गृहस्थ में आत्मज्ञान — भाग 2
क्या संसार के सभी मनुष्यों ने अपने-अपने जीवन में इस तथ्य को आधिक्य रूप में अथवा सूक्ष्म रूप में नहीं देखा है ? जीवन में ऐसा भी समय आता है जब हम अपने प्रेम की वस्तु में, अनुराग के प्रतीक में, अपने प्रेमी के चेहरे की विकृतियों पर ध्यान नहीं देते हैं, उसके मुख-मंडल की कुरूपताओं को देखते ही नहीं, चेहरे की झुर्रियों पर, बाह्य आकारों तथा मुरझाएपन को देखने का कष्ट ही नहीं करते हैं । उस समय हम अपने अनुराग के प्रतीक की अंतःस्थ आत्मा, अंतःस्थ प्रेम, अंतःस्थ हृदय को प्यार करते हैं । हम आंतरिक शुचिता, आंतरिक प्रेम पर ही अपने को न्योछावर करते हैं ।
क्या सभी लोगों ने इसका निरीक्षण नहीं किया है, इसका अनुभव नहीं किया है ? क्या सभी लोगों ने यह नहीं देखा है कि अपने अनुराग के प्रतीक में हम कभी भी शरीर के दोष या बाहरी अवगुणों पर ध्यान नहीं देते हैं । हम उसमें केवल सौंदर्य के ही दर्शन करते हैं, कुरूपता को दृष्टि में आने ही नहीं देते हैं । यदि हमारे प्रेम, हमारे अनुराग के पदार्थ में सच्चा प्यार है तो हमारा हृदय द्रवित हो जाता है और हृदय उसकी ओर आकर्षित होता रहता है । तदुपरांत, ऐसा समय आता है कि हमारे प्रेम का केंद्र उसके स्थूल, बाह्य रंग, रूप, आकृति और चिह्नों की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म और अधिक विशुद्ध हो जाता है ।
अब यहां से आगे के नए चरण का आरंभ होता है । हम आगे और आगे बढ़ते हैं । यहां हम बाहरी आकारों से, स्थूल शरीरों से आगे बढ़कर, विशुद्ध भावना-क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं । अब इसके आगे एक उच्चतर चरण प्रारंभ होता है । यहां हमारे प्रेम, हमारे अनुराग का केंद्र हमारे प्रेम के पदार्थ की भावनाओं, मनोवृत्तियों, मन की विशुद्धता या उसके आकार में नहीं रह जाता है, परंतु हम उसमें ईश्वर, अंतःस्था दिव्यात्मा की अनुभूति करते हैं । उसे प्यार करते हुए, हम उसमें सत्यात्मा तथा अंतःस्थ के देवत्व का दर्शन करते हैं ।
जब एक बार यह स्थिति आ जाती है, जब इस संसार के पदार्थ छविमात्र प्रतीत होने लगते हैं, वे केवल बीजाक्षर मालूम पड़ने लगते हैं, तब हम पदार्थों को नहीं देखते, वरन् उन पदार्थों के पीछे अनिर्वचनीय शक्ति को देखते हैं, जब हमारी अपनी दृष्टि, जो पहले इस पदार्थ या उस पदार्थ पर संकुचित होकर बनी रहती थी, अब हमें इसके योग्य बना देती है कि हम उनमें दिव्यात्मा अथवा सत्यात्मा के दर्शन करें । जब यह स्थिति आ जाती है तो किसी भी मनुष्य के लिए एकता, संपूर्ण विश्व के साथ तादात्म्य का साक्षात्कार करना अत्यंत आसान हो जाता है । यही 'ईसा-स्थिति' है ।
कुछ समय तक इस 'ईसा-स्थिति' में अवस्थित रहने के उपरांत इससे भी आगे की स्थिति में आप उस समय पदार्पण करेंगे जब आप पूर्णरूपेण दिव्यता में समाहित हो जाएंगे, जब आप तुरीयावस्था में लीन हो जाएंगे, जो वस्तुतः एकात्मता और पूर्ण विलय की स्थिति है, जो संपूर्ण लीन की अवस्था है । यही ईश्वर की स्थिति है, ईश्वर की अवस्था है । इसे हम निर्वाण या समाधि की स्थिति भी कहते हैं । यह वह दशा है जिसमें मन में कोई कंपन नहीं होता, कोई प्रतिरोध नहीं होता, कोई विकार नहीं होता ।
हम किस प्रकार अपने सांसारिक संबंधों और निकटताओं को धीरे-धीरे, क्रमशः इस ईसा-स्थिति, निर्वाण-स्थिति, समाधि-स्थिति का साक्षात्कार करने में सहायक बना सकते हैं ?
