उत्तरकाण्ड · भाग ३
तुलसीकी साहसी सराहिए कृपाल राम!
नामकें भरोसें परिनामको निसोच है॥
मोह-मद मात्यो, रात्यो कुमति-कुनारिसों,
बिसारि बेद-लोक-लाज,आँकरो अचेतु है।
भावे सो करत, मुँह आवै सो कहत, कछु
काहूकी सहत नाहिं, सरकश हेतु है॥
तुलसी अधिक अधमाई हू अजामिलतें,
ताहूमें सहाय कलि कपटनिकेतु है।
जैबेको अनेक टेक, एक टेक ह्वैबेकी, जो
पेट-प्रियपूत हित रामनामु लेतु है॥
कलिवर्णन
जागिए न सोइए, बिगोइए जनमु जाँ,
दुख, रोग रोइए, कलेसु कोह-कामको।
राजा-रंक, रागी ओ बिरागी, भूरिभागी, ये
अभागी जीव जरत, प्रभाउ कलि बामको॥
तुलसी! कबंध-कैसो धाइबो बिचारु अंध !
धंध देखिअत जग, सोचु परिनामको।
सोइबो जो रामके सनेहकी समाधि-सुखु,
जागिबो जो जीह जपै नीकें रामनामको॥
बरन-धरम गयो,आश्रम निवासु तज्यो,
त्रासन चकित सो परावनो परो-सो है।
करमु उपासना कुबासनाँ बिनास्यो ग्यानु,
बचन-बिराग, बेष जगतु हरो-सो है॥
गोरख जगायो जोगु, भगति भगायो लोगु,
निगम-नियोगतें सो केल ही छरो-सो है।
कायँ-मन-बचन सुभायँ तुलसी है जाहि
रामनामको भरोसो,ताहिको भरोसो है॥
बेद-पुरान बिहाइ सुपंथु, कुमारग, कोटि कुचालि चली है।
कालु कराल, नृपाल कृपाल न, राजसमाजु बड़ोई छली है॥
बर्न-बिभाग न आश्रमधर्म, दुनी दुख-दोष-दरिद्र-दली है।
स्वारथको परमारथको कलि रामको नामप्रतापु बली है॥
न मिटे भवसंकट, दुर्घट हे तप, तीरथ जन्म अनेक अटो।
कलिमें न बिरागु, न ग्यानु कहूँ,सबु लागत फोकट झूठ-जटो॥
नटु ज्यों जनि पेट-कुपेटक कोटिक चेटक-कौतुक-ठाट ठटो।
तुलसी जो सदा सुखु चाहिअ तौ,रसनाँ निसि-बासर रामु रटो॥
दम दुर्गम ,दान,दया,मख,कर्म, सुधर्म अधीन सबै धनको।
तप,तीरथ,साधन,जोग, बिरागसों होइ,नहीं दृढ़ता तनको॥
कलिकाल करालमुं'रामकृपालु' यहै अवलंबु बड़ो मनको।
'तुलसी'सब संजमहीन सबै,एक नाम-अधारु सदा जनको
पाइ सुदेह बिमोह-नदी-तरनी न लही, करनी न कछू की।
रांकथा बरनी न बनाइ, सुनी न कथा प्रह्लाद न ध्रूकी॥
अब जोर जरा जरि गातु गयो, मन मानि गलानि कुबानि न मूकी।
नीकें कै ठीक दई तुलसी, अवलंब बड़ी उर आखर दूकी॥
राम-नाम-महिमा
रामु बिहाइ 'मरा' जपतें बिगरी सुधरी कबिकोकिलहू की।
नामहि तें गजकी, गनिकाकी, अजामिलकी चलि गै चलचूकी॥
नामप्रताप बड़ें कुसमाज बजाइ रही पति पांडुबधूकी।
ताको भलो अजहूँ 'तुलसी' जेहि प्रीति-प्रतीति है आखर दूकी॥
नाम अजामिल-से खल तारन, तारन बारन-बारबधुको।
नाम हरे प्रहलाद-बिषाद, पिता-भय-साँसति सागरु सूको॥
