गृहस्थ में आत्मज्ञान — भाग 3
एक बार ऐसा हुआ कि जब अपने विचारों में 'मेरी' बिल्कुल तल्लीन थीं—और पति अर्थात 'जोसेफ' भी तल्लीन था, ये दोनों ही समाहित और निमग्न अवस्था में डूबे थे तो ऐसे किसी समय में 'मेरी' ने गर्भधारण किया । बाद में 'मेरी' बिल्कुल भूल गई कि उसके साथ कभी कोई संभोग या इसी प्रकार की अन्य कोई घटना घटित हुई थी ।
प्रायः यह देखा जाता है कि रात में जब बालक जागता है तो उसे उस समय दूध या कोई मिठाई खाने को दे दी जाती है । पर अगले दिन प्रातःकाल जब उससे पूछा जाता है कि पिछली रात में उसने दूध पिया या मिठाई खाई तो वह अक्सर यही उत्तर देता है कि—''नहीं, नहीं, मुझे खाने को कुछ भी नहीं मिला । आपने मुझे कोई भी चीज नहीं दी । आपने यदि कुछ दिया भी होगा तो वह दीदी को दिया होगा ।''
तथ्य यही है कि बालक ने दूध पिया या मिठाई खाई थी, लेकिन प्रातः इस बात को वह बिल्कुल ही भूल गया । स्थिति यह थी कि रात में दूध पीते समय अथवा मिठाई खाते समय बालक महाचेतनातीत अवस्था में था, जहां मन कहीं अन्यत्र रहता है अथवा जैसा आप जानते हैं वह एक प्रकार की निद्रा-भ्रमण की स्थिति होती है ।
जिन लोगों को सोते-सोते चलने की बीमारी होती है, वे सोते-सोते अनेक विचित्र कार्य किया करते हैं, पर जब उनसे अगले दिन प्रातः उन कार्यों के बारे में पूछा जाता है, वे अपनी अनभिज्ञता बताते हैं और यह नहीं जानते कि रात में उन्होंने क्या-क्या किया था । इसी प्रकार ईसा के अपौरुषेय गर्भाधान के विषय में राम की व्याख्या है । जब 'मेरी' और 'जकारिया' या 'जोसेफ', दोनों ही महाचेतनातीत अवस्था में रहे होंगे, जब वे दिव्य चेतनावस्था या निद्रा-भ्रमण की विस्मृति की दशा में रहे होंगे तो ऐसी अवस्था में 'मेरी' ने 'जोसेफ' से गर्भाधान किया होगा । यह वह स्थिति होती है जहां आप इस तुच्छ शरीर को भूल जाते हैं, परंतु आप ईश-शरीर में विराजमान रहते हैं ।
इस प्रकार की अवस्था में उन दोनों ने संभोग किया था और फलतः 'मेरी' ने गर्भ धारण कर लिया । बाद में जब 'मेरी' से पूछा गया कि उसका बच्चा किससे पैदा हुआ, उसका पिता कौन है तो वह कुछ भी नहीं कह सकी ।
ईसाई लोग कहते हैं कि 'मेरी' ने पवित्र आत्मा द्वारा गर्भाधान ग्रहण किया था । इसका तात्पर्य है कि ईश-ज्ञान से परिपूर्ण होने की दशा में, पवित्र आत्मा से पूर्णरूपेण अभिभूत होने के कारण, ईश्वर-चेतना में पूर्ण निमग्न होने की दशा में 'मेरी' ने गर्भ ग्रहण किया था और इस प्रकार, ईसा पवित्र आत्मा के पुत्र थे । प्रकृति के नियम उस समय भी वही थे, जो आज हैं । फिर भी हम कह सकते हैं कि ईसा पवित्र आत्मा के पुत्र थे ।
