श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
गुरु भजन

कबीर : गुरु-आरती — ऐसी आरति त्रिभुवन तारै

ऐसी आरति त्रिभुवन तारै । तेज:पुंज तहँ प्राण उतारै ॥१॥

पाती पंच पुहुप करि पूजा । देव निरंजन और न दूजा ॥२॥

तन मन सीस समरपन कीन्हा । प्रगट ज्योति तहँ आतम लीना ॥३॥

दीपक ज्ञान सबद धुनि घंटा । परम पुरिख तहँ देव अनंता ॥४॥

परम प्रकाश सकल उजियारा । कहै कबीर मैं दास तुम्हारा ॥५॥

स्रोत: संत कबीर · सार्वजनिक सम्पदा