लंकाकाण्ड · भाग १
त्रिजटाका आश्वासन
त्रिजटा कहति बार-बार तुलसीस्वरीसों,
'राघौ बान एकहीं समुद्र सातौ सोषिहैं।
सकुल सँघारि जातुधान-धारि जम्बुकादि,
जोगिनी-जमाति कालिकाकलाप तोषिहैं॥
राजु दे नेवाजिहैं बजाइ कै बिभीषनै,
बजैंगे ब्योम बाजने बिबुध प्रेम पोषिहैं॥
कौन दसकंधु, कौन मेघनादु बापुरो,
को कुंभकर्नु कीटु, जब रामु रन रोषिहैं॥
बिनय-सनेह सों कहति सीय त्रिजटासों,
पाए कछु समाचार आरजसुवनके।
पाए जू, बँधायो सेतु उतरे भानुकुलकेतु,
आए देखि-देखि दूत दारुन दुवनके॥
बदन मलीन, बलहीन, दीन देखि, मानो
मिटै घटै तमीचर-तिमिर भुवनके।
लोकपति-कोक-सोक मूँदे कपि-कोकनद,
दंड द्वै रहे हैं रघु-आदिति-उवनके॥
झूलना
सुभुजु मारीचु खरु त्रिसरु दूषनु बालि,
दलत जेहिं दूसरो सरु न साँध्यो।
आनि परबाम बिधि बाम तेहि रामसों,
सकत संग्रामु दसकंधु काँध्यो॥
समुझि तुलसीस-कपि-कर्म घर- घर घैरु,
बिकल सुनि सकल पाथोधि बाँध्यो।
बसत गढ़ बंक, लंकेसनायक अछत,
लंक नहिं खात कोउ भात राँध्यो॥
'बिस्वजयी' भृगुनायक-से बिनु हाथ भए हनि हाथ हजारी।
बातुल मातुलकी न सुनी सिख का 'तुलसी' कपि लंक न जारी॥
अजहूँ तौ भलो रघुनाथ मिलें, फिरि बूझहै, को गज,कौन गजारी।
कीर्ति बड़ो, करतूति बड़ो, जन-बात बड़ो, सो बड़ोई बजारी॥
जब पाहन भे बनबाहन-से उतरे बनरा, 'जय राम' रढैं।
'तुलसी' लिएँ सैल-सिला सब सोहत, डसागरु ज्यों बल बारि बढ़ै।
करि कोपु करैं रघुबीरको आयसु,कौतुक हीं गढ़ कूदि चढ़ै।
चतुरंग चमू पलमें दलि कै रन रावन-राढ़-सुहाड़ गढ़ै ॥
बिपुल बिसाल बिकराल कपि-भालु, मानो
कालु बहु बेष धरें, धाए किएँ करषा ।
लिए सिला-सैल,साल,ताल औ तमाल तोरि
तोपैं तोयनिधि, सुरको समाजु हरषा॥
डगे दिगकुंजर कमठु कोलु कलमले,
डोले धराधर धारि, धराधरु धरषा।
'तुलसी'तमकि चलैं, राघौकी सपथ करैं,
को करै अटक कपिकटक अमरषा॥
आए सुकु, सारनु, बोलाए ते कहन लागे,
पुलक सरीर सेना करत फहम हीं।
'महाबली बानर बिसाल भालु काल-से
कराल हैं, रहैं कहाँ, समाहिंगे कहाँ मही'॥
हँस्यो दसकंधु रघुनाथको प्रताप सुनि,
'तुलसी' दुरावे मुखु, सूखत सहम हीं।
रामके बिरोधें बुरो बिधि-हरि-हरहू को,
सबको भलो है राजा रामके रहम हीं॥
अंगदजीका दूतत्व
'आयो! आयो! आयो सोई बानर बहोरि!'भयो
सोरु चहुँ ओर लंकाँ आएँ जुबराजकें।
एक काढ़ैं सौंज, एक धौंज करैं, 'कहा ह्वैहै,
पोच भई,'महासोचु सुभटसमाजकें॥
गाज्यो कपिराजु रघुराजकी सपथ करि,
मूँदे कान जातुधान मानो गाजें गाजकें।
सहमि सुखात बातजातकी सुरति करि,
लवा ज्यों लुकात, तुलसी झपेटें बाजकें॥
तुलसीस बल रघुबीरजू कें बालिसुतु
वाहि न गनत, बात कहत करेरी-सी।
बकसीस ईसजू की खीस होत देखिअत,
रिस काहें लागति, कहत हौं मैं तरी-सी॥
चढ़ि गढ़-मढ़ दृढ़,कोटकें कँगूरें, कोपि
नेकु धका देहैं,ढ़ैहैं ढेलनकी ढ़ेरी-सी।
सुनु दसमाथ !नाथ-णातके हमारे कपि
हाथ लंका लाइहैं तौ रहेगी हथेरी-सी॥