इस प्रकार राम का दावा है कि यही वह तरीका है जिसके अनुसार संपूर्ण विश्व को काम करना चाहिए, तभी अनेकानेक व्यक्ति ईसा की तरह उत्पन्न हो सकते हैं । यदि आप चाहते हैं कि आपकी संतति मिल्टन, शेक्सपियर, ईसा या अन्य महापुरुष बने, यदि आप चाहते हैं कि आपकी संतति संपूर्ण विश्व या आपके परिवार के योग-क्षेम में समर्थ हो तब आप अपने हृदयों को पवित्र बनाइए, अपने आपको नीचे मत गिराइए, अपनी अवनति मत होने दीजिए । राम आपसे अनुरोध करता है कि आप अपनी पत्नी और बाल-बच्चों के साथ इस प्रकार रहें जिससे आप अपने आपको तुच्छ स्वार्थमय संकुचित भावनाओं से ऊपर उठाकर रह सकें, इस प्रकार का जीवन व्यतीत करें, जो आपको ईश्वर में, दिव्यात्मा में, पवित्र आत्मा में, सर्वस्व में प्रतिष्ठित कर सके । यदि पति और पत्नी दोनों ही उच्च शक्ति, उच्च विचारों एवं पवित्र भावनाओं से परिपूर्ण रहें तो ऐसे माता-पिता की संतान ईसा ही होगी । यदि आप आज चाहें तो आप एक नहीं, अनेक ईसाओं को जन्म दे सकते हैं ।
आपका घर आपके प्रेम, आपके अनुराग का केंद्र होना चाहिए, न कि उसकी परिसीमा । लोग अपने घर को प्रेम की सीमा बना लेते हैं जिससे उनका प्रेम, उनका अनुराग उस सीमा से आगे न जा सके । घर और पत्नी को तो प्रेम का केंद्र होना चाहिए, जिससे प्रेम की किरणों का सभी दिशाओं में प्रस्फुरण हो सके । आपका प्रेम घर की चारदीवारी में नहीं बंधा रहना चाहिए, आपकी पत्नी द्वारा प्रेम तथा अनुराग की परिसीमा का भान नहीं होना चाहिए ।
आप अपने स्वार्थमय विचारों से अपनी पत्नी को अधोगति की ओर ले जाते हैं, साथ ही, आप अपने आपको भी नीचे गिराते हैं, इस प्रकार आप दोनों के विनाश का काम करते हैं । पत्नी आपको प्रेम करना सिखाती है और आपको चाहिए कि आप उस प्रेम को और पवित्र बनाएं । उस प्रेम को संपूर्ण विश्व के प्रेम का आकार देकर आपको बाह्य रूप-रंग, आकृति, शरीर आदि के प्रेम को संपूर्णता अथवा दिव्यता के प्रेम में परिणत कर देना चाहिए ।
यदि आप इस दृष्टिकोण से, सभी के साथ, हर एक के साथ संपर्क स्थापित करें और इसी प्रेम की दृष्टि से, यहां तक कि घास-फूस, फूल-पौधे, नदी-नाले, पहाड़-पर्वत और बड़ी-बड़ी खाइयों आदि को देखेंगे तो आपको अनुभूति होगी कि आप संपूर्ण विश्व से एकाकार हैं ।
आपकी पत्नी को चाहिए कि वह आपको शिक्षा दे कि आप किस प्रकार समग्र विश्व के साथ अपनी स्थिति का समायोजन करें । उसका कर्तव्य विश्व के साथ आपका सामंजस्य भंग करने का नहीं है ।
अब राम आपको कतिपय आध्यात्मिक नियमों के बारे में बतलाएगा । यही आध्यात्मिक नियम इस संसार के सभी अनुरागों का संचालन करते हैं । यदि राम आपको इन नियमों की जानकारी न भी दें तो भी आप इन नियमों का हर समय अनुभव करते हैं और भविष्य में ऐसा ही अनुभव करते रहेंगे । परंतु इन नियमों से आपको परिचित करा देने से आप सतर्क हो जाएंगे ।