नामसों प्रीति-प्रतीति बिहीन गिल्यो कलिकाल कराल, न चूको।
राखिहैं रामु सो जासु हिएँ तुलसी हुलसै बलु आखर दूको
जीव जहानमें जायो जहाँ, सो तहाँ, 'तुलसी' तिहुँ दाह दहो है।
दोसु न काहु,कियो अपनो, सपनेहूँ नहीं सुखलेसु लहो है॥
रामके नामतें होउ सो होउ, न सोउ हिएँ, रसना हीं कहो है।
कियो न कछू,करिबो न कछू, कहिबो न कछू,मरिबोइ रहो है॥
जीजे न ठाउँ, न आपन गाउँ, सुरालयहू को न संबलु मेरें।
नामु रटो,जमबास क्यों जाउँ को आइ सकै जमकिंकरु नेरें॥
तुम्हरो सब भाँति तुम्हारिअ सौं, तुम्हही बलि हौ मोको ठाहरु हेरें।
बैरख बाँह बसाइए पै तुलसी-घरु ब्याध-अजामिल-खेरें॥
का कियो जोगु अजामिलजू,गनिकाँ मति पेम पगाई।
ब्याधको साधुपनो कहिए, अपराध अगाधनि में ही जनाई॥
करुनाकरकी करुना करुना हित,नाम-सुहेत जो देत दगाई।
काहेको खीझिअ रीझिअ पै, तुलसीहु सों है, बलि सोइ सगाई॥
जे मद-मार-बिकार भरे, ते अचार-बिचार समीप न जाहीं।
है अभिमानु तऊ मनमें, जनु भाषिहै दूसरे दीनन पाहीं?॥
जौ कछु बात बनाइ कहौं, तुलसी तुम्हमें, तुम्हहू उर माहीं।
जानकीजीवन! जानत हौ, हम हैं तुम्हरे, तुम में ,सकु नाहीं
दानव-देव, अहीस-महीस, महामुनि-तापस, सिध्द-समाजी।
जग-जाचक, दानि दुतीय नहीं, तुम्ह ही सबकी सब राखत बाजी॥
एते बड़े तुलसीस! तऊ सबरीके दिए बिनु भूख न भाजी।
राम गरीबनेवाज! भए हौ गरीबनेवाज गरीब नेवाजी॥
किसबी,किसान-कुल,बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर,चपल नट, चोर, चार चेटकी।
पेटको पढ़त गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी॥
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
'तुलसी' बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी॥
खेती न किसानको,भिखारीको न भीख, बलि,
बनिकको बनिज, न चाकरको चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीद्यमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों'कहाँ जाई, का करी?'
बेदहूँ पुरान कही,लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पै,राम! रावरें कृपा करी।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु!
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी॥
कुल- करतूति-भूति-कीरति-सुरूप-गुन-
जौबन जरत जुर, परै न कल कहीं।
राजकाजु कुपथ, कुसाज भोग रोग ही के,
बेद-बुध बिद्या पाइ बिबस बलकहीं॥
गति तुलसीकी लखै न कोउ, जो करत
पब्बयतें छार, छारे पब्बय पलक हीं।
कासों कीजै रोषु दीजै काही, पाहि राम!
