श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

पुनर्जन्म और गृहस्थ के संबंध

अध्याय 5 / 5 · भाग 2 / 3 · गृहस्थ में आनंद की यात्रा
अध्याय 5 / 5 · भाग 2 / 3

पुनर्जन्म और गृहस्थ के संबंध — भाग 2

भाई और बहन एक ही माता-पिता से पैदा होते हैं, उसी घर में अपना बचपन बिताते हैं । वे साथ-साथ बंधे हुए हैं । उनमें एक पारिवारिक ग्रंथि है । लड़का ऑस्ट्रेलिया चला जाता है और वहीं अपने नाते जोड़ लेता है । बहन फ्रांस चली जाती है और एक फ्रांसीसी नारी बन जाती है । बंधन कहां है ? अब हमारा प्रश्न है—यदि पुनर्जन्म सत्य है, तो क्या वह पारिवारिक बंधनों को तोड़नेवाला नहीं ? पारिवारिक बंधन तो इस संसार में विद्यमान नहीं, फिर वह ( पुनर्जन्म ) तोड़ेगा क्या ? वह पारिवारिक बंधनों का विच्छेद नहीं, क्योंकि पारिवारिक ग्रंथियां कहीं हैं ही नहीं ।

चलो, यदि हम ऐसा मान भी लें कि पारिवारिक ग्रंथियों का कुछ अस्तित्व है, हम उन्हें इस जीवन में कुछ समय तक बनाए रख सकते हैं, तो भी पुनर्जन्म उन्हें तोड़ता नहीं । इस दूसरे पहलू से विचार करने पर पुनर्जन्म उन बंधनों का विच्छेदक नहीं होता ।

मान लीजिए कि आपके बहुत से बच्चे हैं । एक उनमें से मर जाता है । आप तो पारिवारिक बंधनों को स्थिर रखना चाहते हैं, किंतु एक छिन जाता है । लो, इस दुनिया से उसका संबंध टूट जाता है । किंतु कुछ लोग सोचते हैं, इस त्रुटि का मार्जन होगा, जो धागे टूट गए हैं वे बैकुंठ में जुड़ जाएंगे । यदि वे किसी दूसरे लोक में जुड़ सकते हैं और यदि आप चाहते हैं कि फिर उनकी पूर्ति हो जाए, तो इन बंधनों का जुड़ जाना उचित है, पर यह जरूरी नहीं हैं कि आप एक काल्पनिक बैकुंठ के अस्तित्व को मानें, जिसका उल्लेख कहीं किसी भूगोल पुस्तक में नहीं मिलता और न जिसका पता कोई पदार्थ-विज्ञान बता सकता है ।

यदि आप चाहते हैं कि आपके मित्रों से आपका संबंध अधिक लंबे काल तक बना रहे, तो पुनर्जन्म के नियम के अनुसार यह मृत्यु के बाद आसानी से चल सकता है, क्योंकि उसके अनुसार मनुष्य अपने भाग्य का विधाता स्वयं है । आप स्वयं अपने व्यक्तिगत बंधन और व्यक्तिगत नाते-रिश्ते बनाते हैं । मरते समय यदि आपका किसी पर गहरा प्रेम है, तो अपने दूसरे जन्म में आप उस व्यक्ति को किसी दूसरे शरीर में उत्पन्न और अपने से संबद्ध पाएंगे । यदि अपने इस वर्तमान जन्म में आप किसी पुरुष विशेष को नहीं देखना चाहते हैं, आप उससे कोई भी सरोकार नहीं रखना चाहते हैं, तो पुनर्जन्म के नियम के अनुसार आपके दूसरे जन्म में आपके साथ उसका कोई वास्ता न रहेगा । पुनर्जन्म का नियम यह नहीं कहता कि मित्र और शत्रु, जिनके संसर्ग में आप नहीं आना चाहते, अथवा जिन लोगों को आप बड़ी उत्सुकता से अपने साथ रखना चाहते हैं, मृत्यु के बाद वे बलात् आपके ऊपर थोप दिए जाएंगे ।

