श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(8) राम।

भाग 28 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 28 · अध्याय 8 / 9

(8) राम।

1 ईश्वर से पहिले 'मैं हूं' था।

2 सदा पृथ्वी के होने से भी पहिले; नित्य समुन्दर की उत्पत्ति से पहिले; अथवा घास के नरम वालों से पहिले; अथवा वृक्षों के सुन्दर अंगों से पहिले; अथवा मेरी टहनियों के ताज़ा रंगीन फलों से पहिले, मैं था और तुम्हारा आत्मा (मन) मुझमें था।

3 किस का मैं धन्यवाद दूं; किस की ओर मैं मुड़कर देखूं; जब पूर्ण परमानन्द, जब अपरमित प्रकाश मुझ में भी व्यक्त है (प्रगट है)।

4 केवल एक ही तत्व है, और वह तत्व मैं हूं। ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

5 मैं सत्य हूं; मैं रूप (शरीर) को सम्मानित करवाने के वास्ते आत्महत्या नहीं सहूंगा।

6 सारा विश्व केवल मेरा ही संकल्प है।

7 विश्व मेरा शरीर है; वायु और पृथ्वी मेरे वस्त्र और पादुकाएं (जूतियां) हैं।

8 आकाश का अर्ध मण्डल मेरा प्याला है, और उस में झलकता हुआ प्रकाश मेरी शराब है।

9 विश्व मेरे आत्मा की ही मूर्ति होने के कारण साक्षात् मधुता का स्वरूप है। किस को मैं दोष दूं? किस को मैं बुरा कहूं? अहो! प्रसन्नता! यह सब कुछ मैं ही हूं।

10 संसार मेरा शरीर है, और जो कोई भी यह कह सकता है कि समस्त विश्व मेरा शरीर है। वह आगमन से मुक्त है।

11 प्र॰-क्या ईश्वर दूत अथवा पैगम्बर का काम करते हैं? उ॰-नहीं, यह मेरी महिमा के खिलाफ़ है; मैं स्वयं परमात्मा हूं; और इसी प्रकार आप भी हो। शरीर मेरा वाहन (सवारी) है।

12 मुझे किसी चीज़ की अभिलाषा नहीं। मुझे आवश्यकताएं नहीं, भय नहीं, आशा नहीं, ज़िम्मेदारी नहीं।

13 मैं धर्म-परिवर्तन करके (या मुरीद बना कर) अनुयायी इकट्ठे करना नहीं चाहता; मैं केवल सत्य में रहता हूं (वा मैं केवल सत्य का आचरण करता हूं)।

14 राम का मिशिन (mission उद्देश्य) बुद्ध, मोहम्मद, ईसा तथा अन्य नवियों या अवतारों के समान करोड़ों अनुयायी बनाना नहीं है, वरन् स्वयं राम प्रत्येक पुरुष, स्त्री और

बालक में उत्पन्न करना, आह्वान करना (या प्रबुद्ध करना) अथवा प्रगट करना है। इस शरीर को रौंद डालो; इस व्यक्तित्व को खा डालो; मुझे पीस डालो, हज़म कर डालो और पचा डालो। तभी और केवल तभी आप राम के प्रति न्याय करोगे।

15 चाहे आप अंग्रेज़ हों, चाहे आप अमेरिकन हों, चाहे आप मुसलमान हों, बुद्ध हों अथवा हिन्दू हों, अथवा कोई भी क्यों न हों, आप राम की (अपनी) आत्मा हैं। आप उसकी आत्मा की भी आत्मा हैं।

16 मेरा मत प्रचार के लिए नहीं है, "मेरी सेवा के लिए" वा मेरे निर्वाह करने के लिए है।

17 यदि कोई मनुष्य मुझे अपने मत को एक शब्द में प्रगट करने की आज्ञा दे तो मैं कहूंगा कि वह "आत्म-विश्वास" वा "आत्म-ज्ञान" है।

18 विशाल संसार मेरा घर है, और उपकार करना मेरा धर्म है।

19 मेरे धर्म के आवश्यक और मुख्य तत्व कवि (Goethe) (गेएथ) के शब्दों में इस प्रकार कहे जा सकते हैं:— मैं आप को बतलाता हूं कि मनुष्य का परम व्यवसाय (वृत्ति) क्या है। मुझ से पहिले संसार का अस्तित्व नहीं था, यह मेरी रचना है।