उदाहरण के रूप में जब एक मनुष्य अपनी गाड़ी हांक रहा हो और उसे यह मालूम नहीं हो कि आगे किस प्रकार का अवरोध है तो जब उसकी गाड़ी उस अवरोध को पार करेगी तब गाड़ी में धक्का लगेगा और वह बुरी तरह हिल-डुल जाएगा । यदि हम उसे उन अवरोधों का ज्ञान करा दें और उसे सतर्क कर दें तो इस चेतावनी से वह सावधान हो जाएगा और जो धक्का उसे लग सकता था, उससे वह बच जाएगा ।
इसी प्रकार, आपके सांसारिक कार्यकलाप में इस प्रकार के धक्के आते रहेंगे, विपदाएं आती रहेंगी, असफलताएं और मानसिक व्यथाएं आती रहेंगी । अब प्रश्न यह है कि ये मानसिक व्यथाएं, ये असफलताएं, ये विपदाएं, ये निराशाएं कब, किस समय आ सकती हैं ? राम आपको इनसे अवगत कराता है और जब आपको इसका ज्ञान हो जाएगा तो आपको धक्के नहीं सहने पड़ेंगे । इस ज्ञान का मार्ग सरल है और जहां तक संभव होगा, आप धक्कों से बचे रहेंगे ।
इसका विधान है और यह विधान इतना निश्चित तथा सत्य है जितना कि कोई गणितीय नियम । यह विधान इतना शाश्वत है जितना कोई भौतिक तथ्य । जब कभी भी कोई पुरुष या कोई महिला किसी आकार, किसी शरीर, किसी भौतिक पदार्थ से प्यार करना प्रारंभ करने लगती है तो उसे कुछ समय तक उस भौतिक पदार्थ का आनंद लेने, उसका रसास्वादन करने का अवसर मिलेगा, परंतु जिस समय वह भौतिक पदार्थ उसके हृदय में अंगीकृत हो जाएगा, जब वह पदार्थ उसके संपूर्ण शरीर के रोम-रोम में परिव्याप्त हो जाएगा, ठीक उसी समय वह पदार्थ उसके पास से हटा लिया जाएगा । यही विधान है । इससे बचा नहीं जा सकता है ।
ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो इसका निराकरण कर सके, ऐसी कोई ऊर्जा या सत्ता नहीं है जो इस प्रकार की घटनाओं को घटित होने से रोक सके । अत्यंत प्राचीन काल से लेकर आज दिन तक इस नियम का कोई भी अपवाद नहीं रहा है ।
आप अपने आपको किसी बाह्य पदार्थ से आसक्ति द्वारा जोड़िए, किसी भी नाम-रूप या व्यक्तित्व से अपने को बांधिए, किसी महापुरुष पर आश्रित होइए, उन पर विश्वास कीजिए, उन पर श्रद्धा कीजिए, उनका भरोसा कीजिए और फिर देखिए वही मेरुदंड, वही अधिष्ठान आपसे हटा लिया जाएगा और आप औंधे गिर पड़ेंगे । किसी मेज पर झुकिए और यदि उस मेज को हटा लिया जाए तो आप गिर ही पड़ेंगे, आपको धक्का सहना पड़ेगा । इस प्रकरण से आपको क्या शिक्षा मिलती है ? इससे यह शिक्षा मिलती है कि हमें अपना प्रेम, अपना अनुराग, इन स्थूल और भौतिक पदार्थों पर आश्रित नहीं करना है ।
इन स्थूल और भौतिक वस्तुओं को हमें अपने प्रेम का पदार्थ नहीं बनाना है । यह यहां भी सत्य है कि इन स्थूल और भौतिक पदार्थों के माध्यम के बिना हम अपने हृदय में प्रेम का पाठ अंगीकार नहीं कर सकते हैं । इन स्थूल भौतिक पदार्थों के जरिए ही हम प्रेम करने का पाठ सीख सकते हैं । परंतु जब एक बार इस प्रेम का पाठ हृदयंगम करा दिया गया जो प्रकृति हमें सिखाती है । इस प्रेम को, इस अनुराग को हमें और आगे बढ़ाना होगा । इसे हमें उन पदार्थों के पीछे छिपे दिव्यात्मा तक ले जाना होगा ।
