श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

धर्म-तत्व।

भाग 3 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 3 · अध्याय 3 / 11

धर्म-तत्व।

(लाहौर निवासी महाशय मथुरादास पुरी ने सन 1906 के प्रारम्भ में निम्नलिखित धर्म विषयक प्रश्न छपवा कर उत्तर पाने के लिये प्रसिद्ध धर्मानुयायी सज्जनों के पास भेजे थे। उस समय स्वामी राम का गंगातट पर निवास था। स्वामी जी ने उनके उत्तर कानपुर के 'जमाना' नामक उर्दू मासिक पत्र द्वारा दिये थे, जिसका यह हिन्दी अनुवाद है।)

प्रश्नः—

(1)—धर्म से क्या तात्पर्य है तथा उससे किस उद्देश, आवश्यकता और लाभ की आकाँक्षा है ?

(2)—धर्म का सर्वोत्तम रूप और उसको आचरण में लाने की सर्वश्रेष्ठ विधि क्या है ?

(3)—मानुषी अस्तित्व में वह मुख्य अंश क्या है, जिससे धर्माचरण और उसका उद्देश मुख्य सम्बन्ध रखते हैं, और वह संबंध किस दशा में कैसा है ?

(4)—धर्म के उद्देश को सफलतापूर्वक पूर्ण करने की विधि में किस किस साधन और सहायता की आवश्यकता है ?

(5)(क) क्या जाति, समय, स्थान, भोजन और संग (सहवास) का धर्माचरण पर कोई प्रभाव होता है, यदि होता है तो क्या ?

(ख) क्या केवल अंधाधुंध विश्वास (इस जीवन के पश्चात् सफलता प्राप्त होने की काल्पनिक धारणा), केवल पुस्तकीय ज्ञान, और धर्मग्रन्थों का बार बार अध्ययन और श्रवण ही धर्म के उद्देश की सिद्धि के लिये काफी होगा, अथवा किसी ऐसे आचरण (व्यवहार) की भी आवश्यकता है जिससे ऐसे संतोषप्रद लक्षण उत्पन्न हों कि उनसे धर्माचरण के परिणाम की धर्म के उद्देश के साथ तुल्यता जीतेजी (वर्तमान जीवन में) प्रमाणीभूत हो सके ? यदि किसी ऐसे आचरण (व्यवहार) की आवश्यकता है तो वह क्या है और क्या संतोषप्रद लक्षण वह उत्पन्न करता है ?

(ग) क्या धर्म के उद्देश को पूरा करने की विधि ही केवल, किसी अनुभवी धर्मनिष्ठ की सहायता विना, किसी सामान्य मनुष्य के लिये पूर्ण लाभप्रद हो सकती है ?

(घ) क्या मानुषी अस्तित्व के संबंध में कोई प्राकृतिक कारण ऐसे हैं जो धार्मिक आचरण (जीवन) के परिणाम की उन्नति पर कोई प्रभाव रखते हों ? यदि हैं तो क्या, और क्या प्रभाव रखते हैं ?

(6) किसी धर्म का महत्व, उसका विश्वास, उसका अंगीकार करना और त्याग करना, किस विवेचना के फल पर निर्भर होना चाहिये, और उसका प्रभाव साधारणतः कब अनुभव में आने लगता है ?

(7)—रचना [सृष्टि] का मूल कारण और उद्देश क्या है ?

(8)—धर्म और विज्ञान, उनके व्यवहार, साधन विधि तथा उद्देशों में क्या भेद और समानता है ?

उत्तरः—

(1)—'धर्म' शब्द से सब लोगों का एक ही तात्पर्य नहीं होता। देश, काल और योग्यता के अनुसार धर्म का अर्थ भी बदलता रहा है। लेखक तो धर्म के तात्पर्य से चित्त की वह बढ़ी-चढ़ी अवस्था लेता है, जिसकी बदौलत शांति, सतोगुण, उदारता, प्रेम, शक्ति और ज्ञान हमारे लिये स्वाभाविक और निजी हो जांय, अर्थात् हमसे स्वतः प्रकट होने लगें। दूसरे शब्दों में हमारी रहन सहन [आचार-व्यवहार], वाणी और विचार एक परिच्छिन्न शरीर और उसके दास की दृष्टि [देहाध्यास] से न रहें, वरन् [सर्वव्यापी] विश्वात्मा और जगत्प्राण की दशा हो जाय। अथवा प्रकट नामरूप और शरीर को वास्तविक मूल [ईश्वर] ही सीधा २ चारों ओर प्रकाशमान् दृष्टिगोचर होने लगे। इन अर्थों में धर्म को लिया जाय तो सारे संसार की उत्पत्ति और स्थिति

