धर्म का अन्तिम लक्ष्य।
(शनिवार, 6 दिसम्बर, 1902 को हरमेठिक ब्रादरहुड हाल, सैन फ्रान्सिस्को में दिया हुआ व्याख्यान।)
मेरे भिन्नाकार रूपो, मेरे अन्य स्वरूपो!
विधिपूर्वक कई व्याख्यान दिये जायेंगे। आज का व्याख्यान उनकी प्रस्तावना समझी जाय। 'धर्म का लक्ष्य क्या है, और हिन्दू उसे पाने का कैसे यत्न करते हैं?"
हिन्दुओं के अनुसार, हरेक व्यक्ति ईश्वर, बहुत ही क़ीमती रत्न, पूर्ण विधि, परमानन्द और अपने आपही में सब सुखों का स्रोत है। हरेक व्यक्ति ईश्वर तथा अपने आप ही में सब कुछ है। यदि ऐसा है, तो लोग कष्ट क्यों पाते हैं? वे इस लिये कष्ट नहीं पाते हैं कि उनके पास साधन वा दवा नहीं हैं, और न इस लिये कि वे अपने भीतर अनन्त खुशी अपने कब्ज़े में नहीं रखते हैं, न यही कारण है कि उनके अन्दर अमूल्य रत्न नहीं है। वास्तविक कारण यह है कि वे उस गांठ को नहीं खोलना जानते जिसमें यह (साधन वा दवा, अनन्त हर्ष, अमूल्य रत्न) बँधा है, उस पेटी को नहीं खोलना जानते जिसमें यह सब बन्द है। दूसरे शब्दों में लोग अपनी ही आत्माओं में प्रवेश करना और अपने ही आत्मा को साक्षात्कार करने का उपाय नहीं जानते। सब धर्म हमारे अपने ही घूंघटों के हटाने और हमारे आत्मा की व्याख्या करने के केवल प्रयत्न हैं! हमारे भीतर अमूल्य रत्न है उनपर हमने अपने ही हाथों से अपने ही उद्योगों से पर्दा डाल रक्खा
है, और अपने को दुःखी, दीन अभागे बता लिया है, जैसा कि इमर्सन ने कहा है, "हरेक मनुष्य (वास्तव में) ईश्वर है, पर मूर्खों का अभिनय (खेल) कर रहा है"।
जो पर्दा हमारे नयनो पर पड़ा हुआ है केवल उसके हटाने और उच्छेदन के उद्यम ही ये सब सम्प्रदायें (मत) हैं। कुछ मत तो पर्दे को बहुत महीन कर देने में दूसरे मतों की अपेक्षा अधिक सफल हुए हैं किन्तु सब मतों में शुद्ध वृत्ति वा सच्ची भावना वाले लोग होते हैं, और जहाँ कहीं शुद्ध वृत्ति वा सच्ची भावना आती हैं वहाँ उतने समय के लिये पर्दा चाहे मोटा हो या महीन, दूर हट जाता है, और आत्म तत्व की एक झलक दिखाई पड़ जाती है। इस का दृष्टान्त इस उदाहरण से दिया जायगा। यह एक पर्दा या घूंघट है (इस समय स्वामी जी ने एक रुमाल अपनी आँखों पर रख लिया)। यह आँखों के सामने है। हम पर्दे को हटा कर देख सकते हैं, किन्तु पर्दा फिर आँखों के सामने आजाता है। पर्दा महीन कर लिया गया (इस समय रुमाल की कुछ तहें हटा ली गई)। और अब जब पर्दा बहुत महीन है तब भी वह अलग सरकाया जा सकता है। किन्तु वह फिर आँखों के सामने आ जाता है। सदा के लिये वह आँखों से दूर नहीं हो जाता। हम इसे और भी महीन कर लेंगे। इस हालत में भी वह कुछ ही देर लिये हटाया जा सकता है, पर वह फिर आँखों के सामने आ जाता है। घूंघट अत्यन्त महीन कर लिया जाने पर, चाहे हटाया न भी जाय, तौ भी हमारी दृष्टि को नहीं रोकता। हम उस में से देख सकते हैं, और पहले की तरह अब भी, हम उसे समय समय पर हटा भी सकते हैं। जब पर्दा बिलकुल ही पतला कर लिया जाता है, तब व्यवहार में वह पर्दा नहीं रह जाता, और उसके होते हुए
भी हम परमानन्द का भोग करते हैं, हमारा ईश्वर का सामना हो जाता है, नहीं नहीं, हम स्वयं ईश्वर हो जाते हैं। अब इस संसार की कोई भी शक्ति सुख में विध्नकारी या विनाशक नहीं हो सकती, कोई भी वस्तु हमारी राह नहीं रोक सकती। अज्ञान (माया) के पर्दे को अत्यन्त से अत्यन्त पतला कर देने वाले और सांसारिक जीवन में भी ज्ञानी को आनन्द दृष्टि का सुख भोगने की योग्यता देने वाले वेदान्त में दूसरे मतों से यही अधिकता है।
