'ॐ' एक पवित्र मंत्र — भाग 2
आप प्रश्न कर सकते हैं कि यह कैसे है ? कृपया आप अपने वैज्ञानिकों, दार्शनिकों तथा हक्सले, स्पेंसर जैसे विद्वानों के मत तथा विचारों पर ध्यान दें । ये सभी जाग्रत संसार की वास्तविकता पर अत्यधिक बल देते हैं । फिर उनके अनुभव जगत् के मिथ्यात्व को किस प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं ?
कृपया विचार करें । क्या आप इन महापुरुषों की सर्वोत्कृष्ट अथवा निकृष्टतम सभी प्रकार की धारणाओं पर विश्वास कर लेंगे ? आप इन लोगों के विचारों पर ध्यान नहीं देंगे, जो ये लोग सोते समय या खर्राटे लेते समय व्यक्त करते हैं ? किस अवस्था में ये महापुरुष अपनी सर्वोत्कृष्ट चरम सीमा पर होते हैं ? उनका सर्वोत्तम स्वरूप केवल उस समय प्रकट होता है, उस समय वे सभी प्रकार का श्रेय तथा समादार प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं, जब उनके अंतस्थल से ज्ञान का स्रोत स्वतः फूटने लगता है, ज्ञान स्वतः निर्झर होने लगता है ।
जब ये महापुरुष अपनी सर्वोत्कृष्ट अवस्था में हों, उस समय इनके पास जाइए और इनका निरीक्षण कीजिए, तब आप देखेंगे कि उनके शरीर का रोम-रोम, उनकी त्वचा का प्रत्येक बाल, विश्व की अवास्तविकता, संसार के मिथ्यात्व की अनवरत व्याख्या कर रहे होते हैं और अद्वैत का उद्घोष कर रहे होते हैं । ऐसी अवस्था में 'मेरे-तेरे' की भावना नहीं होती, किसी प्रकार का द्वैत, विविधाकार व्यक्तित्व या संसार का नामोनिशान नहीं रहता । सारा दृश्यमान जगत अस्तित्वहीन बन जाता है । उस समय विचारक एकाग्र चिंतन की स्थिति में, अमूर्तता की स्थिति में, परिपूर्ण स्थिति में, उस परम उत्कृष्ट स्थिति में प्रतिष्ठित रहता है जहां सारे ज्ञान नैसर्गिक रूप से उससे प्रवाहित होते हैं ।
यह एक ऐसी स्थिति है जहां स्वाभाविक रूप से सभी ज्ञान उससे उसी प्रकार निकलते हैं जिस प्रकार सूर्य से प्रकाश निकलता है । उसकी ऐसी परम स्थिति होने के कारण वह बातचीत नहीं करता । परंतु जब वह अपनी परमावस्था से निकलता है, तभी उससे वार्ता फूटती है, आविष्कार तथा खोज और उत्कृष्ट से उत्कृष्ट विचारधारा प्रवाहित होने लगती है ।
इस प्रकार, जब सभी महान विचारक अपनी अनुपम अवस्था में होते हैं तभी उनके वास्तविक अनुभव संसार के अद्वैत को सिद्ध करते हैं । इस सत्य को और अधिक स्पष्ट किया जाएगा । जब आप विचार करते हैं तब आप क्या करते हैं ? जब आप किसी विषय पर विचार करते हैं तो आप उसकी विवेचना करते हुए आगे बढ़ते हैं । आप अन्य सभी विषयों को छोड़ देते हैं और उस विषय के प्रकरण पर ही सोचते हैं, आप अपने पूरे मन से केवल उस प्रकरण पर ही सोचते हैं, आप अपने पूरे मन से केवल उस प्रकरण पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं ।
