श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

अपने घर को आनंदमय कैसे बनाएं ?

अध्याय 2 / 5 · भाग 1 / 4 · गृहस्थ में आनंद की यात्रा
अध्याय 2 / 5 · भाग 1 / 4

अपने घर को आनंदमय कैसे बनाएं ? — भाग 1

आज राम को अनेक प्रश्न प्राप्त हुए हैं । राम से इनके उत्तर की अपेक्षा भी की गई है । आप तो जानते ही हैं कि जब कोई वकील न्यायालय आता है, वह अपने साथ अपने सभी मुकदमों के कागजात लाता है, लेकिन इन सभी मुकदमे की सुनवाई नहीं हो पाती है । न्यायालय में मुकदमों की अधिक संख्या होने के कारण ऐसा नहीं हो पाता है ।

इसी प्रकार राम को प्राप्त प्रश्नों की संख्या अत्यधिक होने के कारण उन सबका आज सायं न उत्तर ही दिया जा सकता है और न ही उन सब पर विचार ही किया जा सकता है । इसका एक दूसरा कारण भी है । चूंकि पूछे गए अधिकांश प्रश्नों का संबंध आध्यात्मिक विश्व या अगले संसार या परलोक से है, तो फिर हम इन सभी प्रश्नों पर आखिर विचार क्यों करें ?

संप्रति आप इस संसार में रहते हैं । इसलिए यह अधिक समीचीन है कि हम उस विषय पर चर्चा करें जिसका निकट संबंध आपके सांसारिक कार्यकलाप से, आपके हृदय से है, न कि उस प्रश्न पर विचार-विनमय करें, जिसका संबंध आपसे इस समय बिल्कुल है ही नहीं ।

कल सायं हमने जिस विषय पर चर्चा की थी, उसी विषय की चर्चा आज हम आगे बढ़ाएंगे । वह अत्यंत महत्वपूर्ण विषय था—''क्या कोई विवाहित व्यक्ति युक्तिसंगत ढंग से साक्षात्कार प्राप्त करने की लालसा कर सकता है ?'' यह एक लंबा विषय है आज सायंकालीन भाषण में इसकी सम्यक् व्याख्या समाप्त नहीं की जा सकती है । फिर भी हम देखेंगे कि इस समय इस विषय पर हम कितना अधिक ज्ञान अर्जन कर सकते हैं ।

एक समय भारत में एक बहुत ही क्रूर, साथ ही अत्यंत विनोदप्रिय मालिक था । वह अपने नौकरों को अत्यंत मजाकिया ढंग से तंग किया करता था । एक बार उसके एक नौकर ने अपने स्वामी के लिए अत्यधिक सुस्वादिष्ट व्यंजन तैयार किए । स्वामी यह नहीं चाहता था कि उन व्यंजनों का किंचित भी हिस्सा नौकर को मिल सके । वह भोजन रात्रि में पकाया गया था ।

मालिक ने नौकर से कहा—''यह भोजन, ये व्यंजन हम अभी नहीं खाएंगे । इसे हम सवेरे खा सकते हैं । अभी तुम सोने जाओ और हम इन व्यंजनों को सवेरे ही खाएंगे ।'' उस स्वामी की वास्तविक इच्छा इस भोजन को प्रातः ही खाने की थी, क्योंकि तब तक उसकी भूख और खुल जाएगी । रात्रि में भोजन न करने के कारण, वह सवेरे पूरा का पूरा भोजन स्वयं खाने की स्थिति में होगा और इस प्रकार नौकर को खाने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा । यही उस स्वामी का वास्तविक अभिप्राय था ।

