'ॐ' एक पवित्र मंत्र — भाग 1
पिछले दिनों पवित्र मंत्र 'ॐ' के कतिपय पक्षों की संक्षिप्त व्याख्या की गई थी और यह भी स्पष्ट किया गया था कि 'ॐ' मंत्र की पूर्ण विवेचना सात या आठ व्याख्यानों में समाप्त नहीं की जा सकती । इस मंत्र के विषय में संस्कृत भाषा में अनेक ग्रंथ लिखे जा चुके हैं । और आज भी इस 'प्रणव' के बारे में रचनाएं लिखी जा रही हैं । वास्तव में सभी वेद, सभी वेदांत और हिंदुओं के अन्य पवित्र धार्मिक ग्रंथ 'ॐ' के इसी मंत्र में समाहित हैं ।
भारत में विभिन्न संप्रदाय हैं, लेकिन सभी संप्रदाय 'ॐ' के प्रति भावभीनी तथा हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं । यहूदी हो या मुसलमान अथवा ईसाई—सभी अपनी-अपनी प्रार्थनाओं को 'ओमन्' शब्द से समाप्त करते हैं । मुसलमान भी ऐसा करते हैं, परंतु वे 'आमीन' शब्द का उच्चारण इस प्रकार करते हैं जिससे 'ई' पर जोर पड़ता है ।
आप लोग, अमेरिका तथा यूरोपवासी भी अपनी साधारण प्रार्थना में 'ओमन' शब्द का प्रयोग करते हैं । 'ओमन' शब्द का आपकी प्रार्थना में क्या योगदान है ? जहां सभी वाणी रुक जाती हैं, जहां सभी वार्ताओं का अंत होता है, जहां दिव्यता में आत्मा का विलय हो जाता है, उस स्थान पर, उस बिंदु पर 'ओमन' का आविर्भाव होता है । इसलिए आप उस समय तक हृदय की भाषा प्रवाहित करते रहें, जब तक आप उस बिंदु तक न पहुंच जाएं, जहां आपका संपूर्ण अस्तित्व दिव्यता में विलीन न होने लगे ।
जब अकथनीय, अनिर्वचनीय, अव्यक्त स्थिति आती है, तभी 'आमीन' का प्रादुर्भाव होता है । यह 'आमीन' क्या है ? यह 'ॐ' है, ॐ के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है । आपकी सभी पवित्र प्रार्थनाओं में 'ओमन' या 'आमीन' शब्द का वही स्थान है, जो वेदांत शब्द का है अर्थात वाणी की परिसमाप्ति । इस अर्थ में 'आमीन' का वेदांत से सटीक मेल है । यह 'आमीन' शब्द वेदांत के सार-तत्व के अत्यंत निकट है । वेदांत 'ॐ' है ।
वेदांत का शाब्दिक अर्थ है—ज्ञान का अंत, वाणी का अंत । यह उस स्थिति पर प्रकाश डालता है जहां सभी वाणी, सभी विचार विराम पाते हैं । हिंदुओं के मत में 'ॐ' द्वारा ही संपूर्ण वेदांत का प्रतिनिधित्व होता है । जिस परिप्रेक्ष्य में, जिस अर्थ में वेदों में ॐ का प्रयोग हुआ है, उसकी महत्ता अब आपको बतलाई जाएगी । 'ॐ'—है 'अ', 'उ' और 'म' की संधि ।
तंत्र की साधना करनेवाले अपने ढंग से 'ॐ' की व्याख्या करते हैं, शैव अपने अलग ढंग से, वैष्णव अपनी विचारधारा के अनुसार 'ॐ' की विवेचना करते हैं । अन्य हिंदू संप्रदाय 'ॐ' की महत्ता पर अपने-अपने निराले ढंग से प्रकाश डालते हैं । परंतु इस समय 'ॐ' की जो व्याख्या आपके सम्मुख प्रस्तुत की जा रही है, वह सार्वभौमिक है । यह व्याख्या वेदांत के अनादि स्रोत के मुख-केंद्र से निर्गत होती है ।