सभी धार्मिक मतों के अनुयायी समय समय पर परमात्मा से युक्त हो सकते हैं, और उतनी देर के लिये अपने नेत्रों के सामने से पर्दा, वह चाहे महीन हो या मोटा, हटा सकते हैं जितनी देर कि वे परमेश्वर से युक्त रहें। एक वेदान्ती भी यही कर सकता है, आनन्दमय समाधि की दशा में अपने को ला सकता है, किन्तु साधारण अवस्था में भी वह उस दिव्यदृष्टि का सुख भोगता है, जिस दिव्यदृष्टि का सुख मोटे पर्दे वाले मतों को नहीं मिलता।
इस संसार के सभी मत, भारतीय मतों को भी शामिल करके, तीन मुख्य भागों में विभक्त किये जा सकते हैं। संस्कृत में इन्हें हम 'तस्यैवाहम्', 'तवैवाहम्', 'त्वमेवाहम्' कहते हैं। पहले 'तस्यैवाहम्' का अर्थ है "मैं उसका हूँ"। इस प्रकार का मत पर्दे को अपनी मोटाईतम सूरत में रखता है। धार्मिक मतों की दूसरी दशा है 'तवैवाहम्', जिसके अर्थ हैं, "मैं तेरा हूँ"। मतों या सिद्धान्तों की पहली और दूसरी अवस्था का परस्पर भेद आप के ध्यान में आ गया होगा। धर्म मार्ग में पहिली प्रकार की प्रवृत्ति से भक्त वा उपासक, ईश्वर को अपने से दूर, अलक्ष्य समझता है, और वह परमेश्वर की चर्चा अन्य पुरुष "मैं उसका हूँ" में करता है, मानो वह
गैरहाज़िर है। यह धर्म का प्रारम्भ है, धर्म के प्रत्येक बालिक के लिये यह माता के दूध के समान है। एक बार इस दूध को विना पिये मनुष्य धर्म की राह पर आगे बढ़ने में असमर्थ रहता है। "मैं उसका हूँ" यदि मनुष्य इसे पूरी तरह से अनुभव कर ले, तो क्या यह मधुर नहीं है? वह सबेरे जल्दी जागता है और समझता है कि, "मेरा मालिक मुझे जगाता है"। अपने दफ्तर के कामों पर जाता है और उन कामों को अपने प्रिय, मधुर प्रभु, ईश्वर के आदेश से पाया समझता है; सारा संसार ईश्वर का समझता है, और अपने घर, अपने सम्बन्धियों, अपने मित्रों को ईश्वर के वा ईश्वर की कृपा से अपने को मिले हुए ख़याल करता है। अरे, क्या (इससे) दुनिया सच्चे स्वर्ग में नहीं परिणत हो जाती, क्या संसार स्वर्ग में नहीं बदल जाता? मनुष्य को सच्चा होना चाहिये, उसे उत्सुकता से और अपने दिलोजान से समझना तथा अनुभव करना चाहिये कि मेरे आसपास की हरेक वस्तु मेरे प्रभु की, मेरे ईश्वर की है और यह देह उसकी है। यह कल्पना भी पूरी तरह से अनुभव की जाने पर, अत्युत्तम हर्ष, अकथ सुख और परम आनन्द लाती है। यह (कल्पना) उत्कृष्ट है। अनुभव की जाने और अमल में लाई जाने पर, यह कल्पना (विचार) यथेष्ट है, मधुर है, परन्तु मत (सिद्धान्त) के हिसाब से यह प्रारम्भ मात्र है।
"तवैवाहं", अर्थात् "मैं तेरा हूँ, मुझे तेरी हर घड़ी ज़रूरत है, मैं तेरा हूँ, मैं तेरा", भक्ति वा धार्मिक जीवन की इस दूसरी गति, अथवा मतों की इस दूसरी दशा, की इससे तुलना कीजिये। पहली कल्पना मधुर थी, किन्तु यह मधुरतर है। पहली दशा बड़ी प्यारी और रुचिर थी, किन्तु यह अधिक प्यारी और अधिक रुचिर है। ज़रा (दोनों के) भेद पर ध्यान
