप का सदा आज्ञाधीन हूं। आप कोई और अनुमान कभी न करें। जिस कार्य में कोई मनुष्य नित्य प्रवृत हो, उसे कुछ काल के पश्चात् एक शक्ति प्राप्त होजाती है, जिससे उसको बिना विचारे उस कार्य के संबन्ध में जो अच्छी बात हो वह सूझ जाती है। और उस अच्छी बात के अच्छा होने की जो युक्तियां हैं उनका प्रभाव तो उसके मन में पड़ जाता है, चाहे वह सिद्ध करने की युक्तियां स्वयं उसके मन में न
आयें। और बहुधा ऐसी युक्तियां मन में नहीं भी आतीं, क्योंकि युक्तियों का आना और बात है (यह पंडितों व शास्त्रवेत्ताओं का काम है और सारे मनुष्य पंडित या शास्त्रवेत्ता नहीं होते), और वह शक्ति जिससे यह प्रतीत हो जाता है कि अमुक काम ठीक है, पर उस काम के होने में युक्ति मन में नहीं आती, उस शक्ति का नाम संज्ञान (Conscience या ज़मीर) है। मैं जब छोटा था, तो कविता इत्यादि पढ़ने से शीघ्र भांप लेता था कि अमुक कविता उसी वृत्त (metre, छन्द) पर है जैसी कि अमुक दूसरी, या अमुक कविता और छन्द की है, परन्तु यह नहीं जानता था कि क्या वृत्त (छन्द) है, और उन दोनों में भेद किस बात में है, यद्यपि इतना प्रतीत होता था कि कुछ भेद उन में अवश्य है। अर्थात् अपने अनुभव के सिद्ध करने में युक्ति नहीं दे सकता था यद्यपि अनुभव नितान्त सत्य होता था। जैसे केवल दश वर्ष के अभ्यास के पश्चात् अब कविता के विषय में मैं युक्ति देने के योग्य हुआ हूं और जानता हूं कि यह युक्ति उस समय भी दी जा सकती थी, चाहे मैं युक्ति से अपरिचित था, अर्थात् युक्ति अवश्य थी यद्यपि मैं नहीं जानता था। इस से यह सिद्ध हुआ कि सच्चा मनुष्य सर्व काल युक्ति नहीं दे सकता, कोई कोई समय उस की बात बिना युक्ति सुने भी माननी चाहिये, यदि इतना हमें विश्वास हो कि "वह मनुष्य जान बूझ कर बुरा काम नहीं करने वाला, और यदि वह ऐसा काम कर रहा है कि जिस में वह युक्ति नहीं दे सकता, तो वह अपने अन्तरात्मा (ज़मीर) के अनुसार चल रहा होगा।"
(उक्त दृष्टान्त का) दार्ष्टान्त यह है कि मैं आप को निश्चय दिलाता हूं कि मैं आप का अन्तः हृदय से सेवक हूं,
और जो काम मैं करता हूं, चाहे ऊपर से मैं उस विषय युक्ति न दे सकूं, पर वास्तव में वह काम ऐसा होता है जैसा मुझे इतने वर्ष का अभ्यास दर्शाता है कि यह काम अच्छा है, और इस काम के करने में कल्याण होगा। इस लिये आप कहीं यह न अनुमान कर बैठें कि जब यह (अर्थात् मैं) युक्ति नहीं दे सकता तो इसको (अर्थात् मुझे) कोई और प्रयोजन उद्दिष्ट है, अथवा हम से तंग (उपराम) होगया है। यह बात कदापि नहीं। हाय, मैं आप को कैसे निश्चय कराऊं कि मैं आप का दास हूं।
पुनः यह कि जब मैं जानता हूं कि आप का जो विचार मेरे विषय में होता है उसका अन्तिम लक्ष्य (मूल उद्देश्य) यही होता है कि मुझको आनन्द हो, चाहे ऊपर से वह लक्ष्य या उद्देश्य कुछ अन्य ही प्रतीत होता हो। इस लिये मैं ख्याल करता हूं कि यदि मेरे अन्तरात्मा (ज़मीर) से या किसी अन्य अति पक्की रीति से मुझ को ठीक २ प्रतीत हो कि यह बात मेरे लिये अच्छी है (पर जो मेरे लिये अच्छी है वह आप के लिये मुझ से भी अधिक अच्छी होगी, आप के लिये वह कदापि कदापि बुरी नहीं हो सकती), तो अवश्य आप की भी उस विषय में वही सम्मति होगी जो मेरे अन्तरात्मा (ज़मीर) की, या उस परिपक्व उपाय की जिस से कि वह बात प्रतीत हुई है। और आप उस विषय में यह न कहेंगे कि उसने (मैं ने) हमारी आज्ञा भङ्ग की है, बल्कि यह कहेंगे कि उसने (अर्थात् मैं ने) हमारी पूर्ण रीति से आज्ञा पाली है। पुनः यह कि मैं चाहे किसी स्थान पर हूं, आप का तो दास हूं।
अब बात (सारांश) यह है कि आप ने लिखा था कि छुट्टियों में गुजरांवाले आ जाना। सो यह बात है कि
आऊंगा तो मैं अवश्य ही, चाहे कैसी दशा हो; पर यह बात नहीं हो सकती कि सारी छुट्टियां (गुजरांवाले) ही व्यतीत करूं। मेरा अन्तरात्मा (ज़मीर) कहता है कि "लाहौर में अधिक काल रहो" यह बात अन्तरात्मा की समझ कर मैं ने अधिक सोचा नहीं, पर तथापि दो एक युक्तियां लिखता हूं, (मैं बड़ा शोक करता हूं कि मुझे इन निकम्मी युक्तियों पर समय व्यर्थ खोना पड़ता है, पर मैं इस लिये इन पर समय खोने के लिये विवश होता हूं कि कहीं आप कुछ और समझ कर रुष्ट न हो बैठें। यदि मुझे इस बात का भय न हो कि आप रुष्ट हो जायेंगे, तो मैं इन युक्तियों पर समय व्यर्थ न खोऊं। क्या ही अच्छा हो यदि आप मुझ को अपना दास समझ कर मेरे शुद्ध निश्चय या सत्य वाक्यों में संशय न लाया करें।
