मृत्यु के बाद — भाग 2
किंतु वेदांत कहता है, ''ऐ मुसलमानो ! तुम्हें कोई अधिकार नहीं कि तुम इस दुनिया के मनुष्यों को मृत्यु के बाद अपने धर्माचार्य पैगंबर के हवाले कर दो, उन्हें केवल मुहम्मद की दया का भिखारी बनाओ । ईसाइयों को भी अपनी कल्पनाओं का उपभोग करने दो । उन्हें स्वतंत्रता दो । उन सबको जो यूरोप, अमेरिका, भारत, जापान और चीन में मरते हैं, मुहम्मद के अधीन करने की इच्छा न करो । तुम्हें यह कहने का कोई अधिकार नहीं कि यदि वह मुहम्मद में विश्वास करते हैं तब तो ठीक है, अन्यथा उनका अमंगल होगा । ऐसा दावा सर्वथा निर्दयतामूलक है । यदि आप हजरत मुहम्मद के अनुयायी हैं, तो आपको उसी प्रकार का स्वर्ग मिलेगा जैसा आप चाहते हैं । यही बात सब धर्मों के संबंध में है । यदि आप अपने धर्म सिद्धांतों एवं लक्ष्य के प्रति सच्चे हैं, तो मृत्यु के बाद आपको उसी प्रकार के स्वर्ग की प्राप्ति होगी, जिसकी आप आशा करते हैं ।
मृत्यु के बाद स्वर्ग या नरक आप ही पर निर्भर है । मृत्यु के बाद आप ही स्वर्ग बनाते हैं और आप ही नरक बनाते हैं । यह वास्तविकता है कि स्वर्ग और नरक आपके स्वप्नमात्र हैं, जो आपको उस समय सत्य जान पड़ते हैं, इससे अधिक उनका कुछ मूल्य नहीं । आप यह तो जानते ही हैं कि स्वप्न देखते समय स्वप्न हमें सत्य प्रतीत होते हैं । अतएव मृत्यु के बाद ये नरक और स्वर्ग भी आपको सच्चे प्रतीत होंगे, यथार्थतः स्वप्नों से अधिक ये कुछ भी नहीं हैं ।''
एक बात और कही जा सकती है । लोग कहते हैं कि हमारे धर्म ग्रंथों ने जो वचन हमें दिए हुए हैं, यदि वे मृत्यु के बाद सत्य उतरें तो हमें सर्वकालीन सुख की प्राप्ति होगी । हमारे धर्म ग्रंथ मृत्यु के बाद हमें या तो शाश्वत कल्याण मिलने का वचन देते हैं या अनंतकालीन नरक यातना का । यह कैसी बात है ? इसका अर्थ क्या है ?
वेदांत पूछता है कि नित्यता क्या है ? आप सोचते हैं कि नित्यता एक ऐसी वस्तु है जिसका संबंध समय, अनंत समय से है । आप यह भी जानते हैं कि जाग्रत अवस्था का समय स्वप्न के समय से भिन्न होता है । जाग्रत अवस्था में समय एक प्रकार का होता है और स्वप्नावस्था में दूसरी प्रकार का । आपकी स्वप्नावस्था में कभी-कभी कोई ऐसी वस्तु सामने प्रकट होती है, जो आपको पांच हजार वर्ष की पुरानी मालूम होती है ।
मान लो कि अपने स्वप्न में आप एक पहाड़ देखते हैं । अब इसमें संदेह नहीं कि यह पहाड़ स्वप्न में आपने स्वयं तुरंत ही वहां ला खड़ा किया है, जाग्रत अवस्था के दृष्टि-बिंदु से तो यही कहना पड़ेगा, किंतु स्वप्नावस्था के दृष्टि-बिंदु से वह पहाड़ पांच हजार वर्ष पहले का मालूम होता है । वेदांत कहता है कि मृत्यु के बाद आप अपने को स्वप्नवत स्वर्ग में अनंतकाल से पाएंगे, स्वप्नदर्शी अधिष्टान के दृष्टि-बिंदु से आप अपने को स्वर्ग या नरक में अनंतकाल से रहते पाएंगे, किंतु जाग्रत अवस्था के अधिष्ठान के दृष्टि-बिंदु से नहीं ।
यह सत्य है कि इंजील ने आपको जो वचन दिए हैं उन सबको आप यथार्थ पाएंगे, क्योंकि उस हालत में आप ऐसा सोचेंगे कि हम सदा से इसी हालत में रहते आए हैं । वह अवस्था आपको नित्य प्रतीत होगी । स्वप्नदर्शी द्रष्टा के स्थितिबिंदु से जो वस्तु नित्य है, वही जाग्रत द्रष्टा के दृष्टि-बिंदु से नहीं के बराबर है । दोनों बातें सर्वथा पृथक हैं ।
