श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सत्य का मार्ग।

भाग 19 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 19 · अध्याय 2 / 7

सत्य का मार्ग।

1 मार्च 1903 को दिया हुआ व्याख्यान।

जैसा कि समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ है, आज के व्याख्यान का विषय "सत्य का मार्ग है" पश्चिमी कानों के लिए इस शीर्षक के कुछ माने (अर्थ) हो सकते हैं, किन्तु वेदान्त की दृष्टि से यह उपाधि (शीर्षक) अशुद्ध है। 'सत्य' का रास्ता या 'सत्य' को रास्ता असंगत वाक्य है। 'सत्य' दूर नहीं है, तो फिर उसका रास्ता कैसे हो सकता है? सत्य अब भी तुम्हारे पास है, वह अब भी तुम्हारा अपना आप (आत्मा) है। तुम अब भी उस में हो; नहीं, नहीं, तुम स्वयं सत्य हो। तुम वही हो। इस तरह,

सत्य का मार्ग इन शब्दों का व्यवहार करना ग़लती है। तुम्हें तो ईश्वर-ज्ञान की प्राप्ति, आत्मदेव ब्रह्म। का अनुभव ऐसी वस्तु नहीं है जिसे सिद्ध करना है, ऐसी चीज़ नहीं है जिसे पाना है, ऐसा काम नहीं है जिसे पूरा करना है, वह तो पूरा हुआ ही है। तुम तो अब भी वही हो। तुम्हें केवल कामनाओं के कोषों (ढकनों) को, जो तुम्हें घेर किए हुए हैं, तोड़ कर निकल आना है, तुमने जो कुछ किया है केवल उसे तुम्हें मिटाना है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए यदि 'करने' शब्द के विधि-अनुसार अर्थ ग्रहण किए जायं, तो तुम्हें कुछ भी नहीं करना है। अपना कारागार बनाने में तुमने जो कुछ किया है सिर्फ़ उसे मिटा दो, और फिर तुम ईश्वर ही हो, सत्य स्वरूप ही हो। किन्तु जो कुछ किया जा चुका है उस पर हरताल फेर देने का यह काम कुछ लोगों के लिए अति कठिन कर्तव्य है। और इस लिए "सत्य का मार्ग" के सम्बन्ध में हम किये हुए को मिटाने की विधि पर विचार करेंगे। अपने फंदों (बन्धनों) को तोड़ने में कुछ यत्न करना पड़ेगा। ये फंदे (बन्धन), ये ज़ंजीरें और बेड़ियां, जो तुम्हें बांधती हैं, क्या वस्तु हैं? तुम्हारे कान आज इस का आदर कर सकें या नहीं अमरिका वाले और यूरोपीय लोग इस कथन की सुन्दरता को आज समझ सकें या नहीं, किन्तु इससे सत्यता में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने का। सब तो यह है कि तुम्हारे सब स्नेह (आमाकर्षां), राग-द्वेष और तुम्हारी सब वासनायें, बेड़ियां आ ज़ंजीरें हैं। ये तुम्हें बांधती हैं। ये तुम्हें ईश्वरका नहीं दर्शन देतीं, ये तुम्हारा कारागार हैं। तुम्हारी कामनायें तुम्हें बाँधनी हैं। तुम दो मालिकों की सेवा नहीं कर सकत। तुम एक ही समय में परमेश्वर की और धन (कुबेर देवता) की भेंटा नहीं कर सकत। जब तुम शरार के ग़ुलाम हो, तब

तुम विश्व के विधाता नहीं बन सकते। सत्य (तत्व) को प्राप्त करना अखिल विश्व का स्वामी बनना है। और कामनाओं का सत्कार करना, बंधन को, अथवा इस संसार की वस्तुओं की स्थूल पदार्थों की दास्यता और गुलामी को, मंजूर करना है। हरेक आदमी इसामसीह होना चाहता है, हरेक मनुष्य सत्य को अनुभव करना चाहता है, सिद्ध (prophet) बनना चाहता है, किन्तु क़ीमत देने को बहुत ही थोड़े लोग तैयार हैं, विरला ही कोई है।

भारतवर्ष में एक बड़ा पहलवान और कसरती था। गोदना गुदवाने के लिए, अपनी भुजा पर सिंह की तलवार खुदवाने के लिए उस एक नाई की ज़रूरत पड़ी। उसने नाई से अपनी दोनों भुजाओं पर एक बड़ा, तेजस्वी सिंह अंकित कर देने को कहा। उसने कहा कि मेरा जन्म सिंह राशि में हुआ था, लग्न घड़ी बड़ी अच्छी थी, और मैं बड़ा बहादुर हूंगा, ऐसा समझा जाना हूँ। नाई ने सुई ली और चित्रित करना अर्थात् गोदना शुरू किया। और उन के जंग सी सुई चुभाने ही कसरती उस न सह सका। हकना हुआ वह नाई से बोला. 'ठहरो. ठहरो, कर क्या रहे हो?" नाई ने कहा कि मैं शेर की दुम अंकित करने लगा हूँ। वास्तव में, यह मनुष्य सुई के चुभने की जलन नहीं सह सका और बड़ा भद्दा बहाना करके बोला, 'क्या तुम यह नहीं जानते कि बज़ादार लोग अपने कुत्तों और घोड़ों की दुम कटवा डालने हैं, और इस लिए तुम कटा सिंह बड़ा ही सिंह समझा जाता है? तुम सिंह का दुम क्यों बना रहे हो? दुम की कोई ज़रूरत नहीं"। नाई ने कहा. "बहुत खूब. मैं पूँछ न अंकन करूंगा. सिंह के दूने अंग गादूंगा।" नाई ने फिर सुई उठाई और उसके शरीर में भोंकी। इस बार भी वह

आदमी ने सह सका। वह बुम्भला कर बोला, "अब तुम क्या करने वाले हो?" नाई ने कहा, "अब मैं सिंह के कान खींचने लगा हूँ।" पहलवान ने फिर कहा, "अरे नाई! तू बड़ा मूर्ख है। क्या तू यह नहीं जानता कि लोग अपने कुत्तों के कान कटवा डालते हैं? लम्बे कानों वाले कुत्ते घरों में नहीं रखे जाते (अथवा कुत्तों के कान लम्बे नहीं रखे जाते। क्या तू यह नहीं जानता कि बे कानों का ही सिंह सर्वोत्तम है?" नाई रुक गया। कुछ देर बाद नाई ने सुई उठाई और फिर गोदने लगा। वह (पहलवान) उस न सह सका और बिगड़ कर बोला, "अब तू क्या करने लगा है ऐ नाई?" नाई ने कहा, 'अब मैं सिंह की कमर गोदने लगा हूं!" तव तो पहलवान ने कहा, तुमने हम लोगों का काव्य नहीं पढ़ा है? भारतीय कवियों का किया हुआ वर्णन तुमने नहीं पढ़ा है? शेरों की कमर हमेशा बहुत छोटी, पतली, नाम मात्र की, चित्रित की जाती है। तुम्हें सिंह की कमर अंकित करने की ज़रूरत नहीं।" अब तो नाई ने अपने रंग और गोदने की सुई फेंक दी और गोदवानेवाले से अपने सामने से हट जाने को कहा।

यह एक मनुष्य है जो अपने को सिंह राशि में जन्मा बतलाता है, यह मनुष्य बड़ा पहलवान, बड़ा कसरती होने का दम भरता है; यह आदमी अपने को शेर कहता है। वह अपने सारे जिस्म पर सिंह गुदवाना चाहता है, किन्तु सुई की चोभ सह नहीं सकता। अधिकांश में ऐसे ही लोग हैं जो ईश्वर को देखना चाहते हैं, वेदान्त का अनुभव करना चाहते हैं, इसी चाल, इसी पल में, पूर्ण सत्य को जानना चाहते हैं, हरेक बात को पूरा कर डालना चाहते हैं, आधे मिनट में इसामसीह हो जाना चाहते हैं। पर उस शेर (सत्य)

को अपने अन्तःकरणों में अंकित करवा लेने का, उस सदाचार (धर्म) रूप शेर को अपनी हस्ती में चित्रित करवाने या गुदवा लेने का, जब समय आता है, तब वे डंक वा डंक की वेदना नहीं सह सकते; तब वे यों आगा-पीछा करने लगते हैं कि "वस्तु तो मैं चाहता हूँ, पर दाम न दूँगा।"