इस बात (रहस्य) को मैं ने अब समझा है कि लाहौर के बिना अन्य किसी स्थान (बस्ती) में रहने से न केवल यह अवगुण (दोप) होता है कि वहां एकान्त स्थान नहीं मिलता, बल्कि एक अति कठिन और बड़ा अवगुण और भी है, वह यह कि वहां वृत्ति (चित्तावस्था) ऐसी नहीं रहती कि किसी सूक्ष्म कार्य को कर सके, वहां दीर्घदृष्टि जाती रहती है। इसका कारण यह है कि चिदात्मा (नफ़्स) जो कि न स्थूल शरीर है और न स्थूल देह का अंग, वह विषयों की प्राप्ति से और भौतिक पदार्थों के संग से दुर्बल (अशक्त) और दूषित हो जाता है। और लाहौर के बिना अन्य सब स्थानों में यह दूषण (अवगुण) पाया जाता है, क्योंकि वहां सर्व साधारण के मेल जोल (संगति) से चित्त (स्वभाव) की मट्टी खराब हो जाती है।
अब यदि कोई पूछे कि लाहौर में भी तो मेल जोल होता
है, तो उस का उत्तर यह है कि लाहौर में जो मनुष्य मिलता है उस के साथ ऊपरले (बाह्य) चित्त से एक बात की जाती है, जिस में मन का ध्यान उस की ओर नहीं जाता। पर और स्थानों में जो मनुष्य मिलता है, वहां बलात्कार उसकी ओर चित्त वृत्ति देनी पड़ती है, क्योंकि उससे जो मिलाप होता है, वह बहुत काल के पीछे प्राप्त होता है। साथ इसके लाहौर से अतिरिक्त अन्य स्थानों में अपने बन्धुजनों से मिलाप होता है, जिनकी ओर अधिकतम ध्यान देना अवश्य होता है। दूसरे, लाहौर में जो मेल मिलाप होता है, वह बहुधा अपने सहपाठियों से होता है, जो अधिक विक्षेप नहीं डालता।
अब यदि यह प्रश्न किया जाये कि क्या और भी कोई विद्यार्थी है जो छुट्टियों में लाहौर रहेगा? तो सुनिये:- *रुकुनदीन जो पंजाब में इस बार प्रथम रहा है नितान्त एक दिन भी सारी छुट्टियों में अपने ग्राम नहीं जायगा। वह स्वयं कहता है कि वह दस बारह दिन अब वहां (अपने ग्राम) से हो आया है, परन्तु छुट्टियों में वहां कदापि नहीं जायगा, आप मालूम कर लें।
संसार में कोई मनुष्य विद्या में चतुर (निपुण) हो ही नहीं सकता जब तक कि वह परिश्रम न करे। जो निपुण (चतुर) हैं, वे बहुत परिश्रम करते हैं, तब निपुण हैं। यदि हमें उनका परिश्रम विज्ञात न हो, तो वे गुप्त प्रकार से अवश्य करते होंगे, या वे पहिले कर चुके होंगे। यह बातें बहुत अनुसंधान की गयी हैं।
* रुकनदीन से अभिप्राय उस रुकनदीन साहिब ऐम, ए से है कि जो आज कल मिंटगुमरी के डिस्ट्रिक्ट जज के पद पर काम कर रहे हैं।
यह भी सत्य है कि छुट्टियों में कई विद्यार्थी घर जायेंगे और फिर भी वे चतुर (निपुण) हैं। किन्तु उनके विषय में और बात कारण है। उनके घरों में या उन स्थानों में जहां वे जायेंगे ऐसे निमित्त नहीं होते कि जो उनके चित्तों को अभ्यास से रोकें। वे विवाहे हुए नहीं होते, वा कोई और हेतु होता है, अथवा उनके मन बड़ी परिपक्वावस्था को प्राप्त हुए होते हैं जो बाह्य पदार्थों की ओर नहीं जाते। पर मेरा मन पक्का नहीं, यह अति दुष्ट है।
मेधा (ज़ेहन) जिस को कहते हैं, वह शक्ति भी परिश्रम से बढ़ती है। पुनः यह कि यदि संभावना से कोई मनुष्य बिना परिश्रम किये किसी परीक्षा में अच्छा रह भी जाये, तो उस को पढ़ने का आनन्द कदापि नहीं आयेगा। वह मनुष्य बहुत बुरा है। वह उस मनुष्य के सदृश है जिस ने आप को एक समय कहा था कि मुझे एक सीहर्फी (कविता) बना दो और बीच में नाम मेरा रखना। अब चाहे उस ने लोगों में यह मशहूर (प्रसिद्ध वा प्रख्यात कर दिया) कि सीहर्फी मेरी है, परन्तु आप जानते हैं कि उस लेख में जो आनन्द आप को आता होगा उस मनुष्य को कदापि कदापि नहीं आसकता; अथवा वह उस मनुष्य के सदृश है जिस को और की मारी मराई (कमाई हुई विभूति) मिल जाये। अब चाहे उस के पास धन तो है, पर वह धन से आनन्द नहीं ले सकेगा, शीघ्र उस को चीण करदेगा। किन्तु जिस ने परिश्रम से धन कमाया है, वही लाभ उठायेगा।
आप मेरे पिता समान हैं, और पिता माता को ऐसा नहीं होना चाहिये जैसा कि वह गुजरांवाले का पाधा (पंडित), जिस के विषय आप ने एक समय सुनाया था कि उस ने अपने बड़े योग्य (निपुणमति) पुत्र को पाठशाला
में पढ़ने से बन्द कर रखा था, केवल इस लिये कि उस को अपने पुत्र से स्नेह [मोह] बहुत अधिक था।
