नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ
सिरीरागु महला ४ ॥
नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥
कोई गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥
हउ तिसु विटहु चउ खंनीऐ मै नाम करे परगासु ॥१॥
मेरे प्रीतमा हउ जीवा नामु धिआइ ॥
बिनु नावै जीवणु ना थीऐ मेरे सतिगुर नामु द्रिड़ाइ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु अमोलकु रतनु है पूरे सतिगुर पासि ॥
सतिगुर सेवै लगिआ कढि रतनु देवै परगासि ॥
धंनु वडभागी वड भागीआ जो आइ मिले गुर पासि ॥२॥
जिना सतिगुरु पुरखु न भेटिओ से भागहीण वसि काल ॥
ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ॥
ओना पासि दुआसि न भिटीऐ जिन अंतरि क्रोधु चंडाल ॥३॥
सतिगुरु पुरखु अंम्रित सरु वडभागी नावहि आइ ॥
उन जनम जनम की मैलु उतरै निरमल नामु द्रिड़ाइ ॥
जन नानक उतम पदु पाइआ सतिगुर की लिव लाइ ॥४॥२॥६६॥
स्रोत: पंजाबी गुरु-वाणी · देवनागरी लिप्यंतरण · सार्वजनिक सम्पदा