वेदांतिक प्राणायाम — भाग 2
तब आप देखेंगे कि आपने पुस्तकों द्वारा जिन तथाकथित तथ्यों को हृदय में बैठा रखा है, उन सबसे यही एकमात्र सत्य सर्वाधिक सर्वोच्च है । जिन तथाकथित तथ्यों को आप यथार्थ मानते हैं वे सभी वस्तुतः मिथ्या हैं, भ्रम हैं, एक ऐसा इंद्रजाल हैं जिसने आपको अपनी इंद्रियों द्वारा सम्मोहित कर रखा है । कृपया इंद्रियों के धोखे में न आएं ।
एक आदमी आपके पास आता है और आपमें दोष निकालता है तथा आपकी कटु आलोचना करता है, एक दूसरा व्यक्ति आता है और आपको गाली दे जाता है, तीसरा आता है और आपकी खुशामद करता है, आपकी प्रशंसा करता है, आपकी चापलूसी करता है । ध्यान रखें ये बातें तथ्य नहीं हैं । ये तो वास्तविकता से कोसों दूर हैं । आपको तो सत्य के ठोस तथ्य की अनुभूति करते रहनी चाहिए ।
इस सत्य का उच्चारण करते समय आप उन सब विश्वासों को बाहर निकाल फेंक दीजिए, निष्कासित कर दीजिए, उनको देश-निकाला दे दीजिए जिनको आपने बाह्य दृश्यगत परिस्थितियों में अभिव्यक्त कर रखा है । केवल इस तथ्य पर अपनी सारी शक्ति लगा दीजिए, केवल इस तथ्य पर अपनी संपूर्ण सामर्थ्य तथा अपना संपूर्ण बल लगा दीजिए कि 'केवल एकमात्र सत्य है ।' इस यथार्थ की अनुभूति कीजिए—
केवल एकमात्र सत्य है—ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
बहुधा आप देखेंगे कि 'केवल एकमात्र सत्य है'—इस विचार को पहली बार पढ़ने से आप प्रसन्नचित्त और आनंदित हो जाएंगे और आप सभी दुखों तथा कष्टों से अपने आपको ऊपर उठा लेंगे । पर यदि आप और आगे के वाक्य को पढ़ना चाहें तो ऐसा कर सकते हैं । अन्यथा जो कागज आपने अपनी जेब में रखा है यदि उसके एक ही वाक्य को आप जीवन में उतार सकें, उस पर व्यवहार कर सकें तो यही यथेष्ठ होगा ।
फिर भी यदि आप सोचते हैं कि आपको और अधिक शक्ति की आवश्यकता है तो अगला वाक्य पढ़िए—वह है—'वह सत्य मैं स्वयं हूं ।' अब आप अपने लक्ष्य के और समीप आ गए । ओह ! मेरा पड़ोसी मुझसे भिन्न नहीं है । मैं वहां भी उपस्थित हूं । वह सत्य मैं स्वयं हूं । ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
कृपया ध्यान दें । कुछ लोग कहते हैं कि जब आप 'ॐ'
का उच्चारण करते हैं या 'ॐ' का जाप करते हैं तो आपके हाथों की मुट्ठी बंद होनी चाहिए या आपको यह या वह अमुक कार्य या बात नहीं करना चाहिए । इस प्रकार का कोई बंधन नहीं है । उस विचार, उस सत्य की अनुभूति करते रहिए ।
जब आप मन को एकाग्र करने लगें, उस समय यह आवश्यक नहीं है कि आप किसी निश्चित स्थिति में ही बैठें, ऐसा कोई बंधन नहीं है ।
जब आप इस विचार, इस सत्य की अनुभूति कर रहे हों और इस विचार को अपनी श्वास-क्रिया से अंदर-बाहर करके शरीर में समाहित कर रहे हों तब शरीर की चिंता मत कीजिए । इस बात की भी चिंता मत कीजिए कि दूसरे लोग क्या कहेंगे ।
यदि आप उस समय गाना गाना चाहते हों तो गाना गाएं । यदि उस स्थिति में लेटने की आपकी इच्छा हो तो फर्श पर लेट जाएं । परंतु उस विचार, उस सत्य की अनुभूति निरंतर करते जाइए । यदि आप अपने ढंग से हाथ से तालियां बजाना चाहें तो ताली बजाइए । शरीर के व्यवहार के बारे में कोई बंधन नहीं है । परंतु उस विचार, उस सत्य की अनुभूति निरंतर कीजिए ।