भारत में कुछ लोग ऐसे हैं जो ईश्वर की उसी प्रकार पूजा करते हैं जिस प्रकार रोमन कैथोलिक करते हैं । वे ईश्वर की उपासना मूर्तियों और प्रतिमाओं के माध्यम से करते है । ईश्वर की मूर्तियों, राम और कृष्ण की प्रतिमाओं की पूजा की जाती है । राम और कृष्ण भारत के ईसा मसीह हैं ।
भारत में एक वृद्ध महिला एक संत के पास आई । उसने उनसे निवेदन किया कि भगवत-दर्शन के लिए क्या अपना घर और अपना परिवार छोड़कर वृंदावन में शेष जीवन व्यतीत करना उचित होगा । वृंदावन, जहां कृष्ण भगवान का जन्म हुआ था । क्या उसके लिए अपने पारिवारिक बंधनों का परित्याग करना, प्रत्येक के साथ और सब लोगों के साथ अपने संबंधों का विच्छेदन करना और भारत के परम तीर्थ, सुंदरतम नगर वृंदावन, ( जिसे हम भारत का यूरेशलम कह सकते हैं ) में निवास करना उचित है ?
उस वृद्ध महिला के साथ उसका पोता भी संत के पास गया था । संत ने उत्तर दिया—''कृपया ध्यान दें, कृपया विचार करें । वह क्या है जो आपके पोते के नेत्रों के माध्यम से आपकी आंखों में देखता है ? वह कौन-सी शक्ति, कौन-सी ऊर्जा, कैसी दिव्यता है जो इस बालक के शरीर के हर रोम-रोम से आपकी ओर निहार रही है ?'' महिला ने उत्तर दिया—''वह तो ईश्वर ही है । इस छोटे से, प्यारे-प्यारे बालक में न तो कोई लालच है, न कोई दुष्टता का चिह्न । यह प्यारा छोटा-सा बालक बिल्कुल निर्दोष है, नितांत विशुद्ध है । जब यह चिल्लाता है तो इसकी बाल-सुलभ आवाज में ईश्वर की ही वाणी प्रकट होती है, अन्य किसी की नहीं ।''
इस पर संत ने फिर कहा—''जब आप वृंदावन जाएंगी तो कृष्ण की केवल एक मूर्ति से ही प्रेम करेंगी । तो क्या इस बालक का शरीर उतना अच्छा, उतना आकर्षक नहीं है जितनी कृष्ण की वह प्रतिमा जिसका आप भारत के महान तीर्थस्थल वृंदावन में दर्शन किया करेंगी ?'' इस उत्तर पर वह वृद्ध महिला कुछ अचंभित हुई ।
कुछ समय तक विचार करने के बाद, मनन करने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुंची कि वह इस बालक को कृष्ण का अवतार मानकर, इस बालक के शरीर द्वारा, भगवान कृष्ण की भलीभांति पूजा-अर्चना कर सकती है । ईश्वर की तो बस वही दृष्टि है जो बालक के नेत्रों द्वारा देखती है । वह ईश्वर ही है जो बालक को यह शक्ति प्रदान करता है, वह ईश्वर ही है जो बालक के शरीर के रोम-रोम से कार्य करता है । वह दिव्यता ही है ।
संत के निर्देशों के अनुसार उस वृद्ध महिला को यह नहीं मानना चाहिए कि वह बालक केवल उसका अपना पोता मात्र है । उसकी दृष्टि इस प्रकार की नहीं होनी चाहिए कि वह बालक उससे किसी प्रकार से संबंधित है । उसे तो बालक को ईश्वर ही मानना चाहिए और इस प्रकार सभी पारिवारिक तथा सांसारिक बंधनों का परित्याग कर देना चाहिए । यदि कोई बंधन है, कोई संबंध है तो वह है परमेश्वरत्व का । यही त्याग का मार्ग है ।