'ॐ' या 'ओ३म्', तीन अक्षरों 'अ', 'उ' 'म' की संधि है । वेदांत शास्त्र के मतानुसार, 'अ' की ध्वनि तथाकथित भौतिक संसार, दृश्यमान ठोस संसार, सकल इंद्रियों के संसार और उस सबका प्रतिनिधित्व करती है, जो जाग्रत-अवस्था में दिखाई देता है । स्वप्न लोक के सभी अनुभव 'उ' की ध्वनि से परिलक्षित होते हैं । यहां स्वप्नावस्था में देखनेवाला और दिखाई देनेवाली सभी वस्तुएं, दोनों ही दृष्टा तथा दृश्य सभी 'उ' ध्वनि से व्यक्त किए जाते हैं ।
मानस या परा-लौकिक संसार, आत्माओं के विश्व तथा सभी प्रकार के नरक और स्वर्ग 'उ' ध्वनि से स्पष्ट परिलक्षित किए जाते हैं । 'म्' ध्वनि दर्शाती है—सुषुप्ति अर्थात गहननिद्रा की वह अवस्था जिसमें सम्मिलित है—सभी अज्ञात जगत, यहां तक कि जाग्रत अवस्था की वह संपूर्ण स्थिति भी, जो अज्ञात है, जो बुद्धि की समझ से परे है ।
इस प्रकार 'ॐ' अर्थात्, 'अ' 'उ' 'म्' ध्वनि मानव के तीन प्रकार के सभी अनुभवों को अपने में समाहित किए है ।
'ॐ', 'उ', 'म्' में एक वह सामान्य सिद्धांत भी निहित है जिसे अमात्रा की संज्ञा दी जाती है । इस अमात्रा से तात्पर्य है—उस अविनाशी, निर्विकार तथा वास्तविक अधिष्ठान से, जो तीनों प्रकार के दृश्यों—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति में व्याप्त है और सभी में प्रवाहित है । इस अमात्रा की पूर्ण व्याख्या किसी अन्य व्याख्यान में की जाएगी । इस समय इतना ही कहना पर्याप्त है कि 'ॐ' सर्व, संपूर्ण का प्रतिनिधित्व करता है ।
यूरोप तथा अमरीका के सभी दर्शन, जाग्रत अवस्था के अनुभवों पर आधारित हैं और स्वप्नलोक तथा सुषुप्ति अवस्था के अनुभवों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते । हिंदू कहते हैं—''आप अपूर्ण आंकड़े लेकर विचार प्रारंभ करते हैं । तब फिर ब्रह्मांड की समस्या के बारे में आपका हल या उत्तर कैसे सही होगा ?''
ये दार्शनिक अपने आपको जाग्रत अवस्था तक ही सीमित करते हैं । मिल, हैमिल्टन, वर्कले, यहां तक कि स्पेंसर तथा अन्य दार्शनिक केवल जाग्रत अवस्था के अनुभवों के आधार पर अपने-अपने आविष्कार तथा खोजें करते हैं । इन अनुभवों से ये दार्शनिक सभी शक्ति, सभी ऊर्जा या उस शाश्वत आधार आदि के स्रोत के शीर्षस्थ स्थल की खोज करना चाहते हैं ।
यहां पर ध्यान देने की बात यह है कि यदि आपको कोई गणितीय समस्या दी गई है और उसको हल करने के लिए कहा गया है तब आपको सभी तर्कों तथा तथ्यों, प्रतिज्ञाओं और परिकल्पनाओं पर विचार करना होगा । जब संपूर्ण आंकड़े न लेकर केवल उनके एक ही भाग पर आप विचार करेंगे तो आप किस प्रकार समस्या का सही समाधान निकाल सकेंगे ?