ईश्वरानुभव और सत्य को प्राप्त होने के लिए, तुम्हारी प्यारी से प्यारी कामनायें और इच्छायें आर-पार छेदी जायँगी, तुम्हें अपनी प्रियतम वासनाओं और आसक्तियों को काटना होगा, तुम्हें अपने सकल प्यारे अंध विश्वासों और पक्षपातों को मिटा देना होगा, तुम्हें अपनी सब पूर्व कल्पित कल्पनाओं को काट कर फेंक देना होगा। नीच और तुच्छ बनाने वाली सब आकांक्षाओं से तुम्हें अपना पिंड छुटाना होगा, तुम्हें अपने को पवित्र करना पड़ेगा। विशुद्धता, विशुद्धता। बिना दाम दिये तुम ईश्वर को नहीं पा सकते, तुम अपने जन्मजात स्वत्व को लाभ नहीं कर सकते। शुद्ध हृदय वाले धन्य हैं, क्योंकि उन्हें परमेश्वर के दर्शन होंगे। और हृदय की निर्मलता क्या वस्तु है? केवल वैवाहिक पापों से बचाने ही का नाम हृदय की शुद्धता नहीं है। ये तो उसके अर्थ हैं ही, किन्तु और भी बहुत कुछ उसके अर्थ हैं। आज ये वचन तुम्हें चाहे रुचें या न रुचें, किन्तु एक दिन आवेगा जब ये तुम्हें अवश्य रुचेंगे, आज या कल तुम्हें इसी नतीजे पर पहुँचना ही पड़ेगा। नतीजा यह है कि आसक्ति मात्र, वह चाहे आपको अपने घर से हो या घड़ी से, या अपने कुत्ते से हो, अथवा पिता, माता या बच्चे से, अर्थात् किसी चीज़ से भी आसक्ति, सत्य के जिज्ञासु के लिए, इसी क्षण पूर्ण सत्य पर अधिकार पाने के इच्छुक के लिए, उतना ही नीच और दुर्बल बनाने वाली है जितना

कि व्यभिचार। हृदय की शुद्धता का अर्थ है संसार के सब पदार्थों की आसक्ति से अपने को मुक्त कर लेना, त्याग; उससे इतर कुछ नहीं। ये हैं हृदय की पवित्रता के अर्थ। शुद्ध अन्तःकरण वाले धन्य हैं, क्योंकि वे ईश्वर के दर्शन करेंगे। इस पवित्रता को प्राप्त करो, और तुम्हें ईश्वर के दर्शन होंगे।

प्राचीन इतिहास में अटलांटा की बड़ी ही सुन्दर कथा है। उस में ऐसा कहा है कि जो मनुष्य उससे व्याह करना चाहता था उसे उसके साथ दौड़ की बाज़ी लगानी पड़ती थी। कोई भी मनुष्य दौड़ में उससे आगे न निकल सका। परन्तु एक मनुष्य ने अपने देवता जूपिटर की शरण ली और दौड़ में अटलांटा से आगे निकल जाने तथा उसे पा लेने के सम्बन्ध में अपने इष्ट देव से सलाह ली। देवता ने उसे बड़ी ही विलक्षण राय दी। उसने इस मनुष्य से कहा कि दौड़ के रास्ते पर सोने की ईंटें बिछा दो। आप जानते हैं कि दौड़ में अटलांटा को जीत लेने में कोई और सहायता सुरपति जूपिटर जी अपने इस भक्त की नहीं कर सकते थे। अखिल विश्व में सब से तेज़ और ताकतदार होने का वरदान अटलांटा को सुरेश से मिल चुका था। किन्तु जूपिटर के इस भक्त ने दौड़ के पूरे चक्कर पर सोने की ईंटें डाल दीं और अटलांटा को अपने साथ दौड़ने को आह्वान किया। दोनों ने दौड़ना शुरू किया। यह मनुष्य स्वभाव से ही अटलांटा से बहुत दुर्बल था। एक क्षण में वह उससे आगे निकल गई। किन्तु जब वह मनुष्य उसकी नज़र से ओट हो गया, तब उसकी रास्ते पर पड़ी हुई दृष्टि सोने की ईंटों पर गई और उन्हें बटोरने को वह रुक गई। वह जब सोने की ईंटें बटोरने में पड़ी, तब वह भक्त उससे आगे निकल

गया। इसके एक या दो मिनट बाद उसने उसे फिर पकड़ लिया और फिर दौड़ के चक्कर की बाईं तरफ उसने दूसरी ईंट देखी। वह उस ईंट को उठाने गई और ले आई। इस बीच में जूपिटर का वह भक्त उससे आगे निकल गया। किन्तु कुछ ही देर में अटलांटा ने उसे फिर पकड़ लिया। फिर उसे कुछ और सोने की ईंटें मिलीं। वह उन्हें उठाने के लिए रुका। इस बीच में वह आदमी फिर आगे निकल गया। यही होता रहा। दौड़ समाप्त होने तक अटलांटा के पास सोने का बड़ा भारी बोझ हो गया। इस बोझ को ढोना और दौड़ में आगे निकल जाना उसके लिए बड़ा कठिन हो गया। अन्त में वह आदमी जीत गया और अटलांटा हारी। अटलांटा को मिला हुआ सब सोना भी दौड़ में जीतनेवाले आदमी के हाथ लगा। यह सोना उसे मिला। और खुद अटलांटा भी उसे मिली। उसे सब कुछ मिल गया।

धर्म के रास्ते पर और सत्य के मार्ग पर जो लोग चलना चाहते हैं उनमें अधिकांश का यही ढंग है। सत्य के मार्ग पर जब तुम चलना शुरू करते हो, तब तुम्हें अपने इर्द-गिर्द सब प्रकार के जघन्य फल और लौकिक प्रलोभन मिलते हैं। तुम उन्हें उठाने को झुकते हो, किन्तु ज्यों ही तुम ऐसा करते हो और सांसारिक प्रलोभनों तथा सुखों को भोगते हो, त्यों ही तुम अपने को पिछड़ा हुआ पाते हो। तुम दौड़ में हारने लगते हो, टाल-मटोल करते हो, अपना पथ निकट बना लेते हो, और सब कुछ खो बैठते हो। सांसारिक आसक्ति (बंधन) और भौतिकता से होशियार रहो। सांसारिक सुखों को भी भोगते हुए तुम सत्य को नहीं पहुँच सकते। कहावत है कि यदि तुम सत्य का भोग करोगे, तो सांसारिक सुखों को भोगने के योग्य न रह जाओगे। सांसारिक सुखों को तुम

भोगो, तो सत्य तुम्हारी पकड़ से बच जायगा, तुम से आगे निकल जायगा। राम तुमसे आज सत्य वस्तु कह रहा है। अनेक लोग राम के पास आते हैं और बार बार उससे कहते हैं कि वे आत्मानुभव चाहते हैं। तुम इसी क्षण आत्मानुभव कर सकते हो। विषयासक्ति से अपने को मुक्त करलो और साथ ही साथ ईर्ष्या और द्वेष मात्र को फाड़ डालो। ईर्ष्या क्या है, घृणा क्या है? वे हैं अंधा अनुराग। किसी से हमारी नफरत तब ही होती है जब किसी अन्य वस्तु पर हमारी आसक्ति हो। यहाँ पर आप प्रश्न करेंगे कि अपने लड़कों, भाइयों, और पतियों इत्यादि से हम कैसे छुटकारा पावें। यह तो तुम्ही जानो। कैसे और किस तरीके से, यह खुद तुम्हारे जानने की बात है। किन्तु सच यह है कि सत्य या ईश्वर तुम्हारा पिता होना चाहिए, परमेश्वर या सत्य ही तुम्हारी माता, परमेश्वर या सत्य ही तुम्हारी स्त्री, ईश्वर या सत्य ही तुम्हारा अपना बाबा, अपना शिक्षक अपना घर, अपनी दौलत, अपना सब कुछ होना चाहिये। अपनी-सब आसक्तियों को हरेक पदार्थ से हटालो, और एक वस्तु, एक तत्व, एक सत्य स्वरूप, अपने आत्मा पर अपने को एकाग्र करो। तुरन्त ठौरही तुम्हें आत्मानुभव की प्राप्ति होगी।

भारतीय भाषा में एक सुन्दर गीत है, जिसे यहाँ गाने की कोई ज़रूरत नहीं। गीत का अर्थ यह है कि यदि सत्य को पाने के रास्ते में तुम्हारा पिता विघ्न कर्ता हो, तो उसी तरह उसे रौंद कर चले जाओ, उसे पार कर जाओ, जिस तरह प्रह्लाद ने, भारत के एक वीर बालक ने, अपने पिता को त्याग दिया था, क्योंकि वह उसके सत्यानुभव के मार्ग में कंटक बना था। यदि सत्य को अनुभव करने के मार्ग में तुम्हारी माता बाधक बनती हो, तो उसे त्याग दो। यही नई इंजील