अब 'सर्वशक्तिमान' का विचार आता है । इसका मनन कीजिए । यह कागज उन लोगों के लिए है जिन्होंने राम के भाषणों को सुना है । जिन लोगों ने इन व्याख्यानों को नहीं सुना है, उन्हें निःसंदेह इन बातों में अधिक रुचि नहीं होगी । जिन व्यक्तियों ने राम के भाषणों को सुना है, वे जानते हैं कि वास्तविक आत्मा सर्वशक्तिमान है, सर्वोच्च आत्मा सर्वशक्ति-संपन्न है ।
जिस प्रकार इस पृथ्वी पर हर चीज सूर्य के माध्यम से घटित होती है, उसी प्रकार इस संसार में हर चीज संपूर्ण शक्ति- संपन्न होने के कारण 'आत्मा' के माध्यम से ही संपन्न होती है । सूर्य के कारण ही हवा चलती है, सूर्य के कारण घास उगती है, सूर्य के कारण नदियां बहती हैं, सूर्य के कारण फूल खिलते हैं । इस प्रकार 'आत्मा' के कारण, सर्वशक्तिमान सर्वोच्च आत्मा के कारण ही इस ब्रह्मांड में हर एक दृश्य घटित हो रहा है । 'सर्वशक्तिमान', 'सर्वशक्तिमान' ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
इस प्रकार जो संदेह आपको दुर्बल बनाते हैं, आपको व्यग्र करते हैं, जो भ्रांतियां आपको कायर बनाती हैं, उन सबको आपकी पवित्र उपस्थिति में प्रवेश करने का किंचित अधिकार नहीं है । इसकी अनुभूति कीजिए कि आप सर्वशक्तिमान हैं ।
जिस प्रकार के आपके विचार होंगे, उसी प्रकार के आप बनेंगे । दूसरे शब्दों में जो आप सोचेंगे वही आप बनेंगे । आप अपने आपको पापी कहकर कहकर पुकारिए और आप अवश्य ही पापी बन जाएंगे । आप अपने आपको मूर्ख कहकर पुकारिए, आप अवश्य ही मूर्ख बन जाएंगे । आप स्वयं को दुर्बल कहकर पुकारिए, इस संसार में ऐसी कोई ताकत नहीं है जो आपको शक्तिशाली बना सके । बस, आप सर्वशक्ति की अनुभूति कीजिए और सर्वशक्ति-संपन्न हो गए ।
अब आप 'सर्वज्ञ' होने के विचार को लें । इस विचार का मंथन कीजिए, निदिध्यासन कीजिए, अपने मन को इस विचार पर केंद्रित होने दीजिए । 'ॐ' का उच्चारण कीजिए । 'ॐ' शब्द 'सर्वज्ञ' का द्योतक है, इसलिए 'ॐ' का उच्चारण कीजिए । जिस शब्द या जिस मंत्र का जाप करना है, वह है 'ॐ' । 'सर्वज्ञ' ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
इस प्रकार आगे बढ़िए, उन्नति कीजिए । जिन भ्रामक धारणाओं की मोहिनी से वशीभूत होकर आप अज्ञानी और मूर्ख बन गए थे, उन सभी धारणाओं को दूर, बहुत दूर फेंक दीजिए । ईश्वरत्व की अनुभूति का सबसे सीधा मार्ग बस यही है ।
इसी प्रकार 'सर्वव्यापी' के विचार का गहन अध्ययन करें । कृपया इसकी अनुभूति कीजिए कि आप सीमित नहीं हैं, आप परिच्छिन्न नहीं हैं, आप यह क्षुद्र शरीर नहीं हैं, आप यह तुच्छ अहंकार नहीं हैं, आप यह जीव नहीं हैं, आप यह अहंभाव भी नहीं हैं । जो प्रत्येक कण-कण में, अणु-अणु में व्याप्त है, विद्यमान है, वही आपकी वास्तविक आत्मा है । इसके बारे में आपके मन में किंचित संदेह नहीं होना चाहिए । 'सर्वज्ञ', 'सर्वज्ञ', 'सर्वज्ञ' मैं ही हूं । मैं ही सर्वज्ञ हूं जो हर वस्तु में व्याप्त है । सारे शरीर मेरे शरीर हैं—ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
