पुरुषार्थ और प्रारब्ध — भाग 2
यह जो आप सुना करते हैं कि एक मनुष्य ने अपने को मुर्दा बना डाला है, नाड़ी और हृदय गति बंद है । लोग कहते हैं कि वह मर गया और फिर जी उठा । इसके अर्थ यह है कि मेढक आदि के जन्म में जो अभ्यास था, उसको दोहरा लिया । सिद्धि, सिद्धि लोग बहुत कहते हैं, इनके पीछे पड़ने का नाम उन्नति नहीं है, वरन् ऐसा कहने में तुम अपनी अवस्था को रीछ और मेढक आदि की अवस्था में डाल सकते हो, जिनमें अब भी ऐसी बहुत सी शक्तियां वर्तमान हैं, जो सर्व साधारण में उपलब्ध नहीं होतीं । देखें, कुत्ता दूर से सूंघ लेता है, यदि यह शक्ति प्राप्त करो, तो वह कुछ उन्नति नहीं है, वरन पिछली भूली हुई बात का दोहराना भर है । आपकी विचार शक्ति सब कुछ कर सकती है । राम बतलाएगा कि किस ओर विचार लगाओ ।
शतरंज का उदाहरण लो । जब तक कुछ मोहरे मारे न जाएंगे, जीतना संभव नहीं । परिणाम यह निकलता है कि यदि सफलता प्राप्त करनी है । तो कुछ वस्तुओं को छोड़ो और कुछ वस्तुओं को लो । इसलिए कि शक्ति अर्थात प्रकृति उच्च स्वर से कह रही है कि समय के साथ परिवर्तन लाओ या नष्ट हो जाओ । प्रकृति की प्रत्येक वस्तु से, तारों से, वृक्षों से, पत्थरों से पाठ सीख सकते हो ।
जरा गौर से देखो असभ्य लोगों को । कहते हो कि परिणामवाद या विकासवाद की उन्नति की दौड़ में असभ्य लोग बहुत पीछे हैं । किंतु राम ने देखा कि उनके नेत्रों में इतना प्रकाश है कि मील दो मील की दूरी से हरे वृक्ष पर हरा तोता देख सकते हैं । पैरों में वह शक्ति है कि हिरन को दौड़ कर पकड़ सकते हैं । हाथों में वह शक्ति है कि सिंह से बिना शस्त्र के लड़ते हैं । किंतु सुसभ्य मनुष्य के न हाथ में, न पैर में, और न आंख में इतनी शक्ति है ।
इसका कारण क्या है ? कारण यही है कि वे लोग इन (अंगों) को व्यवहार में लाते हैं, इसके बिना वे जीवित नहीं रह सकते । उनकी संतान भी वैसी ही होती है, सुसभ्य मनुष्य असभ्य की तरह नहीं दौड़ सकता है । क्योंकि जब जाना हुआ, गाड़ी घर पर तैयार है । अमेरिका में दो-दो मिनट पर रेलें ऊपर-नीचे अैर भूमि पर चलती हैं, इसलिए अमेरिका निवासियों को पैरों का प्रयोग कम करना पड़ता है । रेल मानो उन्हीं की बढ़ी हुई टांगें हैं ।
असभ्य पुरुष हाथ से काम कर लेते हैं, सुसभ्य उनके स्थान में मशीनों या शस्त्रों से । अब आंखें दुर्बल हुईं, उन्होंने ऐनक लगाई, दूरबीन का आविष्कार किया कि दूर से दूर की वस्तुएं दिखाई दें । अतएव ज्ञात हुआ कि सुसभ्य लोगों ने हाथ, पैर और आंख की मुहरों कों मरवा डाला और मस्तिष्क के मुहरे को जीवित रखा । ऐसे-वैसे मुहरे का पिटवाना ही अच्छा है । यदि असभ्यों की तरह इन शक्तियों को वर्तमान रखा जाता तो जीवन-भार बड़ा संकट स्वरूप हो जाता ।
