श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

ब्रह्मचर्य।

भाग 3 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 3 · अध्याय 4 / 11

ब्रह्मचर्य।

(ता॰ 9-9-1905 को फैज़ाबाद में दिया हुआ व्याख्यान।)

जो नर राम नाम ले नाहीं, सो नर खर कूकर शूकर सम वृथा जिये जन माँही।

ओऽम्‌ ! ओऽम्‌ !! ओऽम्‌ !!! तुझे देखें तो फिर औरों को किन आँखों से हम देखें। यह आंखें फूट जाथँ गर्चि इन आंखों से हम देखें॥ जिन अर्गन होते चाह चली खर कूकन की, धिक्कार उसे। जिन खाय के अमृत वाञ्छा रही लिंद पशुअन की, धिक्कार उसे। जिन पाय के राज को इच्छा रही चक्की चाटन की, धिक्कार उसे। जिन पाय के ज्ञान को इच्छा रही जग विषयन की धिक्कार उसे।

ओ हो हो हो !!!

जीता तो वही है, जो मत् में, नारायण में राम में रहता सहता, चलता फिरता और श्वास लेता है। जिन्दगी तो यही है। आप कहेंगे कि तुम बस आनन्द ही आनन्द बोलते हो, संसार के काम काज कैसे होंगे और दुःख दर्द कैसे मिटेंगे, परन्तु

हर जा कि सुल्तां खेमा जद गौंगा न मानद आमरा।

अर्थः—जिस स्थान पर राजाधिराज ने डेरा लगाया वहां साधारण लोगों का शोर न रहा।

जहां पर सत्, प्रेम, नारायण, का निवास है, जिस हृदय में हरिनाम, ब्रह्म बस जाय, तो वहां शोक, मोह, दुःख, दर्द

(1)एक प्रकार का बाजा। (2)गधे की आवाज।

आदि का क्या काम ? क्या राजाधिराज के खेमे के सामने लुंडी बुच्ची कोई फटक सकती है ? सूर्य जिस समय उदय हो जाता है, तो कोई भी सोया नहीं रहता। पशुओं की भी आंखें खुल जाती हैं, नदियां जो बर्फों की चादरें ओढ़े पड़ी थीं, उन चादरों को फेंक कर चल पड़ती हैं, उसी प्रकार सूर्यों का सूर्य आत्मदेव जब आपके हृदय में निवास करता है, तो वहां कैसे शोक, मोह, और दुःख ठहर सकते हैं ? कभी नहीं, कदापि नहीं। दीपक जल पड़ने से पतंगे आप ही आप उसके आसपास आना शुरू हो जाती हैं। चश्मा जहां वह निकलता है, तृषा बुझानेवाले वहां स्वयं जाने लग पड़ते हैं। फुल जहां खुद खिल पड़ा, भँवरे आप ही आप उधर खींच कर चल आते हैं। उसी प्रकार जिस देश में धर्म, ईश्वर का नाम रोशन हो जाता है, तो संसार के सुख वैभव और ऋद्धिसिद्धियां आप ही खींची हुई उस देश में चली आती हैं। यही कुदरत का कानून है, यही प्रकृति का नियम है। ओऽम् ओऽम् ओऽम् !

बेशक, राम को आनन्द के बिना और बात नहीं आती। बादशाह का खेमा लग जाने पर चोर चकोर नहीं आने पाते, आनन्द का डेरा जम जाने से शोक और दुःख ठहर नहीं सकते, इसलिये आनन्द के सिवाय राम से और क्या निकले ? ओऽम्, आनन्द ! आनन्द !

