उत्तरकाण्ड · भाग २
कामु-से रूप, प्रताप दिनेसु-से, सोमु-से सील, गनेसु-से माने।
हरिचंदु-से साँचे, बड़े बिधि-से, मघवा-से महीप बिषै-सुख-साने॥
सुक-से मुनि, सारद-से बकता, चिरजीवन लोमस तें अधिकाने।
ऐसे भए तौ कहा 'तुलसी,' जो पै राजिवलोचन रामु न जाने॥
झूमत द्वार अनेक मतंग जँजीर-जरे, मद अंबु चुचाते।
तीखे तुरंग मनोगति-चंचल, पौनके गौनहु तें बढ़ि जाते॥
भीतर चंद्रमुखी अवलोकति, बाहर भूप करे न समाते।
ऐसे भए तौ कहा, तुलसी, जो पै जानकीनाथके रंग न राते॥
राज सुरेस पचासकको बिधिके करको जो पटो लिखि पाएँ।
पूत सुपूत, पुनीत प्रिया, निज सुंदरताँ रतिको मदु नाएँ॥
संपति-सिध्दि सबै 'तुलसी' मनकी मनसा चतवैं चितु लाएँ॥
जानकीजीवनु जाने बिना जग ऐसेउ जीव न जीव कहाएँ॥
कृसगात ललात जो रोटिन को, घरवात घरें खुरपा-खरिया।
तिन्ह सोनेके मेरु-से ढेर लहे,मनु तौ न भरो, घरु पै भरिया॥
'तुलसी' दुखु दूनो दसा दुहुँ देखि, कियो मुखु दारिद को करिया।
तजि आस भो दासु रघुप्पतिको, दसरथ्तको दानि दया-दरिया॥
को भरिहे हरिके रितएँ, रितवै पुनि को, हरि जौं भरिहै।
उथपै तेहि को,जेहि रामु थपै, थपिहै तेहि को, हरि जौं टरिहै॥
तुलसी यहु जानि हिएँ अपनें सपनें नहि कालहु तें डरिहै।
कुमयाँ कछु हानि न औरनकीं, जो पै जानकी-नाथु मया करिहै॥
ब्याल कराल महाबिष, पावक मत्तगयंदहु के रद तोरे।
साँसति संकि चली, डरपे हुते किंकर, ते करनी मुख मोरे॥
नेकु बिषादु नहीं प्रहलादहि कारन केहरिके बल हो रे।
कौनकी त्रास करै तुलसी जो पै राखिहै राम, तौ मारिहै को रे।
कृपाँ जिनकीं कछु काजु नहीं,न अकाजु कछू जिनकें मुखू मोरे।
करैं तिनकी परवाहि ते, जो बिनु पूँछ-बिषान फिरैं दिन दौरें॥
तुलसी जेहिके रघुनाथसे नाथु, समर्थ सुसेवत रीझत थोरे।
कहा भवभीर परी तेहि धौं बिचरे धरनीं तिनसों तिनु तोरें॥
कानन, भूधर,बारि,बयारि, महाबिषु, ब्याधि, दवा-अरि घेरे।
संकट कोटि जहाँ 'तुलसी' सुत,मातु, पिता,हित,बंधु न नैरे॥
राखिहैं रामु कृपालु तहाँ, हनुमानु-से सेवक हैं जेहि केरे।
नाक, रसातल, भूतलमें रघुनायकु एकु सहायकु मेरे॥
जबै जमराज-रजायसतें मोहि लै चलिहैं भट बाँधि नटैया।
तातु न मातु,न स्वामि-सखा, सुत-बंधु बिसाल बिपत्ति बँटैया॥
साँसति घोर, पुकारत आरत कौन सुनै, चहुँ ओर डटैया।
एकु कृपाल तहाँ 'तुलसी' दसरथ्थको नंदनु बंदि-कटैया॥
जहाँ जमजातना, घोर नदी, भट कोटि जलच्चर दंत टैवेया।
जहँ धार भयंकर,वारन पार,न बोहित नाव,न नीक खेवैया॥
'तुलसी' जहँ मातु-पिता न सखा, नहिं कोउ कहूँ अवलंब देवैया।
तहाँ बुनु कारन रामु कृपाल बिसाल भुजा गहि काढ़ि लेवैया॥