'दूषनु, बिराधु,खरु, त्रिसरा, कबंधु बधे
तालऊ बिसाल बेधे, कौतुक है कालिको।
एकहि बिसिष बस भयो बीर बाँकुरो सो,
तोहू है बिदित बलु महाबली बालिको॥
'तुलसी' कहत हित मानतो न नेकु संक,
मेरो कहा जैहै, फलु पैहै तू कुचालिको।
बीर-करि-केसरी कुठारपानि मानी हारि,
तेरी कहा चली, बिड़! तोसे गनै घालि को॥
तोसों कहौं दसकंधर रे,रघुनाथ बिरोधु न कीजिए बौरे।
बालि बली, खरु, दूषन और अनेक गिरे जे-जे भीतिमें दौरे॥
ऐसिअ हाल भई तोहि धौं,न तु लै मिलु सीय चहै सुखु जौं रे।
रामकें रोष न राखि सकैं तुलसी बिधि, श्रीपति,संकरु सौ रे॥
तूँ रजनीचरनाथ महा, रघुनाथके सेवकको जनु हौं हौं।
बलवान है स्वानु गलीं अपनीं, तोहि लाज न गालु बजावत सौहौं।
बीस भुजा, दस सीस हरौं, न डरौं, प्रभु-आयसु-भंग तें जौं हौं।
खेतमें केहरि ज्यों गजराज दलौं दल, बालिको बालकु तौं हौं॥
कोसलराजके काज हौं आजु त्रिकूटु उपारि, लै बारिधि बोरौं।
महाभुजदंड द्वै अंडकटाह चपेटकीं चोट चटाक दै फोरौं॥
आयसु भंगतें जौं न डरौं, सब मीजि सभासद श्रोनित घोरौं।
बालिको बालकु जौं, 'तुलसी' दसहू मुखके रनमें रद तोरौं
अति कोपसों रोप्यो है पाउ सभाँ, सब लंक ससंकित, सोरु मचा।
तमके घननाद-से बीर प्रचारि कै, हारि निसाचर-सैनु पचा॥
न टरै पगु मेरुहु तें गरु भो, सो मनो महि संग बिरंचि रचा।
'तुलसी' सब सूर सराहत हैं, जगमें बलसालि है बालि-बचा॥
रोप्यो पाउ पैज कै, बिचारि रघुबीर बलु
लागे भट समिटि, न नेकु टसकतु है॥
तज्यो धीरु-धरनीं,धरनीधर धसकत,
धराधरु धीर भारु सहि न सकतु है॥
महाबली बालिकें दबत कलकति भूमि,
'तुलसी' उछलि सिंधु, मेरु मसकतु है।
कमठ कठिन पीठि घट्ठा पर् यो मंदरको,
आयो सोई काम, पै करेजो कसकतु है॥
रावण और मन्दोदरी
झूलना
कनकगिरिसृंग चढ़ि देखि मर्कटकटकु,
बदत मंदोदरी परम भीता।
सहसभुज-मत्तगजराज-रनकेसरी
परसुधर गर्बु जेहि देखि बीता॥
दास तुलसी समरसूर कोसलधनी,
ख्याल हीं बालि बलसालि जीता।
रे कंत ! तृन दंत गहि 'सरन श्रीरामु' कहि,
अजहुँ एहि भाँति लै सौंपु सीता॥
रे नीच! मारीचु बिचलाइ, हति ताड़का,
भंजि सिवचापु सुखु सबहि दीन्ह्यो।
सहस दसचारि खल सहित खर-दूषनहि,
पैठै जमधाम, तैं तउ न चीन्ह्यो॥
मैं जो कहौं, कंत! सुनु मंतु भगवंतसों
बिमुख ह्वै बालि फलु कौन लीन्ह्यो।
बीस भूज, दस सीस खीस गए तबहिं जब,
ईस के ईससों बैरु कीन्ह्यो॥
बालि दलि, काल्हि जलजान पाषान किये,
कंत ! भगवंतु तैं तउ न चीन्हें।
बिपुल बिकराल भट भालु-कपि काल -से,
संग तरु तुंग गिरिसृंग लीन्हें॥
आइगो कोसलाधीसु तुलसीस जेंहि
छत्र मिस मौलि दस दूरि कीन्हें।
ईस बकसीस जनि खीस करु, ईस! सुनु,
अजहुँ कुलकुसल बैदेहि दीन्हें॥
सैनके कपिन को को गनै, अर्बुदे
महाबलबीर हनुमान जानी।
भूलिहै दस दिसा, सीस पुनि डोलिहैं,
कोऽपि रघुनाथु जब बान तानी॥
बालिहूँ गर्बु जिय माहिं ऐसो कियो,
मारि दहपट दियो जमकी घानीं।
कहति मंदोदरी, सुनहि रावन! मतो,
