उत्तरकाण्ड · भाग ४
कोटिक उपाय करि लालि पालिअत देह,
मुख कहिअत गति रामहीके नामकी॥
प्रगटैं उपासना, दुरावैं दुरबासनाहि,
मानस निवासभूमि लोभ-मोह-कामकी।
तुलसी-से भगत भगति चहैं रामकी॥
कालिहीं तरुन तन, कालिहीं धरनि-धर,
कालिहीं जितौंगो रन, कहत कुचालि है।
कालिहीं साधौंगो काज, कालिहीं राजा-समाज,
मसक ह्वै कहै, ' भार मेरे मेरु हालिहै'॥
तुलसी यही कुभाँति घने घर घालि आई,
घने घर घालति है, घने घर घालिहै।
देखत- सुनत-समुझतहू न सूझै सोई,
कबहूँ कह्यो न कालहू को कालु कालि है॥
रामभक्तिकी याचना
भयो न तिकाल तिहूँ लोक तुलसी-सो मंद,
निंदैं सब साधु,सुनि मानौं न सकोचु हौं।
जानत न जोगु हियँ हानि मानैं जानकीसु,
काहेको परेखो,पापी प्रपंची पोचु हौं॥
पेट भरिबेके काज महाराजको कहायों
महाराजहूँ कह्यो है प्रनत-बिमोचु हौं।
निज अघजाल, कलिकालकी करालता
बिलोकि होत ब्याकुल, करत सोई सोचु हौं॥
धर्म कें सेतु जगमंगलके हेतु भूमि-
भारु हरिबेको अवतारु लियो नरको।
नीति औ प्रतीति-प्रीतिपाल चालि प्रभु मानु
लोक-बेद राखिबेको पनु रघुबरको॥
बानर-बिभीषनकी ओर के कनावड़े हैं,
सो प्रसंगु सुनें अंगु जरे अनुचरको।
राखे रीति आपनी जो होइ सोई कीजै, बलि,
तुलसी तिहारो घर जायऊ है घरको॥
नाम महाराजके निबाह नीको कीजै उर
सबही सोहात, मैं न लोगनि सोहात हौं।
कीजै राम! बार यहि मेरी ओर चष-कोर
ताहि लगि रंक ज्यों सनेह को ललात हौं॥
तुलसी बिलोकि कलिकालकी करालता
कृपालको सुभाउ समुझत सकुचात हौं
लोक एक भाँतिको, त्रिलोकनाथ लोकबस
आपनो न सोचु, स्वामी-सोचहीं सुखात हौं॥
प्रभुकी महत्ता और दयालुता
तौलौं लोभ लोलुप ललात लालची लबार,
बार-बार लालचु धरनि-धन-धामको।
तबलौं बियोग-रोग-सोग, भोग जातनाको
जुग सम लागत जीवनु जाम-जामको।
तौलौं दुख-दारिद दहत अति नित तनु
तुलसी है किंकरु बिमोह-कोह-कामको।
सब दुख आपने, निरापने सकल सुख,
जौलौं जनु भयो न बजाइ राजा रामको॥
तौलौं मलीन , हीन दीन, सुख सपनें न,
जहाँ-तहाँ दुखी जनु भाजनु कलेसको।
तौलौं उबेने पाय फिरत पेटौ खलाय
बाय मुह सहत पराभौ देस-देसको।
तबलौं दयावनो दुसह दुख दारिदको,
साथरीको सोइबो, ओढ़िबो झूने खेसको॥
जबलौं न भजै जीहँ जानकी-जीवन रामु,
राजनको राजा सो तौ साहेबु महेसको॥
ईसनके ईस, महाराजनके महाराज,
देवनके देव, देव! प्रानहुके प्रान हौ।
कालहूके काल, महाभूतनके महाभूत,
कर्महूके करम, निदानके निदान हौ।
निगम को अगम, सुगम तुलसीहू-सेको
एते मान सीलसिंधु, करुनानिधान हौ।
