श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
कवितावली · गोस्वामी तुलसीदास

बालकाण्ड

कवितावली · बालकाण्ड
छंद २

तनकी दुति स्याम सरोरुह लोचन कंचकी मंजुलताई हरैं।

अति सुंदर सोहत धूरि भरे छबि भूरि अनंगकी दूरि धरैं॥

दमकैं दँतियाँ दुति दामिनि-ज्यौं किलकैं कल बाल-बिनोद करैं।

अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं॥

बाललीला

कबहूँ ससि मागत आरि करैं कबहूँ प्रतिबिंब निहारि डरैं।

कबहूँ करताल बजाइकै नाचत मातु सबै मन मोद भरैं ॥

कबहूँ रिसिआइ कहैं हठिकै पुनि लेत सोई जेहि लागि अरैं।

अवधेसके बालक चारि सदा तुलसी-मन-मंदिरमें बिहरैं ॥

बर दंतकी पंगति कंदकली अधराधर-पल्लव खोलनकी ।

चपला चमकैं घन बीच जगैं छबि मोतिन माल अमोलनकी॥

छंद ३

घुँघुरारि लटैं लटकैं मुख ऊपर कुंडल लोल कपोलनकी ।

नेवछावरि प्रान करै तुलसी बलि जाउँ लला इन बोलनकी॥

पदकंजनि मंजु बनीं पनहीं धनुहीं सर पंकज-पानि लिएँ।

लरिका सँग खेलत डोलत हैं सरजू-तट चौहट हाट हिएँ॥

तुलसी अस बालक-सों नहि नेहु कहा जप जोग समाधि किएँ।

नर वे खर सूकर स्वान समान कहौ जगमें फलु कौन जिएँ॥

सरजू बर तीरहिं तीर फिरैं रघुबीर सखा अरु बीर सबै।

धनुहीं कर तीर, निषंग कसें कटि पीत दुकूल नवीन फबै॥

तुलसी तेहि औसर लावनिता दस चारि नौ तीन इकीस सबै।

मति भारति पंगु भई जो निहारि बिचारि फिरी उपमा न पबै॥

छंद ४

धनुर्यज्ञ

छोनीमेंके छोनीपति छाजै जिन्है छत्रछाया

छोनी-छोनी छाए छिति आए निमिराजके।

प्रबल प्रचंड बरिबंड बर बेष बपु

बरिबेकों बोले बैदेही बर काजके॥

बोले बंदी बिरुद बजाइ बर बाजनेऊ

बाजे-बाजे बीर बाहु धुनत समाजके।

तुलसी मुदित मन पुर नर-नारि जेते

बार-बार हेरैं मुख औध-मृगराजके॥

छंद ५

सियकें स्वयंबर समाजु जहाँ राजनिको

राजनके राजा महाराजा जानै नाम को।

पवनु, पुरंदरु, कृसानु, भानु, धनदु-से,

गुनके निधान रूपधाम सोमु कामु को॥

बान बलवान जातुधानप सरीखे सूर

जिन्हकें गुमान सदा सालिम संग्रामको।

तहाँ दसरत्थकें समत्थ नाथ तुलसीके

चपरि चढ़ायौ चापु चंद्रमाललामको॥

मयनमहनु पुरदहनु गहन जानि

आनिकै सबैको सारु धनुष गढ़ायो है।

जनकसदसि जेते भले-भले भूमिपाल

किये बलहीन, बल आपनो बढ़ायो है॥

कुलिस-कठोर कूर्मपीठतें कठिन अति

हठि न पिनाकु काहूँ चपरि चढ़ायो है।

तुलसी सो रामके सरोज-पानि परसत ही

टूट्यौ मानो बारे ते पुरारि ही पढ़ायो है॥

छंद ६

डिगति उर्वि अति गुर्वि सर्ब पब्बै समुद्र-सर।

ब्याल बधिर तेहि काल, बिकल दिगपाल चराचर॥

दिग्गयंद लरखरत परत दसकंधु मुक्ख भर।

सुर-बिमान हिमभानु भानु संघटत परसपर॥

चौंके बिरंचि संकर सहित, कोलु कमठु अहि कलमल्यौ।

ब्रह्मंड खंड कियो चंड धुनि जबहिं राम सिवधनु दल्यौ॥

लोचनाभिराम घनस्याम रामरूप सिसु,

सखी कहै सखीसों तूँ प्रेमपय पालि, री।

बालक नृपालजूकें ख्याल ही पिनाकु तोर् यो,

मंडलीक-मंडली-प्रताप-दापु दालि री॥

जनकको,सियाको,हमारो,तेरो,तुलसीको,

सबको भावती ह्वैहै, मैं जो कह्यो कालि ,री।

कौसिलाकी कोखिपर तोषि तन वारिये,री

राय दशरत्थकी बलैया लिजै आलि री॥

छंद ७

दूब दधि रोचनु कनक थार भरि भरि

