श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(8) आनन्द की फुहार (छींटें)

भाग 28 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 28 · अध्याय 9 / 9

(8) आनन्द की फुहार (छींटें)

1 सभा-समाजों वा समुदाय पर भरोसा मत करो। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह भीतर से प्रबल हो।

2 दूसरों को प्रसन्न करने के उद्देश्य से कोई काम मत करो। वही वीर है जो मुख से 'नहीं' कह सकता है; आपके चरित्र का बल और वीरता आपके 'नहीं' कह देने की शक्ति से प्रगट होती है।

3 इच्छा एक बीमारी है, यह आप को दुविधा में रखती है।

4 राम दो मुख्य बातें आपके ध्यान में लाता है:— (1) परिच्छिन्नात्मा का निषेध (denial of self) (2) शुद्ध आत्मा का प्रमाणी-करण (प्रतिपादन) (positive assertion of Real Self).

5 पूर्ण स्वास्थ्य (निरोगता) और प्रबल प्रवृत्ति का रहस्य चित्त को सदा हलका और प्रसन्न रखना है, और उसे कभी भी थका मान्दा, कभी भी जल्दबाज़, कभी भी भय शोक व चिन्ता से लदा हुआ रखना नहीं है।

6 लोकाचार के दलदल में फंसे रहना, और अपने को रीति-रिवाज की धारा में बहन देना, और किसी जड़ बोझ की तरह नाम रूप के कूँए में डूब जाना, सम्पति की तलैया

में फंसे रहना और उस समय को जो कि ईश्वर की वस्तु होनी चाहिये रुपया कमाने में लगाना और फिर भी इसे "भलाई करना" कहना, क्या यह जड़ता (अकर्मण्यता) नहीं है?

7 जब ईश्वर स्वरूप की दृष्टि से देखा जाय तो सारा संसार सुन्दरता का बहाव, प्रसन्नता का सूचक और आनन्द की वर्षा हो जाता है।

8 चाहे कोई मनुष्य अपने अन्तःहृदय में किसी भी चीज़ को सत्य या विश्वास का पात्र माने, अवश्य ही वह (मनुष्य) उस पदार्थ से त्यागा जाएगा वा धोखा खाएगा। यह एक ऐसा विधान है जो गुरुत्वाकर्षण के विधान से भी अधिक क्रूर है।

9 धन्य हैं वे लोग जो समाचार पत्रों को नहीं पढ़ते, क्योंकि इससे वे प्रकृति के और प्रकृति द्वारा ईश्वर के (सीधा) दर्शन कर सकेंगे।

10 यदि सब लोग तुम्हारी भी प्रशंसा करने लगें तो तुम्हारे लिए शोक है, क्योंकि इसी प्रकार इनके पूर्वजों ने झूठे पैग़म्बरों की प्रशंसा की थी।

11 जीवन तो इस शरीर के पिंजड़े में बन्द हंस के परों का केवल फड़फड़ाना है।

12 जब आप अपने को उदासी व खिन्नावस्था में पाओ, तो राम का उपदेश है कि आप अपने आलस्य को तत्काल त्याग

दो, अपनी पुस्तक को परे फेंक दो, अपने पाँओं पर खड़े हो (अर्थात् अपने आश्रय स्थित हो), खुली हवा में टहलो और शीघ्र २ चलो।

13 ऐसी मित्रता, जिस में हृदयों का मेल मिलाप नहीं; वह भड़ाक आवाज़ करने वाले द्रव्यसमुदाय (mixture) से भी अधिक बुरी सिद्ध होती है; उस का परिणाम ज़ोर की फूट है।

14 यदि आप को कोई बात किसी मित्र के विषय अयोग्य मालूम हुई हो, तो उसे भूल जाओ; यदि आप को उस के सम्बन्ध में कोई अच्छी बात मालूम हुई हो, तो वह उसे कह दो।

15 ईश्वर व्यक्तियों का सम्मान कर्ता नहीं है, और न भाग्य का भूगोल से नाता है।

16 ऐसे ज्ञान का प्राप्त करना कि जिसे हम आचरण में नहीं ला सकते, वह (वास्तव में) आध्यात्मिक कब्ज़ अथवा मानसिक अजीर्ण है।

17 सच्ची शिक्षा का अर्थ पदार्थों को ईश्वर की दृष्टि से देखना है।

18 छिद्रान्वेषण परमात्मा की काट छांट की प्रक्रिया है जो हमें अधिक सुन्दर बनने में सहायता देती है।

