॥ दोहा ॥
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बह बार साखि गौरीस॥28॥
भावार्थ:- रावण के समान शूरवीर कौन है? जिसने अपने हाथों से सिर काट-काटकर अत्यंत हर्ष के साथ बहुत बार उन्हें अग्ि में होम दिया! स्वयं गौरीपति शिवजी इस बात के साक्षी हैं॥28॥
॥ चौपाई ॥
जरत बिलोकेउँ जबहि कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥ नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥
भावार्थ:- मस्तकों के जलते समय जब मैंने अपने ललाटों पर लिखे हुए विधाता के अक्षर देखे, तब मनुष्य के हाथ से अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाता की वाणी (लेख को) असत्य जानकर मैं हँसा॥ ॥।
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें॥। आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें॥2॥।
भावार्थ:- उस बात को समझकर (स्मरण करके) भी मेरे मन में डर नहीं है। (क्योंकि मैं समझता हूँ कि) बूढ़े ब्रह्मा ने बुद्धि भ्रम से ऐसा लिख दिया है। अरे मूर्ख! तू लज्ञजा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीर का बल कहता है!॥2॥।
कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं॥ लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ॥3॥
भावार्थ:- अंगद ने कहा- अरे रावण! तेरे समान लज्जावान् जगत् में कोई नहीं है। लज्ञजाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तू अपने मुँह से अपने गुण कभी नहीं कहता॥3॥
सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कहीं॥ सो भुजबल राखेहू उर घाली। जीतेह सहसबाह बलि बाली॥र4॥
भावार्थ:- सिर काटने और कैलास उठाने की कथा चित्त में चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा। भुजाओं के उस बल को तूने हृदय में ही टाल (छिपा) रखा है, जिससे तूने सहस्रबाह, बलि और बालि को जीता था॥र4॥
सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा॥ इंद्रजालि कहूँ कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा॥5॥
भावार्थ:- अरे मंद बुद्धि! सुन, अब बस कर। सिर काटने से भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है? इंद्रजाल रचने वाले को वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है! ॥5॥।
॥ दोहा ॥
जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद। ते नहिं सूर कहावहिं समुझ्नि देखु मतिमंद॥29॥।
भावार्थ:-अरे मंद बुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आग में जल मरते हैं, गदहों के झुंड बोझ लादकर चलते हैं, पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते॥29॥
॥ चौपाई ॥
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही॥ दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥ ॥
भावार्थ:- अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर, मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूत की तरह (सन्धि करने) नहीं आया हूँ। श्री रघुवीर ने ऐसा विचार कर मुझे भेजा है-॥॥
बार बार अस कहइ कृपाला। नहिहं गजारि जसु बंधे सूकाला॥ मन महूँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे॥2॥
भावार्थ:- कृपालु श्री रामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यार के मारने से सिंह को यश नहीं मिलता। अरे मूर्ख! प्रभु के (उन) वचनों को मन में समझकर (याद करके) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे हैं॥2॥।
नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लैं जातेउँ सीतहि बरजोरा॥ जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी॥3॥।
भावार्थ:- नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीताजी को जबरदस्ती ले जाता। अरे अधम! देवताओं के शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया, जब तू सूने में पराई स्त्री को हर (चुरा) लाया॥3॥
तै निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥ जौं न राम अपमानहिं डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करउँ॥4॥
भावार्थ:- तू राक्षसों का राजा और बड़ा अभिमानी है, परन्तु मैं तो श्री रघुनाथजी के सेवक (सुग्रीव) का दूत (सेवक का भी सेवक) हूँ। यदि मैं श्री रामजी के अपमान से न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि-॥4॥
॥ दोहा ॥
तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाऊँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ॥30॥।
भावार्थ:- तुझे जमीन पर पटककर, तेरी सेना का संहार कर और तेरे गाँव को चौपट (नष्ट-भ्रष्ट) करके, अरे मूर्ख! तेरी युवती स्त्रियों सहित जानकीजी को ले जाऊँ॥30॥
॥ चौपाई ॥
जौं अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मतुसाई॥। कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥
भावार्थ:- यदि ऐसा करूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई नहीं है। मरे हुए को मारने में कुछ भी पुरुषत्व (बहादुरी) नहीं है। वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यंत मूढ़, अति दरिद्र, बदनाम, बहुत बूढ़ा, ॥
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥ तनु पोषक निंदक अघ खानी जीवत सव सम चौदह प्रानी॥2॥
भावार्थ:-नित्य का रोगी, निरंतर क्रोधयुक्त रहने वाला, भगवान् विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करने वाला, पराई निंदा करने वाला और पाप की खान (महान् पापी)- ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदे के समान हैं॥2॥
अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही॥ सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा॥3॥
भावार्थ:- अरे दुष्ट! ऐसा विचार कर मैं तुझे नहीं मारता। अब तू मुझमें क्रोध न पैदा कर (मुझे गुस्सा न दिला)। अंगद के वचन सुनकर राक्षस राज रावण दाँतों से होठ काटकर, क्रोधित होकर हाथ मलता हुआ बोला-॥3॥
रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी॥ कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें॥4॥
भावार्थ:- अरे नीच बंदर! अब तू मरना ही चाहता है! इसी से छोटे मुँह बड़ी बात कहता है। अरे मूर्ख बंदर! तू जिसके बल पर कड्टए वचन बक रहा है, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि अथवा तेज कुछ भी नहीं है॥4॥।
॥ दोहा ॥
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास। सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास॥34 क।॥
भावार्थ:-उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिता ने वनवास दे दिया। उसे एक तो वह (उसका) दुःख, उस पर युवती स्त्री का विरह और फिर रात-दिन मेरा डर बना रहता है॥34 (क)॥
जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक। खाहिं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक॥3 ख॥
भावार्थ:-जिनके बल का तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्यों को तो राक्षस रात-दिन खाया करते हैं। अरे मूढ! जिद्द छोड़कर समझ (विचार कर)॥ 34 (ख)।॥
॥ चौपाई ॥
जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥
भावार्थ:-जब उसने श्री रामजी की निंदा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यंत क्रोधित हुए, क्योंकि (शास्त्र ऐसा कहते हैं कि) जो अपने कानों से भगवान् विष्णु और शिव की निंदा सुनता है, उसे गो वध के समान पाप होता है॥॥
कटकटान कपिकुंजर भारी। दुह भुजदंड तमकि महि मारी॥ डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥2॥।
भावार्थ:-वानर श्रेष्ठ अंगद बहुत जोर से कटकटाए (शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोर से) अपने दोनों भुजदण्डों को पृथ्वी पर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, (जिससे बैठे हुए) सभासद् गिर पड़े और भय रूपी पवन (भूत) से ग्रस्त होकर भाग चले॥2॥
गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछ अंगद प्रभु पास पबारे॥3॥।
भावार्थ:-रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यंत सुंदर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरों पर सुधाकर रख लिए और कुछ अंगद ने उठाकर प्रभु श्री रामचंद्रजी के पास फेंक दिए॥3॥
आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे॥ की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए।॥4॥
भावार्थ:- मुकुटों को आते देखकर वानर भागे। (सोचने लगे) विधाता! कया दिन में ही उल्कापात होने लगा (तारे टूटकर गिरने लगे)? अथवा क्या रावण ने क्रोध करके चार वज्ज चलाए हैं, जो बड़े धाए के साथ (वेग से) आ रहे हैं? ॥4॥
कह प्रभु हँसि जनि ह्ृदयेँ डेराह। लूक न असनि केतु नहिहं राहू॥ ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥5॥
भावार्थ:- प्रभु ने (उनसे) हँसकर कहा- मन में डरो नहीं। ये न उल्का हैं, नवज् हैं और न केतु या राह ही हैं। अरे भाई! ये तो रावण के मुकुट हैं, जो बालिपुत्र अंगद के फेंके हुए आ रहे हैं॥5॥
॥ दोहा ॥
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥32 क।॥
भावार्थ:-पवन पुत्र श्री हनुमानजी ने उछलकर उनको हाथ से पकड़ लिया और लाकर प्रभु के पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्य के समान था॥32 (क)॥।
उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरह कपिहि धरि मारह सुनि अंगद मुसुकाइ॥32 ख॥।
भावार्थ:- वहाँ (सभा में) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि- बंदर को पकड़ लो और पकड़कर मार डालो। अंगद यह सुनकर मुस्कुराने लगे॥32 (ख)॥।
॥ चौपाई ॥
एहि बधि बेगि सुभट सब धावह। खाह भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥ मर्कटहीन करह महि जाई। जिअत धरह तापस द्वौ भाई॥॥
भावार्थ:- (रावण फिर बोला-) इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ कहीं रीछ-वानरों को पाओ, वहीं खा डालो। पृथ्वी को बंदरों से रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों (राम-लक्ष्मण) को जीते जी पकड़ लो॥
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥ मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥2॥
भावार्थ:-(रावण के ये कोपभरे वचन सुनकर) तब युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले- तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज्ज! अरे कुलनाशक! गला काटकर (आत्महत्या करके) मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती!॥2॥।
रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी॥। सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा॥3॥
भावार्थ:- अरे स्त्री के चोर! अरे कुमार्ग पर चलने वाले! अरे दुष्ट, पाप की राशि, मन्द बुद्धि और कामी! तू सन्निपात में कया दुर्वचन बक रहा है? अरे दुष्ट राक्षस! तू काल के वश हो गया है!॥3॥।
याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें॥ रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी॥4॥
भावार्थ:- इसका फल तू आगे वानर और भालुओं के चपेटे लगने पर पावेगा। राम मनुष्य हैं, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी! तेरी जीभें नहीं गिर पड़तीं?॥4॥।
गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं॥5॥।
भावार्थ:- इसमें संदेह नहीं है कि तेरी जीभें (अकेले नहीं वरन) सिरों के साथ रणभूमि में गिरेंगी॥5॥
॥ सोरठा ॥
सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहूँ लोचन अंध घधिग तव जन्म कुजाति जड़॥33 क॥
भावार्थ:- रे दशकन्ध! जिसने एक ही बाण से बालि को मार डाला, वह मनुष्य कैसे हैं? अरे कुजाति, अरे जड़! बीस आँखें होने पर भी तू अंधा है। तेरे जन्म को धिक्कार है॥33 (क)॥
तव सोनित कीं प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम॥33 ख॥
भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के बाण समूह तेरे रक्त की प्यास से प्यासे हैं। (वे प्यासे ही रह जाएँगे) इस डर से, अरे कड़वी बकवाद करने वाले नीच राक्षस! मैं तुझे छोड़ता हूँ॥33 (ख)॥
॥ चौपाई ॥
मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्न्ह रघुनायक॥ असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥ ॥
भावार्थ:-मैं तेरे दाँत तोड़ने में समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्री रघुनाथजी ने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और (तेरी) लंका को पकड़कर समुद्र में डूबो दूँ॥
गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥ मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥2॥
भावार्थ:-तेरी लंका गूलर के फल के समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर (अज्ञानवश) निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फल को खाते क्या देर थी? पर उदार (कृपालु) श्री रामचंद्रजी ने वैसी आज्ञा नहीं दी॥2॥
जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥ बालि न कबहूँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा॥3॥
भावार्थ:-अंगद की युक्ति सुनकर रावण मुस्कुराया (और बोला-) अरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ से सीखा? बालि ने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियों से मिलकर लबार हो गया है॥3॥
साँचेहूँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥ समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥4॥
भावार्थ:-(अंगद ने कहा-) अरे बीस भुजा वाले! यदि तेरी दसों जीगें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्री रामचंद्रजी के प्रताप को समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावण की सभा में प्रण करके (दूढ़ता के साथ) पैर रोप दिया॥4॥
जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥ सुनह सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारह कीसा॥5॥।
भावार्थ:-(और कहा-) अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्री रामजी लौट जाएँगे, मैं सीताजी को हार गया। रावण ने कहा- हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दो॥5॥
इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरघषि उठे जहैँ तहँ भट नाना॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥6॥
भावार्थ:-इंद्रजीत (मेघनाद) आदि अनेकों बलवान् योद्धा जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से बहुत से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थान पर जा बैठ जाते हैं॥6॥
पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥7॥।
भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) वे देवताओं के शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं, परन्तु हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! अंगद का चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी) पुरुष मोह रूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकते॥7॥
॥ दोहा ॥
कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ॥34 क॥
भावार्थ:-करोड़ों वीर योद्धा जो बल में मेघनाद के समान थे, हर्षित होकर उठे, वे बार-बार झपटते हैं, पर वानर का चरण नहीं उठता, तब लज्जा के मारे सिर नवाकर बैठ जाते हैं॥34 (क)॥
भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग। कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥34 खा॥।
भावार्थ:-जैसे करोड़ों विज्न आने पर भी संत का मन नीति को नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर (अंगद) का चरण पृथ्वी को नहीं छोड़ता। यह देखकर शत्रु (रावण) का मद दूर हो गया! ॥34 (ख)॥।