इस प्रकार आपको इस बात का कुछ पता लग गया होगा कि वेदांत किस तरह मृत्यु के बाद की अवस्था के विषय में विभिन्न धर्मों का समन्वय करता है ।
अब आवागमन के संबंध में सोचिए ! अच्छा उन लोगों का क्या होता है जो मुक्त पुरुष या मुक्त आत्मा कहलाते हैं । उनका आवागमन होता है, या नहीं । वेदांत कहता है कि मृत्यु के बाद हरेक व्यक्ति को स्वर्ग और नरक के पड़ावों में से होकर नहीं गुजरना पड़ता और न मृत्यु के बाद सबका पुनर्जन्म ही होता है । प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक नहीं होता । वे जिन्हें मुक्त आत्मा कहते हैं, कौन हैं ? उन्हें पुनर्जन्म के अधीन नहीं होना पड़ता । वे स्वतंत्र हैं । वे नरक या स्वर्ग में कैद नहीं होते । स्वर्ग या नरक सभी उनमें हैं । सारे लोक उनमें हैं । यहां उनके संबंध में कुछ शब्द कहना जरूरी मालूम होता है ।
स्वप्न में आपको दो प्रकार की वस्तुएं मिलती हैं—एक द्रष्टा और दूसरा दृश्य । ये सब नदियां, झील, पहाड़ और पहाड़ियां, जिनसे आप स्वप्न में अपने आपको चारों ओर से घिरा हुआ पाते हैं, दृश्य पदार्थ हैं । और स्वप्नदर्शी द्रष्टा (आत्मा) जो अपने को घिरा हुआ पाता है, पथिक जैसा, तीर्थयात्री और द्रष्टा है । स्वप्न में आप जानते हैं कि अनेक चीजें दिखाई देती हैं । उनमें से एक तो वे होती हैं जिन्हें आप 'मैं' कहते हैं और दूसरी वस्तुएं वे हैं जिन्हें आप पदार्थ कहते है, जो 'मैं' से पृथक होती हैं ।
यह जिसे आप 'मैं' 'स्वयं' अथवा 'आत्मा' कहते हैं दृष्टा है, और दूसरी वस्तुएं जिन्हें आप 'मैं', 'स्वयं' नहीं अथवा 'अनात्मा' कहते हैं, दृश्य पदार्थ हैं । साधारणतः स्वप्न में ये दो मुख्य विभाग हुआ करते हैं—द्रष्टा और दृश्य ।
वेदांत कहता है कि स्वप्न का द्रष्टा और दृश्य आप ही की सृष्टि है, सच्चे आत्मा की सृष्टि, जाग्रत अवस्था के आत्मा की सृष्टि है । अंग्रेजी शब्दकोशकार डॉक्टर जॉनसन, जिसे आप जानते हैं, वार्ताकारों का बादशाह कहलाता था, तर्क में परास्त होना कभी कबूल ही न करता था । अंतिम बात सदा उसी की रहती थी । अंतिम परिणाम सदा उसी के पक्ष में होता था । किसी ने उसके संबंध में यह कहा था कि यदि उसके तमंचे का निशाना चूक जाए तो वह उसके कुंदे के बल से अपने प्रतिस्पर्धी को गिराकर चित कर देगा ।
सारांश यह कि वह सदा अपनी ही जीत रखता था । यदि कभी कोई तर्क में उससे प्रबल पड़ जाता, तो उससे बदला लेने के लिए वह आकाश-पाताल एक कर देता था ।
एक बार जॉनसन ने स्वप्न देखा कि व्याख्यान वाचस्पति एडमंड बर्क ने उसे तर्क में हरा दिया है । जॉनसन जैसे प्रकृति के मनुष्य के लिए यह स्वप्न महा भयंकर था । इसने उसे चौंका दिया, वह जाग उठा । बड़ी बेचैनी में पड़ गया, उसे किसी तरह नींद ही न आती थी । आप जानते हैं कि आपके चित्त का यह गुण है कि वह सदा विश्राम चाहता है । जब वह बहुत व्याकुल होता है तो शांति की प्राप्ति उसके लिए अनिवार्य हो जाती है । कारण, शांति ही चित्त का असली निवास स्थल है, अपना विश्रामगृह खोजना उसका स्वभाव है । इसलिए किसी न किसी तरह शांति की प्राप्ति डॉक्टर जॉनसन के लिए बहुत जरूरी थी ।