(New Testament निउ टेस्टामेंट) कहती है। हिन्दू इंजील भी यही कहती है। अपने माता-पिताओं के कल्याण के लिए सत्य को प्यार करो। अपने माता पिताओं की वहीं तक इज़्ज़त करो जहाँ तक वे सत्य की ओर तुम्हारी उन्नति को नहीं रोकते। यदि तुम्हारा भाई तुम्हारे सत्यानुभव के मार्ग में खड़ा होता है, तो उसे उसी तरह दूर कर दो जिस तरह बिभीषण ने (अपने भाई रावण को) कर दिया था। यदि तुम्हारी स्त्री तुम्हारे सत्य प्राप्ति के मार्ग में विघ्न रूप है, तो उसे ठीक भर्तृहरि की तरह दूर हटा दो। यदि तुम्हारा पति तुम्हारे सत्य-अनुभव के मार्ग में रोड़ा बनता है, तो मीराबाई की भाँति उसे तिलांजलि दे दो। यदि तुम्हारा गुरु, तुम्हारा धर्म पथ प्रदर्शक तुम्हारे सत्य-अनुभव के मार्ग में बाधा डालता है, तो उसे भीष्म की भांति फाड़ दो, परे कर दो, क्योंकि तुम्हारा असली सम्बन्धी, तुम्हारा सब से सच्चा दोस्त, सत्य और केवल सत्य है। और सब नातेदार तथा साथी क्षण स्थायी वा अस्थिर हैं, एक दिन के हैं, किन्तु सत्य सदा तुम्हारे साथ है। सत्य तुम्हारा सच्चा अपना आप (आत्मा) है। सत्य तुम्हारे माता-पिताओं की अपेक्षा तुम्हारा अधिक नज़दीकी है। तुम्हारी स्त्री, बच्चे, मित्रों, इत्यादि की अपेक्षा सत्य तुम्हारा अधिक नज़दीकी है। बादशाहों, मात-पिताओं, बाल-बच्चों, पिता, माता, हर एक से भी सत्य का अधिक मान करो।

भारत के एक राजा के जीवन से एक बड़ा अच्छा दृष्टान्त मिलता है। वह सत्य के मार्ग का पथिक बना। कहते हैं कि बरफ में अपनी देह गला देने को वह हिमालय पर चढ़ रहा था। इसकी बड़ी विस्तृत कथा है। तुम्हें समग्र कथा सुनाने की राम को ज़रूरत नहीं है। किसी

कारण से, किसी एक बड़े कारण से, वह अपने मात-पिता, अपने स्त्री और सालों, अपने चार भाइयों के साथ हिमालय की चोटियों पर जा रहा था। कहते हैं कि वह धर्म-पथ पर चल रहा था, वह सत्य के अन्वेषण के लिये जा रहा था। वह आगे चल रहा था। बढ़ता चला जाता था। उसका छोटा भाई उसके पीछे जा रहा था और उसके छोटे भाई के बाद उसका एक और भाई था, और इस तरह पर ठीक क्रम से भाइयों के पीछे इस राजा की महिषी (अर्धांगी) थी। वह आगे जा रहा है, उसका मुख लक्ष्य की ओर है, और आँखें सत्य पर जमी हुई हैं। उसने देखा कि उसकी रानी उसके पीछे विलाप कर रही है। लड़खड़ाती हुई वह उसका पीछा नहीं कर सकती, वह थक गई और मरणासन्न थी। राजा ने अपना मुख उसकी ओर नहीं फेरा। उसने अपनी स्त्री से कहा कि कुछ कदम दौड़ कर मेरे पास आजाओ और फिर मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूँगा। "मेरे पास आजाओ, मुझ तक आजाओ"। किन्तु तीन पग बढ़कर वह उसके पास न पहुँच सकी। वह बहुत पीछे रह गई थी, वह उसके पास न पहुँच सकी, और राजा पीछे नहीं लौटा। सत्य से एक पग भी लौटने की अनुमति नहीं होना चाहिये। सम्राट युधिष्ठिर कदापि एक पग भी पीछे न लौटेंगे। स्त्री लड़खड़ा कर गिर जाती है, किन्तु उसके लिए सम्राट सत्य की ओर से मुँह नहीं फेर सकता। तुम्हारे पूर्व जन्मों में तुम्हारी हज़ारों स्त्रियां हो चुकी हैं, और यदि तुम्हारे कुछ भावी जन्म हैं, तो न जाने फिर कितनी बार तुम्हारा विवाह होगा; न जाने कितने तुम्हारे नातेदार हो चुके हैं और भविष्य में कौन जाने कितने सम्बन्धी होंगे। इन सम्बन्धियों और बन्धनों के लिए तुम्हें सत्य से मुँह न फेरना चाहिये।

आगे बढ़ो, आगे बढ़ो, कोई चीज़ तुम्हें लौटाने न पावे। अपनी स्त्री की अपेक्षा सत्य का अधिक आदर करो। भगवन् का अधिक सम्मान करो। सत्य का सम्पूर्ण मानव-जाति से सम्बंध है, आत्मदेव या सत्य समग्र काल (time) से सम्बन्ध रखता है, नित्य है। और तुम्हारे सांसारिक बन्धन ऐसे नहीं हैं, वे क्षणिक हैं। इस कानून को ध्यान में रक्खो कि, जो कुछ वास्तव में तुम्हारे लिये हितकर है, वह तुम्हारी स्त्री और तुम्हारे साथियों का भी अवश्य हितकर है। यदि तुम्हें खटके कि अपनी स्त्री से अलग रहने में वास्तव में हमारी भलाई है, तो याद रक्खो कि तुमसे अलग रहना उसके लिये भी वास्तव में हितकर है। यह नियम है। जो सत्य या परमेश्वर तुम्हारे व्यक्तित्व या अस्तित्व के मूल में है, वही तुम्हारी स्त्री के भी व्यक्तित्व का मूलाधार है। सम्राट युधिष्ठिर की रानी गिर पड़ी। किन्तु राजा सीधा चला गया और अपने भाइयों से पीछे चले आने को कहा। कुछ देर तक वे उसके साथ दौड़े, किन्तु अब तो सब से छोटा भाई उसके साथ चलने में असमर्थ हो गया। थकावट के मारे वह लड़खड़ाने लगा और जब गिरने को हुआ, तब चिल्लाया, "भाई! भाई युधिष्ठिर! मैं मरता हूँ, मुझे बचाओ, मुझे।" राजा युधिष्ठिर ने लक्ष्य से, सत्य से अपनी आँखें नहीं हटाईं; वह बढ़ता गया, आगे बढ़ता गया। उसने अपने भाई से केवल पुकार कर कहा कि "दो या तीन पग दौड़ कर मेरे पास पहुँच जाने की हिम्मत करो, और इस शर्त पर मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूँगा; परन्तु किसी भी कारण से, किसी लिये भी तुम्हें धकेलने को मैं एक पग भी पीछे न लौटूंगा।" वह आगे बढ़ता जा रहा है। सब से छोटा भाई मर गया। कुछ देर बाद दूसरा भाई चिल्लाया, जो रस्सी के उस सिरे

