साजन सतगुर पुरखु
सिरीरागु महला ४ ॥
रसु अंम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥
जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥
ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥१॥
भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥
सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥१॥ रहाउ ॥
गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥
सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥
से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥२॥
इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥
बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥
ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥३॥
हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥
आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अंम्रितु चोइ ॥
सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥४॥५॥६९॥
स्रोत: पंजाबी गुरु-वाणी · देवनागरी लिप्यंतरण · सार्वजनिक सम्पदा