॥ चौपाई ॥
कपि बल देखि सकल हियेँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे॥ गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा॥॥
भावार्थ:-अंगद का बल देखकर सब हृदय में हार गए। तब अंगद के ललकारने पर रावण स्वयं उठा। जब वह अंगद का चरण पकड़ने लगा, तब बालि कुमार अंगद ने कहा- मेरा चरण पकड़ने से तेरा बचाव नहीं होगा! ॥॥
गहसि न राम चरन सठ जाई॥ सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥ भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई॥2॥
भावार्थ:-अरे मूर्ख- तू जाकर श्री रामजी के चरण क्यों नहीं पकड़ता? यह सुनकर वह मन में बहुत ही सकुचाकर लौट गया। उसकी सारी श्री जाती रही। वह ऐसा तेजहीन हो गया जैसे मध्याहन में चंद्रमा दिखाई देता है॥2॥।
सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहूँ संपति सकल गँवाई॥ जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥3॥
भावार्थ:-वह सिर नीचा करके सिंहासन पर जा बैठा। मानो सारी सम्पत्ति गँवाकर बैठा हो। श्री रामचंद्रजी जगत्भर के आत्मा और प्राणों के स्वामी हैं। उनसे विमुख रहने वाला शांति कैसे पा सकता है? ॥3॥।
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥ तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कह किमि टरई॥4॥
भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे उमा! जिन श्री रामचंद्रजी के भरूविलास (भौंह के इशारे) से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाश को प्राप्त होता है, जो तृण को वज्र और वजन को तृण बना देते हैं (अत्यंत निर्बल को महान् प्रबल और महान् प्रबल को अत्यंत निर्बल कर देते हैं), उनके दूत का प्रण कहो, कैसे टल सकता है? ॥4॥।
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना॥ रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चलयो बालि नृप जायो॥5॥
भावार्थ:-फिर अंगद ने अनेकों प्रकार से नीति कही। पर रावण नहीं माना, क्योंकि उसका काल निकट आ गया था। शत्रु के गर्व को चूर करके अंगद ने उसको प्रभु श्री रामचंद्रजी का सुयश सुनाया और फिर वह राजा बालि का पुत्र यह कहकर चल दिया-॥5॥।
हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करों बड़ाई॥ प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा॥6॥।
भावार्थ:-रणभूमि में तुझे खेला-खेलाकर न मारूँ तब तक अभी (पहले से) कया बड़ाई करूँ। अंगद ने पहले ही (सभा में आने से पूर्व ही) उसके पुत्र को मार डाला था। वह संवाद सुनकर रावण दुःखी हो गया॥6॥।
जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी॥ 7॥।
भावार्थ:-अंगद का प्रण (सफल) देखकर सब राक्षस भय से अत्यन्त ही व्याकुल हो गए॥7॥
॥ दोहा ॥
रिपु बल धरघषि हरघषि कपि बालितनय बल पुंज। पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥35 क।॥
भावार्थ:-शत्रु के बल का मर्दन कर, बल की राशि बालि पुत्र अंगदजी ने हर्षित होकर आकर श्री रामचंद्रजी के चरणकमल पकड़ लिए। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों में (आनंदाश्रुओं का) जल भरा है॥35 (क)॥ रावण को पुनः मन्दोदरी का समझाना
साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरीं रावनहिं बहुरि कहा समुझाइ॥35 ख॥।
भावार्थ:- सन्ध्या हो गई जानकर दशग्रीव बिलखता हुआ (उदास होकर) महल में गया। मन्दोदरी ने रावण को समझाकर फिर कहा-॥35 (ख)॥
॥ चौपाई ॥
कंत समुझि मन तजह कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥॥
भावार्थ:- हे कान्त! मन में समझकर (विचारकर) कुबुद्धि को छोड़ दो। आप से और श्री रघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है॥॥
पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा॥ कौतुक सिंधु नाघि तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका॥2॥
भावार्थ:- हे प्रियतम! आप उन्हें संग्राम में जीत पाएँगे, जिनके दूत का ऐसा काम है? खेल से ही समुद्र लाँघकर वह वानरों में सिंह (हनुमान्) आपकी लंका में निर्भय चला आया! ॥2॥
रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा॥ जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा॥3॥
भावार्थ:- रखवालों को मारकर उसने अशोक वन उजाड़ डाला। आपके देखते-देखते उसने अक्षयकुमार को मार डाला और संपूर्ण नगर को जलाकर राख कर दिया। उस समय आपके बल का गर्व कहाँ चला गया था?॥3॥
अब पति मृषा गाल जनि मारह। मोर कहा कछु ह्ृदयँ बिचारह॥ पति रघुपतिहि नृपति जनि मानह। अग जग नाथ अतुलबल जानहु॥4॥।
भावार्थ:- अब हे स्वामी! झूठ (व्यर्थ) गाल न मारिए (डींग न हाँकिए) मेरे कहने पर हृदय में कुछ विचार कीजिए। हे पति! आप श्री रघुपति को (निरा) राजा मत समझिए, बल्कि अग-जगनाथ (चराचर के स्वामी) और अतुलनीय बलवान् जानिए॥4॥
बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा॥ जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला॥5॥
भावार्थ:- श्री रामजी के बाण का प्रताप तो नीच मारीच भी जानता था, परन्तु आपने उसका कहना भी नहीं माना। जनक की सभा में अगणित राजागण थे। वहाँ विशाल और अतुलनीय बल वाले आप भी थे॥5॥
भंजि धनुष जानकी बिआह्ी। तब संग्राम जितेह किन ताही॥ सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा॥6॥
भावार्थ:- वहाँ शिवजी का धनुष तोड़कर श्री रामजी ने जानकी को ब्याहा, तब आपने उनको संग्राम में क्यों नहीं जीता? इंद्रपुत्र जयन्त उनके बल को कुछ-कुछ जानता है। श्री रामजी ने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया॥6॥।
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि ह्ृदयेँ नहिं लाज बिसेषी॥7॥
भावार्थ:- शुर्पणखा की दशा तो आपने देख ही ली। तो भी आपके हृदय में (उनसे लड़ने की बात सोचते) विशेष (कुछ भी) लज्जा नहीं आती! ॥7॥
॥ दोहा ॥
बधि बिराध खर दूषनहि लीलाँ हत्यो कबंध। बालि एक सर मार्यो तेहि जानहू दसकंध॥ 36॥
भावार्थ:- जिन्होंने विराध और खर-दूषण को मारकर लीला से ही कबन्ध को भी मार डाला और जिन्होंने बालि को एक ही बाण से मार दिया, हे दशकन्ध! आप उन्हें (उनके महत्व को) समझिए!॥ 36॥
॥ चौपाई ॥
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला॥ कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू॥
भावार्थ:-जिन्होंने खेल से ही समुद्र को बैँधा लिया और जो प्रभु सेना सहित सुबेल पर्वत पर उतर पड़े, उन सूर्यकुल के ध्वजास्वरूप (कीर्ति को बढ़ाने वाले) करुणामय भगवान् ने आप ही के हित के लिए दूत भेजा॥
सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महूँ मृगपति जथा॥ अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके॥2॥
भावार्थ:- जिसने बीच सभा में आकर आपके बल को उसी प्रकार मथ डाला जैसे हाथियों के झुंड में आकर सिंह (उसे छिन्न-भिन्न कर डालता है) रण में बाँके अत्यंत विकट वीर अंगद और हनुमान् जिनके सेवक हैं,॥2॥
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहट। मुधा मान ममता मद बहहू॥ अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा॥3।॥
भावार्थ:- हे पति! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझ ढो रहे हैं! हा प्रियतम! आपने श्री रामजी से विरोध कर लिया और काल के विशेष वश होने से आपके मन में अब भी ज्ञान नहीं उत्पन्न होता॥3॥।
काल दंड गहि काह न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा॥ निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं॥4॥।
भावार्थ:- काल दण्ड (लाठी) लेकर किसी को नहीं मारता। वह धर्म, बल, बुद्धि और विचार को हर लेता है। हे स्वामी! जिसका काल (मरण समय) निकट आ जाता है, उसे आप ही की तरह भ्रम हो जाता है॥4॥