दीजिये। घूँघट का पहले से पतला होजाना भेद का दृष्टान्त है। आप जानते हैं कि, 'मैं तेरा हूँ" में ईश्वर की चर्चा प्रथम वा अन्य पुरुष में नहीं की जाती। वह अब अनुपस्थित, पर्दे की आड़ में नहीं माना जा रहा, किन्तु हमारे आमने-सामने आता है। वह हमारे निकट और हमें प्रिय होता है, हमारे बहुत समीप हो जाता है। अब वह पहले से हमारे अधिक नगीच आ जाता है, हमारी उससे अधिक घनिष्ठता हो जाती है। मत के हिसाब से यह (कल्पना) उच्चतर है। किन्तु प्रायः ऐसा होता है कि लोग इस मत में ही विश्वास जमा बैठते हैं और ईश्वर को अपने अति सुपरिचित अति समीपस्थ की भाँति सम्बोधन करते हैं, पर वे सच्ची उत्कट वृत्ति और सजीव विश्वास से रहित होते हैं।
धार्मिक उन्नति की पहली दशा में यदि सजीव विश्वास जोड़ दिया जाय, तो पर्दा, बहुत मोटा होते हुप भी, उस समय के लिये हट जाता है। जब कि कोई मनुष्य अपने पक्के हृदय से, अपने रक्त के हरेक बूँद से, इस कल्पना को भान (प्रत्यक्ष) कर रहा है कि वह ईश्वर का है, अर्थात् "मैं उस (परमात्मा) का हूँ" उसके शरीर के हरेक रोमकूप से मानो यही विचार बह रहा है; तब सत्यता, उत्कंठता, उत्साह और उमंग ये सब उस समय के लिये उस की आँखों के सामने से पर्दा हटा देते हैं और वह ईश्वर में लीन हो जाता है, ईश्वर में, सर्व रूप में डूब जाता है, ईश्वर भक्त हो जाता है, उस समय तो परमेश्वर हो जाता है। कभी कभी "मैं तेरा हूँ" के ऊँचे सिद्धान्त में श्रद्धा रखने वाले मनुष्य में भी उस सच्चे सजीव विश्वास का अभाव हो जाता है, और वह ईश्वर की मौजूदगी की मधुरता (मिठाइयों) का पूरा पूरा मज़ा नहीं उठाता। परन्तु धार्मिक मत की दूसरी
अवस्था में भी इस सजीव विश्वास और उत्कट इच्छा का योग किया जा सकता है।
मत का तीसरा प्रकार "त्वमेवाहम" कहलाता है, जिसका अर्थ है "मैं तू ही हूँ"। आप देखते हैं कि यह हमें ईश्वर के कितने निकट ले आता है। पहले रूप में "मैं उसका हूँ," ईश्वर परे वा दूर है। दूसरे रूप में "मैं तेरा हूँ" ईश्वर का हमारा आमना-सामना है, वह हमारा अधिक नगीची होता है। किन्तु धार्मिक उन्नति की अन्तिम अवस्था में दोनों एक हो जाते हैं, और प्रेमी तथा प्रिय प्रेममें लुप्त (लीन) हो जाते हैं। इस तरह वेदान्त का अनुभव होता है। पतिंगा प्रकाश की ओर तब तक बढ़ता जाता है जब तक अपनी देह भस्म करके वह स्वयं प्रकाश नहीं हो जाता। उपनिषद (वेदान्त) शब्द के शब्दार्थ हैं, प्रकाशों के प्रकाश के पास इतना निकट (उप) पहुँचना कि विलग और विभाग करने वाला चेतना रूपी पतिंगा अत्यन्त निश्चय पूर्वक (नि) नष्ट (षद) हो जाय। ईश्वर का सच्चा प्रेमी उस में मिल जाता है, और अनजाने, अनायास, बिना इच्छा किये ऐसे वाक्य उसके मुख से निकलते रहते हैं, "मैं वह हूँ," "मैं वह हूँ," "मैं वह हूँ," "मैं तू हूँ," "तू और मैं एक हैं, "मैं ईश्वर हूँ, "मैं ईश्वर हूँ," "कुछ भी कम मैं नहीं हो सकता"। धार्मिक उत्कर्ष की यह अन्तिम अवस्था है। यह उच्चतम भक्ति है। यह वेदान्त कहलाता है, जिसका अर्थ है ज्ञान की इति श्री। समस्त ज्ञान की समाप्ति इसी में होती है, यहां अन्तिम ध्येय मिल जाता है। इस मत में भी जिस में पर्दा इतना महीन है कि एक पर्दे के रहते भी सारी असलियत हम देख सकते हैं, कुछ ऐसे लोग हैं जिन में उत्कट इच्छा, शुद्धि या एकाग्रता
की कमी है और वे पूरे साक्षात्कार का आनन्द लूटने के लिये पर्दे को सरका नहीं देते; और ऐसे भी हैं जो, बुद्धि से इस निश्चय पर पहुँच जाने के बाद, निदिध्यासन द्वारा इस दर्जें तक इस निश्चय का अनुभव करने लग जाते हैं कि वे पर्दा हटा देते हैं और स्वर्गीय आनन्द (अमृत) को भोगते हैं—वे स्वयं स्वर्ग रूप हो जाते हैं। ये इसी जीवन में मुक्त कहे जाते हैं, अर्थात् जीवन्मुक्त होते हैं।