का फल (परिणाम) धर्म है।

धर्म स्वयं ही उद्देश है। समस्त सांसारिक उद्देशों का उद्देश है, और अपना आप उद्देश है, सम्पूर्ण विद्याओं का लक्ष्य और अन्तिम परिणाम [निष्कर्ष] है, वेद का अन्त—वेदांत है, इससे कुछ परे या ऊपर नहीं जो इसका उद्देश हो सके।

आवश्यकता धर्म की उसी प्रकार की है जैसे नदियों को आवश्यकता है समुद्र की ओर बहते रहने की, अग्नि की ज्वाला को ऊपर की ओर भड़कने की, वृक्षों और पशुओं को आहार की, सजीव प्राणियों को वायु की, आंख को प्रकाश की, रोगी को औषधि की।

लाभः—जानते हुए अथवा न जानते हुए धर्म को आचरण में लाये बिना किसी प्रकार की सफलता, उन्नति और अभ्युदय, सुख और शान्ति, स्वास्थ्य और शक्ति, विद्या और कला, कुशल और मंगल प्राप्त नहीं हो सकते।

(2)—कोई भी मनुष्य जाने या अजाने जिस दर्जे [कोटि] तक आचार विचार से धर्म की एकाग्रता और समाधि में स्थित होता है, उसी दर्जे तक वह ऋद्धि सिद्धि को पाता है, और धर्म का सर्वोत्तम रूप यह है कि मनुष्य में कर्म और ज्ञान दोनों द्वारा अहंभाव मिटकर, परमात्वभाव में इस हद (दर्जे) तक समाधि (एकाग्रता व एकता) आ जाय कि व्यक्तिगत कल्याण और कुशलता के स्थान पर देश का देश वरन् देशों के देश उसकी समाधि के प्रभाव से भाग्यवान होते जायँ। समस्त संसार में शक्ति और आनन्द के स्रोत वह निकलें, एकता और आनन्द की लहरें जारी हो जांय, बल और प्रसन्नता की उषा उदित हो जाय॥

आचरण (व्यवहार) में लाने की सर्वश्रेष्ठ विधिः-(क)

उपनिषद् और गीता का बार बार विचार और उसका अनुष्ठान।

(ख) जिस ज्ञानी के निकट बैठने (सहवास) से आश्चर्य की दशा छा जाय उनके दर्शन और सत्संग।

(ग) दिन में कम से कम पांच वार समय निकाल कर अपने स्वरूप से अज्ञान और पाप को निर्मूल करना अर्थात् अपने आप को शरीर और शारीरिकता (देहभाव) से पृथक् देखना, अपना घोंसला, मोह वासनाओं के उजाड़ से उठाकर सत्य की वाटिका और स्वरूप के नन्दनवन में लगाना और इस प्रकार के महावाक्य में लय हो जानाः-

आफ्ताबम्, आफ्ताबम्, आफ्ताब, जरोहा दारन्द अज मन रंगोताब।

मम्ब-ए गुफ्तोर-हक, गुफ्तारे-मा, चश्म-ए-अनवारे-हक, दीदारे-मा।

अर्थात् मैं सूर्य हूं, मैं सूर्य हूं, मैं सूर्य हूं। सारे परमाणु मुझ से चमक दमक पाते हैं। मेरी वाणी ईश्वर की वाणी का भण्डार है और मेरा दर्शन मात्र ईश्वरीय प्रकाश का स्रोत है।

(3)—मानुषी अस्तित्व में वह बात (तत्व) अवश्य है "जिससे धर्माचरण और उसका उद्देश मुख्य संबंध रखते हैं, लेकिन वह मुख्य तत्व मानुषी अस्तित्व का कोई अंश नहीं, वरन् मानुषी अस्तित्व उसका अंश कहा जा सकता है, और इतना भी केवल देखने मात्र है। यह मुख्य तत्व एक अगाध नदी है, जिसमें मैं शरीर, मन आदि, तरंगो की भांति लुढ़क पुढ़क रहे हैं। इस मुख्य तत्व को हिन्दूशास्त्र में "आत्मा" नाम दिया है।

