भारतवर्ष की वर्तमान आवश्यकतायें।
राम की कुटी की खिड़की के बाहर कुमारी (पवित्र) बर्फ के सुन्दर टुकड़े यद्यपि बहुत वेग से गिर रहे हैं, तथापि उनकी शोभा बहुत अपूर्व है और सब पहाड़ बिलकुल 'शुभ्रता' हो रहा है, अर्थात् शुद्ध पवित्र हो गया है। राम ने अभी 'विकासवाद' (Evolution) की सब से नई पुस्तक पढ़ कर रख दी है। नवीनता, प्रतिष्ठा किंवा लोकप्रियता प्राप्त करने की इच्छा बहुधा लोगों को सत्य के मार्ग से विमुख रखती है। इस तरह की इच्छा को एक तरफ़ छोड़ कर और मन को शान्त रख कर अर्थात् दुःख से निराश न होकर और आत्म प्रशंसा (Self-flattery) से फूल कर यदि हम भारतवर्ष की वर्तमान आवश्यकताओं के प्रश्न पर विचार करते हैं तो हमारे सामने उसकी ऐसी शोचनीय स्थिति उपस्थित होती है कि हम अवाक् रह जाते हैं। एक ही पवित्र देश में रहने से जो सम्बन्ध उत्पन्न होता है उसकी हम बिलकुल ही परवाह नहीं करते। और इसका तात्पर्य यह निकलता है कि हम में बन्धुत्व-का जातीय प्रेम का पूरा अभाव है, धार्मिक पन्थ के भेदों ने लोगों के मनुष्यत्व को ढक दिया है, राष्ट्रीयता की कल्पना को प्रायः लुप्त ही सा कर रक्खा है। अमेरिका में भी कदाचित् अधिक नहीं तो हिन्दुस्तान के बराबर तो अवश्य ही पन्थ और मार्ग हैं। परन्तु थोड़ से उन खफ़ती लोगों को छोड़ कर जिनकी जीविका उनके पन्थ
पर निर्भर है, बाकी सब लोगों में यह कभी नहीं देखा जाता है कि वह अपने देशबन्धुता के भाव को अपने धार्मिक पन्थ की कल्पना के भावों के आधीन रक्खें, और यह विचार करें कि अमुक मनुष्य कथोलिक है, मेथोडिस्ट है अथवा अमुक प्रेसबिटेरियन। निष्पक्षपात सत्य कहते हुए यह मानना पड़ेगा कि नाम मात्र का धर्माभिमान अमेरिका के लोगों में स्वाभाविक मनुष्यता किंवा प्राणिमात्र पर दया का लोप नहीं कर देता जैसा कि भारत में होता है। हिन्दुस्तान में मुसलमान लोगों को एक साथ और एकही जगह रहते हुए कई पीढ़ियां व्यतीत हो गईं, परन्तु हिन्दुस्तान में अपने पास रहनेवाले हिन्दुओं की अपेक्षा वह दक्षिण योरप के तुर्कों के साथ सहानुभूति दिखाते हैं। एक बालक जो हिन्दू माँबाप के रक्तमांस से बना है, और ज्योंही वह ईसाई होता है त्योंही वह रास्ते के कुत्तों से भी ज्यादा अनजान अथवा अपरिचित बन जाता है। मथुरा का एक कट्टर द्वैतवादी वैष्णव दक्षिण के एक द्वैतवादी वैष्णव के लाभ के लिये क्या नहीं करता परन्तु वही वैष्णव अपने ही शहर के एक अद्वैतवादी वेदान्ती का मानभंग करने के लिये क्या कसर रखता है? यह सारा दोष किसका है? सब पन्थों के पक्षपात और ऊपरी ज्ञान ही का यह दोष है, "एकही जगह रहने वाले शत्रु"—ऐसा जो वाक्य है वह वर्तमान स्थिति का यथार्थ रूप से वर्णन करता है। एकराष्ट्रीयता का विचार मात्र भी एक अर्थहीन शब्द हो गया है। इसका कारण क्या है? इसका वास्तविक कारण निर्जीव भूतकालीन विधान का अन्ध होकर समर्थन करना और धर्म के पवित्र नाम से जो विचित्र और बेढब अज्ञान की शिक्षा दी जाती है उसके पूर्णतया दास होना ही है। अर्थात् (तस्मात् शास्त्रं प्रमाणन्ते) प्रमाणपालन का चिकना