मतको विशुद्ध या पर्दे को पतला करने की क्रिया मुख्यतः बुद्धि के द्वारा होती है, और पर्दा मनन वा निदिध्यासन द्वारा उठता है। मत वा सिद्धान्त के तीन रूपों का वर्णन किया जा चुका। अब हमें यह देखना चाहिये कि विभिन्न मतोंके लोगोंके लिये समय समय पर कहां तक पर्दे का पलटना सम्भव है। कुछ हिन्दू कहानियां यहां दृष्टान्तों का काम देंगी।
एक लड़की बहुत ही प्रेमासक्त थी। उसकी सारी हस्ती ही प्रेम का रूप हो गई थी। एक बार वह बहुत बीमार थी। वैद्य बुलाये गये। उन्हों ने कहा कि इसे अच्छा करने का केवल एक यही उपाय है कि इसका कुछ खून निकाला जाय। उसकी भुजाओं के मांस में उन्हों ने अपने नश्तर लगाये। किन्तु उसकी देह से ज़रा सा भी खून नहीं निकला। पर उसी समय आश्चर्य के साथ देखा गया कि उसके प्रेमी की त्वचा से खून निकल रहा है। कैसी अद्भुत एकता है! तुम इसे दन्त-कथा वा झूठी कहानी कहोगे, किन्तु यह बात सत्य हो सकती है। प्रायः वे लोग, जो प्रेम का, यद्यपि नीचे दर्जे के प्रेमका, अनुभव करते हैं, अपने ही जीवनों में इसी प्रकार की सी घटना को प्रमाणित करते हैं। उस कुमारी ने अपने व्यक्तित्व को नितान्त भूल कर अपने प्रेमी
से अपने को एक कर दिया था और प्रेमी ने लड़की के प्यार में अपने को डुबा दिया था।
ईश्वर से ऐसी ही एकता धर्म है। मेरी देह उसकी देह हो जाय और उसका अपना आप मेरा अपना आप होजाय।
हिन्दुओं की धर्म-पुस्तक, योग वाशिष्ठ में, हमें एक महिला की कथा मिलती है, जो आग में डाल दी गई थी। लोगों ने देखा कि अग्नि ने उसे नहीं जलाया। उस का प्रेमी आग में झोंक दिया गया, किन्तु उसे भी अग्नि ने भस्म न किया। यह क्या बात है! वे नदी में फेंक दिये गये, किन्तु बहे नहीं। वे पहाड़ों की चोटियों से ढकेले गये, पर एक भी हड्डी न टूटी। क्यों कर? उस समय वे कुछ न बता सके, वे आपे से बाहर थे, वे ऐसी हालत में थे जिसमें उन तक कोई सवाल नहीं पहुँच सकते थे। बहुत काल के बाद कारण पूछा गया। उन्हों ने कहा कि हम दोनों ही के लिये उस समय सर्वत्र प्रियतम ही प्रियतम था, अग्नि अग्नि नहीं थी। वह (अग्नि) उस वामा (स्त्री) को अपना प्रेमी प्रतीत हुई, और मनुष्य को वही अग्नि अपनी प्यारी दिखाई दी। जल उन दोनों के लिये जल ही न था, वह सब प्रियतम स्वरूप था। उनके लिये पत्थर पत्थर न थे, उनके लिये देह देह न थी, सभी कुछ केवल प्रियतम था। प्रिय उन्हें हानि कैसे पहुँचा सकता था?
हिन्दू पुराणों में हम एक बालक की कहानी पढ़ते हैं, जिसके पिता ने, जो सम्राट था, उसे धार्मिक जीवन से हटाना चाहा था। वह चाहता था कि लड़का मेरी तरह दुनियादार रहे, किन्तु पिता की घुड़कियों और फटकारों ने लड़के पर कोई असर नहीं किया, वे उसपर व्यर्थ हुईं। बच्चे को उसके
इरादे से रोकने के लिये, पिता ने उसे आग में डाल दिया, किन्तु आग ने उसे नहीं जलाया। तब बादशाह (उस पिता)ने उसे बहते पानी में फेंक दिया, किन्तु पानी भी बच्चे को ऊपर उठाये रहा (अर्थात् बच्चा डूबा नहीं)। उसके लिये, आग, पानी, और पंचभूत हानिकर होने न पाये—उनकी सच्ची दशा का अनुभव हुआ। लड़का माया को छिन्न भिन्न कर(वा देहाध्यास से रहित होकर) इस असली दशा में अपने को ले आया था। उसके लिये हरेक वस्तु ईश्वर थी, पूर्ण प्रेम थी। धमकियां, घुड़कियां और आँखों का दिखाना, तलवार और ज्वाला मधुर स्वर्ग से किसी तरह कम न थीं। उसे हानि कैसे पहुँच सकती थी?
