श्री रामायण मन्दिरShri Ramayan Mandir — Bareilly | Vikasnagar

उन दिनों उत्तर भारत में अत्यन्त उत्पात मचा हुआ था।

तुलसी चरित (कथा)

उन दिनों उत्तर भारत में अत्यन्त उत्पात मचा हुआ था। मुगलों और पठानों के दमन से हिन्दू समाज अत्यन्त पीड़ित था। अनेक छोटे-बड़े मन्दिर तोड़ कर मस्जिदें बना दी गयी थीं। अयोध्या में पावन रामजन्म भूमि मन्दिर को तोड़कर बाबर ने मस्जिद बना दी थी।

इन्हीं दिनों बाबा नरहरि बालक को ले कर अयोध्या पहुँचे। बाबा नरहरि के परिचित सन्तों और एक मठ के महन्त के सम्मुख बालक की वैष्णवी दीक्षा की व्यवस्था हुयी। संवत 1561, माघ शुक्ल पंचमी दिन शुक्रवार को बालक के सभी संस्कार सम्पन्न हुए। बालक रामबोला के मुण्डन, यज्ञोपवीत, उपनयन आदि संस्कार सम्पन्न कराते हुए बाबा नरहरि ने बालक को अर्थ पंचक, पंच संस्कार और 'अ' कार त्रय के विषय में विस्तार से समझाया।

बाबा बोले — "रामबोला! ध्यानपूर्वक सुन! अर्थ पंचक में पाँच बातों का ज्ञान दिया जाता है। प्रथम — समस्त जगत के स्वामी, चराचर के उपास्य उस परमात्मा का स्वरूप क्या है? द्वितीय — उसके अंश स्वरूप उपासक जीवात्मा का क्या स्वरूप है? तृतीय — उस परम पिता की प्राप्ति कैसे हो? चतुर्थ — प्रभु की प्राप्ति के पश्चात उनसे क्या माँगना चाहिए? पंचम — प्रभु की प्राप्ति के मार्ग में कौन-कौन सी बाधायें आती हैं? इन सब बातों का ज्ञान होना ही 'अर्थ पंचक' ज्ञान कहलाता है।"

गंभीर हो कर सुन रहे रामबोला ने बाबा से कहा — "बाबा! अब 'पंच संस्कार' के विषय में बताने की कृपा करें।" नरहरि बाबा बोले — "पंच संस्कारों में सर्वप्रथम है गुरू देव के हाथों कण्ठी अर्थात् तुलसी की माला धारण करना। द्वितीय संस्कार है — ललाट पर श्री सहित भगवद चरणारविन्द की आकृति का उर्ध्वपुण्ड तिलक धारण करना। तृतीय संस्कार है — भुजाओं के मूल में शंख, चक्र अथवा धनुर्वाण आदि भगवद आयुधों का चिन्ह धारण करना। चतुर्थ संस्कार है — कान में सद्गुरू से परंपरा प्राप्त ईष्ट मन्त्र का श्रवण मनन और जप करना। पंचम संस्कार है — उस उपासक जीवात्मा का दास्य परक नामकरण। इस प्रकार तुम्हारे चार संस्कार पूर्ण हो चुके हैं। इस क्रम में केवल तुम्हारा नाम रखना शेष है।"

रामबोला ने पूछा — "गुरूदेव! कृपया अब 'अ' कार त्रय का भाव भी स्पष्ट करने की कृपा करें।" बाबा बोले — 'अ' कार त्रय का सम्बन्ध हृदय के भावों से है। इन तीन भावों की हृदय में पुष्टि होनी चाहिए। प्रथम — यह समझना कि मैं प्रभु का ही एक अंश हूँ। द्वितीय — यह जानना कि मैं प्रभु सेवा का ही एक उपकरण मात्र हूँ। तृतीय — मैं प्रभु के द्वारा संचालित एवं व्यवस्थित हूँ।

सारे संस्कार पूर्ण होने के पश्चात नरहरि बाबा ने बालक रामबोला को नया नाम दिया — तुलसी दास।

संस्कार तथा नाम पाकर तुलसी के जीवन में अत्यन्त महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखायी देने लगे। तुलसी अत्यन्त परिश्रम से पढ़ता। जो भी उसे पढ़ाया जाता उसे वह शीघ्र ही कंठस्थ कर लेता। दस माह तक अयोध्या में रहने के पश्चात बाबा नरहरि तुलसी को लेकर पुनः सूकर खेत आ गये। वहाँ पाँच वर्ष तक तुलसी की शिक्षा हुई। इस अवधि में बाबा ने वाल्मीकि रामायण सहित विभिन्न रामायणों की कथायें तुलसी को सुनायीं। रामायण की कथाओं में आने वाले मार्मिक प्रसंगों को सुनकर भावुक तुलसी के नेत्रों से अश्रु बहने लगते।

बाबा ने तुलसी को साहित्य, संस्कृत, पुराण, शास्त्र और वेदों के अध्ययन के लिए काशी ले जाने का निश्चय किया।

← देते समय बाबा का चित्त बालक की ओर खिंचा।अध्याय सूची पर वापस जाएँकाशी में शिक्षा →