चुपड़ा नाम देकर आध्यात्मिक आत्मघात करना है। केवल उदार शिक्षा, यथार्थ ज्ञान, सप्रयोग परीक्षण, अथवा तत्व शास्त्रीय विचार की पद्धति के अभ्यास से यह असत्य कल्पना दूर हो सकती है, अन्यथा नहीं। आधुनिक शास्त्रशोधन से निकले हुए उत्तम और मनुष्य कर्तव्य सिखानेवाले तत्व जिस पंथ या धर्म में न हों उसे कदापि यह अधिकार नहीं है कि वह अपने भोले भक्तों पर उपजीविका करे। प्राचीन काल के बहुत से धार्मिक तत्व और प्रथायें राम के मत से तो केवल उस समय के जाने हुए शास्त्र के नियम और सिद्धान्त थे। परन्तु वाह रे दुर्दैव! वह तत्व जो पहले बड़े विरोध से माने गये, फिर इस उत्तेजना के साथ माने गये कि उनको जन्म देने वाली माता अर्थात् स्वतंत्र विचार और निदिध्यासन को बिलकुल ही भुला दिया गया, और बालकों को खिलाते खिलाते माता के प्राण लिये गये। धीरे धीरे वह तत्व यहां तक मान लिये गये कि, एक बालक में मनुष्य हूं यह समझने के पहले ही अपने को ईसाई, मुसलमान अथवा हिन्दू कहने लगा। जब धर्म पर चलनेवालों के आलस्य के कारण, लोगों और पुस्तकों के प्रमाणों और ग्रन्थों के विस्तार पर, धार्मिक तत्व और नियम माने जाने लगे, और जब स्वयम्-अभ्यास, नवीनता की खोज, चातुर्य और ध्यान इत्यादि, जिससे धर्म स्थापकों ने आध्यात्मिक और आधिभौतिक प्रकृति और उसके नियमों का दृढ़ता के साथ अभ्यास किया था, लोप होने लगे, तब सृष्टि के नियमानुसार धर्म की अवनति आरम्भ हो गई। धीरे धीरे ईसा मसीह के पहाड़ी उपदेश अथवा वैदिक यज्ञों के असली उद्देश्यों को तिलांजली दी जाने लगी और उनकी जगह केवल खाली नामों से भरी जाने लगी, और लोगों की निष्ठा इन्हीं
पर अधिक बढ़ने लगी। केवल इतना ही नहीं हुआ किन्तु निर्जीव कलेवर की पूजा करने की अभिलाषा से आत्मा बाहर निकाल कर फेंक दी गई। इस प्रकार ईसा, मुहम्मद, व्यास, शंकर इत्यादि सरीखे सत्यनिष्ठ महात्माओं को ईश्वर का प्रतिनिधि या पैगम्बर का नाम देकर कलंकित किया जाने लगा (क्योंकि पैगम्बर ईश्वरी तेज के हरण करने वाले को कहते हैं)। और प्रकृति के मूल ग्रन्थ के सामने रखकर उनके ग्रन्थों का अपमान किया जाने लगा, क्योंकि प्रकृति के मूल ग्रन्थ ही से उन लोगों ने इधर उधर का थोड़ा बहुत ले लिया था। राम के कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि लोकसंग्रह के लिये इन धार्मिक रीतियों का कोई उपयोग ही न था। किसी समय उनका उपयोग अवश्य था। इन रीतियों की आवश्यकता ठीक वैसी ही थी जैसे किसी बीज की बाढ़ के लिये यह आवश्यक है कि वह बीज एक छिलके