॥ दोहा ॥
दुद सुत मरे दहेउ पुर अजहूँ पूर पिय देह। कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु॥37॥
भावार्थ:- आपके दो पुत्र मारे गए और नगर जल गया। (जो हुआ सो हुआ) हे प्रियतम! अब भी (इस भूल की) पूर्ति (समाप्ति) कर दीजिए (श्री रामजी से वैर त्याग दीजिए) और हे नाथ! कृपा के समुद्र श्री रघुनाथजी को भजकर निर्मल यश लीजिए ॥37॥
॥ चौपाई ॥
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना॥ बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली॥ ॥।
भावार्थ:- स्त्री के बाण के समान वचन सुनकर वह सबेरा होते ही उठकर सभा में चला गया और सारा भय भुलाकर अत्यंत अभिमान में फूलकर सिंहासन पर जा बैठा॥॥ अंगद-राम संवाद, युद्ध की तैयारी
इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा॥ अति आदर समीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी॥2॥
भावार्थ:- यहाँ (सुबेल पर्वत पर) श्री रामजी ने अंगद को बुलाया। उन्होंने आकर चरणकमलों में सिर नवाया। बड़े आदर से उन्हें पास बैठाकर खर के शत्रु कृपालु श्री रामजी हँसकर बोले॥2॥
बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहूँ पूछडउँ तोही॥ रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका॥3॥
भावार्थ:- हे बालि के पुत्र! मुझे बड़ा कौतूहल है। हे तात! इसी से मैं तुमसे पूछता हूँ, सत्य कहना। जो रावण राक्षसों के कुल का तिलक है और जिसके अतुलनीय बाहुबल की जगत्भर में धाक है,॥3॥
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहह तात कवनी बिघि पाए।॥ सुतु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप न गुन चारी॥4॥
भावार्थ:-उसके चार मुकुट तुमने फेंके। हे तात! बताओ, तुमने उनको किस प्रकार से पाया! (अंगद ने कहा-) हे सर्वज्ञ! हे शरणागत को सुख देने वाले! सुनिए। वे मुकुट नहीं हैं। वे तो राजा के चार गुण हैं॥4॥
साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा॥ नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि पहििं आए।॥5॥।
भावार्थ:- हे नाथ! वेद कहते हैं कि साम, दान, दण्ड और भेद- ये चारों राजा के हृदय में बसते हैं। ये नीति-धर्म के चार सुंदर चरण हैं, (किन्तु रावण में धर्म का अभाव है) ऐसा जी में जानकर ये नाथ के पास आ गए हैं॥5॥
॥ दोहा ॥
धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस। तेहि परिहरि गुन आए सुनह कोसलाधीस॥ 38 क॥।
भावार्थ:- दशशीश रावण धर्महीन, प्रभु के पद से विमुख और काल के वश में है, इसलिए हे कोसलराज! सुनिए, वे गुण रावण को छोड़कर आपके पास आ गए हैं॥ 38 (क)॥
परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार। समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार॥38 ख॥
भावार्थ:- अंगद की परम चतुरता (पूर्ण उक्ति) कानों से सुनकर उदार श्री रामचंद्रजी हँसने लगे। फिर बालि पुत्र ने किले के (लंका के) सब समाचार कहे॥38 (ख)॥।
॥ चौपाई ॥
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।॥ लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करह्ट बिचारा॥
भावार्थ:- जब शत्रु के समाचार प्राप्त हो गए, तब श्री रामचंद्रजी ने सब मंत्रियों को पास बुलाया (और कहा-) लंका के चार बड़े विकट दरवाजे हैं। उन पर किस तरह आक्रमण किया जाए, इस पर विचार करो॥
तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमरि ह्ृदयँ दिनकर कुल भूषन॥ करि बिचार तििन्ह मंत्र दूढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा॥2॥
भावार्थ:- तब वानरराज सुग्रीव, ऋक्षपति जाम्बवान् और विभीषण ने हृदय में सूर्य कुल के भूषण श्री रघुनाथजी का स्मरण किया और विचार करके उन्होंने कर्तव्य निश्चित किया। वानरों की सेना के चार दल बनाए।॥2॥।
जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे॥ प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए॥3॥।
भावार्थ:-और उनके लिए यथायोग्य (जैसे चाहिए वैसे) सेनापति नियुक्त किए। फिर सब यूथपतियों को बुला लिया और प्रभु का प्रताप कहकर सबको समझाया, जिसे सुनकर वानर, सिंह के समान गर्जना करके दौड़े॥3॥
हरघषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं॥ गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा॥4॥
भावार्थ:-वे हर्षित होकर श्री रामजी के चरणों में सिर नवाते हैं और पर्वतों के शिखर ले-लेकर सब वीर दौड़ते हैं। 'कोसलराज श्री रघुवीरजी की जय हो' पुकारते हुए भालू और वानर गरजते और ललकारते हैं॥4॥
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका॥ घटाटोप करि चहूँ दिसि घेरी॥ मुखहिं निसार बजावहिं भेरी॥5॥।
भावार्थ:- लंका को अत्यंत श्रेष्ठ (अजेय) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्री रामचंद्रजी के प्रताप से निडर होकर चले। चारों ओर से घिरी हुई बादलों की घटा की तरह लंका को चारों दिशाओं से घेरकर वे मुँह से डंके और भेरी बजाने लगे॥5॥। युद्धारम्भ
॥ दोहा ॥
जयति राम जय लछ़िमन जय कपीस सुग्रीव। गर्जहिं सिंहनाद कपि भालु महा बल सींव॥39॥
भावार्थ:- महान् बल की सीमा वे वानर-भालू सिंह के समान ऊँचे स्वर से "श्री रामजी की जय', 'लक्ष्मणजी की जय', 'वानरराज सुग्रीव की जय'"- ऐसी गर्जना करने लगे॥39॥
॥ चौपाई ॥
लंकाँ भयउ कोलाहल भारी। सुना दसानन अति अहँकारी॥ देखह बनरन्ह केरि ढिठाई। बिहँसि निसाचर सेन बोलाई॥॥
भावार्थ:- लंका में बड़ा भारी कोलाहल (कोहराम) मच गया। अत्यंत अहंकारी रावण ने उसे सुनकर कहा- वानरों की ढिठाई तो देखो! यह कहते हुए हँसकर उसने राक्षसों की सेना बुलाई॥॥
आए कीस काल के प्रेरे। छुधावंत सब निसिचर मेरे॥ बअस कह्ि अट्रहास सठ कीन्हा। गृह बैठें अहार बिघि दीन्हा॥2॥।
भावार्थ:- बंदर काल की प्रेरणा से चले आए हैं। मेरे राक्षस सभी भूखे हैं। विधाता ने इन्हें घर बैठे भोजन भेज दिया। ऐसा कहकर उस मूर्ख ने अट्रहास किया (वह बड़े जोर से ठहाका मारकर हँसा)॥2॥
सुभट सकल चारिहूँ दिसि जाह। धरि धरि भालु कीस सब खाहू॥ उमा रावनहि अस अभिमाना। जिमि टिट्रिभ खग सूत उताना॥3॥।
भावार्थ:- (और बोला-) हे वीरों! सब लोग चारों दिशाओं में जाओ और रीछ-वानर सबको पकड़-पकड़कर खाओ। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! रावण को ऐसा अभिमान था जैसा टिटिहिरी पक्षी पैर ऊपर की ओर करके सोता है (मानो आकाश को थाम लेगा) ॥3॥
चले निसाचर आयसु मागी। गहि कर भिंडिपाल बर साँगी॥ तोमर मुद्र परसु प्रचंडा। सूल कृपान परिघ गिरिखंडा॥4॥
भावार्थ:-आज्ञा माँगकर और हाथों में उत्तम भिंदिपाल, साँगी (बरछी), तोमर, मुद्दर, प्रचण्ड फरसे, शूल, दोधारी तलवार, परिघ और पहाड़ों के टुकड़े लेकर राक्षस चले॥4॥
जिमि अरुनोपल निकर निहारी। धावहिं सठ खग मांस अहारी॥ चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा। तिमि धाए मनुजाद अबूझा॥5॥
भावार्थ:-जैसे मूर्ख मांसाहारी पक्षी लाल पत्थरों का समूह देखकर उस पर टूट पड़ते हैं, (पत्थरों पर लगने से) चोंच टूटने का दुःख उन्हें नहीं सूझता, वैसे ही ये बेसमझ राक्षस दौड़े॥5॥।
॥ दोहा ॥
नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर। कोट कैँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर॥40॥।
भावार्थ:- अनेकों प्रकार के अस्त्र-शस्त्र और धनुष-बाण धारण किए करोड़ों बलवान् और रणधीर राक्षस वीर परकोटे के कैंगूरों पर चढ़ गए॥40॥
॥ चौपाई ॥
कोट कैंग्रन्हि सोहहिं कैसे। मेरु के सूंगनि जनु घन बैसे॥ बाजहिं ढोल निसान जुनझ्ाऊ। सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ॥
भावार्थ:-वे परकोटे के कँगूरों पर कैसे शोभित हो रहे हैं, मानो सुमेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल और डंके आदि बज रहे हैं, (जिनकी) ध्वनि सुनकर योद्धाओं के मन में (लड़ने का) चाव होता है॥