यह मैं ही था जिस ने सूर्य को सागर से उदय किया। चन्द्रमा ने अपना परिवर्तन-शील मार्ग मेरे साथ ही चलना आरंभ किया।

20 मैं तो केवल वाह्य-दृश्य का साक्षी रहता हूं, उन में उलझता (फंसता) कभी भी नहीं, सदा उन से ऊपर रहता हूं। यह सारे नाम रूप दृश्य केवल अविरोध स्फुरण हैं, चक्र की ऊपर नीचे गति है, पांव का ऊपर उठाना और नीचे रखना है।

21 असल में डरने की कोई बात नहीं है। चारों ओर, सारे भविष्य काल में, सारे देश (अर्थात् सब दिशा, काल और देश में) एक ही परमात्मा विद्यमान है, और वह मेरा ही स्वरूप है। तो फिर मुझे डर किस का हो?

22 जब बुखार दर्शन देता है, तो मैं त्योरी नहीं चढ़ाता (वा क्षुभित नहीं होता)। मैं उस का मित्रवत स्वागत करता हूं, और (उस बुखार की दशा में) वह आध्यात्मिक तत्व जिन का भेद अन्य दशा में कभी नहीं खुल सकता था, मुझ में चमक (झलक मार) जाते हैं।

23 हे परमानन्द के महासागर! तू क्रूरता पूर्वक तरंगित हो, लहरें ले, और तूफ़ान बरपा कर, पृथ्वी और आकाश को बराबर करदे। सब विचारों और चिन्ताओं को गहरा

डुबो दे, टुकड़े टुकड़े कर दे और इधर उधर फैंक दे। अरे! इन से मुझे क्या प्रयोजन?

24 हटो ऐ संकल्पो और इच्छाओ! जिनका सम्बन्ध इस संसार की क्षणिक, क्षण-भंगुर प्रशंसा अथवा धन से है। इस शरीर की दशा कैसी भी हो, मेरे से उसका वास्ता नहीं; शरीर सारे मेरे हैं।

25 मैं ने यह निश्चय वा संकल्प कर लिया है कि अपना ईश्वरत्व वा तुम्हारा ईश्वरत्व आपके हृदय में कड़कड़ा दूं वा गरजा दूं, और उसे प्रत्येक कर्म और व्यापार से घोषित कर दूं।

26 मैं शाहंशाह (सम्राज्) राम हूं; जिसका सिंहासन आप का निज हृदय है; जब मैंने वेदों द्वारा प्रचार किया, जब मैंने कुरूक्षेत्र, जेरूसलेम और मक्का में उपदेश किया, तब मुझे लोगोंने गलत समझा। मैं अपनी वाणी (आवाज़) फिर से उठाता हूं। मेरी वाणी तुम्हारी वाणी है, तत्त्वमसि "तू वही है," जो कुछ तू देखता है वह सब तू ही है। कोई शक्ति इसमें बाधा नहीं डाल सकता। राजा, दानव अथवा देवता गण कोई इसके विरुद्ध खड़े नहीं हो सकते। मूर्च्छित (व्याकुल) मत हो। मेरा सिर तुम्हारा सिर है, चाहो तो काट डालो, परन्तु इसकी जगह एक सहस्र सिर और उत्पन्न हो जाएंगे।

27 तेरी छाती में धड़कने वाला, तेरी आंखों में देखने वाला,

तेरी नाड़ी में फड़कने वाला, फूलों में मुस्कराने वाला, बिजली में हँसने वाला, नदियों में गरजने वाला, और पहाड़ों में शान्त है राम।

28 ब्राह्मणत्व को दूर करो, स्वामीपने को जला दो। अपने से पृथक वा विलक्षण करनेवाली उपाधियों और मान-पदों को सागर में गिरा दो। प्यारे! राम तो तुम से अभिन्न है। आप कोई भी हो, विद्यावान् अथवा अविद्यावान (ज्ञानी अथवा अज्ञानी) धनी अथवा निर्धन, पुरुष अथवा स्त्री, साधु अथवा पापी , ईसा अथवा जूडास, कृष्ण अथवा गोपी राम आप का अपना आप है।

