श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

शिवादर्श

अध्याय 2 / 5 · ॐ — एक पवित्र मंत्र
अध्याय 2 / 5

शिवादर्श

अब हम ईश्वर की उसके कई रूपों में विवेचना करेंगे । एक क्षीर-सागर है जो अत्यंत विस्तृत और विशाल है, जिसमें पूरे के पूरे ब्रह्मांड समाहित हैं । वहां एक अति सुंदर, अति अद्भुत शेषनाग है, जो कुंडली मारे बैठा है । उस कुंडली से उसने एक अत्यंत कोमल शैया तैयार कर रखी है । उस शेषनाग के हजारों फन हैं, जो छत्र-छाया कर रहे हैं । ऐसे अनुपम क्षीर-सागर में, उस अनोखी सेज पर भगवान विष्णु, विश्राम-मुद्रा में लेटे हैं । साथ में उनके पैरों के निकट बैठी हैं उनकी सहचरी, दिव्यातिदिव्य, सुंदरतम देवी लक्ष्मी । उन देवी का शरीर पारदर्शी है । उनके नेत्र आधे मुंदे हैं और ओंठों पर मुस्कराहट बिखरी है । लक्ष्मीजी विष्णु भगवान के पैरों को धीरे-धीरे सहला रही हैं ।

दिव्य देवी लक्ष्मीजी एक सुंदर और चित्ताकर्षक कमल के फूल पर विराजमान हैं और उसी कमल पर बैठकर वे विष्णु-भगवान के पैरों को दबा रही हैं, उनको धीरे-धीरे मल रही हैं । विष्णु भगवान और लक्ष्मी देवी के नेत्रों का पारस्परिक मिलन हो रहा है । वे दोनों एक-दूसरे के नेत्रों में एकटक देख रहे हैं ।

अब बतलाइए कि लक्ष्मी देवी किस बात की ओर संकेत करती हैं ? वे प्रतिनिधित्व कर रही है—दिव्यता का, बुद्धि का, परम चिद् का, परम कल्याण का, परमानंद का । देवी लक्ष्मीजी वस्तुतः विष्णु भगवान की स्वयं की महिमा हैं । इसका तात्पर्य यह है कि मुक्त आत्मा निरंतर स्वयं के महिमा-मंडन को देखती रहती है । यह आत्मा उस समय भी शुद्ध, मुक्त, नित्य बनी रहती है जब संपूर्ण संसार प्रलय में लीन हो जाता है । विष्णु भगवान सभी रिश्त-नातों से परे हैं । वे हर प्रकार के बंधनों से मुक्त हैं । उन्हें इस संसार से कोई प्रयोजन नहीं । वे सबसे परे हैं ।

क्षीर सागर का अर्थ है अनंतता । ऐसा क्यों कहा जाता है कि क्षीर-सागर दुग्ध से परिपूर्ण है ? दुग्ध के तीन गुण हैं—एक तो वह प्रकाश स्वरूप है, दूसरे वह परमेश्वर है अर्थात वह कल्याण स्वरूप है और तीसरे, वह स्फूर्ति स्वरूप है, जिसका अर्थ शक्ति है । इस प्रकार अनंत प्रकाश, अनंत कल्याण, अनंत शक्ति की ओर संकेत करता है क्षीर सागर । ऐसे परिवेश में विद्यमान हैं विष्णु भगवान और लक्ष्मी देवी ।

अब शेषनाग से क्या तात्पर्य है ? शेषनाग का अर्थ है वह जो शेष है, जो पूर्ण है और जो सबकी समाप्ति के बाद भी अक्षुण्ण बना रहता है । जब सर्पिनी अपने हजारों अंडों का प्रजनन करती है, तो वह उन अंडों को खाने लगती है जिनको उसने पैदा किया है । हर एक की मृत्यु हो जाती है, केवल एक ही शेष रहता है ।

इस कल्याण, ज्ञान और शक्ति के क्षीर सागर में केवल एक ही अमर है, अक्षय है । विष्णु भगवान और लक्ष्मी देवी एकाकार होकर स्वयं की महिमा में पूर्णरूपेण आनंद, शांत और निश्चल हैं ।

