पुनर्जन्म और गृहस्थ के संबंध — भाग 3
इसी तरह आपके संबंध, आपके बंधन बदलते रहते हैं । वे नित्य नहीं बनाए जा सकते । यदि आपके हृदय में इस प्रकार की कोई आसक्ति हो, तो इसे तुरन्त त्याग दें ।
Rivers may flow uphill, Wind may blow downward, Fire may emit cold rays, The sun may shed darkness, But this Law of the impermanence of wordly relations, Wordly connections cannot be frustrated or foiled. नदियां चाहे उलटकर पहाड़ पर चढ़ जाएं, पवन चाहे नीचे की ओर धंस जाए ! अग्नि चाहे ठंडी किरणें उगले, और चाहे सूर्य अंधकार फैला दे । किंतु सांसारिक रिश्तों की, अनित्यता का नियम तोड़ा नहीं जा सकता, बिगाड़ा नहीं जा सकता ।
यह अटल नियम है । यदि आपका विचार कुछ दूसरा है, तो आप गलती पर हैं । ठीक नदी-नाव संयोग का-सा हाल है । लकड़ी के लट्ठे नदी की सतह पर तैरते-बहते रहते हैं, एक लट्ठा इधर से आता है और दूसरा उधर से । क्षणभर के लिए उनका मिलन होता है, पलभर वे जुड़े रहते हैं और फिर शीघ्र पृथक हो जाते हैं । एक तेज लहर उठकर उनको अलग-अलग कर देती है । संभव है, नदी में बहते हुए ये लट्ठे फिर मिल जाएं, किंतु फिर भी उनको किसी समय अलग होना पड़ेगा । ठीक जिस प्रकार आपके जीवन में, आपके नित्य-प्रति के काम-काज में, पिता और माता, भाई और बहन एक साथ रहते हैं, किंतु हर चौबीस घंटों में वे अलग-अलग हो जाते हैं । दिन में अनेक बार वे चंद मिनटों के लिए मिलते हैं, उसके बाद पुनः अपने-अपने कमरों या दफ्तरों में चले जाते हैं । जिस प्रकार घर-घर में, हर एक परिवार का एक छोटे पैमाने पर मिलन और वियोग होता रहता है, उसी प्रकार एक बड़े पैमाने पर आपके संबंधियों, रिश्तेदारों और मित्रों का मिलन और वियोग चलता रहता है । आप सदा-सर्वदा, एक साथ, साथ-साथ नहीं रह सकते । यदि यह बात है, तो फिर बच्चों का सा खेल क्यों करते हैं ?
जो सदा टिकनेवाला है, जो नित्य और शाश्वत है, फिर क्यों नहीं उसी से सबसे अधिक संबंध जोड़ते । क्षणिक संबंधों की अपेक्षा, जो नित्य है, उसी के लिए फिर अधिक चिंता क्यों नहीं करते ? उसी नित्य स्थायी तत्व का अधिक विचार क्यों नहीं करते ? जिससे आप पृथक नहीं हो सकते, उसे पाने और अनुभव करने का यत्न क्यों नही करते ? अरे ! उस स्थायी तत्व, वास्तविक नित्यता के बलिदान का यत्न क्यों नहीं करते ? शीघ्र टूटनेवाले, अस्थायी नातों के पीछे उस असली तत्व की कुर्बानी क्यों करते हैं ? भारतवर्ष में एक नवविवाहिता युवती थी । वह अपनी सास और अपनी ननदों के साथ बैठी हुई मजेदार गपशप कर रही थी । उस नई दुल्हन का पति उस समय उपस्थित नहीं था, वह कहीं गया हुआ था । नई दुल्हन की ननदों ने उसके पति के विरुद्ध कुछ अयोग्य वचन कहे । राम वहां मौजूद था । राम ने उस दुल्हन के मुख से ये मधुर शब्द निकलते सुने । उसने कहा, ''आपके लिए, आपके जिन उन ( मेरे पति) के साथ आपको केवल दो-चार दिन रहना है, मैं उनसे, जिसके साथ मुझे अपनी सारी जिंदगी बितानी है, बिगाड़ करके बच्चों की सी नादानी नहीं करूंगी ।''
कम से कम उस दुल्हन जैसी, उस महिला जैसी बुद्धि तो रखें । ये सब सांसारिक बंधन, ये लौकिक नाते-रिश्ते सदा न टिके रहेंगे । आपको अपना सारा जीवन उस सच्ची आत्मा के साथ बिताना है, जो नित्य है । आप उससे संबंध नहीं तोड़ सकते । इस चंचल वर्तमान के लिए आपको सच्ची आत्मा से नाता नहीं तोड़ना चाहिए । आप अपने आपको बेचते क्यों हैं ? आप ऐसा जीवन क्यों बिताते हैं, जो आपको क्षुद्र बनाता है ? उस अंतरंग परमेश्वर का क्यों नहीं अनुभव करते, सच्ची आत्मा से क्यों अलग होते हैं ? ज़रा बुद्धिमान बनें !