यह देखिए कि विकसित वृक्ष की शाखाएं किस ओर जा रही हैं । मनुष्य को कहते हैं कि यह सारी सृष्टि का निचोड़ है, तो यह एक सीमा तक सत्य है, क्योंकि सारे संसार की अवस्थाएँ जब उसके मस्तिष्क में आ गईं, तब यह सारे संसार का ज्ञान वाला मनुष्य उत्पन्न हुआ । यहां तक विकासवाद की सीमा है, किंतु अब किस ओर मुख है । संसार की गति (कृत्यों) की अंतिम परिधि (सीमा) क्या है ? एक और अवस्था आती है । जिसमें मनुष्य केवल बोध से नहीं वरन् हृदय से सारे संसार को अपने आप समझने लगता है । केवल सिर और मस्तिष्क ही नहीं वरन् हृदय, जिगर, नस, नाड़ी प्रत्येक अंग-प्रत्यंग, यहां तक कि आपके सेरिब्रम (Cerebrum) में सारा संसार समा जाता है, आप में यह अवस्था आ जाती है कि सारा संसार मेरा ही शरीर है, ये पशु, पक्षी, ये वृक्ष, पर्वत मेरी ही आत्मा हैं—इस नदी में मेरी ही नाड़ियों का रक्त बह रहा है, यह सूर्य, यह चंद्रमा मेरी ही आंखें हैं, मेरा ही हृदय इन सबकी छातियों में धड़क रहा है ।
प्यारे, यह धारणा मन से मिटा दो कि तुम और हो और वह और हैं, तुम और हो और शेष देश के मनुष्य और हैं, जो सब में है, वह तुम हो । जिस देश के लोग इस सत्यता को व्यवहार में लाते हैं—वही जाति शेष रहती है । जैसे कल राम ने बताया था कि जापानियों ने ब्रह्म-विद्या पर व्यावहारिक रूप से अमल किया । जो लोग व्यावहारिक रूप से दूसरों की आत्मा को अपनी आत्मा मानते हैं, वही जीवित रहते हैं, रक्षा का सही उपाय यही है । अन्यथा नष्ट होना सुनिश्चित है ।
आपका खयाल (आकर्षण शक्ति) यह नियम बताता है कि कई शक्तियां, जो परस्पर मिल कर काम कर रही हों, उन शक्तियों के फल (परिणाम) का झुकाव बड़ी शक्ति की ओर होगा । जब वह शक्ति कम हो जाएगी तो उससे कमजोर शक्ति की ओर झुकाव होगा । ऐसे ही आपके भीतर जो खयाल अधिक दृढ़ है, पहले वह व्यवहार में आएगा, तत्पश्चात दूसरा ।
अब यह देखा जाता है कि भीतरी शक्तियों का बाहरी शक्तियों से क्या संबंध है । यह लैम्प जो जल रहा है और चारों ओर की हवा से उसमें ऑक्सीजन खिंचकर आ जाती है । जो भीतरी शक्तियां हैं, वे विशेष आकर्षण से बाहर की शक्तियों के साथ संबंध रखती हैं । जैसा संकल्प होता है, वैसा ही सामान प्राप्त हो जाता है । पाजिटिव (स्थिर) इलेक्ट्रिसिटी के साथ नेगेटिव (चंचल) इलेक्ट्रिसिटी स्वयं उत्पन्न हो जाती हैं, यह प्रकति का नियम है । इधर लड़कियां उत्पन्न होती हैं उधर प्रकृति लड़के भी उत्पन्न करती है । आप जानते हैं कि फूलों में भी नर-मादा (स्त्री-पुरुष) होते हैं । गोमती नदी के किनारे किसी स्थान पर मादा फूल है, किसी जगह नर फूल है । मधुमक्खी के द्वारा नर फूल का नर भाग मादा फूल तक पहुंचता है । जब आवश्यकता या इच्छा होती है तो सामान अपने आप प्राप्त हो जाते हैं । यही नियम आपके लिए हैं । जैसे आपके भीतरी संकल्प होंगे, वैसे ही बाहरी खयाल उत्पन्न हो जाएंगे । जब हिंदू-मुसलमानों ने मंदिर और मसजिदों में यों प्रार्थना की कि 'हम दास हैं, हमको नौकर राखो जी, मैं दास, मैं दास, मैं पापी, मैं अपराधी' तो आकर्षण-नियम को पूरा करने के लिए प्रकाश स्वरूप ज्योतियों के ज्योति रूप परमेश्वर ने गोरे चिट्टे चमकते-दमकते मुगलों और अंग्रेजों के तेजस्वी शरीर बना कर हमारी कामनाएं पूरी की और दास बना लिया । इसलिए यदि गरीब हो तो अपने बनाए हुए अपने खयाल से कैद में पड़े हुए हो, इससे अपने खयाल से ही छुटकारा हो सकता है ।