अब राम को उन शेष वाक्यों की व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है जो इस कागज में दिए गए हैं । उन वाक्यों को अब आपके सामने सीधे-सादे ढंग से पढ़ दिया जाएगा । इस पद्धति का अभ्यास कीजिए, इस विधि का अनुसरण कीजिए । यदि आप एक सप्ताह में दिव्यात्मा तथा सत्य का साक्षात्कार नहीं कर लेते तो राम को झूठा और गलत समझिए ।
'मैं मूर्तमान संपूर्ण स्वास्थ्य हूं ।'
जिस शरीर को आप मेरा कहते हैं, यदि वह बीमार है, तो उसे एक ओर रख दें । उसके बारे में बिल्कुल भी सोचे नहीं । लेकिन यह अनुभव करते रहें कि आप स्वयं मूर्तमान स्वास्थ्य हैं । पूर्ण स्वास्थ्य आपका है । इसकी अनुभूति कीजिए । आपका शरीर अपने आप स्वस्थ हो जाएगा । यही रहस्य है । इसका परीक्षण कीजिए और निष्कर्ष निकालिए कि यह तथ्य है या नहीं । मैं निश्चयपूर्वक कहता हूं कि यही निष्कर्ष निकलेगा ।
आपके प्रयत्न बिना ही आपका शरीर ठीक हो जाएगा । आपको इस शरीर की चिंता नहीं करनी चाहिए—'हे ईश्वर ! मुझे भला-चंगा कर दीजिए ।' संस्कृत के धर्म-ग्रंथों में एक अति सुंदर मंत्र है—नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः । यह सत्य दुर्बल व्यक्ति द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता ।
क्या आप नहीं जानते हैं कि जब आप अमरीका के राष्ट्रपति या किसी राजा से भेंट करने जाएं और वहां याचक या भिखारी के रूप में पहुंचें, तो आपको निष्कासित कर दिया जाएगा, आपको उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी जाएगी । इसी प्रकार यदि आप याचक और भिक्षुक के रूप में ईश्वर के पास जाएंगे तो वहां से नीचे गिरा दिए जाएंगे ।
इसकी अनुभूति कीजिए कि आप मूर्तमान संपूर्ण स्वास्थ्य हैं । किसी चीज की भिक्षा मत मांगिए । कहिए, 'मैं स्वास्थ्य हूं ।' और देखिए, आप मूर्तरूप स्वास्थ्य बन जाएंगे ।
इसके बाद अगला विचार है—'संपूर्ण शक्ति मैं हूं ।' इस विचार को अपने मन में रखिए और ॐ ! ॐ !! ॐ !!! का उच्चारण कीजिए । इसी प्रकार कहिए 'संपूर्ण शक्ति मैं हूं ।'
तदुपरांत यह विचार आता है कि 'संपूर्ण ब्रह्मांड केवल मेरा स्वरूप मात्र है ।' इस तथ्य में आस्था रखिए और जब आप इस तथ्य पर मन में विचार करें तो मन ही मन उन तर्कों का मंथन कीजिए जिन्हें वेदांती विद्वान इस तथ्य को सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत करते हैं । इस यथार्थ को सत्य सिद्ध करने के लिए आपका जितना भी ज्ञान है, उसे मन में लाइए और उस पर गहन विचार कीजिए ।
यदि आपने इस यथार्थ के बारे में कुछ भी अध्ययन नहीं किया है या इस संबंध में कुछ भी नहीं सुना है जो यह सिद्ध करे कि संपूर्ण विश्व 'मेरा संकल्प' है तो भी इस यथार्थ पर आप अटूट आस्था रखिए, आप देखेंगे कि यह विश्व आपका संकल्प मात्र बनकर रह जाएगा । यह संसार 'मेरा संकल्प' है, ॐ का उच्चारण कीजिए और इसकी अनुभूति कीजिए । इसी प्रकार अन्य मंत्र इस प्रकार हैं:
संपूर्ण आनंद में हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
संपूर्ण ज्ञान मैं हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
संपूर्ण सत्य मैं हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
संपूर्ण प्रकाश में हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
निर्भय, निर्भय मैं हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
अनुराग रहित, विराग रहित मैं हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
संपूर्ण अभिलाषाओं की संपूर्ति मैं हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
मैं परमात्मा हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
मैं सभी कानों से सुनता हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
मैं सभी आंखों से देखता हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
सभी मस्तिष्कों में मैं सोचता हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
संत जिस एकमात्र सत्य को जानने की आकांक्षा करते हैं वह स्वयं मैं हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
जो जीवन और प्रकाश, सूर्य और तारों द्वारा चमकता है, वह मैं हूं ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
बस इस कागज, इस कृति के मंत्रों के मंतव्य का अंत यहां हो जाता है । इसी का उल्लेख राम ने इस भाषण के प्रारंभ में किया था ।
इस सत्य की और अधिक व्याख्या करने के लिए कुछ शब्द और कहना अभीष्ट है । हिंदू लोक-साहित्य में एक सुंदर कहानी का उल्लेख किया गया है—
एक समय एक बड़े पंडित या एक महान संत हुए । वे धर्म-ग्रंथों से पवित्र पाठों को पढ़कर कुछ श्रोताओं को उनका उपदेश समझा रहे थे । एक बार ऐसा हुआ कि जिस समय ये पंडितजी या संत महाराज धर्म-ग्रंथों के पाठों की व्याख्या कर रहे थे, उसी समय गांव की कुछ ग्वाल-बालाएं पंडितजी या संत के उपदेश-स्थल के पास से निकलीं ।
उन ग्वाल-बालाओं ने संत के मुख से निकले ये शब्द सुने—''ईश्वर का पवित्र नाम, परमात्मा का पुनीत नाम एक महान जल-पोत ( जहाज ) है, जो हमें भव-सागर से पार लगा देता है और यह भव-सागर ईश्वर के नाम के उच्चारण से ऐसा मालूम देने लगता है मानो एक छोटा-सा सरोवर हो । इससे अधिक भव-सागर की कोई महत्ता नहीं होती ।''
इस प्रकार का उपदेश उन सरल हृदयवाली ग्वाल-बालाओं ने सुना । उन ग्वाल-बालाओं ने इस उपदेश को अक्षरशः सत्य माना । इस उपदेश में उनका अनन्त, अटल विश्वास हो गया । उन ग्वाल-बालाओं को अपने दूध की बिक्री के लिए प्रतिदिन एक नदी को पार करके दूसरे किनारे जाना होता था । वे तो ग्वाल-बालाएं ही थीं । उन्होंने इस उपदेश पर मन ही मन सोचा ।
उन्होंने विचार किया कि यह तो पवित्र उपदेश है । धर्म-ग्रंथ में लिखा है, इसलिए यह गलत नहीं हो सकता है । इसे तो सत्य होना ही चाहिए । उन्होंने सोचा कि हम क्यों प्रतिदिन नाविक को नदी पार कराने के लिए पांच पैसे दें ? ईश्वर का पवित्र नाम लेकर और 'ॐ' का उच्चारण करते हुए हम नदी को क्यों न पार करें ?
