सम्मोहन विद्या और वेदांत
इमरसन का कहना है कि किसी को चोर कहो और वह चोरी करने लगेगा । दूसरे शब्दों में, किसी तरह का सुझाव दो और तुम्हें प्रत्यक्ष उसके अनुरूप परिणाम दिखाई देगा । यह कथन कुछ उदाहरणों में ठीक उतरता है, किंतु सर्वव्यापी रूप से नहीं । कुछ उदाहरणों में सूचना प्रत्यक्ष फल पैदा कर सकती है, किंतु दूसरे स्थानों में उसका बिल्कुल विपरीत परिणाम भी हो सकता है । सूचना सीधा प्रभाव उत्पन्न करती है—जो लोग इस बात पर अनुचित जोर देते हैं, वे केवल आधे सत्य से ही परिचित हैं, आधा अभी उनसे बहुत दूर है ।
वेदांत के अनुसार सूचनाएं अपना प्रभाव उसी तरह पैदा करती हैं, जैसे बिजली—एक अप्रवाह द्वारा और दूसरा प्रवाहन के द्वारा । उन मामलों में परिणाम सीधा और सूचना-अनुरूप होता है, जहां हमारी सूचना सीधे विषय को छूती है, किंतु जहां पर हमारी सूचना सीधे हमारे विषय या रोगी तक नहीं पहुंच सकती, अर्थात जहां रोगी की बुद्धि सूचना देनेवाले व्यक्ति से द्वेष रखती है और बीच में बाधक बनकर सूचना को उसके कारण शरीर से सीधा स्पर्श नहीं होने देती, वहां परिणाम सोचे हुए परिणाम से बिल्कुल उलटा होता है । ऐसा परिणाम सम्मोहन की अप्रवाह क्रिया कहलाती है । जबकि पहला सीधा परिणाम सम्मोहन की प्रवाहन क्रिया है ।
'कारण-शरीर' मनुष्य के संपूर्ण मानसिक संस्कारों और सुप्त शक्तियों का चेतना से नीचे स्तर पर स्थित भंडार है । हमारे सारे काम काज, चेष्टाएं, चाल-ढाल बर्ताव और दशाएं इसी कारण-शरीर में निहित सामग्री का फैलाव मात्र हैं, उसके अनुकूल परिणाम का होना अनिवार्य है । 'कारण-शरीर' मनुष्य का हृदय, केंद्र, स्वामी है । आप उसे कर्तृव्य-प्रधानाधिकरणनिष्ठ मन भी कह सकते हैं ।
(ग)—कारण शरीर ।
(ख)—सूक्ष्म शरीर या मानसिक क्षेत्र, अंतःकरण ।

(क)—स्थूल शरीर ।
स्थूल शरीर द्वारा किया हुआ कोई भी काम तुरंत मानसिक शक्ति अथवा विचार के रूप में परिणत हो जाता है और कुछ दिनों तक सूक्ष्म शरीर में, (जिसे साथ के चक्र में 'ख' से दर्शाया गया है)—रहने के बाद, कारण शरीर में, (जिसे 'ग' से दर्शाया गया है) पहुंच जाता है । जो संकल्प या विचार स्थूल जगत से न आकर अनायास, सीधे मानसिक लोक, सूक्ष्म शरीर 'ख' से प्रकट होते दिखाई देते हैं, वे कारण शरीर में पूर्वसंचित मानसिक शक्ति के प्रादुर्भाव मात्र हैं, जो कारण शरीर से नीचे उतरकर सूक्ष्म शरीर 'ख' में प्रकट होते हैं । इस प्रकार क, ख और ग अर्थात इन तीन शरीरों का पारस्परिक संबंध कुछ-कुछ वायु, जल और वाष्प के संबंध के समान है अथवा ऐसा है जैसे नदी का हिम-स्थित स्रोत, नदी का पर्वतीय भाग और नदी का मैदानी भाग । वास्तव में इन तीनों का संबंध एक सिलसिले में चलता है ।
मानो, आपने राह में किसी बीमार को पड़े देखा । स्वभावतः आप उसकी सहायता करने पहुंच गए । अब जब आप उसकी सेवा-शुश्रूषा में लगे हुए हैं, तब आपका ध्यान उस कर्तव्य की ओर बिल्कुल नहीं जाता, आप पीड़ित मनुष्य की पीड़ा हरने के लिए भरसक चेष्टा करते रहते हैं, आपकी सारी इंद्रियां और सारे अंग पूर्णतया क्रियाशील हो जाते हैं । हां, जब आप उस पीड़ित व्यक्ति की सेवा कर चुकते हैं और आपका शरीर और इंद्रियां विश्राम करने लगती हैं, तब आप स्वतः देखेंगे कि आपकी वह क्रियाशीलता और शक्ति, जो पहले इंद्रियों के क्षेत्र में काम करती थीं, 'ख' लोक में पहुंच गई है । दूसरे शब्दों में आपका चित्त स्वभावतः अपने किए हुए कार्य का चिंतन करने लग जाता है और आप अपनी चेतना में उस कार्य की पवित्रता और महत्ता पर विचार करने लगते हैं ।
