उत्तरकाण्ड · भाग ५
तुलसीसु दरिद्रु-सिरोमनि, सो सुमिरें दुख-दारिद होहिं न ठाढ़े।
भौनमें भाँग,धतुरोई आँगन, नागेके आगें हैं मागने बाढ़े॥
सीस बसै बरदा, बरदानि, चढ्योबरदा, धरन्यो बरदा है।
धाम धतूरो, बिभूतिको कूरो,निवासु जहाँ सब लै मरे दाहैं॥
ब्याली कपाली है ख्याली, चहूँ दिसि भाँगकी टाटिन्हके परदा हैं।
राँकसिरोमनि काकिनिभाग बिलोकत लोकप को करदा है॥
दानि जो चारि पदारथको, त्रिपुरारि, तिहूँ पुरमें सिर टीको।
भोरो भलो, भले भायको भूखो, भलोई कियो सुमिरें तुलसीको॥
ता बिनु आसको दास भयो,कबहूँ न मिट्यो लघु लालचु जीको।
साधो कहा करि साधन तैं, जो पै राधो नहीं पति पारबतीको॥
जात जरे सब लोक बिलोकि तिलोचन सो बिषु लोकि लियो है।
पान कियो बिषु, भूषन भो, करुनाबरुनालय साइँ-हियो है।
मेरोइ फोरिबे जोगु कपारु, किधौं कछु काहूँ लखाइ दियो है
काहे न कान करौं बिनती तुलसी कलिकाल बेहाल कियो है॥
खायो कालकूटु भयो अजर अमर तनु,
भवनु मसानु, गथ गाठरी गरदकी।
डमरु कपालु कर,भूषन कराल ब्याल,
बावरे बड़ेकी रीझ बाहन बरदकी॥
तुलसी बिसाल गोरे गात बिलसति भूति,
मानो हिमगिरि चारु चाँदनी सरदकी।
अर्थ-धर्म-काम-मोच्छ बसत बिलोकनिमें,
कासी करामाति जोगी जागति मरदकी॥
पिंगल जटाकलापु माथेपै पुनीत आपु,
पावक नैना प्रताप भ्रूपर बरत है।
लोयन बिसाल लाल, सोहै बालचंद्र भाल,
खंठ कालकूटु, ब्याल-भूषन धरत है॥
सुंदर दिगंबर, बिभूति गात, भाँग खात,
रूरे सृंगी पुरें काल-कंटक हरत हैं।
देत न अघात रीझि, जात पात आकहीकें
भोरानाथ जोगी जब औढर ढरत हैं॥
देत संपदासमेत श्रीनिकेत जाचकनि,
भवन बिभूति-भाँग, बृषभ बहनु है।
नाम बामदेव दाहिनो सदा असंग रंग
अर्ध्द अंग अंगना, अनंगको महनु है॥
तुलसी महेसको प्रभाव भावहीं सुगम
निगम-अगमहूको जानिबो गहनु है।
भेष तौ भिखारको भयंकररूप संकर
दयाल दीनबंधु दानि दारिददहनु है॥
चाहै न अनंग- अरि एकौ अंग मागनेको
देबोई पै जानिये,सुभावसिध्द बानि सो।
बारि बुंद चारि त्रिपुरारि पर डारिये तौ
देत फल चारि, लेत सेवा साँची मानि सो॥
तुलसी भरोसो न भवेस भोरानाथको तौ
कोटिक कलेस करौ, मरौ छार छानि सो।
दारिद दमन दूख-दोष दाह दावानल
दुनी न दयाल दूजो दानि सूलपानि-सो॥
काहेको अनेक देव सेवत जागै मसान
खोवत अपान, सठ होत हठि प्रेत रे।
काहेको उपाय कोटि करत,मरत धाय,
जाचत नरेस देस- देसके,अचेत रे
तुलसी प्रतीति बिनु त्यागै तैं प्रयाग तनु,
धनहीके हेत दान देत कुरुखेत रे।
पात द्वै धतूरेके दै, भोरें कै, भवेससों,
सुरेसहूकी संपदा सुभायसों न लेत रे॥
स्यंदन,गयंद, बाजिराजि,भले भले भट,
धन-धाम-निकर करनिहूँ न पूजै क्वै।
बनिता बिनीत, पूत फावन सोहावन,औ
बिनय बिबेक, बिद्या सुभग सरीर ज्वै॥
इहाँ ऐसो सुख,परलोक सिवलोक ओक,
जाको फल तुलसी सो सुनौ सावधान ह्वै।
जानें, बिनु जानें, कै रिसानें, केलि कबहुँक
सिवहि चढ़ाए ह्वैहैं बेलके पतौवा द्वै॥
रति-सी रवनि, सिंधुमेखला अवनि पति
औनिप अनेक ठाढ़े हाथ जोरि हारि कै।
संपदा-समाज देखि लाज सुरराजहूकें
सुख सब बिधि बिधि दीन्हैं, सवाँरि कै॥
इहाँ ऐसो सुख, सुरलोक सुरनाथपद,
जाको फल तुलसी सो कहैगो बिचारि कै।
आकके पतौआ चारि फूल कै धतूरेके द्वै
दीन्हें ह्वैहैं बारक पुरारिपर डारिकै॥
देवसरि सेवौं बामदेव गाउँ रावरेहीं
नाम रामहीके मागि उदर भरत हौं।
दीबे जोग तुलसी न लेत काहूको कछुक,
लिखी न भलाई भाल, पोच न करत हौं॥
एते पर हूँ जो कोऊ रावरो ह्वै जोर करै,
ताको जोर, देव! दीन द्वारें गुदरत हौं।
पाइ कै उराहनो उराहनो न दीजो मोहि ,
कालकला कासीनाथ कहें निबरत हौं
चेरो रामराइको, सुजस सुनि तेरो, हर!
