पुरुषार्थ और प्रारब्ध — भाग 1
असली हवाला या प्रमाण तुम्हें स्वयं होना चाहिए । क्या धार्मिक पुस्तकें बेकार हैं ? निःसंदेह पुस्तकों से मुझे सहायता मिली और जो कुछ उन पुस्तकों में लिखा था वह सब अपने अनुभव में लाया । वह पहले मेरे प्रमाण और हवाला थीं और अब मैं स्वयं प्रमाण और हवाला हूं ।
रसायन विद्या की पुस्तक विद्यार्थी को सहायता देती है, किंतु विद्यार्थी का अपना अनुभव उसकी सच्ची प्रमाणिकता है । वेद या कुरान तुम्हें आत्मिक रसायन में सहायक हो सकते हैं, लेकिन तुम्हारा स्वतः का अनुभव असली प्रमाण या हवाला है, आप लोग आज मेरी सब बातों से सहमत न होंगे, खैर आज नहीं तो कल सहमत होंगे, और कल नहीं तो दूसरे जन्म में आओगे, वहां मानना ही पड़ेगा । सच्चाई की सदैव विजय होगी ।
वेदांत के अनुसार मनुष्य की असली आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं है और सारे संसार की शक्तियां उसके आधीन हैं । लेकिन जिसको प्रायः लोग जन या मनुष्य कहते हैं, वह मन-बुद्धि, और शरीर का योग है । उसको उसी तरह से प्रकृति की शक्ति प्राप्त है, जिस तरह से नदी-नाले, बादल, हवा, वर्षा और सूर्य को । यदि मनुष्य को इन्हीं अर्थों में ले लें, तो मनुष्य एक निकम्मी पराधीन वस्तु अन्य वस्तुओं की भांति है ।
कहते हैं कि गेंद को हाथ में लेकर जब हवा में फेंकते हैं, तो उसमें एक गति उत्पन्न हो जाती है । यदि कहीं वह सचेत हो जाए अर्थात उसमें चेतना (कौंशंश), समझने-बूझने की शक्ति उत्पन्न हो जाए, तो वह यही कहेगा कि मैं स्वयं चलता हूं, लेकिन प्रत्यक्ष है कि स्वयं नहीं चलता, भिन्न-भिन्न शक्तियां जो उसे चलाती हैं, जिनमें से एक ग्रेविटेशन (आकर्षण शक्ति या अधःपतनशीलता) है और एक शक्ति है, जिसने उसमें गति उत्पन्न की थी ।
मनुष्य भी इसी प्रकार अन्य शक्तियों की तरह दूसरी शक्तियों की पराधीनता में काम करता है, भेद केवल इतना है कि वृक्ष, फल और वनस्पति में चेतना नहीं और यह सचेत है । वह नहीं कहते कि हम किसी काम को करते हैं लेकिन यह कहता है कि 'मैं करता हूं' 'मैं करता हूं ।' वास्तव में वह एक ही शक्ति जो सबमें काम करती है, यद्यपि नाम अनेक हैं । संसार की ओर वस्तुओं में उसे ग्रेविटेशन (अधः पतनशीलता या आकर्षण शक्ति) कहो और उसी शक्ति का मनुष्य में चाहे प्रेम नाम रखो, प्रकृति में उसे आकर्षण (ग्रहण शक्ति) कहो और मनुष्य में भक्ति । प्रकृति में जो अट्रैक्शन और रिपल्शन (आकर्षण और क्षेपण या निराकरण) है, यही मनुष्य में राग-द्वेष है । इसको एक उदाहरण से स्पष्ट किया जाएगा ।
पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ जमी रहती है और उसी में ग्लैशियर या बर्फ की नदी उत्पन्न होती है और रास्तों को काटती-छांटती वृक्षों को उखेड़ती-पुखेड़ती आगे बढ़ती चली जाती है । यह किसकी बदौलत ? सूर्य की बदौलत तथा अन्य शक्तियों के भी कारण जो मिलकर काम कर रही हैं । फिर वह आगे बढ़कर नदी बनकर चली । यह नदी क्यों चल रही है ? वही सूर्य, आकर्षण शक्ति तथा अन्य शक्तियां काम कर रही हैं, जो बर्फ में कर रही थीं । किंतु नदी तरल है, इसलिए सूर्य का ठसमें प्रतिबिंब पड़ता है । पक्षी, वनस्पति और पाषाण जो उन्नति कर रहे हैं, वह परमेश्वर की बदौलत या कई विभिन्न शक्तियों की बदौलत, अविनाशी भगवान की बदौलत है । लेकिन वे पक्षी (पक्षी, पाषाण आदि) जमी हुई बर्फ की भांति हैं और उनमें सूर्य का प्रतिबिंब या चेतनात्मा का प्रतिबिंब नहीं पड़ता ।
मनुष्य का संबंध अन्य वस्तुओं के साथ वही है जो पिघलती हुई नदी का बर्फ के साथ । इसमें नदी की भांति एक प्रतिबिंब (चेतनता का पड़ रहा है) सचेतन है, अहंता का माद्दा (बीज या मल) उत्पन्न हो गया, जो कहता है कि यह तो ''मैं करता हूं'', ''मैं करता हूं'', यद्यपि करने वाली वही सारी शक्तियां हैं ।
वास्तव में वृक्षों का ईश्वर वही है जो तुम्हारा ईश्वर है, वृक्षों का अन्तरात्मा वही है जो तुम्हारा है । इसलिए वृक्ष तुम्हारे भाई हुए, संपूर्ण ईश्वरीय सृष्टि भाई हुई । यह बात तो प्रकृति ने समस्त ब्रह्मांड में दिखा दी है, और साथ ही यही दर्जे छोटे पैमाने पर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में भी पाए जाते हैं । जब वह बच्चा था तो आत्मा यद्यपि वैसा ही था, लेकिन अहंकार या अहंता उसमें नहीं समाई थी । आयु बढ़ते ही मानो पहाड़ों की बर्फ पिघल पड़ी और नदी पर सूर्य की किरणें पड़ने लगीं अर्थात् उसमें चैतन्य का प्रतिबिंब पड़ने लगा और यह कहने लगा ''यह मैंने किया'', ''मैंने किया'' जो बचपन में नहीं कहता था । सुषुप्ति की अवस्था लो । इस अवस्था में भी शरीर कुछ-कुछ बढ़ ही रहा है । इसमें रक्त का दौड़ना बंद नहीं, किंतु इस समय अहंता की अवस्था नहीं । उस समय तो तुम पाषाण या वनस्पति के भाई हो । जब जाग्रत अवस्था में आये तो फिर तरल अवस्था में आ गए और किरणें प्रतिबिंबित होने लगीं, फिर कहने लगे कि ''पुस्तकें मैंने लिखीं'', ''व्याख्यान मैंने दिया'', ''यह मैंने किया'', ''वह मैंने किया ।''
एक बात और विचार करने की है । जब मनुष्य अति उच्च अवस्था पर पहुंचा हुआ होता है—कवि का उदाहरण ले लो, जिस समय वह अपने विचारों में मग्न हो जाता है—उसे कदापि स्मरण नहीं रहता कि मैं लिख रहा हूं । अहंता का खयाल ही नहीं । जिस समय एक गणितज्ञ कठिन से कठिन गुत्थियों (घुंडियों या उलझनों) को हल कर रहा हो, उस समय मानो उसका मस्तिष्क ईश्वर ने पकड़ लिया है, अहंता नितांत दूर है । लेकिन निरहंता (देहाध्यास की शून्यता) में हल कर चुकने के बाद फड़क उठा कि वाह क्या ! ''ग्रंथी हल की है'', ''मैंने की है'' ।