संबन्ध किस दशा में कैसा—चित्त और मन का परिच्छिन्नता को छोड़ कर नामरूप से पार हो निजस्वरूप (आत्मा) में लीन हो जाना, सत्स्वरूप, आनन्दस्वरूप और ज्ञानस्वरूप बन जाना है।

उदाहरण—जैसे एक लहर या बुलबुला अपने परिच्छिन्न नाम रूप से पृथक होकर अपनी असलियत (मूल स्वरूप) अर्थात् जल रूप से सब लहरों और बुलबुलों में मौज मारता है, स्वादिष्ट है, स्वच्छ है, इत्यादि इत्यादि; या जैसे खांड का बना हुआ कुत्ता या चूहा अपने परिच्छन्न नामरूप से रहित होकर अपना मूल स्वरूप अर्थात् खांड के रूप से, खाँड के सिंह, राजा, देवता में मौजूद है और सुस्वादु है, श्वेत वर्ण है, इत्यादि इत्यादि।

स्पष्टीकरणः—(क) मन, बुद्धि, चित्त अहंकार किसी सूक्ष्म विषयपर विचार करते करते यदि एकाग्रता की उस अवस्था पर पहुँच जाँय कि क्षण भर के लिये इनका निरोध हो जाय तो विद्या और वैभव का स्वरूप बन निकलते हैं।

(ख) यदि रण क्षेत्र में सब संबंधों को तिलांजलि देकर किसी के मन, बुद्धि चित्त अपनी परिच्छिन्नता से रहित हो जाँय तो निर्भयता, वीरता, शौर्य और शक्ति की नदी बह निकलती है।

(ग) अथवा मन, बुद्धि, चित्त अहंकार जब किसी प्रकार के प्रेमपात्र और इष्ट (पदार्थ) पाकर अपरिच्छिन्नता, अभेदता और एक प्रकार से लय को प्राप्त होते हैं (जैसे एक लहर दूसरी लहर से मिलकर मिट सकती है) तो आनन्द ही आनन्द बन जाते हैं।

अतः मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का आत्मा में लीन होना

(पूर्ण मोक्ष) कपाट का खुलना है, और मन का आत्माकार होना ही, क्या ऋद्धि का बल, क्या आनन्द, इन सबका पुञ्ज प्रकाशस्वरूप बाहर निकलता है।

जब तक मन, बुद्धि आदि आत्माकार नहीं अर्थात् परिच्छिन्नता (नामरूप) से संयुक्त हैं, मौज की चादर मानो जल के रूप को छिपा रही है, बुलबुलों के बुरक़ (एक प्रकार का परदेदार मुसलमान स्त्रियों के पहरने का वस्त्र जो उनको सिर से पैर तक ढांप लेता है) से नदी ढकी हुई है, भीतरी कपाट बंद है, और मनुष्य अज्ञानांधकार, भय और दुर्बलता, पाप और दुःख में फंसा हुआ है।

बाह्येन्द्रिय और अन्तः करण में जो भी शक्ति और बल है, वह सब आत्मा का ही है। इनका आत्मा में मर जाना (लय होना) ही [मनुष्य का] अमर होना है, जैसे तरंग का जल में मिटना नदी होना है। इनका आत्मा से अलग अमर होने की इच्छा करना मानो मर जाना (विनाश होना) है। बुलबुले को पानी से अलग करो फूट जायगा! प्रत्येक व्यक्ति के लिये सोना इसी कारण से जीवन का हेतु है कि गाढ़ निद्रा में बाह्येन्द्रिय और अन्तःकरण, अपरिच्छिन्नता के कारण अपने वस्तविक स्वरूप [आत्मा] में लीन और निमग्न हो आते हैं।

(4)—साधन और सहायताः—

[क] केवल इतना आहार और वह आहार जो शीघ्र पच सके और सहज में हजम हो सके। [ख] नींद भर सोना। [ग] प्रातः सायं नियम पूर्वक व्यायाम करना। [घ] यथा शक्ति ऐसी संगत से बचना जो हृदय में