परन्तु आनन्द का डेरा डालने से पहले जमीन का साफ कर लेना भी आवश्यक है। इसलिये आज राम, जिसके यहां आनन्द की बादशाहत के सिवाय कुछ और है ही नहीं, झाड़ू लेकर झाडने बुहारने का काम कर रहा है। जिस तरह दूध या किसी और अच्छी वस्तु को रखने के लिये बरतन का

स्वच्छ कर लेना जरूरी है, इसी तरह आनन्द को हृदय में रखने के लिये हृदय का शुद्ध कर लेना भी आवश्यक है। सो आज राम इस सफाई का-विशुद्धि का यत्न बतलायगा। लोग कहते हैं कि घी खाने से शक्ति आ जाती है, किन्तु जब तक ज्वर दूर न हो जाय घी अपथ्य ही अपथ्य है। कड़वी कुनैन या चिरायता या गिलो खाये बिना ज्वर दूर न होगा, अर्थात् जब तक कि मन पवित्र और शुद्ध न होगा, ज्ञान का रंग कदापि न चढ़ेगा।

ओरा ब चइमे-पाक तवा दीद चूँ हलाल, हर दीदा जल्वगाहे आँ माह पारा नेस्त।

अर्थः—विशुद्ध दृष्टि से तु उस प्रियतम को द्वितिया के चन्द्रोदय के समान देख सकता है, परन्तु सब के नेत्र उसका दर्शन नहीं कर सकते।

जब राम पहाड़ों पर था, तो उसने एक दिन एक मनुष्य को देखा कि गुलाब का एक सुन्दर पुष्प नाक तक ले गया और चिल्ला उठा। उसमें क्या था ? इस सुन्दर फूल में एक मधुमक्खिका बैठी थी, जिसने उस पुरुष की नाक की नोक में एक डंक मारा, इसी कारण से, वह चिल्ला उठा। और दुःख से व्याकुल हो गया और पुष्प हाथ से गिर पड़ा। इसी तरह समस्त कामनायें और विषय वासनायें देखने में उस गुलाब के फूल की तरह सुन्दर और चित्ताकर्षक प्रतीत होती हैं, किन्तु उनके भीतर वास्तव में एक विषयी भिड़ बैठी है, जो डंक मारे बिना न रहेगी। आप समझते हैं कि हम सुन्दर २ पुष्पों (संसार के पदार्थों) और विलासों को भोग रहे हैं, किन्तु वास्तव में वह विष जो उनके अन्दर है, आपको भोगे बिना न रहेगा। संसार के लोग जिसको आनन्द या स्वाद कहते

हैं, वह अपना ज़हरीला असर उत्पन्न किये बिना भला कब रह सकता है ?

हाय, आज भीष्म के देश में ब्रह्मचर्य पर दो बातें कहनी पड़ती है, उस भीष्म को ब्रह्मचर्य तोड़ने के लिये ऋषि मुनि और सौतेली मां, जिसके लिये उसने ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली अर्थात् प्रण किया था, उपदेश करती है कि तुम ब्रह्मचर्य तोड़ दो, राजमंत्री, नगरजन, ऋषि मुनि सब आग्रह करते हैं कि तुम अपना व्रत छोड़ दो। तुम्हारे विवाह करने से तुम्हारा कुल का वंश बना रहेगा, राज बना रहेगा, इत्यादि इत्यादि। किन्तु नवयुवा भीष्म यौवनावस्था में जिस समय विरला ही कोई ऐसा युवक होता है कि जिसको-चित्त बाह्य सौन्दर्य और चित्ताकर्षक रंगराग के भूठे जाल में न फँसता हो-उस समय यौवनपूर्ण भीष्म, शूरवीर भीष्म यूं उत्तर देता है, "तीनों लोक को त्याग देना, स्वर्ग का साम्राज्य छोड़ देना, और उनसे भी कुछ बढ़कर हो उसे न लेना मंजूर है, परन्तु सत् से विमुख होना स्वीकार न करूंगा। चाहे पृथ्वी अपने गुण (गन्ध) को, जल अपने स्वभाव (रस-स्वाद) को, प्रकाश अपने गुण (भिन्न २ रंगों का दिखलाना) को, वायु अपने गुण (स्पर्श), को सूर्य अपने प्रकाश को, अग्नि अपनी उष्मा को, चन्द्र अपनी शीतलता को, आकाश अपने धर्म (शब्द) को, इन्द्र अपने वैभव को, और यमराज न्याय को छोड़ दें, परन्तु मैं सत्य को कदापि नहीं छोड़ूंगा।