किन्तु आप तो बड़े ही अच्छे हैं, आप को तो इस विषय में उस पाधे (पंडित) की सी उपमा (तुलना) त्रिकाल भी नहीं दी जासकती। आप का और उसका उदाहरण तो प्रकाश और अन्धेरे के समान है। कदाचित् आप के चित्त में यह बातें नहीं बीती होंगी, जो मैंने ऊपर लिखी हैं। तभी आप ने यह कहा कि लाहौर में मत रहना। अब दो वर्ष की बात है, अधिक काल भी नहीं। यदि अब परिश्रम न करूं तो और कब समय आयगा परिश्रम के लिये। आप मुझे दो वर्ष की छुट्टी दो, फिर सारी आयु आप के संग हूं। आप ने यह समझ छोड़ना कि हमारा पुत्र परदेश (विलायत) गया हुआ है, जब आयेगा फिर हमारा है। और मेरा ध्यान जब इस (पढ़ने की) ओर अधिक हो, तो आप ने मेरी बाह्य अपेक्षाओं (ज़रूरतों) का ऐसे ध्यान रखना जैसे कि एक महाराजा अपने योधाओं की रखता है जिस समय कि योधा युद्ध में अपने महाराजा के लिये शत्रु से लड़ रहे हों। आप ने कभी कोई और ख्याल (अनुमान) मेरे विषय में न लाना, मैं आप का दास हूं।
मैं यह जानता हूं कि परिश्रम अति उत्तम वस्तु है (पर मैं परिश्रम इस प्रकार नहीं करने वाला कि रोगी हो जाऊं), किन्तु परिश्रम में लगने के लिये आप की (सहायता की) आवश्यकता है। आप मुझे सहायता दें कि मैं पढ़ने में परिश्रम करूं। आप की सहायता बिना परिश्रम भी नहीं हो सकता। हे परमात्मा! मेरा मन प्रयत्न (अभ्यास के श्रम) में अधिक युक्त हो, मैं अत्यन्त परिश्रम करूं, क्योंकि मेरे संकल्पों को पूरा करने वाले आप हैं। (सातवीं या आठवीं
छुट्टी के पश्चात् मैं गुजरांवाले आऊंगा, थोड़े ही काल के बाद फिर लाहौर में यदि आजाऊं तो बड़ी अच्छी बात हो)
आप ने इस लम्बे लेख से रुष्ट न हो जाना। इससे वास्तव में अभिप्राय यही था कि किसी प्रकार से आप रुष्ट न हो जायें। †रघुनाथशरण को यह कह देना कि यदि अच्छा (निपुण) होना चाहता है, तो यों करे कि पुस्तक को कण्ठस्थ कर ले। इस बात में से इतने लाभ प्राप्त होते हैं कि मैं किसी प्रकार से वर्णन नहीं कर सकता। मुझे तेरह वर्ष के पश्चात् यह बात मालूम हुई है। यह बात अत्यन्त ही अच्छी है। मैं इस को विस्तार पूर्वक फिर कभी वर्णन करूंगा, जब गुजरांवाले आऊंगा। यह बात ऐसी है कि इस से केवल अपने शिक्षक (अध्यापक) से अतिरिक्त अन्य आचायों की नितान्त आवश्यकता नहीं रहती+।
आप का दास तीर्थ राम,
(41) गुरु-आज्ञा पालन निमित्त ईश्वर से प्रार्थना। 13 अगस्त 1880
संबोधन पूर्वोक्त,
आपका एक कृपापत्र * देवीदयाल के हाथों का लिखा
† रघुनाथ शरण भगत धन्नाराम (गुरु जी) की बुआ का पुत्र था। * लाला देवीदयाल जी तीर्थराम जी के गुरुभाई थे, अर्थात् वह भी भगत धन्ना राम जी की संगति किया करते थे। +नोट - इस वर्ष तीर्थ राम जी की आयु साढ़े सोलह वर्ष के लगभग थी और बी-ए श्रेणी में प्रविष्ट हुए अभी केवल अढ़ाई मास ही हुए थे और इस छोटी सी आयु में इस उच्च श्रेणी में लिखा हुआ यह युक्त तथा नम्रता भरा पत्र उनकी योग्यता और गुणों पर भली प्रकार से रौशनी डालता है।
हुआ मिला। अत्यन्त हर्ष हुआ। "हे परमात्मन्। मुझ से कभी कोई ऐसी बात न हो जो आप की इच्छा के विरुद्ध हो" हे पिताजी! मैं अपनी ओर से तो बड़ा ही चाहता हूं कि सदा ही आप की इच्छा के अनुसार चलूं, मगर यदि कोई चूक हो जाय तो आप क्षमा करें और उसकी सूचना दें जिस से पुनः उस से बचने का प्रयत्न करूं।
आप का दास तीर्थराम,
(42) अपनी व्याधि के कारण स्वयं जान लेने की शक्ति। 28 अक्तूवर 1880
संबोधन पूर्वोक्त,
कल एक बजे से पहिले कालेज में मुझे ज्वर आरम्भ हो गया था। उस समय मैं घर चला आया, बड़ी ही कठिनता से लुहारी दरवाज़े तक पहुंचा। वहां से यक्के पर चढ़ कर घर आया। यहां पांच छः बार वमन (उलंटी) आयी, और एक बार शौच (जंगल)। परन्तु अशक्ति बढ़ गयी। अन्त में निद्रा आ गयी, और रात्रि के बारह बजे जाकर होश आई, तब से अभी तक जाग रहा हूं। अब प्रकृति अच्छी है। यह तीन दिन कालेज में जाने से जो मुझे ताप (ज्वर) चढ़ा, तो उसका कारण मैं यह समझता हूं कि वहां बारह बजे के लगभग मुझे शौच और वमन (क़ै) आनेवाले मालूम होते थे, पर मैं अध्ययन में प्रवृत रहा, और इनकी ओर ध्यान तक न दिया। अस्तु! अब मैं ऐसा नहीं करूंगा। और यदि मेरा पूर्वोक्त कथन (कारण) सत्य है, तो आगे से मुझे आरोग्यता (स्वास्थ्य) रहेगी। मैं आप का दास हूं, आपने मेरे अपराध क्षमा करना।