बाजहिं भेरि नफीरि अपारा। सुनि कादर उर जाहिं दरारा॥ देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा। अति बिसाल तनु भालु सुभट्रा॥2॥
भावार्थ:- अगणित नफीरी और भेरी बज रही है, (जिन्हें) सुनकर कायरों के हृदय में दरारें पड़ जाती हैं। उन्होंने जाकर अत्यन्त विशाल शरीर वाले महान् योद्धा वानर और भालुओं के ठट्ट (समूह) देखे॥2॥।
धावहिं गनहिं न अवघट घाटा। पर्वत फोरि करहिं गहि बाटा॥ कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं। दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं॥3॥।
भावार्थ:-(देखा कि) वे रीछ-वानर दौड़ते हैं, औघट (ऊँची-नीची, विकट) घाटियों को कुछ नहीं गिनते। पकड़कर पहाड़ों को फोड़कर रास्ता बना लेते हैं। करोड़ों योद्धा कटकटाते और गर्जते हैं। दाँतों से होठ काटते और खूब डपटते हैं॥3॥।
उत रावन इत राम दोहाई। जयति जयति जय परी लराई॥ निसिचर सिखर समूह ढहावहिं। कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं॥4॥
भावार्थ:- उधर रावण की और इधर श्री रामजी की दुहाई बोली जा रही है। 'जय' 'जय' 'जय' की ध्वनि होते ही लड़ाई छिड़ गई। राक्षस पहाड़ों के ढेर के ढेर शिखरों को फेंकते हैं। वानर कूदकर उन्हें पकड़ लेते हैं और वापस उन्हीं की ओर चलाते हैं॥4॥। छंदः
धरि कुधर खंड प्रचंड मर्कट भालु गढ़ पर डारहीं। झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं॥ अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए। कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहैँ तहँ राम जसु गावत भए।॥
भावार्थ:- प्रचण्ड वानर और भालू पर्वतों के टुकड़े ले-लेकर किले पर डालते हैं। वे झपटते हैं और राक्षसों के पैर पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर पटककर भाग चलते हैं और फिर ललकारते हैं। बहुत ही चंचल और बड़े तेजस्वी वानर-भालू बड़ी फुर्ती से उछलकर किले पर चढ़-चढ़कर गए और जहाँ-तहाँ महलों में घुसकर श्री रामजी का यश गाने लगे।
॥ दोहा ॥
एक एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ। ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ॥4॥।
भावार्थ:- फिर एक-एक राक्षस को पकड़कर वे वानर भाग चले। ऊपर आप और नीचे (राक्षस) योद्धा- इस प्रकार वे (किले से) धरती पर आ गिरते हैं॥4॥
॥ चौपाई ॥
राम प्रताप प्रबल कपिजूथा। मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा॥ चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर। जय रघुबीर प्रताप दिवाकर॥
भावार्थ:- श्री रामजी के प्रताप से प्रबल वानरों के झुंड राक्षस योद्धाओं के समूह के समूह मसल रहे हैं। वानर फिर जहाँ-तहाँ किले पर चढ़ गए और प्रताप में सूर्य के समान श्री रघुवीर की जय बोलने लगे॥॥
चले निसाचर निकर पराई। प्रबल पवन जिमि घन समुदाई॥ हाहाकार भयउ पुर भारी। रोवहिं बालक आतुर नारी॥2॥।
भावार्थ:- राक्षसों के झुंड वैसे ही भाग चले जैसे जोर की हवा चलने पर बादलों के समूह तितर-बितर हो जाते हैं। लंका नगरी में बड़ा भारी हाहाकार मच गया। बालक, स्त्रियाँ और रोगी (असमर्थता के कारण) रोने लगे॥2॥
सब मिलि देहिं रावनहि गारी। राज करत एहिं मृत्यु हँकारी॥ निज दल बिचल सुनी तेहिं काना। फेरि सुभट लंकेस रिसाना॥3॥
भावार्थ:- सब मिलकर रावण को गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्यु को बुला लिया। रावण ने जब अपनी सेना का विचलित होना कानों से सुना, तब (भागते हुए) योद्धाओं को लौटाकर वह क्रोधित होकर बोला-॥3॥
जो रन बिमुख सुना मैं काना। सो मैं हतब कराल कृपाना॥ सर्बसु खाइ भोग करि नाना। समर भूमि भए बल्लभ प्राना॥4॥
भावार्थ:- मैं जिसे रण से पीठ देकर भागा हुआ अपने कानों सुूँगा, उसे स्वयं भयानक दोधारी तलवार से मारूँगा। मेरा सब कुछ खाया, भाँति- भाँति के भोग किए और अब रणभूमि में प्राण प्यारे हो गए!॥4॥।
उग्र बचन सुनि सकल डेराने। चले क्रोध करि सुभट लजाने॥ सन्मुख मरन बीर कै सोभा। तब तिन््ह तजा प्रान कर लोभा॥5॥
भावार्थ:- रावण के उग्र (कठोर) वचन सुनकर सब वीर डर गए और लज्नित होकर क्रोध करके युद्ध के लिए लौट चले। रण में (शत्रु के) सम्मुख (युद्ध करते हुए) मरने में ही वीर की शोभा है। (यह सोचकर) तब उन्होंने प्राणों का लोभ छोड़ दिया॥5॥
॥ दोहा ॥
बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि। ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारि॥42॥।
भावार्थ:-बहुत से अस्त्र-शस्त्र धारण किए, सब वीर ललकार-ललकारकर भिड़ने लगे। उन्होंने परिघों और त्रिशूलों से मार-मारकर सब रीछ- वानरों को व्याकुल कर दिया॥42॥
॥ चौपाई ॥
भय आतुर कपि भागत लागे। जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे॥ कोउ कह कहूँ अंगद हनुमंता। कहँ नल नील दुबिद बलवंता॥॥
भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं) वानर भयातुर होकर (डर के मारे घबड़ाकर) भागने लगे, यद्यपि हे उमा! आगे चलकर (वे ही) जीतेंगे। कोई कहता है- अंगद-हनुमान् कहाँ हैं? बलवान् नल, नील और द्विविद कहाँ हैं?॥१॥
निज दल बिकल सुना हनुमाना। पच्छिम द्वार रहा बलवाना॥ मेघनाद तहँ करइ लराई। टूट न द्वार परम कठिनाई॥2॥
भावार्थ:-हनुमान्जी ने जब अपने दल को विकल (भयभीत) हुआ सुना, उस समय वे बलवान् पश्चिम द्वार पर थे। वहाँ उनसे मेघनाद युद्ध कर रहा था। वह द्वार टूटता न था, बड़ी भारी कठिनाई हो रही थी॥2॥
पवनतनय मन भा अति क्रोधा। गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा॥। कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा। गहि गिरि मेघनाद कहूँ धावा॥3॥
भावार्थ:-तब पवनपुत्र हनुमानजी के मन में बड़ा भारी क्रोध हुआ। वे काल के समान योद्धा बड़े जोर से गरजे और कूदकर लंका के किले पर आ गए और पहाड़ लेकर मेघनाद की ओर दौड़े॥3॥।
भंजेउ रथ सारथी निपाता। ताहि हृदय महूँ मारेसि लाता॥ दुसरें सूत बिकल तेहि जाना। स्यंदन घालि तुरत गृह आना॥4॥।
भावार्थ:- रथ तोड़ डाला, सारथी को मार गिराया और मेघनाद की छाती में लात मारी। दूसरा सारथी मेघनाद को व्याकुल जानकर, उसे रथ में डालकर, तुरंत घर ले आया॥4॥।
॥ दोहा ॥
अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल। रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल॥43॥
भावार्थ:- इधर अंगद ने सुना कि पवनपुत्र हनुमान् किले पर अकेले ही गए हैं, तो रण में बाँके बालि पुत्र वानर के खेल की तरह उछलकर किले पर चढ़ गए॥43॥
॥ चौपाई ॥
जुद्ध बिरुद्ध करुद्ध द्वौ बंदर। राम प्रताप सुमिरि उर अंतर॥ रावन भवन चढ़े द्वौ धाई। करहिं कोसलाधीस दोहाई॥॥
भावार्थ:- युद्ध में शत्रुओं के विरुद्ध दोनों वानर क्रुद्ध हो गए। हृदय में श्री रामजी के प्रताप का स्मरण करके दोनों दौड़कर रावण के महल पर जा चढ़े और कोसलराज श्री रामजी की दुहाई बोलने लगे॥॥
कलस सहित गहि भवनु ढहावा। देखि निसाचरपति भय पावा॥ नारि बूंद कर पीटहिं छाती। अब दुदइ कपि आए उतपाती॥2॥
भावार्थ:- उन्होंने कलश सहित महल को पकड़कर ढहा दिया। यह देखकर राक्षस राज रावण डर गया। सब स्त्रियाँ हाथों से छाती पीटने लगीं (और कहने लगीं-) अब की बार दो उत्पाती वानर (एक साथ) आ गए हैं॥2॥
कपिलीला करि तिन्हृहि डेरावहिं। रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं॥ पुनि कर गहि कंचन के खंभा। कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा॥3॥
भावार्थ:- वानरलीला करके (घुड़की देकर) दोनों उनको डराते हैं और श्री रामचंद्रजी का सुंदर यश सुनाते हैं। फिर सोने के खंभों को हाथों से पकड़कर उन्होंने (परस्पर) कहा कि अब उत्पात आरंभ किया जाए॥3॥
गर्जि परे रिपु कटक मझारी। लागे मरे भुज बल भारी॥ काहृहि लात चपेटन्ति केह। भजह न रामहि सो फल लेहू॥4॥