रागद्वेष भर दें। यदि ज्ञानियों का सत्संग मिल सके तो वाह वाह, अन्यथा एकान्त सेवन तो सबसे अच्छा है।

[ङ] सदाचार, सद्वचन, सत्कर्म, उदारता, क्षमा, तथा लोकहित का कोई न कोई कार्य अवश्य करते रहना, बहुत बड़े सहायक हैं।

(5)(क) "जाति, समय, स्थान, आहार, और संगत का प्रभाव" अवश्य होता है। इन के अनुसार मनुष्य के चित्त की अवस्था होती है। इसी लिये समय, स्थान, आहार, और संगत बदलने से चित्त की दशा भी बदल सकती है, इसी लिये शिक्षा का प्रभाव पड़ना भी सम्भव है, और इसी लिये धर्माचरण में प्रत्येक को पूर्ण सफलता प्राप्त होना संभवित है।

जाति (असलियत) तो प्रत्येक की आत्मा (ईश्वर) है, हां जाति [Heredity = कुल, वंश] भिन्न भिन्न है, और जाति [वंश वा कुल] के प्रभाव की शक्ति वृत्तों और सामान्य पशुओं में, स्थान, समय, आहार और संगत" की शक्ति पर सदैव प्रभावशाली रहती है। किन्तु मनुष्यों के लिये संगत शिक्षा, और आहार की शक्ति प्रत्येक दशा में जाति की शक्ति पर प्रभावशाली हो सकती है।

[ख] ऐसा सन्तोषप्रद अभ्यास भी है जो जीतेजी मुक्ति [जीवन मुक्ति] दे सके, अर्थात् शोक, मोह, क्रोध और पाप से पूर्ण छुटकारा दिला सके। और वह अभ्यास मन-वचन-कर्म से देह तथा देहदृष्टि को भूल कर ब्रह्मदृष्टि [सब का अपना आप—आत्मा—होकर] रहना सहना है। इससे सन्तोषप्रद लक्षणों की पूछो तो अपने आप

"दौलत गुलामे मन शुदो इकबाल चाकरम्"

अर्थात् लक्ष्मी मेरी दासी है और ऐश्वर्य मेरा दास हो जाता है। पाप और सन्ताप का मूलोच्छेद हो जाता है।

[ग] "सामान्य मनुष्य" से अभिप्राय यदि वह व्यक्ति सूचित है, जिसके भीतर आत्मजिज्ञासा प्रेम [अभेद] की अवस्था तक नहीं भड़की, तो उसको चाहे कैसा ही "पहुँचा हुआ" अनुभवी आत्मनिष्ठ क्यों न मिले पूर्ण रूप से उद्देश कदापि सिद्ध न होगा। हजारो राजे महाराजे कृष्ण भगवान के सहवास में आये किन्तु गीता तो किसी ने नहीं सुनी। अर्जुन ने सुनी और वह भी उस समय जब राज, प्रतिष्ठा, प्राण, शिर, सम्बन्धी, धर्म और लोक परलोक को कृष्ण के चरणों पर निछावर कर बिलकुल हार कर वैराग्य स्वरूप हो रहा था।

यदि जिज्ञासा तीव्र है तो यह नितान्त असंभव है कि अनुभवी आत्मनिष्ठ या कोई अन्य आवश्यक सहायता अपने आप खिंचकर न चली आय। कोयला को आग लगी तो प्राणवायु [Oxygen] को अपनी ओर खींच लाती है, तो क्या मनुष्य के हृदय की अग्नि ही इतनी बेवस थी कि परम गुरु के मिलाप से वंचित रहे। अतः यह मानना ही असंभवित है, कि सच्चा जिज्ञासु हो और फिर आवश्यक सहायता से वंचित रहे।

[घ] मानुषी जीवन [अस्तित्व] में जितनी ठोकरें लगती हैं और कष्ट आते हैं, देखने में अर्थात् बाह्य दृष्टि से उनके कारण चाहे क्या ही न हों, यदि विचारपूर्वक देखा जाय, और उन विपत्तियों का सामना होने से पहले की अपनी भीतरी अवस्था को पक्षपात और धोके से रहित होकर सच सच और ठीक ठीक याद किया जाय तो निरंतर बिना अन्वय-