उस व्यक्ति को धिक्कार है जो उस प्यार को अपनी पत्नी के पीछे निहित दिव्यता के पास नहीं ले जाता है जिस प्यार को उसने अपनी पत्नी के चरणों में रहकर सीखा है । यदि आप इस प्रेम का प्रयोग नहीं करते हैं तो आपका विनाश होगा, आप कष्टों को भुगतेंगे । जब आपकी पत्नी आपको प्रेम करना सिखाती है तो प्रेम का उपयोग सभी के लिए, हर एक के लिए, समग्र ब्रह्मांड के लिए अवश्य किया जाना चाहिए ।
आध्यात्मिक विकास सांसारिक सुखों की भूमि में बोए गए बीज से अंकुरित नहीं होता है । इसलिए जब आपके प्रेम का बीज पत्नी या पति के पार्थिव शरीर की भूमि में बोया जाए तो प्रेम के उस बीज को, जो पार्थिव शरीर में बोया गया है, उसे मिट्टी में गाड़ दिया जाए और मिट्टी से उसे ढक दिया जाए । जब यह प्रेम का बीज मिट्टी में मिल जाएगा तभी वह प्रेम उत्तम होगा, प्रस्फुरित होगा और खुली हवा में, स्वच्छंद वातावरण में पल्लवित तथा पुष्पित होगा ।
इस प्रकार, पत्नी में या पति में इस प्रेम के बीज को आरोपित कीजिए, परंतु पत्नी या पति अथवा किसी भौतिक पदार्थ में बोए गए बीज को मिट्टी में मिलने दीजिए, उसे मर जाने दीजिए तभी वह खुली हवा में अंकुरित होकर बाहर निकलेगा और फल देगा । जहां तक सांसारिक पदार्थों के प्रति अनुराग के प्रश्न का संबंध है, उसमें प्रत्यक्ष विफलता ही विफलता सामने आएगी । जैसे ही बीज मिट्टी में समाप्त हो जाएगा, प्रकृति का नियम है कि वही बीज किसी न किसी समय आपको ईश्वर की अनुभूति कराएगा । जिस व्यक्ति ने कभी भी प्रेम नहीं किया है वह ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकता, यह एक निर्विवाद तथ्य है ।
बहुधा यह उपदेश दिया जाता है कि सांसारिक प्रेम से धर्म का कोई लेना-देना नहीं है, कोई सरोकार नहीं है । राम का दावा है कि उसका सरोकार है । प्रेम, अनुराग का उचित उपयोग आपकी ईश्वरानुभूति कराता है । ''अन्य सभी सुखों की प्राप्ति के लिए कष्ट उठाना निरर्थक है ।'' वास्तव में एकमात्र विशुद्ध प्रेम आपको ईश्वर का साक्षात्कार कराता है । यही प्रेम वस्तुतः ईश्वर का पर्याय है ।
पति का ध्येय, वैवाहिक संबंधों का उन्नयन होना चाहिए, न कि धनोपार्जन और पारिवारिक जीवन का दुरुपयोग । वही साधन, जो मूल रूप से आनंद के स्रोत हुआ करते थे, अंततः दुख-कष्ट लाने के माध्यम बन जाते हैं ।
कृपया साधन को साध्य मत बनाइए । धन या संपत्ति तो केवल वे साधन मात्र हैं जिनसे आप अपने आपको ठंडक से बचा सकते हैं, अपनी प्यास बुझा सकते हैं, अपनी क्षुधा की पूर्ति कर सकते हैं या अपने को उस कक्ष में रख सकते हैं जहां आपको कोई विघ्न-बाधा न पहुंचा सके । अब आप स्वयं सोचिए कि इन सब आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आपको कितने धन की आवश्यकता हो सकती है ?