भावार्थ:-वे गर्जकर शत्रु की सेना के बीच में कूद पड़े और अपने भारी भुजबल से उसका मर्दन करने लगे। किसी की लात से और किसी की थप्पड़ से खबर लेते हैं (और कहते हैं कि) तुम श्री रामजी को नहीं भजते, उसका यह फल लो॥4॥
॥ दोहा ॥
एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड। रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड॥44॥
भावार्थ:- एक को दूसरे से (रगड़कर) मसल डालते हैं और सिरों को तोड़कर फेंकते हैं। वे सिर जाकर रावण के सामने गिरते हैं और ऐसे फूटते हैं, मानो दही के कूंडे फूट रहे हों ॥4॥
॥ चौपाई ॥
महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिहं॥ कह बिभीषनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा॥॥
भावार्थ:- जिन बड़े-बड़े मुखियों (प्रधान सेनापतियों) को पकड़ पाते हैं, उनके पैर पकड़कर उन्हें प्रभु के पास फेंक देते हैं। विभीषणजी उनके नाम बतलाते हैं और श्री रामजी उन्हें भी अपना धाम (परम पद) दे देते हैं॥॥
खल मनुजाद द्विजामिष भोगी। पावहिं गति जो जाचत जोगी॥। उमा राम मृदुचित करुनाकर। बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर॥2॥
भावार्थ:- ब्राह्मणों का मांस खाने वाले वे नरभोजी दुष्ट राक्षस भी वह परम गति पाते हैं, जिसकी योगी भी याचना किया करते हैं, (परन्तु सहज में नहीं पाते)। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! श्री रामजी बड़े ही कोमल हृदय और करुणा की खान हैं। (वे सोचते हैं कि) राक्षस मुझे वैरभाव से ही सही, स्मरण तो करते ही हैं॥2॥।
देहिं परम गति सो जियँ जानी। अस कृपाल को कहह्ठ भवानी॥ अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी। नर मतिमंद ते परम अभागी॥3॥
भावार्थ:- ऐसा ह्ृदय में जानकर वे उन्हें परमगति (मोक्ष) देते हैं। हे भवानी! कहो तो ऐसे कृपालु (और) कौन हैं? प्रभु का ऐसा स्वभाव सुनकर भी जो मनुष्य भ्रम त्याग कर उनका भजन नहीं करते, वे अत्यंत मंदबुद्धि और परम भाग्यहीन हैं॥3॥
अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा। कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा॥ लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें। मथहिं सिंधु दुइ मंदर जैसें॥4॥।
भावार्थ:- श्री रामजी ने कहा कि अंगद और हनुमान किले में घुस गए हैं। दोनों वानर लंका में (विध्वंस करते) कैसे शोभा देते हैं, जैसे दो मन्दराचल समुद्र को मथ रहे हों॥4॥ दोहा :
॥ दोहा ॥
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत। कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहैँ भगवंत॥45॥
भावार्थ:- भुजाओं के बल से शत्रु की सेना को कुचलकर और मसलकर, फिर दिन का अंत होता देखकर हनुमान् और अंगद दोनों कूद पड़े और श्रम थकावट रहित होकर वहाँ आ गए, जहाँ भगवान् श्री रामजी थे॥45॥।
॥ चौपाई ॥
प्रभु पद कमल सीस तिन््ह नाए। देखि सुभट रघुपति मन भाए।॥ राम कृपा करि जुगल निहारे। भए बिगतश्रम परम सुखारे॥॥
भावार्थ:- उन्होंने प्रभु के चरण कमलों में सिर नवाए। उत्तम योद्धाओं को देखकर श्री रघुनाथजी मन में बहुत प्रसन्न हुए। श्री रामजी ने कृपा करके दोनों को देखा, जिससे वे श्रमरहित और परम सुखी हो गए॥
गए जानि अंगद हनुमाना। फिरे भालु मर्कट भट नाना॥ जातुधान प्रदोष बल पाई। धाए करि दससीस दोहाई॥2॥
भावार्थ:- अंगद और हनुमान् को गए जानकर सभी भालू और वानर वीर लौट पड़े। राक्षसों ने प्रदोष (सायं) काल का बल पाकर रावण की दुहाई देते हुए वानरों पर धावा किया॥2॥।
निसिचर अनी देखि कपि फिरे। जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे॥ द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी। लरत सुभट नहिं मानहिं हारी॥3॥
भावार्थ:- राक्षसों की सेना आती देखकर वानर लौट पड़े और वे योद्धा जहाँ-तहाँ कटकटाकर भिड़ गए। दोनों ही दल बड़े बलवान् हैं। योद्धा ललकार-ललकारकर लड़ते हैं, कोई हार नहीं मानते॥3॥।
महाबीर निसिचर सब कारे। नाना बरन बलीमुख भारे॥ सबल जुगल दल समबल जोधा। कौतुक करत लरत करि क्रोधा॥4॥
भावार्थ:-सभी राक्षस महान् वीर और अत्यंत काले हैं और वानर विशालकाय तथा अनेकों रंगों के हैं। दोनों ही दल बलवान् हैं और समान बल वाले योद्धा हैं। वे क्रोध करके लड़ते हैं और खेल करते (वीरता दिखलाते) हैं॥4॥।
प्राबिट सरद पयोद घनेरे। लरत मनहूँ मारुत के प्रेरे॥ अनिप अकंपन अरु अतिकाया। बिचलत सेन कीन्टि इन्ह माया॥5॥
भावार्थ:-(राक्षस और वानर युद्ध करते हुए ऐसे जान पड़ते हैं) मानो क्रमशः वर्षा और शरद ऋतु में बहुत से बादल पवन से प्रेरित होकर लड़ रहे हों। अकंपन और अतिकाय इन सेनापतियों ने अपनी सेना को विचलित होते देखकर माया की॥5॥
भयउ निमिष महँ अति अँधिआरा। बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा॥6॥
भावार्थ:- पलभर में अत्यंत अंधकार हो गया। खून, पत्थर और राख की वर्षा होने लगी॥6॥
॥ दोहा ॥
देखि निबिड़ तम दसहूँ दिसि कपिदल भयउ खभार। एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार॥46॥।
भावार्थ:- दसों दिशाओं में अत्यंत घना अंधकार देखकर वानरों की सेना में खलबली पड़ गई। एक को एक (दूसरा) नहीं देख सकता और सब जहाँ-तहाँ पुकार रहे हैं॥46॥
॥ चौपाई ॥
सकल मरमु रघुनायक जाना। लिए बोलि अंगद हनुमाना॥ समाचार सब कहि समुझाए। सुनत कोपि कपिकुंजर धाए॥॥
भावार्थ:- श्री रघुनाथजी सब रहस्य जान गए। उन्होंने अंगद और हनुमान् को बुला लिया और सब समाचार कहकर समझाया। सुनते ही वे दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़े॥॥
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा। पावक सायक सपदि चलावा॥ भयऊउ प्रकास कतहूँ तम नाहीं। ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं॥2॥।
भावार्थ:-फिर कृपालु श्री रामजी ने हँसकर धनुष चलाया और तुरंत ही अग्िबाण चलाया, जिससे प्रकाश हो गया, कहीं अँधेरा नहीं रह गया। जैसे ज्ञान के उदय होने पर (सब प्रकार के) संदेह दूर हो जाते हैं॥2॥
भालु बलीमुख पाई प्रकासा। धाए हरष बिगत श्रम त्रासा॥ हनूमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे॥3॥
भावार्थ:-भालू और वानर प्रकाश पाकर श्रम और भय से रहित तथा प्रसन्न होकर दौड़े। हनुमान् और अंगद रण में गरज उठे। उनकी हाँक सुनते ही राक्षस भाग छूटे॥3॥
भागत भट पटकहिं धरि धरनी। करहिं भालु कपि अद्भुत करनी॥ गहि पद डारहिं सागर माहीं। मकर उरग झष धरि धरि खाहीं॥4॥
भावार्थ:- भागते हुए राक्षस योद्धाओं को वानर और भालू पकड़कर पृथ्वी पर दे मारते हैं और अद्भुत (आश्चर्यजनक) करनी करते हैं (युद्धकौशल दिखलाते हैं)। पैर पकड़कर उन्हें समुद्र में डाल देते हैं। वहाँ मगर, साँप और मच्छ उन्हें पकड़-पकड़कर खा डालते हैं॥4॥ माल्यवान का रावण को समझाना
॥ दोहा ॥
कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ। गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ॥47॥
भावार्थ:- कुछ मारे गए, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़ पर चढ़ गए। अपने बल से शत्रुदल को विचलित करके रीछ और वानर (वीर) गरज रहे हैं॥47॥
॥ चौपाई ॥
निसा जानि कपि चारिउ अनी। आए जहाँ कोसला धनी॥ राम कृपा करि चितवा सबही। भए बिगतश्रम बानर तबही॥॥
भावार्थ:- रात हुई जानकर वानरों की चारों सेनाएँ (टुकड़ियाँ) वहाँ आईं, जहाँ कोसलपति श्री रामजी थे। श्री रामजी ने ज्यों ही सबको कृपा करके देखा त्यों ही ये वानर श्रमरहित हो गए॥
उहाँ दसानन सचिव हँकारे। सब सन कहेसि सुभट जे मारे॥ आधा कटकु कपिन्ह संघारा। कहह् बेगि का करिअ बिचारा॥2॥।
भावार्थ:- वहाँ (लंका में) रावण ने मंत्रियों को बुलाया और जो योद्धा मारे गए थे, उन सबको सबसे बताया। (उसने कहा-) वानरों ने आधी सेना का संहार कर दिया! अब शीघ्र बताओ, क्या विचार (उपाय) करना चाहिए? ॥2॥
माल्यवंत अति जरठ निसाचर। रावन मातु पिता मंत्री बर॥ बोला बचन नीति अति पावन। सुनह् तात कछु मोर सिखावन॥3॥