नेपोलियन को देखिए कि वह युद्धक्षेत्र में खड़ा है, इधर गोला सनसनाता हुआ आया, हजारों मनुष्य गिर रहे हैं, लेकिन उसे खबर ही नहीं कि क्या हो रहा है, खुदी (अहंता) का नाम ही नहीं । इसकी वही दशा है जैसी ग्लैशियर की हालत । जब अति उच्च स्थिति पर शक्ति होती है, अहंता नहीं होती । यह बात याद रखने योग्य है कि जितने बड़े-बड़े काम होते हैं, अहंता के बिना होते हैं । और आश्चर्य यह है कि जब अहंता आती है तो हमारे कार्य को रद्दी कर देती है ।
एक मनुष्य व्याख्यान दे रहा है, जिस समय उसे खयाल आया कि मैं अच्छा व्याख्यान दे रहा हूं उसी समय से वह बात जाती रही । लड़के ने जिस समय स्कूल में यह खयाल किया कि क्या अच्छी तरह कविता पढ़ रहा हूं, बस उसी समय मुंह बंद हो गया । यह अहंता उस मक्खी की भांति है जो चलती गाड़ी के घोड़े की पीठ पर बैठी हुई कह रही थी कि 'गाड़ी मैं चलाती हूं ।' मनुष्य में जब अहंता आई, वहीं से ''तुम और हो'', ''मैं और हूं'' हो गया । अहंता ही है जिसकी बदौलत मस्तिष्क में यह बात समा जाती है कि ''यह हमने किया,'' यद्यपि अहंता ने कुछ भी नहीं किया, जैसे कि सूर्य की गर्मी और आकर्षण शक्ति नदी को चलाने के कारण थे, यदि नदी में प्रतिबिंब कह दे कि मैं नदी चला रहा हूं तो क्या आप उसे मानेंगे ? या वह माने जाने के योग्य है ? इसी प्रकार आपकी अहंता नहीं है जो काम करती है । जो काम आप कर रहे हैं या हो रहा है, वह एक परमेश्वर की बदौलत हो रहा है । जैसे लेबोरेटरी (Laboratory) होती है या इन्वेंट्री (Inventory), वहां खयाली बातें नहीं है, वहां प्रत्येक वस्तु का अनुभव और साक्षात्कार किया जाता है । वैसे अमेरिका में संकल्पशक्ति (या संकल्प शास्त्र) के अनुभव भी किए जाते हैं ।
कुछ अनुभव जो राम ने देखा है, अब उनकी साक्षी देगा । एक मनुष्य को ऐसी अवस्था में डाल सकते हैं जब अहंता काम न कर सके, अर्थात् नदी बहती जाए और सूर्य का प्रतिबिंब न पड़े । यह वह अवस्था है जिस समय मनुष्य हिप्नोटाइज्ड या साइकौलोजाइज्ड कर दिया जाता है । राम के सामने एक ऐसे मनुष्य को इस अवस्था में डाला जिसे चौथिया का ताप था अर्थात् जिसे चौथे दिन की बारी से ज्वर आया करता था । उसे हिप्नोडाइज्ड करके उसमें यह (खयाल या संकल्प) डाला कि ज्वर दूर हो जाए और ऐसी चित्त शक्ति से यह खयाल भरा कि उसका प्रभाव हो । फिर उसी अवस्था में ले आए । ज्वर दूर हो गया, किंतु उसके स्थान में नित्य ज्वर आने लगा । यह खयाल का अपराध नहीं था, वरन् उसका अपराध था जिसने खयाल भरा था । कुछ समय बाद उसमें ज्वर बिल्कुल छोड़ देने का खयाल डाला गया और फिर जगाया गया । ज्वर बिल्कुल दूर हो गया । यह परिणाम इस बात का सूचक है कि आपका शरीर आपके संकल्पों (खयालों) से बना हुआ है । और अनुभव सुनिये—एक व्यक्ति था जिसे सिगार पीने का बड़ा व्यसन था । उसने चाहा कि वह उसे छोड़ दे । एक मनोचिकित्सक ने उसे सम्मोहित किया और उसमें यह खयाल भरा कि उसने दिन भर में एक ही बार सिगार पीया है । इसके बाद उसने एक इतना बड़ा सिगार बनाकर पीना आरंभ किया जो सबके बराबर था । यह भूल खयाल डालने वाले की थी । फिर दुबारा उस पर अमल किया गया और अभ्यास बिलकुल छूट गया ।