कुछ देर बाद आप देखेंगे कि जो शक्ति 'ख' लोक में काम कर रही थी, वह वहां से विदा हो गई है । वह कहां चली गई ? क्या वह समाप्त हो गई ? ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि प्रकृति में कुछ भी नष्ट नहीं होता । वेदांत के अनुसार, यह शक्ति सिर्फ अदृश्य हो गई है, अर्थात चेतना के निम्नतल 'क' में जाकर कारण शरीर में पहुंच गई है ।
इसी प्रकार कारण शरीर में जो मानसिक शक्तियां संचित होती रहती हैं, वही 'ख' लोक में हमारे स्वप्नों हमारी हृदयस्थ भावनाओं, हमारी स्वाभाविक रुचियों, प्रवृत्तियों और कार्यों में प्रकट होती है । वेदांत के अनुसार हमारी स्वाभाविक रुचियों की उत्पत्ति का यही रहस्य है ।
परीक्षात्मक प्रमाण
जाग्रत या सम्मोहित अवस्था में किसी मनुष्य के कारण शरीर का सीधे या वक्र रेखा में स्पर्श कीजिए । वहां जिस प्रवृत्ति या अभिरुचि की भावना पहुंच जाएगी, वह निस्संदेह ठीक समय पर स्वयं प्रकट होगी । जब कोई मनुष्य सम्मोहित किया जाता है और उसे कोई ऐसी उत्तर-सम्मोहन-सूचना दी जाती है कि वह जागने के बाद किसी समय पर कोई विशेष कार्य करे, तो वह सूचना उस कार्य को प्रबल रुचि के रूप में ठीक समय पर निस्संदेह प्रकट होती है । इस प्रकार जैसा कि इस सम्मोहन-क्रिया के उदाहरण में बतलाया गया है कि कारण शरीर में प्रविष्ट सूचना के अनुरूप फल प्रकट किया जा सकता है वैसे ही वेदांत मानता है कि मनुष्य के सभी कामों में उनके प्रकट करनेवाले संकल्प, कारण शरीर में पहले ही से विद्यमान रहते हैं ।
वेदांत के अनुसार ये सूचनाएं, ये संकल्प, इंद्रियों के सम्मोहन से या मानसिक संवेदनाओं के सम्मोहन से अथवा सम्मोहन के और भी किसी रूप से कारण शरीर में प्रविष्ट होते रहते हैं, क्योंकि वेदांत के अनुसार संपूर्ण संसार ही एक विशेष सम्मोहन-क्रिया से बना हुआ है । बस, कारण शरीर में स्वास्थ्य की सूचना भर दो, स्थूल शरीर स्वस्थ हुए बिना न रहेगा ।
कारण शरीर में परमेश्वरत्व की सूचना समाने दो, मनुष्य महात्मा हुए बिना नहीं रह सकता । कारण शरीर में गुलामी और कमज़ोरी की सूचनाएं भरने दो, स्थूल शरीर का दुर्बल और गुलाम होना अनिवार्य हो जाएगा । अपने भले-बुरे का मनुष्य आप ही विधाता है, क्योंकि उसका कारण शरीर ही उसके चारों ओर की परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी है ।
जिस प्रकार स्वप्नाचार—सोते समय चलने-फिरने की आदत या सम्मोहन की अवस्था में व्यक्ति विशेष को वहां झील दिखाई पड़ती है, जहां दूसरी के लिए झील-वील का कोई निशान तक नहीं होता, उसे वहां मछलियों से भरा तालाब दिखाई देता है, जहां दूसरों के लिए तालाब का नाम तक नहीं होता, वह ऐसी-ऐसी चीज़ों को देखता है, जो दूसरों के लिए कभी मौजूद नहीं रहतीं, किंतु जिस प्रकार ये सारे दृश्य, बनावटी पदार्थ उसी सम्मोहित मनुष्य की निजात्मा से उत्पन्न और पोषित होते हैं, उसी प्रकार वेदांत के अनुसार हमको दिखाई देनेवाला यह संपूर्ण संसार विशुद्ध रूप से केवल हमारी निजात्मा से ही धारण होता है ।