आइए, देखिए, कहां तक स्वतंत्रता है और कहां तक परतंत्रता ? कहां तक पुरुषार्थ और कहां तक प्रारब्ध है ? दोनों की कैफियत रेलगाड़ी और पटरी जैसी है । रेल स्वतंत्र भी है और परतंत्र भी । स्वतंत्र तो ऐसी, फुर-फुर चलती है और परतंत्र यों कि लकीर की फकीर है । इसी तरह आपके खयालों के साथ मस्तिष्क में पटरियां पड़ जाती हैं और बाहर से साज और समान प्राप्त हो जाते हैं और वह (Affinity) संबंध या संपर्क बाहर के समान इकट्ठा कर लेती हैं, तो भविष्य के लिए उन पटरियों पर रेल चलाना सहज हो जाता है । और यह भी सिद्ध है कि पुरानी पटरियां उखड़ सकती हैं । रेशम के कीड़े का उदाहरण लो कि स्वतंत्र भी है और परतंत्र भी । यह रेशम के निकालने में स्वतंत्र है और जब निकाल चुका तो उस कोए (रेशम के कोश) में फंसकर बद्ध हो जाता है । ऐसा ही तुम्हारा उदाहरण है कि—
''ऐ रोशनी-ए-तबा-तो बर मन बला शुदी ।''
अर्थात्—मेरी ही बुद्धि की योग्यता तो तुझ पर आफत हो गई । तुम्हारी स्वतंत्रता मुझे परतंत्र बना रही है । एक मनुष्य ने तमस्सुक लिख दिया कि इतने दिनों में रुपया दे दिया जाएगा । रुपया पैदा करने में स्वतंत्र था, तमस्सुक लिखने में स्वतंत्र था, और केवल अपने लिखने से आपसे बद्ध हो गया । इसी तरह मनुष्य स्वतंत्र होता हुआ भी अपने कर्म से आप बद्ध हो जाता है । कर्म अर्थात् अमल इसके लिए बंधन हैं ।
फिर प्रारब्ध की अधीनता में भी तुम स्वतंत्र हो । लोग आपत्ति करते हैं कि यदि ईश्वर एक है तो यह क्या कि किसी को अंधा और किसी को लूला उत्पन्न किया, किसी को अमीर किसी को गरीब बनाया ? राम कहता है कि यदि ईश्वर और हो और तुम्हारा स्वरूप और हो तो यह धब्बा अवश्य आएगा । और उसकी कृपालुता में अंतर पड़ेगा क्योंकि उसी पिता के समक्ष एक लड़का फूलों की सेज का सुख भोगता है, दूसरा लड़का कांटों में गिर रहा है, यह क्यों किया ? यदि ईश्वर के तुम बच्चे होते तो भेद-भाव का आरोप उचित था । लेकिन यथार्थ यह है कि ईश्वर से तुम भिन्न नहीं हो ।
यदि एक मनुष्य स्वयं ही नदी में गिरे, स्वयं ही श्मशान में जाए और स्वयं ही पागलखाने को, तो वह अत्याचार नहीं है । वह ईश्वर उधर अंग्रेज है, वही ईश्वर इधर मुसलमान है, वही ईश्वर हिंदू है, वही धनी, वही निर्धन, वही जिसको तुम पिता कहते हो, पुत्र बनकर प्रकट हो रहा है । एक बात और सुनिए सूर्य का प्रकाश सब जानते हैं कि श्वेत है, किंतु जब प्रकाश को (Prism) तिकोने शीशे से देखते हैं, तो मालूम होता है कि यह धोखा था । यहां सात रंग दिखाई देते हैं, यह क्या बात है, सात रंग और फिर सफेद, कारण ज्ञात हो या न हो, चाहे आप कुछ भी नहीं जानते, पर यह बात माननी पड़ेगी ।