लोग कहते हैं कि ''हमें सर्दी लग गई है ।'' पर तथ्य यह है कि सर्दी ने आपको नहीं जकड़ा है, परंतु आपने स्वयं ही सर्दी को पकड़ रखा है । रोग से आप पीड़ित नहीं होते, वह आप स्वयं हैं, जो रोग के पीछे भागते हैं और उस रोग से पीड़ित हो जाते हैं । सर्दी की बीमारी से बचने के लिए आपको कपड़े पहनना अत्यावश्यक है, परंतु इन कपड़ों की वास्तविक उपयोगिता आपकी सर्दी से रक्षा करने में है, जिससे आप सर्दी-जुकाम आदि से पीड़ित न हो सकें । आपके ये कपड़े सादे किस्म के हो सकते हैं, सस्ते भी हो सकते हैं । इनको अधिक कीमती और मूल्यवान होने की आवश्यकता नहीं है ।
हम छोटे-छोटे घरों में रह सकते हैं, आजकल के अत्यंत चमकीले, भड़कीले, आकर्षक भव्य, सुंदर मकानों में रहने की आवश्यकता क्या है ? हम सादे, छोटे घरों में आराम से रह सकते हैं, जो जानवरों से अथवा अन्य प्राणियों से हमारी रक्षा आसानी से कर सकें । हमें इन सुंदर, भव्य मकानों की आवश्यकता नहीं है । लोगों ने अपने घरों को सुंदर बनाने तथा भव्यता को स्वयं में ही एक बड़ा उद्देश्य बना रखा है । इसी प्रकार वस्त्रों की सुंदरता एक दूसरा लक्ष्य है, भोजन की मेज पर विभिन्न प्रकार के रुचिकर खाद्य-पदार्थ की व्यवस्था को अपना एक साध्य तथा लक्ष्य बना रखा है । इतना ही नहीं, ये ध्येय तथा लक्ष्य ही नहीं हैं, अपितु साधन और साध्य, दोनों ही हैं ।
विश्व के इतिहास में कुछ लोग छोटी झोंपड़ियों तथा घरों में रहते थे, सादे ढंग के कपड़े पहना करते थे और रूखा-सूखा भोजन किया करते थे । परंतु अंततः वे विश्व के महानतम व्यक्ति, विश्व के नायक ही बने ।
आप प्लेटो के बारे में जानते होंगे । प्लेटो नाम का यूनानी पर्याय 'रैकम' है । इसका फारसी भाषा में मतलब होता है वह व्यक्ति जो बड़ी नांद (टब) या बड़े पीपे में रहता हो, उसमें निवास करता हो । ऐसा ही घर प्लेटो का था । ऐसे ही स्थान में वह संसार से उपराम होकर रहा करता था ।
थोड़ा ध्यान दीजिए । जिन कुछ लोगों ने इतनी अधिक निर्धनता में जीवन-यापन किया, उन्होंने संसार को अपनी देन से कितना अधिक उपकृत किया है ।
शेक्सपियर का मकान 'स्ट्राफोर्ड-आन-एवन' पर स्थित था । यह कोई भव्य मकान नहीं था । अपने जीवन-काल के प्रथम दौर में वह एक निर्धन व्यक्ति था । वह तो उसके जीवन का उत्तरार्द्ध भाग था जब वह धन का संचय कर सका ।
अपने जीवन के पूर्वार्द्ध भाग में शेक्सपियर नाटक देखने वाले दर्शकों की सेवा किया करता था और उनके घोड़ों पर निगरानी रखता था ।