कुछ काल बीता एक हिन्दू साधु हिमालय के घोर जंगल में गंगा के तटपर बैठा हुआ था। वह आप ही आप शिवोहम् शिवोहम्, शिवोहम् (जिसके अर्थ हैं मैं ईश्वर हूँ, मैं ईश्वर हूँ) रट रहाथा और दूसरे तटपर बैठे हुए कुछ और साधु उसे देख रहे थे। घटनास्थल पर एक चीता आ गया। चीते ने आकर उसे अपने पंजों में दबोच लिया। और यद्यपि वह चीते के नखों में था, तथापि उसी निर्भीक भाव से वही उच्चारण शिवोहम्, शिवोहम्, शिवोहम् उसके मुख से जारी था। चीते ने उसके हाथ और पाँव नोच डाले, फिर [अस्पष्ट] वेग में किञ्चित भी घटी न थी। आप इसे क्या समझते हैं? "मैं परमेश्वर हूँ, मैं परमेश्वर हूँ," इस कथन को आप क्या समझते हैं? क्या आप इसे अनीश्वर वादिता (नास्तिकता) कहेंगे? इस कथन का नास्तिकता से बड़ा अन्तर है, उस से बड़ी दूर है। यह अन्तिम अनुभव है। प्रेम की चोटी पहुंचने पर क्या प्रेमी अपने प्रियतम से अपनी अभेदता नहीं समझते? क्या माता अपने बच्चे को
अपने मांस का मांस, अपने खून का खून, अपनी हड्डियों की हड्डियाँ नहीं समझती? और क्या माता अपने बच्चे को अपना दूसरा अहं, (अपना आप), अपना दूसरा आत्मा नहीं मानती? क्या बच्चे के स्वार्थों और माता के स्वार्थों में अनन्यता नहीं है? अवश्य है।
उस (परमात्मा) को अंकमें भरते हुए, उसे अंगीकार करते हुए, उसे व्याहते हुए उससे इस दर्जे तक और इतना अत्यन्त अभेद हो जाओ कि बिलगता का कोई चिन्ह भी न बाकी रहे। "हे प्रभु! तेरी मर्ज़ी पूरी हो" यह प्रार्थना करने के बदले तुम्हें यह हर्ष हो कि मेरी मर्ज़ी पूरी हो रही है।
अमेरिका में इन दिनों जो रीतियां और ढंग आप पाते हैं उन से बहुत समय पूर्व के भारतवर्ष की रीतियों और ढंगोंमें बड़ा अन्तर था। अमेरिका में बिजली की बत्तियां रात में आप के घरोंको रौशन करती हैं। जिस काल की राम बात कहने लगा है उन दिनों, हिन्दू लोग मिट्टी के दीपक काम में लाते थे, और जब एक घर के दिये जल जाते थे तब उससे मिले हुप घरों के लोग अपने पड़ोसी के घर से अपने दिये जला लाते थे। एक दिन शाम को एक कुमारी, जो बेतरह कृष्ण के प्रेम में आसक्त थी, अपना दिया जलाने के बहाने से उनके बाप के घर गई। यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि वास्तव में कृष्णके मुख-मंडल के प्रकाश में पतिंगे की तरह अपने को भुलसाने ही की उसकी इच्छा थी कि जो उसे किसी दूसरे ऐसे घर में न लेजा कर जिसमें कि दीपक जल रहे थे, कृष्ण के घरमें ले गई थी। वास्तव में वह उन्हें देखने गई थी, दिया जलाने का तो उसने अपनी माता से बहाना किया था। उसे अपने दीपक की बत्ती जलते हुप दीपक की बत्ती में लगानी थी। किन्तु उसके नेत्र दीपकों की ओर न थे, वे प्यारे नन्हे कृष्ण के
देहरे पर थे। वह कृष्ण के जादूभरे, मनोहर चेहरे को देख रही थी, इतने चाव से वह उन्हें देख रही थी कि उसे यह भी न जान पड़ा कि जलते हुप दीपक में मेरे दीपक की बत्ती लगने के बदले मेरी अंगुलियां उसमें जल रही हैं, दीपक की लाट उसकी अंगुलियों को जलाती रही, किन्तु उसे यह न जान पड़ा। समय बीतता गया और वह घर न लौटी। उसकी माता अधीर होगई, अब और देर न सह सकी। वह अपने पड़ोसी के घर गई। वहां उसने अपनी बेटी का हाथ जलते देखा और यह देखा कि लड़की को इसकी कोई खबर नहीं है। अंगुलियां झुलस गई थीं और भुर्ता हुई जाती थीं, और हड्डियां जलकर कोयला होगई थीं। माता ने सर्द आह भरी, उसकी सांस रुक गई, वह कलपने और रोने लगी, "अरे मेरी बेटी, मेरी दुलारी! तू क्या कर रही है? कृपा करके बता कि तू क्या कर रही है?" तब लड़की चैतन्य हुई, या, आप कह लें, वह अपनी चेतना से हटा ली गई।
