श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

प्रयाग के निकटवर्ती जिले बाँदा के राजापुर ग्राम में पंडित आत्माराम दुबे घर के बाहरी भाग में अपने कुछ परिचितों के साथ बैठे हैं।

तुलसी चरित (कथा)

प्रयाग के निकटवर्ती जिले बाँदा के राजापुर ग्राम में पंडित आत्माराम दुबे घर के बाहरी भाग में अपने कुछ परिचितों के साथ बैठे हैं। भीतर वाले कमरे में उनकी पत्नी हुलसी के प्रसव के लिए एक दाई, दासी चुनिया तथा दो-तीन स्त्रियाँ उपस्थित हैं।

तभी भीतर कांसे की थाली बज उठती है जिसका अर्थ है कि बालक का जन्म हुआ है। पंडित आत्माराम ज्योतिष के अच्छे ज्ञाता हैं। आस-पास के गाँवों में उनकी काफी प्रसिद्धि है। पंचांग, पत्रिकायें उठा पंडित जी ग्रह नक्षत्र की गणना करने लगते हैं।

थोड़ी देर तक गणना करते-करते माथे की त्योरियों को बल देते; ढीला छोड़ते जैसे उन्हें स्वयं पर विश्वास नहीं हो पा रहा था। पुनः गणना करने लगे। बार-बार की गणना से भी एक ही निर्णय पर पहुँचने के पश्चात उनका मुख विवर्ण हो उठा। बालक अभुक्तमूल नक्षत्र में जन्मा था, जिसका अर्थ था कि बालक माता-पिता ही नहीं ग्राम के लिए भी घोर विपत्ति का कारण सिद्ध होगा।

पंडित आत्माराम निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि क्या किया जाये। ज्योतिष पर उन्हें दृढ़ विश्वास था। उन्होंने बालक का मुख भी न देखने का निश्चय किया। उधर बालक के जन्म के पश्चात उसकी माता के स्वास्थ्य में अत्यंत गिरावट आती जा रही थी। गिरते हुए स्वास्थ्य के बीच ही जब उन्हें बालक के भविष्य तथा पंडित जी के निश्चय के विषय में ज्ञात हुआ तो उनकी दशा और बिगड़ने लगी। वे जानती थीं कि पंडित जी को अपने ज्योतिष पर अत्यन्त विश्वास है। वे बालक को कदापि स्वीकार नहीं करेंगे।

जब हुलसी को लगा कि उसके प्राण अब नहीं बचेंगे तो अपनी विश्वस्त दासी चुनिया को बुला बालक को उसे सौंपते हुए कहा कि वह बालक को लेकर अपनी ससुराल हरिहरपुर चली जाये। हुलसी को अब अपने जीवन का कोई विश्वास नहीं रहा। बालक के पोषण और देखभाल के लिए हुलसी ने चुनिया को अपने गहने और कुछ धन भी दिया। चुनिया से बालक का दायित्व संभालने का वचन ले कर हुलसी ने श्वांस छोड़ दिया।

जहाँ जन्म के समय बधाइयाँ बजने जा रही थी वहाँ शोक ने अपना साम्राज्य फैला दिया।

बालक को गोद में लेते ही चुनिया ने गहरी निःश्वांस भरकर देखा तो उसके मुख पर एक विचित्र सी मुस्कराहट दिखायी दी। मानो कोई सुन्दर स्वप्न देख रहा हो। चुनिया सोचने लगी — 'इसके आने से कितने भरे हृदय सूख गये, कितनी सूखी आँखों में बाढ़ आ गयी। यह अभागा अपने सम्बन्ध में क्या जानता है? यह कैसे जान पायेगा कि इसके आगमन ने जब इसकी माता का जीवन छीन लिया तो पिता के मन में भी कोई उत्साह नहीं बचा। इसके स्वागत में न मेवे बंटे न ही किसी ने बधाई गायी।' चुनिया ने स्वार्थ, मोह और रूढ़िग्रस्त समाज से बच्चे को बचाने का निश्चय किया और रात ही रात में अपनी ससुराल हरिहरपुर आ गयी।

साढ़े पाँच वर्ष तक बालक का यथा संभव पालन पोषण करने के बाद एक दिन चुनिया भी चल बसी। पहले से ही अनाथ बालक का अन्तिम आश्रय भी शेष न रहा। बालक द्वार-द्वार भटकने लगा। इधर-उधर भिक्षा माँगकर पेट भर कर खुले आकाश के नीचे सो जाता।

अध्याय सूची पर वापस जाएँसाढ़े पाँच वर्ष का नन्हा बालक कन्धे पर झोला लटकाये भिक्षा माँगते द्वार-द्वार भटकता फिर रहा है। →