उनकी आस्था वज्र के समान अटल थी । अगले दिन वे नदी के समीप पहुंचीं और बस, उन्होंने 'ॐ' का उच्चारण किया । आश्चर्य ! वे नदी में घुसकर आगे बढ़ने लगीं । उन्होंने नदी को पार कर लिया । वे डूबी नहीं । नदी को पार करने की उनकी यह क्रिया प्रतिदिन की हो गई । उन्होंने नाविक को पैसे देने बंद कर दिए । वे उन संत की आभारी थीं । उन्होंने उनके प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट की । उन्होंने ही तो 'ईश्वर का नाम' लेने का उपदेश दिया था । उस उपदेश को व्यवहार में लाने के कारण उनके काफी पैसे बच रहे थे ।
उन्होंने संत से विनती की कि वे कृपापूर्वक उनके घर आकर भोजन ग्रहण करें । संत ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली । यह भी निश्चित हो गया कि संत किस दिन भोजन करने के लिए उनके घर जाएंगे । निश्चित दिन एक ग्वाल-बाला सन्त को अपने साथ लेने आई । जब यह ग्वाल-बाला संत को अपने गांव ले जा रही थी तो वे मार्ग में आनेवाली नदी के समीप पहुंचे । बस, एक पल में वह ग्वाल-बाला तो नदी को पार करके दूसरी ओर पहुंच गई, परंतु संत नदी के पहलेवाले किनारे पर ही खड़े रहे । वे ग्वाल-बाला का साथ नहीं दे सके ।
थोड़ी देर बाद ग्वाल-बाला नदी में से होकर संत के पास पुनः पहुंची । उसने विनय की । साथ न चलने का कारण जानना चाहा । उसने जानना चाहा कि वे क्यों देर कर रहे हैं ? संत ने कहा कि वे नाविक की प्रतीक्षा कर रहे हैं । नाविक के बिना वे कैसे नदी पार करते ?
इस पर उस ग्वाल-बाला ने कहा—''महाराज ! सभी ग्वाल-बालाएं आपकी बहुत ऋणी हैं । आप हमारे ऊपर बड़े दयालु रहे हैं । आपकी कृपा से ही हम एक महीने में पूरे के पूरे 150 पैसे बचा सकीं । अब तो हम जीवन पर्यंत नाविक को नदी उतरवाई का कोई पैसा नहीं देंगीं । आप स्वयं नाविक को दिए जानेवाले पैसे को क्यों नहीं बचा लेते और मेरे साथ नदी के उस पार चलते ? आपके ही उपदेश और आपकी ही सलाह के कारण हम लोग बिना कोई क्षति उठाए, बिना कोई चोट खाए, नदी के उस पार पहुंच जाती हैं ।''
इस पर संत ने उस ग्वाल-बाला से पूछा कि उनका वह कौन-सा उपदेश था जिसके कारण उन बालाओं ने धन की बचत की । उस ग्वाल-बाला ने संत को उस उपदेश का स्मरण कराया जो उन्होंने एक बार दिया था । उपदेश था कि ईश्वर का नाम एक जल-पोत है, जो इस भव-सागर से पार लगा देता है ।
संत ने कहा कि बिल्कुल ठीक है, बिल्कुल सही है । उन्हें भी ऐसा करना चाहिए । उनके साथ अन्य साथी भी थे । संत ने एक बहुत लंबा रस्सा मंगवाया और उस रस्से को अपनी कमर में कसकर बांध लिया । उन्होंने अपने साथियों से कहा कि रस्से का शेष भाग वे अपने पास रखें । उन्होंने कहा कि वे ईश्वर का नाम लेंगे, नदी में कूद जाएंगे, आगे बढ़ेंगे और आस्था, विश्वास के बल पर नदी को पार करने की कोशिश करेंगे, पर यदि उनके साथी लोग यह देखें कि वे नदी में डूब रहे हैं तो उन्हें उनको ( संत को ) खींच लेना चाहिए ।
अंततः संत नदी में कूद पड़े, कुछ आगे बढ़े कि डूबने लगे । उनके साथियों ने उन्हें खींचकर बाहर निकाल लिया ।