तभी आपकी समस्त शक्तियां, सभी ऊर्जा उस विशेष प्रकरण पर ध्यानावस्थित हो जाती हैं । तभी आपका मन उस प्रकरण से, उसके विचारों से परिपूर्ण हो जाता है । परिणाम यह होता है कि इस परिपूर्ण ध्यानावस्था में वह प्रकरण स्वतः पलायन कर जाता है और निरपेक्ष तथा चेतनातीत स्थिति पैदा हो जाती है । ऐसी निरपेक्ष चेतना उत्पन्न हो जाती है, जो सभी ज्ञान के स्रोत का मुखद्वार है ।
मनोविज्ञान के एक प्रसिद्ध नियम के अनुसार यदि आप किसी पदार्थ के बारे में सचेत होना चाहते हैं तो उस पदार्थ के विचार के अतिरिक्त आपके मन में अन्य किसी पदार्थ का विचार नहीं होना चाहिए । परंतु यदि आपके मन में अन्य पदार्थों का विचार आता है तो अभीष्ट पदार्थ पर एकाग्रता नहीं हो सकती । दूसरे पदार्थों का विचार आने से द्वैत उत्पन्न होता है । परंतु जब मन में द्वैत नहीं हो अर्थात अद्वैत की भावना से आपका मन परिपूर्ण हो तो सभी प्रकार की पदार्थ-चेतना शांत हो जाती है और इस तरह प्रेरणा के स्रोत बिंदु की प्राप्ति होती है ।
जब टेनीसन 'लार्डटेनीसन' होने के अस्तित्व के सभी विचारों से परे होते थे, तभी वे कवि टेनीसन बन सके । जब वर्कले में आधिपत्य की कोई भावना नहीं रहती थी, जब वे संरक्षण-च्युत पादरी होते थे, केवल तभी विचारक वर्कले का आविर्भाव होता था । जब ह्यूम अपने व्यक्तित्व से ऊपर उठ जाते थे । जिसका उल्लेख उनके चरित्र-लेखक करते हैं, केवल तभी दार्शनिक ह्यूम उभरते थे । जब हक्सले वह हक्सले नहीं रहते थे जिसे इतिहासकार चित्रित करते हैं, वरन जब वे पूर्ण होते थे, केवल तभी वे वैज्ञानिक हक्सले बन पाते थे ।
जब हमारे द्वारा कोई महान और अद्भुत कार्य संपन्न होता है तो हमारे लिए उसका श्रेय लेना मूर्खतापूर्ण भूल है, क्योंकि जब वह कार्य संपादित किया जा रहा था, उस समय श्रेय प्राप्त करने का इच्छुक 'अहंकार' वहां था ही नहीं । यदि यह अहंकार होता तो उस महान कार्य का सौंदर्य ही विनष्ट हो गया होता । उस समय 'मैं यह महान कार्य कर रहा हूं' की चेतना पूर्ण रूप में अनुपस्थित रहती है, उसका अस्तित्व नहीं होता । जो महान कार्य होता है, वह ईश्वर द्वारा अपने आप ही संपादित होता है ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि यदि हम इन महापुरुषों, विचारकों या महान लेखकों के निर्णयों, उनकी सम्मतियों पर उनके उत्कृष्ट स्वरूप में विचार करें तो हम देखेंगे कि वे अपने कर्मों द्वारा नहीं अपने शरीर के प्रत्येक रोम-रोम से यही अभिव्यक्त कर रहे होते हैं, यही उपदेश दे रहे होते हैं कि संसार मिथ्या है । ''कर्म का उद्घोष शब्दों के उद्घोष से अधिक प्रतिभा-संपन्न होता है ।''
युद्ध-क्षेत्र में हम अनेक महान वीरों और नायकों को युद्ध करते हुए देखते हैं । जब इनकी चरमोत्कर्ष स्थिति होती है तभी वे निरंतर युद्ध करते रहते हैं । भले ही बंदूकों की गोलियों की बौछार तेजी से और अबाध गति से होती रहती हो, एक गोली इधर से गिरती हो, उधर एक घाव लगता हो, उनके शरीरों से खून के फव्वारे फूटते रहते हों, उनका शरीर छलनी-छलनी होता जाता हो, फिर भी वे निर्भय होकर, निडर होकर पूरे मनोयोग से आगे, और फिर और आगे ही बढ़ते जाते हैं ।
