श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

हिमालय।

भाग 3 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 3 · अध्याय 7 / 11

हिमालय।

पवित्र गंगा राम की विरह को न सह सकी। मास भर न होने पाया था कि उसने राम को फिर अपने पास बुला लिया। सारी स्वाभाविक सभ्यता को भूल वह उसके ऊपर हर्ष के अश्रुकण बरसाने लगी। प्यारी गंगी! गंगोत्तरी में तुम्हारी दिन दिन बढ़ती छवि की छटा और पल पल के चंचल कलबल को कौन वर्णन कर सकता है! गोरे गोरे गिरि और भोले भोले देवदार—यही तुम्हारे साथी हैं। उनका सीधा सच्चा स्वभाव कैसा प्रशंसनीय है। वृक्ष तो विशेष कर पारसी कवि की प्रेयसी से ऊंचाई में बराबरी का दावा करते हैं। और उनकी मधुर मधुर मरुत् तो बस अपूर्व ही है। वह चित्त को उत्तेजित व उल्लसित और मन को दूना करती है। यहां पर यह कितना भली भांति मालूम होता है कि "परमात्मा पत्थरों में सोता है, लताओं में श्वास लेता है, पशुओं में चलता फिरता है और मनुष्यों में जीता जागता है।" यम्नोत्तरी से चलकर यात्री लोग गंगोत्तरी दस दिन से कम में नहीं पहुंचते। राम यम्नोत्तरी से जाने के तीसरे ही दिन वहां पहुंच गया। वह ऐसे रास्ते से गया जिस पर अभी तक किसी मैदान में रहने वाले ने पैर भी नहीं रक्खा था। पहाड़ी लोग इस मार्ग को छाया मार्ग कहते हैं। तीन रातें लगातार सुनसान जंगली गुफाओं में बिताईं। न कोई कुटि मिली और न झोपड़ी। यात्रा भर में कोई दो पैर वाला जीव भी न दीख पड़ा।

क्यों—यह मार्ग छाया मार्ग क्यों कहलाता है? प्रायः साल भर उसमें छाया ही छाया रहती है। वृक्षों की छाया? नहीं नहीं। भला ऐसी बेढब उंचाई और ऐसी शरद् वायु में वृक्षों का कौन काम? अधिकतर यह मार्ग मेघों ही से ढका रहता है। यम्नोत्तरी और गंगोत्तरी के आसपासवाले ग्रामों के गोपगण अपने अपने भेड़ों को चराते हुए हर साल दो तीन महीने काटते हैं। अकस्मात वे लोग बर्फ से ढके हुए बड़े बड़े गिरि शिखरों के पास मिले। बन्दर पुच्छ और हनुमान मुख के निकट ही उनसे भेट हुई थी। येही दोनों गिरिशृंग दोनों सरिता स्वसाओं के सोतों को मिलाते हैं। यों ही इस मार्ग का पता मिला। फूलों की वहां इतनी घनी उपज है कि सारा मार्ग का मार्ग एक ज़री का खेत सा दीख पड़ता है। नीले, पीले, बैंजनी-भांति भांति के फूल जंगल में भरे पड़े हैं। ढेर के ढेर कमल और बनफशे, गुलेलाला और गुल बहार—सौ सौ वर्ष के एक एक फूल; गगलधूप, ममीरा, मीठा तेलिया, सलद मिस्री आदि अनेक रुचिर रंगिनी लतायें; केसर, इत्रसू आदि अपार महा मधुर सुगन्ध से भरे पौधे, भेड़ गद्दे, तथा तुहिन शिखरों से भरे-गर्भोंवाले गर्बीले ब्रह्मकमल, इन सबों ने तो गिरिराज को मानो स्वर्ग लोक और मृत्युलोक के स्वामी का प्रमदवन ही सा बना दिया है। रंग रंग हे रंग! प्रेमसीमा मनहारी, भाषा परम विराट तुम्हारी है उपकारी। सुन्दरता का भेद भरा है जिसमें सारा, देखा प्रकृति परे अधिक अधिकार तुम्हारा। ये भाषा के रूप जगत् प्रभु को भाते हैं, वे ही उसके अमित हर्ष को दरसाते हैं।

"गोल चाँद का जोबन फूट फूट कर बाहर निकल रहा है।" चारों ओर सुन्दरता ही सुन्दरता बरस रही है। इधर देखो उधर मरुद्गण निडर होकर खेल रहे हैं। जो मिलता है उसीको वे चुम्बन करते हैं। चटकीले चमकीले फूलों को तो वे खूब ही चूमते हैं। जगह जगह पर गंध की धामनियां पवन के प्रवाह पर लहरें लेती हुई राम को ऐसी लग रही हैं जैसे मधुर मनोहर आनन्ददायक गान। मृदु और मधुर-प्रेमियों के विरह विलाप के बुन्दों सी मृदु और उनके मंजु मिलाप की मुसकयान सी मधुर-वाहित गंध की यहां बेहद बहुतायत है। इन बड़े बड़े विराट पहाड़ों की चोटियों पर ये सुन्दर सुन्दर खेत ऐसे बिछे हुए हैं जैसे कामदार क़ालीनें। देवताओ! यह भला तुम्हारी भोजन की मेज़ें हैं या नृत्य की भूमि? कल कल करते हुये नाले और दरारों और कगारों पर धड़ धड़ाती हुई नदियां—यह दोनों ही इन दिव्य दृश्यों में उपस्थित हैं। किन्हीं किन्हीं चोटियों पर तो दृष्टि को बिलकुल स्वतन्त्रता मिल जाती है। कुछ रोक टोक ही नहीं। बेखटके चारों ओर मनमानी दूर तक चली जाती है। न उसकी राह में कोई स्थूल शैल ही आ खड़ा होता है, और न उसके रास्ते को कोई रुष्ट मेघ ही रोकता है। कोई कोई शिखरवरों को तो गगनभेदी और घनच्छेदी होने का इतना अधिक उत्साह है कि वह रुकना भूल ही गये हैं और उच्च से उच्च गगन मंडलों में लुप्त ही से हुए जाते हैं। मानी महीधरों की महान् महिमा का वर्णन करते हुए उस मणिमय अरुणोदय की ओस को भूल जाना उचित न होगा, जिसने हमारे मार्ग की सुखमा को कुछ कम नहीं बढ़ाया था। अहा! देखो, वह कमलदल से लगा छोटा सा चंचल, चपल, सरल ओसकण मनुष्य के मन का कैसा