वेदांत आपसे समस्त आंकड़ों को लेकर विचार करने के लिए आग्रह करता है । आपके आंकड़े तीन प्रकार के हैं । आपके सांसारिक अनुभव तीन प्रकार के हैं और इन सभी पर विचार किया जाना चाहिए । जाग्रत अवस्था के संसार में स्वप्न व सुषुप्ति इन दो अवस्थाओं के संसार पूर्णतः विलुप्त हो जाते हैं । फिर भी आप अर्थात 'आत्मा', स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थाओं में विद्यमान रहते हैं । आप इनमें मृत नहीं हैं ।
सुषुप्ति अर्थात गहन निद्रा अवस्था में आपकी बुद्धि और व्यक्तिगत चेतना समाप्त हो जाती है, फिर भी वास्तविक आत्मा अर्थात आपकी वास्तविक 'अस्ति' वहां भी एक रस में व्याप्त है । यह अपरिवर्तनीय, शाश्वत तथा निर्विकार सिद्धांत है । यह वास्तविकता स्थायी रूप से आपकी सच्ची आत्मा या आपकी वास्तविक अस्ति के रूप में तीनों अवस्थाओं में समान रूप से प्रवाहित होती है । यही 'ॐ' है ।
आपको अपने मस्तिष्क, मन या बुद्धि को अपने आत्मदेव के रूप में मान्यता देने का कोई अधिकार नहीं है । आप कैसे जानते हैं कि इस संसार का अस्तित्व है ? आप किस प्रकार जानते हैं कि यह ब्रह्मांड है ? क्योंकि आप पदार्थों का स्पर्श करते हैं, वस्तुओं को देखते हैं, बातों को सुनते हैं, स्वाद लेते हैं और चीजों को सूंघते हैं, केवल यही तो प्रमाण है ।
यदि आप कहते हैं कि चूंकि विक्टर ह्यूगो, रॉबर्ट इंगरसोल, इमरसन तथा अन्य विचारकों ने इस संसार में इतना अधिक लिखा है, इसलिए संसार का अस्तित्व अवश्य होना चाहिए । परंतु राम आपसे पूछता है कि आप कैसे जानते हैं कि धार्मिक पुस्तकें भी हैं ? यह सब आप अपनी इंद्रियों के माध्यम से जानते हैं । आपकी इंद्रियों ही इस संसार के अस्तित्व के बारे में एकमात्र प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रमाण हैं ।
संवेदनशीलता सभी बोधों तथा बुद्धिजनित ज्ञानों आदि का मौलिक कारण है । यह संवेदनशीलता केवल आपकी जाग्रत अवस्था तक सीमित नहीं है । आपकी जाग्रत अवस्था में आपकी इंद्रियां स्थूल रूप में हैं । परंतु क्या आप अपने स्वप्नों में नहीं देखते हैं ? क्या आप स्वप्नों में इंद्रियों का प्रयोग नहीं करते हैं ? क्या आपके इंद्रिय-अवयव स्वप्नलोक की विशेषताओं के अनुरूप नहीं बन जाते ? स्वप्न में आपके बाह्य नेत्र और बाह्य कर्ण काम नहीं करते हैं । स्वप्नलोक में आप इंद्रियजनित पदार्थों की रचना करते हैं और साथ ही इनसे अनुभव प्राप्त करने के लिए इंद्रियों के विशेष अवयवों या तदनुकूल इंद्रियों का भी निर्माण करते हैं ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि स्वप्नलोक में इंद्रियां और इंद्रियों द्वारा अनुभव किए जानेवाले पदार्थ एक ही शक्ति के धनात्मक तथा ऋणात्मक ध्रुव हैं, या एक प्रकार से दोनों एक ही सिक्के के दो उलट-पुलट पहलू हैं । स्वप्न में दृष्टा तथा दृश्य, दोनों एक साथ प्रकट होते हैं । स्वप्न के दृष्टा तथा दृश्य का उद्भव 'ओ३म् अर्थात 'अ', 'उ', 'म' की ध्वनि से होता है । स्वप्नलोक की आधारभूत वास्तविकता, जिसमें दृष्टा एवं दृश्य दोनों ही प्रकट होते हैं, वस्तुतः सच्ची आत्मा अर्थात 'ॐ' है, इसके अलावा और कुछ नहीं है ।
वेदांत के अनुसार जाग्रत अवस्था में आपकी इंद्रियां तथा दृष्टगत पदार्थ एक-दूसरे से एक ही शक्ति के धनात्मक एवं ऋणात्मक ध्रुवों की भांति जुड़े रहते हैं । स्वप्न में भी यद्यपि पदार्थों की उत्पत्ति तुरंत और तत्क्षण होती है । फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि इन पदार्थों का अपना एक लंबा भूतकाल रहा होगा । इसी प्रकार जाग्रत अवस्था में संसार के पदार्थों का अपने-अपने पुराने इतिहास सहित चेतन दृष्टा के साथ, एक साथ ही प्रादुर्भाव होता है ।