जहाँ हित स्वामि, नसंग सखा,बनिता, सुत,बंधु, न बाप, न मैया।
काय-गिरा-मनके जनके अपराध सबै छलु छाड़ि छमैया॥
तुलसी! तेहि काल कृपाल बिना दूजो कौन है दारुन दुःख दमैया॥
जहाँ सब संकट, दुर्गट सोचु, तहाँ मेरो साहेबु राखै रमैया॥
तापसको बरदायक देव सबै पुनि बैरु बढ़ावत बाढ़ें।
थोरेंहि कोपु, कृपा पुनि थोरेंहि,बैठि कै जोरत,तोरत ठाढ़ें॥
ठोंकि-बजाई लखें गजराज, कहाँ लौं कहौं केहि सों रद काढ़ें।
आरतके हित नाथु अनाथके रामु सहाय सही दिन गाढ़ें॥
जप,जोग,बिराग, महामख-साधन, दान,दया,दम कोटि करै।
मुनि-सिध्द, सुरेसु, गनेसु, महेसु-से सेवत जन्म अनेक मरै॥
निगमागम-ग्यान, पुरान पढ़े, तपसानलमें जुगपुंज जरै।
मनसों पनु रोऽपि कहै तुलसी, रघुनाथ बिना दुख कौन हरै॥
पातक-पीन, कुदारद-दीन मलीन धरैं कथरी-करवा है।
लोकु कहै, बिधिहूँ न लिख्यो सपनेहूँ नहीं अपने बर बाहै॥
रामको किंकरु सो तुलसी, समुझेंहि भलो, कहिबो न रवा है।
ऐसेको ऐसो भयो कबहूँ न भजे बिनु बानरके चरवाहै॥
मातु-पिताँ जग जाइ तज्यो बिधिहूँ न लिखी कछु भाल भलाई॥
नीच, निरादरभाजन, कादर, कूकर-टूकन लागि ललाई॥
रामु-सुभाउ सुन्यो तुलसीं प्रभुसों कह्यो बारक पेटु खलाई।
स्वारथको परमारथको रघूनाथु सो साहेबु, खोरि न लाई॥
पाप हरे, परिताप हरे,तनु पूजि भो हीतल सीतलताई।
हंसु कियो बकतें, बलि जाउँ, कहाँलौं कहौं करुना-अधिकाई॥
कालु बिलोकि कहै तुलसी,मनमें प्रभुकी परतीति अघाई।
जन्मु जहाँ, तहँ रावरे सों निबहै भरि देह सनेह-सगाई॥
लोग कहैं, अरु हौंहु कहौं, जनु खोटो-खरो रघुनायकहीको।
रावरी राम! बड़ी लघुता, जसु मेरो भयो सुखदायकहीको॥
कै यह हानि सहौ, बलि जाउँ कि मोहू करौ निज लायकहीको।
आनि हिएँ हित जानि करौ, ज्यों हौं ध्यानु धरौं धनु-सायकहीको॥
आपु हौं आपुको नीकें कै जानत, रावरो राम! भरायो-गढ़ायो।
कीरु ज्यौं नामु रटै तुलसी, सो कहै जगु जानकीनाथ पढ़ायो॥
सोई है खेदु, जो बेदु कहै, न घटै जनु जो रघुबीर बढ़ायो।
हौंतो सदा खरको असवार, तिहारोइ नामु गयंद चढ़ायो॥
छारतें सँवारि कै पहारहू तें भारी कियो,
गारो भयो पंचमें पुनीत पच्छु पाइ कै।
हौं तो जैसो तब तैसो अब अधमाई कै कै,
पेटु भरौं, राम! रावरोई गुनु गाईके॥
आपने निवाजेकी पै कीजै लाज, महाराज!
मेरी ओर हेरि कै न बैठिए रिसाइ कै।
पालिकै कृपाल! ब्याल-बालको न मारिये,
औ काटिए न नाथ ! बिषहूको रुखु लाइ कै॥
बेद न पुरान-गानु, जानौं न बिग्यानु ग्यानु,
ध्यान-धारना-समाधि-साधन-प्रबीनता
नाहिन बिरागु, जोग, जाग भाग तुलसी कें,
दया-दान दूबरो हौं, पापही की पीनता॥
लोभ-मोह-काम-कोह-दोश-कोसु-मोसो कौन?