ऐसी दैवी-प्रेम की दशा में, पूर्ण प्रेम की इस अवस्था में प्रेमी और प्रिय अनन्य हो जाते हैं। "मैं वह हूँ," "मैं तू हूँ"।
यह तीसरी अवस्था है। और इसके बाद वह दशा आती है जिसमें इन प्रवचनों का भी व्यवहार नहीं किया जा सकता।
ऊपर की कहानियां तीसरे प्रकार के प्रेम का दृष्टान्त हैं। नीचे की कथा धार्मिक उन्नति की दूसरी अवस्था, "मैं तेरा हूँ," "मैं तेरा हूँ" का उदाहरण है। दो लड़के एक गुरु के पास आये, और धर्म की शिक्षा देने की उससे प्रार्थना की। गुरु ने कहा कि बिना तुम्हारी परीक्षा लिये मैं शिक्षा न दूँगा। अस्तु, गुरु ने उन दोनों को एक एक कबूतर देकर कहा कि इन्हें ऐसे एकान्त स्थान में ले जाकर मार डालो कि जहां कोई देखने न पावे। उन में से एक तो सीधा भीड़वाली
आम सड़क में चला गया। सड़क पर जो लोग आ-जा रहे थे उनकी तरफ पीठ फेर कर और अपने सिर पर एक कपड़ा डाल कर उसने कबूतर का गला घोंट दिया और सीधा शिष्टक के पास आकर बोला, "प्रभु, प्रभु! (स्वामी, स्वामी!) आप की आज्ञा का पालन होगया"। स्वामी ने पूछा, "क्या तुमने उस समय कबूतर का गला घोंट दिया जब तुम्हें कोई नहीं देखता था?" उसने कहा, "हाँ"। बहुत ठीक, अब देखना है कि तुम्हारे साथी ने क्या किया है"।
दूसरा लड़का घने, घोर जंगल में चला गया, और कबूतर का गला उमेठने वाला ही था। पर ज़रा देखो तो, कबूतर की सौम्य, कोमल और चमकती हुई आँखें ठीक उसके चेहरे पर टकटकी लगाये हैं। उन आँखों से उसकी आँखे चार हुईं, और कबूतर की गर्दन मरोड़ने निमित अपने प्रयत्न में वह सहम गया। उसके ख़याल में यह बात आई कि स्वामी ने जो शर्त लगाई है वह बड़ी बेढब है, कठिन है। यहां इस कबूतर में ही गवाह देखनेवाला मौजूद है। "ओह मैं अकेला नहीं हूँ, ऐसे स्थान में नहीं हूँ, जहां मुझे कोई न देखेगा। मैं देखा जा रहा हूं। अच्छा, मैं क्या करूं? कहां मैं जाऊं?" वह आगे बढ़ता बढ़ता किसी दूसरे बन में पहुँचा। वहां भी जब वह (उमेठने का) काम करने वाला था कबूतर की आँखों से उसकी आँखें मिलीं, और कबूतर ने उसे देखा। "द्रष्टा" स्वयं कबूतर में ही था।
वारंबार उसने कबूतर को मार डालने की चेष्टा की, वारम्वार उसने कोशिश की, किन्तु गुरु की लगाई हुई शर्त को पूरा करने में वह असफल हुआ। अनिच्छा पूर्वक टूटा दिल लेकर वह स्वामी के पास लौट आया, स्वामी के चरणों में कबूतर जीता रख दिया और खूब रोया
तथा चिल्लाया, 'गुरु जी! गुरु जी! (स्वामी, स्वामी!) मैं यह शर्त नहीं पूरी कर सकता। कृपा करके मुझे ब्रह्मज्ञान दीजिये। यह परीक्षा मेरे लिये बड़ी कठिन है। मैं इस परीक्षा में नहीं ठहर सकता। कृपया करुणामय होइये, मुझ पर रहम कीजिये और मुझे ब्रह्म-ज्ञान दीजिये, मुझे उसकी ज़रूरत है, अवश्य मुझे उसकी ज़रूरत है"। स्वामी ने बच्चे को ले लिया, उसे अपनी बाहों में उठा लिया, चूमा-चाटा और पीठ ठोंकी, और प्यार से उससे कहा, "हे प्यारे! हे प्यारे! जिस पक्षी का तुम वध करने वाले थे उसकी आँखों में जिस तरह तुमने लखने वाले को देखा है उसी तरह जहां कहीं तुम्हें जाने का संयोग हो और जहाँ कहीं किसी प्रलोभन से प्रेरित होकर तुम कोई पाप करने को उतारू हो, वहीं ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करो। जिस नारी की तुम्हें उत्कट लालसा हो उसके मांस और नयनों में द्रष्टा को, साक्षी को, प्रत्यक्ष करो। अनुभव करो कि उसके नेत्रों से भी तुम्हारा प्रभु तुम्हें देख रहा है। मेरा प्रभु मुझे देखता है। ऐसा आचरण करो कि मानो तुम सदा परम प्रभु के सामने हो, सदा परमेश्वर का तुम्हारा [अस्पष्ट] है, सब समय प्यारे की नज़र के नीचे हो"।