वह चाहता था कि उसका नौकर बचे-खुचे जूठे व्यंजनों को ही खा सके । पर वह अपना यह मंतव्य साफ-साफ अपने नौकर से नहीं कह पा रहा था । इसीलिए स्वामी ने नौकर से कहा—''अभी जाओ और आराम करो । हममें से वही प्रातः काल इस सुस्वादिष्ट भोजन को खाएगा जो रात में मधुरतम और सुंदरतम स्वप्न देखेगा । यदि सवेरे तक भी तुमने सुंदरतम् स्वप्न देख लिया तो सारे का सारा भोजन तुम्हीं करोगे अन्यथा सारे का सारा भोजन मेरे हिस्से में आ जाएगा । तब तुम्हारे हिस्से में केवल जूठन ही आएगा ।''

सवेरा हुआ और तब स्वामी और सेवक एक-दूसरे के आमने-सामने बैठे । स्वामी चाहता था कि उसका नौकर ही अपने स्वप्न का वर्णन पहले करे, परंतु नौकर ने कहा—''मालिक ! आप तो मेरे स्वामी हैं । इसलिए पहल करने का सुअवसर भी आपको ही मिलना चाहिए । कृपया आप ही अपने स्वप्न का वर्णन पहले करें, उसके बाद मैं अपने स्वप्न की बात कहूंगा ।''

स्वामी ने मन ही मन सोचा कि यह बेचारा नौकर, यह निरीह, मूर्ख और निरक्षर नौकर भला अच्छे स्वप्न की खोज कैसे कर सकेगा, उसका वर्णन तो दूर की बात रही । इसलिए मालिक ने अपने स्वप्न का वर्णन प्रारंभ किया—''मैं स्वप्न में भारत का सम्राट बना । मैंने अपने स्वप्न में देखा कि सभी यूरोपीय शक्तियां और अमरीका के राजे-महाराजे सभी भारत के इस सम्राट के अधीन हो गए हैं । इस प्रकार भारत का सम्राट होने के नाते मेरा राज्य संपूर्ण विश्व में फैला था ।''

आप जान गए होंगे कि यही उस क्रूर स्वामी का स्वप्न था । जो वास्तविक भारतीय होते हैं वे राजा कहलाए जानेवाले व्यक्तियों के शरीर के पुतले सामने रखकर उनकी पूजा करने की बचकानी रीति के समर्थक नहीं होते हैं । जो भी हो, इस मालिक के स्वप्न पर विचार कीजिए । उसने स्वप्न में अपने आपको देखा कि वही भारत के राज-सिंहासन पर बैठा है और सारे संसार पर शासन कर रहा है ।

इस स्थिति में उसने यह महसूस किया कि संपूर्ण संसार के सभी देशों के राजे-महाराजे उसके सम्मुख नत-मस्तक खड़े हैं और अपना-अपना सम्मान प्रकट करने के लिए अनुनय-विनय कर रहे हैं । इसके अतिरिक्त इस स्वामी ने अपने स्वप्न में यह भी देखा कि सभी देवता तथा सभी साधु-संन्यासी उसके दाईं और या बाईं ओर बैठे हैं । अपने ऐसे भव्य, मधुरतम स्वप्न का वर्णन करके उसने अपने नौकर से कहा कि अब वह अपनी कहानी, अपने स्वप्न का वर्णन करे ।

उस निरीह नौकर ने, उस बेसहारा नौकर ने सिर से लेकर पांव तक कांपते हुए अपने स्वप्न को सुनाना शुरू किया—''मेरे मालिक ! मैंने ऐसा कोई स्वप्न नहीं देखा जैसा आपने देखा है ।''

यह सुनकर स्वामी अत्यधिक प्रसन्न हुआ, उसका चेहरा खुशी के कारण खिल उठा । उसने सोचा कि अब तो सारे का सारा स्वादिष्ट भोजन एकमात्र वही खाएगा ।

नौकर ने अपने स्वप्न के वर्णन में बताया कि उसने अपने सपने में देखा कि एक बहुत बड़ा दानव, एक अत्यधिक कुरूप दानव, एक डरावना और घृणित दानव चमचमाती नंगी तलवार अपने हाथ में लेकर उसकी ओर बढ़ रहा है ।

इस पर मालिक ने पूछा—''आगे क्या हुआ, आगे का हाल जल्दी बताओ ।''