कलिहूँ जो सीखि लई मेरियै मलीनता।
एकु ही भरोसो राम! रावरो कहावत हौं,
रावरे दयालु दीनबंधु ! मेरी दीनता॥
रावरो कहावौं, गुनु गावौं राम! रावरोइ,
रोटी द्वै हौं पावौं राम! रावरी हीं कानि हौं।
जानत जहानु, मन मेरेहूँ गुमानु बड़ो,
मान्यो मैं न दूसरो, न मानत, न मानिहौं॥
पाँचकी प्रतीति न भरोसो मोहि आपनोई,
तुम्ह अपनायो हौं तबै हीं परि जानिहौं।
गढ़ि-गुढ़ि छोलि-छालि कुंदकी-सी भाईं बातैं
जैसी मुख कहौं, तैसी जीयँ जब आनिहौं॥
बचन,बिकारु,करतबउ खुआर, मनु
बिगत-बिचार, कलिमलको निधानु है।
रामको कहाइ,नामु बेचि-बेचि, खाइ सेवा-
संगति न जाइ, पाछिलरको उपखानु है॥
तेहू तुलसीको लोगु बलो-भलो कहै, ताको
दूसरो न हेतु,एकु नीकें कै निदानु है।
लोकरीति बिदित बिलोकिअत जहाँ-तहाँ,
स्वामीकें सनेहँ स्वानहू को सनमानु है॥
नाम-विश्वास
स्वारथको साजु न समाजु परमारथको,
मोसो दगाबाज दूसरो न जगजाल है।
कै न आयों,करौं न करौगो करतूति भली,
लिखी न बिरंचिहूँ भलाइ भूलि भाल है॥
रावरी सपथ, रामनाम ही की गति मेरें,
इहाँ झूठो,झूठो सो तिलोक तिहूँ काल है।
तुलसी को भलो पै तुम्हारें ही किएँ कृपाल,
कीजै न बिलंबु बलि, पानीभरी खाल है॥
काया नहिं छाड़ि देत ठाटिबो कुठाटको।
मनोराजु करत अकाजु भयो आजु लगि,
चाहे चारु चीर, पै लहै न टूकु टाटको॥
भयो करतारु बड़े कूरको कृपालु, पायो
नामुप्रेमु-पारसु, हौं लालची बराटको।
'तुलसी' बनी है राम! रावरें बनाएँ, नातो
धोबी-कैसो कूकरु न घरको, न घाटको॥
ऊँचो मनु, ऊँची रुचि, भागु नीचो निपट ही,
लोकरीति-लायक न, लंगर लबारु है॥
स्वारथु अगमु परमारथकी कहा चली,
पेटकीं कठिन जगु जीवको जवारु है॥
चाकरी न आकरी, न खेती, न बनिज-भीख,
जानत न कूर कछु किसब कबारु है।
तुलसीकी बाजी राखि रामहीकें नाम, न तु
भेंट पितरन को न मूड़हू में बारु है॥
अपत-उतार ,अपकारको अगारु, जग
जाकी छाँह छुएँ सहमत ब्याध-बाघको।
पातक-पुहुमि पालिबेको सहसाननु सो,
काननु कपटको,पयोधि अपराधको॥
तुलसी-से भामको भो दाहिनो दयानिधानु,
सुनत सिहात सब सिध्द साधु साधको।
रामनाम ललित-ललामु कियो लाखनिको,
बड़ो कूर कायर कपूत-कौड़ी आधको॥
सब अंग हीन, सब साधन बिहीन मन-
बचन मलीन, हीन कुल करतूति हौं।
बुधि-बल-हीन, भाव-भगति-बिहीन, हीन
गुन, ग्यानहीन, हीन भाग हूँ बिभूति हौं॥
तुलसी गरीब की गई-बहोर रामनामु,
जाहि जपि जीहँ रामहू को बैठो धूति हौं।
प्रीति रामनामसों प्रतीति रामनामकी,
प्रसाद रामनामकें पसारि पाय सूतिहौं
मेरें जान जबतें हौं जीव ह्वै जनम्यो जग,
तबतें बेसाह्यो दाम लोह, कोह, कामको।
मन तिन्हीकी सेवा,तिन्हि सों भाउ निको,
बचन बनाइ कहौं 'हौं गुलामु रामको'
नाथहूँ न अपनायो, लोक झूठी ह्वै परी, पै
प्रभुहू तें प्रबल प्रतापु प्रभूनामको।
आपनीं भलाई भलो कीजै तौ भलाई, न तौ
तुलसीको खुलैगो खजानो खोटे दामको
जोग न बिरागु, जप, जाग, तप, त्यागु, ब्रत,
तीरथ न धर्म जानौं,बेदबिधि किमि है।
तुलसी-सो पोच न भयो है, नहि व्हेहै कहूँ,
सोचैं सब, याके अघ कैसे प्रभु छमिहैं ॥
मेरें तो न डरु, रघुबीर! सुनौ, साँची कहौं,
खल अनखैहैं तुम्हैं,सज्जन न गमिहैं।
भले सुकृतीके संग मिहि तुलाँ तौलिए तौ,
नामकें प्रसाद भारू मेरी ओर नमिहैं॥