तीनों लोकों को करूं त्याग और वैकुण्ठ का राज्य छोड दूं, पर मैं नहीं छोडता सत् का मेराज। पंच तत्व, चंद्रमा, सूर्य, इन्द्र और यमदेव, दें छोड खासियत अपनी मगर सत् है मेरा सरताज।

(1.)सीढी, मार्ग। (2)मुकुट।

हनूमान का नाम लेने और ध्यान करने से लोगों में शौर्य और वीरता आ जाती है। हनूमान को महाबीर किसने बनाया ? इसी ब्रह्मचर्य ने। मेघनाद को मारने की किसी में शक्ति न थी। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचन्द्र ने भी यह मर्यादा दिखलाई कि मैं स्वयं राम हूं, किन्तु मैं भी मेघनाद को नहीं मार सकता। उसको वही मारेगा कि जिसके अन्तःकरण में बारह वर्ष तक किसी प्रकार का मलिन विचार न आया हो। और वह लक्ष्मण जी थे। जिन २ लोगों ने पवित्रता अर्थात् चित्त की शुद्धि को छोड़ा उनकी स्थिति खराब होने लगी। विजय उस मनुष्य की कभी नहीं हो सकती, जिसका हृदय शुद्ध नहीं है।

पृथ्वीराज जब रणक्षेत्र को चला, जिसमें यह सैकड़ों वर्ष के लिये हिन्दूओं की गुलामी शुरू हो गई, लिखा है कि चलते समय वह अपनी कमर महारानी ने कसवा कर आया था। नेपोलियन जैसा युद्धवीर जब अपनी उन्नति के शिखर से गिरा, अड़ड़ड़ धम। लिखा है कि जाने से पहले ही वह अपना खून-अपना घात आप कर चुका था। खून क्या लाल ही होता है ? नहीं नहीं सफेद भी होता है। अर्थात् उस रणक्षेत्र से पहली शाम को वह एक चाह में अपने तई पहले ही गिरा चुका था। अभिमन्यु कुमार जैसा चन्द्रमा के समान सुन्दर, सूर्य के समान तेजस्वी, अपूर्व, नवयुवक जब उस कुरुक्षेत्र की भूमि में अर्पण हुआ और उस युद्ध में काम आया कि जहां से भारत के क्षत्री शूरवीरों का बीज उड़ गया, तो युद्ध से पहले वह (अभिमन्यु) क्षत्रिय वंश का बीज डाल कर आ रहा था।

राम जब प्रोफेसर था, उसने उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण विद्यार्थियों की नामावलि बनाई थी, और उनके भीतर की दशा और आचरण से यह परिणाम निकाला था, कि जो विद्यार्थी परीक्षा के दिनों या उसके कुछ दिनों पहले

विषयों में फंस जाते थे, वे परीक्षा में प्रायः फेल अर्थात् असफल होते थे, चाहे वे वर्षभर श्रेणी में अच्छे क्यों न रहे हों। और वे विद्यार्थी जिनका चित्त परीक्षा के दिनों में एकाग्र और शुद्ध रहा करता था वे ही उत्तीर्ण और सफल होते थे।

बाइबल में शूरवीरता में ख्यात प्रसिद्ध सामसन (Samson) का दृष्टान्त आया है। मगर जब उसने स्त्रियों के नेत्रों की विषमयी मदिरा को चखा तो उसकी समस्त वीरता और शौर्य को उड़ते जरा देर न लगी। एक वीर नर ने कहा है:—

"My strength is as the strength of ten Because my heart is pure.

I never felt the kiss of love, Nor maiden's hand in mine."

TENNYSON.