तब नौकर ने आगे बताया—''मेरे मालिक ! वह मेरे पीछे दौड़ा और मुझे मार डालने वाला ही था ।''

मालिक ने यहां तक अनुमान लगाया कि यह अच्छा शगुन है, बाजी उसी के हाथ में रहेगी ।

नौकर ने फिर कहा—''वह मुझे मौत के घाट उतारना चाहता था, मेरी हत्या करने की कोशिश कर रहा था ।''

स्वामी ने उससे पूछा—''तब तुमने क्या किया ? वह तुम्हारी हत्या क्यों करना चाहता था ?''

नौकर ने उत्तर दिया—''मेरे मालिक ! वह चाहता था कि या तो मैं स्वयं वह स्वादिष्ट भोजन खा जाऊं या फिर मरने के लिए तैयार हो जाऊं ।''

मालिक ने पूछा—''तो फिर तुमने क्या किया ?''

उसने उत्तर दिया—''मैं सीधे रसोईघर में गया और सारा भोजन खा गया ।''

मालिक ने गुस्से में पूछा—''तुमने मुझे जगाया क्यों नहीं ?''

नौकर ने विनीत होकर कहा—''मेरे मालिक ! उस समय आप संपूर्ण विश्व के सम्राट थे । आपके दरबार में बड़े-बड़े लोगों का अत्यंत सुंदर और भव्य समागम था । दरवाजे पर सिपाही तलवारें निकाले हुए गोला-बारूद से लैस पहरा दे रहे थे । यदि मैंने उस समय राजसिंहासन पर बैठे सम्राट, आपसे, भेंट करने की चेष्टा भी की होती तो उन सिपाहियों ने मुझे मार ही डाला होता । मैं आपके पास न तो आ ही सकता था और न बता ही सकता था कि उस समय मेरी कितनी दयनीय स्थिति थी । इसलिए मुझे विवश होकर उस स्वादिष्ट भोजन को अकेले खाना पड़ा ।''

राम आपको बतलाता है कि जिस स्वर्ग का आपसे वायदा किया गया है । जिस वैकुंठ का आपको वचन दिया गया है । जिन परलोकों के बारे में आपसे प्रतिज्ञा की गई है, उन सबके बारे में आप केवल स्वप्न ही देख रहे हैं । ये वे चीजें हैं जिनका सपना आप देख रहे हैं और ये सपने अत्यंत सुंदर हैं, अत्यंत मधुर हैं, अत्यंत प्रिय हैं ।

लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि आप इन स्वप्नों में केवल हवाई किले ही बना रहे हैं । ये स्वप्न रेत पर खड़े हैं । आप हवाई किले बनाते जा रहे हैं और सोचते जाते हैं कि आपको यह करना चाहिए, आपको वह करना चाहिए । आपको शैतान से डरना चाहिए और आपको ईश्वर से भय खाना चाहिए । आपको इस प्रकार का आचरण करना चाहिए अन्यथा अमुक, अमुक, देवदूत आपको नरक से स्वर्ग नहीं जाने देगा । आप इन चीजों के बारे में स्वप्न देख रहे हैं ।

राम आपसे कहता है कि वह नौकर बनना कहीं अधिक लाभप्रद तथा श्रेयस्कर है जिसने दानव के डर के मारे उस स्वादिष्ट भोजन का रसास्वादन कर लिया था । ऐसा करना अधिक अच्छा है, अधिक लाभदायक है, क्योंकि इसका संबंध सीधे वर्तमान से है, जो इस समय में सत्य है, वास्तविक है ।

यह अधिक वांछनीय है कि आप उन बातों पर, उन मामलों पर अधिक ध्यान दें जो आपके हृदय के निकट से निकट हैं, जिनका संबंध आपके कार्यकलाप से है । अपनी चिंता, अपने हृदय की चिंता सबसे पहले करें और परलोक की बात और स्वप्नों के संसार को बाद में देख लिया जाएगा । ये अपनी चिंता अपने आप कर लेंगे । कहावत है कि दान-पुण्य सबसे पहले अपने घर से ही शुरू किया जाता है । इसलिए अपने घर से ही इस कार्य का प्रारंभ करें ।

अब राम उस प्रश्न पर विचार करेगा जिसका संबंध आप सभी से है । प्रश्न यह है—''किसी विवाहित युगल को किस प्रकार रहना चाहिए जिससे उनका विवाह दुःख-दारुण्य, चिंता, कष्ट और विपदाओं से ग्रसित न हो सके ?''