वेदांत यह नहीं कहता कि जिनकी उपस्थिति आपको घृणास्पद लगती है, जिनकी उपस्थिति आपको इतनी नीरस मालूम होती है, वे बलात् आपके संबंधी बनाए जाएंगे । यदि किसी नारी को अपने पति द्वारा तलाक दिया गया है और वह उसे फिर कभी नहीं देखना चाहती, तो कर्म के नियम के अनुसार वह पति उसे फिर कभी परेशान नहीं करेगा । जिनको वह देखना चाहती है, जिनसे वह अपना संबंध रखना चाहती है, उन्हीं को वह अपने दूसरे जन्म में समझेगी-बूझेगी ।

इस विषय से संबंध रखने वाली अनेक भ्रांतियां हैं । एक के बाद एक क्रमशः उन सबको यहां उठाया जाएगा । पहले हम स्वर्ग के विषय को लेंगे, जिसका यूरोप और अमेरिका व्यापक तौर से भ्रांत, पूर्ण उल्टा अर्थ लगाते हैं । क्या हम उसे ईसाई स्वर्ग (Christian Heavan) का नाम देंगे ? नहीं, उसे पादरियों का स्वर्ग (Churchian Heaven) कहेंगे । किंतु क्या स्वर्ग की कल्पना में ही अर्थ विरोध का पुट नहीं है ? स्वर्ग शब्द से प्रायः लोग एक ऐसा स्थान समझते हैं, जहां वे सबके सब एक साथ उठेंगे-बैठेंगे और रहेंगे । राम चाहता है कि कृपाकर आप तनिक सोचें, सत्य के लिए आप तनिक विचार करें, जहां आप परिच्छिन्न होते हैं, क्या वहां कभी पूर्ण आनंद हो सकता है ? ससीमता में क्या कोई सच्चा सुख हो सकता है ? असंभव, असंभव ।

यदि आपके स्वर्ग में आपके प्रतियोगी विद्यमान हों—वे सब, जो अतीत में मर चुके हैं और जो भविष्य में मरेंगे, और वे सब जो आज भारतवर्ष में, ऑस्ट्रेलिया में, अमेरिका में अथवा कहीं और भी मर रहे हैं, तो क्या आपको उससे सुख मिल सकता है ? आपने सुना होगा कि सेलकर्क क्या कहता था—

''I am monarch of all I survey, my right there is none to dispute''

''जहां तक जाती है दृष्टि, उस सबका सम्राट हूं मैं, मेरे अधिकार का प्रतिवादी कहीं कोई नहीं !''

जब कभी आप गाड़ी में बैठते हैं, तो सारी गाड़ी केवल अपने ही लिए आयत्त करने की इच्छा करते हैं । जब दूसरे लोग भीतर आ जाते हैं, तब आप उद्विग्न से हो उठते हैं । आप अपने कमरे में बैठे हैं और कोई आपसे मिलने आता है, झट आप नौकर से कहलवा देते हैं कि आप घर पर नहीं हैं, बाहर गए हैं ।

आपके पास एक घर और कुछ जायदाद है और एक दूसरे आदमी के पास भी वैसा ही घर और संपत्ति है । अब गास्पेल तथा वेदों के सार उपदेशों का अनादर करते हुए, आपकी इच्छा है कि आपके पास उस आदमी से अधिक संपत्ति हो जाए । आप चाहते हैं कि वह आपका प्रतिद्वंद्वी आपके बराबर न हो सके, वह आपके अधीन हो जाए । क्या यह तथ्य नहीं हैं कि कुछ ईसाई, असली ईसाई नहीं, किंतु गलती से जो ईसाई कहे जाने वाले हैं, यदि उनके साथ एक ही जहाज पर कोई बौद्ध, मुसलमान अथवा हिंदू यात्री बैठ जाता है, तो वे उसकी उपस्थिति से घृणा करते हैं ? राम यह बात स्वयं अपने अनुभव से कहता है । वे उसकी उपस्थिति से घृणा करते हैं । उसकी उपस्थिति से मानो उनका सुख मिटने लगता है ।