अच्छा चिन्ह है। छोटा है, चपल है परन्तु अहा! कितना पवित्र है। कैसा स्वच्छ और चमकीला है। वह सत्य का सूर्य वह अनादि दीप्ति का प्रभाव मानों उसी के हृदय में स्थित है। अरे मनुष्य! क्या तू वही छोटा सा जलकण, वही ज़रा सा बुन्द है या तू अनन्त आदीप्त है। सचमुच तू वह तनिक सा बुन्द नहीं। तू "ज्योतिषां ज्योतिः" प्रकाशों का भी प्रकाश है। सब वेद यही कहते हैं। राम यही कहता है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि यह तेरा ही तेज और तेरा ही प्रकाश है जो ऐसे ऐसे दिव्य देशों को ज्योति और जीवन से भर देता है। ऊपर नीचे, इधर उधर, चारों ओर तेरा ही तो प्रकाश और प्रतिमावान् मूर्ति विराजमान है। तू ही वह शक्ति है "जो किसी परिमाण की परवा नहीं करती परन्तु छोटे और बड़े सब से काम निकालती है।" तू ही उषःकाल को उसकी मुसकयान देता है और तू ही पाटल पुष्प को प्रभा प्रदान करता है। अर्ध रात्रि के छटा भरे तारे चमकीले, प्रात समय के ओस बिन्दु समुदाय छबीले। जो कुछ सुन्दर और स्वच्छ है अंश कहीं पर, है तेरा ही नाथ सभी प्रतिबिम्ब मनोहर। तारापति शुभ चन्द्र रात में स्वामी तू है, संध्या की द्युति ओस प्रात में स्वामी तू है। शोभा और प्रकाश यहां है जो कुछ भाया, तूने ही निर्माण किया अरु जगत् सजाया। है व्यापक तव तेज वस्तुएँ जग की सारी, कहती हैं चुप चाप "यहां है विश्वबिहारी"। उसी बाल कृष्ण (गोकुलचन्द्र) की यह लत थी कि वह

गोपियों का मक्खन चुरा चुरा कर मन माना खाकर बाक़ी बचा कुचा उन्हीं के बछड़ों और बकरियों के मुंह में लपेट देता था। वे बेचारे जीव जन्तु ही उन अज्ञान गँवारियों के धौल धप्पे सहते और गाली खाते थे। पर यह नन्हा सा प्यारा चोर तो हर बार सफाचट बच जाता था। वही आत्माओं की आत्मा जो चाहती है वह करती है। वास्तव में यह सब कुछ वही मायामय, वही नटवर, वही राम करवा रहा है। परन्तु उसकी माया भी बड़ी अद्भुत है। वही इस मिथ्या आत्मा को अर्थात् इस असत्य अहंकार को ज़ाहिरा ज़िम्मेदारी में फंसा देता है, इस माखनचोर कृष्ण को भोला कहो, चाहे नटखट, पर हे पाठक! तुम भी वही हो। बाज़ीगर हो चाहे जादूगर हो, राम तुम्हारी भी आत्मा है। जो कुछ है वह तुम्हीं में है। एक और अनेक तुम्हीं सबको भरते हो। इस अकेले पीले शरीर रूपी छोटे से द्वीप ही में तुम बँधे हुये नहीं हो। नहीं, नहीं, तुम किसी के बंधु नहीं हुए हो। वह अभियुक्त अहंकार, वह असत्य आत्मा, तुम्हारी आत्मा नहीं है। तुम एक क्षुद्र बिन्दु नहीं हो। तुम अखंड अगाध महासागर हो। (बाहरी रूप से मोहित होने वाले नेत्रों के लिये) राम का वर्तमान निवासस्थान एक सुघड़ आनन्ददायक पहाड़ी कुटी है। उसके आस पास एक हरी भरी और सुनसान प्राकृतिक वाटिका है। उससे गंगा का एक सुरम्य दृश्य दिखाई देता है। नारायण और तुलाराम दूसरी जगह रहते हैं। यहां पर रामबूटी बहुत उत्पन्न होती है। गौरया और इतर पक्षी दिन भर मन माना शब्द उच्चारण करते हैं। वायु यहां की निरोगी है। गंगी का गायन और पक्षियों का गूंजना यहां पर सर्वदा स्वर्गीय उत्सव सा बनाये रखते हैं। यहां फिर गंगा

की घाटी बहुत विस्तीर्ण है। मानो गंगा एक बड़े मैदान में बहती है, परन्तु प्रवाह बहुत ज़ोर का है। तथापि राम ने कई बार उसे मध्य कर पार किया है। केदार और बदरी ने बड़े प्रेम से अनेक वार राम बादशाह को आमन्त्रित किया है। परन्तु प्यारी गंगी को विरह की कल्पना मात्र से बहुत दुःख होता है, और उसका मुखचन्द्र म्लान पड़ जाता है। राम उसे अप्रसन्न नहीं करना चाहता और न उसे उदास होते हुए देख सकता है। ॐ! ॐ!! ॐ!!!