29 ईसाई, हिन्दू, फ़ारसी, आर्य-समाजी, सिक्ख मुसलमान और वे लोग जिनके पुट्ठे (Muscles) हड्डियां तथा मस्तिष्क मेरी प्यारी इष्ट-देवी भारत भूमि के अन्न और नमक खाने से बने हैं, वे मेरे भाई हैं, नहीं नहीं वे मेरा अपना आप हैं। इनसे कह दो कि मैं इनका हूं! मैं सबको हृदय से लगाता (सब का समावेश करता) हूं। किसी को अलग नहीं करता। मैं प्रेम रूप हूं। प्रकाश के समान प्रेम प्रत्येक पदार्थ को, सबको प्रकाश की ज्योतियों से मंढ देता है। ठीक और अवश्य ही मैं प्रेम के प्रताप की बाढ़ हूं। मैं सब से प्रेम करता हूं।

30 अरी हिमालय की बर्फ़! तेरा स्वामी तुझे सत्य (प्रकाश) के प्रति अपनी शुभ्रता और दृढ़ता को बनाए रखने की आज्ञा देता है। द्वैत भाव से भरा हुआ जल नीचे मैदानों में तू कभी भी न भेजियो।

31 मैं सर्वोपरि निकृष्ट हूं; सर्वोपरि श्रेष्ठ हूं। मेरे लिए न कोई सर्व निकृष्ट है, न सर्व श्रेष्ठ है। जहां कहीं मनुष्य की दृष्टि पड़ती है, वहीं मैं हूं। जीसस (ईसा) में मैं प्रगट हुआ। मुहम्मद में मैं ने ही अपने को प्रगट किया। संसार में सब से अधिक प्रसिद्ध मशहूर आदमी मैं हूं, और सब से अधिक बदनाम, कलंकित, और अधम मैं हूं; मैं सर्वरूप हूं, सब हूं।

32 अहा! मैं कितना सुन्दर हूं। मैं बिजली में चमकता हूं, मैं बादल में गरजता हूं; मैं पत्तियों में सरसराता हूं, मैं पवन में सन सनाता हूं, मैं कल्लोलाकुल (तरंगित) सागर में लुढ़कता हूं; मित्र मैं हूं; शत्रु मैं हूं।

33 ओहो, यह कैसा आश्चर्यों का आश्चर्य है कि सब पदार्थों में, सब प्रत्यक्ष व्यक्तियों में सारे प्रत्यक्ष रूपों में एक ही अनन्त शक्ति व्यापक है। अहो! यह मैं हूं; मैं ही वह अनन्त (शक्ति) हूं कि जो महान् प्रसिद्ध वक्ताओं के शरीरों में व्यापक है। अहा! कैसा आनन्द है! कि मैं ही अनन्त स्वरूप हूं और यह शरीर नहीं हूं।

34 ऐसा एक भी हीरा नहीं है, ऐसा एक भी सूर्य अथवा नक्षत्र नहीं है कि जो चमकता रहा हो, पर उस की चमक मेरे कारण न हो। सारे आकाश मंडल के नक्षत्रों की चमक मेरे कारण है।

इच्छित पदार्थों का समस्त आकर्षक स्वभाव और उन की सारी शोभा (कान्ति) मेरे ही कारण है।

35 यह मेरे गौरव के प्रतिकूल और मेरी ओर से मेरा पतन होगा कि पहले तो इन पदार्थों को मैं शोभा और महिमा उधार दूं; और फिर उन्हीं को ढूंढ़ता फिरूं। यह मेरी शान के विरुद्ध (ख़िलाफ़) है! मेरा इतना पतन कदापि नहीं हो सकता। नहीं मैं उन के द्वार पर भिक्षा मांगने के लिए कभी नहीं जा सकता।

36 अरी क्षत्र! कहां है तेरी विजय? अरी मौत! कहां है तेरा डंक?