आरति सँवारि बर नारि चलीं गावती।

लीन्हें जयमाल करकंज सोहैं जानकीके

पहिरावो राघोजूको सखियाँ सिखावतीं॥

तुलसी मुदित मन जनकनगर-जन

झाँकतीं झरोखें लागीं सोभा रानीं पावतीं।

मनहुँ चकोरीं चारु बैठीं निज निज नीड

चंदकी किरनि पीवैं पलकौ न लावतीं

नगर निसान बर बाजैं ब्योम दुंदुभीं

बिमान चढ़ि गान कैके सुरनारि नाचहीं।

जयति जय तिहुँ पुर जयमाल राम उर

बरषैं सुमन सुर रूरे रूप राचहीं॥

जनकको पनु जयो, सबको भावतो भयो

तुलसी मुदित रोम-रोम मोद माचहीं।

सावँरो किसोर गोरी सौभापर तृन तोरी

जोरी जियो जुग-जुग जुवती-जन जाचहीं॥

छंद ८

भले भूप कहत भलें भदेस भूपनि सों

लोक लखि बोलिये पुनीत रीति मारिषी।

जगदंबा जानकी जगतपितु रामचंद्र,

जानि जियँ जोहौ जो न लागै मुँह कारखी॥

देखे हैं अनेक ब्याह, सुने हैं पुरान बेद

बूझे हैं सुजान साधु नर-नारि पारिखी।

ऐसे सम समधी समाज न बिराजमान,

रामु-से न बर दुलही न सिय-सारिखी॥

बानी बिधि गौरी हर सेसहूँ गनेस कही,

सही भरी लोमस भुसुंडि बहुबारिषो ।

चारिदस भुवन निहारि नर-नारि सब

नारदसों परदा न नारदु सो पारिखो।

तिन्ह कही जगमें जगमगति जोरी एक

दूजो को कहैया औ सुनैया चष चारखो।

रमा रमारमन सुजान हनुमान कही

सीय-सी न तीय न पुरुष राम-सारिखो॥

छंद ९

दूलह श्रीरघुनाथु बने दुलही सिय सुंदर मंदिर माहीं।

गावति गीत सबै मिलि सुंदरि बेद जुवा जुरि बिप्र पढ़ाहीं॥

रामको रूप निहारति जानकी कंकनके नगकी परछाहीं।

यातें सबै सुधि भूलि गई कर टेकि रही पल टारत नाहीं॥

परशुराम-लक्ष्मण-संवाद

भूपमंडली प्रचंड चंडीस-कोदंडु खंड्यो,

चंड बाहुदंडु जाको ताहीसों कहतु हौं।

कठिन कुठार-धार धरिबेको धीर ताहि,

बीरता बिदित ताको देखिये चहतु हौं॥

तुलसी समाजु राज तजि सो बिराजै आजु,

गाज्यौ मृगराजु गजराजु ज्यों गहतु हौं।

छोनीमें न छाड्यौ छप्यो छोनिपको छोना छोटो,

छोनिप छपन बाँको बुरुद बहतु हौं॥

छंद १०

निपट निदरि बोले बचन कुठारपानि,

मानी त्रास औनिपनि मानो मौनता गही।

रोष माखे लखनु अकनि अनखोही बातैं,

तुलसी बिनीत बानी बिहसि ऐसी कही॥

सुजस तिहारें भरे भुअन भृगुतिलक,

प्रगट प्रतापु आपु कह्यो सो सबै सही।

टूट्यौ सो न जुरैगो सरासनु महेसजूको,

रावरी पिनाकमें सरीकता कहाँ रही॥

गर्भके अर्भक काटनकों पटु धार कुठारु कराल है जाको।

सोई हौं बूझत राजसभा 'धनु को दल्यौ' हौं दलिहौ बलु ताको॥

लघु आनन उत्तर देत बड़े लरिहै मरिहै करिहै कछु साको।

गोरो गरूर गुमान भर् यो कहौ कौसिक छोटो-सो ढोटो है काको॥

मखु राखिबेके काज राजा मेरे संग दए,

दले जातुधान जे जितैया बिबुधेसके।

छंद ११

गौतमकी तीय तारी, मेटे अघ भूरि भार,

लोचन-अतिथि भए जनक जनेसके॥

चंड बाहुदंड-बल चंडीस-कोदंडु खंड्यो

ब्याही जानकी, जीते नरेस देस-देसके।

साँवरे-गोरे सरीर धीर महाबीर दोऊ,

नाम रामु लखनु कुमार कोसलेसके॥

काल कराल नृपालन्हके धनुभंगु सुनै फरसा लिएँ धाए।

लक्खनु रामु बिलोकि सप्रेम महारिसतें फिरि आँखि दिखाए॥

धीरसिरोमनि बीर बड़े बिनयी बिजयी रघुनाथु सुहाए।

लायक हे भृगुनायकु, से धनु-सायक सौंपि सुभायँ सिधाए॥