अर्थः—दस नवयुवाओं की मुझ में शक्ति है क्योंकि मेरा हृदय पवित्र है। कामासक्त होकर न मैं ने कभी किसी स्त्री को चुम्बन लिया, न किसी तरुणी को हस्तस्पर्श।

जैसे तेल बत्ती के उपर चढ़ता हुआ प्रकाश में बदल जाता है, वैसे ही जिस शक्ति की अधोमुख गति है, यदि ऊपर की तरफ बहने लग पड़े, अर्थात् उर्ध्वरेतस् बन जाय तो विषयवासना रूपी बल, ओजस् और आनन्द में बदल जाता है। अर्थशास्त्र में बहुधा आप सज्जनों ने पढ़ा होगा कि पदार्थ विज्ञान वेत्ताओं के सिद्धान्त से स्पष्ट फलितार्थ होता है और जिसमें यह दिखलाया है कि किसी देश में जनसंख्या का बढ़ जाना और भलाई का स्थिर रहना एक ही समय में असंभव्य है, एक दूसरे से विरुद्ध है। अगर बागीचा में

गोडी न की जाय, और पैड़ों की काट छांट न की जाय तो थोड़े ही दिनों में बाग बन हो जायगा, सब रास्ते बन्द। इसी तरह जातीय सुस्थिति और वैभव को स्थायी रखने के लिये नैतिक पद्धति (Ethical process) जिसको हक्सले (Huxley) ने उद्यानपद्धति से वर्णित किया है, बर्ताव में लाना पड़ता है। अर्थात् लोकसंख्या को किसी विशिष्ट मर्यादा से अधिक न बढ़ने देना उचित होता है, चाहे यह विदेशगमन से प्राप्त हो, चाहे संतान के कम पैदा करने से। जब सीधी तरह से कोई बात समझ में नहीं आती, तो दंड के जोर से सिखलाई जाती है। सभ्यताहीन लोगों में पहले पशुओं की तरह मां बहन का विचारविवेक न था, किन्तु शनैः २ वे इस नियम को समझने लगे और मां बहन इत्यादि निकट के सम्बन्धियों में विवाह का रिवाज बन्द कर दिया। कुछ आचार विचार को पाशव वृत्ति और व्यवहार का नाम देकर तुच्छ मान लिया जाता है, किन्तु न्याय की दृष्टि से देखा जाय तो मनुष्य की अपेक्षा पशु अधिक शुद्ध और पवित्र हैं, तथापि साथ ही साथ वे आचार विचार पशुओं को बदनाम करने के योग्य भी हैं। कारण यह है कि गो मनुष्यों की अपेक्षा पशु ब्रह्मचर्य का अधिक पालन करते हैं, तथापि सन्तति घड़ाधड़ बढ़ाते चले जाते हैं, जिसका परिणाम भिडाई और जीवन के लिये युद्ध-कलह (Struggle for life) होता है। पशुओं की सन्तति केवल लड़ मरने और अशक्तों के नाश होने से स्थायी रहती है। खेद है उन मनुष्यों पर, जो न केवल पशुओं की तरह सन्तति उत्पन्न करते जाने में विचारहीन हैं, बल्कि पशुओं से बढ़कर वख्त बेवख्त अपना सफेद खून श्वेतशुद्ध नाणिक आनन्द के लिये बहा देने के लिये कटिबद्ध हैं। जिस समय हम लोग अर्थात् आर्यन्न लोग

इस देश में आये, उस समय हमको जरूरत थी कि हमारी सन्तति और संख्या अधिक हो, इस लिये विवाह के समय इस प्रकार की प्रार्थना की जाती थी कि इस पुत्री के दस पुत्र हों। मगर इन दिनों दस पुत्रों की इच्छा करना ठीक नहीं है। तुम कहते हो कि मरने के बाद तुम्हें स्वर्ग में पुत्र पहुँचायेंगे। मगर अब तो जीते जी यह बच्चे, जिन्हें तुम पेटभर रोटी भी नहीं दे सकते, दुःख, आपत्ति अर्थात् नरक के कारण हो रहे हैं। प्यारो, उधार के पीछे नकद को क्यों छोड़ते हो ? इस किस्म का प्रश्न अर्जुन ने भगवान् कृष्ण से गीता में किया था, कि पिंड कौन देगा और पितृ किस प्रकार स्वर्ग में पहुँचेंगे। कृष्ण भगवान ने जो जवाब दिया है उसको भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में 42 से लेकर 46 श्लोक तक अपने अपने घरों में जाकर देखलो।

