श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
कवितावली · गोस्वामी तुलसीदास

लंकाकाण्ड · भाग २

कवितावली · लंकाकाण्ड · भाग २
छंद ५८

राक्षस-वानर-संग्राम

रोष्यो रन रावनु, बोलाए बीर बानइत,

जानत जे रीति सब संजुग समाजकी।

चली चतुरंग चमू, चपरि हने निसान,

सेना सराहन जोग रातिचरराजकी॥

तुलसी बिलोकि कपि-भालु किलकत

ललकत लखि ज्यों कँगाल पातरी सुनाजकी।

रामरूख निरखि हरष्यो हियँ हनूमानु,

मानो खेलवार खोली सीसताज बाजकी॥

साजि कै सनाह-गजगाह सउछाह दल,

महाबली धाए बीर जातुधान धीरके।

इहाँ भालु-बंदर बिसाल मेरु-मंदर-से।

लिए सैल-साल तोरि नीरनिधितीरके॥

तुलसी तमकि-ताकि भिरे भारी जुध्द क्रुध्द,

सेनप सराहे निज निज भट भीरके।

रुंडनके झुंड झूमि-झूमि झुकरे-से नाचैं,

समर सुमार सूर मारैं रघुबीरके॥

छंद ५९

तीखे तुरंग कुरंग सुरंगनि साजि चढ़े छँटि छैल छबीले।

भारी गुमान जिन्हें मनमें, कबहूँ न भए रनमें तन ढीले॥

तुलसी लखी कै गज केहरि ज्यों झपटे,पटके सब सूर सलीले।

भूमि परे भट भूमि कराहत, हाँकि हने हनुमान हठीले।

सूर सँजोइल साजि सुबाजि, सुसेल धरैं बगमेल चले हैं

भारी भुजा भरी,भारी सरीर, बली बिजयी सब भाँति भले हैं॥

'तुलसी' जिन्ह धाएँ धुकै धरनी, धरनीधर धौर धकान हले हैं।

ते रन-तीक्खन लक्खन लाखन दानि ज्यों दारिद दाबि दले हैं॥

गहि मंदर बंदर-भालु चले, सो मनो उनये घन सावनके।

'तुलसी' उत झुंड प्रचंड झुके, झपटैं भट जे सुरदावनके॥

बिरुझे बिरुदैत जे खेत अरे, न टरे हठि बैरु बढ़ावनके।

रन मारि मची उपरी-उपरा भलें बीर रघुप्पति रावनके॥

छंद ६०

सर-तोमर सेलसमूह पँवारत,मारत बीर निसाचरके।

इत तें तरु-ताल तमाल चले,खर खंड प्रचंड महीधरके॥

'तुलसी' करि केहरिनादु भिरे भट, खग्ग खगे,खपुआ खरके।

नख-दंतन सों भुजदंड बिहंडत, मुंडसों मुंड परे झरकैं॥

रजनीचर-मत्तगयंद-घटा बिघटै मृगराजके साज लरै।

झपटै भट कोटि महीं पटकै, गरजै, रघुबीरकी सौंह करै

तुलसी उत हाँक दसाननु देत, अचेत भे बीर, को धीर धरै।

बिरुझो रन मारुतको बिरुदैत, जो कालहु कालसो बूझि परै॥

जे रजनीचर बीर बिसाल, कराल बिलोकत काल न खाए।

ते रन-रोर कपीसकिसोर बड़े बरजोर परे फग पाये॥

लूम लपेटि, अकास निहारि कै, हाँकि हठी हनुमान चलाए

सूखि गे गात, चले नभ जात, परे भ्रमबात, न भूतल आए॥

छंद ६१

जो दससीसु महीधर ईसको बीस भुजा खुलि खेलनिहारो।

लोकप, दिग्गज, दानव ,देव सबै सहमे सुनि साहसु भारो॥

बीर बड़ो बिरुदैत बली, अजहूँ जग जागत जासु पँवारो।

सो हनुमान हन्यो मुठिकाँ गिरि गो गिरिराजु ज्यों गाजको मारो॥

दुर्गम दुर्ग, पहारतें भारे, प्रचंड महा भुजदंड बने हैं ।

लक्खमें पक्खर, तिक्खन तेज, जे सूरसमाजमें गाज गने हैं॥

ते बिरुदैत बली रनबाँकुरे हाँकि हठी हनुमान हने हैं।

नामु लै रामु देखावत बंधुको घूमत घायल घायँ घने हैं॥

हाथिन सों हाथी मारे, घोरेसों सँघारे घोरे,

रथनि सों रथ बिदरनि बलवानकी।

छंद ६२