पर था, और वह भी लड़खड़ाने वाला ही था। उसने सहायता के लिये पुकारा, "भाई! भैया युधिष्ठिर! मेरी सहायता करो, मेरी मदद करो, मैं गिरा चहता हूँ"। किन्तु भाई युधिष्ठिर पीछे नहीं लौटता। वह बढ़ा चला जाता है। इस तरह सब भाई मृत्यु को प्राप्त हुए, किन्तु महाराज युधिष्ठिर टस से मस न हुआ, या एक पग भी नहीं लौटा। वह चला ही जाता है, धर्म के मार्ग पर वह बढ़ता ही जाता है। आगे चलकर कहानी यों है कि जब युधिष्ठिर सत्य की सर्वोच्च चोटी पर पहुँच गया, जब वह अभीष्ट स्थान पर पहुँच गया, तब स्वयं परमात्मदेव मूर्तिमान सत्य, उसके सामने आविर्भूत हुआ। जैसा कि हमें इंजील में पढ़ने को मिलता है कि परमेश्वर कपोत (dove) के रूप में दिखाई पड़ा, उसी तरह हिन्दू धर्म-शास्त्रों में किन्हीं व्यक्तियों को देवदूत या वैकुण्ठ पात (इन्द्र) के रूप में ईश्वर के दर्शन देने की बात हमारे पढ़ने में आती है। इस तरह आगे कथा में वर्णित है कि जब महाराज युधिष्ठिर सत्य के शिखर पर पहुँच गया, तब मूर्तिमान सत्य ने प्रगट होकर उससे सशरीर वैकुण्ठ चलने को, स्वर्गारोहण करने को कहा। जिस तरह आप इंजील में किन्हीं लोगों का जीते जी स्वर्गारोहण पढ़ते हैं, उसी तरह महाराजा युधिष्ठिर सजीव स्वर्गारोहण करने की प्रार्थना होने की यह कथा है। अपनी दाहिनी ओर देखने पर उसे एक कुत्ता अपने पास दिखाई दिया। राजराजेश्वर युधिष्ठिर ने कहा, "हे परमात्मदेव! हे सत्य! यदि तुम मुझे उच्चतम वैकुण्ठ को ले चलना चाहते हो, तो इस कुत्ते को भी मेरे साथ आपको ले चलना पड़ेगा। इस कुत्ते को भी मेरे साथ श्रेष्ठ स्वर्ग को चढ़ा ले चलिये।" किन्तु कहानी कहती है कि देहधारी परमेश्वर या सत्य ने कहा, "महाराज युधिष्ठिर! ऐसा नहीं

हो सकता। कुत्ता इस काबिल नहीं है कि सर्वश्रेष्ठ स्वर्ग को पहुँचाया जाय, कुत्ते को अभी अनेक योनियों में जन्म लेना है, कुत्ते को अभी मनुष्य की योनि में जन्म लेना है और उत्तम जीवन व्यतीत करना है; उसे पवित्र और शुद्ध मनुष्य की तरह अभी रहना है, और तब वह परम स्वर्ग को चढ़ाया जायगा। तुम सदेह सर्व श्रेष्ठ स्वर्ग में जाने के योग्य हो, किन्तु कुत्ता नहीं है।" तब तो महाराज युधिष्ठिर बोले, "हे सत्य! हे परमेश्वर! मैं यहाँ तुम्हारे लिये आया हूँ, न कि स्वर्ग या वैकुण्ठ के लिये। यदि आप मुझे सर्वश्रेष्ठ वैकुण्ठ को ले जाना और वहाँ सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं, तो आप को इस कुत्ते को भी मेरे साथ ले चलना पड़ेगा। मेरी स्त्री मेरे साथ न आ सकी, वह धर्म के मार्ग पर डगमगा गई। मेरा सब से छोटा भाई मेरे साथ न चल सका, वह सत्य के मार्ग पर काँच्या गया; मेरे साथ दूसरे भाई मेरे साथ न देख सके, उन्होंने मुझे छोड़ दिया, उन्होंने अपने को दुर्बलता के हवाले कर दिया, उन्होंने प्रलोभनों को अपने पर विजय पाने दी, वे मेरे साथ नहीं चल सके। किन्तु अकेला यह कुत्ता मेरे साथ आया है। यह कुत्ता है। इसने दुःख-दर्द में मेरा साथ दिया है, यह प्रयत्नों में मेरा साथी हुआ है, मेरे संग्रामों में इसने हिस्सा लिया है, मेरी चिन्ताओं में इसने बँटाया है, मेरे साथ इसने परिश्रम किया है, वह कुत्ता है। जब इस कुत्ते ने मेरी मुश्किलों में, मेरे कठिन प्रसंगों और संकटों में, मेरा साथ दिया है, तब मेरे वैकुण्ठ या स्वर्ग को वह क्यों न भोगेगा! मैं तुम्हारे स्वर्ग या वैकुण्ठ को कदापि न जाऊँगा यदि तुम इस कुत्ते को उस वैकुण्ठ या स्वर्ग का मेरा साझेदार न बनाओगे। यदि इस कुत्ते को तुम मेरे साथ नहीं आने देते, तो मुझे तुम्हारे वैकुण्ठ की ज़रूरत नहीं है।"

कथा बताती है कि देहधारी सत्य या ईश्वर ने एक बार फिर महाराज युधिष्ठिर से कहा, "कृपा करके यह अनुग्रह मुझ से न चाहो, अपने साथ इस कुत्ते को ले चलने को मुझ से न कहो।" किन्तु महाराज युधिष्ठिर ने कहा, "दूर हो तू यहाँ से; तुम देहधारी सत्य या परमेश्वर नहीं हो, तुम कोई शैतान हो, तुम परमेश्वर या सत्य नहीं क्योंकि यदि तुम सत्य होते तो अपने सामने कोई अन्याय क्यों होने देते? क्या तुम्हारे ध्यान में यह नहीं आता कि, यदि केवल मुझे स्वर्ग का भोग देते हो और इस कुत्ते को मेरे सुख का साझीदार नहीं बनने देते तो तुम इस कुत्ते के साथ, जिसने मेरे दुःखों को बँटाया, अन्याय करते हो? यह अनीति देहधारी सत्य या परमेश्वर के अनुरूप नहीं है।" कथा बताती है कि इस पर, देहधारी सत्य या परमेश्वर अपने सच्चे रूप में प्रकट हुआ, और वह कुत्ता तुरन्त ही फिर कुत्ता न रहा बल्कि स्वयं सर्व शक्तिमान महाप्रभु के पूर्ण तेज से युक्त दिखाई पड़ा। उस राजा की परख और परीक्षा हो रही थी, और अन्तिम परीक्षा में, अन्तिम क्षण में, वह सफल हुआ।

इस तरह पर तुम्हें सत्य के पथ पर चलना है। यदि तुम्हारे अति नज़दीकी और प्रियतम साथी भी, जो तुम्हारे कुटुम्बी हैं, धर्म के रास्ते पर तुम्हारे साथ न चल सकें, तो उन को अपने मित्र न समझो। और यदि एक कुत्ता सदाचार के पथ में तुम्हारा साथ दे, तो उस कुत्ते को तुम्हें अति नज़दीकी और प्रियतम प्राणी समझना होगा। इस तरह तुम्हारे धर्माचरण का पक्ष लेने के सिद्धान्त पर तुम्हें अपने मित्र बनाने चाहिये। किसी ऐसे को अपना मित्र न बनाओ जो तुम्हारी दुष्प्रकृति का पक्ष पाती हो। यदि इस सिद्धान्त पर तुम अपने मित्र चुनोगे कि उनमें भी वही कुप्रवृत्तियां हैं जो

तुममें हैं, तो पीड़ा, चिन्ता और विकट वेदना तुम्हें भोगना पड़ेगी।

एक हिन्दू महात्मा के सम्बन्ध में कहते हैं कि एक बार वह भूखा सड़कों पर जा रहा था। आप जानते हैं कि हिन्दुस्थान में महात्मा लोग जब भूखे होते हैं, तब पहाड़ों से उतर कर बस्ती पर विचरते हैं और शरीर रक्षा निमित्त भोजन मांगते हैं। अति विरल अवसरों पर ही वे सड़कों पर आते हैं। आम तौर पर वे नगरों से बाहर वनों में रहते हुए ईश्वर के ध्यान में अपना सब समय बिताते हैं। भूखे महात्मा जी को भोजन कराया गया। यदि राम भी कुछ लोना है, तो उसे क्षमा करने के लिये आप के पास उचित कारण होगा। एक महिला उसके खाने के लिये उत्तम भोजन लाई। उसने रोटी लेकर अपने रुमाल में रखली, और भारतीय साधुओं के दस्तूर के अनुमान घर से निकल कर जंगल की राह ली। वहाँ उसने रोटी पानी में डाल दी और भिगा कर खा ली। दूसरे दिन फिर मामूली समय पर वह नगर आया। फिर वह महिला उसके पास गई और कोई बहुत ही उत्तम भोजन खाने को दिया। वह लौट गया। तीसरे दिन भी नारी कोई अति उत्तम आहार लाई और साधु को वह अन्युजन आहार देते समय उसने कहा, — "मैं तुम्हारी राह देखा करती हूँ। तुम्हारी राह देखते देखते, दरवाज़े की ओर ताकते ताकते, मेरी आँखें दुःखने लगी हैं। तुम्हारे नेत्रों ने मुझे मोह लिया है।" उस महिला के मुख से ये वचन निकले। साधु चला गया। वह किसी दूसरे दरवाज़े पर गया और वहाँ उसे कुछ भोजन मिला। उस भोजन को खा कर वह वन को चला गया। और उस पहली महिला के दिये हुए भोजन को, जिसने उस पर अपने प्रेम भाव की सूचना दी थी, उसने लक्ष्मी में