इन अनुभवों में आरंभ में तो कुछ असफलता मिली, मगर पूर्ण सफलता के अनुभव भी यह ही हैं । कल बताया था कि मिस्टर जॉन्स की अवस्था बदल गई और उसके खयालों की शक्तियां ऐसी मरोड़ी गईं कि वह डॉक्टर पॉल की अवस्था में काम करने लगा । आप इस अनुभव के मानो या न मानो, आपकी मर्जी है । अभी कुछ समय पहले तक लोग रेल और तार की आश्चर्यजनक शक्तियों को नहीं मानते थे । न मानो तुम्हारी इच्छा है । किंतु यह आंखों देखी बातें हैं, उनको राम कैसे कह दे कि नहीं हैं । आपके शरीर की रोगता और अरोगता, आपके मुख-मंडल की प्रफुल्लता और मलिनता और आपके मुखमंडल की रंगत, कौन-सी शक्तियां हैं जो इन्हें चला रही हैं । यह शक्तियां खयाल की हैं । आपकी बाह्य अवस्था और कर्म आपके इस खयाल की शक्ति पर निर्भर हैं ।
कल राम ने आपको बताया था । एक मनुष्य को ऐसी अवस्था में डालकर फर्श पर झील का भ्रम पैदा कर दिया और वह उसमें मछलियां पकड़ने लगा । यह भी देखा कि एक मनुष्य को ऐसी अवस्था में डाला गया और उसमें यह खयाल प्रवाहित किया कि वह वृक्ष है, सिर एक मेज पर रखा और पैर दूसरी मेज पर, बीच में बोझ रखा गया और उस पर लड़के चढ़े, लेकिन झुकने का नाम नहीं । यह क्या है । यह सिद्ध करता है कि शारीरिक और बाह्य काम खयाल पर निर्भर है—
जैसी आपकी मति होगी, वैसी आपकी गति होगी ।
विचारों की एक ऐसी अवस्था होती है, जिसमें अहंता का साथ नहीं होता है । उस अवस्था को कारण शरीर (सब्जेक्टिव माइंड) या सुषुप्ति कहते हैं । एक अवस्था में अहंता का साथ होता है उसे सूक्ष्य शरीर (आब्जेक्टिव माइंड) या स्वप्न कहते हैं, जाग्रत अवस्था को स्थूल शरीर कहते हैं । ये तीनों शरीर परस्पर ऐसे जुड़े हैं जैसे पानी और बर्फ का परस्पर संबंध होता है । जो काम हाथ से होता है, उसका प्रभाव मन पर पड़ता है ।
इस समय जो व्याख्यान सुन रहे हो, वह अपनी इंद्रियों से सुन रहे हो, यह शारीरिक क्रिया है, और फिर सूक्ष्म शरीर की क्रिया अर्थात् विचार हो रहा है । जब यहां से चले जाआगे, कुछ देर तक प्रभाव रहेगा, फिर यह प्रभाव मन में नहीं रहेगा । अंततः यह शक्ति भी कहीं न कहीं रहेगी, अगर तुम्हारे पास न रही तो फिर वह शक्ति कहां रहेगी ? यह सुषुप्त अवस्था या कारण शरीर में रहेगी । वहां का जाना यों स्वीकार करेंगे । एक झील है, उसमें बहुत सी वस्तुएं गिरीं । कुछ देर ऊपर रहीं फिर तह में जम गईं । जब हिलाया तो सतह (तल) पर आ गईं । राम जब हिंदुस्तानी बोल रहा है, तो अंग्रेजी और फारसी मन की तह में हैं । मन की झील को हिला दें तो सतह पर आ सकती हैं । जिस समय आप स्वप्नमय या मनोमय जगत में होते हैं, तो कई बार जोश आ जाता है कि 'मैं यह काम करूंगा', 'वह काम करूंगा', मानो वह शक्ति बाहर से आयी, इस तरह यह आपको गति में डाल देती है । यह क्या हुआ ? किसी दूसरे ने यह खयाल दिला दिया या भीतर से उत्पन्न हुआ ? राम स्पष्ट करके दिखा देगा कि राम के सामने यह अनुभव हुआ । एक लड़का था । हिप्नोटाइज्ड किया गया और उससे कहा कि देखो 'जब तुम जाग जाओगे, तब हम ताली बजायेंगे ।' तब तुम पानी की ओर जाना और नदी के पास जो एक छड़ी पड़ी होगी, उसे उठा लेना और नाचना गाना, फिर वहां से लौटकर आकर बैठ जाना ।