एक बड़ी बात लिखता हूं कि हमारे गणितशास्त्र के अध्यापक (प्रोफेसर) ने कहा है कि दस बारह दिन के पश्चात् मैं दो नई पुस्तकें, आरम्भ कराऊंगा, तब तक तुम पुस्तकों को प्राप्त करलेना। पर बड़े शोक की बात है कि वह पुस्तकें मेरे पास नहीं हैं, और उन का मूल्य भी बहुत बड़ा है, अर्थात् 17) सतरह रुपये। सो अब क्या मैं पंडित रघुनाथ मल जी को लिखदूं कि रुपये भेज दें (क्योंकि उन्हों ने कहा हुआ है), अथवा कोई और उपाय करना चाहिये? उत्तर अवश्य शीघ्र [इसी डाक में] भेजना।
आप का दास तीर्थ राम,
(43) फीस की मुआफी के विषय में चिन्ता 2 दिसम्बर,
संबोधन पूर्वोक्त,
आज मैं कालेज गया था, वहां और तो सर्व प्रकार से ठीक रहा, परन्तु मेरी फीस के नितान्त मुआफ होने में कुछ संशय पड़ गया है, क्योंकि जो अध्यापक [प्रोफेसर] मेरी आधी फीस अपनी जेब से देता था अब उसने वह बन्द कर दी है। और वे [कालेज के क्लार्क इत्यादि] कहते हैं कि "हमें केवल आधी फीस मुआफ करने का अधिकार है। और उस प्रोफेसर* ने अपने पास से आधी फीस देना इस लिये बन्द करदिया है कि वह कहता है कि
* यहां प्रोफेसर से अभिप्राय मिस्टर गिल्बर्टसन (Gilbertson) ऐम, ए है जो उन दिनों लाहौर मिशन कालेज में गणितशास्त्र के प्रोफेसर थे, और इस विषय में तीर्थराम जी से बहुत सेवा लिया करते थे। आज कल यह साहिब देहली के गवर्नमेण्ट हाई स्कूल में हैड मास्टर (मुख्याध्यापक) हैं (1912)
अब मेरे पास कोई काम ऐसा नहीं जो तुझ से कालेज में करवा सकूं, और धर्मार्थ में देता नहीं"। पर हां, यदि कोई काम मेरे सम्बन्ध निकल पड़ा, तो मेरी फीस मुआफ रहेगी।
आप का दास तीर्थ राम,
(44) अन्य महात्माओं के दर्शन। 16 दिसम्बर 1880
संबोधन पूर्वोक्त,
कल मैं और भ्राता जी और अयोध्यादास उन महात्माओं* के दर्शन को छज्जू भगत के चुबारे गये थे, दर्शन हुए, गीता का सोलहवां अध्याय थोड़ा सा उन की वाणी से सुना। आप का मत्था टेकना कहा और बात छेड़ी, बड़े प्रसन्न हुए। पर वे कहते थे कि हम शीतकाल लाहौर ही में काटने का संकल्प रखते हैं। और फिर जब मौज आयगी गुजरांवाले में आयेंगे। अब चार बजे कालेज से आ कर पत्र लिखा है। हमारी परसों गणित और अतरसों (तीसरे दिन) अंगरेजी की परीक्षा है। मेरी तापतिल्ली [गुल्म रोग] दूर नहीं हुई, बल्किः बढ़ गयी है। आप दया रक्खा करें।
आप का दास तीर्थराम,
सन 1881 ईस्वी (इस समय तीर्थराम जी की आयु साढ़े सतरह वर्ष के लगभग थी।)
* यह महात्मा स्वयं प्रकाश उदासी साधु थे, यह स्वभाव के बड़े स्वतंत्र (खुलासे) थे। भगत जी ने तीर्थराम जी को उन के दर्शन के लिये सूचना दी थी, जिस दर्शन का प्रभाव इस पत्र में तीर्थराम जी ने प्रकट किया है।
(45) परीक्षा में फ़ारसी भाषा के मौक़ूफ़ होने (न रहने) पर हर्ष। 2 जनवरी 1881
संबोधन पूर्वोक्त,
आज मैं कालेज गया था, फीस के विषय में कुछ नहीं सुना, हमारी फार्सी मौक़ूफ हो गयी है। यह परमेश्वर ने बड़ी दया की है। आप अपनी अवस्था से कृपया सूचना देते रहा करें। मैं राज़ी (प्रसन्न) हूं॥
आप का दास तीर्थराम,
(46) फ़ीस की मुआफी पर प्रिन्सिपल साहिब का वचन। 18 जनवरी 1881
संबोधन पूर्वोक्त,
आज मुझे हमारे कालेज के डाक्टर साहिब मिले थे। वह कहते हैं कि हम ने प्रिन्सिपल साहिब से कहा था और प्रिन्सिपल साहिब यह कहते हैं किः- "अगर तीर्थ राम अपनी श्रेणी में चतुर रहे और सर्व प्रकार से अच्छा वर्ताव करे अर्थात् कभी अनुपस्थित न हो, या कोई और बात ऐसी न करे, तो हम तीर्थराम से फ़ीस न लेंगे, परन्तु एक संकेत और यह है कि मुझे (तीर्थ राम को) उन का काम भी करना पड़ेगा। दृष्टान्तरूप से, इस सप्ताह में कुछ लैक्चर लिखने पड़ेंगे"। आप दयादृष्टि रक्खा करें। आप का पत्र अभी तक कोई नहीं आया, सारा हाल लिखो।
आप का दास तीर्थ राम,
( 47 ) संसार के लोग कैसे होते हैं । 1 फरवरी 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
आज आप का एक पत्र मिला, बड़ा हर्ष हुआ। जब भाई # साहिब गुजरांवाले में आयें, आप ने अवश्य ही रोक देना कि किसी बुरे कार्य में प्रवृत्त न हों, और न अपने संबन्ध बढ़ाने का यत्न करें, नहीं तो बहुत पछताना पड़ेगा। रीछ को पकड़ लेना सुगम है, पर उस से छूटना अति कठिन है।
संसार के लोग कभी किसी के नहीं होते, केवल अपना स्वार्थ नित्य दृष्टि में रखते हैं। सुन्दर २ दाना देख कर जाल में न फंस जाना। और भाई साहिब से कहना कि मुझे कोई पत्र क्यों नहीं लिखा?
