काशी के पंच गंगा घाट पर बाबा नरहरि के परममित्र एवं वयोवृद्ध सन्त आचार्य श्री शेष सनातन रहते हैं। आचार्य की गणना काशी के प्रमुख विद्वानों में होती है। बाबा नरहरि तुलसी दास को लेकर आचार्य शेष सनातन के पास पहुँचे। बाबा नरहरि के निवेदन और तुलसी दास के गुणों से प्रभावित हो आचार्य शेष सनातन ने उन्हें अपने पास रख लिया।
तुलसी दास को योग्य जान आचार्य शेष सनातन ने अपने दायित्व सौंपना प्रारम्भ कर दिया। तुलसी ने भी आचार्य को निराश नहीं किया। वेद पुराण, शास्त्र, नीति ही नहीं ज्योतिष में भी आचार्य ने तुलसी को पारंगत कर दिया।
लगभग पन्द्रह वर्ष का समय बीत गया। आचार्य शेष सनातन के परम शिष्य तुलसी अब तेईस-चौबीस वर्ष के हो चुके हैं। पाठशाला में सबसे तेजस्वी दिखने वाला छात्र तुलसी अध्ययन पूर्ण कर अब 'तुलसी दास शास्त्री' बन गया है। उसी पाठशाला में छात्रों को पढ़ाने के साथ-साथ पंडित तुलसीदास शास्त्री काशी के अनेक स्थानों पर प्रायः कथा भी बाँचते हैं। हनुमान जी के प्रति तुलसी की बचपन से ही अगाध श्रद्धा है। इसी अवधि में तुलसी दास ने अपने जीवन की प्रथम महत्वपूर्ण काव्य रचना 'हनुमान चालीसा' की रचना की।
कुछ समय पश्चात आचार्य शेष सनातन के भौतिक लीलाओं को समाप्त कर प्रभु में लीन हो जाने से तुलसी ने काशी को प्रणाम कर बाबा नरहरि के दर्शनों के लिए चित्रकूट जाने का निश्चय किया। मार्ग में ही सूचना मिली कि बाबा नरहरि भी ऐहिक लीला समाप्त कर चुके हैं। सो चित्रकूट को प्रणाम कर तुलसी दास ने एक बार पुनः अपनी जन्मभूमि राजापुर जाने का निश्चय किया।