अपने घर को आनंदमय कैसे बनाएं ? — भाग 3
उस आंतरिक वास्तविकता को अधिक प्यार करें जो उन परिधानों को ग्रहण किए हुए हैं । कृपया आप इस बात का चिंतन कीजिए और आप प्रत्यक्ष अनुभूति करेंगे । कुछ मनुष्य ऐसे भी होते हैं जो दूसरों की अपेक्षा अधिक चित्ताकर्षक होते हैं, जिनमें दूसरों की अपेक्षा अधिक कांति होती है । आप राम को कृपया क्षमा करें, यदि वह उस विषय पर चर्चा करता है जिसके बारे में बात करने का प्रचलन नहीं है । यह विचित्र बात है कि जो बातें हमें मन ही मन सर्वाधिक भाती हैं, हम उन पर चर्चा नहीं सुनते हैं । इस विषय पर चर्चा करने की परंपरा नहीं हैं । परंतु यह बहुत आवश्यक है । इसका संबंध वस्तुतः आपसे है । चूंकि दूसरे लोग इस विषय के बारे में नहीं बोलते हैं, इसलिए राम उस विषय की व्याख्या करना उचित समझता है ।
ठीक है, यह कांति है, पर यह कांति कहां से आई ? यह कांति, यह गतिशीलता, यह क्रिया क्या है ? यह सब क्या है ? क्या यह सब कांति वास्तव में नाक, कान, आंख के कारण है ? नहीं, ऐसा नहीं है । आंख, कान इत्यादि के माध्यम से केवल इसकी प्रतीति होती है । आपने क्लियोपेट्रा, मिश्र की उस लड़की-क्लियोपेट्रा, उस अफ्रीकी नीग्रो लड़की क्लियोपेट्रा के बारे में सुना होगा । उसने सम्राट मार्क एंटोनी को मोहित किया था । उन्हें आकर्षित कर लिया था । उन्हें मोह-पाश में आबद्ध कर लिया था । यह सब कांति के द्वारा ही हुआ ।
यह कांति आपके अंतःस्थ की दिव्यता से आती है, अन्य किसी स्रोत से नहीं । यही क्रियाशीलता भी है । पर यह क्रिया, ऊर्जा या गति क्या है ? ध्यान दें । आप पहाड़ों पर घूम सकते हैं, आप खड़ी चढ़ाई के पर्वतों का आरोहण कर सकते हैं, आप एक स्थान से दूसरे स्थान आ-जा सकते हैं, आप जहां भी विचरण करना चाहें, कर सकते हैं, पर जब शरीर की मृत्यु हो जाती है तब उसका क्या होता है ? जब शरीर की मृत्यु हो जाती है तब वह क्रियाशीलता, आपके अंतःस्थ का वह ईश्वर, जो आपको कितनी ही महान से महान ऊंचाइयों तक उठा सकता था, अब उस तरीके से शरीर की उतनी सहायता नहीं करता है जितनी वह पहले किया करता था ।
तब आपके शरीर में वह क्या था, जो मांसपेशियों को गति देता था, जो आपके बालों को उगाता था, जो आपकी नस-नाड़ियों में रक्त का संचार किया करता था ? वह क्या है ? वह क्या है जो आपके शरीर के सभी अवयवों को गति, ऊर्जा और क्रिया देता है ? वह क्या है ?
वह है—एकमात्र विश्वव्यापी शक्ति, एकमात्र विश्वव्यापी दिव्यता, एकमात्र विश्वव्यापी ईश्वर जो वास्तव में तुम हो । उपनिषदों में जिसके बारे में कहा गया है—'तत्त्वमसि' एकमात्र विश्वव्यापी शक्ति, एकमात्र विश्वव्यापी ईश्वर, जो वास्तव में आप हैं, आत्मा ही है । जब मनुष्य मर जाता है कुछ आदमी उसे उठाकर श्मशान या कब्रिस्तान ले जाते हैं । पर जब वह जिंदा था तो वह क्या था जो इतने अधिक किलोग्राम वजन के उसके भारी-भरकम शरीर को इतनी बड़ी-बड़ी ऊंचाइयों, इतने ऊंचे-ऊंचे पर्वतों के शिखरों तक ले जाता था ?