अब यदि स्वर्ग में आपको अपने चारों ओर इसी प्रकार के लोग देखने पड़ें, जो आपसे कहीं अधिक श्रेष्ठ हों, जो ईसामसीह और बुद्ध के समान हों, जिन्हें आप स्वयं अपने से बहुत बड़ा मानते हैं, जो महात्माओं के समान हों, जो आपकी अपेक्षा अत्यधिक उन्नत अवस्था में हों, तो क्या आप उस स्थिति में सुखी रह सकेंगे ? क्या उस स्थिति में आप सुख का अनुभव कर सकेंगे ? तनिक इस पर विचार करें, एक क्षण भर इस पर चिंतन करें ।

जहां कहीं भेद-भाव होता है, वहां सुख नहीं रह सकता । असंभव, यह असंभव है । ऐसी कौन-सी चीज है जो आपकी प्रफुल्लता को नष्ट कर देती है ? वह है दूसरों का अस्तित्व । प्रत्येक मनुष्य एकदम निराला होना चाहता है । हर एक व्यक्ति एक, अद्वितीय, द्वैतहीन होना चाहता है । अतः आपको उस प्रकार के स्वर्ग से कोई सुख नहीं मिल सकता, जो आपने भ्रमवश मान रखा है, जो इंजील ने आपके लिए प्रदान किया है ।

अच्छा, अब हम इंजील की किस प्रकार ऐसी टीका कर सकते हैं, जिससे वह कुछ युक्तिसंगत, उचित प्रतीत हो ? इंजील में हमसे कहा जाता है—हम स्वर्ग में मिलेंगे । हम सबके सब स्वर्ग में मिलेंगे । स्वर्ग में अपने मित्रों से हम मिलेंगे । इसका क्या अर्थ है ? वस्तुतः इसका क्या अभिप्राय है ? इसका ठीक-ठीक अर्थ लगाएं, इसे समझें । क्या आप नहीं जानते कि उस इंजील में, जिसमें लिखा है कि हम सब स्वर्ग में मिलेंगे, यह भी लिखा हुआ है, 'स्वर्ग का साम्राज्य आपके अंदर है ।' परमेश्वर का राज्य, सच्चा स्वर्ग आपके अंदर है, आपसे बाहर नहीं । अपने से बाहर स्वर्ग की कल्पना न करें । उसे आकाश में या नक्षत्रों के बीच में न ढूंढ़ें । परमेश्वर पर तनिक दया करें । यदि वह परमेश्वर मेघों पर रहेगा तो बेचारे गरीब को सर्दी हो जाएगी । स्वर्ग आपके अंदर है । परमेश्वर आपके अंदर है । देखें तो सही ।

अपने आपको उस आनंदमय ईश्वरीय ज्ञान की अवस्था में लाएं, परमेश्वर से पूर्ण अभिन्नता की अवस्था में अपने आपको डाल दें, अथवा यों कहिए कि निर्वाण की दशा में प्रवेश करें, उस ईश्वरीय कल्याणमय दशा को प्राप्त करें और फिर आप स्वयं स्वर्ग रूप हैं, स्वर्ग में आना-जाना कैसा ! उस स्थिति में आप सारी दुनिया से एक हैं । वहां आप मृतक और जीवित और इस पृथ्वी पर, जिन लोगों के आविर्भाव की आशा है, उन सबसे अभिन्न हो जाते हैं । स्वर्ग आपके अंदर है, और इसी प्रकार से, हम स्वर्ग में सबसे मिलते हैं । जीवन मुक्त, इसी जीवन में मुक्त रहने वाला मनुष्य सदा स्वर्ग में रहता है, वह सभी मरने वालों से तादात्म्य रखता है ।

