मंगलाचरण
कवितावली · मंगलाचरण
छंद १
रेफ आत्मचिन्मय अकल, परब्रह्म पररूप।
हरि-हर-अज-वन्दित-चरन,अगुण अनीह अनूप॥१॥
छंद २
बालकेलि दशरथ-अजिर,करत सो फिरत सभाय।
पदनखेन्दु तेहि ध्यान धरि विचरत तिलक बनाय॥२॥
छंद ३
अनिलसुवन पदपद्मरज,प्रेम सहित शिर धार ।
इन्द्रदेव टीका रचत, कवितावली उदार ॥३॥
छंद ४
बन्दौं श्रीतुलसीचरन नख, अनूप दुतिमाल ।
कवितावलि-टीका लसै कवितावलि-वरभाल ॥४॥
बालरूपकी झाँकी
अवधेसके द्वारें सकारें गई सुत गोद कै भूपति लै निकसे।
अवलोकि हौं सोच बिमोचनको ठगि-सी रही,जे न ठगे धिक-से॥
तुलसी मन-रंजन रंजित-अंजन नैन सुखंजन-जातक-से।
सजनी ससिमें समसील उभै नवनील सरोरुह-से बिकसे॥
पग नूपुर औ पहुँची करकंजनि मंजु बनी मनिमाल हिएँ।
नवनील कलेवर पीत झँगा झलकै पुलकैं नृपु गोद लिएँ॥
अरबिंदु सो आननु रूप मरंदु अनंदित लोचन-बृंग पिएँ।
मनमो न बस्यो अस बालकु जौं तुलसी जगमें फलु कौन जिएँ॥