जो कुछ वह था वह तो अदृश्य, अवर्णनीय था, परंतु उसका वहां कुछ अस्तित्व अवश्य था । वह अंतर की, अंतःस्थ की दिव्यता है । वह प्रत्येक शरीर में विद्यमान ईश्वर है और वह ईश्वर ही है जो प्रत्येक वस्तु को क्रियाशीलता और शक्ति से संपन्न करता है । वह ईश्वर ही है जिसके कारण प्रत्येक व्यक्ति की गति में कांति रहा करती है ।
जब एक व्यक्ति सो जाता है तो उसके नेत्र देखते नहीं हैं । जब वह सोया हुआ रहता है तो उसके कान सुनते नहीं हैं । जब एक मनुष्य मृत हो गया तो उसके नेत्र तो जहां के तहां बने रहते हैं, परंतु वह देखता नहीं है, उसके कान भी जहां के तहां रहते हैं, परंतु वह सुनता नहीं है । क्यों ? कारण यह है कि वह दिव्यता, अंतःस्थ की आत्मा जिस ढंग से पहले सहायता करती थी, अब वैसी सहायता नहीं करती है ।
वह अंतःस्थ का ईश्वर है जो नेत्रों द्वारा देखता है, वह अंतःस्थ का ईश्वर है जो कानों को सुनने की क्षमता प्रदान करता है, वह अंतःस्थ का ईश्वर है जो नाक को सूंघने की शक्ति देता है और वह अंतःस्थ का ईश्वर है जो मांसपेशियों को ऊर्जा प्रदान करता है । वह अंतःस्थ का ईश्वर है जो सभी प्रत्यक्ष कांति का मूल तत्व, सार तत्व है । इसे याद रखिए ।
इस पर ध्यान दीजिए । वह कौन है जो आपके सामने खड़ा है, वह कौन है जो आपकी आंखों में आंखें मिलाकर देखता है जब आप उस व्यक्ति की ओर घूरते हैं ? वह और कोई नहीं आपका अंतःस्थ का ईश्वर है । बाह्य आंखें, कान, त्वचा आदि तो केवल आवरण हैं, वे तो ऊपरी परिधान हैं, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं ।
जब इस संसार के लोग पदार्थों की अभिलाषा करते हैं, उनसे प्रीति करते हैं तो वे अंतःस्थ की सत्यता से कहीं अधिक पोशाक और परिधानों से स्नेह करने लगते हैं और यह भूल जाते हैं कि यही सत्यता उस पोशाक, उस परिधान के द्वारा चमकती है । इस प्रकार वे पोशाक मात्र, परिधान मात्र को मूर्तरूप दे देते हैं और उसकी पूजा करने लगते हैं । वे सत्यता, अधिष्ठान और आंतरिक वास्तविकता की अपेक्षा प्रतिबिंबों पर अधिक ध्यान देते हैं । बस, यही कारण है कि लोगों को इस पाप के दुःखद् परिणामों को भुगतना पड़ता है । वस्तुस्थिति ऐसी ही है । इससे ऊपर उठिए, इससे परे उठिए । प्रत्येक पत्नी और प्रत्येक पति एक-दूसरे के भीतर ईश्वर के दर्शन करे, अंतःस्थ के ईश्वर का अवलोकन करे और अंतःस्थ के ईश्वर की पूजा-अर्चना करे ।
हर वस्तु आपके लिए ईश्वर बन जानी चाहिए । पत्नी को अपने पति के लिए नरक का खुला द्वार बनने के बदले यह चाहिए कि वह उसके लिए दर्पण बने, जिसमें झांककर पति ईश्वर के दर्शन कर सके । पति भी अपनी पत्नी के लिए नरक का खुला द्वार बनने के बदले उसके लिए दर्पण बने, जिसमें उसकी पत्नी भी ईश्वर का अवलोकन कर सके ।
कोई पति या पत्नी अपने अर्द्धांग को इस तथ्य का, इस ईश्वरत्व का, समस्त ऊर्जाओं की इस वेदांतिक एकाग्रता का साक्षात्कार करने के लिए सक्षम बना सकता है ? इसे वे दोनों किस प्रकार कर सकते हैं ?