ऐसी स्थिति में उनका शरीर वस्तुतः कोई शरीर नहीं रहता और बाह्य जगत भी कोई जगत नहीं रह जाता । ऊर्जा की परिभाषा में वे तो इस जगत तथा शरीर को मिथ्या सिद्ध कर रहे होते हैं ।
पश्चिमी संसार के महान नायक जैसे नेपोलियन, वाशिंगटन विलिंगटन तथा अन्य महावीर अपने कृत्यों से सिद्ध करते हैं, वे अपनी तुच्छ बुद्धि के बावजूद आपको स्पष्ट करते हैं कि जब वास्तविक आत्मा दृढ़तापूर्वक अपने को आरोपित करती है तभी संसार विलीन हो जाता है । वास्तविक आत्मा तो सच्चिदानंद है, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण शक्ति है । केवल यह आत्मा ही वह ठोस सत्य है जिसके सामने संसार की दृश्यमान वास्तविकता की परिसमाप्ति हो जाती है ।
वह कौन-सा तत्व है जो योद्धा की भुजाओं को सशक्त बनाता है ? वह तत्व है, सच्ची आत्मा की कठोर, निश्चल और अटल वास्तविकता से तादात्म्य स्थापित करने का सत् ।
वे कौन-से कारण हैं जिनसे मन को अनेकानेक अन्वेषण तथा खोज करने की प्रेरणा मिलती है ? कारण यह है कि मन या बुद्धि थोड़े समय के लिए ही सही, सच्ची आत्मा-ईश्वर की निष्ठुर तथा दृढ़ सत्ता में विलय हो जाती है, तभी प्रेरणा मिलती है । यही सच्ची आत्मा आप हैं । आप ही एकमात्र वास्तविकता हैं । आप ही ब्रह्मांड के प्रकाशक हैं, प्रभुओं के प्रभु, पवित्रों में पवित्रतम, उच्चों में सर्वोच्च उच्च आप ही हैं ।
'ॐ' मंत्र, अ, उ, म् की संधि है । 'अ' अक्षर निश्चल सत्य अर्थात आपकी आत्मा का प्रतिनिधित्व करता है, जो जाग्रत अवस्था के भ्रामक भौतिक संसार में व्याप्त होकर अपनी अभिव्यंजना करता है । 'उ' अक्षर मानस संसार का प्रतिपादन करता है और अंतिम अक्षर 'म्' पूर्ण आत्मा की अभिव्यक्ति करता है, जो 'अज्ञात' तत्व का रूप लेकर अव्यवस्थित स्थिति में व्याप्त होकर अपनी अभिव्यंजना करता है ।
जब बुद्धिमान व्यक्ति 'ॐ' का उच्चारण करते हैं, उस समय वे निश्चल वास्तविकता के रूप में 'आत्मा' का साक्षात्कार करने के लिए अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर देते हैं । उस ध्यान में संपूर्ण भावनाओं का समावेश कर देते हैं । यही निश्चल वास्तविकता ठीक उसी प्रकार तीनों संसारों में व्याप्त है, ठीक उसी प्रकार तीनों संसारों का ही संहार करती है जिस प्रकार सूर्य सर्वत्र व्याप्त है, परंतु सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय अपने सातों रंगों की छटा बिखेरकर, मन मोह लेता है । कुछ समय के बाद दोपहर और फिर शाम होने के पहले ही सूर्य अपने उदय और अस्त होनेवाली अपनी मनमोहिनी छटा अपने में समेट लेता है ।
