श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गुरु भजन

आनंद साहिब — गुरु-महिमा (पउड़ी 21–25)

जे को सिखु गुरू सेती सनमुखु होवै ॥

होवै त सनमुखु सिखु कोई जीअहु रहै गुर नाले ॥

गुर के चरन हिरदै धिआए अंतर आतमै समाले ॥

आपु छडि सदा रहै परणै गुर बिनु अवरु न जाणै कोए ॥

कहै नानकु सुणहु संतहु सो सिखु सनमुखु होए ॥21॥

जे को गुर ते वेमुखु होवै बिनु सतिगुर मुकति न पावै ॥

पावै मुकति न होर थै कोई पुछहु बिबेकीआ जाए ॥

अनेक जूनी भरमि आवै विणु सतिगुर मुकति न पाए ॥

फिरि मुकति पाए लागि चरणी सतिगुरू सबदु सुणाए ॥

कहै नानकु वीचारि देखहु विणु सतिगुर मुकति न पाए ॥22॥

आवहु सिख सतिगुरू के पिआरिहो गावहु सची बाणी ॥

बाणी त गावहु गुरू केरी बाणीआ सिरि बाणी ॥

जिन कउ नदरि करमु होवै हिरदै तिना समाणी ॥

पीवहु अंम्रितु सदा रहहु हरि रंगि जपिहु सारिगपाणी ॥

कहै नानकु सदा गावहु एह सची बाणी ॥23॥

सतिगुरू बिना होर कची है बाणी ॥

बाणी त कची सतिगुरू बाझहु होर कची बाणी ॥

कहदे कचे सुणदे कचे कची आखि वखाणी ॥

हरि हरि नित करहि रसना कहिआ कछू न जाणी ॥

चितु जिन का हिरि लइआ माइआ बोलनि पए रवाणी ॥

कहै नानकु सतिगुरू बाझहु होर कची बाणी ॥24॥

गुर का सबदु रतंनु है हीरे जितु जड़ाउ ॥

सबदु रतनु जितु मंनु लागा एहु होआ समाउ ॥

सबद सेती मनु मिलिआ सचै लाइआ भाउ ॥

आपे हीरा रतनु आपे जिस नो देइ बुझाइ ॥

कहै नानकु सबदु रतनु है हीरा जितु जड़ाउ ॥25॥

पंजाबी गुरु-वाणी · देवनागरी लिप्यंतरण · सार्वजनिक सम्पदा