यदि पत्नी को अपने पति का उद्धारक बनना है तो सबसे पहले उसे अपने पति को सभी बाह्य संक्रामकताओं और छूत वाली बुराइयों से बचाना होगा । यदि उसका प्रेमी अविवाहित है तो उसके सभी प्रकार के प्रलोभनों के शिकार बनने की संभावना रहती है । वह प्रेमी तो बिना मस्तूल की वह नाव बन जाता है जो सभी प्रकार की हवाओं और तूफानों के रहमो-करम पर निर्भर रहती है, भले ही वे हवाएं किसी भी दिशा से क्यों न चलें ।
जब तक वह व्यक्ति अविवाहित रहता है, वह दिव्य-ज्ञानविहीन मनुष्य रहता है । जब तक वह अविवाहित रहता है, उसे सभी दिशाओं से सभी प्रकार की संक्रामकताओं का सामना करना होता है और ऐसी स्थिति में उसकी प्रेमिका को सबसे पहले अपने होनेवाले पति को इन सभी प्रलोभनों से बचाना होता है । अब क्या होता है ? सामान्यतः पत्नियां अपने पतियों को इन प्रलोभनों से नहीं बचातीं, वरन् वे स्वयं ही अपने पतियों के कंधों पर भारी बोझ बन जाती हैं ।
यह तो कुछ ऐसा ही हुआ कि कोई व्यक्ति अपने सभी रुपये दे डाले और इन अपने सभी रुपयों के छोटे नोटों के बदले उतने ही मूल्य का एक बड़ा नोट ले ले । निस्संदेह वह पति, अपनी पत्नी को सहारा मानकर अन्य प्रलोभनों से छुटकारा पा जाता है परंतु पत्नी पर पूर्णतः आश्रित रहने का उसका दोष सभी पुराने अपमानों से अधिक गंभीर है । वह अनेक प्रकार के विविध प्रलोभनों से तो उन्मुक्त हो जाता है, परंतु पत्नी पर पूरी तरह निर्भरता का एकमात्र दोष अथवा पत्नी की अधीनता ही उसको अत्यधिक बोझिल बनाने के लिए पर्याप्त है ।
यह सब तो उस घोड़े के दृष्टांत के समान हुआ जो एक मनुष्य के पास अपनी रक्षा के लिए गया । आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी था जब मनुष्य जंगल में रहता था । घोड़ा भी जंगल में रहता था, हिरन और बारहसिंघे भी जंगलों में रहते थे, जैसे आजकल जंगल में रहते हैं । एक बार एक बारहसिंघे की लड़ाई में घोड़ा हार गया था । घोड़े को बारहसिंघे ने अपने सींगों से काफी घायल कर दिया था । इसलिए वह घोड़ा सहायता के लिए मनुष्य के पास गया ।
मनुष्य ने कहा—''ठीक है, मैं तुम्हारी मदद करूंगा । मेरे हाथ में तीर-कमान हैं । तुम मुझे अपनी पीठ पर बैठा लो और मैं वहां पहुंचकर तुम्हारे शत्रुओं को मार डालूंगा ।'' मनुष्य घोड़े की पीठ पर सवार हुआ, जंगल में गया और उस बारहसिंघे को मार गिराया । ये दोनों—वह मनुष्य और घोड़ा, विजेता होकर घर लौटे । घोड़ा अत्यधिक प्रसन्न था । अब घोड़ा वापस जाना चाहता था ।
घोड़े ने मनुष्य को धन्यवाद दिया और बोला—''मेरे प्यारे श्रीमान ! मैं आपका बहुत-बहुत कृतज्ञ हूं । मैं अब आपसे विदा लेना चाहता हूं ।'' इस पर मनुष्य कहने लगा—''अब तुम कहां जाना चाहते हो ? अब तो मुझे ज्ञात हो गया है कि तुम कितने उपयोगी हो, मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा । तुमको मेरा नौकर बनकर रहना होगा, तुमको मेरा दास, गुलाम बनना होगा ।''
यहां घोड़े की बारहसिंघों, हिरनों और अन्य वन-प्राणियों से रक्षा तो हो गई, पर उस घोड़े ने अपनी स्वतंत्रता खो दी । और यही गुलामी और यही दासता उसकी बाह्य सफलता तथा विजय का परिणाम थी । उसकी विजय का श्रेय किसी भी प्रकार उसकी स्वतंत्रता की हानि की पूर्ति नहीं कर सकता ।
यही स्थिति मनुष्य की है । शादी के बाद अनेकानेक प्रलोभनों से तो वह बच गया, परंतु एक प्रलोभन से वह नहीं बच सका जो उसने अपनी पत्नी के संबंध में उस पर आश्रित होने के कारण एक प्रकार की उसकी दासता के रूप में प्राप्त किया । यह तो ठीक उसी प्रकार का बर्ताव रहा जो घोड़े को मनुष्य ने उसकी सहायता करके उसे दिया था ।
अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि पत्नी किस प्रकार अपने पति की उद्धारक और रक्षक बने ? निस्संदेह वह उसे अनेक प्रलोभनों से बचाती है । यह सब बहुत अच्छा है । प्रलोभनों से बचाना बिल्कुल सही है । पर आगामी लक्ष्य तो यह है कि पत्नी अपने पति को अपना दास न बनाए । (अमरीकी लोग कहते हैं कि उन्होंने फिलीपाइन निवासियों पर विजय प्राप्त की, परंतु यदि वे इस विजय के उल्लास में डूब गए और सतर्क नहीं रहे तो वे भी गुलाम बना लिए जाएंगे ।)
