अपने घर को आनंदमय कैसे बनाएं ? — भाग 4
आप अपने पति या पत्नी से ऐसे मधुर संबंध बनाएं जिससे आप लोग सही दिशा में प्रगति कर सकें और प्रकृति की योजना के अनुसार अपना काम कर सकें ।
प्रकृति का विधान है—'स्वतंत्रता, स्वतंत्रता, स्वतंत्रता' । आप अपनी पत्नी को अपने से स्वतंत्र कर दीजिए और आप स्वयमेव पत्नी से स्वतंत्र हो जाएंगे । इसका क्या तात्पर्य है ? क्या इसका यह मतलब है कि एक झटके में सभी बंधनों को समाप्त कर दिया जाए, उनका अस्तित्व ही नष्ट कर दिया जाए ? क्या इसका यह मतलब है ? अथवा क्या इसका यह तात्पर्य है कि इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को बे-लगाम या छुट्टा छोड़ दिया जाए और प्रत्येक नारी बिल्कुल ही स्वच्छंद और मनमानी करने लगे ?
नहीं, नहीं, इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है । इस तरीके से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती है, यह तो बंधन है, यह तो गुलामी है । अपने अर्द्धांग, अपने साथी को स्वतंत्र बनाने का तात्पर्य यह है कि आप अपने पति या पत्नी के हृदय में यह भाव कूट-कूटकर भर दें कि वह आपके शरीर में विश्वास और आस्था न करे, बल्कि अपने अंतर्निहित ईश्वर पर विश्वास करे । उसमें अनन्य आस्था रखे । जब पति अपनी पत्नी को प्यार करे या पत्नी अपने पति को प्यार करे तो पति या पत्नी को अपने अर्द्धांग के अंतर्निहित ईश्वर से प्यार करना चाहिए और अर्द्धांग के प्रेम को स्वयं में अंतर्निहित ईश्वर के रूप में स्वीकार करना चाहिए ।
लोग कहते हैं कि वे सभी ईसा मसीह में विश्वास करते हैं । पर राम कहता है कि आपको अपनी पत्नी या पति में विश्वास करना चाहिए । राम कहता है कि ''आप अपने सहयोगी, अपने अर्द्धांग के मांस-पिंड पर विश्वास न करें, वरन् उसकी अंतःस्थ दिव्यता में प्रगाढ़ आस्था रखें ।'' आपको अपने अर्द्धांग के बाहरी हाड़-मांस और त्वचा को एक आवरण मात्र मानना चाहिए जो आपके लिए पारदर्शी हो और आप उस आवरण से आगे अंतःस्थ ईश्वर का दिग्दर्शन कर सकें ।
हमें उस प्रकार की चिड़िया बननी चाहिए जो इस क्षण उस डाल पर बैठ गई है जो पहले से झूल या डोल रही थी । वह चिड़िया अनुभव करती है कि यद्यपि डाल झूल रही है, लेकिन वह निर्भीक भाव से अपने गीत गाने में निमग्न रहती है, क्योंकि वह जानती है कि उसके पंख हैं । डाल नीचे-ऊपर डोलती रहे, लेकिन चिड़िया पर उसका कोई असर नहीं होता ।
वह तो निडर है, क्योंकि यद्यपि वह झूलनेवाली डाल पर बैठी है, लेकिन उसे मालूम है कि उसके पर हैं । चिड़िया जानती है कि उसका झूलनेवाली डाल पर विश्वास नहीं है, परंतु उसे तो अपने परों का भरोसा है । बस, यही विधि है । चिड़िया का विश्वास उस डाल पर नहीं है जिस पर वह बैठी है, उसकी आस्था तो अपने परों पर है ।
इसी प्रकार, जहां कहीं भी आप हों, आप अपनी बीवी-बच्चों से कितना भी अनुराग, प्रेम करते हों, परंतु आप वहां पर मत रुकिए, वहीं पर विश्राम मत करने लगिए और अपना हृदय वहीं न जमने दीजिए । आप अपने हृदय को ईश्वर के साथ बनाए रखिए, आप अपने हृदय को अपने भीतर के ईश्वरत्व पर केंद्रीभूत होने दीजिए । यही विधि है ।