पाइ तर आइ रह्यौं सुरसरितीर हौं।
बामदेव! रामको सुभाव-सील जानियत
नातो नेह जानियत रघुबीर भीर हौं॥
अधिभूत बेदन बिषम होत,भूतनाथ
तुलसी बिकल, पाहि!पचत कुपीर हौं।
मारिये तौ अनायास कासीबास खास फल,
ज्याइये तौ कृपा करि निरुजसरीर हौं॥
जीबेकी न लालसा, दयाल महादेव! मोहि,
मालुम है तोहि, मरिबेईको रहतु हौं।
कामरिपु ! रामके गुलामनिको कामतरु!
अवलंब जगदंब सहित चहतु हौं॥
रोग भयो भूत-सो, कुसूत भयो तुलसीको,
भूतनाथ, पाहि! पदपंकज गहतु हौं।
ज्याइये तौ जानकीरमन-जन जानि जियँ
मारिये तौ मागी मीचू सूधियै कहतु हौं॥
भूतभव! भवत पिसाच -भूत- प्रेत -प्रिय,
आपनो समाज सिव आपु नीकें जानिये।
नाना बेष, बाहन, बिभूषन,बसन, बास,
खान -पान,बलि-पूजा बिधिको बखानिये॥
रामके गुलामनिकी रीति, प्रीति सूधी सब,
सबसों सनेह, सबहीको सनमानिये।
तुलसीकी सुधरै सुधारे भूतनाथहीके
मेरे माय बाप गुरु संकर-भवानिये॥
काशीमें महामारी
गौरीनाथ, भोरानाथ, भवत भवानीनाथ।
बिस्वनाथपुर फिरी आन कलिकालकी।
संकर-से नर, गिरिजा-सी नारीं कासीबासी,
बेद कही, सही ससिसेखर कृपालकी॥
छमुख-गनेस तें महेसके पियारे लोग
बिकल बिलोकियत, नगरी बिहालकी।
पुरी-सुरबेलि केलि काटत किरात कलि
निठुर निहारिये उघारि डीठि भालकी॥
ठाकुर महेस ठकुराइनि उमा-सी जहाँ,
लोक-बेदहूँ बिदित महिमा ठहरकी।
भट रुद्रगन, पूत गनपति-सेनापति,
कलिकालकी कुचाल काहू तौ न हरकी॥
बीसीं बिस्वनाथकी बिषाद बड़ो बारानसीं,
बूझिए न ऐसी गति संकर-सहरकी।
कैसे कहै तुलसी बृषासुरके बरदानि
बानि जानि सुधा तजि पीवनि जहरकी॥
लोक-बेदहूँ बिदित बारानसीकी बड़ाई
बासी नर नारि ईस-अंबिका-सरूप हैं।
कालनाथ कोतवाल दंडकारि दंडपानि,
सभासद गनप-से अमित अनूप हैं॥
तहाऊँ कुचालि कलिकालकी कुरीति, कैधौं
जानत न मूढ़ इहाँ भूतनाथ भूप हैं।
फलें फूलैं फैलैं खलल, सीदै साधु पल-पल
खाती दीपमालिका, ठठाइयत सूप हैं॥
पंचकोस पुन्यकोस स्वारथ-परमारथको
जानि आपु आपने सुपास बास दियो है।
नीच नर-नारि न सँभारि सके आदर,
लहत फल कादर बिचारि जो न कियो है॥
बारी बारानसी बिनु कहे चक्रपानि चक्र,
मानि हितहानि सो मुरारि मन भियो है।
रोसमें भरोसो एक आसुतोस कहि जात
बिकल बिलोकि लोक कालकूट पियो है॥
रचत बिरंचि, हरि पालत, हरत हर
तेरे हीं प्रसाद अग- जग-पालिके।
तोहिमें बिकास बिस्व ,तोहिमें बिलास सब,
तोहिमें समात, मातु भूमिधरबालिके ॥
दीजे अवलंब जगदंब ! न बिलंब कीजै,
करुनातरंगगिनी कृपा-तरंग-मालिके।
रोष महामारी, परितोष महतारी दुनी
देखिये दुखारी, मुनि-मानस-मरालिके॥
निपट बसेरे अघ औगुन घनेरे,नर-
नारिऊ अनेरे जगदंब! चेरी-चेरे हैं।
दारिद-दुखारी देबि भूसुर भिखारी-भीरु
लोब मोह काम कोह कलिमल घेरे हैं॥
लोकरीति राखी राम, साखि बामदेव जानि
जनकी बिनति मानि मातु ! कहि मेरे हैं।
महामारी महेसानि! महिमाकी खानि, मोद-
मंगलकी रासि, दास कासीबासी तेरे हैं॥
लोगनिकें पाप कैधौं, सिध्द-सुर-साप कैधौं,
कालकें प्रताप कासी तिहूँ ताप तई है।
ऊँचे,नीचे,बीचके,धनिक,रंक, राजा,राय
हठनि बजाइ करि डीठि पीठि दई है॥
देवता निहोरे, महामारिन्ह सों कर जोरे,
भोरानाथ जानि भोरे आपनी-सी ठई है।
करुनानिधान हनुमान बीर बलवान !
