हउ सतगुर सेवी आपणा
सिरीरागु महला ३ घरु १ ॥
हउ सतिगुरु सेवी आपणा इक मनि इक चिति भाइ ॥
सतिगुरु मन कामना तीरथु है जिस नो देइ बुझाइ ॥
मन चिंदिआ वरु पावणा जो इछै सो फलु पाइ ॥१॥
जिनी गुरमुखि चाखिआ सहजे रहे समाइ ॥१॥ रहाउ ॥
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी पाइआ नामु निधानु ॥
अंतरि हरि रसु रवि रहिआ चूका मनि अभिमानु ॥
हिरदै कमलु प्रगासिआ लागा सहजि धिआनु ॥
मनु निरमलु हरि रवि रहिआ पाइआ दरगहि मानु ॥२॥
सतिगुरु सेवनि आपणा ते विरले संसारि ॥
हउमै ममता मारि कै हरि राखिआ उर धारि ॥
हउ तिन कै बलिहारणै जिना नामे लगा पिआरु ॥
सेई सुखीए चहु जुगी जिना नामु अखुटु अपारु ॥३॥
गुर मिलिऐ नामु पाईऐ चूकै मोह पिआस ॥
हरि सेती मनु रवि रहिआ घर ही माहि उदासु ॥
जिना हरि का सादु आइआ हउ तिन बलिहारै जासु ॥
नानक नदरी पाईऐ सचु नामु गुणतासु ॥४॥१॥३४॥
स्रोत: पंजाबी गुरु-वाणी · देवनागरी लिप्यंतरण · सार्वजनिक सम्पदा