आप का दास तीर्थराम,
( 48 ) समय पर उधार लेकर भी अपने मौसा ( संबन्धियों ) की जरूरत पूरी करना 8 फरवरी 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
आज आप का पत्र मिला बड़ा हर्ष हुआ। आज मासड़ [ मौसा ] जी का पत्र भी आया था। उन्होंने एक डिक्शनरी ( कोष ) की आकांक्षा जतलाई है जो सवा रुपये 1॥) को आ सकती है। मेरा विचार है कि इस आदित्यवार को मैं उन्हें कोष लेकर भेज दूं। सवा रुपया किसी से उधार
________________ * भाई जी से तात्पर्य तीर्थराम जी को अपने बड़े भ्राता गोस्वामी गुरुदासजी से है जो आजकल अपने ग्राम में ब्राह्म वृत्ति का काम करते हैं।
ले लूं। और इस समय उन से कुछ मांगना भी उचित नहीं समझता।
हमारे कालेज के डाक्टर साहिब ने मुझे इस सप्ताह एक लैक्चर नक़ल करने ( लिखने ) को दिया है। इस शनिवार को हमारी गणित की परीक्षा है। दूसरे शनिवार को अंग्रेजी की। आप मुझे पत्र लिखते रहा करें और दया रक्खा करें। मैं आप का दास हूं।
आपका सेवक तीर्थ राम,
(49) प्रतिदिन व्यायामार्थ प्रिन्सिपल साहिब का विद्यार्थी नियत करना। 20 फरवरी 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
.................आज मासड़ ( मौसा ) जी ने मुझे तापतिल्ली ( प्लीहा रोग ) की और गोलियां भेजी हैं। दो तीन दिन से प्रिन्सिपल साहिब ने मुझ पर एक विद्यार्थी ( रुकनदीन ) नियत किया है कि वह मुझे प्रति दिन छुट्टी के पश्चात् आधा घंटा तक व्यायाम किये विना घर न आने दिया करे, क्योंकि मैं इन दिनों बहुत ही दुर्बल और रोगी सा हो चला था।
आप का दास तीर्थराम
(50) (विश्वविद्यालय की ओर से) वार्षिक परीक्षा में गणित शास्त्र में थोड़े नम्बर किये जाने का विचार (तजवीज़) 2 अप्रिल 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
महाराज जी! अब पंजाब विश्वविद्यालय में यह विचार
( तजवीज़ ) हो रहा है कि गणित-शास्त्र की परीक्षा में उसके नम्बर 150 के बदले 130 किये जायें, और कई अन्य विषय जिनके नम्बर वर्तमानकाल में 100 या 120 हैं उन विषयों के नम्बर भी 130 किये जायें, अर्थात् और कई विषयों को भी गणित शास्त्र के समान पदवी दी जाये। यह बात बहुत बुरी है। यह तो मानो परिश्रम और अपरिश्रम ( अथवा प्रयत्न और अप्रयत्न ) के भेद को उठा देना है। हमारा गणितशास्त्र का प्रोफेसर कहता था कि मैं इसके विरुद्ध यत्न करूंगा। आगे देखिये क्या होता है। आप पत्र लिखते रहा करें।
आप का दास तीर्थराम
(51) तीर्थराम जी के घर में चोरी। 7 अप्रिल 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
आज प्रातःकाल छे बजे मैं किंचित् काल के लिये महाराजा साहिब की *समाधि तक फिरने गया था। अधिक से अधिक पंद्रह मिनट लगे होंगे। वापस आया तो मकान का ताला ( जन्द्रा ) बिल्कुल गुम ( लुप्त ) और द्वार आधा खुला था। अन्दर गया तो भीतर की कोठड़ी जो पौड़ियों (सोपान) के नीचे है खुली पड़ी थी।
धन्यवाद परमेश्वर को है कि मेरी पुस्तकें और वस्त्र उसी प्रकार पड़े हैं यद्यपि गड़ुवी गलास और पतीला नहीं हैं। एक टोपी चोर की यहां रह गयी है। आप दया रक्खा करें।
________________ * समाधि से तात्पर्य महाराजा रंजीत सिंह की समाधि से है जो लाहौर में किले ( गढ ) के समीप है।
(52) नवीन चारपाई [ खट्वा ] पर हर्ष। 11 मई 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
मेरी चारपाई ( खट्वा ) अब नितान्त ही टूट गयी थी, दो दिन तो मानो पृथिवी पर ही सोता रहा। कल मैं पांच आने का धान मोल ले आया था, आज चारपाई ( खट्वा ) नई बुना ली है। पांच पैसे बुनाने में लगे हैं। मैं अब नवीन बुनी हुई चारपाई को देखकर बड़ा खुश हुआ हूं। आज हमें छुट्टी (अनध्याय) थी। किराया का रुपया कल बावा जी को दे दिया था। अब मेरी प्रकृति अच्छी है।
आप का दास तीर्थराम
(53) तीर्थराम जी का कालेज बोर्डिंग (आश्रम) में जाने का विचार। 16 मई 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
आज कालेज में आप का पत्र मिला था। बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ। यदि आप आ जाते तो बड़ी ही अच्छी बात होती। क्योंकि मुझे जैसी चिन्ता न होती जो इस समय किंचित् हो रही है।
इस समय चिन्ता यह है कि जब आज प्रातः साढ़े पांच बजे मैं कालेज पहुंचा, तो उसी समय बोर्डिंग के सारे विद्यार्थी मुझे आकर कहने लग पड़े कि:—"अब आप को (अर्थात् मुझे) बोर्डिंग में अवश्य रहना पड़ेगा। अब प्रिन्सिपल साहिब का आदेश होगया है।" फिर जब दो तीन घंटे बीते,