राम अब आपका ध्यान दो महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर आकृष्ट करना चाहता हैः 1. क्षुद्रात्मा का खंडन, 2. सत्यात्मा का मंडन ।

प्रथम—वेदांत के अनुसार क्षुद्रात्मा के खंडन की स्थिति है—पूर्ण विराम, उपराम, आराम, चैन और त्याग । जब कभी भी आप समय निकाल सकें, अपने शरीर को कुर्सी या पलंग पर फेंक दीजिए, मानो आपने कभी भी उस शरीर का भार या बोझ उठाया ही न हो, उस शरीर से आपका कोई लेना-देना ही न रहा हो और वह शरीर आपसे उतना ही अनभिज्ञ हो जितना कोई पत्थर का टुकड़ा । आप अपने शरीर को निर्जीव मुर्दे की तरह विश्राम करने दें और मन को किसी प्रकार के संकल्प-विकल्प से विरत रहने दें, जिससे कोई तनाव न रहे, कोई दबाव न रहे (इसे शवासन भी कहते हैं) ।

अपने शरीर से सभी प्रकार की आसक्तियों, मोह और ममता को हटा दें । आप अपने शरीर की अथवा अन्य किसी चीज की चिंता और अनुराग से अपने मन को मुक्त रखिए । सभी प्रकार की अभिलाषाओं या महत्वाकांक्षाओं का परित्याग कर दीजिए, उनका तिरस्कार कर दीजिए । यही है क्षुद्रात्मा का खंडन और विश्राम की परम स्थिति ।

द्वितीय—ईश्वरत्व । (सत्यात्मा का मंडन) । कृपया ईश्वर की इच्छा को अपनी इच्छा बनाइए । ईश्वर की इच्छा चाहे सुख के लिए हो या दुःख के लिए, इसकी परवाह किए बिना ईश्वर के उद्देश्य की उसी प्रकार रक्षा कीजिए, उसकी उसी प्रकार पूर्ति कीजिए, मानो वह उद्देश्य आपका ही, स्वयं का है ।

'आत्म-साक्षात्कार' के विषय पर राम ने पहले जो व्याख्यान दिया था, उसके निर्देशानुसार आप अनुभव कीजिए कि आप अपने शरीर से और शारीरिक परिस्थितियों से परे हैं, उनसे ऊपर हैं । आप मन से और मानसिक संकल्प-विकल्पों से परे हैं । उनसे ऊपर हैं । आप सफलता-असफलता, प्रेम या भय से भी ऊपर हैं । आप अपने आपको सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक शक्ति, सूर्यों के सूर्य के रूप में अनुभव कीजिए । यह अनुभव कीजिए कि आप कार्य-कारण और दृश्यगत परिवेश से परे हैं, आप महान विश्वों के साथ तदाकार हैं, आप सच्चिदानंद हैं, आप मुक्त स्वरूप राम हैं ।

'ॐ' का उच्चारण कीजिए और जो लय या तान आपके हृदय से स्वतः निकल रही है उसी में 'ॐ' का गायन कीजिए । अनुभव कीजिए कि आप पूर्ण आनंद, परिपूर्ण आनंद, सच्चिदानंद हैं । इस प्रकार आपकी शिकायतों, कष्टों, दुःखों के मूल कारण अपने आप ही आपकी उपस्थिति मात्र से विलुप्त हो जाएंगे । यह विश्व और आपकी परिस्थितियां ठीक वैसी हैं जैसा आप उनके बारे में सोचा करते हैं । आप अपने हृदय पर संसार के बोझ को भारी मत होने दीजिए ।

इस सत्य पर दिन-रात मनन कीजिए कि विश्व के सभी समाज और सभी लोक-मत केवल आपके संकल्प मात्र हैं और आप ही वह आदिशक्ति हैं जिसकी श्वास या प्रतिच्छाया मात्र ही यह संपूर्ण संसार है । आप अपने लक्ष्य की सर्वोच्च ऊंचाइयों को क्यों नहीं प्राप्त करते हैं, कारण साफ है कि आप अपने निकटस्थ 'अस्ति', अपनी निकटतम सर्वोच्च वास्तविक सत्ता की अपेक्षा दूसरे लोगों के अस्थिर, चंचल और अस्पष्ट निर्णयों के प्रति अधिक विनम्र और विनीत हैं ।