त्याग का अर्थ वैराग्य नहीं होता । त्याग का तात्पर्य प्रत्येक वस्तु को पवित्र बनाना होता है । बालक का परित्याग करने का अर्थ यह नहीं होता कि बालक के साथ सभी प्रकार के संबंधों का विच्छेदन कर दिया जाए । इसका तात्पर्य यह है कि वह बालक, जो उसका पोता है, वस्तुतः ईश्वर है ।
वेदांत के अनुसार त्याग यही है कि हर एक में, सभी में दिव्यता का साक्षात्कार किया जाए । वेदांत आपसे यह अनुरोध कदापि नहीं करता है कि आप अपनी पत्नी या अपने पति तथा अन्य संबंधियों को छोड़ दें । वेदांत कहता है—''पत्नी को इसलिए छोड़ दीजिए, क्योंकि पत्नी के रूप में वह आपसे संबंधित है । पत्नी का पत्नी के रूप में परित्याग कर दीजिए । लेकिन उसके अंतःस्थ में, उसके भीतर वास्तविक आत्मा, वास्तविक दिव्यता का साक्षात्कार कीजिए । शत्रु का शत्रु के रूप में परित्याग कर दीजिए, शत्रु में केवल ईश्वर का ही दर्शन कीजिए । इसी प्रकार मित्र का मित्र के रूप में त्याग कर दीजिए, उस मित्र में ईश्वरत्व, देवत्व का साक्षात्कार कीजिए ।''
स्वार्थमय और व्यक्तिगत बंधनों को त्याग दीजिए, प्रत्येक में, सभी में दिव्यता का ही दर्शन कीजिए, हर एक में और सभी में ईश्वर ही ईश्वर देखिए । यही वह सार-तत्व है जिसका पालन करने की, जिसे अपने जीवन में उतारने की आज्ञा हिंदू शास्त्र प्रत्येक पति और पत्नी को देता है । इन शास्त्रों के निर्देशों को राम ने अपने पारिवारिक जीवन में व्यावहारिक रूप से उतारा, उनका अनुसरण किया ।
राम की पत्नी प्रतिदिन प्रातः उठती थी और जब राम ध्यान में निमग्न होते थे, जब राम ईश्वरत्व का अनुभव कर रहे होते थे, दिव्यत्व का साक्षात्कार कर रहे होते थे, जब राम ईश्वर में पूर्णतः खो जाया करते थे, जब राम शरीर या मन से परे, उनसे ऊपर उठ जाया करते थे, तब उनकी पत्नी उनके पास आती थीं और जिस प्रकार रोमन कैथोलिक प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना करते हैं, उसी प्रकार उनकी पत्नी भी उनके निकट आतीं और राम की ओर निहारतीं, पर इस प्रक्रिया में वह राम के शरीर की पूर्ण उपेक्षा कर दिया करती थीं । इस अवस्था में राम अपने शरीर की उपेक्षा कर दिया करते थे । वे भौतिकता से कहीं ऊपर उठ जाया करते थे और ईश्वरत्व से एकाकार हो जाया करते थे ।
ऐसे समय, राम की पत्नी राम में केवल दिव्यता, ईश्वर का दर्शन किया करती थीं, उसकी दृष्टि में और कोई बात ठहरती ही नहीं थी । यद्यपि राम की पत्नी अधिक शिक्षित नहीं थीं, तो भी इससे क्या होता है ? वह तो राम के शरीर से थोड़ी दूर बैठकर राम के ललाट पर अपनी निगाह गड़ा लिया करतीं और इस शरीर की नश्वरता पर विचार किया करतीं । फिर वे 'ॐ-ॐ' का उच्चारण करतीं और राम के शरीर को अपने मस्तिष्क के नेत्रों के सम्मुख इस विधि से रखतीं कि सभी अन्य विचार रुक जाते, अन्य विचार मन में उठते ही नहीं थे और उनके, स्वयं के शरीर का विचार भी लुप्त हो जाया करता था ।