तो कालेज के *डाक्टर साहिब मुझे मिले और कहने लगे कि:—"तू ने प्रिन्सिपल साहिब का आदेश सुना है या नहीं? मैं ने कहा कि सुना तो है, पर पहिले मैं अपने घर लिखकर अपने वालदैन ( जिससे तात्पर्य आप से था ) की आज्ञा लेना चाहता हूं। वह डाक्टर साहिब कहने लगे कि "प्रिन्सिपल का आदेश सब अवस्था में मानना पड़ेगा।" फिर जब कालेज बन्द होगया, अर्थात् पढ़ाई समाप्त कर चुके, तो प्रिन्सिपल साहिब ने कहा कि "तेरे लाभ कारण मैं ने यह आदेश दिया है"। अब इस सारी बात की जड़ ( मूल ) में लिखता हूं:—
एक दिन जब हमें छुट्टी थी तो मैं अपने डेरे ( स्थान ) में बैठ कर पढ़ रहा था। हमारे कालेज के लगभग सारे विद्यार्थी ( आश्रमस्थ, तथा उनसे अतिरिक्त ) मेरे मकान ( स्थान ) के सामने से गुज़रे। वे चले तो और जगह थे, पर मुझे साथ लेजाना चाहते थे। उन्हों ने मेरा मकान देखा और मुझ से सारी अवस्था पूछी। ( मेरे साथ सारे विद्यार्थी अच्छा वताओ करते हैं )। मैंहरे ( जलवाह ) की दुकान से रोटी और मकान ( स्थान ) की कालेज से दूरी, और मकान का हवादार न होना इत्यादि सब अवस्था देख कर कहने लगे:—हम तुम्हारे इस मकान में रहने पर राजी ( प्रसन्न ) नहीं हैं। हमारे विचार से यही कारण है कि तुम वार २ रोगी हो जाते हो। और फिर रोगावस्था में तुम्हारी यहां खवर लेने वाला ( अर्थात् सहायता करने वाला ) भी कोई नहीं। हम चाहते हैं कि तुम बोर्डिंग ( आश्रम ) में चले आओ। वहां आपके पढ़ने ( अभ्यास ) में नितान्त कोई विघ्न नहीं होगा, इत्यादि"।
________________ * यह डाक्टर आर्विसन साहिब थे जो उस समय मिशन कालेज में साइन्स के प्रोफैसर थे।
मैं तो तूष्णी ( चुपका ) हो रहा, पर वे ( विद्यार्थी ) कहने लगे कि हम प्रिन्सिपल साहिब को कह देंगे। सो उन्हों ने कह दिया। और प्रिन्सिपल साहिब ने मुझे उक्त आज्ञा दे दी।
अब महाराज जी! आप देखते हैं मेरा किसी प्रकार 'का अपराध नहीं है। अब वहां जाना पड़ा है। आप मुझ पर किंचित् रुष्ट न होना। मैं आप का दास हूं। मुझ पर दयादृष्टि रक्खें। आपके वश ( वश ) में सब कुछ है। बोर्डिंग में एक कोठड़ी ( कुटिया ) सब से अलग है। वह हमारी श्रेणि के विद्यार्थी ने ली हुई है। पर वह विद्यार्थी अभी यहां नहीं है। यदि वह स्वीकार करले कि वह कुटि मुझ को देदे और आप अन्य विद्यार्थियों के साथ किसी और कमरे ( कुटी ) में रहे, तो बड़ी अच्छी बात हो। तीन रुपये और नौ आने (3॥॥-) प्रत्येक मास ( वहां ) देने पड़ते हैं। रोटी, मकान, पानी, चूहड़ा ( भंगी ) इत्यादि सब व्यय ( खर्च ) के लिये।
महाराज जी! मैं जानता हूं कि सब अपने मन के अधीन है। यदि हम चाहें तो मन को चाहे कहां एकाग्र करलें, यद्यपि बड़े परिश्रम और प्रयत्न की आवश्यकता है। जितना हम मन को अधिक एकाग्र करेंगे, उतना ही लाभ होगा चाहे कहां हों, जैसा कि बोर्डिंग के विद्यार्थी भी तो कई वार प्रथम या द्वितीय रहते हैं।
मैं आप से सहायता मांगता हूं कि मैं मन को वहां इस स्थान से भी अधिक एकाग्र कर सकूं। आपने मुझ को पहिले से अधिक सेवक समझना। आप अब यहां कब आयेंगे। आप यदि वहां बोर्डिंग में मेरे पास आकर रहें तो किसी प्रकार का डर नहीं, क्योंकि और विद्यार्थियों [ आश्रमस्थों ] के संबन्धी भी तो सदा आते जाते रहते हैं।
अब क्योंकि वहां ( बोर्डिंग में ) जाना अवश्य हो गया है
और वह भी बहुत शीघ्र ( जल्दी ), इस लिये मैं ने यह संकल्प किया है कि इस वीरवार या शुक्रवार वहां चला जाऊं। मैं आप की स्वीकारता, प्रसन्नता और कृपा चाहता हूं, क्योंकि मैं सब के स्थान में आप ही को समझता हूं, और मेरा बड़ा भरोसा ( आश्रय ) आप ही पर है।
बारह आने की चार पुस्तकें अंग्रेज़ी भाषा की अति लाभदायक ली थीं। अब मेरे पास खर्च ( व्यय ) नितान्त समाप्त होगया है। अस्तु ( खैर ) लाला अयोध्यादास से मैं ले लूंगा। आप ने इस पत्र का उत्तर तत्काल कृपया कालेज में भेजना। और मुझे पत्र भेजने में कभी विलम्ब न करना। मेरे पर कृपादृष्टि रखनी।
यदि आप के विचार ( मति ) में मेरा वहां ( बोर्डिंग में ) न जाना उचित हो, तो आप लिखें कि उन को क्या उत्तर दूं।
आप का दास तीर्थ राम,
(54) एक ही दम एकान्त अभ्यास छोड़ने से हानि की संभावना। 23 मई 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं आज भी बोर्डिंग नहीं गया। अब अगले वीरवार या शुक्रवार पर बात जा पड़ी है, क्योंकि तव तक पहिली तारीख भी समीप आ जायगी। परन्तु एक उपाय दृष्टि में आता है जिस से वहां ( बोर्डिंग में ) न जा सकूं। कि वह पृथक कुटी बोर्डिंग वाली जो मैंने आप को लिखी थी वह मिलनी अब कठिन है, और मैं यह कहूं कि जव तक वह कोठड़ी ( कुटी ) मुझे न मिले मैं नहीं आता, क्योंकि यक-