ये तीनों संसार भासमान और दृश्यमान हैं । आप अपनी स्वप्नावस्था में एक भेड़िया देखते हैं । डर जाते हैं कि कहीं भेड़िया आपको खा न जाए । आप भयभीत हो उठते हैं । परंतु वास्तविकता यही है कि वह भेड़िया नहीं है, जिसे आप देखते हैं, वह तो आप स्वयं हैं जो भेड़िए के रूप में प्रकट हुए हैं । इसी प्रकार वेदांत आपको बतलाता है कि जाग्रतावस्था में भी 'वह आप ही हैं' जो अपने मित्र के रूप में प्रकट होते हैं । आप दोनों हैं । आप सूर्य हैं और जलाशय भी, जिसमें सूर्य का प्रतिबिंब पड़ता है । आप दीपक हैं और पतंगा भी । जो भी आपको अपना घोर से घोर शत्रु दिखाई देता है, वही शत्रु आप हैं, अन्य कोई नहीं ।
जब आप 'ॐ' का उच्चारण करें, उस समय आपको अपने मन को शाश्वत सत्य के साक्षात्कार के अपने अभ्यास के उस चरम पर केंद्रीभूत करना चाहिए, जहां मन से सभी प्रकार की ईर्ष्या और द्वेष का समूल नाश हो जाए और इन दोषों को बाहर निकालकर फेंक दिया जाए । द्वैत के भाव, भिन्नता के भाव को बिल्कुल समाप्त कर दें । मित्र-शत्रु, नाम-रूप केवल स्वप्न-मात्र हैं । आप ही मित्र हैं और आप ही शत्रु । कल जो बातें आप कर चुके, क्या वे आज आपके साथ हैं ? क्या वे कृतियां स्वप्न नहीं बन गई हैं ? वे तो समाप्त हो गई हैं । वे भूतकाल के गर्भ में चली गईं । वे अब कहां हैं ? क्या आप अभी भी सोचते हैं कि वे समाप्त नहीं हुई हैं ? वे तो कभी की विलीन हो गईं !
इस परिप्रेक्ष्य में, इस अर्थ में भी जाग्रतावस्था के अनुभव स्वप्न मात्र हैं । स्वप्नावस्था के अनुभव तो स्वप्न होते ही हैं । इन सब दृश्यगत संसारों के पीछे विद्यमान रहती है—वास्तविक, कठोर, नकद और निश्चल सचाई, सच्ची आत्मा । इसकी अनुभूति कीजिए ।
कुछ लोग ऐसे हैं जो विचारों को ही ठोस भौतिक आधार प्रदान करना चाहते हैं और सभी भौतिक पदार्थों का केवल विचारमात्र के रूप में साक्षात्कार कर सत्य की उपेक्षा करते रहते हैं । वे मानते हैं कि मानस संसार या विचारों के संसार की तुलना में भौतिक धरातल ही वास्तविक है । वेदांत के अनुसार, भौतिक तथा मानस, दोनों संसार मिथ्या हैं । आपको इन दोनों संसारों से ऊपर उठना होगा, क्योंकि निश्चलता, वास्तविक शांति, आनंद उसी समय प्राप्त किया जा सकता है, जब आप इन सब संसारों, इन भासमान दृश्यों के पीछे की सत्यता, नकद वास्तविकता का साक्षात्कार कर लें ।
'अ', 'उ', 'म्' में 'अ' अक्षर की कभी-कभी किसी मंत्र या किस अन्य रूप की संज्ञा दी जाती है । 'उ' का भी इसी प्रकार बहुधा किसी मंत्र या किसी विशेष रूप के नाम से उच्चारण किया जाता है । 'म्' को भी किसी मंत्र या किसी निर्दिष्ट रूप से विभूषित किया जाता है । परंतु 'ॐ' या 'ओउम्' किसी मंत्र या रूप पर अवरुद्ध नहीं होता । वह तो सत्य, नकद वास्तविकता का प्रतीक है । जितने भी मंत्र हैं, उन सबमें यही वास्तविकता, यही सत्यता प्रवाहित होती है । लोग कहते हैं—''हमें जीवन चाहिए, ठोस वस्तु चाहिए, हम केवल विचार-मात्र नहीं चाहते हैं ।''