फेंक दिया। और दूसरी महिला के भेंट किये हुए भोजन को उसने खाया। क्या आप जानते हैं कि दूसरे दिन उसने क्या किया! लोहे के सूए को खूब तपा कर उसने अपनी आँखें छेद कर निकाल लीं, और उनको अपने अंगोछे में बांध कर एक लकड़ी के सहारे बड़ी कठिनता से रास्ता टटोलते टटोलते वह उस महिला के घर पर पहुंचा जिसने उससे प्रेम प्रकट किया था। उसने महिला को बड़ी उत्सुकता से अपनी राह देखते पाया। उस साधु के नयन ज़मीन पर गड़े हुए थे। महिला ने यह नहीं ध्यान किया कि साधु ने अपनी आँखें छेद कर बाहर निकाल ली हैं। और जब वह कोई अति स्वादिष्ट पदार्थ उसके खाने के लिये लाई, तब अपने नेत्र-गोलक उसे भेंट करते हुए वह (साधु) बोला, "माता! माता! इन नयनों को ले लीजिये, क्योंकि इन्होंने तुम्हें मोहित किया था और तुम्हें बड़ा कष्ट दिया था। इन नेत्रों को अपने कब्ज़े में रखने का तुम्हें पूरा अधिकार है। मां! तुम्हें इन नयनों की चाह थी। इन्हें लो, अपने पास रक्खो इनको, इन्हें प्यार करो और इनका सुख भोगो, इन नेत्र-गोलकों को तुम जो चाहो करो, किन्तु ईश्वर के लिये, दया करके, मेरी आध्यात्मिक गति (आध्यात्मिक उन्नति) को न रोको। सत्य के मार्ग में मेरे ठोकर खाकर गिरने की व्यवस्था न करो।"

अरे भाइयो! अब हम देख सकते हैं कि, यदि तुम्हारी आँखें तुम्हारी राह में रोड़ा हैं, तो उन्हें निकाल कर फेंक दो। तुम्हारी सारी हस्ती अंधेरे में तबाह हो जाने से यह अच्छा है कि तुम्हारी देह बिना प्रकाश के हो। यही रास्ता है।

यदि तुम्हारे नेत्र तुम्हारे सत्यानुभव के मार्ग में रोड़े हैं, तो उन्हें छेद कर निकाल डालो। यदि तुम्हारे कान तुम्हें फुसलाते और पीछे रखे हैं, तो उन्हें काट डालो। यदि

तुम्हारी स्त्री, रुपया, दौलत, सम्पत्ति, या कोई भी चीज़ रास्ते (सन्मार्ग) में विघ्न करती है, तो उसे दूर करदो। यदि सत्य को तुम उतना ही प्यार कर सको जितना कि अपनी घरवाली और नातेदारों को प्यार करते हो, यदि तुम परमेश्वर या आत्मा या आत्मानुभव को उतने ही जोश या रुचि के साथ प्यार करसको जितने जोश और उत्साह से अपनी बीबी को प्यार करते हो, अपनी स्त्री पर जितना प्रेम दिखाते हो यदि उसके आधे से भी तुम परमेश्वर को प्यार कर सको तो इसी क्षण (समय) तुम्हें सत्य की प्राप्ति होजाय। जब तुम धर्मपन्थ पर चलना शुरू करते हो और प्रारम्भ में मिलने वाले कुछ प्रलोभनों पर विजय प्राप्त करते हो तब तुम्हें परमेश्वर का अनुभव होता है। साधारण प्रलोभनों पर विजय पाने पर तुम्हें क्या मालूम होगा। तब तुम्हें यह रास्ता निरा ऊटपटांग और सुन्दरता-रहित न जान पड़ेगा, तब तुम्हें यह सारा रास्ता विषम (बीहड़) न प्रतीत होगा। कहा जाता है कि सत्य का मार्ग सुई के सिरे (नाके) से भी अधिक तंग है। वेदों में लिखा हुआ है कि सत्य का पंथ अस्तुरे की धार के समान पैना और संकीर्ण है। किन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। प्रारम्भ में पंथ बहुत पैना और संकीर्ण जान पड़ता है किन्तु जब आप साधारण प्रलोभनों को जीत लेते तब अत्यन्त सुन्दर और सुगम रास्ता आपको मिलेगा। आप सम्पूर्ण प्रकृति को अपनी सहायता करते और हरेक वस्तु को अपना पक्ष लेते पावेंगे। ये कठिनाइयां, ये प्रलोभन, ये रुकावटें, ये प्रयत्न और विरोध केवल आपको धमकाते हैं। वे आपको डराते और दबकाते हैं। किन्तु वास्तव में हानि नहीं पहुंचाते। यदि तुम उनकी आंखें नीची कर सको और उन्हें भयभीत कर सको तो तुम्हें मालूम होगा कि कठिनाइयां केवल देखने

मात्र को कठिनाइयां मालूम पड़ती थीं, कठिनाइयां और प्रलोभन केवल मालूम पड़ने भरकी कठिनाइयां और प्रलोभन थे। आप सम्पूर्ण प्रकृति को अपनी ओर खड़ा हुआ पावेंगे, समग्र सृष्टि को अपनी टहल करने को तैयार पावेंगे। आप को यह पता लग जायगा।

एक हिंदू धर्म पुस्तक में जो भारत की इलियड (प्रसिद्ध कविता) है और जिसमें संसार के अथवा अन्ततः भारत के सर्वश्रेष्ठ शूरवीर राम की कथा वर्णित है, कहा हुआ है कि जब वे (राम) सत्य को खोजने गये, सत्य के पुनर्लाभ या अनुसन्धान के लिये गये, तब सम्पूर्ण प्रकृति ने अपनी सेवा उनके अर्पण की। कहा जाता है कि बन्दर उनके सैनिक बने और गिलहरियों ने खाड़ीपर पुल बनाने में उनकी सहायता की। कहा गया है कि जटायू (हंसों) ने भी उनका पत्र लेकर शत्रु पर विजय पाने में उनकी सहायता की। कहते है कि पत्थर अपने स्वभाव को भूल गये, पानी में फेंके जाने पर डूबने के बदले पत्थरों ने कहा "हम उतराते या पानी पर तैरते रहेंगे ताकि सत्य के पक्ष की जय हो"। उसमें यह कहा गया है कि, वायु और आकाश उनके पक्ष में थे, अग्नि उन्हें थांभे रही, पवनों और तूफानों ने उनका साथ दिया। अंग्रेज़ी भाषा में एक कहावत है कि वायु और लहर सदा वीर की अनुकूलता करती हैं। समग्र प्रकृति आपका पक्ष लेती है, जब आप प्रयत्न में लगे ही रहते हैं, जब आप शुरू की दिखावे की कठिनताओं को जीत लेते हैं। शुरू के प्रलोभनों और झगड़ों को यदि आप जीत लें तो समग्र प्रकृति को आपकी चेरी बनना पड़ेगा। सत्य पर डटे रहने का आग्रह करो तब तुम्हें विदित होगा कि तुम किसी साधारण लोक में नहीं रहते हो। दुनिया तुम्हारे लिये अद्भुत चमत्कारों की दुनिया

बन जायगी, चारों ओर तुम्हारे अलौकिक घटनायें घटेंगी और धिक् (लानत) दें देवताओं को यदि वे तुम्हारी अग्रसर गति (आध्यात्मिक उन्नति) में तुम्हारी खिदमत न करें। प्रकृति उत्सुकता के साथ विश्व के शासक की मुसाहबी कर रही है। आप अखिल विश्वके स्वामी हैं, यदि सत्य के साथ आप डटे हुप हैं तो समग्र संसार के आप अधिपति हैं।