उनकी अनुभूति ऐसी होती थी कि मानो वे स्वयं राम के शरीर में समाहित हो गई हैं, राम के शरीर में बदल गई हैं । परंतु आत्मा के बारे में क्या हुआ ? वे ऐसी स्थिति में यह अनुभव करती थीं, यह साक्षात्कार करती थीं कि उनकी स्वयं की आत्मा ही राम की आत्मा है । उनकी ऐसी अनुभूति होती थी, उनको ऐसा साक्षात्कार होता था कि वह राम नहीं हैं जो ध्यानावस्था में निमग्न है, ईश-चेतना में खोए हैं, वरन् वह तो स्वयं वही वहां विराजमान हैं जो ईश्वर-चेतना में अपने को समाहित किए हुए हैं ।
राम का ध्यान, राम की पत्नी का ध्यान था । उसे ऐसी अनुभूति होती थी कि वह स्वयं संपूर्ण ब्रह्मांड से एकाकार हैं । वह अनुभव किया करती थीं और साक्षात्कार करती रहती थीं कि वह तो संपूर्ण विश्व की आत्मा हैं, सत्यात्मा हैं । इस प्रकार राम की पत्नी राम की सहायक बन जाया करती थीं और राम उनका सहायक ।
प्रश्न यह है कि किस प्रकार पत्नी पति की सहायक हो सकती है ? जब पत्नी अपने पति को ईश्वर के रूप में स्वीकार कर लेती है, जब इस प्रकार के विचार तथा भावावेश उसके पति को साक्षात ब्रह्म बना देते हैं तो उसकी मानसिक ऊर्जा, उसकी शक्ति इस दिशा में संचालित होने पर यह स्वाभाविक ही हो जाता है कि उसका पति उसके लिए पूर्ण ईश्वर ही बन जाए । इस विधि से क्या पति को यह प्रेरणा और सहायता नहीं मिलेगी कि वह ईश्वर के रूप में अपनी वास्तविक आत्मा का साक्षात्कार करे ? ऐसा अवश्य होगा । इसमें संदेह नहीं ।
सभी ईसाई वैज्ञानिक अपने व्यक्तिगत अनुभवों से जानते हैं कि हम किसी भी व्यक्ति को उस प्रकार का अनुभव करा सकते हैं जिस प्रकार का अनुभव हम उसे कराना चाहते हैं ।
कल्पना कीजिए कि पत्नी ऐसे दिव्य विचारों का प्रसारण कर रही है, ऐसे विचारों को निर्गत कर रही है कि उसका पति ईश्वर है । इस विचार का प्रसारण उसके पति को ईश्वर के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करने में सहायक होता है । और जब उसका पति ईश्वर के साथ अपनी अभेदता का साक्षात्कार लेता है तो स्वाभाविक है कि उसकी पत्नी भी लाभान्वित होगी ।
वाह ! यह कैसा अनुपम आध्यात्मिक संगम है ! कितना अद्वितीय मिलन है । जरा कल्पना कीजिए । दोनों एक-दूसरे की सहायता करते हैं और अंततः दोनों ही पारस्परिक रूप से लाभान्वित होते हैं । इस प्रकार के आध्यात्मिक मिलन पर आधारित विवाह अथवा प्रेम, संसार में सबसे अधिक आनंददायक होता है । जिन वैवाहिक संबंधों का आधार मुखाकृति के रूप-रंग, मुख की छवि की रूप रेखा, व्यक्तिगत सौंदर्य, शरीर की बनावट और आकृति होता है, उनका अंत दुःखद होता है, निराशा ही निराशा हाथ में लगती है । ऐसे विवाह अंततः हृदय-विदारक होते हैं और उनसे चिंता तथा कष्टादि ही उत्पन्न होते हैं ।