19 यह सदा याद रक्खो कि ईर्ष्या और द्वेष और छिद्रान्वेषण और दोषारोपण वा निन्दा करने के विचार अथवा ऐसे विचार जिन में ईर्ष्या और घृणा की गन्ध हो, इन को प्रगट करने से आप वैसे ही विचार अपनी ओर बुलाते हैं। जब कभी आप अपने भाई की आँखों में तिल देख रहे हैं, तो (उसी समय) आप अपनी आँख में भी लकड़ी का लट्ठा डाल रहे हैं।

20 छिद्रान्वेषण की कैंची से जब आप की भेंट हो, तो आप झट अपने भीतर दृष्टि डाल कर देखो कि वहां क्या हो रहा है।

21 सब से परम उत्कृष्ट छिद्रान्वेषण यह है कि लोगों को आप जो कुछ बाहर से अनुभव कराना चाहते हैं वही उन को आप (उन्हीं के) भीतर से करा दें।

22 किसी विशेष बात में अपने मित्र में क्षुद्र त्रुटियों के देख लेने से हाय यह कैसी उग्र वृत्ति हम में उठ आती है कि उस मित्र के उत्तम गुणों (लक्षणों) का भी हम सत्कार करना छोड़ देते हैं।

23 जो शक्ति हम दूसरों के (स्वभावों पर) निर्णय देने में नष्ट करते हैं, वही ठीक हमें अपने आदर्श के अनुसार रहने में लगानी आवश्यक है।

24 यदि आप की बुद्धि प्राचीन काल के मृत आचार्यों की उक्तियों, कल्पनाओं और भ्रमों वा तरंगों की प्रशंसा नहीं

करती, तो (संसार की दृष्टि में) आप पतित हैं; प्रत्येक शरीर आप का ठीक विरोधी हो जाएगा।

25 जिस क्षण हम संसार के सुधारक के रूप में खड़े होते हैं, उसी क्षण हम संसार के बिगाड़ने वाले बन जाते हैं।

26 दूसरों की दृष्टि से अपने को देखने का स्वभाव वृथा अहंकार और आत्म-श्लाघा (खुदतुमाई) फलाता है।

27 लोग विधियों और आशाओं के बोझ तले अपने असली स्वरूप को खो बैठे हैं; और अपने को केवल नाम और रूप मात्र समझते हैं।

28 अपने से बाहर मत भटको। अपने केन्द्र पर रहो।

29 अपना केन्द्र अपने से बाहर मत रक्खो; यह आप का पतन कर देगा। अपने में अपना पूर्ण विश्वास रक्खो, अपने केन्द्र पर डटे रहो; कोई चीज़ तुम्हें हिला तक न सकेगा।

30 सत्य को कुचल कर यदि मिट्टी में मिला दिया जाय, तो भी उभर आएगा, क्योंकि ईश्वर के अनन्त वर्ष (समय) उस सत्य के ही होते हैं।

31 ईसामसीह ने केवल ग्यारह (मनुष्यों) को उपदेश दिया था, परन्तु वे शब्द वायुमंडल ने बटोर लिए, आकाश ने संचय कर लिए, और आज उन को करोड़ों आदमी पढ़ते हैं।

32 चोरे (अपवित्र) विचार, सांसारिक इच्छाएँ तो मिथ्या शरीर और मिथ्या मन से सम्बन्ध रखने वाले पदार्थ हैं, और अन्धकार की वस्तुएँ हैं।

33 सांसारिक बुद्धिमत्ता अज्ञानता का एक बहाना है।

34 बालक तो पिता का भी पिता होता है।

35 आप के निजानुभव से अधिक योग्य शिक्षक और कोई नहीं है।

36 कवि को प्रेरणा उसी समय होती है, जब कि वह परिच्छिन्नात्मा अथवा अहंकार के ख़याल से ऊपर उठा होता है, और जब उस को यह ख़याल नहीं होता कि "मैं कविता लिख रहा हूँ"

37 ईश्वर में निवास करो, और सब ठीक है; दूसरों का निवास भी ईश्वर में कराओ, और सब अच्छा ही होगा। इस सत्य पर विश्वास करो, तुम्हारा उद्धार हो जायगा; इस का विरोध करो, तो तुम्हें कष्ट मिलेगा।

38 जीवन और मृत्यु तो सांस द्वारा हवा को भीतर खेंचने और बाहर निकालने के समान हैं।

39 जिस समय हक्सले (Huxley), ऐतिहासिकों का

हक्सले नहीं रहता, वरन् सर्व रूप होता है, तब वह वैज्ञानिक हक्सले हो जाता है।

40 इस संसार में जिस वस्तु से आप का सामना हो, वह अटकाने वाले रोड़े की जगह (आत्मानुभव या ऊपर चढ़ने की) सीढ़ी हो जाना चाहिये। अटकाने वाले रोड़े को सीढ़ी का पत्थर बना लो।