राम का आपसे अनुरोध है कि आप अपनी आत्म-शक्ति पर जिएं । दूसरे लोगों की सम्मतियों के लिए जीवित रहने की आवश्यकता नहीं है । मुक्त रहिए, निर्द्वंद रहिए । बस, बिना किसी झिझक के, बिना कोई समय खोए, केवल एक स्वामी—अपनी सत्यात्मा, अपने वास्तविक पति-परमेश्वर, अपने अंतस्थ ईश्वर को प्रसन्न करने का प्रयत्न कीजिए । आप किसी भी तरह अधिकांश लोगों को, संपूर्ण जनता को, बहुमत को संतुष्ट करने में समर्थ नहीं हो सकते और न ही हजारों सिरोंवाली विक्षिप्त जनता को संतुष्ट करने का आपका कोई दायित्व ही है ।

क्या आप किसी भी बात के लिए जनता के प्रति ऋणी हैं ? क्या आप लोगों के प्रति किसी भी प्रकार का ऋण चुकाने के लिए बाध्य हैं ? नहीं, बिल्कुल नहीं । आप अपने स्वयं के निर्माता हैं । आप अपने आपको ही गाकर सुनाइए, मानो आप ही अकेले हैं और पास में आपको सुननेवाला कोई भी नहीं है । जब आपकी स्वयं की आत्म संतुष्ट हो जाएगी तो निश्चित है कि जनता भी संतुष्ट हो जाएगी । यही नियम है । दूसरों के लिए अप्राकृतिक, अस्वाभाविक जीवन जीने से क्या लाभ है ?

एक बार एक राजकुमार दरबारियों के लड़कों के साथ लुका-छिपी का खेल खेल रहा था । राजकुमार को लड़कों को ढूंढ़ने में बहुत कठिनाई हो रही थी । पास में खड़े एक सज्जन से नहीं रहा गया । वह कहने लगा—''इन साथी खिलाड़ियों को ढूंढ़ने में राजकुमार इतनी परेशानी क्यों उठा रहे हैं ? यदि राजकुमार अपनी राजसी सत्ता का उपयोग करें और अपने साथियों को एकत्र होने की आज्ञा दें तो सबके सब लुका छिपी के अपने-अपने स्थानों से निकलकर सामने आ जाएंगे ।''

इस प्रकार के प्रश्न का उत्तर यही है कि ऐसा करने से, राज-सत्ता के उपयोग द्वारा खेल का सारा मजा ही किरकिरा हो जाएगा, खेल में कोई रुचि नहीं रहेगी ।

इसी प्रकार राम कहता है कि वास्तव में आप सर्वोच्च शासक हैं, आप सर्वज्ञ, सबकुछ जाननेवाली दिव्यात्मा हैं । परंतु जब आपने मजाक में ही सही, सभी प्रकार के विचारों और तथाकथित ज्ञान के रूप में विद्यमान अपनी समस्त प्रजाओं को इस संसार के बड़े लुका छिपी खेल के गोरख धंधे में ढूंढ़ने का काम ही प्रारंभ कर दिया है तो सत्य विचारों की खोज के खेल को अपनी राजसत्ता का उपयोग करके रोकना उचित दांव नहीं होगा, क्योंकि इस राजसत्ता के प्रयोग से तो खेल का पूरा मजा ही भंग हो जाएगा, खेल की भावना ही समाप्त हो जाएगी ।