जो विवाह, जो परिणय, आध्यात्मिक मिलन पर आधारित रहता है, जिसमें चेहरे के रंग या मुखड़े अथवा आकृति की सुंदरता पर ध्यान नहीं दिया जाता है, वरन् जिसमें अंतःस्थ दिव्यता का ही दिग्दर्शन होता है, वही विवाह वस्तुतः सुखद और सुरक्षित है, चिरस्थाई भी । ऐसे परिणय में ही आनंद और हर्ष का वातावरण बना रहता है ।
एक महिला एक संत के पास आई और उनसे प्रश्न किया—''कुछ महीने पूर्व ही मेरे पति का देहावसान हुआ था । मैं उनकी आत्मा की शांति के लिए क्या करूं ?'' इन्हीं संत के पास एक-दूसरे सज्जन आए और कहने लगे कि मैं तो आत्म-हत्या करने वाला हूं, क्योंकि मेरा एक ही बच्चा था जो अब मर गया है । मैं उस बच्चे का बिछोह सहन नहीं कर सकता हूं । एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि मेरी पत्नी की मृत्यु हो गई है और अब मैं सोचता हूं कि उसके बिना मेरा जीवन ही निरर्थक है । अब, इस संत ने इन सभी प्रश्नों का क्या उत्तर दिया ?
वह महिला अत्यंत दुःखी और निराश थी । वह अपने पति के उद्धार के बारे में अत्यधिक चिंतित थी । संत ने उससे कहा—''आप अपने पति का उद्धार कर सकती हैं, आप निराश न हों । बस, मेरी सलाह मानिए, उस पर अमल कीजिए । दिन में जब कभी भी आप निराशा का अनुभव करें अथवा जब आपके मन में अपने पति का विचार आने लगे तो तुरंत ही बैठ जाइए, अपने नेत्र बंद कर लीजिए और अपने मन के सामने अपने पति के शरीर की कल्पना कीजिए । आप तो जानती ही हैं कि ऐसा करने से आपके अनुराग और प्रेम का पदार्थ आपके मन के सामने तुरंत ही उपस्थित हो जाता है ।
जब आपके मन के सामने अपने पति का चित्र साकार हो जाए अथवा जब आप अपने मन की आंखों से अपने पति के शरीर को निहारने लगें तो कृपया दुःख प्रकट मत कीजिए, चिंतित मत होइए, रोइए-धोइए या चिल्लाइए नहीं । आपके रोने-धोने से, चिल्लाने से, आंसू बहाने से, विलाप करने से आप अपने पति को पार्थिव जगत के बंधनों में ही जकड़ देंगी । आप उन्हें सांसारिक मोह-ममता में बांध देंगी, फलस्वरूप आपका यह कार्य दूषित हो जाएगा और वे पतन के भागी बनेंगे ।
आपको अपने पति को नीचे नहीं घसीटना चाहिए । आपको उनकी अवनति का कारण नहीं बनना चाहिए और न ही उनकी प्रगति में बाधक बनना चाहिए । आप अपने पति के दूसरे संसार के बारे में सोच सकती हैं । चूंकि आपके नेत्र मुंदे हैं और मन के इन नेत्रों के सम्मुख आपके पति का चित्र सजीव है, इसलिए आपको सोचना चाहिए कि आपके पति मृत नहीं हैं, वरन् जीवित हैं, सजीव हैं । जब आपका यह विचार बन जाए, जब आप इस प्रकार आश्वस्त हो जाएं तो निरंतर अनुभव कीजिए, अनुभूति करते जाइए, इसका साक्षात्कार कीजिए कि आपके पति ईश्वर हैं । आप उनको बतलाइए, उनको उपदेश दीजिए और निरंतर उनसे कहते जाइए ।