41 जो मनुष्य स्वेच्छा पूर्वक अपने (अहंकार) को सूली पर चढ़ा देता है, उस के लिए यह संसार स्वर्गीय उपवन है। बाक़ी सब के लिए यह लुप्त स्वर्ग है।

42 ठीक जौ और गेहूं के भाव घटने बढ़ने के समान मनुष्य का ज़िक्र किया जाता है; इस से ऊपर उठो। आप का कोई मूल्य नहीं लगा सकता।

43 ईश्वर-प्रेरणा के आनन्द-भवन का प्रवेश-द्वार हृदय है, परन्तु प्रस्थान-द्वार सिर (मस्तिष्क) है।

44 त्याग दो! त्याग दो भ्रान्ति को (मोह माया को), जागो! जागो!! स्वतन्त्र बनो। मुक्ति! मुक्ति!! मुक्ति!!!

45 WANTED Reformers, Not of others

But of themselves. Who have won Not University distinctions, But victory over the local self. Age :— the youth of Divine Joy. Salary :— God-head. Apply sharp With no begging solicitations But commanding decision To the Director of the Universe, Your Own Self. Om ! Om ! Om !!!

ज़रूरत है (आवश्यकता है) सुधारकों की. दूसरों के सुधारकों की नहीं, किन्तु अपने निज के, सुधारकों की। विश्व विद्यालय के उपाधिधारियों की नहीं, किन्तु परिच्छिन्न भाव के विजेताओं की। आयुः—दिव्यानन्द भरा तारुण्य वेतनः—ईश्वरत्व शीघ्र निवेदन करो, विश्व नियन्ता से, अर्थात् अपने ही आत्मा से, दासोऽहं भरी दीनता से नहीं, किन्तु निश्चयात्मक निर्णय व अधिकार के साथ, ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

जब कोई मुनि (चिन्तक), तत्वज्ञानी, कवि, वैज्ञानिक या अन्य प्रकार का कार्यकर्ता समाधी की अवस्था से एकताल होजाता है, और त्याग की शिखर पर यहां तक चढ़ जाता है कि उस में व्यक्तित्व के चिन्ह का लेशमात्र भी नहीं रहता और उसे वेदान्त का प्रत्यक्ष अनुभव होता है, तभी और केवल तभी वह ईश्वर जो कि गायकों का स्वामी वा गुरू है, उस के शरीर और मन का बाजा अपने हाथों में लेता है, और उस में से विशाल लहरें, मधुर तालें और उत्कृष्ट तानें निकालता है।

Peace immortal falls as rain drops, Nectar is pouring in musical rain ; Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!

My clouds of glory, they march so gaily ! The worlds as diamonds drop from them. Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!

My balmy breath, the breeze of Law, Blows beautiful ! beautiful !! Some objects swing and sway like twigs. And others like the dew-drops fall ; Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!

My graceful Light, a sea of white ; An ocean of milk, it undulates. It ripples softly, softly, softly ; And then it beats out worlds of spray.

I shower forth the stars as spray. Drizzle ! Drizzle !! Drizzle !!!

आती अमृत शान्ति मेघ के बुन्दों के सम, भली सुरीली लगी सुधा रस बरसे अनुपम, रिम झिम ! रिम झिम ! रिम झिम !!!

मेरी द्युति के मेघ चले हैं सुन्दर कैसे। हैं उन से गिर रहे लोक सब हीरों ऐसे। रिमझिम ! रिमझिम !! रिमझिम !!!

मेरी सांस सुगन्ध नीति की सुखद बयारी है यह कितनी सुन्दर अनुपम बहने वारी॥ मृदुशाखासम वस्तु झूल, कुछ भूमै कोई। ओस बिन्दु सम गिरे टूट कर भूमे कोई॥ रिमझिम ! रिमझिम !! रिमझिम !!!

मेरी शोभन-प्रभा श्वेत सागर-सी सो है। तीर पयोनिधि लहर लेत तारंगित होये॥ मन्द मन्द जो मंजु तरंगे उसमें शान्ति। जल-फुहार-संसार भार बाहर कर ज्ञातीं॥ तारागण की झड़ी नीर कण सम में करता। रिमझिम रिमझिम मेंह बड़ा सुखदायी होता।

'Are you afraid ? Afraid of what ? Of God ? Nonsense ; Of Man ? Cowardice ; Of the elements ? Dare them ;

Of yourself ? Know thyself ; Say, I am God.

क्या डरते हो ! किस से डरते हो ! क्या ईश्वर से ! तो मूर्ख हो। क्या मनुष्य से ! तो कायर हो। क्या (पंच) भूतों से ! उन का सामना करो। क्या अपने आप से ! तो अपने को जानो। कहदो "अहं ब्रह्मास्मि" (मैं ईश्वर हूं) इति ।