आप स्वयं इसी तरीके से व्यवहार कीजिए और अपने बीवी-बच्चों को इसी प्रकार का व्यवहार करने दीजिए । आप उन सभी से स्वतंत्र हो जाएंगे और वे भी आपसे स्वतंत्र हो जाएंगे । कोई भी आश्रित नहीं है, सभी स्वतंत्र हैं, पूर्ण स्वाधीन हैं । इस प्रकार प्रत्येक अमरीकी, प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र हो सकता है ।
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एक बार एक जगह सर्वाधिक सुंदर चित्र का प्रदर्शन हो रहा था । उस चित्र में एक भव्य पलंग था और उस पर अति सुंदर, शाही बिस्तर बिछे थे, रंग-बिरंगे तकिये रखे थे । उस पलंग पर एक अत्यंत रूपवती रानी, अत्यंत सुंदर महिला लेटी थी । उस पलंग के एक किनारे उसके पुत्रादि बैठे थे और दूसरे किनारे पर उसका पति—वहां का राजा एक कुर्सी पर विराजमान था । वह अत्यंत सुंदर चित्र था, वह अत्यधिक चित्ताकर्षक था, अत्यंत मोहक था ।
चित्र में प्रदर्शित किया गया था कि रानी अत्यंत बीमार है, मरणासन्न है और उसका पति, वहां का राजा आंसू बहा रहा है तथा उसके पुत्र और पुत्रियां रो रही हैं । वह बहुत ही अधिक मार्मिक, हृदय को उद्वेलित करने वाला चित्र था । क्या आप उस सुंदर चित्र को अपने पास रखना चाहेंगे ? निस्संदेह आपमें से हर एक उस चित्र के लिए लालायित होगा ।
यदि आपने वह चित्र देख लिया होता तो आपने उसे अवश्य खरीद लिया होता, क्योंकि वह बिल्कुल सजीव चित्र था । उस चित्र को आप अपने पास क्यों रखना पसंद करेंगे ? उस चित्र में एक अनुपम आभा दिखाई पड़ती थी जो आपको मोहित करती थी । परंतु क्या आप वह मरणासन्न रानी बनना पसंद करेंगे ? वह अत्यधिक धनी थी, लेकिन थी तो मरनेवाली ही । और क्या आप उसका आंसू बहानेवाला पति या उसके रोने-चिल्लाने वाले बच्चे बनना पसंद करेंगे ? कभी नहीं !
वेदांत की आपसे अपेक्षा है कि आप अपने-अपने परिवारों में रहें, अपने घरों में ईश्वर की स्थिति में प्रतिष्ठित होकर रहें, अपने गृहों में साक्षी के रूप में, अमूर्त ईश्वर के रूप में रहें, आप किसी से आसक्त न हों, आप किसी के साथ बंधन में न बंधें, अनुरागहीन रहें । अपने चित्त को हमेशा निश्चल बनाए रखें, अनासक्त रहें, अपने हृदय और मन को अंतःस्थ दिव्यात्मा पर सदैव केंद्रित रखें और घरेलू कार्यकलाप को उसी दृष्टि से देखें जिस प्रकार आप उस मनोरम चित्र को देख रहे थे । आप जानते हैं कि जब आप साक्षी के रूप में सर्वत्र सभी कार्यों को देखेंगे तो वह आनंद का स्रोत होगा और यदि आप स्वयं उन कार्यों में लिप्त हो गए तो वही दुःख का कारण होगा ।
यदि हम इस विश्व के दृश्यों, उसके कार्यकलाप में अपने को संलग्न कर लें, उलझा लें तो हमारी दुर्दशा ही होगी । परंतु जब इन्हीं चीजों को साक्षी के रूप में निर्विकल्प दृष्टि से देखेंगे तो हमें उनसे आनंद आएगा और वे हमें अतिसुंदर लगने लगेंगी । इसलिए अपने अंतःस्थ दिव्यात्मा का साक्षात्कार कीजिए ।
राम के व्याख्यानों को ध्यान से सुनिए तथा गुनिए और आप धीरे-धीरे प्रगति करते हुए सत्य के बारे में आश्वस्त हो जाएंगे । राम सभी को विश्वास दिलाता है, वचन देता है कि इस संसार में जो कोई भी व्यक्ति राम के व्याख्यानों को सुनेगा, उसकी सारी शंकाएं निर्मूल हो जाएंगी और अपने स्वयं की दिव्यात्मा में उसका संकल्प और आस्था पूर्णरूपेण स्थिर हो जाएगी ।