यह विचार उनके सामने बारंबार रखिए कि '' आप ईश्वर हैं, आप दिव्यात्मा हैं, आप महेश्वर हैं, आपके चित्र में, आपके शरीर में आपकी आकृति में केवल दिव्यात्मा ही प्रकट हो रही है और केवल यही दिव्यात्मा मुझे दिखाई दे रही है ।''
''आप जानते हैं कि जब हम टेलीफोन का यंत्र उठाते हैं और उसे अपने कानों से लगाते हैं तो हम कुछ न कुछ सुनते हैं । हम यह जानते हैं कि जिस आवाज को हम सुन रहे हैं वह लोहे के बने टेलीफोन यंत्र की नहीं है, वरन् सुदूर बैठे, दूसरी ओर से अपने मित्र की वाणी की है । इसी प्रकार, जब आप अपने नेत्रों के सम्मुख अपने स्वर्गीय पति के चित्र की कल्पना साकार करती हैं तो इस बात का साक्षात्कार कीजिए कि आपके उस मानसिक चित्र के पीछे दिव्यात्मा ही दिखाई दे रही है । आप अपने पति को बतलाइए कि 'आप दिव्यात्मा हैं, आप ईश्वर हैं ।' इस पद्धति से आप अपने स्वर्गीय पति का उद्धार कर सकती हैं, उनकी आत्मा को शांति प्रदान कर सकती हैं ।'
जब ऐसा है कि हम अपने मृत, परलोकगामी मित्रों का उद्धार कर सकते हैं, उनका उन्नयन कर सकते हैं, उनकी सहायता कर सकते हैं तो इसमें किंचित भी संदेह नहीं है कि हम इसी पद्धति से अपने जीवित मित्रों की भी उन्नति कर सकते हैं, उनका भी उद्धार कर सकते हैं, उनकी भी सहायता कर सकते हैं ।
अब जब पति और पत्नी इस तरह रहते हैं तो संपूर्ण मिलन सीधा-सादा आध्यात्मिक उन्नयन है, एक-दूसरे के आनंद का स्रोत है । आप लोग कहा करते हैं कि हर जगह पति अपनी पत्नी के आनंद, सुख की अभिवृद्धि करना चाहता है और वह अपनी पत्नी पर सबकुछ न्योछावर करना चाहता है, जिससे उसे खुशी हो । अज्ञान के कारण लोग समझते हैं कि उन्होंने सही मार्ग अपना लिया है । वे सोचते हैं कि सही रास्ता एक-दूसरे की इंद्रियजनित रुचियों की संपूर्ति करना है और इस प्रकार एक-दूसरे को आनंद प्रदान करना है । पर ऐसा नहीं होता । इन तरीकों से आप न केवल अपनी, वरन दूसरों की भी अवनति करते हैं ।
प्रकृति का विधान है कि जो वस्तु मुझे आनंद देती है वह आपको भी अवश्य आनंद देती है, जो मेरे लिए लाभप्रद है वह आपके लिए भी अवश्य लाभप्रद है, यदि मैं समुन्नति करता हूं तो आप भी समुन्नति करते हैं, मेरा उन्नयन आपका उन्नयन है, बिना संसार को बीमार किए मैं अपने आपको बीमार नहीं कर सकता, अपने शरीर को स्वस्थ बनाकर मैं संपूर्ण विश्व को स्वस्थ बनाए रख सकता हूं । वास्तव में क्रिया और प्रतिक्रिया समान और विपरीत होती है ।