कहा जाता है कि नेपिलस के एक बड़े अजायबघर में छत पर एक सुन्दर फिरिश्ते का सा चेहरा है और जादूघर के चाहे जिस भाग में आप हों, चाहे जिस हिस्से को आप देखते हों, आप छतपर जांय, आप नीचे जांय, कहीं भी आप हों, फिरिश्ते की निर्मल चमकीली, तेजस्वी आँखें सीधी आप की आँखों को देखती होती हैं। आध्यात्मिक उन्नति की दूसरी दशा में जो लोग हैं वे, यदि सच्चे हैं तो, निरन्तर प्रभु के नेत्र के नीचे रहते हैं। वे समझते और अनुभव करते
हैं कि चाहे जहां हम जांय, चाहे घर की सबसे भीतरी कोठरी में, चाहे बन की अत्यन्त एकान्त गुफाओं में, हम अपने को परमेश्वर के नयनों के सामने पाते हैं, हम उस से देखे जाते हैं, "उसके प्रकाश" से प्रकाशित होते रहते हैं, "उसकी" कृपा से परिपुष्ट होते हैं।
अब हम आत्मविकास की प्रारम्भिक दशा पर आते हैं। "मैं उसका हूँ! मैं उसका हूँ! मैं ईश्वर का हूँ"! यह प्रारम्भिक दशा प्रतीत होती है। किन्तु, ओह! धर्मोन्नति की प्रारम्भिक दशा का अनुभव करना लोगों के लिये कितना कठिन है। और यदि कोई मनुष्य सच्चा है, असल में एकाग्र चित्त है, असल में भक्तिमान् है, जो कुछ विश्वास करता है उसपर अमल करता है, इस विचार को रक्त के साथ अपनी नाड़ियों में संचारता है, अपने रक्त के प्रत्येक बूँद में इसका अनुभव करता है, इस से अर्थात् इस प्रारम्भिक मत से, अपने को भर लेता है, तो वह इस लोक में देवदूत (फिरिश्ता) होसकता है।
भारत का एक अति पूज्य महापुरुष अपनी नई जवानी में ऐसे स्थान में काम करता था जहां सदा भिक्षा देना, लोगों को भोजन और खज़ाना बांटता उसका कर्त्तव्य था। गरीब लोग उसके सामने लाये गये, जिन्हें तेरह मन आटा देनेकी उसके मालिक ने उसे आज्ञा भेजी थी। उसने उन्हें एक, दो, तीन, चार पाँच छ करके तेरह मन आटा दे दिया। आटा देते समय वह ज़ोर ज़ोर से गिनती करता जाता था। भारतीय भाषामें संख्या थर्टीन को तेरह कहते हैं। यह बड़े ही मार्के का शब्द है। इसके दो अर्थ हैं एक तो तेरह—दस में तीन का योग, और। शब्द के दूसरे अर्थ हैं, "मैं तेरा हूँ। मैं तेरा हूँ। मैं ईश्वर का हूँ। मैं उसका हिस्सा हूँ, मैं उसका हूँ"।
अच्छा, उसने बारह गिने और अब संख्या तेरां की बारी आई। जब वह उन्हे तेरहवां मन दे चुका था, और तेरां का शब्द कह रहा था,तब उसमें ऐसे पवित्र संस्कार उदय हुप कि उसने बास्तव में अपनी देह और सर्वस्व को ईश्वरार्पण कर दिया। वह दुनिया के बारे में सब बातें भूल गया, वह आपे से बाहर था,नहीं, नहीं, वह आपे में था। परमानन्द की इस दशा में वह तेरा, तेरा, तेरा, तेरा, रटने लगा, और लोगों को बेखबरी से, तेरा, तेरा कहता हुआ, मन के बाद मन तब तक देता रहा जब तक वह परमानन्द की दशा में आकर, आत्मसाक्षात्कार की दशा वा तुरीयावस्था में लीन हुआ मूर्छित नहीं होगया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जो लोग प्रारम्भिक दशाओं में हैं, वे कभी कभी अत्यन्त उँचाइयों पर चढ़ सकते हैं, यदि वे उतने ही साधु हैं जितने उनके बचन, यदि वे सच्चे और उत्सुक हैं, यदि वे ईश्वर की आँखों में धूल नहीं झोंकना चाहते, यदि वे ईश्वर से किये हुप वादों (प्रतिज्ञों वा प्रतिज्ञाओं) को तोड़ नहीं डालना चाहते। एक बार भी जब मन्दिर या गिर्जा में वे कहें कि "मैं तेरा हूँ," तव उन्हें इसका अनुभव करना चाहिये, इसे चरितार्थ करना चाहिये, इसे प्रत्यक्ष करना चाहिये। यह सच्चा धर्म है।
दुनिया भर के भिन्न २ मत इन तीन शीर्षकों में बाँटे जा सकते हैं, "मैं उसका हूँ" "मैं उसका"! "मैं तेरा हूँ!," "मैं वह हूँ"। जहाँ तक रूपों का सम्बन्ध है, दूसरा रूप, "मैं तेरा हूँ," पहले रूप "मैं उसका हूँ," से ऊँचा है। और तीसरा रूप 'मैं वह हूँ" सर्वोच्च है। इन तीनों रूपों में से किसी में भी हम सच्चा धार्मिक भाव भर सकते हैं।