न्यूटन भी एक गरीब व्यक्ति था । जब उसके पास अत्यंत निर्धन व्यक्तियों को देने के लिए अथवा किताबें खरीदने के लिए धन नहीं रहता था, तो वह दुःखी हो जाया करता था । परंतु अन्य किसी अवसर पर अथवा अन्य प्रयोजनों के लिए उसे अपनी गरीबी पर दुःख नहीं होता था ।
कृपया ध्यान दें । ऐसे बहुत से व्यक्ति हुए जो गरीबों जैसा खाना खाया करते थे और गरीबी ढंग के कपड़े पहना करते थे, फिर भी उन्होंने संसार को कितना अधिक दिया । प्राचीन काल में, भारत में कुछ हिंदू जंगलों के कंद-मूल फल पर अपना जीवन निर्वाह किया करते थे । इन महान व्यक्तियों ने संसार को सर्वोच्च ज्ञान अर्थात वेदांत-ज्ञान से उपकृत किया, वह वेदांत जो प्रेम और स्वतंत्रता का दर्शन है ।
कृपया, आप अपने आपको महान तथा सत्पुरुष बनाने का प्रयत्न कीजिए । अपनी ऊर्जा का व्यर्थ में अपव्यय मत कीजिए । सुंदर तथा भव्य भवनों के निर्माण पर अपने विचारों को विनष्ट मत कीजिए । आपने देखा होगा कि अनेकानेक भवन तो आलीशान, महान और सुंदर हैं, पर इनमें रहनेवाले व्यक्ति बहुत ही छोटे हैं, क्षुद्र हैं । भारत में बड़े-बड़े विशालकाय मकबरे हैं । उनमें अब क्या रखा है ? कुछ नहीं ! केवल सड़ी-गली लाशें, उन पर चलनेवाले कीड़े-मकोड़े, सांप, बिच्छू आदि के अलावा कुछ नहीं ।
कृपया भव्य मकानों तथा महान एवं आकर्षक फर्नीचर और साज-सम्मान को बनाने में अपनी शक्ति, अपनी ऊर्जा का अपव्यय न करके अपनी पत्नी, अपने मित्रों तथा अपने स्वयं को महान् बनाने का प्रयत्न मत कीजिए । यदि आप इस विचार पर गंभीरतम ढंग से मनन करें, यदि इस विचार की अनुभूति करें, यदि इस बात को सही-सही परिलक्षित कर लें, तथा इस बात को हृदय से ग्रहण कर लें कि जीवन का एकमात्र उद्देश्य तथा लक्ष्य धन-संचय और ऊर्जा का अपव्यय करना नहीं है, वरन अपनी आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करना, अपने आपको स्वतंत्र बनाने के लिए स्वयं को दीक्षित करना और ईश्वराकार ग्रहण करना है । यदि आप इस तथ्य का साक्षात्कार कर लेते हैं और इसी दिशा में अपनी शक्ति, अपनी ऊर्जा का संचालन करते हैं तो निस्संदेह आपके पारिवारिक बंधन आपके लिए कोई अवरोध सिद्ध नहीं होंगे ।
कुछ लोग कहते हैं कि ''ऐसा कैसे हो सकता है । यह ठीक है कि हम सीधे-सादे ढंग से रहें । परंतु हमारे अतिथि भी आते हैं । यदि हमारे पास केवल छोटे-छोटे कमरे और खाने के लिए कटोरे भर ही भोजन हो तो वे आखिर क्या कहेंगे ?''
ओ मेरे अत्यंत प्रियतम ! प्रश्न यह है कि आप अपने लिए जीवित रहते हैं या दूसरों के लिए ? कृपया आप अपने लिए जीवित रहिए । यह आपके अतिथियों का कोई कर्तव्य नहीं है कि वे आपके जीवन में हस्तक्षेप करें । जब आप भोजन करते हैं तो क्या आप उसे खाते हैं या आपके अतिथि या मित्र ?