यदि मैं वास्तविक रूप से आपको प्रसन्न करता हूं तो मुझे अवश्यमेव प्रसन्न होना चाहिए । लोगों की ऐसी धारणा है कि एक-दूसरे की इंद्रियजनित अभिरुचियों की पूर्ति से आनंद मिलता है । निश्चित रूप से ऐसा नहीं होता है । इससे तो घृणा तथा हृदय-विदारक चिंताओं का ही जन्म होता है ।
ऐसे कृत्यों से दोनों को दुःख उठाना पड़ता है । दोनों अनुभव करते हैं कि वे दुःखी हैं, अप्रसन्न हैं, हत-भाग्य हैं । वे चिंता से और भय से ग्रस्त रहते हैं ।
वस्तुस्थिति यह है कि एक-दूसरे को सुखी बनाने के तरीके का ज्ञान न होने के कारण विभिन्न भय, क्रोध आदि पैदा होते हैं । यदि आप एक-दूसरे को सुखी बनाना चाहते हैं तो आपको अपने क्षुद्र स्वार्थमय अहम् की परिधि से आगे समुन्नति करनी होगी । आपको अपने सहयोगी को, मित्र को वास्तविक भावनाओं की अनुभूति करानी होगी । आपको अपनी पत्नी को प्रगाढ़ शक्ति देनी होगी । आपकी प्रगाढ़ शक्ति वहां अवश्य परिलक्षित होनी चाहिए । आपको एक-दूसरे को ज्ञान देना होगा । इस प्रकार आप अपने सहयोगियों को सुखी बना सकेंगे और अंततः आप स्वयं अपने आपको प्रसन्न रख सकेंगे ।
यदि आप वास्तव में शुभचिंतक हैं तो आपको उन वस्तुओं को देना होगा जो आनंद का वास्तविक स्रोत हैं और वे वस्तुएं हैं—ज्ञान और आध्यात्मिक स्वतंत्रता । इसका ज्ञान अपने मित्रों को कराइए । यह प्रत्येक पति का कर्त्तव्य है कि वह अपनी पत्नी को दीक्षित करे और प्रत्येक पत्नी का कर्त्तव्य है कि वह अपने पति को शिक्षित करे ।
एक-दूसरे को आनंदित करने का यह एक मार्ग है जो पति अपनी पत्नी का प्राध्यापक नहीं है अथवा जिस पत्नी के माध्यम से पति समुन्नति नहीं प्राप्त करता है और शिक्षित नहीं होता है, जिस पत्नी को अपने पति से आध्यात्मिक स्वाधीनता तथा ज्ञान प्राप्त नहीं होता, वह पति या पत्नी वस्तुतः एक-दूसरे के लिए अवांछनीय हैं । पत्नी पापी है और पति भी उतना ही अपराधी और पापी है यदि वह अपनी पत्नी के लिए अपने घर को विश्वविद्यालय का रूप नहीं देता है ।
जहां तक ईसा मसीह के अपौरुषेय गर्भाधान का प्रश्न है, उस संदर्भ में राम की व्याख्या इस प्रकार है—ईसा की मां 'मेरी' थीं । वे अत्यंत विशुद्ध, पवित्र और ईश्वर-प्रेमी थीं । वे ऐसी महिला थीं जिन्होंने कुछ सीमा तक ईश्वर का साक्षात्कार प्राप्त कर लिया था । वे ईश्वर-दृष्टा थीं । वे ईश्वरत्व के साथ एकाकार थीं । एक व्यक्ति 'जकारिया' भी था । जकारिया को 'जोसेफ' भी कहते हैं । यह वह व्यक्ति था जिसने बाद में 'मेरी' की अस्मिता की रक्षा के लिए उसका साथ दिया था । यदि आप इस व्यक्ति को जकारिया के नाम से नहीं पुकारना चाहते हैं तो उसे जोसेफ का नाम दे दीजिए ।
परंतु यह व्यक्ति जोसेफ अत्यंत विशुद्ध, पवित्र, पुण्यात्मा था । इसने सभी में दिव्यता का साक्षात्कार किया था । इसने ईश्वर का साक्षात्कार किया था । 'मेरी' और 'जोसेफ', दोनों ही वयस्क थे, नवयुवक थे ।