यह कथन शरीर में डाला गया जिसमें यह खयाल जम गया, लेकिन जाग कर वह बात भूल गया कि किसी ने कुछ कहा था । भूल जाने का अर्थ है कि झील की तह में वह बातें थी, किंतु उसे खबर नहीं रही । जिस समय तह हिला दी गई अर्थात् ताली बजाई गई, तो वह पश्चिम की ओर चला, छड़ी उठा ली, सिर पर रखी, नाचा, गाया और लौट कर, आकर बैठ गया । उससे पूछा गया, यह क्या है ? हमने तुम्हें ऐसा करने को तो नहीं कहा था, लेकिन वह मानता ही नहीं है । वह कहता है कि यह मेरे मन का खयाल था, मेरा यह जोश था, मेरी यह मौज थी । इसी प्रकार प्रायः हम काम कर बैठते हैं, किंतु उसका कारण नहीं मालूम होता । अदालत में प्रायः कारण पूछा जाता है । वह लोग मनोविज्ञान के इस सिद्धांत को ही नहीं जानते । यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक काम का कोई न कोई कारण ज्ञात ही हो ।
भाग्य क्या है ? प्रारब्ध या कर्म का शाब्दिक अर्थ क्रिया या काम । क्या काम वह है, जो शरीर से किया गया ? काम की परिभाषा वह गति है, जिससे मन का संबंध हो । कर्म वह है जिससे मन का लगाव हो । असली कर्म वह खयाल है जो मन या सूक्ष्म शरीर की तह में है । अतः हमारे खयालों से भाग्य बंधा हुआ है । इसके संबंध में एक बात ध्यान से सुनिये ।
हिंदू कहते हैं, कि चौरासी लाख चक्र में होकर मनुष्य, मनुष्य की योनि में आया है । परिणामवाद (Evolution) का प्रश्न हद दर्जे तक पहुंचा । अमेरिका से डारविन के मन की व्याख्या उत्तम रूप से की गई, वहां एक अद्भुतालय (अजायबघर) है, जहां माता के पेट का एक दिन का बच्चा, दो दिन का बच्चा, तीन दिन का बच्चा इसी तरह नौ महीने तक के बच्चे शीशियों में रखे हुए हैं । आप विचार करें तो मनुष्य मछली, मेढक और बंदर आदि के रूप से गुजरने के बाद ही अपने रूप में आता है । इस प्रकार प्रकृति ने हमको दिखा दिया है कि दायरे (वृत्त) के भीतर दायरा है, प्याज के छिलकों की भांति एक के भीतर एक मौजूद है, या द्रोपदी के चीर की भांति 'सारी में नारी और नारी में सारी' है । एक ही नियम है जो सारे पर्दों की तहों में चल रहा है । वही नियम मनुष्य पर चलता है । जब मनुष्य माता के उदर में आता है तो नौ मास के समय में सारी अवस्थाओं को पार कर जाता है । जैसे बी.ए. की परीक्षा के पहले विद्यार्थी पूरी किताबें थोड़े समय में दोहरा जाते हैं, वैसे ही शरीर की बनावट में भी कुछ ऐसा ही होता है क्योंकि आपके 'कारण शरीर' में पिछले जन्मों के अभ्यास संचित हैं ।