अंत में उसने इस विचार से अपने को शांत किया कि यदि मैं एडमंड बर्क के पास जाऊं और कहूं—ऐ बर्क ! मेरे स्वप्न में किस तर्क से तुमने मुझे हराया है, तो वह उस तर्क को दोहरा न सकेगा । स्वप्न में जो प्रबल तर्क उसने दिए हैं और जिन दुर्बल तर्कों से मेरी हार हुई, उनको मैं ही जानता हूं । मैं दोनों पक्ष जानता हूं । मैं विजयी और पराजित दोनों पक्षों को खूब जानता हूं, किंतु एडमंड बर्क उनके संबंध में कुछ नहीं जानता, क्योंकि मेरे ही दिमाग से दोनों पक्ष के तर्क पैदा हुए हैं, मैं ही स्वयं एक ओर तो एडमंड बर्क के रूप में प्रकट हुआ और दूसरी ओर पराजित जॉनसन के रूप में ।
बस, वेदांत कहता है कि अपने स्वप्न में आप स्वयं ही एक ओर तो दृश्य पदार्थों के रूप में प्रकट होते हैं और दूसरी ओर दृश्य पदार्थों के द्रष्टा बन जाते हैं । सब आप हैं, वह आप ही की असली आत्मा है जो एक ओर तो पहाड़ों, नदियों, जंगलों और पशु-पक्षियों के रूप में प्रकट होती है और दूसरी ओर चकित होनेवाले तीर्थयात्री के रूप में । इस तरह आप द्रष्टा हैं और आप ही दृश्य भी हैं ।
इस प्रकार वेदांत के अनुसार मृत्यु के अनंतर आने वाली निद्रा में आप ही नरक और आप ही स्वर्ग हैं, और आप ही वह मनुष्य हैं जो स्वर्ग के सुख भोगता है या नरक के दुख उठाता है । बस, इस तत्व का अनुभव करो और स्वतंत्र हो जाओ ।
एक ऐसी नारी थी जिसे वेदांत का यह ज्ञान था । एक दिन एक हाथ में अग्नि और दूसरे हाथ में शीतल जल लिए वह सड़क पर जा रही थी । लोगों ने उसके पास आकर पूछा—''एक हाथ में ठंडा पानी और दूसरे में अग्नि ले चलने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है ?'' जिस मनुष्य ने उससे यह प्रश्न किया था वह एक धर्म-प्रचारक था । नारी ने कहा, ''इस अग्नि से मैं आपके स्वर्ग और बैकुंठ में आग लगाऊंगी और इस जल से मैं आपके नरक को ठंडा करूंगी ।''
जो मनुष्य सचमुच जानता है कि वह स्वयं नरक और स्वयं स्वर्ग है, उसके लिए न आपके स्वर्ग का कोई प्रलोभन होता है और न आपके नरक से कोई भय । वह उनसे परे हो जाता है । धर्म प्रचारक निरुत्तर हो गया । अब इस दुनिया पर आइए और उस जाग्रत अवस्था के बारे में सोचिए, जिस पर आप इतने लट्टू रहते हैं । वेदांत सिद्ध करता है कि यह स्थूल ठोस मालूम पड़ने वाली दुनिया भी, यह पत्थर जैसी कठोर दुनिया भी असत्य है, यह आपके स्वप्न से भिन्न नहीं । भेद केवल दर्जे का है । आपकी जाग्रत दुनिया भी एक स्वप्न है । यह एक ठोस और घनीकृत स्वप्न है । वेदांत कहता है कि आपकी इस सुदृढ़ प्रतीत होनेवाली दुनिया में द्रष्टा और दृश्य पदार्थ आपकी सच्ची आत्मा की सृष्टि हैं, इससे अधिक कुछ नहीं ।
वह आपकी सच्ची आत्मा ही है, जो एक ओर तो नगर, कस्बे, नदियां तथा पहाड़ बन जाती है, तो दूसरी ओर इस दुनिया में एक भूला-भटका, निराश्रय बटोही । जाग्रत अवस्था में भी जो द्रष्टा के रूप में प्रकट होता है, वही दृश्य पदार्थ है और जो दृश्य पदार्थ के रूप में प्रकट होता है, वही द्रष्टा है ।
मृत्यु में केवल द्रष्टा दब-सा जाता है और पदार्थ ज्यों-के- त्यों रहते हैं, जैसे आप स्वप्न देख रहे हैं । मान लें कि आप स्वप्नावस्था में अपने को बर्कले शहर में पाते हैं यद्यपि वास्तव में आप सैनफ्रांसिस्को में सोए हुए थे । यहां आपके स्वप्न में बर्कले क्या है और बर्कले से संबंध रखनेवाले सारे दृश्य क्या हैं, ये सब दृश्य पदार्थ थे और आप बर्कले में रहनेवाले द्रष्टा ।