संसार के, राम के विचार से अत्यन्त महापुरुष की, एक भारतीय महात्मा की, जीवनी वर्णन करके राम अब समाप्त करेगा। उसका नाम है शम्सतबेरज़। विचित्र परिस्थिति में इस मनुष्य का जन्म हुआ था। कहानी सच है या भूठी, इससे हमें कोई मतलब नहीं। किन्तु कुछ न कुछ सत्य उस में अवश्य होगा। उसके पिता के सम्बन्ध में कहा गया है कि एक समय वह देश में महा निर्धन मनुष्य था। उस महादीन व्यक्ति ने अपनी ज़िन्दगी पूरी तरह से ईश्वर ध्यान में बिताई। वह भूल गया कि उसका शरीर कभी जन्मा था, वह बिलकुल भूल गया कि उसकी देह कभी भी इस लोक में थी। उसके लिये दुनिया कभी दुनिया थी ही नहीं। वह परमेश्वर था, पूर्ण ब्रह्म था। और जिस तरह कभी २ किसी व्यक्ति की सारी देह किसी एक ख्याल से परिपूर्ण हो (पग) जाती है उसी तरह नख से शिखा तक उसकी देहका प्रत्येक रोमकूप (every pore of his body) ब्रह्मज्ञान से पूर्ण (सचेतन) था। बयान किया गया है कि जब वह सड़कों पर चलता था तब लोग उसके शरीर के रोम-कूपों (pores) से यह गीत सुनते थे, "हक्क, अनलहक्क," जिसका अर्थ है "ईश्वर, मैं ईश्वर हूँ"। उसकी जीभ पर सदा यह गीत रहता था, "अनलहक्क, अनलहक्क, ब्रह्म मैं हूं, ब्रह्म मैं हूँ"। साधारण लोग उसके आस-पास जमा हो गये,

उन्होंने उसे मार डालना चाहा। उन्हों ने उस पर धर्मद्रोह (कुफ्र) का अभियोग लगाया। वह अपने को ईश्वर क्यों कहता है? वह स्वयं परमेश्वर का; उसके लिये देह देह नहीं थी, न दुनिया दुनिया थी। "अनलहक्क" शब्द जब उसके मुख से निकलते थे तब उसे उनका भी ध्यान नहीं होता था। जिस तरह सोया हुआ मनुष्य घर्राटे लेता है उसी तरह अपने हिसाब से वह बिलकुल परमेश्वर में डूबा हुआ था। और यदि "अनलहक्क" शब्द उसके मुख से निकलते थे तो वे सोये हुए मनुष्य के घर्राटों के तुल्य थे। किन्तु लोगों ने उसे मार डालना चाहा पर उसके लिये यह क्या था, किसे तुम मारोगे? तुम तो शरीर का बध करोगे, किन्तु उसकी अपनी दृष्टि से तो उस शरीर का कभी अस्तित्व था ही नहीं। उसके शरीर को मार डालो, किन्तु उसको इससे कौन पीड़ा हो सकती थी? कहा गया है कि उसका शरीर सूली पर चढ़ाया गया। आप जानते हैं कि सलीब पर देह को रखना एक सहज बात है, किन्तु वहां सलीब से भी एक बदतर चीज़ थी। यह एक लोहे की लम्बी, (सिरे की तरफ़) नोकदार चोब थी, सुई की सी नोकदार चोब थी। और इस मनुष्य का हृदय लोहे की बल्ली के ठीक सिरे पर रख दिया गया। लोहे की चोब के पैने नुकीले सिरे को उसकी सौर मर्मग्रंथि (Solar plexus) को छेदकर पार निकल जाना था। इस तरह पर मनुष्य उन दिनों मारा जाता था। आप समझ सकते हैं कि यह सलीब से भी खराब ढंग है। उसकी देह इस तरह की सूली पर रक्खी गई। और बयान किया गया है कि जब उसकी देह उस सूली पर रक्खी हुई थी उसका चेहरा तेज से दमक रहा था, तथा उसके शरीर के प्रत्येक रोम से वही मधुर

गीत निरन्तर निकल रहा था, "अनलहक्क, मैं ईश्वर हूँ, मैं ईश्वर हूँ, परब्रह्म मैं हूँ, परब्रह्म मैं हूँ"। शरीर मृत्यु को प्राप्त होता है, किन्तु उसके लिये इससे कोई अन्तर नहीं पड़ा। इस कथा में आप देखते हैं कि, यदि सत्य के लिये आपको अपनी देह दे देना पड़े तो देदीजिये। यह अन्तिम आसक्ति (बन्धन) तोड़ी गई। सत्य के लिये, सांसारिक आसक्तियों (अनुरागों) को दे देने की तो बात ही क्या है, सत्य के लिये आप को केवल सांसारिक आसक्तियों (अनुरागों) को ही न छिन्न करना पड़ेगा, किन्तु यदि शरीर देने की ज़रूरत पड़े, तो उसे भी दे दीजिये। इस तरह पर आप को सत्य के पथ पर चलना है। जब यह मनुष्य उस नुकीले चोब पर लटक रहा था तब खून के बूँद उसकी देह से टपके। और कहानी बताती है कि लोहू के उन क़तरों को एक युवती ने बटोर लिया। यह जवान लड़की, जो उस साधु का सा ही विश्वास रखती थी, यह नौ जवान लड़की जिसके विचार वही थे जो प्रचारक के थे, इस जमा किये हुए रक्त को पी गई। और कहा जाता है कि उसके गर्भ रह गया। यह बात सच हो या झूठ, इससे हमारा कुछ मतलब नहीं है। यदि ईसामसीह निष्पाप गर्भ की पैदाइश हो सकता है तो, वेदान्त के अनुसार, यह बात भी सत्य हो सकती है क्योंकि यह एक ऐसा मनुष्य था जो ईसामसीह से कम नहीं था, यथार्थ में अनेक बातों में उससे बढ़ा हुआ था। इस स्त्री से एक लड़का उत्पन्न हुआ जो साधु हुआ, जिस की जीवनी राम आप को सुनाना चाहता है। अपने प्रारम्भ से ही, अपने बचपन से ही वह पूर्ण परमेश्वर था, अपने बाप से भी कहीं बढ़ चढ़ कर था। आप विश्वास करें, उस की ज़ुबान से निकली हुई एक अति अपूर्व पुस्तक, बहुत

बड़ा ग्रंथ है। इस महापुरुष ने कभी क़लम उठाकर उसे नहीं लिखा। किन्तु कहा जाता है कि उसके मुख से सदा कविता ही निकलती थी, वह जो कुछ भी बोलता था काव्य ही होता था। किन्तु किस तरह का काव्य? तुम्हारे अमेरिकन कवियों का अधम काव्य नहीं। यह यथार्थ में वास्तविक काव्य होता था। ब्रह्म-ज्ञान के सिवाय और कुछ भी इसमें नहीं होता था। ईश्वरी-कल्पनाओं से अलंकृत यह अति उत्कृष्ट काव्य होता था। इसका प्रत्येक शब्द सोने से तौले जाने के योग्य है, यदि उसकी तौल की जा सकती है, तो।

इस मनुष्य के सम्बन्ध में एक बड़ी ही विचित्र बात कही जाती है। एक बार तमाशा करने वाले लोगों की एक मंडली आई, आप सरकस या किसी दूसरी तरह का तमाशा कह सकते हैं। बादशाह को उन्हों ने तमाशा दिखाया। बादशाह उन से बहुत खुश हुआ और एक हज़ार रुपए इनाम दिया। बाद को बादशाह को बड़ा पश्चाताप हुआ। निस्सार तमाशों आदि के लिये हर रात हज़ारों रुपये दे डालना महाराज ने उचित नहीं समझा। अपने हज़ार रुपये फ़ेर लेने के लिये उसने एक चाल चली। उसने तमाशे वाले से सिंह का वेष धरने को कहा और कहा कि यदि शेर का खेल पसन्द आ जायगा तो तुम्हें बहुत कुछ कोई बड़ी भारी चीज़ दी जायगी, नहीं तो तुम्हारी सब सम्पति जुर्माने में लेली जायगी। ये लोग शेर का तमाशा न कर सके, वे शेर का रूप या वेष बना कर बादशाह को खुश न कर पाये। देखिये हिन्दुस्थान में ऐसे लोग हैं जो सब तरह के रूप बनाते हैं और कुछ जानवरों के रूप में भी प्रगट होते हैं और जिन जानवरों का वेष धरते हैं उन्हीं का प्रतिरूप सब तरह पर हो जाते हैं। किन्तु शेर का रूप वे न धर सके। ये लोग इस साधु पुरुष के पास आये