व्यतिरेक [लाना-लगाना] के मालूम होगा कि बाह्य विपत्ति तो पीछे आई, भीतरी अधःपतन पहले हो चुका था, अर्थात् हृदय कहीं सर्वभूतात्मदृष्टि को छोड़ कर परिच्छिन्न देहात्मदृष्टि से रागद्वेष आदि में फँस गया था। यदि अन्य दृष्टि से देखें, तो यों कहिये कि हृदय सांसारिक पदार्थों के मूल स्वरूप [सत्य स्वरूप, आत्मा, ब्रह्म] की ओर ध्यान न देते हुए उनके बाह्य नामरूप में बेतरह उलझ गया था। जैसे कि स्त्री के मिथ्या रूप-सौंदर्य की चाह में डूब गया था, अथवा किसी को शत्रु समझ कर उस (नामरूपात्मक) काल्पनिक छाया को सच मान कर विष उगल रहा था, जो अपने ही आपको चढ़ा। प्यारे यार (प्रेमा) का पत्र आया, वह पत्र भी प्यारा लगने लगा। किन्तु उसमें प्रीति वस्तुतः उस कागज़ के टुकड़े के साथ नहीं थी, यार के साथ थी। इसी प्रकार स्त्री, पुत्र, घर. बार, विद्या और धन आदि को सच्चे यार (आत्मा-ब्रह्म) की ओर के पत्र जान कर उस अविनाशी प्यारे के कारण यदि हमारी प्रीति उनसे हो तो निभ सकती है; नहीं तो यों ही ये चिट्ठियाँ जब प्यारी लगीं, और चिट्ठीवाले को हमने भुलाया [धर्म के नियम को तोड़ा] तो शामत [विपत्ति] आई।

इस पर वेद की आज्ञा है "जो भी कोई ब्राह्मण को ब्राह्मण की दृष्टि से देखेगा और आत्मा की दृष्टि से न देखेगा [अर्थात् ब्राह्मण शरीर के नामरूप संज्ञा को केवल टेलीफोन न जानेगा जिसके द्वारा आत्मा अर्थात् ईश्वर स्वयं बातें कर रहा है] तो वह मनुष्य ब्राह्मण से धोका खायगा। जो भी कोई राजा को राजा [नामरूप] की दृष्टि से देखेगा और आत्मा की दृष्टि से न देखेगा वह राजा से धोका खायगा। जो भी कोई धनाढ्य को धनाढ्य की दृष्टि से देखेगा और

आत्मा की दृष्टि से न देखेगा वह धनाढ्य से धोका खायगा। जो भी कोई देवता को देवता की दृष्टि से देखेगा और आत्मा की दृष्टि से न देखेगा वह देवता से धोका खायगा। जो भी कोई भूतों [तत्वों] को भौतिक दृष्टि से देखेगा और आत्मा की दृष्टि से न देखेगा वह भूतों से धोका खायगा। जो भी कभी, चाहे कोई, चाहे किसी ही वस्तु को उसके नामरूप की दृष्टि से देखेगा और आत्मा की दृष्टि से न देखेगा वह उस वस्तु से धोका खायगा"*

अनन्त जीवन का यही नियम है जिसकी चोटें खा खा कर प्रत्यक्ष प्रमाण से विरुद्ध होने पर भी हज़रत मोहम्मद आदि को आवश्यकता पड़ी कि ऊंची मीनारों पर से पुकार पुकार कर दुनिया को बांगें सुनायेंः-"ला इलाहुल् अल्लाह" [और कुछ नहीं है सिवाय ईश्वर के]। ईसाई मत में सूली चढ़ कर फिर जी उठने से भी इसी प्रकार के सत्य में पुनर्जीवित होना अभिप्रेत है। जीवन के कड़े अनुभवों की नींव पर बुद्ध भगवान् इसी अध्यात्म-नियम को मनसा वाचा कर्मणा बनों में सुनाते फिरे कि "जो भी कोई सांसारिक वस्तुओं को सत्य मान कर उन पर भरोसा करेगा, धोका खायगा।"

