साढ़े पाँच वर्ष का नन्हा बालक कन्धे पर झोला लटकाये भिक्षा माँगते द्वार-द्वार भटकता फिर रहा है। बालक पर छायी अमंगल की छाया से भी बचने के लिए लोग उससे दूर भागते हैं, उसे भरपेट भिक्षा मिलने में भी अत्यन्त कठिनाई आती है। ऐसे ही माँगते-माँगते बालक आज एक द्वार पर खड़ा हुआ है —
"कुछ खाने को दे दो न माँ!" बालक ने बड़ी दीनता से कहा। "चल-चल अभागा कहीं का! अपनी माँ को खा गया, चुनिया को खा गया, अब यहाँ क्या खाने आया है? चल भाग यहाँ से।" वह कर्कशा स्त्री बालक को फटकारते हुए बोली। "कुछ दे दो न माता! बहुत भूख लगी है।" बालक ने करुण स्वर में कहा। "अब जाता है या लगाऊँ दो हाथ?" कर्कशा क्रूरता पर उतर आयी।
अपमानित बालक चुपचाप अपनी राह हो लिया। कुछ दूर जा कर एक स्थान पर बैठ जाता है। परन्तु भूख से व्याकुल प्राण उसके नन्हें पाँवों को फिर एक घर की ओर मोड़ देते हैं। "दया करो माता! कुछ खाने को दे दो।" "कौन? रामबोला! अभी रसोई नहीं बनी है। जा आगे बढ़ जा।" "तीन दिन हो गये माँ। कुछ भी नहीं खाया है।" करूण कंठ से बालक ने याचना की। "कह दिया न रसोई नहीं बनी।" गृह स्वामिनी ने भीतर से ही कठोर स्वर में बालक को फटकार दिया।
भूख, पीड़ा और अपमान से क्षुब्ध बालक आगे बढ़ जाता है। बालक मार्ग में ही एक स्थान पर बैठ जाता है। बालक का कोमल, निर्मल मन राम से आश्रय माँगने लगा — "प्रभु! और किसके आगे हाथ फैलाऊँ? ऐसा दूसरा कौन है जो सदा के लिए मेरा माँगना मिटा दे?"
श्री राम से प्रार्थना करते-करते बालक खाली पेट एक वृक्ष के नीचे लेट गया। भूख के कारण नेत्रों में नींद नहीं उतरती। रह-रह कर आँतों में मरोड़ उठता है तो बालक पानी पीकर फिर लेट जाता है। इस प्रकार जैसे-तैसे दिन बीतने लगे।