दास न बनाने की इस प्रक्रिया को किस प्रकार व्यावहारिक रूप से अपनाया जा सकता है ? पत्नी को चाहिए कि वह अपने पति को दास न बनाए और पति को चाहिए कि वह अपनी पत्नी को अपने ऊपर आश्रित न होने दे । अब दूसरा चरण प्रारंभ होता है । यदि इस विधा को प्राप्त कर लिया गया तो आध्यात्मिक उन्नति की प्रत्येक आशा है । अन्यथा कोई भी आशा नहीं है । यह एक ऐसा प्रकरण है जो आपके ध्यान में नहीं लाया जाता है । लेकिन यह यथार्थ है ।
आप जानते ही हैं कि ईसा मसीह को मानव जाति का उद्धारक माना जाता है और यह भी कहा जाता है कि ईसा संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा करेंगे, वे सभी पापों को नष्ट कर देंगे और पृथ्वी पर स्वर्ग का साम्राज्य स्थापित कर देंगे । परंतु इन सभी बाइबिलों, कुरानों और वेदों के बावजूद हम देखते हैं कि विश्व जितना पहले अधार्मिक था, उतना ही आज बना हुआ है । इसका कारण क्या है ?
कारण यह है कि इस बुराई के वास्तविक कारण का निराकरण नहीं किया गया है । वास्तविक कठिनाई आपके स्वयं के गृहस्थ-जीवन में निहित है । जब तक पत्नी अपने पति के योग-क्षेम को सुनिश्चित नहीं करती, जब तक पति अपनी पत्नी के कल्याण को समुन्नत करने के लिए कटिबद्ध नहीं होता है, तब तक धर्म कभी भी प्रतिष्ठित नहीं हो सकता । धर्म के लिए आशा करना व्यर्थ है ।
आप जानते हैं कि यह वाष्प और विद्युत शक्तियों का युग है, विज्ञान का युग है । ऐसे में धर्म को अपना बोरिया-बिस्तर समेटना चाहिए और विदा ले लेनी चाहिए । ईसाइयो ! ए हिंदुओ ! ए मुसलमानो ! यदि आप वास्तव में चाहते हैं कि संसार के दुःखों का निराकरण कर दिया जाए, यदि आप वास्तव में चाहते हैं कि मानवमात्र के कष्टों और व्यथाओं का समूल उन्मूलन कर दिया जाए तो आपको गंभीरतापूर्वक मनन करना होगा । आपको वैवाहिक संबंधों को न्यायोचित धरातल पर स्थापित करना होगा । आपको प्रत्येक महिला और पुरुष के हृदय में यह सद्भावना जाग्रत करनी होगी कि प्रत्येक को अपने पति या अपनी पत्नी का उद्धारक या बाइबिल की भाषा में ईसा मसीह बनना है । यह हमारा परम श्रेष्ठ दायित्व है कि हम अपने आपको एक-दूसरे का उद्धारक सिद्ध करें ।
पर ऐसा कैसे किया जाए ? यदि पत्नी अपने पति को दास बनाने की इच्छा न करे और पति भी अपनी पत्नी को अपने ऊपर आश्रित बनाने की बिल्कुल चेष्टा न करे तो पति और पत्नी एक-दूसरे के उद्धारक बन सकते हैं । आप सभी को, अपने आप से अपनी ओर से, स्वतंत्र कर दीजिए और फिर देखिए कि आप स्वयं स्वतंत्र हैं । यही विधान है ।
क्रिया और प्रतिक्रिया समान और विरोधी होती हैं । आप अपनी पत्नी को अपने ऊपर आश्रित बनाइए, उसे अपना दास बनाइए तो फिर आप भी उसके गुलाम बन जाएंगे । ओह ! यह तो सर्वाधिक भयंकर कथन है । पर सत्य तो किसी से कोई समझौता नहीं करता है, वह तो भयंकर कटु और अप्रिय होता है । ईसा मसीह ने इसी सत्य का उपदेश दिया । परिणामस्वरूप ईसा को यातनाएं सहनी पड़ीं और सूली पर चढ़ना पड़ा । सुकरात आए, उन्होंने भी यही बताया और परिणाम स्वरूप उन्हें विषपान करना पड़ा, लोग सत्य को प्रसन्नतापूर्वक कभी भी स्वीकार नहीं करते हैं । यह भयानक कथन प्रतीत होता होगा, लेकिन सत्यता, वास्तविकता यही है । कृपया गंभीरतापूर्वक विचार करें ।
एक आदमी ने एक बैल के गले में रस्सी लपेट रखी है और उस रस्सी से बैल के सींगों को बांध रखा है । वह आदमी रस्सी का दूसरा सिरा अपने हाथ में लिये है । वह सोचता है कि बैल तो उसका नौकर है, उसका गुलाम है । पर सत्य यह भी है कि वह आदमी बैल का जितना गुलाम है, उतना बैल उस आदमी का गुलाम है । उस आदमी को क्या अधिकार है कि वह कहे कि बैल उसका है, उसकी संपत्ति है ?