कियो कलिकाल कुलि खललु खलक हीं॥
बबुर-बहेरेको बनाइ बागु लाइयत,
रूँधिबेको सोई सुरतरु काटियतु है।
गारी देत नीच हरिचंदहू दधीचिहू को,
आपने चना चबाइ हाथ चाटियतु है॥
आपु महापातकी, हँसत हरि-हरहू को,
आपु है अभागी, भरिभागी डाटियतु है।
कलिको कलुष मन मलिन किए महत,
मसककी पाँसुरी पयोधि पाटियतु है॥
सुनिए कराल कलिकाल भूमिपाल! तुम्ह,
जाहि घालो चाहिए, कहौ धौं राखै ताहि को।
हौ तौ दीन दूबरो, बिगारो-ढारी रावरो न,
मैंहू तैंहू ताहिको, सकल जगु जाहिको॥
काम,कोहू लाइ कै देखाइयत आँखि मोहि,
एते मान अकसु कीबेको आपु आहि को॥
साहेबु सुजान, जिन्ह स्वानहूँ को पच्छु कियो,
रामबोला नामु, हौं गुलामु रामसाहिको॥
साँची कहौ,कलिकाल कराल !मैं ढारो-बिगारो तिहारो कहा है।
कामको, कोहको,लोभको, मोहको मोहिसों आनि प्रपंचु रहा है॥
हौ जगनायकु लायक आजु, पै मेरिऔ टेव कुटेव महा है।
जानकीनाथ बिना 'तुलसी' जग दूसरेसों करिहौं न हहा है॥
भागीरथी-जलु पानकरौं,अरु नाम कै रामके लेत नितै हौं।
मोको न लेनो, न देनो कछू, कलि ! भूली न रावरी ओर चितेहौ॥
जानि कै जोरु करौ, परिनाम तुम्है पछितैहौ, पै मैं न भितेहौं।
ब्राह्मन ज्यों उगिल्यो उरगारि, हौं त्यौं हीं तिहारें हिएँ न हितैहौं॥
राजमरालके बालक पेलि कै पालत-लालत खूसरको।
सुचि सुंदर सालि सकेलि, सो बारि कै बीजु बटोरत ऊसरको॥
गुन-ग्यान-गुमानु, भँभेरि बड़ी, कलपद्रुमु काटत मूसरको।
कलिकाल बिचारु अचारु हरो, नहिं सूझै कछू धमधूसरको॥
कीबे कहा,पढ़िबेको कहा फलु, बूझि न बेदको भेदु बिचारैं।
स्वारथको परमारथको कलि कामद रामको नामु बिसारैं॥
बाद-बिबाद बिषादु बढ़ाइ कै छाती पराई औ आपनी जारैं।
चारिहुको, छहुको, नवको, दस-आठको पाठु कुकाठु ज्यों फारैं॥
आगम बेद, पुरान बखानत मारग कोटिन, जाहिं न जाने।
जे मुनि ते पुनि आपुहि आपुको ईसु कहावत सिध्द सयाने॥
धर्म सबै कलिकाल ग्रसे, जप,जोग बिरागु लै जीव पराने।
को करि सोचु मरै 'तुलसी' हम जानकीनाथके हाथ बिकाने॥
धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहूकी बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ॥
तुलसी सरनाम गुलामु है रामको,जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ।
माँगि कै खैबौ, मसीतको सोइबो, लैबोको एकु न दैबेको दोऊ॥
मेरें जाति-पाँति न चहौं काहूकी जाति-पाँति,
मेरे कोऊ कामको न हौं काहूके कामको
लोकु परलोकु रघुनाथही के हाथ सब,
भारी है भरोसो तुलसीके एक नामको॥
अतिही अयाने उपखानो नहि बूझैं लोग,
'साह ही को गोतु गोतु होत है गुलामको॥
साधु कै असाधु, कै भलो कै पोच,सोचु कहा,
काकाहूके द्वार परौं, जो हौं सो हौं रामको॥
कोऊ कहै, करत कुसाज, दगाबाज बड़ो,
कोऊ कहै रामको गुलामु खरो खूब है।
साधु जानैं महासाधु, खल जानैं महाखल,
बानी झूँठी-साँची कोटि उठत हबूब है॥
चहत न काहूसों न कहत काहूकी कछू,
सबकी सहत , उर अंतर न ऊब है।
तुलसीको भलो पोच हाथ रघुनाथही के
रामकी भगति-भूमि मेरी मति दूब है॥
जागैं जोगी-जंगम, जती-जमाती ध्यान धरैं
डरैं उर भारी लोभ, मोह, कोह,कामके।
जागैं राजा राजकाज, सेवक-समाज,साज,
सोचैं सुनि समाचार बड़े बैरी बामके॥
जागैं बुध बिद्या हित पंडित चकित चित,
जागैं लोभी लालच धरनि ,धन धामके।
जागैं भोगी भोग हीं, बियोगी, रोगी सोगबस,
सोवैं सुख तुलसी भरोसे एक रामके॥
रामु मातु,पितु, बंधु, सुजन, गुरु, पूज्य, परमहित।
साहेबु, सखा,सहाय,नेह-नाते, पुनीत चित॥
देसु,कोसु, कुलु,कर्म,दर्म, धनु, धाम,धरनि, गति।
जाति-पाँति सब भाँति लागि रामहि हमारि पति॥
महाराज, बलि जाउँ, राम ! सेवक-सुखदायक ।
महाराज, बलि जाउँ, राम !सुन्दर सब लायक ॥
महाराज, बलि जाउँ, राम ! राजीवबिलोचन ॥
बलि जाउँ,राम ! करुनायतन, प्रनतपाल, पातकहरन।
बलि जाउँ, राम ! कलि-भय-बिकल तुलसिदासु राखिअ सरन॥
जय ताड़का-सुबाहु-मथन मारीच-मानहर!