से कुछ काल तक ढका रहे परन्तु उस नियमित काल के पश्चात् अर्थात् उस बीज के कुछ उगने पर यदि वह छिलका नहीं गिरेगा तो वह बढ़ते हुए दाने के लिये एक कारागार बन जायगा और उसकी बाढ़ को रोकेगा। हमें दाने का विशेष ध्यान रहना चाहिये क्योंकि छिलके को गिराने के लिये अर्थात् उन अकड़नेवाले दूसरों के विचारों को दूर करने के लिये और प्रकृति के ग्रन्थ को पढ़ने के लिये प्रत्येक मनुष्य को यह अनुभव करना आवश्यक है कि, एक पैगम्बर (भविष्यवक्ता) की शक्ति मेरा भी जन्मसिद्ध अधिकार है और उसमें कोई बात अलौकिक नहीं है। बहुधा लोगों के ध्यान में किसी मकान का ढांचा या नक्शा उस समय तक नहीं समाता, जब तक कि मकान
बनकर उनके सामने तैयार न हो जाय। इसी प्रकार कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके ध्यान में वर्तमान काल अथवा भूत काल से एक परमाणु भी आगे बढ़ने का विचार नहीं आता। परन्तु आशा की जाती है कि ऐसे लोगों की संख्या भारतवर्ष में बहुत न्यून होती जाती है। कार्यक्षम वेदान्त (Dynamic Vedant) का अभिप्राय जैसा राम ने समझा है, यह है कि लोगों को अनिश्चित उतार चढ़ाव के उस पार कर दे और उनके स्वाभाविक ऐश्वर्य का, ऐक्यता का, और जिससे वह मिलें उससे मित्रता का, अनुभव करा दे और स्वाभाविक भेदभावों से एक स्थायी व स्वाभाविक मेल प्राप्त करा दे। ऐसे वेदान्त की किस देश में आवश्यकता नहीं है? किन्तु भारतवासियों को इसकी अत्यन्त आवश्यकता है। भारतवर्ष की वर्तमान आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये, प्रेम और प्रकाश को फैलाने के लिये राम एक चैतन्य मठ (जीवन संस्था) खोलने के लिये प्रस्ताव करता है, जिसका विशेष विवरण छोड़ कर संक्षेप वर्णन यह है। स्थूल रूपरेखा। इस मठ में पहले भिन्न भिन्न धर्मों और दर्शनों का मुकाबिले (प्रतियोगिता) के साथ अध्ययन किया जायगा। [धर्म और दर्शन।] अभ्यासियों को प्राचीन और अर्वाचीन धर्मों और दर्शनों को न्यायकारी या साक्षी की भांति पक्षपातरहित होकर अध्ययन करने में सहायता दी जायगी। हर एक विद्यार्थी को अपनी योग्यता के अनुसार धार्मिक और दार्शनिक ग्रन्थों का अध्ययन करना पड़ेगा और यदि आवश्यकता होगी तो कोई अध्यापक अवश्य सहायता देगा। सायंकाल के समय सम्पूर्ण सभा के सन्मुख उस विद्यार्थी ने जो कुछ दिन भर में पढ़ा है, उसे सब वर्णन करना पड़ेगा
और उसे यह भी वर्णन करना पड़ेगा कि पढ़ने के समय उसके मन में क्या क्या विचार उत्पन्न हुए थे। इन संक्षिप्त आवेदनों को सुनकर हर रात्रि को राम की देख रेख में एक छान बीन करने वाली किन्तु आदरणीय वार्तालाप इस अभिप्राय से हुआ करेगी, कि जिन विषयों को मठ के भिन्न भिन्न सभासदों ने अध्ययन किया है, उनमें मेल प्रकाश किया जाय। इस प्रकार आपस में मेल और प्रेम बढ़ेगा और हर एक सभासद