इसके लिए पहली आवश्यकता यह है कि आप अपनी दिव्यता में, अपने ईश्वरत्व में अपना दृढ़ विश्वास, निश्चल आस्था उत्पन्न करें । इस विश्वास को अर्जित कीजिए और फिर जो प्रक्रिया आप लोगों को बतलाई जाएगी और स्पष्ट की जाएगी, उससे आप अपनी दिव्यता में अपने आपको केंद्रित कीजिए । उसी दिव्यता का रूप बनिए, अपने आपको शाश्वत, सर्व शक्तिमान ईश्वर के रूप में अनुभूति कीजिए ''मैं वही ईश्वर हूं, मैं वही दिव्यात्मा हूं ।'' इसका साक्षात्कार कीजिए, इसकी अनुभूति कीजिए तथा अपनी गृहस्थी के संबंधों एवं अन्य प्रकरणों को इसी दृष्टि से देखिए, मानो वे चित्र मात्र हों और उन चित्रों से आपको कोई विशेष सरोकार और लगाव नहीं है ।
ऐसा मालूम हो सकता है कि यह कथन विरोधाभासी है और यह कथन स्वतः ही अपना खंडन कर रहा है । लोग कहते हैं कि यदि वे सांसारिक मामलों में अपने को न फंसाएं और उनमें न उलझें तो वे उन्नति नहीं कर सकते हैं । अरे ! आप भूल कर रहे हैं । वास्तविकता यह है कि जिस क्षण आपने अपने आपको इन झमेलों में व्यस्त किया, उसी क्षण आपने उन्नति करना बंद कर दिया ।
जब आप लेखन कार्य कर रहे हों तो उसकी सफलता आपके निस्पृह भाव से, अकर्त्ता-भाव से करने पर निर्भर होती है । उस समय आपका अहंकार, आपकी क्षुद्रात्मा, मिथ्याभिमान बिल्कुल ही नहीं रहता है । आपका काम, आपका लेखन स्वतः ही, यांत्रिक रूप से, अपने आप संपन्न होता रहता है । यह एक प्रकार का परावर्तित कार्य है । आपका हाथ स्वयमेव ही लेखन-कार्य में तल्लीन हो जाता है, काम होता रहता है ।
ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि आप इस कार्य में अपनी क्षुद्रात्मा को, अपने स्वार्थी अहंकार को हस्तक्षेप नहीं करने देते । जिस क्षण आपके अपने मन में यह विचार उत्पन्न होना प्रारंभ हुआ कि ''देखो, मैं कितनी महान कृति लिख रहा हूं, मेरा लेखन कितना अद्भुत हो रहा है'', बस, उसी क्षण आप चूक कर बैठते हैं और आपकी लेखनी भी भूल करने लगती है ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि कार्य तभी संपन्न होता है, जब हम अपने क्षुद्र स्वार्थपरक अहंकार से विरत हो जाते हैं । जिस क्षण आप क्षुद्र अहंकार के भंवर जाल में फंसे, आपका सारा कार्य उसी क्षण बिगड़ गया । सर्वोत्कृष्ट कार्य वही होता हो जो अकर्त्ता भाव से, निरासक्त भाव से किया जाता है । त्याग का तात्पर्य इस क्षुद्र, व्यक्तिगत, स्वार्थपरक अहंकार से छुटकारा पाना है । जीव-भाव के मिथ्याभिमान से विरत होना है ।
सूर्य प्रकाशित होता है । सूर्य को यह भान नहीं है कि वह कार्य कर रहा है । सूर्य अत्यंत मोहक, चित्ताकर्षक है, क्योंकि वह व्यक्तिगत भाव से शून्य रहता है, निर्लिप्त, निस्पृह है । नदी प्रवाहित होती है । उसके प्रवाह में व्यक्तिगत क्षुद्र अहंकार किंचित मात्र भी नहीं रहता, लेकिन वह अपना काम निरंतर करती रहती है ।