और रोने धोने तथा आंसू बहाने लगे। कथा कहती है कि, सम्पूर्ण सृष्टि से तद्दाकारता, समग्र प्रकृति से एकता और प्रत्येक से अभेदता होने के कारण स्वभाविक सहानुभूति ने इस महापुरुष के हृदय को दबा लिया और सहसा उसने उन लोगों से कहा कि तुम खुश हो, मैं सिंह का वेष धारण करूंगा, मैं स्वयं शेर का खेल दिखाऊंगा। आगे कथा यों है कि दूसरे दिन जब बादशाह और उसके दरबारी सब के सब इस प्रत्याशा में खड़े हुए थे कि तमाशा करनेवाली मंडली का कोई आदमी सिंह की आकृति और रूप बना कर आवेगा, तब एका एक, मानों जादू के ज़ोर से, एक सच्चा शेर आंगन में कूद पड़ा। यह सिंह तुरन्त गरजने लगा। इस ने बादशाह के बच्चे को झपट लिया और टुकड़े टुकड़े चीर डाला। उसने एक दूसरे लड़के को उठा लिया और उसे आकाश में उछाल दिया। आप देखते है कि यह एक मनुष्य था जो वास्तव में पर ब्रह्म और परमात्मा था। इस व्यक्ति के लिये "मैं यह छोटा नन्हा शरीर हूं" की कल्पना अतीत काल की बात हो चुकी थी अर्थात् बिलकुल निरर्थक होचुकी थी। वह स्वयं परब्रह्म था, और वह वही परमेश्वर था जो सिंह के रूप में प्रकट हुआ और एक क्षण के विचार में वह शेर बनगया। (जैसा तुम सोचते हो वैसे ही तुम हो जाते हो और यदि तुमने अपने आत्म स्वरूप को परमात्मा समझा और अनुभव किया है, तो आप के सब विचार और मनोरथ अवश्य सफल होंगे, वहीं ही पूरे होंगे इस लिये इस पुरुष का विचार कि मैं सिंह बन सकता हूँ तुरन्त सफल हुआ, और वह सिंह होगया। तमाशा समाप्त हुआ। लड़के को मार डालने के बाद महात्मा चला गया, क्यों कि उसे सिंह होना और इस देह या उस देह का आदर करना नहीं था। वह

व्यक्तियों को मानने वाला नहीं था अर्थात् देहों में आसक्त नहीं था। बादशाह जामे के बाहर होगया। बादशाह दरबारी महाकोप की मूर्ति होगये। उन्होंने इस पुरुष से बदला लेना चाहा। वे उसके पास गये और बोले, "अजी महाराज! अजी महाराज!! कृपा करके इस लड़के को फिर जिला दीजिये। यदि आप उसे मार सकते हैं, तो जिला भी सकते हैं। उसे जिला दीजिये, जिस तरह ईसा "कुम बिस्मिल्लाह" कहकर मुर्दों को जिलाया करता था जिस 'कुमबिस्मिल्लाह' का अर्थ है—"ईश्वर के नाम से उठ खड़ा हो, ईश्वर की महिमा बखानो और चलो जी उठो, पुनर्जीवित हो"। उन्हों ने उससे उस लड़के को ईश्वर के नाम से फिर जिला देने को कहा। महात्मा हँसे और बोले, "ईश्वर के नाम से फिर जी जाओ", किन्तु लड़का चैतन्य न हुआ। महात्मा ने कहा कि "लड़का ईश्वर के नाम से सजीव नहीं होता है"। उसने फिर कहा, "ईश्वर के लिये जी जाओ"। अब भी लड़का न जिया। महात्मा ने तीसरी बार फिर कहा, "जी जाओ और प्रभु के नाम से उठो और चलो"। किन्तु जीवित न हुआ। महात्मा मुस्कुराया और बोला, "कुम-बेज़िज़नी", "मेरी आज्ञा से जी जाओ, मेरे आदेश से जी उठो"। अब तो लड़का जी उठा। "कुम बेज़िज़नी", यह सत्य है, "मेरे आदेश से जी उठो" और लड़का बिलकुल दुरुस्त अर्थात् सजीव हो गया। लड़का जी उठा, किन्तु उसके आस पास के लोग यह न सह सके। उन्हों ने कहा, "यह धर्मद्रोही (काफ़िर) मनुष्य है। यह सम्पूर्ण कीर्ति खुद लेना चाहता है वह अपने को ईश्वर के बराबर बनाना चाहता है। उसे मार डालना चाहिये, उसका बध हो जाना चाहिये, जीते जी उसकी खाल उतार लेनी चाहिये"। महात्मा के लिये ये बातें

अर्थ रहित थीं। लोग उसे नहीं समझे थे। वह देह को, क्षुद्र व्यक्तित्व को, परमेश्वर नहीं कह रहा है। वह तो अपने मांस को इसके पहले ही मार और सूली पर चढ़ा चुका था। लोग जीते जी उसकी खाल उतार लेना चाहते थे, और कहानी आगे यों कहती है कि उस (महात्मा) ने तुरन्त अपने नखों से अपना सिर बिदारना शुरू किया और जिस तरह जानवरों की खाल उतार कर देह से अलग करदी जाती है, उसी तरह अपने ही नखों से महात्मा ने अपनी खाल उतार डाली और काटकर फेंक दी। इसी अवसर की रची हुई उसकी एक उत्कृष्ट और बड़ी कविता है। उस गीत (कविता) का मर्म यह है, "ऐ आत्मा! ऐ मेरे अपने आप!" वह अपने को सम्बोधन कर रहा है, जिसके लिये संसार का विप अमृत है और ऐ आत्मा! (मेरे अपने आप!) जिसके लिये संसार का अमृत (अर्थात्, इन्द्रियों के भोग) विप है, यहां ये लोग कुछ मांगते हैं। संसार मुर्दा लाश (यहाँ पर मुर्दा लाश का अर्थ "इन्द्रियों के भोग" है) के सिवाय और कुछ नहीं है, दुनिया के सुख केवल निर्जीव शव हैं और कुछ भी नहीं, और उनके पीछे दौड़ने वाले लोग कुत्तों से किसी तरह बेहतर नहीं। यहां ये कुत्ते आये हैं। यह मांस इन्हें खाने को देदो," कहानी चाहे सच्ची हो या झूठी, राम को इससे कोई प्रयोजन नहीं। किन्तु कहानी का तत्व, कहानी की शिक्षा, तुम्हें मन में रखना चाहिये।

सत्य की प्राप्ति के लिये, धर्म के रास्ते पर चलने के लिये, सारे अनुराग (मोह) को त्याग दो, सांसारिक कामनाओं और स्वार्थ पूर्ण लगनों (आसक्तियों) से ऊपर उठो। यदि लौकिक आसक्तियों और स्वार्थ भरी इच्छाओं से आप अपने को छुटा लें तो फिर सत्य की बात ही क्या है? आप

सत्य इसी क्षण हैं। "मुझे अधिक प्रकाश चाहिये, अधिक प्रकाश", यह मूर्खों की प्रार्थना है। तुम्हें ऐसी प्रार्थना करने की ज़रूरत नहीं। प्रकाश को बुलाने के लिये आपको ऐसी एक प्रार्थना भी नष्ट (व्यर्थ) करने की ज़रूरत नहीं है, यदि आप अपने को इसी पल अभिलाषाओं से शून्य करलें, यदि आप अपने को सब दुनियावी लगावों (प्रीतियों वा आसक्तियों) से छुटा लें। आप जानते हैं कि आप की हरेक कामना आप का एक भाग कतर लेती है, आपको अपना एक छोटा अपूर्णांक बना कर छोड़ जाती है। पूर्ण मनुष्य का दर्शन हमारे लिए कितना विरल है! एक पूर्ण मनुष्य ईश्वरोपदिष्ट मनुष्य है, एक पूर्ण मनुष्य सत्य रूप है। हरेक अभिलाषा या लगन, आपको, समभिन्न (proper fraction) किन्तु वास्तव में एक विषम भाग, तुम्हारे अपने आपका तुच्छ अंश बना देती है। जिस समय इन अभिलाषाओं, लगनों, स्नेहों, द्वेषों और आसक्तियों वा अनुरागों को आप दूर हटादें, प्रकाश पाने की इच्छा को भी विताड़ित करदें, अपने आप को राग द्वेष से छुटा अचल स्थिरता प्राप्त करें, और एक क्षण के लिये ॐ की रट लगावें, जब आप के मन की कोई भी वृत्ति किसी व्यक्ति, किसी देह, या किसी पदार्थ में न रह जाय जब आप का वह समस्त भाग, जो आप अमुक पदार्थ या इच्छा के पास छोड़ चुके हैं, बिलकुल लोप हो जाय, तब आप शान्त होकर बैठें, ॐ रटें, और तब विचारें कि आप के अन्दर कौन है। क्या वह आप का अपना आप ही नहीं है, जो बालों को बढ़ाता है और आप की नाड़ियों में खून बहाता है? क्या वह आपका अपना आप (आत्मा) ही नहीं है जिस ने इस शरीर को रचा? यह विचित्र दुनिया भी आप ही के हाथ की कारीगरी है। निस्संदेह यह आप की अपनी ही

