तुलसी बाबा काशी लौट आये। कुछ समय पश्चात काशी में पहले अकाल फिर भयंकर महामारी फैली। चारों ओर लोग भागते, कूदते और हाय-हाय कर मर जाते। हजारों व्यक्ति अकाल ही काल कवलित हो गये। काशी पति महादेव की नगरी की दुर्दशा गोस्वामी जी से देखी नहीं गयी। अपने अखाड़ों के सभी युवकों को बाबा ने रोगियों की सेवा और नगर से बीमारी दूर रखने के लिये साफ-सफाई में लगा दिया। नीम की पत्तियाँ उबाल कर काढ़ा बना-बना कर रोगियों को पिलाना उनकी सेवा करना बाबाजी का दैनन्दिन कार्य हो गया।
महामारी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। बाबा ने काशीपति शिव से प्रार्थना की —
'अपनी बीसीं आपुही पुरिहि लगाए हाथ।
केहि विधि बिनती बिस्व की, करौं बिसव के नाथ।।'
बीसीं बिस्व नाथ की विषाद बडों बारानसी।
बूझिए न ऐसी गति संकर सहर की।।
कैसे कहे तुलसी वृषासुर के बरिदानि।
बानि जानि सुधा तजि पीविन जहर की।।
महादेव के चरणों में छन्दों के अनेक पुष्प चढ़ा गोस्वामी जी ने उनसे अपनी बीसीं (एक ग्रह दशा; रूद्र की बीसीं में संहार अधिक हुआ करता है) से काशी की रक्षा करने की प्रार्थना की। काशी नगरी की सभी दिशाओं में संकट मोचक हनुमान जी के मन्दिरों की स्थापना करवा कर त्राहिमाम करती दैहिक, मानसिक यन्त्रणाओं से घिरी प्रजा में पूजा पाठ द्वारा गोस्वामी जी ने आस्था की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखा।
कुछ समय पश्चात राम-राम कर महामारी शान्त हो गयी। समय बीतता रहा। बाबा की आयु बढ़ती रही। बाबा काशी से वाराह क्षेत्र गये। वहाँ से जन्म भूमि राजापुर। रत्नावली को दिये वचन को निभाने का समय आ गया था। रत्नावली को दर्शन दे उनका अन्तिम समय सौभाग्यपूर्ण बना बाबा काशी लौट आये।