37 मैं सम्राटों का सम्राट हूं। मैं ही वह हूं जो इस संसार में सारे राजाओं के रूप में प्रगट होता है।

38 मुझ में ही सारा संसार रहता सहता, चलता फिरता और जीवित है। सर्वत्र मेरी ही इच्छा पूर्ण की जा रही है।

39 शरीर अनेक हैं, आत्मा एक है; और परमात्मा मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं है। मैं ही कर्म कर्ता (परिश्रमी), साक्षी, न्यायाधीश, कड़ा छिद्रान्वेषक (और) वाद वा करने वाला हूं। मेरे लिए प्रत्येक जीव स्वतन्त्र है, बन्धन, परिच्छिन्नता और दोष मेरी दृष्टि में नहीं आते।

मुक्त स्वतन्त्र मैं हूं, और अन्य लोग भी स्वतन्त्र हैं; ईश्वर, ईश्वर हूं मैं, तुम और वह। न ऋण है न कर्तव्य, न धोका है न डर, मैं ही अमी और यहां परमात्मा स्वरूप हूं।

40 कहां है वह तलवार जो मुझे मारडाल सके? कहां है वह शस्त्र जो मुझे घायल कर सके। कहां है वह विपत्ति जो मेरी प्रसन्नता को बिगाड़ सके? कहां है वह दुःख वा शोक जो मेरे सुख में बाधा डाल सके? अमर, कल आज और सदा एक रूप, शुद्ध, पवित्रों का पवित्र, विश्व का स्वामी, वह मैं हूं।

41 मैं मर नहीं सकता, मृत्यु चाहे सदा, मुझ ताना रूप में बाना चुनती रहे। मैं कभी जन्मा नहीं था, तथापि मेरे श्वास के जन्म, उतने ही अधिक हैं जितनी निद्रा-रहित सागर में लहरें

42 कोई पाप नहीं, शोक नहीं, कष्ट (दुःख) नहीं, अपनी सुखी (प्रसन्न) आत्मा में सुराजित (स्थित) हूं। मेरे भय भाग गए; मेरी शंकाएं मिट गईं। मेरी विजय प्राप्ति का दिन आ गया।

43 मेरे लिए मेरा आत्मा ही मेरा साम्राज्य है, (क्योंकि) इस में मुझे अति पूर्ण आनन्द प्राप्त होता है। कोई सांसारिक लहर मेरे (निश्चल) चित्त को आन्दो- लित नहीं कर सकती।

इस लिए (इन लहरों से) मेरे को न कोई लाभ है, न मेरे लिए हानि।

मुझे शत्रु से भय नहीं, मुझे मित्र से घृणा नहीं; मुझे मौत का डर नहीं, मुझे अन्त की चिन्ता नहीं।

44 अरे, चोर! अरे निन्दक, प्यारे डाकू! आओ, स्वागत, शीघ्र! अरे डरो मत। मेरा अपना आप तो तेरा है, और तेरा मेरा है। हां यदि तुम (चाहो), तो कोई चिन्ता नहीं, कृपया लेजाओ इन वस्तुओं को जिन को तुम मेरी समझते हो। हां यदि तुम यह उचित समझते हो, एक ही चोट से इस देह को मार डालो, या इस के टुकड़े टुकड़े करके काट डालो। शरीर को ले जाओ और जो कुछ तुम कर सको। नाम और यश को लेकर चल भागो! ले जाओ! चले जाओ! तथापि यदि तुम मुड़ पलट कर देखो। तो मैं ही अकेला, सुरक्षित और स्वस्थ रहता हूँ! नमस्कार! अरे, प्यारे! नमस्कार!

45 मौत के नाम राम का अन्तिम संदेश। अरे मौत! बेशक छुड़ादे मेरे इस एक जिस्म (तन) को। मेरे और तन ही मुझे कुछ कम नहीं। केवल चांद की किरणें चांदी की तार पहिन कर चैन से काट सकता हूँ। पहाड़ी नदी नालों के वेष में गीत गाता फिरूँगा, बहरे- मव्वाज (समुद्र की तरंगों) के लिवास (वस्त्र) में मैं ही लहराता फिरूँगा। मैं ही बाद-ए-खुशगवार (मन्द २ पवन)

और नसीमे-मस्ताना-ख़राम (मस्तचाल समीर) हूँ। मेरी यह सूरते-सैलानी (घूमने फिरने की मूर्ति) हर वक्त रवानी (चलने फिरने) में रहती है। इस रूप में पहाड़ों से उतरा; मुरझाते पौधों को ताज़ा किया, गुलों (फूलों) को हंसाया, बुलबुल को रुलाया, दर्वाज़ों को खटखटाया, सोतों को जगाया, किसी का आँसू पूंछा, किसी का घूंघट उड़ाया, इसको छेड़, उसको छेड़, तुझको छेड़, वह गया, वह गया, न कुछ साथ रक्खा, न किसी के हाथ आया।