लख़त [ एक ही दम ] नितान्त एकान्त अभ्यास के स्वभाव को हटा देना मेरे लिये अति हानिकारक होगा।
आप का दास तीर्थराम,
(55) मकान में पुनः सर्प। 23 मई 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
आज कालेज से मैं आया, तो मकान का द्वार खोलते ही एक सर्प कौड़ियों वाला मेरी ओर पड़ा। जो सर्प मैंने प्रथम देखा था ( जब पहिले मकान में आया ही था ) उस से यह सर्प आधा था। कदाचित् उस का बच्चा हो। मैंने लोगों को बुलाया, उन्हों ने मार दिया।
कालेज के सब लोग मेरे बोर्डिंग में न जाने के अत्यन्त विरुद्ध हैं। वे कहते हैं कि यदि अब तुम यह स्वभाव न डालोगे कि लोगों के वीच में भी पढ़ सको, और प्रत्येक स्थान में मन को एकाग्र कर सको, तो तुम्हें फिर कभी भी यह स्वभाव नहीं पड़ेगा। जैसे जो मनुष्य तैरना तो चाहे, पर पानी में न जाये, तो उसे कभी तैरना नहीं आता।
और आयु में जब मनुष्य बड़ा हो जाता है, तो उसे अलग मकान ( स्थान ) और समय मिलना अति कठिन होता है। क्योंकि कभी कोई मित्र मिलने आ जाता है, कभी कोई सम्बन्धी ही, इत्यादि। इस लिये यदि मनुष्यों के वीच में भी पढ़ने का स्वभाव न हो, तो पिछली आयु में उन्नति करना कठिन हो जाता है।
मैंने डाक्टर* साहिब को वह बात कही थी, जो मैंने
________________ * डाक्टर साहिब से अभिप्राय डाक्टर आर्विसन है जो साइन्स के प्रोफेसर थे।
पिछले पत्र में आप को लिखी थी। वह कहने लगे, प्रथम तो तुम्हारे मन में किंचित् भी फर्क़ ( विपरीतता या विक्षेप ) आयेगा ही नहीं, और यदि आये भी तो पहिले दो तीन दिन कए होगा, फिर तुम्हारा मन पढ़ने में अच्छा लग जाने लग पड़ेगा। और ( इस से अतिरिक्त ) वाह्य लाभ तो निःसन्देह वहां सब हैं।
तात्पर्य यह कि मेरा अब बोर्डिंग में न जाना किसी रीति से दिखाई नहीं देता। अब यह यत्न करना चाहिये कि बोर्डिंग में जाकर मन पहिले से भी अधिक लगे, क्योंकि अब वहां न जाने का यत्न करना व्यर्थ है। इस लिये इस वीरवार ( गुरुवार ) या शुक्रवार को मैं वहां जाने का संकल्प रखता हूं। आप इस वीर वार से पहिले यहां एक दिन हो जायं तो बड़ी कृपा हो, आप ने दास पर किसी प्रकार से दोष न आरोपना। मैं सर्व प्रकार से आप का आज्ञाकारी ( सेवक ) हूं।
आप का दास, तीर्थराम।
(56) बोर्डिंग का मासिक व्यय। 25 मई 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
आज मैं ने सब वातें दर्याफ्त की हैं।
(1) ग्रीष्म ऋतु की छुट्टियों में हम को किराया इत्यादि नहीं देना पड़ता।
(2) जितने दिन हम रोटी खायें उतने दिनों का हिसाव देना पड़ता है, और यदि कोई अतिथि हों तो जितने दिन
वह खाये उतने दिन हमारे हिसाव में दाम अधिक किये जाते हैं।
(3) बोर्डिंग की फीस ( अर्थात् मासिक किराया ) ॥-) नौ आने पहिली 1 तारीख से लेकर बीसवीं (20) तारीख तक चाहे कब दे दें। परन्तु भोजन का दिनों के हिसाव से गिन कर मास के अन्त में दिया जाता है।
(4) मैं ने लाला *शिवराम को कहा था कि इतना खर्च मेरे रत्नक ( पिता माता ) नहीं दे सकते, वह हिसाव करके कहने लगा कि लगभग एक रुपया यहां अधिक लगेगा। उस में कुछ बड़ा कष्ट नहीं है। यदि भोजन अच्छा मिल जाये तो तुम ने और खर्च कम कर देना। और यदि इसमें कष्ट भी हो तो केवल नौ मास, परीक्षा तक। और फिर यह भी कहने लगा कि प्रथम तो हम अधिक खर्च नहीं होने देंगे, और द्वितीय यहां तुम्हें अधिक पुस्तकों के खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, क्योंकि तुम औरों से ले सकते हो। तृतीय यदि यहां प्रतिकूलता हो तो छुट्टियों के पश्चात् चले जाना।
आप का दास तीर्थराम
(57) विद्यार्थी अवस्था में सहपाठियों को प्रोफैसर के स्थान पर पढ़ाना। 25 जून 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
हमारा गणित शास्त्र का प्रोफैसर बीमार था, इसलिये
________________ * लाला शिवराम उस समय कालेज बोर्डिंग के अध्यक्ष ( सुपरिण्टैण्डैण्ट ) थे।
एक घंटा प्रतिदिन उसके बदले मैं पढ़ाता रहा हूं। कल हमें ( अर्थात् गणित शास्त्र के विद्यार्थियों को ) पहिले छुट्टी हो गयी थी। मैं कालेज बोर्डिंग आया। एक रुपया तुड़वाने के लिये सन्दूक से बाहर रक्खा ( अपने बैठने के स्थान पर ), मेरे कमरे का साथी दीना नाथ अभी नहीं आया था। परन्तु एक दो लड़के और बोर्डिंग में आये हुए थे। मैं रोटी खाने रसोई में गया, किन्तु रुपया बाहर ही पड़ा रहा, और कमरे ( कोठी ) का ताला (जन्द्रा) भी मारा नहीं। रोटी ( भोजन ) खा कर जब आया तो रुपया नहीं था। दीना नाथ ने बहुत पूछा पाछा, पर मिला नहीं। न मालूम, किसने लिया। कदाचित् नौकर ने लिया, या किसी विद्यार्थी ने ही उठा लिया हो। कल से मुझे एक बड़ा संदूक मिल गया है, इससे बड़ा सुख है।