चंचल चपेट, चोट चरन चकोट चाहें,

हहरानी फौजें भहरानी जातुधानकी॥

बार-बार सेवक-सराहना करत रामु,

'तुलसी' सराहै रीति साहेब सुजानकी।

लाँबी लूम लसत, लपेटि पटकत भट,

देखौ देखौ, लखन ! लरनि हनुमानकी॥

दबकि दबोरे एक, बारिधिमें बोरे एक,

मगन महीमें, एक गगन उड़ात हैं।

पकरि पछारे कर, चरन उखारे एक,

चीरी-फारि डारे, एक मीजि मारे लात हैं॥

'तुलसी' लखत, रामु, रावनु, बिबुध, बिधि,

चक्रपानि, चंडीपति, चंडिका सिहात हैं॥

बड़े-बड़े बानइत बीर बलवान बड़े,

जातुधान, जूथप निपाते बातजात हैं॥

छंद ६३

प्रबल प्रचंड बरिबंड बाहुदंड बीर

धाए जातुधान, हनुमानु लियो घेरि कै।

महाबलपुंज कुंजरारि ज्यों गरजि, भट

जहाँ-तहाँ पटके लँगूर फेरि-फेरि कै।

मारे लात,तोरे गात, भागे जात हाहा खात,

कहैं, 'तुलसीस! राखि' रामकी सौं टरि कै।

ठहर-ठहर परे, कहरि-कहरि उठैं,

हहरि-हहरि हरु सिध्द हँसे हेरि कै॥

जाकी बाँकी बीरता सुनत सहमत सूर,

जाकी आँच अबहूँ लसत लंक लाह-सी।

सोई हनुमान बलवान बाँको बानइत,

जोहि जातुधान-सेना चल्यो लेत थाह-सी॥

कंपत अकंपन, सुखाय अतिकाय काय,

कुंभऊकरन आइ रह्यो पाइ आह-सी।

देखे गजराज मृगराजु ज्यों गरजि धायो,

बीर रघुबीरको समीरसूनु साहसी॥

छंद ६४

झूलना

मत्त-भट-मुकुट, दसकंठ-साहस-सइल-

सृंग-बिद्दरनि जनु बज्र-टाँकी।

दसन धरि धरनि चिक्करत दिग्गज, कमठु,

सेषु संकुचित, संकित पिनाकी॥

चलत महि-मेरु,उच्छलत सायर सकल,

बिकल बिधि बधिर दिसि-बिदसि झाँकी।

रजनिचर-घरनि घर गर्भ-अर्भक स्रवत,

सुनत हनुमानकी हाँक बाँकी ॥

कौनकी हाँकपर चौंक चंडीसु, बिधि,

चंडकर थकित फिरि तुरग हाँके।

कौनके तेज बलसीम भट भीम-से

भीमता निरखि कर नयन ढाँके॥

दास-तुलसीसके बिरुद बरनत बिदुष,

बीर बिरुदैत बर बैरि धाँके।

नाक नरलोक पाताल कोउ कहत किन

कहाँ हनुमानु-से बीर बाँके।

छंद ६५

जातुधानावली-मत्तकुंजरघटा

निरखि मतगराजु ज्यों गिरितें टूट्यो।

बिकट चटकन चोट, चरन गहि, पटकि महि,

निघटि गए सुभट, सतु सबको छूट्यो॥

'दासु तुलसी' परत धरनि धरकत, झुकत

हाट-सी उठति जंबुकनि लूट्यो।

धीर रघूबीरको भीर रनबाँकुरो

हाँकि हनुमान कुलि कटकु कूट्यो ॥

छप्पै

कतहुँ बिटप-भूधर उपारि परसेन बरष्षत।

कतहुँ बाजिसों बाजि मर्दि, गजराज करष्षत॥

चरनचोट चटकन चकोट अरि-उर-सिर बज्जत।

बिकट कटकु बिद्दरत बीरु बारिदु जिमि गज्जत॥

लंगूर लपेटत पटकि भट,'जयति राम,जय!उच्चरत।

तुलसीस पवननंदनु अटल जुध्द क्रुध्द कौतुक करत॥

छंद ६६

अंग-अंग दलित ललित फूले किंसुक-से

हने भट लाखन लखन जातुधानके।

मारि कै, पछारि कै, उपारि भुजदंड चंड,

खंडि-खंडि डारे ते बिदारे हनुमानके॥

कूदत कबंधके कदम्ब बंब-सी करत,

धावत दिखावत हैं लाघौ राघौबानके।

तुलसी महेसु, बिधि, लोकपाल, देवगन,

देखत बेवान चढ़े कौतुक मसानके॥

लोथिन सों लोहूके प्रबाह चले जहाँ-तहाँ

मानहुँ गिरिन्ह गेरु झरना झरत हैं।

श्रोनितसरित घौर कुंजर-करारे भारे,

कूलतें समूल बाजि-बिटप परत हैं॥