अब उक्त सम्मोहनजन्य अथवा स्वप्नाचार के और सांसारिक दृश्यों में अंतर केवल इतना है कि वे संसार की अपेक्षा अल्पकालीन और क्षणिक होते हैं । यह संसार की अवस्था ठीक ऐसी बात है जैसे कोई मनुष्य सम्मोहन की अवस्था में डाल दिया गया हो और उसे उस अवस्था से बाहर निकालने की सुधि भुला दी गई हो । संसार के सभी मनुष्य संसार के इस विचित्रतम जादू से मोहित किए हुए हैं और उनको इस सम्मोहित अवस्था से निकालने में बहुत समय लग सकता है । यह सम्मोहन तब तक चलता रहता है, जब तक कोई ब्रह्मज्ञानी, जीवन मुक्त आकर उनके मोह को दूर करके उनको असली ब्रह्मज्ञान का साक्षात न करा दे, और वे स्व-स्वरूप में न जाग उठें । वह जो सार तत्व है, जो संपूर्ण दृश्य जगत का आधार है, वही वास्तव में सत् है और जो कुछ उसके ऊपर आरोपित है, वह अवश्य ही भ्रमात्मक और सम्मोहित व्यापार है ।
'कारण' शरीर का आधार और अधिष्ठान जो सब अवस्थाओं में, सम्मोहित अवस्था में, जाग्रत अवस्था में, स्वप्न की अवस्था में, और सुषुप्ति की अवस्था में सदा एकरस रहता है, वही सच्ची आत्मा या परम सत् है । दूसरी हरेक वस्तु उसके ऊपर आरोपित है । अतएव भ्रमात्मक और सम्मोहित व्यापार है ।
आत्मानुभव का अर्थ है इसी लाचारी और सम्मोहन की अवस्था से मुक्त होना तथा इस दिखाई पड़नेवाले दृश्य जगत को उस परम सत् में लीन कर देना । माता और पिता की सूचनाओं, सुझावों और प्रस्तावों (Suggestions) तथा हमारी इंद्रियों की सूचनाओं के द्वारा उनका अनुमोदन होने पर हमें संसार की मोह-निद्रा प्राप्त होती है, अतः इनकी प्रतिकूल सूचनाओं के समुचित प्रयोग से निराकरण या निवारण हो सकता है ।
वास्तविक आत्मा ने गलती क्यों की
आपकी यह 'क्यों और किसलिए' तथा संपूर्ण चिंताएं उसी सम्मोहन क्रिया का अंशमात्र और परिणाम हैं, उसी मूल कारण की संतति और अनुचर हैं । ऐसे प्रश्न करने का अर्थ होता है कि आप कार्य के द्वारा कारण को जानने की आशा करते हैं । यह तो पुत्र को पिता के आगे रखना और गाड़ी को घोड़े के आगे रखना जैसा है । यह 'क्यों', 'कैसे' की प्रवृत्ति और प्रश्न पर प्रश्न करने की अभिरुचि—यह संपूर्ण शृंखला उसी सम्मोहनावस्था का अंशमात्र आविर्भाव मात्र है ।
सम्मोहन से मुक्ति की अवस्था में यह कुछ भी वर्तमान नहीं रहता । असली मूल अवस्था में इनमें से कुछ भी वर्तमान नहीं रहता, कोई प्रश्न संभव नहीं होता । यह संपूर्ण प्रश्न माला कागज पर खिंची ऐसी भूल-भुलैया का चक्कर है, जिसका कहीं अंत दिखाई नहीं देता । यह कार्यकारण शृंखला कभी रुकती नहीं, पेंच डालती हुई सदा घूमती रहती है । जबकि वास्तविक सत्य, परम सत् उस कागज के समान है जिस पर ये सारे चक्कर, घेरे और भूल-भुलैया बनी हैं ! कागज, सत्य श्रृंखला से परे हैं । इसलिए 'क्यों' और 'कैसे' के प्रश्नों को हल करने की चेष्टा करना, कागज की उस भूल-भुलैया के चक्कर में आदि अथवा अंत का सिरा बना देने के समान है ।
अरे, कागज तो चक्र के सभी घेरों, लपेटों और फेरों में एक समान मौजूद है । अतः राम सारे संसार को आदेश देता है कि अपने आपको भूल-भुलैया या घूम-घुमौवा के चक्कर में, सांप की कुंडली में उलझा हुआ मत समझो । अपने आपको सांप की कुंडली का नियंता, शासक और स्वामी जानो और अनुभव करो । बस, आपका कार्य कारण-माला से परे हो जाना निश्चित, सुनिश्चित है । इसमें संदेह नहीं ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!