महिमा अपार, काहू बोलको न वारापार,
बड़ी साहबीमें नाथ ! बड़े सावधान हौ॥
आरतपाल कृपाल जो रामु जेहीं सुमिरे तेहिको तहँ ठाढें।
नाम-प्रताप-महामहिमा अँकरे किये खोटेउ छोटेउ बाढ़े॥
सेवक एकतें एक अनेक भए तुलसी तिहुँ ताप न डाढ़े।
प्रेम बदौं प्रहलादहिको, जिन पाहनतें परमेस्वरु काढ़े॥
काढ़ि कृपान, कृपा न कहूँ, पितु काल कराल बिलोकि न भागे।
'राम कहाँ? सब ठाऊँहैं,' खंभमें? 'हाँ'सुनि हाँक नृकेहरि जागे॥
बैरि बिदारि भए बिकराल, कहें प्रलादहिकें अनुरागे।
प्रीति-प्रतीति बड़ी तुलसी, तबतें सब पाहन पूजन लागे॥
अंतरजामिहुतें बड़े बाहेरजामि हैं राम, जे नाम लियेतें।
धावत धेनु पेन्हाइ लवाई ज्यों बालक-बोलनि कान कियेतें॥
आपनि बूझि कहै तुलसी, कहिबेकी न बावरि बात बियेतें।
पैज परें प्रहलादहुको प्रगटे प्रभु पाहनतें, न हियेतें॥
बालकु बोलि दियो बलि कालको कायर कोटि कुचालि चलाई।
पापी है बाप, बड़े परतापतें आपनि ओरतें खोरि न लाई॥
भूरि दईं बिषमूरि, भई प्रहलाद-सुधाईं सुधाकी मलाई।
रामकृपाँ तुलसी जनको कग होत भलेको भलाई भलाई॥
कंस करी बृजबासिन पै करतूति कुभाँति, चली न चलाई।
पंडूके पूत सपूत, कपूत सुजोधन भो कलि छोटो छलाई॥
कान्ह कृपाल बड़े नतपाल, गए खल खेचर खीस खलाई।
ठीक प्रतीति कहै तुलसी, जग होई भले को भलाई भलाई॥
अवनीस अनेक भए अवनीं, जिनके डरतें सुर सोच सुखाहीं।
मानव-दानव-देव सतावन रावन घाटि रच्यो जग माहीं॥
ते मिलिये धरि धूरि सुजोधनु, जे चलते बहु छत्रकी छाँहीं।
बेद पुरान कहैं ,जगु जान, गुमान, गोबिंदहि भावत नाहीं॥
गोपियोंका अनन्य प्रेम
जब नैनन प्रीति ठई ठग स्याम सों, स्यानी सखी हठि हौं बरजी।
नहि जानो बियोगु-सो रोगु है आगें, झुकी तब हौं तेहि सों तरजी॥
अब देह भई पट नेहके घाले सों, ब्यौंत करै बिरहा-दरजी।
ब्रजराजकुमार बिना सुनु भृंग ! अनंगु भयो जियको गरजी॥
जोग-कथा पठई ब्रजको,सब सो सठ चेरीकी चाल चलाकी।
ऊधौ जू! क्यौं न कहै कुबरी, जो बरी नटनागर हेरि हलाकी॥
जाहि लगै परि जाने सोई, तुलसी सो सोहागिनि नंदललाकी।
जानी है जानपनी हरिकी, अब बाँधियैगी कछु मोटि कलाकी॥
पठयो है छपदु छबीलें कान्ह कैहूँ कहूँ
खौजिकै खवासु खासो कुबरी-सी बालको।
ग्यानको गढ़ैया,बिनु गिराको पढ़ैया,बार-
खालको कढ़ैया, सो बढ़ैया उर-सालको॥
प्रीतिको बधीक,रस रीतिको अधिक,नीति-
निपुन, बिबेकु है, निदेसु देस-कालको।
तुलसी कहें न बनै, सहें ही बनैगी सब
जोगु भयो जोगको बियोगु नंदलालको॥
विनय
हनुमान व्हे कृपाल, लाडिले लखनलाल!