दीपक जलता है, लेकिन उसमें यह व्यक्तिगत अहंकार नहीं रहता है कि ''मैं महान हूं, मैं प्रज्वलित हो रहा हूं, मैं प्रकाश फैला रहा हूं ।'' इस अहंकार से दीपक नहीं जलता है । फूल खिलते हैं और अपनी सुगंधि चारों ओर फैलाते रहते हैं । परंतु उनमें यह भाव नहीं होता है कि वे अत्यंत मधुर हैं, वे अत्यंत प्रिय हैं ।
इसी प्रकार आप अपना कार्य भी अकर्त्ता भाव से होने दें । आप अपने कार्य को स्वार्थपरक अहंकार के किंचित प्रदूषण से उन्मुक्त रखें, आप अपने कार्य को ठीक उसी प्रकार होने दें, जिस प्रकार तारे और सूर्य करते हैं, आप अपने कार्य को चंद्रमा की भांति संचालित होने दें । केवल तभी आपका कार्य सफल होगा । केवल तभी आप इस संसार में वास्तविक रूप से कुछ कर सकने में समर्थ हो सकेंगे । सभी नायकों ने, सभी प्रतिभा-संपन्न व्यक्तियों ने इस रहस्य का पता लगा लिया था, इस रहस्य पर अपना अधिकार जमा लिया था । उन्होंने अपने आपको अकर्त्ता के भाव में तिरोहित कर दिया था । और तभी उनके कार्य इतने प्रतिभा संपन्न हो सके । यही विधान है । इसलिए आप इस भ्रामक विचार का परित्याग कर दें कि जब तक किसी मामले में आप अपने आपको उलझाएंगे नहीं, तब तक आप कभी भी उन्नति नहीं कर सकेंगे । इस तरह का विश्वास करने में आप भयंकर भूल करते हैं ।
शाश्वत विधान यही है कि मनुष्य को विश्राम की अवस्था में, शांति की दशा में और अविचलित स्थिति में रहना चाहिए परंतु उसका शरीर सदैव गति में रहना चाहिए । उसका चित्त 'स्थिति-विज्ञान' के नियमों का अनुपालन करता रहे और उसका शरीर 'गति-विज्ञान' के नियमों का । शरीर को कार्य में संलग्न और आंतरिक आत्मा को सदैव विश्राम की स्थिति में, स्थिर होना चाहिए । यही विधान है ।
इसके अनुसार आप स्वतंत्र हों । अपने कार्यों को उतनी ही सच्चाईपूर्वक, परंतु उतनी ही कोमलतापूर्वक संपन्न होने दें, जिस प्रकार नेत्रों पर कोई चित्र चित्रित होता है । आपके नेत्रों पर निस्संदेह चित्र अपनी सच्ची छाया में, अपने पूर्ण परिवेश में अंकित रहता है परंतु यह सबकुछ कितनी कोमलतापूर्वक होता है । इससे नेत्रों पर भार नहीं पड़ता है । सभी चित्र आंखों में अंकित रहते हैं, परंतु नेत्र तो स्वतंत्र ही बने रहते हैं । उन पर भार का कोई आभास नहीं होता ।
बस, ठीक इसी प्रकार आपकी स्थिति, अपनी गृहस्थी के मामलों में, अपने परिवार के मामलों में, सांसारिक जीवन में बनी रहनी चाहिए । आप इन सभी दृश्यों को, इन सभी प्रयोजनों को देखें, परंतु उनमें उलझें नहीं, निरापद हों, स्वतंत्र हों । और यह स्वतंत्रता केवल उसी दशा में प्राप्त की जा सकती है, जब आपको पूर्ण सत्य का, जिसे वेदांत कहते हैं, साक्षात्कार करके सत्यात्मा का ज्ञान हो जाए । अपनी वास्तविक दिव्यात्मा की अनुभूति कीजिए और तभी सभी नक्षत्र, सभी ग्रह, सभी तारे आपकी आज्ञा का अनुपालन करने लगेंगे ।