दूसरे सभासदों के मानसिक परिश्रम से लाभ प्राप्त करेगा। और उसके बदले में अपने मानसिक परिश्रम के फल को सब के सन्मुख उपस्थित करेगा। वर्तमान आवश्यकतानुसार इकट्ठे होकर एक साथ काम करने से मानसिक कार्य के प्रभावों का अधिक प्रचार होगा और सच्ची विद्या का विकाश होगा। नये प्रवेश हुये विद्यार्थियों को धर्म और दर्शन की महत्ता से, जिसकी मांग भारतवर्ष में बहुत है, मेल के साथ विद्याध्ययन पद्धति का स्वाद चखाया जायगा [तत्व शास्त्र।] और फिर विज्ञान की भिन्न भिन्न शाखायें अर्थात् वनस्पतिशास्त्र, प्राणिशास्त्र, विद्युत्शास्त्र, भूगर्भशास्त्र, रसायनशास्त्र, खगोलशास्त्र आदि भी उनके अध्ययन में प्रवेश की जायँगी। इन विद्याओं को उनके अभ्यासक्रम में प्रवेश कराते ही एक पुस्तकालय और रसायनशास्त्र की प्रयोगशाला, वेधशाला और इस प्रकार के बहुत से दूसरे भवन स्थापित हो जायेंगे। इस मठ में उपर्युक्त विद्याओं का प्रचार करने से यह अभिप्राय है कि थोड़ा सा प्रकट (चमकता हुआ) धार्मिक मिथ्याबोध दूर हो जाय। लोगों का परिश्रम और पराक्रम अधिक लाभदायक और बुद्धिमत्ता के कार्यों में लग जाय। इस मठ में विज्ञान का पठनपाठन धार्मिक उत्तेजना के साथ
होगा। विद्या, शिल्प तथा और और काम भी जो देखने में लौकिक प्रतीत होते हैं, यहां इस अभिप्राय से प्राप्त किये जायँगे कि वेदान्त की आत्मा का संगठन काम काज के साथ कर दिया जाय, अर्थात् अभ्यासयुक्त व्यावहारिक वेदान्त प्राप्त हो। कहा जाता है कि अगेसिज़, जो भौतिक शास्त्र का एक बड़ा भारी पंडित था, अपनी प्रयोगशाला को प्रार्थना मंदिर से कम पवित्र नहीं समझता था और न किसी भौतिक तत्व को एक नैतिक तत्व से कम समझता था। प्रकृति की भिन्न भिन्न वस्तुओं में एक ही व्यवस्था का पता लगाना उसके समीप परमात्मा के विचारों को पुनः पुनः विचार करना था। ठीक समय पाकर इस मठ में एक तीसरा भाग भी आरम्भ किया जायगा अर्थात् कला कौशल और शिल्प विद्या का भी प्रारम्भ किया जायगा। [कारीगरी और शिल्प विषय।] क्योंकि कला कौशल और शिल्प विद्या की आजकल भारतवर्ष में विशेष न्यूनता है। इस शोचनीय अवस्था के विषय में इस समय कहने की कुछ आवश्यकता नहीं मालूम होती। अमेरिका और यूरुप के कई बड़े बड़े विश्वविद्यालय जैसे यल, हार्वर्ड, स्टेनफोर्ड, शिकागो इत्यादि, लोगों के निज के विश्वविद्यालय हैं। बड़े शोक की बात है कि भारत के लोग अपनी शिक्षा के लिये सरकारी शिक्षा का मुँह निहार रहे हैं और अपनी आवश्यकताओं पर किंचित् मात्र भी ध्यान नहीं देते। इस चैतन्यमठ में, जिसका राम ने प्रस्ताव किया है, महा कट्टर और घोर नास्तिक पुस्तकों का भी तत्व-निर्णय के विचार से आदर और स्वागत किया जायगा। "सत्य, सम्पूर्ण सत्य और केवल अव्यवच्छिन्न सत्य" यही इस मठ का मुद्रा लेख रहेगा। ॐ! ॐ!! ॐ!!!