भगवन्, स्वर्ग कोई मुक्ति नहीं है, स्वर्ग के बाद तो फिर यहां आना पड़ता है। स्वर्ग के विषय में क्या ही खूब कहा है:-

"जिन्नत परस्त जाहिद कबहक्क परस्त है; हूरों पर मर रहा है यह शहबत परस्त है।"

अर्थात् जो बैकुंठ की कामना रखता है, वह ब्रह्म का उपासक कैसे कहा जा सकता है, वह तो अप्सराओं की इच्छा रखता है, और कामासक्न है।

प्यारो, अगर तुम लोकसंख्या के कम करने में यत्न न करोगे, तो प्रकृति अपने जंगली पद्धति (wild process) को काम में लायगी, अर्थात् कांट, छांट करना शुरू कर देगी, जैसा कि महर्षि वसिष्ठ जी ने फरमाया है। (1) महामारी (2) दुर्भिक्ष (3) भूकम्प (4) युद्ध कलह या प्लेग इत्यादि छांट शुरू हो जायगी। अगर गृहकलह, दुर्भिक्ष, प्लेग आदि

ना मंजूर है, तो पवित्रता, ब्रह्मचर्य, हृदय की शुद्धि और निर्मल आचार व्यवहार को बर्ताव में लाओ, जगत में प्रेम और जातीय एकता कदापि स्थायी नहीं रह सकते, जब तक कि लोकसंख्या की वृद्धि और जमीन की पैदावार (धान्य की उत्पत्ति) परस्पर ठीक २ एक समान न रहे। संसार में कोई देश ऐसा नहीं है जो निर्धनता में हिन्दुस्तान से कम हो और लोकसंख्या में इससे अधिक। ऐसी दशा में झगड़े बखेड़े और स्वार्थ परायणता भला क्यों कर दूर हो सकती है, और मेलमिलाप और एकता क्योंकर स्थायी रह सकते हैं ? दो कुत्तों के बीच में एक रोटी का टुकड़ा डाल कर कहते हो कि मत लड़ो। भला यह कैसे संभावित हो सकता है ? इस दशा में प्रेम और एकता का उपदेश करना, लेक्चरबाजी की हँसी उड़ाना और उपदेश का मखौल करना है। एक गौशाला में दस गायें हों, और चारा केवल एक के लिये हो, तो गायें ऐसी गरीब, शान्त स्वभाव और अवाक् पशु भी आपस में लड़ने मरने बिना नहीं रह सकते। भला भूखे मरते भारतवासी कैसे प्रेम और एकता स्थायी रख सकते हैं ? विज्ञान शास्त्र में यह बात सिद्ध हो चुकी है कि, किसी पदार्थ की समतोल अवस्था (equilibrium) के लिये जरूरी है कि एक अणु या अंश की अन्तर्गत गति के लिये इतनी जगह हो कि दूसरे अणु की गति वा व्यापार में बाधा न पड़ने पाय। अब भला बताओ कि जिस देश में एक आदमी के पेट भर खाने से बाकी दस आदमी आधे तृप्त या भूखे रह जाँय, उस देश में भिन्न २ व्यक्तियां एक दूसरे के सुख में बाधा डालने वाली क्यों न हों ? और ऐसे देश की शान्ति और समतोल अवस्था (equilibrium) कैसे स्थायी रह सकती है ? क्या तुम भारतवर्ष को कलकत्ता की काल-कोठरी