इतना ही नहीं, भविष्य में भी इस दुनिया में, जिन लोगों के आने की आशा है, उन सबसे भी वह एक है । वह ऐसा अनुभव करता और मानता है कि सभी तारागण, सभी ज्ञात प्राणी उसकी अपनी आत्मा है । वह अनुभव और भान करता है कि ''मैं सच्चा परमेश्वर हूं, सच्चा परम पुरुष हूं, स्वयं तत्वस्वरूप हूं, सारभूत हूं, अज्ञेय, परमेश्वर हूं । मैं सर्व हूं, और इस प्रकार सर्व होता हुआ, मैं स्वर्ग में हूं, और स्वर्ग में मैं हर एक व्यक्ति से मिलता हूं ।''

राम अब एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कहनेवाला है । लोग इस दुनिया में अपनी इच्छित वस्तुओं के लिए लालायित रहते हैं, रात-दिन उन्हें पाना चाहते हैं, किंतु पाते नहीं । यह क्या बात है ? वे उनको क्योंकर नहीं पाते और कैसे उनको पा सकते हैं ? लोगों के दिल टूट जाते हैं, प्रेम में हताश होने पर, इच्छा के विफल होने पर, विषय-वासनाओं के मारे जाने पर लोग मुरझाने लगते हैं और मुरझाते-मुरझाते एक दिन ऐसा आता है, जब उनका सारा जीवन ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है । ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि वे लोग स्वर्ग में नहीं मिलते, यही उनकी असफलता का एकमात्र कारण है ।

यदि आप चाहते हैं कि आपके मित्र आपको मिलें, तो ऐ सांसारिक ऐश्वर्यों के भूखे दुनिया के लोगो ! यदि आप चाहते हैं कि संसार के वैभव आपकी खोज करें, ऐ अपने प्रेम पात्रों के लिए अपनी शक्तियों को नष्ट करने वालो ! यदि आप चाहते हैं कि आपके मित्र आपको उत्कृष्ट प्रेम से प्यार करें, जैसा आप उन्हें करते हैं, तो ऐ उच्च पदों की इच्छा रखनेवाले अकृतकार्य लोगो ! राम की शिक्षा का अनुसरण करो, क्योंकि यही एकमात्र ताली है, जो सब इच्छित पदार्थों के तालों को खोल देती है । इसके लिए आपको स्वर्ग में मिलना होगा और आपको ऐसा प्रबंध करना होगा कि हर एक वस्तु स्वयं आपको खोजे । स्वर्ग में मिलने का क्या अर्थ है ? प्रेम की भिक्षा में, प्रेम पाने की आकांक्षा में प्रेम की खोज में ''क्या आप मुझसे प्रेम करते हैं'' ऐसे क्षुद्र और अधिकार के भाव में दिव्यता का लेश भी नहीं ।

मैं तभी आपके निकट खिंचता हूं और तभी आपके बगल में खड़ा होता हूं, जब आप मुझे छोड़ देते हैं, और खो देते हैं, जब आप एक ऐसे स्तर पर खड़े हो जाते हैं, जो मैं और तू, दोनों से ऊंचा है । यदि आप मुझ पर अपने नयन गाड़कर प्रेम की भीख मांगेंगे, तो मैं दूर हटता जाऊंगा । यह नियम है, ऐसा नियम जो अनिवार्य, अविनाशी, निष्ठुर और सर्वथा अटल है । जिस क्षण आप इच्छा से ऊपर उठते हैं, उसी क्षण इच्छा की वस्तु तुम्हें खोजने लगती है, और जब तक आप मांगने, जांचने, ढूंढ़ने, उत्कृष्ट लालासा की वृत्ति में रहते हैं, तब तक आप दुत्कारे जाएंगे, आपको इच्छित वस्तु न मिलेगी, आप उसे कदापि नहीं पा सकते ।

(इच्छित) वस्तु से ऊपर उठो, उसके ऊपर खड़े हो और वह आपको आप ढूंढ़ने लगेगी । यही नियम है । कहा गया है—''ढूंढ़ो और पाओगे, खटखटाओ और दरवाजा आपके लिए खुल जाएगा ।'' इसे समझने में बड़ी भूल की जाती है ।'' ढूंढ़ेंगे तो आप कभी नहीं पाएंगे, खटखटाएंगे, तो आपके लिए दरवाजा कदापि न खुलेगा ।'' क्या यह अनुभव यथार्थ नहीं ?