हिन्दुओं के अनुसार, मत की पहली अवस्था पर सच्ची
धार्मिक वृत्ति डालने वाले इसी जीवन में, या दूसरे जन्म में, मत की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त होंगे। पहले वे मत की दूसरी अवस्था को प्राप्त होंगे, और फिर सच्ची धार्मिक वृत्ति की संगति करते हुप इसी जन्म या दूसरे आने वाले जन्म में धीरे धीरे उत्तरोत्तर उच्चतर धार्मिक मत "मैं वह हूँ" 'मैं तू हूँ"—पर चढ़ेंगे। जब यह दशा प्राप्त हो जाती है, तब फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। मनुष्य स्वतंत्र, स्वतंत्र, स्वतंत्र है! मनुष्य ईश्वर है, ईश्वर! वह सिरे पर (अर्थात् अन्त तक) पहुँच गया। ॐ!
[इसके बाद अंग्रेज़ी में एक कविता है, जो निम्नलिखित है:]
Oh! brimful is my cup of joy, Fulfilled completely all desires; Sweet, morning zephyrs I employ, 'Tis I in bloom their kiss admires. The rainbow colours are my attires; My errands run light, lightning fires. All lovers I am, all sweethearts I, I am desires, emotions I. The smiles of rose, the pearls of dew, The golden threads so fresh, so new. Of sun's bright rays embalmed in sweetness, The silvery moon, delicious neatness, The playful ripples, waving trees, Entwining creepers, humming bees, Are my expression, my balmy breath, My respiration in life and death, All ill and good, and bitter and sweet, In that my throbbing pulse doth beat.
What shall I do, or where remove? I fill all space, no room to move. Shall I suspect or I desire? All time is time, all force my fire, Can I be doubt or sorrow—stricken? No, I am verily all Causation. All time is now, all distance here, All problem solved, solution clear. No selfish aim, no tie, no bond, To me do each and all respond. Impersonal Lord of foe and friend, To me doth every object bend.
अरे ! मेरे आनन्द का प्याला लबालब भरा है। पूरी तरह सब इच्छायें पूरी होगईं; सबेरे की मधुर, मन्द बायु मेरी चेरी है, (फूलों के) खिलाव में मैं ही उसकी चुम्बी सराहता हूँ। इन्द्र धनुष के रंग मेरे वस्त्र हैं; प्रकाश, दहकती हुई अग्नियां मेरे संदेश ले जाती हैं, सभी प्रेमी मैं हूँ, सभी प्रिय मैं, अभिलाषायें मैं हूँ, मैं ही मनोवृत्तियां। गुलाब की मुस्कुराहटें, ओस के मोती, सुनहले तागे ऐसे ताज़े, ऐसे नये, सूर्य की चमकीली किरणें मधुरता में पगी हुई, रुपहला चन्द्रमा, रोचक स्वच्छता, खिलाड़ी तरंगें, लहराते हुए वृक्ष, लिपटी लतायें, भनभनाती मधुमक्खियां,
मेरा शाक्य हैं, मेरी सुगन्धित श्वास। मेरा सांस लेना जीवन और मरण है। सब बुरा और भला, तथा कड़ुआ और मीठा मेरी उस धड़धड़ाती नाड़िका में उछलता है। क्या मैं करूँ, या कहाँ हटूँ? मैं सब स्थान घेरे हूँ, सरकने की कहीं जगह नहीं, क्या मैं आशंका करूँ या कामना करूँ? सब काल मैं हूँ, सब शक्ति मेरी आग। क्या मैं सन्देह या शोक-पीड़ित हो सकता हूँ? नहीं, मैं सचमुच सम्पूर्ण हेतु हूँ। सब काल 'अब' है, सब देश 'यहाँ', कोई स्वार्थ पूर्ण उद्देश नहीं, न आसक्ति न बंधन, हरेक और सब मेरी अनुकूलता करते हैं।
(मैं हूँ) शत्रु और मित्र का अकर्तृक (निष्काम या निर्विकार अथवा निराकार) प्रभु, हरेक पदार्थ मेरे आगे झुकता वा प्रणाम करता है।