अतः यह अध्यात्म-नियम वह "प्राकृतिक नियम" है जो धार्मिक आचरण के परिणाम की उन्नति पर आश्चर्यकारक प्रभाव रखता है। यदि कोई व्यक्तिविशेष इस आत्मा के साथ सम्पूर्ण रूप से एकप्राण और एकमत होगा, तो समस्त संसार उसके साथ एकप्राण और एकमत है। यदि कोई जाति दूसरी जातियों के मुकाबले में इस मुख्य तत्व [सत्यता] और भीतरी एकता को व्यवहार में लावेगी तो वह जाति

* देखो बृहदारण्यक उपनिषद्।

उत्कर्ष को प्राप्त होगी। और विरुद्ध इसके जो भी कोई व्यक्ति इस मुख्य तत्व [सत्यता] को व्यवहार रूप में भूलेगा वह व्यक्ति नष्ट होगा। और जो भी कोई जाति इस मुख्य तत्व को तुच्छ जानेगी वह जाति तुच्छ हो जायगी, और जो लोग इस धार्मिक नियम को बुद्धि से जानते ही नहीं या आचरण [व्यवहार] में भूल बैठे हैं, वह अशुद्ध अत्तर की भाँति जीवन की पाटी से मिट जायंगे या विनाश की रेखा के नीचे आ जायँगे।

(6)—धर्म का प्राण (तत्व अर्थात् आन्तर रूप) तो ऊपर वर्णित हो चुका। वह तो हृदय का पिघलना या घुलना है। खुदी (देहात्मभाव) के स्थान पर खुदाई (ब्रह्मभाव) का आ जाना है। और वह एक ही है, न वह अदल बदल के योग्य ही है। अब रहे धर्म के शरीर (बाह्यरूप) तो वे कई हैं और देश-काल तथा आवश्यकता के अनुसार भिन्न भिन्न हैं। सर्व साधारण के लिये धर्म से धर्म का शरीर (बाह्यरूप) ही अभिप्रेत होता है, और इसमें हृदय के पिघलने की अपेक्षा समाज रीति-रिवाज, खाना पीना, धर्मनिष्ठ आचार्य, धार्मिक ग्रंथ, एकाग्रता के साधन, परलोक संबंधी विचार, मुक्ति के मार्ग, वादविवाद और तर्क वितर्क इत्यादि बहुत भाग लेते हैं।

जो लोग वास्तविक धर्म से बिलकुल अनभिज्ञ हैं, वे बाह्य-धर्म को बदलते फिरते हैं। और 'किसी धर्म का महत्व, एक का अंगीकार करना और दूसरे को छोड़ देना आदि' वे किस विवेचना के फल पर निर्भर" रखते हैं, उनकी वेही जानें, हम इस विषय में कुछ नहीं कह सकते।

(7)—"रचना सृष्टि Creation का मूल कारण और उद्देशः—" यह प्रश्न दूसरे शब्दों में यों वर्णित हो सकता है

"जगत् क्यों बना ? जगत् कब बना ? जगत् कहाँ बना ? जगत् किस ढंग से बना ?" इत्यादि। या अधिक स्पष्ट किया जाय तो प्रश्न का रूप यह होगाः—"जगत् किस कारण से बना ? किस काल में बना ? किस स्थान पर बना ? किसके द्वारा बना ? इत्यादि।"

उत्तरः—थोड़ा विचार किया जाय तो जगत् के बड़े बड़े स्तंभ स्वतः कार्य कारण की परम्परा, काल, स्थल और संबंध इत्यादि ही सिद्ध होंगे। इस लिये इस प्रश्न के अन्तर्गत कि "जगत् किस कारण से बना" यह प्रश्न भी शामिल है कि "कार्य कारण की परम्परा" किस कारण से आरम्भ हुई। और यह प्रश्न अनुचित है, इस में अन्योन्याश्रय दोष (Reasoning in a circle) है।

और इस प्रश्न के अन्तर्गत कि "जगत् किस काल में बना ?" यह प्रश्न शामिल है कि "काल किस काल में उत्पन्न हुआ ?" यह भी अनुचित है। और इस प्रश्न के अन्तर्गत कि "जगत् कहां पर बना ?" यह प्रश्न भी शामिल है कि "देश किस देश में प्रकट हुआ ?" यह भी अनुचित है। इसी प्रकार "किस के द्वारा बना ?" यह भी अनुचित है। अतः मनुष्य अपनी मानुषी दृष्टि से इस विषय पर सिर धुनता हुआ व्यर्थ समय नष्ट करता है।