(Black Hole) बनाये विना नहीं रहोगे ? जो वस्तु नकम्मी हो जाती है, वह इस लेम्प के समान नीचे उतार दी जाती है, जो अभी उतार दिया गया है*। आख़िर कब समझोगे ? मनुष्य बल को, अपने पुरुषत्व को इस प्रकार नाश मत करो कि जिससे तुम्हारी भी हानि हो और समस्त देश की भी। इसी शक्ति को ब्रह्मानन्द और आत्मबल में बदल दो। दुनियां का सब से बड़ा गणितशास्त्री सर आईज़क न्यूटन 80 साल से अधिक आयु तक जिया और वह ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत करता था। दुनियां का लगभग सब से बड़ा तत्व-विचारक कैंट बहुत बड़ी उम्र तक जिया और वह भी ब्रह्मचारी था। हर्बर्ट स्पेन्सर और स्वीडनबर्ग जैसे संसार के ख़यालों को पलटा देने वाले ब्रह्मचारी ही हुए हैं। कुछ अंग्रेज़ी वर्त्तमान पत्रों ने यह ख़याल उड़ा रक्खा है कि ब्रह्मचारी का जीवन आयु को घटाता है। विचार पूर्वक देखने से मालूम होता है यह परिणाम पेरिस और एडिनबरो में कुछ वर्षों की जन संख्या की वृद्धि के रिपोर्टों से निकाला गया था। अब जिसमें किंचित् भी विवेकशक्ति है, यदि विचार करे तो देख सकता है कि पेरिस और एडिनबरो में उन्हीं लोगों का विवाह नहीं होता जो बीमार हों, कंगाल हों, उद्योगहीन हों, या अन्य रीति से घर घर भटकते फिरते हों। इस लिये उन देशों में अविवाहित और एकाकी जीवन अकाल मृत्यु का कारण नहीं, बल्कि अकाल मृत्यु ही अविवाहित जीवन का कारण होता है। और ये अविवाहित लोग जो आत्मिक और बौद्धिक व्यापार से शून्य हैं, ब्रह्मचारी नहीं कहला सकते। बस, *एक लेम्प जो मेज पर रक्खा था और जिसकी चिमनी काली पड़ गई थी, उस समय मेज से नीचे उतार दिया गया था, जिसका यह उल्लेख है।

ब्रह्मचर्य पर जनसंख्या के कारण से विरोध करना नितान्त अनुचित है। अब हम दो एक अमेरिका देश के ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत करनेवालों का हाल सुनाकर समाप्त करेंगे। हमारे भारत की विद्या को विदेशियों ने प्राप्त करके उससे लाभ उठाया, और हम वैसे ही कोरे के कोरे रह जाते हैं यह कैसे शोक की बात है ? "हमारे पिता ने कूप खुदवाया है" इसके कहने से हमारी प्यास नहीं जायगी। प्यास तो पानी के पीने से ही जायगी। इसी तरह शास्त्रों पर आचरण करने से आनन्द होगा। अमेरिका के सब से बड़े लड़के एमर्सन (Emerson) का गुरू, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला थोरो (Thoreau) भगवद्गीता के विषय में इस प्रकार लिखता है कि प्रति दिन मैं गीता के पवित्र जल से स्नान करता हूं। गो इस पुस्तक के लिखनेवाले देवताओं को अनेक वर्ष व्यतीत हो गये, लेकिन इसके बाहर की कोई पुस्तक अभी तक नहीं निकली है ! इसकी खूबी व महत्व हमारे आज कल के ग्रन्थों से इस क़दर चढ़ बढ़कर है कि कई बार मैं यह ख़याल करता हूं कि शायद इसके लिखे जाने का समय नितान्त निराला समय होगा। पाताल लोक में अर्थात् अमेरिका में उपनिषद्, भगवद्गीता और विष्णु पुराण को सब से पहले प्योर थोरो ने राइज़ (introduce) किया। सर टामस रो आदि जो यूरोप से हिन्दुस्तान में आये, वह उन पवित्र ग्रन्थों के लातीनी अनुवादों को यहां से यूरोप में ले गये, और फ्रांस से यह शख़्स थोरो उन अनुवादों को अमेरिका में ले गया। इन पुस्तकों के अनुवादों को फिरंगियों ने फ़ारसी भाषा से लातीनी भाषा में किया था, क्योंकि उस समय यूरोप की शिक्षा लातीनी भाषा में थी, और प्रायः इसी भाषा में ग्रन्थ