सृष्टि है। यह समझलो। आप के द्वारा सुनने वाला कौन है? क्या आप खुद ही नहीं हैं? वह कौन है जो आप के द्वारा देखता है? क्या आप खुद ही नहीं? आप की नाड़ियों में खून दौड़ाने वाला कौन है? क्या आप स्वयं नहीं हैं? यदि आप का वह अपना आप (आत्मा) ऐसे अपूर्व काम कर सकता है, तो यह दुनिया भी आप ही की रचना है। ऐसा समझो और अपने आत्मदेव में आनन्द मनाओ और अपने भीतर से उस (आनन्द) को प्राप्त करो, अपने निजात्मा ही का सुख लूटो। सब असाधारण कामनाओं और असामान्य अभिलाषाओं को दूर फेंकदो। ॐ २ रटो। यदि कुछ पल भी आप ऐसा करें तो सिर से पैर तक आपकी सारी हस्ती ज्योतिमय हो जाय, जब आप खुद ही प्रकाश हैं तो प्रकाश के लिये प्रार्थना क्यों? आप तुरन्त प्रकाश हो सकते हैं। अपने को पूर्ण बनाइये, कामनाओं और अनुराग से छुटकारा पाइये, इस राग द्वेष से पीछा छुड़ाइये। आसक्ति ही आप को अपने स्वरूप से अलग करती है। जब आप घर पहुंचें तब विचार करें कि किस चीज़ में आप का चित्त लगा हुआ है। यदि आप नामवरी या यशमें आसक्त हैं तो उसे दूर कर दीजिये। यदि लोक प्रियता की इच्छा के मोह में आप उलझ हुए हैं तो उस से अपने को विरक्त कर लीजिये। यदि संसार का हित करने की आकांक्षा, अभिलाषा में भी आप का अनुराग है तो उसे त्याग दीजये। यह एक गैर मामूली सी बात मालूम होती है। दुनिया इतनी दीन क्यों हो कि वह हर घड़ी आप की सहायता मांगती रहे?

राम कहता है कि निष्काम भाव से या बिना किसी उद्देश्य के आप अपने कर्तव्य को कीजिये। अपने काम को करो, अपने काम में सुख अनुभव करो, क्यों कि आपका काम

स्वयं आनन्द है, क्योंकि काम आत्मानुभव का ही दूसरा नाम है। अपने काम में लगे रहिए, क्योंकि काम आपको करना ही है। काम आपको आत्मानुभव कराता है। किसी दूसरे हेतुसे काम न कीजिये। स्वतंत्र वृत्ति से अपने काम पर आइये जैसे एक राजकुमार मनोरंजन के लिये फुटबाल या दूसरा कोई खेल खेलने जाता है वैसे आप अपने कामपर जाइये, क्योंकि सुख या आनन्द कर्म के रूप में रहता है। हम अपने को स्वतंत्र समझें न कि किसी चीज से भी आबन्ध (क़ैद)।

लोग कहते हैं, 'कर्तव्य', 'कर्तव्य', 'कर्तव्य'। कर्तव्य तुम्हारा स्वामी क्यों बने? किसी का भी अपने को जवाबदेह न समझो आप स्वयं अपने प्रभु हैं। किसी डर को अपने पास न फटकने दो। हम कहते हैं कि तुम्हें काम करना होगा, किन्तु यदि आप कोई दूसरा काम कर रहे हैं, जिसे आपने धार्मिक मान लिया है, जिसे आपने पवित्र और पुण्य कर्म बना लिया है, और आप उसमें लगे हुए हैं, तो बहुत अच्छा है। जब तुम्हारे हाथ काम में नियुक्त नहीं हैं, जब तुम्हारे हाथ खाली हैं, और तुम अपने कमरे में बैठे हुए हो तब अपने प्रभुत्व का आनन्द लूटो, अपने आत्मानन्द का स्वाद लो। यह सर्व श्रेष्ठ काम है वहां (अपने कमरे में) अपने अन्तर्गत सब अनुरागों को दूर करदो। लोग कहते हैं "मोह वा अनुराग ज़रूरी है, हमसे काम कराने के लिप हेतु आवश्यक है"। यह एक मिथ्या कल्पना है। सब मोहों (आसक्तियों) को त्याग दीजिये, अपने को सब कामनाओं से मुक्त करलीजिये, तुरन्त ही आप अपने को स्वाधीन पावेंगे; आप अपने कंधों पर कोई ज़िम्मेदारी या भार लदा न देखेंगे। आपके कंधों पर जो बोझें हैं उन्हें आपने स्वयं लादा है आपके

बाझ को उतरवाने के लिये किसी के भी आने की ज़रूरत नहीं है। जब आप अपने कंधों पर कोई भार नहीं पाते हैं, जब आप सब प्रिय पदार्थों को अपने आप ही में पाते हैं, जब आप इस वेदान्त के तत्व को वर्ताव में लाते हैं, तब आप का सारा अस्तित्व प्रकाश रूप हो जाता है। स्वयं प्रकाशों के प्रकाश होते हुए किससे आप को प्राकाश के लिए प्रार्थना करनी होगी? यही रहस्य है। तुम स्वाधीन होजाओ। तुमको कौन बांधता है? तुम्हें गुलाम बनानेवाला कौन है? तुम्हारी अपनी कामनायें, दूसरा कोई नहीं। संसार की समस्त आकर्षण शक्ति का, संसार की सकल शक्तियों का, स्रोत तुम ही हो। दुनिया के सब अपूर्व चमत्कार तुम्हारे अधम गुलामों से कुछ भी अधिक नहीं है। इन वासनाओं से पिंड छुटा लो, इसी समय तुम स्वाधीन हो जाओगे। और जब सब कामनाओं से तुम छूट जाओगे तब कौन सा परमानन्द ऐसा है जो तुम्हें न प्राप्त होगा? कोई ज़िम्मेदारी नहीं, कोई भय नहीं। तुम्हें डरना क्यों चाहिये? केवल इसी लिये कि तुम्हें आशंका है कि कहीं अमुक चीज़ जाती न रहे? तुम इस मनुष्य से डरते हो, तुम उस से डरते हो, तुम्हें हँसी का डर है, क्यों कि तुम्हें यश की अभिलाषा है, तुम कीर्ति में आसक्त हो। समस्त भय और चिन्ता इच्छाओं का परिणाम है। सिरदर्द और दिलदर्द इच्छाओं के नतीजे हैं। राष्ट्रपति या सम्राट के सामने तुम साष्टांग प्रणाम करते और झुक जाते हो, केवल इसीलिये कि तुम्हें उसकी कृपादृष्टि की चाह है। इच्छाओं से मुक्त होने पर, एक एक करके इन इच्छाओं को दूर करदेने पर तुम प्रभुओं के प्रभू और बादशाहों के बादशाह होजाते हो। उस समय तुम कितने स्वाधीन और स्वतंत्र होते हो! इस तरह पर राम कहता है कि सत्यका

मार्ग कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे तुम्हें पाना या पूरा करना है, तुम्हें अपने उद्योगों और प्रयत्नों से केवल उस बंधन और गुलामी को मिटाना है जिनकी रचना तुम ने अपनी इच्छाओं के द्वारा पहले ही से कर रक्खी है।

ॐ! ॐ!!

सांसारिक सुख तो पोस्ते के फूलों के समान हैं। जोकि हाथ में आते ही बिखर जाते हैं॥ या नदी पर बरफ़ गिरने के तुल्य हैं। जिसकी सफ़ेदी क्षणभर रहकर सदा के लिये लुप्त होजाती है॥

या उदीची *तेजस के समान है। जिस का वेग दृष्टि की चपलता को भी पछाड़ देता है॥ या इन्द्र धनुष्य के मनोहर रूप के तुल्य हैं। जो तूफान के आते ही विलीन हो जाते॥

* उत्तरीय तथा दक्षणीय ध्रव पर गगन मण्डल में थोड़े थोड़े समय पर एक विस्तारित प्रकाश दिखाई देजाता है जो कि बड़े बेग से भागता रहता है। इस की दौड़ की तेजी के कारण दृष्टि उस का पीछा नहीं कर सकती है। इस प्रकाश की दौड़ को अंग्रेजी में Borealis Race (बोरिअलिश रेस) कहते हैं।