जसरासि जहाँ-तहाँ तैंहीं लूटि लई है॥
संकर-सहर सर, नरनारि बारिचर
बिकल, सकल, महामारी माजा भई है।
उछरत उतरात हहरात मरि जात,
भभरि भगात जल-थल मीचुमई है॥
देव न दयाल, महिपाल न कृपालचित,
बारानसीं बाढति अनीति नित नई है ।
पाहि रघुराज ! पाहि कपिराज रामदूत !
रामहूकी बिगरी तुहीं सुधारि लई है॥
एक तै कराल कलिकाल सूल-मूल, तामें
कोढ़मेंकी खाजु-सी सनीचरी है मीनकी।
बेद -धर्म दूरि गए,भूमि चोर भूप भए,
साधु सीद्यमान जानि रीति पाप पीनकी॥
दूबरेको दूसरो न द्वार, राम दयाधाम!
रावरीऐ गति बल-बिभव बिहीन की।
लागैगी पै लाज वा बिराजमान बिरुदहि,
महाराज ! आजु जौं न देत दादि दीनकी॥
विविध
रामनाम मातु-पितु, स्वामि समरथ, हितु,
आस रामनामकी, भरोसो रामनामको।
प्रेम रामनामहीसों, नेम रामनामहीको,
जानौं नाम मरम पद दाहिनो न बामको॥
स्वारथ सकल परमारथको रामनाम,
रामनाम हीन तुलसी न काहू कामको।
रामकी सपथ, सरबस मेरें रामनाम,
कामधेनु-कामतरु मोसे छीन छामको॥
मारग मारि,महीसुर मारि, कुमारग कोटिककै धन लीयो।
संकरकोपसों पापको दाम परिच्छित जाहिगो जारि कै हीयो॥
कासीमें कंटक जेते भये ते गे पाइ अघाइ कै आपनो कीयो।
आजु कि कालि परों कि नरों जड जाहिंगे चाटि दिवारीको दीयो॥
कुंकुम -रंग सुअंग जितो, मुखचंदसो चंदसों होड़ परी है।
बोलत बोल समृध्दि चुवै, अवलोकत सोच-बिषाद हरी है॥
गौरी कि गंग बिहंगिनिबेष, कि मंजुल मूरति मोदभरी है।
पेखि सप्रेम पयान समै सब सोच-बिमोचन छेमकरी है॥
मंगलकी रासि, परमारथकी खानि जानि
बिरचि बनाई बिधि, केसव बसाई है।
प्रलयहूँ काल राखी सूलपानि सूलपर,
मीचुबस नीच सोऊ चाहत खसाई है॥
छाडि छितिपाल जो परीछित भए कृपाल,
भलो कियो खलको, निकाई सो नसाई है।
पाहि हनुमान! करुनानिधान राम पाहि!
कासी-कामधेनु कलि कुहत कसाई है॥
बिरची बिरंचकी, बसति बीस्वनातकी जो,
प्रानहू तें प्यारी पुरी केसव कृपालकी।
जोतिरूप लिंगमई अगनित लिंगमयी
मोच्छ बितरनि, बिदरनि जगजालकी॥
देबी-देव-देवसरि-सिध्द-मुनिबर-बास
लोपति-बिलोकत कुलिपि भोंडे भालकी।
हा हा करे तुलसी, दयानिधान राम ! ऐसी
कासीकी कदर्थना कराल कलिकालकी॥
आश्रम-बरन कलि बिबस बिकल भए
निज-निज मरजाद मोटरी-सी डार दी।
संकर सरोष महामारिहीतें जानियत,
साहिब सरोष दुनी-दिन-दिन दारदी॥
नारि-नर आरत पुकारत, सुनै न कोऊ,
काहूँ देवतनि मिलि मोटी मूठि मारि दी।
तुलसी सभीतपाल सुमिरें कृपालराम
समय सुकरुना सराहि सनकार दी॥
भाग-1 (दोहा संख्या 1 से 50)