भावते भरत! कीजै सेवक-सहाय जू।
बिनती करत दीन दूबरो दयावनो सो
बिगरेतें आपु ही सुधारि लीजे भाय जू॥
मेरी साहिबिनी सदा सीसपर बिलसति
देबि क्यों न दासको देखाइयत पाय जू।
खीझहूमें रीझिबेकी बानि सदा रीझत हैं,
रीझे ह्वैहैं, रामकी दोहाई, रघुराय जू॥
बेष बिरागको, राग भरो मनु माय! कहौं सतिभाव हौं तोसों।
तेरे ही नाथको नामु लै बेचि हौं पातकी पावँर प्राननि पोसों॥
एते बड़े अपराधी अघी कहुँ, तैं कहु, अंब! कि मेरो तूँ मोसों।
स्वारथको परमारथको परिपुरन भो, फिरि घाटि न होसों॥
सीतावट-वर्णन
जहाँ बालमीकि भए ब्याधतें मुनिंदु साधु
'मरा मरा' जपें सिख सुनि रिषि सातकी।
सीयको निवास, लव-कुसको जनमथल
तुलसी छुवत छाँह ताप गरै गातकी॥
बिटपमहीप सुरसरित समीप सोहै,
सीताबटु पेखत पुनीत होत पातकी।
बारिपुर दिगपुर बीच बिलसति भूमि,
अंकित जो जानकी-चरन-जलजातकी॥
मरकतबरन परन ,फल मानिक-से
लसै जटाजूट जनु रूखबेष हरु है।
सुषमाको ढैरु कैधौं सुकृत-सुमेरु कैधौं,
संपदा सकल मुद-मंगलको घरु है॥
देत अभिमत जो समेत प्रीति सेइये
प्रतीति मानि तुलसी, बिचारि काको थरु है।
सुरसरि निकट सुहावनी अवनि सोहै
रामरवनिको बटु कलि कामतरु है॥
देवधुनि पास, मुनिबासु,श्रीनिवासु जहाँ,
प्राकृतहूँ बट-बूट बसत पुरारि हैं।
जोग-जप-जागको, बिरागको पुनीत पीठु
'आयसु', 'आदेस', 'बाबू' भलो-भलो भावसिध्द
तुलसी बिचारि जोगी कहत पुकारि हैं।
राम-भगतनको तौ कामतरुतें अधिक,
सियबटु सेयें करतल फल चारि हैं॥
चित्रकूट-वर्णन
जहाँ बनु पावनो सुहावने बिहंग-मृग,
देखि अति लागत अनंदु खेत-खूँट-सो।
सीता-राम-लखन-निवासु, बासु मुनिनको,
सिध्द-साधु-साधक सबै बिबेक-बूट-सो॥
झरना झरत झारि सीतल पुनीत बारि,
मंदाकिनि मंजुल महेसजटाजूट-सो।
तुलसी जौं रामसो सनेहु साँचो चाहिये तौ,
सेइये सनेहसों बिचित्र चित्रकूट सो॥
मोह-बन-कलिमल-पल-पीन जानि जिय
साधु-गाइ-बिप्रनके भयको नेवारिहै।
दीन्हीहै रजाइ राम, पाइ सो सहाइ लाल
लखन समत्थ बीर हेरि-हेरि मारिहै॥
मादाकिनी मंजुल कमान असि,बान जहाँ
बारि-धार धीर धरि सुकर सुधारिहै।
चित्रकूट अचल अहेरि बैठ्यो घात मानो
पातकके ब्रात घोर सावज सँघारिहै॥
लागि दवारि पहार ठही, लहकी कपि लंक जथा खरखौकी।
चारु चुआ चहुँ ओर चलैं, लपटैं-झपटैं सो तमीचर तौंकी॥
क्यौं कहि जात महासुषमा, उपमा तकि ताकत है कबि कौं की।
मानो लसी तुलसी हनुमान हिएँ जगजीति जरायकी चौकी॥
तीर्थराज-सुषमा
देव कहैं अपनी-अपना, अवलोकन तीरथराजु चलो रे।
देखि मिटैं अपराध अगाध, निमज्जत साधु-समाजु भलो रे॥
सोहै सितासितको मिलिबो, तुलसी हुलसै हिय हेरि हलोरे।
मानो हरे तृन चारु चरैं बगरे सुरधेनुके धौल कलोरे॥
श्रीगङ्गा-महात्म्य