कृपया ध्यान दें । जिस प्रकार का विश्वास उन संत का था, जिस प्रकार की आस्था को वे अपने व्यवहार द्वारा प्रतिदिन कर रहे थे और जिसका वे विश्वास दिला रहे थे, वास्तव में उससे आपकी किसी प्रकार की रक्षा नहीं हो सकती । वह तो आपके हृदय की कुटिलता है । जब आप ॐ का उच्चारण करने लगते हैं या जब आप ईश्वर का नाम लेने लगते हैं और दंभ से कहते हैं कि ''मैं मूर्तमान स्वास्थ्य हूं, मैं ही स्वास्थ्य हूं,'' तो वस्तुस्थिति यही होती है कि आप दिल ही दिल में, अपने हृदय के अंतस्थ में कांपने लगते हैं ।
आपके हृदय में घबराहट का, कंपकंपी का, भय का, शंका का वह बीज बना रहता है कि यदि कहीं ऐसा हो जाए तो ? यदि कहीं मैं डूबने लगूं तो मुझे बाहर निकाल लिया जाए । इस तरह अगर-मगर का चक्कर मन में बना रहता है । आपमें 'यदि' की तुच्छ हिचकिचाहट बनी रहती है । आपके मन में न तो विश्वास ही रहता है, न ही आस्था ।
यहां परिकल्पित मामले नहीं चलेंगे । यह एक अविश्वास है जो भेद-भाव कर देता है, उल्टा-पुल्टा कर देता है । तथ्य यह है कि इस संसार में जितनी भी परिस्थितियां हैं, उनके रचयिता आप हैं, ये परिस्थितियां आपके द्वारा ही बनाई गई हैं । किसी दूसरे ने नहीं बनाई हैं । आप दिव्यात्मा हैं, ईश्वरों के परमेश्वर हैं । इसकी अनुभूति कीजिए । इसी क्षण इसका साक्षात्कार कीजिए । दृढ़, अटल, निश्चल विश्वास रखिए और ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान का साक्षात्कार कीजिए ।
आप देखेंगे कि जिस विधि से मंत्रों के इस कागज को पढ़ने की विधि आज रात आपको बताई गई है, उसका प्रतिदिन निदिध्यासन करने से आपके सभी 'अगर-मगर', आपकी समस्त शंकाओं को निकाल बाहर कर दिया जाएगा जो आपको बांधे हुए हैं ।
अपने आपको निरंतर अपनी दिव्यात्मा के संसर्ग में बनाए रखने से छोटे-बड़े सभी अगर-मगर, शंकाएं आदि समाप्त हो जाएंगी । मंत्र के इस कागज को यदि आप प्रतिदिन पांच बार न पढ़ सकें तो दो बार अवश्य पढ़ें । आपकी सभी शंकाओं का समाधान हो जाएगा । छोटे-बड़े अगर-मगर भगा दिए जाएंगे, खदेड़ दिए जाएंगे ।
राम अब इस व्याख्यान को विराम देता है । आप लोगों में से जो लोग राम से थोड़ी-बहुत सामाजिक चर्चा करना चाहते हों, उन्हें चाहिए कि जब राम यहां से विदा ले, उसके बाद उससे वार्ता की जाए । राम यह आसन 'ॐ', 'ॐ', 'ॐ' की ध्वनि के उच्चारण के साथ छोड़ देगा ।
एक बात और । आप लोगों में से जिन लोगों ने पिछले व्याख्यानों को नहीं सुना है और इसलिए इस व्याख्यान को भी सही ढंग से नहीं समझ सके हैं, वे देखेंगे कि उनके हितार्थ यह संपूर्ण वेदांत-दर्शन अत्यंत सहज दार्शनिक रूप में एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर दिया जाएगा । आपके सामने संपूर्ण वेदांत-दर्शन की व्याख्या कर दी जाएगी । एक बात और, वेदांत-दर्शन पर आपके जो संदेह हैं या वेदांत के बारे में आपकी जो भ्रांतियां हैं, वे एक समय राम की भी रही हैं । उस दृष्टिकोण से आपके अनुभव और आपकी शंकाएं स्वयं राम की हैं । इन शंकाओं, भ्रांतियों का राम अनुभव कर चुका है, इनका समाधान भी राम कर चुका है ।
राम आपको आश्वस्त करता है कि आपके सभी संशय, शंकाएं वास्तव में आपकी दूषित अविद्या, अज्ञान है । आपकी ये सभी शंकाएं और संदेह क्षणभंगुर हैं, वे सभी एक पल में विलुप्त हो सकते हैं । यदि आपमें से कोई भी अपनी शंकाओं के समाधान के बारे में राम से विशेष रूप से चर्चा करना चाहता है तो वह कर सकता है । राम इस स्थान से इतनी जल्दी नहीं जानेवाला ।