तुम कहते हो कि यह फूल सफेद है, यह फूल गुलाबी है, यह हरा पत्ता है । साइंस वाले कहते हैं, यह कुछ भी नहीं । वह सिद्ध करके दिखा देते हैं । एक फूल अंधेरे में ले जाओ, फिर देखो वह वैसा ही मुलायम है, उसमें सुगंध भी वही है, वह ठंडा भी वैसा ही है, उसमें पंखुड़ियां भी उतनी ही हैं, लेकिन उसका रंग कहां गया ? रंग फूल में है ही नहीं, वह प्रकाश का रंग था, प्रकाश के साथ चला गया । पत्ती में कहते हो हरा रंग है—पत्ती पर एक प्रकार का मसाला या शक्ति है, जैसे फॉटोग्राफ के प्लेट पर हुआ करती है, जिसने छः रंगों को खा लिया या सोख लिया, लेकिन एक रंग, जिसको नहीं खाया, यही वह रंग है जो दिखाई देता है और जिसे हरा रंग कहते हैं ।
अब देखिये प्रकाश में सात रंग हैं, इनमें काला नहीं गिना जाता । काला रंग वह है जिसने प्रकाश के सातों रंगों को खा लिया, सफेद जिसने एक रंग को भी न लिया, सब त्याग दिया ।
प्यारे ! संसार में जितने रंग दृष्टिगोचर हो रहे हैं—यह शक्तियां, यह बुद्धि, यह समझ, यह विचारशीलता, ये सब शक्तियां एक ही परमात्मा, एक ही राम की हैं । यूं देखो तो सतरंगा और उस तरह देखो तो सारे रंग उसी के । उसी रंग का नाम माया है । इस संसार में कहते हैं कि मनुष्य शक्तिमान है, यह भी कहते हैं कि दाहिना हाथ अधिक शक्तिमान् होता है । इसलिए वह अधिक शक्तिमान् है कि वह उस हाथ की शक्ति को त्यागता रहता है अर्थात् व्यय करता रहता है । फूल जिस रंग को त्यागता है, वही रंग उसका होता है । प्यारे, जिस वस्तु को तुम त्यागोगे वही तुम्हारे पास आएगी । जिस वस्तु से तुम बेपरवाही करोगे अर्थात् मुख मोड़ोगे वही उपस्थित होगी । सूर्य के प्रकाश में यदि तुम छाया का पीछा करोगे तो वह तुम्हारे आगे भागेगी, और जिस समय तुम उसे त्यागोगे अर्थात् सूर्य की ओर मुख करके दौड़ोगे, तो वह तुमको पकड़ने दौड़ेगी ।
''गुलशन अज़ मतलब तमाम शब मतलब ।'' जिस रंग को सोखते हो, वह नष्ट हो जाता है और जिसको त्यागते हो, वह तुम्हारा हो जाता है । जिस समय यह इच्छा होती है कि सम्मान हो और जब तुम दूसरे का सम्मान करते हो तो तुम्हारा अपने आप सम्मान हो जाता है । जिस समय लोगों को प्यार देते हो तो चारों ओर से प्रीति तुम्हारी ओर दौड़ी हुई आती है ।
काले वह हैं, जिन्होंने सारे रंगों को अपने 'अहंभाव' में सोख लिया और कहा, ''मैं और हूं'', ''वह और है'' । जैसे वह स्वार्थी लड़का जिसका मैंने कल जिक्र किया था और जिसने जापान में किताब का वर्का (पेज) चुराया था । और गोरे वह हैं जिनका अमल त्याग पर है, जिनका कथन यह है कि मेरे रंग, मेरी जान सबकी जान, मेरा माल सबका माल, मेरा शरीर सबका शरीर, मेरी विद्या सबकी विद्या, मेरा ज्ञान सबका ज्ञान ।
जो मनुष्य सारे रंगों को त्यागता है उसकी आत्मा सबकी आत्मा है, जिसे फिर न कुछ ढूंढ़ना है और न कुछ लालसा है । वरन् जिसकी—
आरजू भी विसाले पर्दा है, आरजू है कि आरजू न रहे । जुस्तुजू भी हिजाबे-हस्ना है, जुस्तुजू है कि जुस्तुजू न रहे । तू को इतना मिटा कि तू न रहे, और तुझमें दुई की बू न रहे ।
अर्थात् मिलने की इच्छा ही भेद भाव है, इसलिए ऐसी इच्छा हो कि इच्छा ही न रहे, जिज्ञासा भी एक सुंदर परदा है, इसलिए ऐसी जिज्ञासा हो कि जिज्ञासा ही न रहे, दुई के भाव को इतना मिटा कि जीव भाव समूल नष्ट हो जाए और तुझमें द्वैत की गंध तक न रहे ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!