जब आप यह कहते हैं कि यह संसार वास्तविक है, ठोस है, स्थूल है तो आपका यह कथन दृष्टा के साक्ष्य पर निर्भर है । यह स्थिति एक प्रकार से स्वप्न देखनेवाले अहंकारी दृष्टा के समान है, जो स्वप्न में देखी गई वस्तुओं को स्वप्न काल में वास्तविक मानता है । इसकी तुलना चित्रपट पर बनी तस्वीर में अपने कुत्ते को वास्तविक कहे । परंतु तथ्य यही है कि दोनों ही मिथ्या हैं, वास्तविक नहीं हैं ।
वह क्या था, जिसके कारण इंद्रियों का अस्तित्व हुआ ? केवल तत्व ही थे । आप इन तत्वों का ज्ञान किस प्रकार प्राप्त करते हैं ? केवल इंद्रियों के माध्यम से । क्या वह वृत्त में घुमा-फिराकर एक ही बात को सिद्ध करनेवाला तर्क नहीं है ? इस तर्क विधा से जाग्रत अवस्था में संसार की मिथ्या प्रकृति सिद्ध होती है । जब तक आप स्वप्नलोक में अपना स्वप्न देख रहे होते हैं, उस समय तक दृष्टगत पदार्थ वास्तविक ही लगते हैं । जब हम सोकर जाग्रत अवस्था में उठते हैं तब स्वप्न लोक के पदार्थ, जागने पर विद्यमान नहीं रहते हैं ।
जाग्रत अवस्था में सभी वस्तुएं सभी पदार्थ ठोस तथा स्थूल होते हैं । जब हम सुषुप्ति अवस्था में अर्थात गहन निद्रा की अवस्था में होते हैं, तब यह प्रत्यक्ष संसार कहां रहता है ? यह संसार कहीं भी नहीं रहा, चला गया, समाप्त हो गया । इस प्रकार हम स्पष्ट रूप से देखते हैं कि वास्तविकता की परिभाषा जाग्रत अवस्था के दृश्यों अथवा स्वप्न अवस्था पर सही तथा समान रूप से लागू नहीं होती । दूसरे शब्दों में, दोनों ही अवास्तविक हैं ।
हिंदू 'वास्तविकता' की परिभाषा इस प्रकार करते हैं—'वास्तविकता' वह है जो सभी परिस्थितियों में एक समान विद्यमान रहे । जो दृश्य एक क्षण दिखाई दे और दूसरे क्षण छाया की तरह विलुप्त हो जाए, वह भ्रमात्मक या मायावी दृश्य है । यही परिभाषा हरबर्ट स्पेंसर ने भी की है ।
आप यह क्यों कहते हैं कि स्वप्नलोक अवास्तविक है ? केवल इसलिए, क्योंकि जब आप निद्रा से जाग जाते हैं तो स्वप्न लोक विलीन हो जाता है । तब फिर 'अवास्तविकता' की यही मूल परिभाषा जाग्रत अवस्था पर क्यों लागू नहीं होती ?
जब आप स्वप्नलोक या सुषुप्ति अवस्था में होते हैं, उस समय तो जाग्रत अवस्था में आपके संसार का अस्तित्व ही नहीं रहता । 'ॐ' अर्थात अ, उ, म् में अ की ध्वनि इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि जाग्रत अवस्था के प्रत्यक्ष दृष्टा, अधिष्ठान सत्ता 'मैं' की अभिव्यंजना मात्र है ।
मनुष्य के हृदय को किस प्रकार पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण ने पराभूत कर रखा है ? लोग कहते हैं कि ''मेरे पास ठोस नकदी है ।'' यह वास्तविकता है, यह स्थूल साकार प्रतीत होनेवाला विश्व है ।'' ऐ मूर्ख ! केवल एकमात्र ठोस सत्य आपकी आत्मा है । यह सत्य अपरिवर्तनीय है । आपकी आत्मा अमर है । केवल यही वास्तविकता एवं ठोस सत्य है । शेष तो इंद्रियों का भ्रम जाल है ।
कुछ लोग इस निष्कर्ष को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि इन लोगों की यह मान्यता है कि स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थाएं जाग्रत अवस्था की प्रतिद्वंद्वी हैं, इसलिए संसार के मिथ्या जाल को ये लोग स्वीकार नहीं करते । ऐसे लोगों के विचारार्थ कुछ बातों की व्याख्या की जाएगी ।