बुद्ध भगवान के पास एक आदमी पहुंचा और उनसे उनके पिता के महल में चलने के लिए कहने लगा । आप जानते हैं कि वही बुद्ध भगवान, जो किसी समय राजा थे, राजकुमार थे, उस समय भिक्षु बन गए थे । उन्होंने सबकुछ त्याग दिया और भिक्षु हो गए । भिक्षु के बाने में यत्र-तत्र घूमते-फिरते थे, किसी से कुछ मांगते नहीं थे । यदि उनके कमंडल में, जिसे वे अपने हाथ में लिए रहते थे, कोई कुछ डाल देता, तो वाह-वाह, अन्यथा वे शरीर के लिए, इस सांसारिक जीवन के लिए तिनका भर भी परवाह नहीं करते थे ।
वे अपने पिता के राज्य में गए और भिक्षु के बाने में वहां की सड़कों पर घूमने लगे । उन्हें भिक्षु कहना गलती थी । वह फकीरी नहीं, वह तो शहंशाही है । जो कोई वस्तु नहीं खोजता, जो कोई चीज नहीं मांगता, यदि वह नष्ट हो जाए तो क्या ? नष्ट हो जाने दो । क्या परवाह है । भोजन या वस्त्र मांगने के लिए वह कभी आपके पास नहीं आता ।
उसी भेष में वे सड़कों पर घूम रहे थे । उनके पिता ने यह हाल सुना, वह उनके पास आए, और बिलखते रोते हुए बोले, ''बेटा ! मेरे प्यारे कुमार ! मैंने ऐसा कभी नहीं किया, तुम जो पोशाक पहने हो, वह मैंने कभी नहीं पहनी । मैं ही क्यों, मेरे पिता अर्थात तुम्हारे प्रपिता ने साधुओं का यह भेष कभी नहीं धारण किया, तुम्हारे प्रपितामाह भिक्षु बनकर कभी सड़कों पर नहीं घूमे । हम लोग राजा रहे हैं, तुम भी राजघराने के हो, फिर तुम यह फकीरी बाना धारण करके, आज हमारे वंश को क्यों अपमानित और लज्जित कर रहे हो ? दया करके ऐसा न करो, दया करके ऐसा न करो । मेरे सम्मान की कुछ तो रक्षा करो ।''
मुस्कुराते हुए बुद्ध भगवान ने उत्तर दिया, उन्होंने हंसते हुए कहा, ''महाराज ! महाराज ! मैं उसे खूब देखता हूं, मैं अपने पूर्वजन्मों को जानता हूं, मैं देखता हूं कि जिस वंश का मैं हूं, वह सदा से भिक्षुओं का वंश रहा है ।'' इसका दृष्टांत इस तरह दिया जा सकता है ।
यह एक सड़क है और वह एक दूसरी सड़क आई है । बुद्ध भगवान कहते हैं—महाराज ! आप अपने पूर्वजन्मों से उस राह से चलते आए हैं, और मैं इस राह से चला आ रहा हूं और इस जन्म में हम लोग चौराहे पर मिल गए हैं । अब मुझे अपनी राह जाना है और आपको अपनी राह जाना है ।
बंधन कहां है ? संबंध कहां है ? आप कहते हैं कि आपके अपने बाल-बच्चे हैं । आप राम को क्षमा करेंगे, यदि वह ऐसी बातें कहता है, जो इस देश की सभ्यता के द्वारा अशोभनीय समझी जाएं । आप कहते हैं कि ये बच्चे आपके हैं, आप कहते हैं कि यह मेरा पुत्र है, मेरे मांस का मांस, मेरे रक्त का रक्त, मेरी हड्डी की हड्डी । अरे, यह तो स्वयं मेरी आत्मा है, यह मेरा पुत्र है, ओह प्यारा दुलारा बेटा ! नन्हा-सा मनोहर बच्चा ! और आप उसे अपने हृदय से चिपटाते हैं, आप अपने गले लगाते हैं, किंतु तनिक अपने तत्वज्ञान की समीक्षा तो करें । वह बच्चा आपका है और आप चाहते हैं कि वह गांठ सदा स्थायी बनी रहे । आप इस संबंध को अनंत काल तक चलाना चाहते हैं । अब कृपया, सत्य के नाम पर उत्तर दें कि यदि बच्चा आपका पुत्र है और आपकी देह से पैदा होने के कारण आप अपने इस संबंध को स्थिर रखना चाहते हैं, तो उन जुओं का क्या होगा ? क्या वे आपके देह से नहीं पैदा हुई हैं ? क्या वे आपके पसीने से उत्पन्न नहीं हैं ? क्या वे आपके खून की खून नहीं, क्या उनका खून आपके बदन से नहीं लिया गया है ? क्या उनका समग्र जीवन आपके जीवन से नहीं बना है ? तनिक उत्तर दीजिए ।
एक तरह के बच्चे की हत्या करना, एक तरह के बच्चे को नष्ट करना और दूसरी तरह के बच्चे को चूमना-चाटना, उस पर सारे प्रेम की वर्षा करना अन्याय है, कैसा असंगत है ! अपने तर्क को देखें ! 'राम' का यह अभिप्राय नहीं है कि आप अपने बच्चों के प्रति निष्ठुर हो जाएं और आप उनकी जरूरतों की ओर ध्यान ही न दें । राम यह बिल्कुल नहीं चाहता । 'राम' का उपदेश है कि आपको संपूर्ण संसार को अपनी आत्मा समझना चाहिए, और वैसे ही अपने बच्चों को भी आपको अपनी आत्मा मानना चाहिए । आप राम की बातों का अनर्थ न करना । 'राम' केवल यह कहता है कि 'आपके पारिवारिक बंधन आपकी अपनी उन्नति को न रोकने पाएं । अपने पारिवारिक संबंधों को अपने मार्ग में बाधक न बनने दें । वे आपकी अग्रसर गति में बाधा क्यों डालें ?''
जब इस शरीर ने, आपकी आत्मा ने, जिसे आप 'राम' कहते हैं, संन्यास ग्रहण किया था, अपने पारिवारिक संबंध और अपने लौकिक पद का परित्याग किया था, तब उनसे कुछ लोगों ने कहा था—''स्वामीजी, स्वामी जी ! यह क्या बात है कि आपने स्त्री, बच्चों, नातेदारों और उन विद्यार्थियों के हकों का कोई खयाल तक नहीं किया, जो आपसे सहायता और उपकार की आशा रखते थे, आपने उन लोगों के दावों का बिल्कुल लिहाज नहीं किया ?'' यह प्रश्न पूछा गया था । 'राम' पूछता है—''आपका पड़ोसी कौन है ?'' तनिक देखिए । जिस मनुष्य ने 'राम' से वह प्रश्न किया था, वह विश्वविद्यालय में राम का सह-अध्यापक था । राम ने उससे कहा—''आप एक अध्यापक हैं, आप कॉलेज में दर्शन-शास्त्र पढ़ाते हैं, क्या आप यह कह सकते हैं कि आपकी स्त्री और बच्चों में भी उतनी ही विद्या है जितनी आप में ? क्या आप कह सकते हैं कि आपकी चाची और दादी भी उतनी ही विद्वान हैं जितने आप ? क्या आपके चचेरे भाइयों को भी उतना ही ज्ञान है ?'' उसने उत्तर दिया—''नहीं, मैं अध्यापक हूं, उनमें मेरी जितनी विद्या कहां ?'' राम ने कहा—''अच्छा, यह क्या बात है कि आप विश्वविद्यालय में तो पढ़ाते हैं, किंतु आप अपने छोटे बच्चों, अपनी स्त्री और अपने नौकरों को नहीं पढ़ाते ? आप अपनी दादी और अपने चचेरे भाइयों, अपनी भावजों को क्यों नहीं पढ़ाते । यह क्या बात है ?'' उसने कहा कि वे मेरे व्याख्यान को समझ नहीं सकते । तब उसे निम्नलिखित बातें समझाई गई थीं—