इस बात को पुनः अत्यंत बल देकर कहा जा सकता है कि यदि आप दुःख-दारुण्य से छुटकारा पाना चाहते हैं, यदि आप पूर्ण आनंद की अनुभूति करना चाहते हैं, यदि आप अपनी मुक्ति पुनः सुनिश्चित रूप से प्राप्त करना चाहते हैं, यदि आप आत्म-साक्षात्कार करना चाहते हैं तो आपको अवश्य ही वेदांत का अनुभव करना होगा, वेदांत का साक्षात्कार करना होगा । अन्य दूसरा मार्ग है ही नहीं । आपके सभी मत-मतांतर, आपके सभी सिद्धांत, आपके सभी अन्य साक्षात्कार, केवल वेदांत की ओर आपको उन्मुख करते हैं । वे केवल आपको पूर्ण सत्य की ओर ले जाते हैं ।
ये अच्छे चिह्न हैं, आशाजनक संकेत हैं कि अमरीका में हाल में शुरू किए गए अधिकांश पंथों में वेदांत का समावेश हो रहा है और उनमें वेदांत के अनुशीलन पर जोर दिया जा रहा है । ये पंथ वेदांत को अंगीकार कर रहे हैं । इन पंथों को वेदांत के प्रति अपना आभार प्रकट करने की आवश्यकता नहीं है । क्रिश्चियन साइंस, नया दर्शन, अध्यात्मवाद या ईश्वरीय-विज्ञान आदि सभी के अनुयायी वस्तुतः दिव्यात्मा हैं । यह अमरीका के लिए एक बहुत ही बड़ा शुभ संकेत है ।
परंतु राम आपको स्पष्ट बतला देता है कि यदि आप संपूर्ण परिवेश में, संपूर्ण महिमा में सत्य का साक्षात्कार करना चाहते हैं तो बस एक ही अवलंब है—वेदांत का । आप इस वेदांत को जिस नाम की संज्ञा देना चाहें, दे दें, आप स्वतंत्र हैं । पर हिंदू धर्म-ग्रंथों में इस वेदांत को सर्वोच्च सच्चाई के साथ, सर्वाधिक सुस्पष्ट तरीके से उद्घाटित किया गया है ।
सर्वोच्च सत्य यही है कि आप दिव्यात्मा हैं, प्रभुओं के प्रभु हैं, ईश्वरों के परमेश्वर हैं । इसकी अनुभूति कीजिए, इसका साक्षात्कार कीजिए, कोई भी और कुछ भी आपका किंचित बाल-बांका नहीं कर सकता । आप महेश्वर हैं ।
'यह संसार मेरा संकल्प मात्र है, मैं प्रभुओं का प्रभु हूं ।' यही सत्य है । यदि आप इस प्रकार की बातें सुनने के अभ्यस्त नहीं हैं तो भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है । इससे क्या होता है यदि हमारे पूर्वजों ने इसमें आस्था प्रकट नहीं की ? आपके पूर्वजों से जितना भी अच्छा बन पड़ा, वह सब उन्होंने किया । आपको भी चाहिए कि जितने भी अच्छे से अच्छे कार्य आप संपन्न कर सकें, उन्हें अवश्य संपन्न करें । आपकी मुक्ति आपके माता-पिता या आपके पूर्वजों का दायित्व नहीं है ।
आपकी मुक्ति आपका अपना उत्तरदायित्व है । कृपया यह न सोचें कि वेदांत आपके लिए कोई भिन्न, कोई अजनबी वस्तु है । वेदांत तो आपके लिए सर्वाधिक स्वाभाविक है । क्या आपकी स्वयं की आत्मा आपके लिए गैर है, दूसरी है ? वेदांत तो आपको सीधे-सादे ढंग से आपकी स्वयं की आत्मा, आपकी सत्यात्मा के बारे में ज्ञान कराता है । यदि आपकी स्वयं की आत्मा आपके लिए गैर है, वह दूसरों की है तो वेदांत भी गैर है, वह आपका नहीं, दूसरों का है ।
वेदांत का साक्षात्कार करने से सभी कष्ट, सभी दुःख तुरंत ही दूर हो जाते हैं, चाहे ये दुःख, ये कष्ट शारीरिक हों, मानसिक हों, नैतिक हों, आध्यात्मिक हों । इसका साक्षात्कार करना, इसकी आत्मानुभूति करना, कोई कठिन कार्य नहीं है । यह तो वस्तुतः आपका अपना ही स्वभाव है ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!