श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

महाप्रयाण

तुलसी चरित (कथा)

गोस्वामी तुलसी दास शय्या पर पड़े हैं। कई दिन से उनके शरीर में फुँसियाँ निकल आयी हैं। विश्राम कर रहे गोस्वामी जी के मानस पटल पर सम्पूर्ण जीवन वृत्त घूम जाता है। बाबा प्रभु की कृपा को स्मरण कर उठते हैं कि उनके दीन हीन जीवन को प्रभु ने किस प्रकार अपनी शरण में लेकर पतित से पावन कर दिया। सन्त हृदय को विपत्ति में भी प्रभु की कृपा दिखायी दे रही है। वे मान रहे हैं कि इन फुँसियों के रूप में उनके प्रभु का उनके स्वामी का नमक बह रहा है —

"आसन बसन हीन, विषम-विषाद-लीन,
देखि दीन दूबरौ, करैं न हाय-हाय को?
तुलसी अनाथ सों सनाथ रघुनाथ कियो,
दिया फल सील सिंधु अपने सुभाय को।।
नीच यहि बीच पति पाई भरूहाइगो,
बिहाय प्रभु भजन वचन मन काय को।
ताते तनु पेखियत घोर बरतोर मिस,
फूटि फूटि निकसत है लोन राम राय को।।"

आज श्रावण तीज का दिन है। बाबा का स्वास्थ्य बिगड़ता जा रहा है। अनेक सेवक सन्त उन्हें घेरे खड़े हुये हैं। बाबा राम मिलन के क्षण को पहचान रहे हैं। बाबा जान गये कि उनके स्वामी, उनके प्रभु को उनकी आवश्यकता है। बाबा के महाप्राण का क्षण पहचान कर शिष्यों ने धरती को गाय के गोबर से लीप दिया है।

बाबा का कंठ अवरूद्ध होने लगा है। शरीर में बल नहीं रहा। स्वर टूट रहा है। बाबा बोले —

"राम नाम जस बरनि के, मयो चहत अब मीन।
तुलसी के मुख दीजिये, अबहीं तुलसी सोन।।"

बाबा की इच्छा पहचान उन्हें धरती पर लिटा दिया गया। तुलसीदल, सोना और गंगाजल उनके कंठ में डाला गया। बाबा के निस्तेज हो रहे नेत्रों में श्री रामदरबार में विराजमान श्रीराम, माँ सीता, अनुज भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न सहित हनुमान जी के चित्र उभर आये।

शून्य में टिकी दृष्टि में उभरे राम दरबार को प्रणाम करने के लिये बाबा के हाथ स्वतः जुड़ते चले गये। श्वांस गति का क्रम बिगड़ने से छाती फूल-पिचक रही है। जीवन के प्रति अब कोई आशा नहीं दीखती। टूटती श्वांसों ने अन्तिम बार सम्पूर्ण साहस बटोर कर 'राम' कहा। इसी के साथ एक अज्ञात से उद्गम से निकली एक लघु सरिता रामभक्ति और कृपा पाकर पावन होते-होते गंगा बन अतल महासागर में विलीन हो गयी।

प्रकृति ने भी मानो उन्हें अन्तिम प्रणाम करने के लिए ही मेघाच्छादित गगन में तीव्र चमक बिखेरती ऐसी दामिनी उत्पन्न की कि उसकी कौंध भीतर कमरे तक आ पहुँची। बाहर तेजी से मेघ बरस रहे थे और भीतर सबके नेत्र.........

।। इति ।।

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