देखो । ये सचमुच आपके पड़ोसी नहीं हैं । नौकर-चाकर, यह दादी, यह स्त्री और यह बाल-बच्चे और आपका यह कुत्ता भी आपका पड़ोसी नहीं है । यद्यपि कुत्ता आपका रात-दिन का साथी है, कभी आपका साथ नहीं छोड़ता, अज्ञानी की दृष्टि में वह आपका सबसे बड़ा साथी हो सकता है, किंतु आप जानते हैं कि कुत्ता, नौकर-चाकर और मूर्ख चाची और दादी आपके पड़ोसी नहीं हो सकते । आप कौन हैं ? आप शरीर नहीं हैं, आप शुद्ध आत्मा हैं, किंतु यूरोपीय दार्शनिक होने के कारण आप इसे स्वीकार नहीं करते । अच्छा, आप मन हैं, अतः आपके पड़ोसी भी वही हैं जो सदा आपके साथ उसी उच्च स्तर में रहते हैं, जहां आपका मन रहता है । विद्यार्थी, शास्त्री, विद्याविशारद, अपने अध्ययन के कमरे में उन्हीं पुस्तकों पर ध्यान लगाते हैं, उसी विषय का चिंतन करते हैं, वही चीज पढ़ते हैं जो आप पढ़ते हैं । आपका चित्त उन्हीं विषयों में रमता है, जिनमें उनका । अतः वे आपके पड़ोसी हैं ।
जब आप अपने पढ़ने के कमरे में होते हैं, लोग कहते हैं कि आप विद्यागार (Study Room) में हैं । ईमान से कहिएगा कि आप उस समय कमरे में होते हैं या अपने विचारों की तल्लीनता में । आप उस समय पढ़ने के कमरे में नहीं रहते हैं, यद्यपि कुत्ता आपकी गोद में बैठा रहता है, यद्यपि आपके बच्चे कमरे में खेलते रहते हैं, किंतु वे आपके लिए कुछ भी नहीं होते । आप तो दार्शनिक लोक में विचरते हैं । उतनी ऊंचाई पर आपके पड़ोसी वही विद्यार्थी होते हैं जो अपने-अपने घरों में वही विषय पढ़ते हैं । वही आपके सच्चे पड़ोसी हैं । वही आपके अत्यंत समीपवर्ती पड़ोसी हैं । और इस प्रकार, आपकी सहानुभूति-संवेदना अपनी चाची और दादी, कुत्ते अथवा नौकर-चाकरों की अपेक्षा, जो आपके पड़ोसी नहीं हैं, उन विद्यार्थियों तक अधिक पहुंचती रहती है । आपका पड़ोसी तो वह है, जो आपकी वृत्ति के अधिक समीप हो, जो उसी लोक में रहता हो जिसमें आप रहते हैं । आपका पड़ोसी वह नहीं है जो उसी घर में रहता है और फिर मक्खियां भी तो उसी घर में रहती हैं, कुत्ते और बिल्लियां भी तो उसी घर में रहती हैं ।
अध्यापक महोदय ! अब मुझे बताएं, यदि आपके हाथ की बात हो, तो आप आगे कहां पैदा होंगे ? क्या आप उसी अपढ़ दादी या चाची के परिवार में पैदा होंगे ? नहीं, नहीं । आप तो उस कुटुंब में पैदा होंगे, जहां के लोग आप जैसे चित्तवाले हों, जहां के लोग आपके लिए आपके अनुकूल परिस्थिति और वातावरण उत्पन्न कर सकें । आप अवश्यमेव वहीं पैदा होंगे । आप इससे इतर कुटुंब में पैदा न होंगे । इस प्रकार आप हर समय अपने पारिवारिक संबंध बदलते रहते हैं ।
प्रेम का अर्थ क्या है ? प्रेम का अर्थ केवल इतना ही है कि आप वही भावना रखते हैं, जैसी कोई दूसरा रखता है । इससे अधिक कुछ नहीं । आप एक मनुष्य को प्यार करते हैं । उसका स्वार्थ, उसका आनंद, उसका कष्ट वही है जो आपका । वही पदार्थ उसको पीड़ा पहुंचाते हैं, जिनसे आपको पीड़ा होती है । जो पदार्थ उसे सुखकर लगते हैं, वही आपको भी सुख देते हैं, वही पदार्थ उसे हर्ष देते हैं जो आपके लिए हर्षदायक हैं । यही प्रेम है, आप उसे प्रेम करने लगते हैं । आप किसी मनुष्य को उसकी खातिर