अब यहां ध्यान दीजिए—कभी-कभी हमें दोहरी निद्रा आती है, कभी-कभी हमें नींद में अथवा स्वप्न में नींद आ जाती है, ठीक वैसे जैसे चक्र वृद्धि ब्याज होता है । यह एक स्वप्न में स्वप्न या दोहरा स्वप्न होता है । जैसे यदि आपको बर्कले में निद्रा आती है, तो यह दोहरी निद्रा का दृष्टांत है । क्या होता है ? आप फिर जागते हैं । कभी-कभी स्वप्न में हम जिस स्थान पर सोते हैं, उसी स्थान पर एक लंबे स्वप्न में फिर जाग पड़ते हैं । इसी तरह यहां आप बर्कले शहर में देखते हैं । बर्कले शहर पदार्थ दृश्य है और आप द्रष्टा हैं । फिर द्रष्टा सो गया, दृश्य पदार्थ बर्कले ही बना रहा, द्रष्टा मानो दुबक गया और फिर कुछ काल बाद उठ बैठा । आपने स्वयं अपने को फिर बर्कले में पाया, किंतु आपकी नींद ठीक जैसी की तैसी जारी रहती है । अब बर्कले से आप लॉसएंजिल्स गए । वहां आपके मित्र का मकान आदि पदार्थ दृश्य हुए और आप द्रष्टा । मानो वहां फिर सो जाता है और फिर जागता है । लॉसएंजिल्स में एक झपकी लेने के बाद आप लिंक ऑबज़र्वेंटरी (वैधशाला) में भी एक झपकी लेने लगते हैं । लिंक ऑब्जर्वेंटरी दृश्य हुई और आप द्रष्टा हुए । कुछ देर के लिए द्रष्टा सोकर दुबक जाता है, और फिर उठता है । लिंक आब्जर्वेंटरी से आप ग्रीष्मवास में जाते हैं, और आप जब ऐसा स्वप्न देख रहे हैं तब आपके कुटुंब के कोई सज्जन आकर आपको जगा देते हैं ।
यहां आप ही ग्रीष्मावास थे और आप ही उस ग्रीष्मावास का सुख भोगने वाले व्यक्ति भी । जब आप पढ़ते हैं तो द्रष्टा और दृश्य पदार्थ दोनों चल बसते हैं, दोनों गायब हो जाते हैं, द्रष्टा और दृश्य दोनों ही लुप्त हो जाते हैं । किंतु जब आप स्वप्न में सोते और उठते थे, तब केवल द्रष्टा दुबकता था और दृश्य पदार्थ ज्यों के त्यों बने रहे थे । आप असलियत में पूरे नहीं जागे थे ।
वेदांत के अनुसार ऊपर दिए गए दृष्टांत की तरह यह विश्व, यह विशाल संसार भी एक स्वप्न है । इस विशाल दुनिया के स्वप्न में सारा देश, काल और वस्तु (कार्य-कारण संबंध) यह समस्त विश्व, जिसे आप अपने बाहर देखते हैं, दृश्य पदार्थ हैं और जिसे आप 'मेरा शरीर', मेरा तुच्छ अपना आप कहते हैं, वह भी पदार्थ जैसा है ।
जब एक साधारण मनुष्य मर जाता है, तब क्या होता है ? माया का, अविद्या का लंबा स्वप्न भंग नहीं होता, ज्यों का त्यों चलता है, वह मरता है । मृत्यु का अर्थ केवल द्रष्टा का दुबक जाना, लुप्त हो जाना है । तब दृश्य पदार्थ वहीं का वहीं बना रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता । सो जब एक मनुष्य यहां मरता है और दूसरे जन्म में फिर जागता है तो वह वही संसार अपने चारों ओर पाता है कि जिसे वह मरते समय बहुत प्यार करता था ।
मान लो कि इस दूसरे जन्म में यह मनुष्य 80-90 साल जीता है और फिर मर जाता है । दूसरे जन्म में जो बर्कले या लॉसएंजिल्स शहर के तुल्य हैं, दृश्य पदार्थ वही बना रहता है, केवल द्रष्टा कुछ देर के लिए लुप्त हो जाता है । परिणाम में कुछ समय के बाद वह फिर पैदा होता है । इस तीसरी जिंदगी में वह फिर 70 या 80 वर्ष जीता है और तदोपरांत मर जाता है । यहां उदाहरण की भांति दृश्य पदार्थ जो लिंक वैधशाला के समान है, ज्यों का त्यों बना रहता है, और द्रष्टा दुबककर अदृश्य हो जाता है और पुनः प्रकट होता है ।