क्या आप स्वयं अपना भोजन पचाते हैं या आपके लिए वे लोग आपकी पाचन-क्रिया करते हैं ? जब आप देखते हैं तो क्या आपके नेत्रों की मांसपेशियां आपको देखने में सहायता देती हैं अथवा दूसरों के नेत्रों की मांसपेशियां ? कृपया, आप स्वयं गुरुत्वाकर्षण का, अपना केंद्र बनें । स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनें ।
अपनी स्वयं की शक्ति पर विश्वास कीजिए, उसका आश्रय लीजिए और अपने अतिथियों की सम्मतियों की परवाह मत कीजिए । अतिथियों के स्वागत का मापदंड उनके रहन-सहन या भोजन की सुखमय व्यवस्था मत बनाइए । लोग बहुधा ऐसा सोचा करते हैं कि यदि उन्होंने अपने अतिथियों के ठहरने तथा भोजन की समुचित व्यवस्था नहीं की तो वे उनका सही ढंग से आदर-सत्कार करने में असमर्थ रहते हैं ।
इस प्रकार के विचार से गृह-स्वामी स्वयं ही गृह का संलग्नक या परिशिष्ट बनकर रह जाता है । कृपया आप अपने आपको संपत्ति का संलग्नक या पिछलग्गू मत बनाइए । परंतु अपनी संपत्ति को आप अपना अनुवर्ती, अपने हाथ की कठपुतली बनाइए । अपनी शक्ति, अपनी ऊर्जा का साक्षात्कार कीजिए ।
जब कोई अतिथि आपके यहां आए तो ऐसा कीजिए कि जब वह आपके घर से जाने लगे तब वह अधिक प्रबुद्ध तथा समुन्नत हो, जब वह आपसे विदा ले तो जिस समय वह आपके पास आया था, उससे अधिक बुद्धिमान होकर आपके यहां से जाए । देखिए, अपने सहयोगियों के प्रति आपका यही दायित्व होना चाहिए । यही तरीका है, जिससे आप अपनी गृहस्थी को सुखमय बना सकते हैं । यही मार्ग है, जिसका अनुसरण कर कोई भी गृहस्थ अपनी गृहस्थी को रोड़ा या अवरोध बनाने के बजाय उसे उन्नयन का सोपान बना सकता है ।
जिस समय कोई अतिथि आपके पास आए तो यह देखिए कि वह जाते समय और अधिक बुद्धिमान होकर आपसे विदा ले । उसके भोजन या रहन-सहन की अधिक चिंता मत कीजिए । आप उसे उत्कृष्ट वस्तु से उपकृत करें, आप उसे ज्ञान तथा बुद्धिमत्ता दें । कृपया उसे आप अपने अनुराग का भागीदार बनाइए ।
कृपया याद रखिए कि यद्यपि आप अपने अतिथि को कोई विशेष रुपया-पैसा न भी दें, यदि आप अपने अतिथि की शारीरिक रूप से कोई सेवा न भी करें, फिर भी यदि आप अपने अतिथि को प्रेम से परिपूर्ण, अंतःस्थ से निर्गत, सत्य से सिंचित एक मधुर मुस्कान दे सकें तो आपका अतिथि समुन्नत हुए बिना, प्रसन्नचित् हुए बिना नहीं रह सकता है । यह वस्तुतः एक महान् सेवा है जो अर्पित की जा सकती है । किसी व्यक्ति को रुपया-पैसा देना कुछ भी नहीं है । यह तो कुछ वैसा ही है जिस प्रकार एक पति अपनी पत्नी को धन दे और तदुपरांत उसको तलाक दे दे ।
आपकी पत्नी आपसे धन नहीं चाहती है, वह आपसे प्रेम की आकांक्षा करती है । किसी व्यक्ति को धन देकर आप केवल एक अपराधी की भूमिका का ही निर्वाह करते हैं और उसे चकमा देकर धोखा देते हैं । कृपया उसे प्रेम और ज्ञान से अभिभूत कीजिए, उसका उन्नयन कीजिए, उसे प्रबुद्ध बनाइए । यही वस्तुतः महान् अतिथि-सत्कार है । यही आपको करना अभीष्ट है । यही प्रेम का अमोघ मंत्र है, जिससे आपको अपनी पत्नी और बाल-बच्चों का मनोरंजन करना चाहिए, उन्हें मुग्ध करना चाहिए ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!