मुनिमख-रच्छन-दच्छ, सिलातारन, करुनाकर !
नृपगन-बल-मद सहित संभु-कोदंड-बिहंडन !
जय कुठारधरदर्पदलन दिनकरकुलमंडन॥
जय जनकनगर-आनंदप्रद, सुखसागर, सुषमाभवन।
कह तुलसिदासु सुरमुकुमनि, जय जय जय जानकिरमन॥
जय जयंत-जयकर, अनंत, सज्जनजनरंजन!
जय बिराध-बध-बिदुष, बिबुध-मुनिगन-भय-भंजन
जय निसिचरी-बिरूप-करन रघुबंसबिभूषन!
सुभट चतुर्दस-सहस दलन त्रिसिरा-खर-दूषन॥
जय दंडकबन-पावन-करन,तुलसिदास-संसय-समन!
जगबिदित जगतमनि, जयति जय जय जय जय जानकिरमन!
जय मायामृगमथन, गीध-सबरी-उध्दारन !
जय कबंधसूदन बिसाल तरु ताल बिदारन !
दवन बालि बलसालि, थपन सुग्रीव, संतहित !
कपि कराल भट भालु कटक पालन,कृपालचित!
जय सिय-बियोग-दुख हेतु कृत-सेतुबंध बारिधिदमन !
दससीस बिभीषन अभयप्रद, जय जय जय जानकिरमन !
रामप्रेमकी प्रधानता
कनककुधरु केदारु, बीजु सुंदर सुरमनि बर।
सींचि कामधुक धेनु सुधामय पय बिसुध्दतर॥
तीरथपति अंकुरसरूप जच्छेस रच्छ तेहि।
मरकतमय साखा-सुपुत्र, मंजरय लच्छि जेहि॥
कैवल्य सकल फल, कलपतरु,सुभ सुभाव सब सुख बरिस।
जाय सो सुभटु समर्थ पाइ रन रारि न मंडै।
जाय सो जती कहाय बिषय-बासना न छंडै॥
जाय धनिकु बिनु दान, जाय निर्धन बिनु धर्महि।
जाय सो पंडित पढ़ि पुरान जो रत न सुकर्महि॥
सुत जाय मातु-पितु-भक्ति बिनु, तिय सो जाय जेहि पति न हित।
सब जाय दासु तुलसी कहै, जौं न रामपद नेहु नित॥
को न क्रोध निरदह्यो, काम बस केहि नहि कीन्हो?
को न लोभ दृढ़ फंद बाँधि त्रासन करि दीन्हो ?
कौन हृदयँ नहि लाग कठीन अति नारि-नयन-सर?
लोचनजुत नहि अंध भयो श्री पाइ कौन नर ?
सुर-नाग-लोक महिमंडलहुँ को जु मोह कीन्हो जय न ?
कह तुसिदासु सो ऊबरै, जेहि राख रामु राजिवनयन॥
भौंह-कमान सँधान सुठान जे नारि-बिलोकनि-बानतें बाँचे।
कोप-कृसानु गुमान-अवाँ घट-ज्यों जिनके मन आव न आँचे।
लोभ सबै नटके बस ह्वै कपि-ज्यों जगमें बहु नाच न नाचे
नीके हैं साधु सबै तुलसी, पै तेई रघुबीरके सेवक साँचे॥
बेष सुबनाइ सुचि बचन कहैं चुवाइ
जाइ तौ न जरनि धरनि-धन-धामकी।