उस खेल के मैदान में, उस क्रीड़ा-स्थल में, जहां भूत, भविष्य और वर्तमान तथा हजारों सूर्य और तारे केवल आपके स्वयं की आत्मा हैं, आपके ज्ञान-सागर में ज्वार-भाटे की तरह भांति-भांति की लहरें मात्र हैं, आपको विधि-विधानों की, परीक्षाओं और सांसारिक सफलताओं की क्या परवाह, क्या चिंता होनी चाहिए ? यदि आप दिव्य दूर दृष्टि प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको उस इंद्रियजनित क्रीड़ा-स्थल को छोड़ना होगा । उन इंद्रियों से ऊपर उठना होगा जिनके द्वारा आप दिव्य दूरदृष्टि प्राप्त करने का निरर्थक प्रयत्न कर रहे हैं । मछली पकड़ने के लिए एक जाल डाला गया । मछली जाल में तो फंस गई, लेकिन अपनी प्रचंड शक्ति के कारण जाल लेकर ही वह भाग निकली । ईश्वर को यह सलाह या यह परामर्श मत दीजिए कि उसे किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए । ईश्वर पर अपनी इच्छा मत थोपिए, मत आरोपित कीजिए उसे, जिसे आप सही मानते हैं । केवल अपने आपको ईश्वर के सम्मुख समग्र रूप से समर्पित कर दीजिए क्षुद्रात्मा का परित्याग कर दीजिए, दूषित अभिलाषाओं को तिलांजलि दे दीजिए ।

इस प्रकार आप अपने शरीर और मन को प्रकाश से परिपूर्ण कर लेंगे और स्वयं को दिव्यता के प्रकट होने का पूर्ण साधन बना लेंगे । जो भी वास्तविक ज्ञान है, वह अंतःकरण से, अंतस्थ से प्राप्त होता है । पुस्तकों अथवा दूसरों के मस्तिष्क के बाह्य साधनों से वास्तविक शिक्षा नहीं मिल सकती । अनुसंधान के क्षेत्र में जो भी प्रतिभा-संपन्न व्यक्ति और शोधकर्त्ता हुए हैं, वे केवल उस समय अपने आविष्कारों को पूरा कर सके जब वे ब्रह्म के, ईश्वर के, परिपूर्णता के विचार में निमग्न थे, इंद्रियजनित लोक से काफी ऊपर थे, किसी प्रकार की कामना और एषणा (वासना) की चाह से परे थे और जब उन्होंने अपनी मानसिकता तथा व्यक्तित्व को स्वार्थपरता की हर प्रकार की प्रवृत्ति से मुक्त बना लिया था ।

उन्होंने पारदर्शी दर्पण बनकर ज्ञानार्जन किया और फिर उन्हीं के माध्यम से ज्ञान को प्रकाश प्रस्फुटित किया । उन्होंने पुस्तकों द्वारा प्रकाश को आलोकित किया, पुस्तकालयों तथा पुस्तकों के भंडार को समृद्ध बनाया, पुस्तकालय उनको प्रबुद्ध न कर सके ।

वास्तविक कार्य यही है । कार्य से राम का मंतव्य कभी भी मंथर गति से निरर्थक कठोर श्रम नहीं है । वेदांत में कार्य का तात्पर्य सदैव सत्यात्मा, वास्तविक आत्मा के सामंजस्यपूर्ण, तरंगपूर्ण संबंध और ब्रह्मांड से तादात्म्य स्थापित करना है । एकमात्र सत्य से निःस्वार्थपूर्ण अभेदता ही वेदांत के अनुसार वास्तविक कार्य है । इस कार्य को अज्ञानी लोग 'अकाम' या 'आलस्य' की संज्ञा देकर दुष्प्रचार करते हैं ।

कृपया राम का 'सफलता का रहस्य' व्याख्यान एक बार फिर पढ़िए । वेदांत भावना से, वेदांत के निर्देशों के अनुसार किया गया सर्वाधिक श्रमसाध्य कार्य भी बस एक खेल मात्र ही प्रतीत होता है । इसमें किंचित बोझ या थकान अनुभव नहीं होती । इस प्रकार, वेदांत दर्शन के सिद्धांतों और उपदेशों में स्पष्ट किया गया है कि एक दृष्टिकोण से जो सर्वोत्कृष्ट कार्य कहा जाता है, वह दूसरे दृष्टिकोण से बिल्कुल नाममात्र का कार्य भी नहीं होता ।