सुभट-सरीर नीर-चारी भारी-भारी तहाँ,

सूरनि उछाहु, कूर कादर डरत हैं।

फेकरि- फेकरि फेरु फारि- फारि पेट खात,

काक-कंक बालक कोलाहलु करत हैं॥

छंद ६७

ओझरीकी झोरी काँधे, आँतनिकी सेल्ही बाँधें,

मूँडके कमंडल खपर किएँ कोरि कै।

जोगिनी झुटुंग झुंड-झुंड बनीं तापसीं-सी

तीर-तीर बैठीं सो समर-सरि खौरि कै॥

श्रोनित सों सानि -सानि गूदा खात सतुआ-से

प्रेत एक पिअत बहोरि घोरि-घोरि कै।

'तुलसि' बैताल-भूत साथ लिए भूतनाथु,

हेरि- हेरि हँसत हैं हाथ-हाथ जोरि कै॥

राम सरासन तें चले तीर रहे न सरीर, हड़ावरि फूटीं।

रावन धीर न पीर गनी, लखि लै कर खफ्पर जोगिनि जूटीं॥

श्रोनित -छीट छटानि जटे तुलसी प्रभु सोहैं महा छबि छूटीं।

मानो मरक्कत-सैल बिसालमें फैलि चलीं बर बीरबहूटीं

छंद ६८

लक्ष्मणमूर्छा

मानी मैगनादसों प्रचारि भिरे भारी भट,

आपने अपन पुरुषारथ न ढील की।

घायल लखनलालु लखी बिलखाने रामु,

भई आस सिथिल जगन्निवास-दीलकी॥

भाईको न मोहु छोहु सीयको न तुलसीस

कहैं 'मैं बिभीषनकी कछु न सबील की'

लाज बाँह बोलेकी, नेवाजकी सँभार-सार

साहेबु न रामु-से बलाइ लेउँ सीलकी॥

कानन बासु दसानन सो रिपु

आननश्री ससि जीति लियो है।

बालि महा बलसालि दल्यो

कपि पालि बिभीषनु भूपु कियो हैं॥

तीय हरी, रन बंधु पर्यो

पै भर् यो सरनागत सोच हियो है।

बाँह-पगार उदार कृपाल

कहाँ रघुबीरु सो बीरु बियो है॥

छंद ६९

लीन्हो उखारि पहारु बिसाल,

चल्यो तेहि काल, बिलंबु न लायो।

मारुतनंदन मारुतको, मनको,

खगराजको बेगु लजायो॥

तीखी तुरा 'तुलसी' कहतो

पै हिएँ उपमाको समाउ न आयो।

मानो प्रतच्छ परब्बतकी नभ।

लीक लसी, कपि यों धुकि धायो॥

चल्यो हनुमानु, सुनि जातुधान कालनेमि

पठयो ,सो मुनि भयो, पायो फलु छलि कै।

सहसा उखारो है पहारु बहु जोजनको,

रखवारे मारे भारे भूरि भट दलि कै॥

छंद ७०

बेगु, बलु,साहस,सराहत कृपालु रामु,

भरतकी कुसल, अचलु ल्यायो चलि कै।

हाथ हरिनाथके बिकाने रघुनाथ जनु,

सीलसिंधु तुलसीस भलो मान्यो भलि कै॥

युध्दका अंत

बाप दियो काननु, भो आननु सुभाननु सो,

बैरी भौ दसाननु सो, तीयको हरनु भो

बालि बलसालि दलि, पालि कपिराजको,

बिभीषनु नेवाजि, सेत सागर-तरनु भो॥

घोर रारि हेरि त्रिपुरारि-बिधि हारे हिएँ,

घायल लखन बीर नर बरनु भो।

ऐसे सोकमें तिलोकु कै बिसोक पलही में,

सबही को तुलसीको साहेबु सरनु भो॥

छंद ७१

कुंभकरन्नु हन्यो रन राम, दल्यो दसकंधरु कंधर तोरे।

पूषनबंस बिभूषन-पूषन-तेज-प्रताप गरे अरि-ओरे॥

देव निसान बजावत, गावत, साँवतु गो मनभावत भो रे।

नाचत-बानर-भालु सबै 'तुलसी' कहि 'हा रे! हहा भै अहो रे'॥

मारे रन रातिचर रावनु सकुल दलि,

अनुकूल देव-मुनि फूल बरषतु है।

नाग, नर, किंनर, बिरंचि, हरि, हरु हेरि

पुलक सरीर हिएँ हेतु हरषत हैं॥

बाम ओर जानकी कृपानिधानके बिराजैं,

देखत बिषादु मिटै, मोदु करषतु हैं।

आयसु भो ,लोकनि सिधारे लोकपाल सबै,

'तुलसी' निहाल कै कै दिये सरखतु हैं॥