लोग प्रार्थना करते हैं कि ''हे ईश्वर ! हमारे कष्ट हर लीजिए ! हे ईसा मसीह ! हमें दुःखों से बचा लीजिए ! हे कृष्ण ! हे बुद्ध भगवान ! हमें विपदाओं से त्राण दिलाइए !'' परंतु राम आपसे अनुरोध करता है कि ईश्वर, ईसा, कृष्ण, बुद्ध मृत्यु के बाद आपके दुःखों से आपकी रक्षा करें या न करें, परंतु संप्रति प्रश्न यह है कि इस जीवन में आपके कष्टों को कौन दूर करे ? होना यह चाहिए कि प्रत्येक पति अपनी पत्नी के लिए ईसा मसीह बने और प्रत्येक पत्नी अपने पति के लिए ईसा मसीह सिद्ध हो ।

पर हो यह रहा है कि प्रत्येक पत्नी अपने पति के लिए ईसा मसीह बनने के बदले वह जुडास इसकैरियट बन जाती है जिसने ईसा मसीह को अंत में धोखा दिया था । इसी प्रकार का व्यवहार पति भी अपनी पत्नी के प्रति करता है और वह पत्नी के लिए ईसा को धोखा देनेवाला जुडास इसकैरियट बन जाता है ।

इन मामलों को, इस प्रकार के व्यवहार को किस प्रकार ठीक किया जाए, किस प्रकार संतुलित बनाया जाए ? उपाय यह है कि प्रत्येक पत्नी और प्रत्येक पति त्याग का वरण करें, त्याग का आलिंगन करें । आप तो जानते हैं कि ईसाई जगत के अनुसार ईसा मसीह साक्षात त्याग की मूर्ति हैं । इसलिए यदि प्रत्येक पत्नी या प्रत्येक पति त्याग की मूर्ति बन जाए तो वे एक-दूसरे की रक्षा कर सकते हैं, एक-दूसरे को बचा सकते हैं ।

'त्याग' एक ऐसा शब्द है जिससे प्रत्येक व्यक्ति भयभीत हो जाता है, कांपने लगता है । हर व्यक्ति त्याग के शब्द को सुनकर थर-थर कांपने लगता है, परंतु त्याग के बिना आपके घर में स्वर्ग लाने का अन्य कोई विकल्प नहीं है । त्याग शब्द के बारे में अनेक भ्रांतियां हैं । इस शब्द का प्रयोग पहले भी अनेक भाषणों में किया गया । इसलिए यह जरूरी लगता है कि त्याग के वास्तविक अर्थ की व्याख्या की जाए ।

त्याग आपसे यह अपेक्षा नहीं करता है कि आप हिमालय के घने जंगलों में जाकर रहें, त्याग आपको यह भी आदेश नहीं देता कि आप अपने वस्त्र उतार फेंकें और नंगे रहें, त्याग आपसे यह भी आशा नहीं करता है कि आप नंगे पैर और सिर मुड़ाकर परिव्राजक बनें । यह त्याग नहीं है ।

यदि त्याग का यह तात्पर्य, यह मंतव्य होता तो कोई भी विवाहित दंपत्ति कैसे त्याग का व्यवहार कर सकता है ? यह युगल दंपत्ति पति-पत्नी की तरह रहते हैं, उनका घर-परिवार है, उनकी जमीन-जायदाद है, संपत्ति है । तब ये लोग किस प्रकार त्याग की मूर्ति बन सकते हैं ?