ओह ! किस प्रकार के जीवन की आपको अपेक्षा है ? क्या आप उस जीवन को चाहते हैं, जो जाग्रतावस्था का है ? निर्णय आपको करना है कि आपको कौन-सा जीवन पसंद है । वास्तविकता, सच्चा जीवन तो आपकी स्वयं की आत्मा है । वह ऐसा कठोर विधान है, जो आपको कभी भी इंद्रियों के माध्यम से सुखों की अनुभूति करने की आज्ञा नहीं देगा । क्या आपके लिए यह कभी संभव है कि आप अपने आपको इंद्रियों को समर्पित कर दें, इंद्रियों के हाथ अपने को बेच दें और फिर भी आनंद से भरपूर रहें ? कदापि नहीं, यह असंभव है ।
विधान यही है जो सर्वाधिक निष्ठुर, अविचलित, निश्चल है और वह आपको इंद्रिय-भोगों में आनंद लेने की अनुभूति करने की अनुमति नहीं देता । आत्मा ही वास्तविक जीवन है, नकद वास्तविकता है । इसका साक्षात्कार कीजिए । फिर ये भौतिक सुख आपको ढूंढ़ने के लिए उसी प्रकार दौड़ेंगे, जिस प्रकार पतंगा प्रज्ज्वलित दीपक के पीछे दौड़ता है, जिस प्रकार नदी समुद्र से मिलने के लिए व्याकुल रहती है, जिस प्रकार एक छोटा कर्मचारी अपने महान सम्राट के प्रति अपना सम्मान प्रकट करने के लिए परेशान रहता है ।
जब आपने अपनी सच्ची आत्मा को, अपनी दिव्य प्रभुता को, अपनी वास्तविक सत्ता-संपन्न आत्मा को सकल रूप में जान लिया और उसकी अनुभूति कर ली तो सारे सुख, सारे आनंद आपके पास स्वतः ही आएंगे । 'ॐ' इस आत्मा का प्रतिपादन करता है । आपके सामने यह स्पष्ट रूप से सिद्ध किया जा चुका है कि 'अ', 'उ', 'म्' की संधि से बने मूल मंत्र द्वारा हिंदू लोग, विशेषकर वेद और उसके आधारभूत सत्य को आत्मसात करने का गुर प्राप्त करते हैं । आधारभूत सत्य आप ही हैं । 'ॐ' का तात्पर्य सभी दृश्यमान, भासमान परिवेश के पीछे अधिष्ठान, सत्य से है । 'ॐ' शाश्वत सत्य है । 'ॐ' अविनाशी आत्मा है । यही आत्मा आप हैं । इसलिए जब आप 'ॐ' के पवित्र मंत्र का गायन करें, उस समय आप अपनी बुद्धि, अपने शरीर को अपनी वास्तविक आत्मा में विलीन कर दें ।
इस सत्य का साक्षात्कार कीजिए और इसको आप भावना की भाषा में गाइए, अपने कर्मों द्वारा गाइए, अपने शरीर के रोम-रोम से इसे गाइए । इस सत्य को आप अपनी नस नाड़ियों में प्रवाहित कीजिए । इस सत्य का आप अपने हृदय में स्पंदन कीजिए । इस सत्य को आप अपने रक्त की प्रत्येक बूंद द्वारा और अपने शरीर के प्रत्येक रोम द्वारा अपने से एकाकार कीजिए ।
सत्य यह है कि आप ही प्रकाशों के प्रकाश हैं, प्रभुओं के प्रभु हैं, आप ही वास्तविक आत्मा हैं । सूर्य तथा चांद-तारों को आपने अपने हाथों से बनाया है और आसमान तथा पृथ्वी तो आपकी अपनी कृतियां हैं । हर वस्तु, प्रत्येक पदार्थ, आपकी प्रभुता, आपकी महिमा का उद्घोष कर रहे हैं और सकल प्रकृति आपका सम्मान प्रकट करने के लिए नतमस्तक है ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!