ओ अगणित सूर्यो, ओ अपार तारो ! ओ प्रकाशों के प्रकाशपुंज के लघुत्तम कणो ! ओ सूर्यो के सूर्य ! तुम सभी आओ, विचरण करो, भ्रमण करो मुझमें, मुझ ही में । ओ समस्त ब्रह्मांड मंडलो ! ओ समस्त भू-धराओ ! गिरो, उठो तुम सभी, और डोलो उधर-इधर, विचरण करो, भ्रमण करो मुझमें, मेरे अथाह तरंगित महासागरों में, केवल भंवरों की भांति, लहरों की तरह । ओ अनेकानेक संसारो ! ओ मेरे तारागणों ! घूमो तकली की भांति, छिपाओ कुछ भी नहीं और दिखाओ नाचते-नाचते अपने सभी अंग, सभी भाग ! क्या नहीं मालूम, सभी सूर्य, सभी तारे, समूची पृथ्वी, सभी महासागर घूमते हैं मेरे स्वप्न की छाया की भांति ? मैं चलता हूं, मैं घूमता हूं, मैं आता हूं, मैं जाता हूं । मैं ही हूं, गति, गतिमान और गतिकारक, नहीं है विश्राम, नहीं है गति मुझमें, न ही है कोई मेरा या तेरा, मैं तो हूं शब्दातीत, वर्णनातीत । ओ छोटे-छोटे तारो ! चमको, दमको, मीचो आंखें, झपकाओ पलकें, और पुकारो मुझे । पर, उत्तर दो पहले ओ प्यारे-प्यारे छोटे तारो ! कहां से देते हो संकेत मुझको ? कहां से पुकारते हो मुझको ? मैं ही तो चमकता हूं तुम्हारी आंखों में, और मैं ही हूं जीवन तुम्हारा, वह जीवन जो तुम कहते हो मेरा है उसे मैं ही जीता हूं ।
यह है आपकी वास्तविक आत्मा, यही है आपका स्वरूप जो आप स्वयं हैं । इसका साक्षात्कार कीजिए और स्वतंत्र बनिए । इसकी अनुभूति कीजिए और आप ब्रह्मांड के स्वामी बन गए । इसका साक्षात्कार कीजिए और देखिए कि आपके सारे के सारे उद्यम, आपके संपूर्ण कार्यकलाप अपने आप, स्वतः ही आपके सम्मुख सर्वाधिक वांछनीय रूप में संपन्न होकर उपस्थित होंगे ! आप तब स्वयं देखेंगे कि सफलता आपके पीछे-पीछे आपको खोजती हुई दौड़ रही है, आपको तब सफलता की आकांक्षा करने की आवश्यकता नहीं होगी । आप देखेंगे कि अंतःस्थ दिव्यात्मा की इस आस्था से, अंतःस्थ के ईश्वर के इस साक्षात्कार से, संपूर्ण ब्रह्मांड आपका दासानुदास बन जाएगा और इस संसार की प्रत्येक वस्तु आपके आधीन स्वयमेव हो जाएगी ।
आप अनुभव करेंगे कि सफलता और समृद्धि आपको खोजती फिरेगी और आपको इनके पीछे नहीं दौड़ना होगा । कहावत है कि ''यदि पहाड़ मुहम्मद के पास नहीं आते हैं तो मुहम्मद पहाड़ों के पास जाएगा ।'' जिस क्षण आप सांसारिक पदार्थों से सुख की अनुभूति लेना समाप्त कर देंगे, उसी क्षण आप स्वतंत्र हो जाएंगे तथा अपने भीतर की दिव्यात्मा का साक्षात्कार कर लेंगे । उसी क्षण से आपको मुहम्मद के पास जाने की आवश्यकता नहीं होगी । मुहम्मद खुद-ब-खुद आपके पास खिंचे चले आएंगे ।
यही विधान है । यही रहस्य है । यही छिपा रहस्य संपूर्ण संसार का नियामक है । यही मौलिक सत्य आप स्वयं हैं । इसका साक्षात्कार कीजिए, अपनी पत्नी और बाल-बच्चों को यही अनुभूति कराइए । आप स्वयं स्वतंत्र हो जाइए और साथ ही वे सभी लोग भी स्वतंत्र हो जाएंगे । तभी आप इस यथार्थरूपी काल कोठरी को स्वर्ग में परिणत कर देंगे, आप अपने घर को अपने लिए स्वर्ग बना लेंगे, आप सर्वाधिक झगड़ालू घरों को सुख और आनंद से परिपूर्ण कर देंगे ।
इसके अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है और न ही इस अपरिहार्य, अपरिवर्तनीय तथा कठोर नियम से कोई छुटकारा है । यही एकमात्र मार्ग है । यही विधान वह अनमोल कुंजी है, यही विधान वह अचूक मंत्र है जो विश्व के सभी कोषों के सभी द्वार तत्क्षण खोल देंगे । यदि आप अपने अंतःस्थ की दिव्यात्मा का साक्षात्कार कर लेंगे तो आप स्वतंत्र हैं । कृपया आप दूसरों को इसी सत्य, इसी विधान की अनुभूति कराने में सहायता करें ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!