हिंदू शास्त्रों के अनुसार मूर्तमान त्याग हैं—शिव और पार्वती, जो अपने परिवार के साथ निवास करते हैं, जिनके चारों ओर उनका परिवार भी बैठा रहता है । भगवान शिव और देवी पार्वती तो पति-पत्नी हैं । वे अपने परिवार के साथ रहते हैं और अपने कर्तव्यों का निर्वाह भी करते हैं । हिंदू शास्त्रों में शिव-पार्वती त्याग की दिव्य मूर्ति हैं । लोग सामान्यतः यह समझते हैं कि हिंदुओं का त्याग से मतलब यह है कि लोग वन में जाकर रहें । समाज से दूर अकेले रहें । हर चीज से विलग रहें और हर वस्तु से घृणा करें ।

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार त्याग शब्द का यह तात्पर्य नहीं है । हिंदुओं को अपने पारिवारिक जीवन में त्याग का परिपालन करना होता है । यदि त्याग का वेदांत, यदि त्याग का दर्शन और त्याग का सत्य केवल उन चंद इने-गिने लोगों के लिए है जो संसार छोड़कर वन में चले जाते हैं, तो उस त्याग का क्या उपयोग है ? हम ऐसे त्याग को नहीं चाहते हैं । ऐसे त्याग को गंगा नदी में फेंक देना चाहिए । हमें ऐसा त्याग नहीं चाहिए ।

हिंदुओं द्वारा जिस त्याग का प्रतिपादन किया गया है, उसकी आवश्यकता प्रत्येक व्यक्ति को है । जब तक कोई व्यक्ति त्यागी नहीं बनता, तब तक वह अपने आपको नायक सिद्ध नहीं कर सकता । जब तक कोई कवि त्याग की मूर्ति नहीं बनता, तब तक वह कविता नहीं लिख सकता । आप कदाचित बाइरन कवि का उदाहरण देंगे जिसको इंग्लैंड से निष्कासित कर दिया गया था, क्योंकि उसको अत्यंत अनैतिक व्यक्ति माना जाता था । वेदांत यहां तक कहता है कि बाइरन की प्रतिभा का रहस्य उसका त्याग था । यह त्याग का अद्भुत, अद्वितीय विचार है जिसकी व्याख्या राम आपको बता रहा है ।

वाशिंगटन त्यागी पुरुष था । यदि उसने त्याग का अनुशीलन नहीं किया होता तो वह युद्ध-क्षेत्रों में विजयश्री प्राप्त नहीं कर सकता था । यह बहुत विचित्र लग रहा होगा । क्या आपने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि कोई भी नायक, चाहे वह नेपोलियन बोनापार्ट हो या वाशिंगटन, विलिंगटन, अलेक्जेंडर, सीजर या अन्य कोई हो, यदि वह विजयी होना चाहे, यदि वह राष्ट्रों पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहे, यदि वह सभी सेनाओं को पराजित करना चाहे तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह व्यावहारिक रूप से अपने आपको संसार से ऊपर रखे, सभी आसक्तियों से अपने को परे रखे ।

उसका मन निश्चल होना चाहिए उसका चित्त शांत, अविचलित, विकार-रहित होना चाहिए और उसका एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए जिसकी प्राप्ति के लिए उसे अपनी संपूर्ण शक्तियों को केंद्रीभूत करके उनका उपयोग करना है । उसे परेशान नहीं होना चाहिए ।