इस पृथ्वी के पूरे धरातल के आधे से कुछ अधिक भाग में हमेशा रात्रि होती है और रात्रि में पृथ्वी की लगभग आधी जनसंख्या या तो स्वप्नलोक या सुषुप्ति अवस्था में रहती है । प्रत्येक व्यक्ति ठीक उसी प्रकार स्वप्नलोक के अनुभवों से गुजरता है जिस प्रकार उसे जाग्रत अवस्था के अनुभवों से गुजरना होता है । क्या संपूर्ण शिशु-काल एक लंबी निद्रा का समय नहीं है ? इस पर भी ध्यान दीजिए कि मृत्यु भी एक लंबी निद्रा ही है ।
आप अपने जीवनकाल के प्रथम तीन या चार वर्षों में लगातार सोते ही रहते हैं । अब आप अपने संपूर्ण जीवनकाल की गणना कीजिए कि कितने घंटे आपने जाग्रत अवस्था में व्यतीत किए । आप यह देखकर आश्चर्यचकित होंगे कि आपका आधा जीवन तो सोने में ही व्यतीत हो गया और आधा जीवन जाग्रत अवस्था में । तब आपको क्या अधिकार है कि आप केवल उन्हीं बातों और घटनाओं पर विचार करें जो जाग्रत अवस्था में घटित हुई हों और उन बातों पर कोई ध्यान न दें जो सोने के समय घटित हुई हों । क्या आप उस समय मृत हो जाते हैं जब आप सोते रहते हैं ? कदापि नहीं । आपके स्वप्नलोक के अनुभव भी तो अनुभव हैं । तब इन पर विचार क्यों न किया जाए ?
यदि जाग्रत अवस्था, स्वप्नलोक से अधिक शक्तिशाली हो तो ऐसा क्यों है कि सभी व्यक्ति, यहां तक कि शक्तिशाली से शक्तिशाली व्यक्ति, बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति, बिना किसी अपवाद के प्रत्येक रात्रि अपने-अपने हाथ-पैर फैलाकर निद्रा देवी को गोद में चले जाते हैं, चाहे उन्हें पलंग पर लेटना पड़े या सोफे पर या अन्य शैया पर ।
निद्रा का कठोर नियम किसी भी व्यक्ति के जाग्रत रहने की, उसकी उत्कृष्ट अभिलाषा पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता । जिस प्रकार स्वप्न अवस्था का अपना स्वयं का संसार है, उसी प्रकार जाग्रत अवस्था का भी । अतएव यदि आपका ध्यान आकर्षित करने का जाग्रत संसार का अधिकार है तो स्वप्नलोक का भी । आपको उचित ढंग से इन पर विचार करना चाहिए ।
अमरीका तथा यूरोप निवासी प्रत्येक वस्तु को बहुमत के दृष्टिकोण से निर्धारित करते हैं । यदि ऐसा है तो स्वप्न तथा सुषुप्ति अवस्थाओं को अपना मत देने का अधिकार होना चाहिए । यदि अवस्था के अनुभवों के आधार पर स्वप्नावस्था के अनुभव 'अवास्तविक' हैं तो स्वप्नलोक के अनुभवों के आधार पर जाग्रतावस्था के अनुभव 'मिथ्या' हैं ।
यह भी देखिए कि पेड़-पौधे वास्तव में सुषुप्ति की दशा में सतत रहते हैं और पशु निरंतर स्वप्नावस्था में । ऐसा ही है । जिस प्रकार का जगत आपको अर्थात मानव को प्रतीत होता है, उससे बिल्कुल भिन्न इन पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों जीव-जंतुओं को । तब फिर पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के अनुभवों पर विचार क्यों न करें ? चींटी के नेत्रों, उल्लू के नेत्रों, हाथी के नेत्रों के लिए संसार की चीजें वैसी नहीं हैं जैसी आपके नेत्रों के लिए हैं । उनके लिए चीजों का स्वरूप बिल्कुल भिन्न है । परंतु आप कहते हैं कि केवल मानव के अनुभवों पर ही विचार करना चाहिए और उसके जाग्रतावस्था अथवा जाग्रत संसार को ही वास्तविक मानना चाहिए । परंतु यदि आप सही परिप्रेक्ष्य में सभी पूर्व महापुरुषों के अनुभवों पर ध्यान दें तो केवल यही विचार आपको आश्वस्त कर देगा कि यह ठोस प्रतीतात्मक संसार मिथ्या है ।