कारण यह है कि बैल उस आदमी को छोड़कर नहीं जा सकता है । कृपया विचार करें । यदि इसका एकमात्र कारण यही है कि बैल उस आदमी को छोड़कर नहीं जा सकता है, तो हम कहते हैं कि वह आदमी भी बैल को नहीं छोड़ सकता है । बैल उस आदमी को इसलिए नहीं छोड़ सकता है, क्योंकि वह आदमी भी बैल को नहीं छोड़ सकता है । यदि वह आदमी बैल को छोड़ सकता, यदि वह व्यक्ति स्वतंत्र हो सकता, यदि वह बैल का दास न बना होता तो बैल भी उसका दास नहीं बना रह सकता था । यही विधान है ।
क्या आप नहीं देखते हैं कि सभी परिवार कष्ट भोग रहे हैं ? क्या यह तथ्य नहीं है ? क्या यह सत्य नहीं है कि यूरोप, अमरीका, भारत, जापान और इस संसार में हर जगह लगभग सभी परिवार दुःख, कष्ट झेल रहे हैं ? वे कहते हैं—''अपना घर मंगलमय, अपना घर सुखमय ।'' कितनी बड़ी आत्म प्रवंचना है ! यह तो कहने के लिए है कि घर मंगलमय, सुखमय है, पर है यह केवल नाममात्र । यह स्वप्नमात्र है !
यह कैसे हो सकता है कि लोग कष्ट भोग रहे हों और उनके घर सुखमय हों । क्या आप अंतरंग हृदय से यह नहीं चाहते हैं कि आपके घर मंगलमय हों ? यदि आप सुख चाहते हैं तो उसके लिए सच्चे प्रयत्न करने होंगे । घर को एक बड़ा मजाक मत बनाइए । संकल्प लीजिए, सच्चे बनिए और कारण का पता लगाने का प्रयत्न कीजिए । वस्तुस्थिति का निरीक्षण कीजिए ।
उसकी विवेचना कीजिए, उसका विश्लेषण कीजिए और आप देखेंगे कि परिवारों में कलह का, सामंजस्य की कमी का कारण यह है कि ये लोग प्रकृति के नियम नहीं जानते, उनसे पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं । उनके ऊपर अज्ञान का भूत सवार है । वे नहीं जानते हैं कि प्रकृति का विधान क्या है और विकास की गति किस दिशा में जा रही है । उन्हें इसका पता नहीं ।
राम आपको बतलाता है कि जिस दिशा में विकास के क्रम चल रहे हैं और संपूर्ण प्रकृति कार्य कर रही है, वह यह है कि हर एक व्यक्ति, सभी लोग अंतर्निहित ईश्वरत्व के साक्षात्कार के लिए धीरे-धीरे, चरणबद्ध विधि से आगे अग्रसर होते जाएं । यही मार्ग है, जिस पर इस संसार के सभी दृश्य संचालित होते हैं । यही सच्ची विधि है ।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंतःस्थ के ईश्वर की अनुभूति करनी चाहिए, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतर्निहित दिव्यता का साक्षात्कार कर, पूर्ण दिव्यात्मा, पूर्ण आत्मा बन जाना चाहिए । अस्तित्व के लिए संघर्ष का कारण यही है कि हम इस सत्य की अनुभूति नहीं करते हैं ।