इन सबका क्या तात्पर्य है ? क्या कहने का यह मतलब है कि सभी अन्य पदार्थों का परित्याग कर दिया जाना चाहिए ? जितना अधिक त्यागी कोई व्यक्ति होगा, उतना ही अधिक उत्तम और उतना ही अधिक श्रेष्ठ वह अपने को सिद्ध कर सकेगा । नेपोलियन का उदाहरण लें । वह युद्ध-स्थल पर पहुंचता है और एक ही शब्द 'हाल्ट' ( रुको ) के उद्घोष से उन हजारों सैनिकों को रोक देता है जो उसको जीतने के लिए एकत्र हुए थे । यह कैसे हुआ ? वह सारी शक्ति कहां से आई ? नेपोलियन के अपनी वास्तविक सत्यात्मा में, अपने अंतःस्थ देवत्व में, अपने सत्य आत्म-स्वरूप में विलीन हो जाने के फलस्वरूप उसमें यह शक्ति आई । इस शक्ति का उद्गम यही सत्य है ।

हो सकता है, उसे इसका ज्ञान हो या न हो । पर वह तो शरीर से परे, मन से परे, प्रत्येक वस्तु से परे, निश्चल खड़ा था । उसके लिए यह संसार कोई संसार नहीं रह गया था । यही स्थिति सर आइजक न्यूटन जैसे महानतम प्रतिभाशाली व्यक्तियों की होती है । विश्व को अपने दर्शन, अपने ज्ञान-विज्ञान से लाभान्वित तथा समृद्ध करने के लिए इन प्रतिभाओं को व्यावहारिक रूप से यही त्याग अपनाना पड़ता है । ऐसा व्यक्ति शरीर, मन और वस्तुतः सभी से ऊपर उठ जाता है । वह घर में बैठा है, परंतु उसके लिए घर कोई नहीं घर नहीं है, उसके लिए मित्र कोई मित्र नहीं है । वह तो कितनी अद्वितीय अमूर्त स्थिति में प्रतिष्ठित है !

लोग कहते हैं कि वह कुछ भी नहीं कर रहा है, परंतु जब आप यह मानते हैं कि वह कुछ भी नहीं कर रहा है, तभी उसकी वह स्थिति सर्वोत्कृष्ट होती है । प्रत्यक्ष रूप से वह निश्चित है, उसने सभी का परित्याग कर दिया है, वह अपनी उत्कृष्ट चरम अवस्था में अवस्थित है ।

ये महापुरुष, ये नायक, ये महान प्रतिभा-संपन्न व्यक्ति, त्याग शब्द पर अनायास ही टिक जाते हैं । जिस सत्य का उन्होंने अनजाने ही, अचेतन रूप से अपने जीवन में व्यवहार किया, उसे अपनाया और जिस सत्य के माध्यम से वे इतने ऊंचे उठे तथा अपने को विख्यात कर सके, उस सत्य की व्याख्या करना, उसको क्रमबद्ध विधि से आपके सामने प्रस्तुत करना हिंदू दर्शन का ध्येयं रहा है ।

हिंदू दर्शन का लक्ष्य है कि आपको सही तरीके से उस सत्य के सम्मुख किया जाए, उस सत्य को वैज्ञानिक परिवेश दिया जाए और आपको उन नियमों, उन विधानों और उन विधियों की व्याख्या समझाई जाए, जिनके द्वारा आप उस सत्य तक पहुंच सकें ।

हिंदू दर्शन ने इस त्याग को ज्ञान के रूप में अभिहित किया है । इसका तात्पर्य यह है कि त्याग और ज्ञान दोनों ही एक हैं अभिन्न हैं । त्याग शब्द का पर्याय है ज्ञान । पर यह ज्ञान वह ज्ञान नहीं जिसको आप भौतिक पदार्थों की जानकारी से प्राप्त करते हैं या जो आपका वस्तुपरक मान्य ज्ञान है । निस्संदेह यह वस्तुपरक या पदार्थीय ज्ञान आपकी काफी सहायता करता है, परंतु यह यथार्थ, सत्य ज्ञान नहीं है । केवल यह वस्तुपरक ज्ञान आपको कभी भी शांति प्रदान नहीं कर सकता है । वह ज्ञान, जिसका पर्याय त्याग है, वस्तुतः सत्य का ज्ञान है, वास्तविक आत्मा का ज्ञान है, आप क्या हैं, इसका ज्ञान है ।