भावार्थ:- माल्यवंत (नाम का एक) अत्यंत बूढ़ा राक्षस था। वह रावण की माता का पिता (अर्थात् उसका नाना) और श्रेष्ठ मंत्री था। वह अत्यंत पवित्र नीति के वचन बोला- हे तात! कुछ मेरी सीख भी सुनो-॥3॥
जब ते तुम्ह सीता हरि आनी। असगुन होहिं न जाहिं बखानी॥ बेद पुरान जासु जसु गायो। राम बिमुख काहूँ न सुख पायो॥4॥
भावार्थ:-जब से तुम सीता को हर लाए हो, तब से इतने अपशकुन हो रहे हैं कि जो वर्णन नहीं किए जा सकते। वेद-पुराणों ने जिनका यश गाया है, उन श्री राम से विमुख होकर किसी ने सुख नहीं पाया॥4॥
॥ दोहा ॥
हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान। जेहिं मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान॥48 क॥
भावार्थ:-भाई हिरण्यकशिपु सहित हिरण्याक्ष को बलवान् मधु-कैटभ को जिन्होंने मारा था, वे ही कृपा के समुद्र भगवान् (रामरूप से) अवतरित हुए हैं॥ 48 (क)॥
मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम
लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, लक्ष्मणजी को शक्ति लगना
कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध। सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध॥48 ख॥
भावार्थ:- जो कालस्वरूप हैं, दुष्टों के समूह रूपी वन के भस्म करने वाले (अग्रि) हैं, गुणों के धाम और ज्ञानघन हैं एवं शिवजी और ब्रह्माजी भी जिनकी सेवा करते हैं, उनसे वैर कैसा? ॥48 (ख)॥
॥ चौपाई ॥
परिहरि बयरु देह बैदेही। भजह कृपानिधि परम सनेही॥ ताके बचन बान सम लागे। करिआ मुँह करि जाहि अभागे॥॥
भावार्थ:- (अतः) वैर छोड़कर उन्हें जानकीजी को दे दो और कृपानिधान परम सख्रेही श्री रामजी का भजन करो। रावण को उसके वचन बाण के समान लगे। (वह बोला-) अरे अभागे! मुँह काला करके (यहाँ से) निकल जा॥॥
बूढ भएसि न त मरतेउँ तोही। अब जनि नयन देखावसि मोही॥ तेहिं अपने मन अस अनुमाना। बध्यो चहत एहि कृपानिधाना॥2॥।
भावार्थ:-तू बूढ़ा हो गया, नहीं तो तुझे मार ही डालता। अब मेरी आँखों को अपना मुँह न दिखला। रावण के ये वचन सुनकर उसने (माल्यवान् ने) अपने मन में ऐसा अनुमान किया कि इसे कृपानिधान श्री रामजी अब मारना ही चाहते हैं॥2॥
सो उठि गयउ कहत दुर्बादा। तब सकोप बोलेउ घननादा॥ कौतुक प्रात देखिअह मोरा। करिहउँ बहुत कहाँ का थोरा॥3॥
भावार्थ:- वह रावण को दुर्वचन कहता हुआ उठकर चला गया। तब मेघनाद क्रोधपूर्वक बोला- सबेरे मेरी करामात देखना। मैं बहुत कुछ करूँगा, थोड़ा क्या कहूँ? (जो कुछ वर्णन करूँगा थोड़ा ही होगा) ॥3॥
सुनि सुत बचन भरोसा आवा। प्रीति समेत अंक बैठावा॥ करत बिचार भयउ भिनुसारा। लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा॥4॥
भावार्थ:- पुत्र के वचन सुनकर रावण को भरोसा आ गया। उसने प्रेम के साथ उसे गोद में बैठा लिया। विचार करते-करते ही सबेरा हो गया। वानर फिर चारों दरवाजों पर जा लगे॥4॥
कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ घेरा। नगर कोलाहलु भयउ घनेरा॥ बिबिधायुध धर निसिचर धाए। गढ़ ते पर्वत सिखर ढहाए॥5॥
भावार्थ:- वानरों ने क्रोध करके दुर्गम किले को घेर लिया। नगर में बहुत ही कोलाहल (शोर) मच गया। राक्षस बहुत तरह के अस्त्र-शस्त्र धारण करके दौड़े और उन्होंने किले पर पहाड़ों के शिखर ढहाए॥5॥ छ्भद :
ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले। घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले॥ मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भणए। गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहि जहैँ सो तहैँ निसिचर हए॥
भावार्थ:- उन्होंने पर्वतों के करोड़ों शिखर ढहाए, अनेक प्रकार से गोले चलने लगे। वे गोले ऐसा घहराते हैं जैसे वज़रपात हुआ हो (बिजली गिरी हो) और योद्धा ऐसे गरजते हैं, मानो प्रलयकाल के बादल हों। विकट वानर योद्धा भिड़ते हैं, कट जाते हैं (घायल हो जाते हैं), उनके शरीर जर्जर (चलनी) हो जाते हैं, तब भी वे लटते नहीं (हिम्मत नहीं हारते)। वे पहाड़ उठाकर उसे किले पर फेंकते हैं। राक्षस जहाँ के तहाँ (जो जहाँ होते हैं, वहीं) मारे जाते हैं।
॥ दोहा ॥
मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ पुनि छेंका आइ। उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ॥49॥।
भावार्थ:- मेघनाद ने कानों से ऐसा सुना कि वानरों ने आकर फिर किले को घेर लिया है। तब वह वीर किले से उतरा और डंका बजाकर उनके सामने चला॥49॥।
॥ चौपाई ॥
कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता। धन्वी सकल लोत बिख्याता॥ कहूँ नल नील दुबिद सुग्रीवा। अंगद हनूमंत बल सींवा॥
भावार्थ:-(मेघनाद ने पुकारकर कहा-) समस्त लोकों में प्रसिद्ध धनुर्धर कोसलाधीश दोनों भाई कहाँ हैं? नल, नील, द्विविद, सुग्रीव और बल की सीमा अंगद और हनुमान् कहाँ हैं?॥ ॥।
कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही। आजु सबहि हठि मारउँ ओही॥ अस कह कठिन बान संधाने। अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने॥2॥
भावार्थ:-भाई से द्रोह करने वाला विभीषण कहाँ है? आज मैं सबको और उस दुष्ट को तो हठपूर्वक (अवश्य ही) मारूँगा। ऐसा कहकर उसने धनुष पर कठिन बाणों का सन्धान किया और अत्यंत क्रोध करके उसे कान तक खींचा॥2॥
सर समूह सो छाड़ै लागा। जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा॥ जहूँ तहँ परत देखिअहिं बानर। सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर॥3॥
भावार्थ:- वह बाणों के समूह छोड़ने लगा। मानो बहुत से पंखवाले साँप दौड़े जा रहे हों। जहाँ-तहाँ वानर गिरते दिखाई पड़ने लगे। उस समय कोई भी उसके सामने न हो सके॥3॥
जहैँ तहँ भागि चले कपि रीछा। बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा॥ सो कपि भालु न रन महँ देखा। कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा॥4॥।
भावार्थ:- रीछ-वानर जहाँ-तहाँ भाग चले। सबको युद्ध की इच्छा भूल गई। रणभूमि में ऐसा एक भी वानर या भालू नहीं दिखाई पड़ा, जिसको उसने प्राणमात्र अवशेष न कर दिया हो (अर्थात् जिसके केवल प्राणमात्र ही न बचे हों, बल, पुरुषार्थ सारा जाता न रहा हो) ॥4॥।
॥ दोहा ॥
दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर। सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर॥50॥।
भावार्थ:- फिर उसने सबको दस-दस बाण मारे, वानर वीर पृथ्वी पर गिर पड़े। बलवान् और धीर मेघनाद सिंह के समान नाद करके गरजने लगा॥50॥
॥ चौपाई ॥
देखि पवनसुत कटक बिहाला। क्रोधवंत जनु धायउ काला॥ महासैल एक तुरत उपारा। अति रिस मेघनाद पर डारा॥॥
भावार्थ:- सारी सेना को बेहाल (व्याकुल) देखकर पवनसुत हनुमान् क्रोध करके ऐसे दौड़े मानो स्वयं काल दौड़ आता हो। उन्होंने तुरंत एक बड़ा भारी पहाड़ उखाड़ लिया और बड़े ही क्रोध के साथ उसे मेघनाद पर छोड़ा॥॥
आवत देखि गयउ नभ सोई। रथ सारथी तुरग सब खोई॥। बार बार पचार हनुमाना। निकट न आव मरमु सो जाना॥2॥
भावार्थ:- पहाड़ों को आते देखकर वह आकाश में उड़ गया। (उसके) रथ, सारथी और घोड़े सब नष्ट हो गए (चूर-चूर हो गए) हनुमान्जी उसे बार-बार ललकारते हैं। पर वह निकट नहीं आता, क्योंकि वह उनके बल का मर्म जानता था॥2॥।
रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भाँति करेसि दुर्बादा॥ अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे। कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे॥3॥।
भावार्थ:- (तब) मेघनाद श्री रघुनाथजी के पास गया और उसने (उनके प्रति) अनेकों प्रकार के दुर्वचनों का प्रयोग किया। (फिर) उसने उन पर अस्त्र-शस्त्र तथा और सब हथियार चलाए! प्रभु ने खेल में ही सबको काटकर अलग कर दिया॥3॥
देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना॥ जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला। डरपावै गहि स्वल्प सपेला॥4॥