बैगि लै देहि बैदेहि रानी॥
गहनु उज्जारि,पुरु जारि,सुतु मारि तव,
कुसल गो कीसु बर बैरि जाको।
दूसरो दूतू पनु रोऽपि कोपेउ सभाँ,
खर्ब कियो सर्बको, गर्बु थाको॥
दासु तुलसी सभय बदत मयनंदिनी,
मंदमति कंत, सुनु मंतु म्हाको।
तौलौ मिलु बेगि, नहि जौंलौं रन रोष भयो
दासरथि बीर बिरुदैत बाँको॥
काननु उजारि, अच्छु मारि, धारि धूरि कीन्हीं,
नगरु प्रचार् यो, सो बिलोक्यो बलु कीसको।
तुम्हैं बिद्यमान जातुधानमंडलीमें कपि
कोऽपि रोप्यो पाउ,सो प्रभाउ तुलसीसको॥
कंत ! सुनु मंतु कुल-अंतु किएँ अंत हानि,
हातो कीजै हीयतें भरोसो भुज बीसको।
तौलौं मिलु बेगि जौलौं चापु न चढ़ायो राम,
रोषि बानु काढ्यो न दलैया दससीसको॥
'पवनको पूतु देख्यो दूतु बीर बाँकुरो,जो
बंक गढ़ लंक-सो ढकाँ ढकेलि ढाहिगो।
बालि बलसालिको सो काल्हि दापु दलि कोपि,
रोप्यो पाउ चपरि, चमुको चाउ चाहिगो॥
सोई रघुनाथ कपि साथ पाथनाथु बाँधि,
आयो नाथ! भागे तें खिरिरि खेह खाहिगो।
'तुलसी' गरबु तजि मिलिबेको साजु सजि,
देहि सिय, न तौ पिय! पाइमाल जाहिगो॥
उदधि अपार उतरत नहिं लागी बार
केसरीकुमारु सो अदंड-कैसो डाँड़िगो
बाटिका उजारि, अच्छु, रच्छकनि मारि भट
भारी भारी राउरेके चाउर-से काँड़िगो॥
'तुलसी' तिहारें बिद्यमान जुबराज आजु
कोऽपि पाउ रोपि, सब छूछे कै कै छाँड़िगो।
कहेकी न लाज, पिय! आजहूँ न पिय आए बाज,
सहित समाज गढ़ु राँड-कैसो भाँड़िगो॥
जाके रोष-दुसह-त्रिदोष-दाह दूरि कीन्हे,
पैअत न छत्री-खोज खोजत खलकमें।
माहिषमतीको नाथ !साहसी सहस बाहु॥
समर-समर्थ नाथ! हेरिए हलकमें॥
सहित समाज महाराज सो जहाजराजु
बूड़ि गयो जाके बल-बारिधि-छलकमें।
टूटत पिनाककें मनाक बाम रामसे, ते
नाक बिनु भए भृगुनायकु पलकमें॥
कीन्ही छोनी छत्री बिनु छोनिप-छपनिहार,
कठिन कुठार पानि बीर-बानि जानि कै।
परम कृपाल जो नृपाल लोकपालन पै,
जब धनुहाई ह्वैहै मन अनुमानि कै॥
नाकमें पिनाक मिस बामता बिलोकि राम
रोक्यो परलोक लोक भारी भ्रम भानि कै।
नाइ दस माथ महि, जोरि बीस हाथ, पिय !
मिलिए पै नाथ ! रघुनाथ पहिचानि कै॥
कह्यो मतु मातुल, बिभीषनहूँ बार-बार,
आँचरु पसार पिय१ पाँय लै-लै हौं परी।
बिदित बिदेहपुर नाथ! भुगुनाथगति,
समय सयानी कीन्ही जैसी आइ गौं परी।
बायस, बिराध,खर,दूषन, कबंध, बालि,
बैर रघुबीरकें न पूरी काहूकी परी।
कंत बीस लोयन बिलोकिए कुमंतफलु,
ख्याल लंका लाई कपि राँडकी-सी झोपरी॥
राम सों सामु किएँ नितु है हितु, कोमल काज न कीजिए टाँठे।
आपनि सूझि कहौं,पिय ! बूझिए, झूझिबे जोगु न ठाहरु, नाठे॥
नाथ! सुनी भृगुनाथकथा, बलि बालि गए चलि बातके साँठें।
भाइ बिभीषनु जाइ मिल्यो, प्रभु आइ परे सुनि सायर काँठें॥
पालिबेको कपि-भालु-चमू जम काल करालहुको पहरी है।
लंक-से बंक महा गढ़ दुर्गम ढ़ाहिबे-दाहिबेको कहरी है॥
तीतर-तोम तमीचर-सेन समीरको सूनु बड़ो बहरी है।
नाथ! भलो रघुनाथ मिलें रजनीचर-सेन हिएँ हहरी है॥