कि कस नकशूद नकशायद ब हिकमत ई मुहम्माँ।

अर्थात् न किसी ने इस घुंडी को खोला और न कोई बुद्धि से इसे खोल ही सकता है, यही माया है।

(8)—धर्म और विज्ञानः—

साधन—विज्ञान शास्त्र परीक्षा (experiments) प्रयोग निरीक्षण (observations = प्रत्यक्षीकरण) अनुमान और

उपमान पर निर्भर है और इसमें अन्वय व्यतिरेक (Method of agreement and difference) से कारण कार्य का सम्बन्ध स्थापित किया जाता है। धर्म का तात्विक नियम भी जो प्रश्न (5-घ) के उत्तर में लिखा जा चुका है, परीक्षा, निरीक्षण, अनुमान और उपमान से सिद्ध होता है, और अन्वय व्यतिरेक के न्याय (विधि) पर निर्भर है। कोई भी व्यक्ति यदि अपने चित्त की अवस्था का ठीक ठीक वर्णन बिना घटाये बढ़ाये लिखता जाय और जो जो घटनाएँ तथा दुःख सामने आता जाय उसे भी लेखबद्ध करता जाय, तो रसायन शास्त्र [Chemistry] और शारीर शास्त्र [Physiology] के साधन को बर्ताव में लावे तो धर्म के तात्विक नियम की सचाई [सत्यता] का उपासक अपने आप होना पड़ेगा।

उद्देश्य—विज्ञान शास्त्र और धर्म के बर्ताव में इतना भेद है कि विज्ञान शास्त्र तो बाह्य पदार्थों पर परीक्षा और निरीक्षण करेगा जो प्रायः सुगम है, और धर्म आध्यात्मिक तथा आभ्यन्तर अवस्थाओं पर परीक्षा और निरीक्षण करेगा जो बहुधा बहुत कठिन है।

विज्ञान शास्त्र का उद्देश है अनेकता में एकता को खोजना [To discover unity in variety] और संसार में एकता को प्रकट करना। जैसे वृक्ष से गिरते हुए सेब में और पृथ्वी के चहुँ ओर घूमते हुए चंद्र में एक ही नियम [गुरुत्वाकर्षण] का पता लगाना, और विकासवाद के द्वारा छोटे से छोटे वनस्पति के बीज से लेकर मनुष्य तक की एकता का संबंध और पहुँच दिखलाना। और धर्म का उद्देश भी [वरन् स्वयं धर्म] यही है कि बाह्य भेद विरोध में मेल और एकता बल्कि सारे संसार में एकता और अभेद का देखना और बर्तना।

भेद दोनों में इतना है कि विज्ञान शास्त्र बुद्धि और विद्या के द्वारा एकता का रंग दिखाता है और धर्म आचरण [व्यवहार] तथा अनुभव द्वारा अभेद में गोते दिलाता है।

उधर अनेष्ट हैकल, पॉल कैरस, रूमेनेज़ आदि आधुनिक पश्चिम के विज्ञानशास्त्री बाह्य जगत् में एकता ही एकता पुकारते हैं और इधर उपनिषद्, ताउज़िम [Taosim] और तसव्वुफ [Sufism] आदि प्राचीन धर्म एकता ही एकता हमारे रोम रोम में उतारते हैं।

विज्ञानशास्त्र अधिकतर प्रत्यक्ष प्रमाण पर चलता है। धर्म भी यदि साक्षात्कार पर निर्भर न हो तो धर्म ही नहीं वरन् सुनी सुनाई कहानी है, या पक्षपात है।

पर भेद इतना है कि विज्ञानशास्त्र चूंकि नामरूप से अधिक संबंध रखता है, अतः बाह्य इन्द्रियों की सहायता की आवश्यकता है, और धर्म चूंकि आत्मसत्ता (Substance) को सीधे सीधे अनुभव में लाता है, इस लिये उस अन्तर्दृष्टि को वर्तता है जो बाह्य नेत्रों का नेत्र [ज्योति] है। आजकल के मनोविज्ञान शास्त्र (Psychology) के शब्दों में धर्म हृदय और अन्तःकरण (Ganglionic Centres) को प्रकाशित करता है।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!