प्यार नहीं करते, आप उसमें अपने आपको ही प्यार करते हैं, इससे अधिक कुछ नहीं । आप केवल अपने आपको प्यार कर सकते हैं । तीन मनुष्य हैं क, ख और ग । यह क है, यह ख है, यह ग है । अथवा इसे हम रासायनिक सूत्र के रूप में भी रख सकते हैं, 'क' और 'ख' में कुछ समान बात है, और 'क' तथा 'ग' में भी कुछ समान बात है, किंतु 'क' 'ग' में, 'क' 'ख' से अधिक समानता है, इसलिए 'क' 'ख' की अपेक्षा, 'ग' की और अधिक आकृष्ट होगा ।
बस, इसी प्रकार आपके पारिवारिक बंधन टूटते रहते हैं, बार-बार टूटते और जुड़ते हैं । इस भांति प्रेम का अर्थ केवल इतना है कि आप अपने आपका कुछ अंश किसी दूसरे मनुष्य में अनुभव करते हैं । जब कोई व्यक्ति पूर्णतया और एकमात्र आपका प्रतिरूप हो जाए, तब आप स्वयं प्रेमरूप बन जाएंगे ।
इस सिलसिले में हम एक दूसरे विषय पर पहुंचते हैं, जिसे राम आज नहीं उठाएगा । यह बड़े महत्व का विषय है । यह विषय है निर्भीकता । भय की सृष्टि कैसे होती है, भय का कारण क्या है ? उसमें यह दिखाया जाएगा कि यही आसक्ति, यही अपने बंधनों और संबंधों को सदा के लिए स्थिर रखने की इच्छा, संपूर्ण भय की जड़ है । लोग कहते हैं डरो मत, डरो मत । कितनी अतार्किक बात है ! मानो भय आपके वश में है । और वह आप पर हावी नहीं । भय की एक दवा बताई जाएगी, किंतु 'राम' उस विषय को यहीं छोड़ता है, वह फिर कभी उठाया जाएगा ।
यहां एक कविता, जो एक उपनिषद् का भाषांतर है, पढ़ी जाएगी, और फिर बस । यद्यपि अनुवाद सर्वांगपूर्ण नहीं है, फिर भी उससे कुछ आशय निकल ही जाएगा ।
The untouched soul, greater than all the World (because the world's by it exist). Smaller than subtle ties of things minutest Last of ultimatiest, Sits in the very heart of all that lives, Resting, it ranges every where! Asleep It roams the world unsleeping; How can one behold Divinest spirit as it is glad beyound joy existing Outside life beholding it in bodies bodiless Amid impermanency permanenet, Embracing all thing yet in the midst of all the mind Enlightened casts its grief away. ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
निर्लेष-आत्मा, लोक-लोकांतरों में सबसे महान ( क्योंकि लोक तो उसी में टिके हैं ) छोटी से छोटी चीजों की सूक्ष्म ग्रंथियों से भी सूक्ष्म, सबसे अंतिम से भी अंतिम, प्राणियों के हृदय में बैठा है । आराम करता हुआ भी, वह सर्वत्र प्रबंध बांधता है, सोता हुआ भी वह संसार में घूमता है, अनिद्रित ! कैसे कोई उस दिव्य आत्मा को देख सकता है, क्योंकि वह जीवन से परे विद्यमान, हर्ष से भी अधिक प्रफुल्लित है ।
शरीरों में देखता हुआ अशरीरी, अनित्यता के मध्य में नित्य, सृष्टि का आलिंगन करता हुआ, सबके मध्य में— उसके द्वारा प्रबुद्ध मन अपने शोक को दूर फेंक देता है, एकदम दूर !
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!