देवनदी कहँ जो जन जान किए मनसा, कुल कोटि उधारे।
देखि चले झगरैं सुरनारि, सुरेस बनाइ बिमान सँवारे॥
पूजाको साजु बिरंचि रचैं तुलसी, जे महातम जाननिहारे।
ओककी नीव परी हरिलोक बिलोकत गंग ! तरंग तिहारे॥
ब्रह्मु जो ब्यापकु बेद कहैं, गम नाहिं गिरा गुन-ग्यान-गुनीको।
जो करता, भरता, हरता,सुर-साहेबु,साहेबु दीन-दुनीको॥
सोइ भयो द्रवरूप सही, जो है नाथु बिरंचि महेस मुनीको।
मानि प्रतीति सदा तुलसी जलु काहे न सेवत देवधुनीको॥
बारि तिहारो निहारि मुरारि भएँ परसें पद पापु लहौगो॥
ईस ह्वै सीस धरौं पै डरौं , प्रभुकी समताँ बड़े दोष दहौंगो॥
बरु बारहिं बार सरीर धरौं,रघुबीरको ह्वै तव तीर रहौंगो।
भागीरथी! बिनवौं कर जोरि, बहोरि न खोरि लगै सो कहौंगो॥
अन्नपूर्णा-महात्म्य
लालची ललात, बिललात द्वार-द्वार दीन,
बदन मलीन, मन मिटै ना बिसूरना।
ताकत सराध, कै बिबाह, कै उछाह कछू,
डोलै लोल बूझत सबद ढोल-तूरना॥
प्यासेहूँ न पावै बारि, भूखें न चनक चारि,
चाहत अहारन पहार, दारि घूर ना।
सोकको अगार, दुखभार भरो तौलौं जन
जौलौं देबी द्रवै न भवानी अन्नपरना॥
शंकर-स्तवन
भस्म अंग, मर्दन अनंग, संतत असंग हर।
सीस गंग, गिरिजा अर्धंग, भूषन भुजंगबर॥
मुंडमाल, बिधु बाल भाल,डमरु कपालु कर।
बिबुधबृंद-नवकुमुद-चंद, सुखकंद सूलधर॥
त्रिपुरारि त्रिलोचन, दिग्बसन, बिषभोजन, भवभयहरन।
कह तुलसिदासु सेवत सुलभ सिव सिव सिव संकर सरन॥
गरल-असन दिगबसन ब्यसन भंजन जनरंजन।
कुंद-इंदु-कर्पर-गौर सच्चिदानंदघन॥
बिकटबेष, उर सेष, सीस सुरसरित सहज सुचि।
सिव अकाम अभिरामधाम नित रामनाम रुचि॥
कंदर्पदर्प दुर्गम दमन उमारमन गुनभवन हर।
त्रिपुरारि! त्रिलोचन! त्रिगुनपर! त्रिपुरमथन! जय त्रिदसबर॥
अरध अंग अंगना, नामु जोगीसु, जोगपति।
बिषम असन दिगबसन, नाम बिस्बेसु बीस्वगति॥
कर कपाल, सिर माल ब्याल, बिष-भूति-बिभूषन।
नाम सुध्द, अबिरुध्द, अमर अनवद्य, अदूषन॥
बिकराल-भूत-बेताल-प्रिय भीम नाम, भवभयदमन।
सब `बिधि समर्थ, महिमा अकथ, तुलसिदास-संसय-समन॥
भूतनाथ भयहरन भीम भयभवन भूमिधर।
भानुमंत भगवंत भूतिभूषन भुजंगबर॥
भव्य भावबल्लभ भवेस भव-भार-बिभंजन
भूरिभोग भैरव कुजोगगंजन जनरंजन॥
भारती-बदन बिष-अदन सिव ससि-पतंग-पावक-नयन।
कह तुलसिदास किन भजसि मन भद्रसदन मर्दनमय॥
नागो फिरै कहै मागनो देखि 'न खाँगो कछू', जनि मागिये थोरो।
राँकनि नाकप रीझि करै तुलसी जग जो जुरैं जाचक जोरो॥
नाक संवारत आयो हौं नाकहि, नाहिं पिनाकिहि नेकु निहोरो।
ब्रह्मा कहै, गिरिजा! सिखवो पति रावरो, दानि है बावरो भोरो॥
बिषु पावकु ब्याल कराल गरें, सरनागत तौ तिहुँ ताप न डाढ़े॥
भूत बेताल सखा, भव नामु दलै पलमें भवके भय गाढ़े॥