इस प्रकार जन्म और मृत्यु का यह सिलसिला तब तक जारी रहता है जब तक द्रष्टा और दृश्य दोनों एक साथ ही न दब जाएं, लुप्त न हो जाएं । जब तक दुनिया आपको अपने से भिन्न मालूम पड़ती है, तब तक आप इस संसार में कैदी हैं, आप सदा आवागमन, इस जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधे रहेंगे । आपके इर्द-गिर्द यह पहिया घूमता और आपको कुचलता ही रहेगा । आपको कभी ऊपर और कभी नीचे ले जाएगा । आपको कभी विश्राम या शांति न मिल सकेगी ।
अब वेदांत की घोषणा सुनिए । मुक्त जीवन वही है जो अपने आप ही में द्रष्टा और दृश्य दोनों पा लेता है । जब जागने पर हमें डॉक्टर जॉनसन की तरह इस ज्ञान की उपलब्धि हो जाती है कि हम ही स्वप्न के द्रष्टा हैं और हम ही पदार्थ हैं तब हम मुक्त हो जाते हैं । दुनिया मेरा शरीर है, संपूर्ण विश्व मेरा शरीर है, जो ऐसा कह सकता है वही आवागमन के बंधन से मुक्त है । वह कहां जा सकता है, कहां से आ सकता है ? कोई स्थान ऐसा नहीं जो उससे परिपूर्ण न हो, वह तो अनंत है, वह कहां जाएगा ? कहां से आएगा ? सारा विश्व, ब्रह्मांड उसमें है । वह प्रभुओं का प्रभु है, आवागमन के बंधन से मुक्त ।
भारतवर्ष का हरेक बच्चा माता के दूध के साथ मानो इस एक इच्छा को पिया करता है कि आत्म अनुभव प्राप्त करके आवागमन के चक्र से छूट जाऊं, मुझे बार-बार जन्म-मरण में फंसना न पड़े और ईश्वरीय ज्ञान, ब्रह्मानुभूति में निवास कर परमानंद और परम कल्याण की प्राप्ति कर सकूं ।
मिल्टन की जीवनी में एक महिला के संबंध में, जो उसकी स्त्री थी, एक बड़ी सुंदर कथा दी हुई है । उस स्त्री ने स्वप्न में अपने पति को देखा । उसका हृदय पति के लिए छटपटाने लगा । उसने उसे अंक में भरकर कहा, ''मेरे प्यारे स्वामिन् ! मैं सर्वथा तुम्हारी हूं, पूर्णतः तुम्हारी ।'' ठीक इसी क्षण उसकी आंख खुल गई । उसने देखा कि जो कुत्ता उसके पलंग पर सोया हुआ था, अपना शरीर उसके शरीर से सटा रहा है । स्त्री के जागने पर कुत्ता बिस्तर से उछलकर भागने लगा ।
वास्तव में कुत्ते से लिपटना उसे स्वप्न में अपने पति से लिपटना जैसा प्रतीत हुआ था । यदि कुत्ता अपने पूर्ण बल से चिपटा होता और वह जागी न होती तो उसे एक महान हिमालय अपनी छाती पर प्रतीत होता । वेदांत कहता है कि जब तक अविद्या का कुत्ता, माया का कुत्ता तुम्हें नीचे दबोचे रहता है, तब तक तुम्हारे स्वप्न निरंतर कभी अच्छे से बुरे और कभी बुरे से अच्छे रूप में बदलते रहते हैं । कभी तुम्हें पति की प्रतीति होगी और कभी प्रबल हिमालय की । आंसू और मुस्कान के बीच तुम सदा लटकन की तरह झूलते रहोगे, संसार तुम्हारे दिल पर बोझ समान पड़ा रहेगा, तुम्हें चैन का नाम न मिलेगा ।
वेदांत कहता है, ''अविद्या के इस कुत्ते से अपना पिंड छुड़ाओ, अपने को सर्वशक्तिमान परमेश्वर बनाओ, अपने को ब्रह्म बनाओ, ब्रह्मरूप का अनुभव करो और तुम एकदम मुक्त हो ।''
चाहे हजारों रूपों में तू मुझे चकित करे, तथापि ऐ मेरे प्यारे ! मैं तुझे अच्छी तरह पहचानता हूं, तू अपने चेहरे को चाहे जादू से छिपाए, पर मुझसे छिप नहीं सकता ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!