कबीर : गुरु-आरती — ऐसी आरति त्रिभुवन तारै
ऐसी आरति त्रिभुवन तारै । तेज:पुंज तहँ प्राण उतारै ॥१॥
पाती पंच पुहुप करि पूजा । देव निरंजन और न दूजा ॥२॥
तन मन सीस समरपन कीन्हा । प्रगट ज्योति तहँ आतम लीना ॥३॥
दीपक ज्ञान सबद धुनि घंटा । परम पुरिख तहँ देव अनंता ॥४॥
परम प्रकाश सकल उजियारा । कहै कबीर मैं दास तुम्हारा ॥५॥
स्रोत: संत कबीर · सार्वजनिक सम्पदा