चार पांच दिन से मुझे प्रत्येक दिन नकसीर ( नाक से रुधिर बहना ) आती थी, परन्तु कल रात को तो इतनी आई कि प्रायः ( लगभग ) अचेत ( बेहोश ) होगया। आज कालेज में भी नहीं गया, क्योंकि उस समय मस्तिष्क में अशक्ति अधिक थी। परन्तु सात बजे प्रातःकाल से लेकर अब तक प्रकृति अत्यन्त कुशल रही है। विद्यार्थी सब मेरे साथ सहानुभूति ( हमदर्दी ) करते हैं, और विशेष करके दीना नाथ बड़ी टहल ( सेवा ) करता है। आज मैं ने वादाम और चार मगज़ खुटवा कर पीये हैं। इस समय सब प्रकार से कुशल है। आप दया रक्खा करें। मुझे पत्र लिखते रहा करें।
आप का दास तीर्थराम
(58) तीक्ष्ण (गरम) वस्तुओं का नितान्त असेवन (परहेज़) 26 जून 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
मैं ने जो लफाफा (पत्र) लिखा था उस में एक बात लिखनी भूल गया था कि लाला शिवराम बोर्डिंग के व्यवस्थापक (मोहत्मिम) को आप पर बड़ा विश्वास हो गया है। हम दोनों सोने से पहिले भजन किया करते हैं। मैं ने आप की बातें सुनाई थीं। बड़ा खुश हुआ। मैं अब तीक्ष्ण (गरम) वस्तुओं का नितान्त असेवन (परहेज़) करता हूं।
आपका दास तीर्थराम
(59) अति परिश्रम मस्तिष्क की निर्बलता का कारण होता है। 10 जुलाई 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
यहां अत्यन्त दर्जे की गर्मी पड़ती है, और मैं (जिस की प्रकृति पहिले ही गर्मी वाली है) बहुत ही तंग हूं। मेरा दमाग (मस्तिष्क) काम नहीं कर सकता। इस से आज बहुत ही कम पढ़ सका हूं। मेरा चित्त अब यह चाहता है कि छुट्टियां लेकर 25 जुलाई से पहिले ही आप के पास आजाऊं और कुछ आराम करूं। यदि मेरा दमाग ठीक होगया तब तो नहीं आऊंगा, और यदि न हुआ तो आप लिखो कि मेरा आना उचित है कि नहीं। यदि उचित हो तो आऊं, नहीं तो न आऊं।
दमाग की निर्बलता का कारण यह भी है कि पिछले दिनों अति परिश्रम करना पड़ा था आप मेरे पर दया रक्खा करें। आप का दास तीर्थराम
(60) तीव्र गुरु भक्ति और सेवा। 2 अक्टूवर 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
परमेश्वर के वास्ते एक पत्र लिखो। आप ने वृक्ष को अब तक पाला है, और पानी दिया है, अब अकस्मात् ( एक दम ही ) उस वृक्ष का ध्यान छोड़ना नहीं चाहिये। आप चाहे मुझे चाहें अथवा न चाहें, मैं तो आप का सेवक हूं। पर इतना अवश्य चाहता हूं कि आप ( यदि अधिक नहीं तो ) इतना ध्यान तो मेरी ओर भी रक्खा करें जितना कि अपने पानी भरने वाले मेहरे ( जलवाह ) या किसी अनुचर की ओर रखते हैं।
आप का दास तीर्थराम
(61) संसार के सुख रात के पक्षी का साया (छाया) हैं। 5 दिसम्बर 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
कल आप का पत्र मिला था, अति हर्ष प्राप्त हुआ। मैं ने कल से आप की ओर लिखने के लिये यह कार्ड अपने पास रक्खा हुआ था। परन्तु ( गणित शास्त्र के ) एक कठिन प्रश्न को हल करने में प्रवृत था। लिखने को अवकाश नहीं मिला। कल से कालेज का शेष काम भी अभी तक
और कुछ नहीं किया। अब आठ पहर के पीछे वह प्रश्न निकला ( सिद्ध हुआ ) है। अब और काम करूंगा।
परमात्मा का स्वरूप अद्भुत चमत्कारों का समूह है, संसार के सुख ऐसे हैं जैसे *उस रात के पक्षी का साया ( छाया ) जिस को कभी किसी ने देखा नहीं, किन्तु उस के उड़ने की आवाज़ ही केवल सुनी है।
आप का दास तीर्थराम
(62) प्लीहा (तापतिली) से आरोग्य प्राप्ति। दिसैम्बर 1861
संबोधन पूर्वोक्त,
हमारे कालेज के डाक्टर साहिब ने मुझे एक अंग्रेज़ी दवाई (औपधि) दिलवाई थी, अब कुछ तो व्यायाम के कारण और कुछ उसकी औपधि के कारण से मेरी तिल्ली (प्लीहा) नितान्त दूर हो गयी है। परमेश्वर की और आप की बड़ी कृपा हुई है। आप दया रक्खा करें।……काम बहुत बड़ा होता है और परिश्रम चाहता है। आप कृपादृष्टि रक्खा करें जिस से मैं परिश्रम (उद्यम अथवा अभ्यास) करता रहूं और सदा बड़ी अच्छी रीति से सारा काम करूं।
आप का दास तीर्थराम
________________ *भगत धन्ना राम जी से विदित हुआ कि प्रत्येक रात्रि वह सब नियत समय पर एक पक्षी के उड़ने की आवाज सुना करते थे, परन्तु बहुत यत्न करने पर भी वह पक्षी रात्रि के समय किसी को दिखाई नहीं देता था, यद्यपि उस के उड़ने की आवाज अवश्य सब को सुनाई देती थी। उस पक्षी के दृष्टान्त से तीर्थराम जी ने संसार के सुखों को दर्शाया है।
ला॰ झण्डूमल हलवाई।
देहली 1912