हिंदू पुराणों में ईश्वर के दो रूप बतलाए गए हैं । वैसे हर धर्म के तीन पक्ष होते हैं—एक है दर्शन, दूसरा है कर्म-कांड, और तीसरा है पुराण । दर्शन तो विद्वानों के लिए है, कर्म-कांड जन-सामान्य के लिए है और पुराण अथवा पौराणिक गाथाएं विचारशील लोगों के लिए हैं । इन तीनों पक्षों को साथ-साथ, ताल-मेल के साथ, समुचित रूप से चलना होता है । यदि एक भी पक्ष कमजोर हुआ या पीछे रह गया तो वह धर्म टिक नहीं सकता ।

हिंदू धर्म-ग्रंथों में इन तीनों पक्षों का पूर्ण संतुलन तथा समन्वय है । इसीलिए आज भी तीस करोड़ लोग हिंदू धर्म के प्रति निष्ठावान हैं । इन तीस करोड़ लोगों का धर्म 'हिंदू धर्म' है । जिस धर्म में इन तीन पक्षों में से किसी एक भी पक्ष की कमी होती है, वह सच्चा धर्म नहीं हो सकता । हिंदू धर्म में ये तीनों पक्ष पूर्णावस्था में हैं । हिंदू पुराणों से राम आप लोगों को 'पूर्ण मानव' या 'दिव्यात्मा' के बारे में बतलाएगा जिसको हिंदू लोग अपने-अपने मन में सदा बसाए रखते हैं ।

हिंदू धर्म-ग्रंथों में ईश्वर के दो पक्ष, दिव्यात्मा के दो स्वरूप बतलाए गए हैं । एक पक्ष है पूर्ण धवल, महान, ऐश्वर्यपूर्ण, सर्वज्ञ परमेश्वर का जिनकी प्रतिभाशाली, प्रभासंपन्न आकृति है, जो हिमालय के सर्वोच्च शिखर पर विद्यमान हैं, जो ध्यानावस्थित और विचारमग्न हैं, जिनके नेत्र मुंदे हैं, जो संसार के प्रति चेतनाहीन हैं, जो चिदानंद की जीवंत मूर्ति हैं । उन्हें दुःख, दारुण्य, कष्ट, विषाद छू तक नहीं गए हैं, वे सभी चिंताओं सभी उद्विग्नताओं से मुक्त हैं । वे स्वतंत्र हैं, स्वच्छंद हैं । उनके लिए इस संसार का कभी अस्तित्व रहा ही नहीं । यह उस परमात्मा का एक पक्ष है । वे स्वतंत्र, उन्मुक्त, नित्य दिव्यात्मा हैं । ऐसे हैं शिव । धवल तो हिमालय का परिचायक है, जहां मन शांत, निश्चल, अटल हो जाता है ।

इनके साथ ही वहां उस परमेश्वर—उस 'शिव' की सहधर्मिणी भी बैठी हैं । उनका रंग सिर से पैर तक तेजोमय गुलाबी है । वे परमेश्वर—'शिव'—के चरणों के पास बैठी हैं । वे सहधर्मिणी-पार्वतीजी अपने पति के लिए हर समय जड़ी-बूटियां, वनस्पतियां पीसा करती हैं और अन्य तेज रस तैयार रखती हैं । ज्यों ही परमेश्वर-शिव अपने नेत्र खोलते हैं, उनकी सहधार्मिणी पार्वतीजी तुरंत ही उस मदमत्त रस से परिपूर्ण प्याला उनके ओंठों से लगा देती हैं जिसको तैयार करने में पार्वतीजी स्वतः ही निमग्न रहा करती हैं ।

इससे शिवजी पुनः अपनी ध्यानावस्था में, तुरीयावस्था में तल्लीन हो जाते हैं । तब पार्वतीजी संपूर्ण ब्रह्मांड के बारे में शिवजी से प्रश्न पूछती हैं और शिवजी पार्वतीजी को सब स्पष्ट करते हैं । पार्वतीजी हिमालयराज की पुत्री हैं, परंतु परमेश्वर-शिवजी के सन्निकट होने और उनके सान्निध्य में रहने के कारण उन्होंने सबकुछ परित्याग कर दिया । ऐसे हैं शिवजी और ऐसे हैं शंभूजी, और ऐसी है पार्वतीजी, ऐसी हैं गिरजाजी ।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!