लिखे जाते थे। अगर सच पूछो तो वेदान्त का झंडा पहिले पहल इसी पुरुष (थोरो) ने अमेरिका में गाड़ा। एक दिन जंगल में सैर करते हुए इससे एमर्सन ने पूछा कि इन्डियन अर्थात् अमेरिका के असली बाशिन्दों के तीर कहां मिलते हैं ? उसने साधारणतः अपना हर समय का वही उत्तर दिया "जहां चाहो"। इतने में ज़रा झुका और एक तीर घास से उठाकर झट दे दिया और कहा "यह लो"। एमर्सन ने पूछा कि देश कौन सा अच्छा है तो उत्तर दिया कि 'अगर पैरों तले की पृथ्वी तुमको स्वर्ग और वैकुण्ठ से बढ़ कर नहीं मालूम देती तो तुम इस पृथ्वी पर रहने के योग्य नहीं"। उसके द्वार हर समय खुले रहते थे और रोशनी और वायू की कभी रोक टोक न थी। एमर्सन कहता है कि उसके मकान की छत में एक भिड़ों का छत्ता लगा हुआ था और भिड़ों और शहद की मक्खियों को मैंने उसके साथ चारपाई पर बेखटके सोते देखा मगर इस समदर्शी को कभी दुःख नहीं पहुंचाती थी। सांप उसकी टांगों से लिपट जाते थे मगर उसे किंचित् परवा नहीं। काटने तो कैसे क्योंकि उसके हृदय से दया और प्रेम की किरणें फूट रही थीं। और वह तो व्यालभूषण बना हुआ था। और इस तरह का शंकर के समान अनुभव रखता था। जिस पुरुष को संसार के नखरे टखरे और क्रोध कटाक्ष नहीं हिला सकते, वही संसार को ज़रूर हिला देगा। अमेरिका का एक और महापुरुष वौल्ट व्हिटमन [Walt Whitman] नामी अभी वर्तमान में गुज़रा है, जो "स्वतंत्रता के युद्ध" (War of Independence,) के दिनों में स्वतंत्रता का भजन गाता फिरा करता था। उसके मुख से प्रसन्नता टपकती थी और हाथों से काम करने का स्वभाव रखता

था। उसका लड़ाई में यही काम था कि पीड़ितों की मरहम-पट्टी करे, प्यासों को पानी और भूखों को रोटी दे, और लोगों के दिलों में हिम्मत और साहस को पैदा कर दे, तथा आनन्द से गीत गाता फिरे। उसकी आंखों से आनन्द बरसता था। उसकी आवाज़ से खुशी टपकती थी, जिस तरह कुरुक्षेत्र की रणभूमि में कृष्ण भगवान्, और भूत पिशाचों के बीच में शिव भगवान् विचरते थे, इसी तरह यह महापुरुष अमेरिका के उस रणक्षेत्र में बेधड़क घूमता फिरता था। उसने एक पुस्तक लिखी है, जिसका नाम "घास की पत्तियां" (Leaves of grass) है, जिसके पढ़ते पढ़ते मनुष्य आनन्द से गद्गद हो जाता है। अो3म् ! आनन्द ! आनन्द ! आनन्द ! डटकर खड़ा हूं खौफ से खाली जहान में। तसकीने दिल भरी है मेरे दिल में, जान में॥ सूखे ज़मां मकां है मेरे पैर मिस्ले संग। मैं कैसे आ सकूं हूं कैदे बयान में॥ * * * * बादशाह दुनियां के हैं मोहरे मेरी शतरंज के। दिल्लगी की चाल हैं सब रंग सुलह व जंग के॥ रक्स शादी से मेरे जब कांप उठती है ज़मीं। देखकर मैं खिलखिलाता कहकहाता हूं वहीं॥ खुश खड़ा दुनिया की छत पर हूं तमाशा देखता। गाहबगाह देता रहा हूं वहशियों की सी सदा॥ ॐ! ॐ!! ॐ!!!