जब कोई भिक्षुक आपके पास आता है, तो उसे देखकर आपको घृणा क्यों होती है ? क्या वह ठीक नहीं कि गरीब लोग सड़कों पर चलने के कारण जेल भेज दिए जाते हैं ? राम ने जेल का निरीक्षण किया है और उसे ज्ञात हुआ कि अधिकांश कैदियों का एकमात्र अपराध उनकी गरीबी है । लोग उन्हें कहते हैं, ''अनाथालय क्यों नहीं जाते, तुम्हारी उपस्थिति से हमें क्षोभ होता है ।'' क्या यह सच्ची बात नहीं है ?

आप परमेश्वर के पास जाना चाहते हैं, भिखमंगे की भांति मलिन वस्त्रों के साथ क्या आप वहां घुस पाएंगे ? नहीं, कदापि नहीं । जब आपको किसी राजा के पास जाना होता है, तो आपको अपनी सर्वोत्तम पोशाक पहननी पड़ती है । जब आप परमेश्वर के पास जाएंगे तो आपको निष्कामता की पोशाक पहननी पड़ेगी । यदि आप ईश्वर के दर्शन चाहते हैं, स्वर्ग के साम्राज्य का अनुभव चाहते हैं । तो आपको इच्छाहीनता की पोशाक पहननी पड़ेगी । आपको आवश्यकता से परे होना पड़ेगा, आपको इच्छा से ऊपर उठना होगा ।

कर्म का नियम हमें बतलाता है—''मनुष्य स्वयं अपना भाग्य विधाता है । हम स्वयं अपनी परिस्थिति और वातावरण का निर्माण करते हैं । यहां हर एक बच्चा अपने बाप का बाप है । हर एक लड़की अपनी मां की मां है ।'' ये कथन रहस्यमय जान पड़ते हैं, ये अद्भुत और असंगत जान पड़ते हैं, किंतु हैं ये पूर्ण सत्य और सत्य के सिवाय इनमें कुछ भी नहीं है ।

''First seek the kingdom of Heaven and everything else will be added unto you''. That is law ''पहले स्वर्ग का साम्राज्य ढूंढ़ो और फिर, प्रत्येक वस्तु आपको आप ही आ मिलेगी ।'' यही नियम है ।

कर्म के नियम के अनुसार, ( राम यहां कर्म के नियम की व्याख्या करनेवाला नहीं है, किंतु उसके केवल उस एक अंश की चर्चा करेगा, जिसका संबंध इस विचाराधीन विषय से है ) जब आप वस्तुओं की इच्छा करते हैं, जब तक उनके लिए आपके हृदय में उत्कृष्ट इच्छा और तीव्र लालसा विद्यमान रहती है, वे आपको नहीं दी जातीं, किंतु तीव्र लालसा और उत्कृष्ट इच्छा करने के कुछ काल के अनंतर चाहने, मांगने और इच्छा करने के बाद, एक ऐसा समय आता है, जब आप उस इच्छा, उस अभिलाषा से, उस संकल्प से ऊब जाते हैं और अपना मुंह मोड़ लेते हैं, एकदम निराश और खिन्न हो जाते हैं, बस, तभी वह (इच्छित वस्तु) आपके पास चली आती है । यही कर्म का नियम है ।