जातिके,सुजातिके,कुजातिके पेटागि बस
खाए टूक सबके, बिदित बात दुनीं सो।
मानस-बचन-कायँ किए पाप सतिभायँ,
रामको कहाइ दासु दगाबाज पुनी सो।
रामनामको प्रभाउ, पाउ, महिमा, प्रतापु,
तुलसी-सो जग मनिअत महामुनी-सो।
अतिहीं अभागो, अनुरागत न रामपद,
मूढ़! एतो बड़ो अचिरिजु देखि-सुनी सो॥
जायो कुल मंगन, बधावनो बजायो, सुनि
भयो परितापु पापु जननी-जनकको॥
बारेतें ललात-बिललात द्वार-द्वार दीन,
जानत हो चारि फल चारि ही चनकको॥
तुलसी सो साहेब समर्थको सुसेवकु है,
सुनत सिहात सोचु बिधिहू गनकको।
नामु राम! रावरो सयानो किधौं बावरो,
जो करत गिरींतें गरु तृनतें तनकको॥
बेदहुँ पुरान कही, लोकहहूँ बिलोकिअत,
रामनाम ही सों रीझें सकल भलाई है।
कासीहू करत उपदेसत महेसु सोई,
साधना अनेक चितई न चित लाई है॥
छाछीको ललात जे, ते रामनामकें प्रसाद,
खात, खुनसात सोंधे दूधकी मलाई है।
रामराज सुनिअत राजनीतिकी अवधि,
नामु राम! रावरो तौ चामकी चलाई है॥
सोच-संकटनि सोचु संकटु परत, जर
जरत, प्रभाउ नाम ललित ललामको।
बूड़िऔ तरति बिगरीऔ सुधरति बात,
होत देखि दाहिनो सुभाउ बिधि बामको॥
भागत अभागु, अनुरागत बिरागु,भागु
जागत आलसि तुलसीहू-से निकामको।
धाई धारि फिरिकै गोहारि हितकारी होति,
आई मीचु मिटति जपत रामनामको॥
आँधरो अधम ज़ड़ जाजरो जराँ जवनु
सूकरकें सावक ढकाँ ढकेल्यो मगमें।
गिरो हिएँ हहरि 'हराम हो, हराम हन्यो'
हाय! हाय करत परीगो कालफगमें॥
'तुलसी'बिसोक ह्वै त्रिलोकपति लोक गयो
नामकें प्रताप, बात बिदित है जगमें।
सोई रामनामु जो सनेहसों जपत जनु,
ताकी महिमा क्यों कही है जाति अगमें ॥
जापकी न तप-खपु कियो, न तमाइ जोग,
जाग न बिराग, त्याग, तीरथ न तनको।
भाईको भरोसो न खरो-सो बैरु बैरीहू सों,
बलु अपनो न, हितू जननी न जनको॥
लोकको न डरु, परलोकको न सोचु, देव-
सेवा न सहाय, गर्बु धामको न धनको।
रामही के नामते जो होई सोई नीको लागै,
ऐसोई सुभाउ कछु तुलसीके मनको॥
ईसु न, गनेसु न, दिनेसु न, धनेसु न,
सुरेसु,सुर,गौरि, गिरापति नहि जपने।
तुम्हरेई नामको भरोसो भव तरिबेको,
बैठें-उठे, जागत-बागत, सोएँ सपनें॥
तुलसी है बावरो सो रावरोई रावरी सौं,
रावरेऊ जानि जियँ कीजिए जु अपने।
जानकीरमन मेरे! रावरें बदनु फेरें,
ठाउँ न समाउँ कहाँ, सकल निरपने॥
जाहिर जहानमें जमानो एक भाँति भयो,
बेंचिए बिबुधधेनु रासभी बेसाहिए।
ऐसेऊ कराल कलिकालमें कृपाल ! तेरे
नामकें प्रताप न त्रिताप तन दाहिए॥
तुलसी तिहारो मन-बचन-करम, तेंहि
नातें नेह-नेमु निज ओरतें निबाहिए।
रंकके नेवाज रघुराज ! राजा राजनिके,
उमरि दराज महाराज तेरी चाहिए॥
स्वारथ सयानप, प्रपंचु परमारथ,
कहायो राम! रावरो हौं, जानत जहान है।
नामकें प्रताप बाप ! आजु लौं निबाही नीकें,
आगेको गोसाई ! स्वामी सबल सुजान है॥
कलिकी कुचालि देखि दिन-दिन दूनी, देव!
पाहरूई चोर हेरि हिए हहरान है।
तुलसीकी ,बलि, बार-बारहीं सँभार कीबी,
जद्यपि कृपानिधानु सदा सावधान है॥
दिन-दिन दूनो देखि दारिदु, दुकालु, दुखु,
दुरित दुराजु सुख-सुकृत सकोच है।
मागें पैंत पावत पचारि पातकी प्रचंड,
कालकी करालता, भलेको होत पोच है॥
आपनें तौ एकु अवलंबु अंब डिंभ ज्यों,
समर्थ सीतानाथ सब संकट बिमोच है।