यह तो आप जानते हैं कि मनुष्य को उन्नति करने के लिए अपना एक पैर ऊपर उठाना और दूसरा नीचे करना पड़ता है । जैसे चलने में एक पैर को ऊपर उठाना और दूसरे को नीचे गिराना होता है, इसी तरह कर्म के नियम की शक्तिमत्ता के अंतर्गत आपकी इच्छाओं की कृतकार्यता और पूर्ति के लिए, उस समय का आना जरूरी है कि, जब आप उनसे ऊपर उठें, इच्छाओं को त्याग दें । इसी तरह इच्छा से ऊपर उठने पर इच्छा त्याग देने से इच्छा की पूर्ति होती है ।

कर्म के नियम के व्याख्याता साधारणतः इस प्रश्न के धन-पहलू (Positive Side) पर अधिक ज़ोर देते हैं और ऋण-पहलू (Negative Side) की उपेक्षा करते हैं । राम आपसे कहता है कि आपकी सारी इच्छाएं जरूर पूर्ण होंगी, आपकी सारी अभिलाषाएं अवश्य सफल होंगी । हर एक वस्तु, जिसकी आप कामना करते हैं, आपके सामने अवश्यमेव लाई जाएंगी । किंतु एक शर्त है । उसकी प्राप्ति से पूर्व आपका एक ऐसी स्थिति में पहुंचना जरूरी है, जिसमें आप उस इच्छा को त्याग देते हैं । और जब आप इच्छा त्याग देंगे, तभी वह पूरी होगी । 'राम' का खयाल है कि नियम का यह अंश सबकी समझ में नहीं आ रहा है । इसका कारण यह है कि उन्होंने 'राम' के पिछले व्याख्यान नहीं सुने हैं, जो हरमेटिक ब्रदरहुड के भवन में दिए गए थे । अच्छा, यदि आप इसे इस समय नहीं समझते हैं, तो यह विषय फिर कभी उठाया जाएगा ।

एक बात और । अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जो अपने रिश्ते, अपने नाते बनाए रखना चाहते हैं, वे उन संबंधों को चिरस्थायी करना चाहते हैं । उच्च स्वर से घोषित कर दीजिए, हर जगह ढिंढोरा पीट दीजिए कि लौकिक संबंधों, सांसारिक संपर्कों को स्थिर रखने और उन्हें स्थायी बनाने की इच्छा पागलपन का विचार है । यह संभव नहीं, संभव नहीं । यह तो आशा के विरुद्ध आशा करना है । झूठी आशा है । आप अपने सांसारिक संबंधों और लौकिक बंधनों को स्थायी नहीं बना सकते । कोई भी सांसारिक वस्तु नित्य नहीं बनाई जा सकती । इस सत्य को अपने हृदय में पैठने दीजिए, इसे अपने अंतःकरण में घर करने दीजिए कि लौकिक बंधनों और संबंधों को स्थायी बनने की चेष्टा करना पागलपन का विचार है ।

राम बार-बार इसे दोहराता है कि भाई ! आप ऐसा नहीं कर सकते । इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है । इस संसार में कोई चीज नित्य नहीं है । एकमात्र नित्य वस्तु आपके भीतर परमेश्वर है, चिरंतन परमेश्वर है, जो स्वयं आप हैं, चिरंतन सत्य है, जो स्वयं आप हैं । यह देह स्थायी नहीं बनाई जा सकती । यह क्षुद्र शरीर नित्य स्थायी नहीं बनाया जा सकता । यदि आप अरब-खरब वर्ष भी जीते रहें, तो भी मृत्यु तो आएगी ही । सूर्य एक दिन मरता है, पृथ्वी एक दिन मरती है, तारे मरते हैं । इसका अर्थ है परिवर्तन । इन सबको बदलना पड़ता है, ये नित्य नहीं बनाए जा सकते, जैसे आपका शरीर क्षण-क्षण बदलता रहता है । सात साल के बाद तो वह बिल्कुल नया हो जाता है, पूर्णतः नूतन शरीर बन जाता है ।