भावार्थ:- श्री रामजी का प्रताप (सामर्थ्य) देखकर वह मूर्ख लज्नित हो गया और अनेकों प्रकार की माया करने लगा। जैसे कोई व्यक्ति छोटा सा साँप का बच्चा हाथ में लेकर गरुड़ को डरावे और उससे खेल करे॥4॥।
॥ दोहा ॥
जासु प्रबल माया बस सिव बिरंचि बड़ छोट। ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट॥54॥
भावार्थ:- शिवजी और ब्रह्माजी तक बड़े-छोटे (सभी) जिनकी अत्यंत बलवान् माया के वश में हैं, नीच बुद्धि निशाचर उनको अपनी माया दिखलाता है॥5॥। चौपाई : :
नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा। महि ते प्रगट होहिं जलधारा॥ नाना भाँति पिसाच पिसाची। मारु काटु धुनि बोलहिं नाची॥॥
भावार्थ:- आकाश में (ऊँचे) चढ़कर वह बहुत से अंगारे बरसाने लगा। पृथ्वी से जल की धाराएँ प्रकट होने लगीं। अनेक प्रकार के पिशाच तथा पिशाचिनियाँ नाच-नाचकर 'मारो, काटो' की आवाज करने लगीं॥॥
बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा। बरषइ कबहूँ उपल बहु छाड़ा॥ बरघि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा। सूझ न आपन हाथ पसारा॥2॥।
भावार्थ:- वह कभी तो विष्टा, पीब, खून, बाल और हड़्ियाँ बरसाता था और कभी बहुत से पत्थर फेंक देता था। फिर उसने धूल बरसाकर ऐसा अँधेरा कर दिया कि अपना ही पसारा हुआ हाथ नहीं सूझता था॥2॥
कपि अकुलाने माया देखें। सब कर मरन बना ऐहि लेखें॥ कौतुक देखि राम मुसुकाने। भए सभीत सकल कपि जाने॥3॥।
भावार्थ:- माया देखकर वानर अकुला उठे। वे सोचने लगे कि इस हिसाब से (इसी तरह रहा) तो सबका मरण आ बना। यह कौतुक देखकर श्री रामजी मुस्कुराए। उन्होंने जान लिया कि सब वानर भयभीत हो गए हैं॥3॥
एक बान काटी सब माया। जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया॥ कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके। भए प्रबल रन रहहिं न रोके॥4॥
भावार्थ:- तब श्री रामजी ने एक ही बाण से सारी माया काट डाली, जैसे सूर्य अंधकार के समूह को हर लेता है। तदनन्तर उन्होंने कृपाभरी दृष्टि से वानर-भालुओं की ओर देखा, (जिससे) वे ऐसे प्रबल हो गए कि रण में रोकने पर भी नहीं रुकते थे॥4॥
॥ दोहा ॥
आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ। लछ़िमन चले क्रद्ध होइ बान सरासन हाथ॥52॥
भावार्थ:- श्री रामजी से आज्ञा माँगकर, अंगद आदि वानरों के साथ हाथों में धनुष-बाण लिए हुए श्री लक्ष्मणजी क्रुद्ध होकर चले॥।52॥
॥ चौपाई ॥
छुतज नयन उर बाह बिसाला। हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला॥ इहाँ दसानन सुभट पठाए। नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए॥॥
भावार्थ:- उनके लाल नेत्र हैं, चौड़ी छाती और विशाल भुजाएँ हैं। हिमाचल पर्वत के समान उज्ज्वल (गौरवर्ण) शरीर कुछ ललाई लिए हुए है। इधर रावण ने भी बड़े-बड़े योद्धा भेजे, जो अनेकों अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़े॥॥
भूधर नख बिटपायुध धारी। धाए कपि जय राम पुकारी॥ भिरे सकल जोरिहि सन जोरी। इत उत जय इच्छा नहिं थोरी॥2॥।
भावार्थ:- पर्वत, नख और वृक्ष रूपी हथियार धारण किए हुए वानर 'श्री रामचंद्रजी की जय' पुकारकर दौड़े। वानर और राक्षस सब जोड़ी से जोड़ी भिड़ गए। इधर और उधर दोनों ओर जय की इच्छा कम न थी (अर्थात् प्रबल थी)॥2॥।
मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं। कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं॥ मारु मारु धरु धरु धरु मारू। सीस तोरि गहि भुजा उपारू॥3॥
भावार्थ:- वानर उनको घूँसों और लातों से मारते हैं, दाँतों से काटते हैं। विजयशील वानर उन्हें मारकर फिर डाँटते भी हैं। 'मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, पकड़कर मार दो, सिर तोड़ दो और भुजाएँ पकड़कर उखाड़ लो'॥3॥।
असि रव पूरि रही नव खंडा। धावहिं जहैँ तहैँ रुंड प्रचंडा॥ देखहिं कौतुक नभ सुर बुंदा। कबहुँक बिसमय कबहूँ अनंदा॥4॥।
भावार्थ:-नवों खंडों में ऐसी आवाज भर रही है। प्रचण्ड रुण्ड (धड़) जहाँ-तहाँ दौड़ रहे हैं। आकाश में देवतागण यह कौतुक देख रहे हैं। उन्हें कभी खेद होता है और कभी आनंद॥4॥
॥ दोहा ॥
रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ। जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्मो छाइ॥53॥।
भावार्थ:- खून गड़ों में भर-भरकर जम गया है और उस पर धूल उड़कर पड़ रही है (वह दृश्य ऐसा है) मानो अंगारों के ढेरों पर राख छा रही हो॥53॥।
॥ चौपाई ॥
घायल बीर बिराजहिं कैसे। कुसुमति किंसुक के तरु जैसे॥ लछ़िमन मेघनाद द्वौ जोधा। भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा॥
भावार्थ:- घायल वीर कैसे शोभित हैं, जैसे फूले हुए पलास के पेड़। लक्ष्मण और मेघनाद दोनों योद्धा अत्यंत क्रोध करके एक-दूसरे से भिड़ते हैं॥॥
एकहि एक सकइ नहिं जीती। निसिचर छल बल करइ अनीती॥ क्रोधवंत तब भयउ अनंता। भंजेउ रथ सारथी तुरंता॥2॥।
भावार्थ:- एक-दूसरे को (कोई किसी को) जीत नहीं सकता। राक्षस छल- बल (माया) और अनीति (अधर्म) करता है, तब भगवान् अनन्तजी (लक्ष्मणजी) क्रोधित हुए और उन्होंने तुरंत उसके रथ को तोड़ डाला और सारथी को टुकड़े-टुकड़े कर दिया!॥2॥
नाना बिधि प्रहार कर सेषा। राच्छस भयउ प्रान अवसेषा॥ रावन सुत निज मन अनुमाना। संकठ भयउ हरिहि मम प्राना॥3॥
भावार्थ:- शेषजी (लक्ष्मणजी) उस पर अनेक प्रकार से प्रहार करने लगे। राक्षस के प्राणमात्र शेष रह गए। रावणपुत्र मेघनाद ने मन में अनुमान किया कि अब तो प्राण संकट आ बना, ये मेरे प्राण हर लेंगे॥3॥
बीरघातिनी छाड़िसि साँगी। तेजपुंज लब्धिमन उर लागी॥। मुरुछा भई सक्ति के लागें। तब चलि गयउ निकट भय त्यागें॥4॥।
भावार्थ:-तब उसने वीरघातिनी शक्ति चलाई। वह तेजपूर्ण शक्ति लक्ष्मणजी की छाती में लगी। शक्ति लगने से उन्हें मूर्दा आ गई। तब मेघनाद भय छोड़कर उनके पास चला गया॥4॥
॥ दोहा ॥
मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ। जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ॥54॥
भावार्थ:- मेघनाद के समान सौ करोड़ (अगणित) योद्धा उन्हें उठा रहे हैं, परन्तु जगत् के आधार श्री शेषजी (लक्ष्मणजी) उनसे कैसे उठते? तब वे लजाकर चले गए॥54॥
॥ चौपाई ॥
सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू। जारइ भुवन चारिदस आसू॥ सक संग्राम जीति को ताही। सेवहिं सुर नर अग जग जाही॥॥
भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं-) हे गिरिजे! सुनो, (प्रलयकाल में) जिन (शेषनाग) के क्रोध की अग्ि चौदहों भुवनों को तुरंत ही जला डालती है और देवता, मनुष्य तथा समस्त चराचर (जीव) जिनकी सेवा करते हैं, उनको संग्राम में कौन जीत सकता है?॥॥
यह कौतूहल जानइ सोई। जा पर कृपा राम कै होई॥ संध्या भय फिरि द्वौ बाहनी। लगे सँभारन निज निज अनी॥2॥
भावार्थ:-इस लीला को वही जान सकता है, जिस पर श्री रामजी की कृपा हो। संध्या होने पर दोनों ओर की सेनाएँ लौट पड़ीं, सेनापति अपनी-अपनी सेनाएँ संभालने लगे॥2॥।
व्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर। लछ्धिमन कहाँ बूझ करुनाकर॥ तब लगि लै आयउ हनुमाना। अनुज देखि प्रभु अति दुख माना॥3॥
भावार्थ:- व्यापक, ब्रह्म, अजेय, संपूर्ण ब्रह्मांड के ईश्वर और करुणा की खान श्री रामचंद्रजी ने पूछा- लक्ष्मण कहाँ हैं? तब तक हनुमान् उन्हें ले आए! छोटे भाई को (इस दशा में) देखकर प्रभु ने बहुत ही दुःख माना॥3॥। लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, लक्ष्मणजी को शक्ति लगना
जामवंत कह बैद सुषेना। लंकाँ रहइ को पठई लेना॥ धरि लघु रूप गयउ हनुमंता। आनेउ भवन समेत तुरंता॥4॥
भावार्थ:- जाम्बवान् ने कहा- लंका में सुषेण वैद्य रहता है, उसे लाने के लिए किसको भेजा जाए? हनुमानजी छोटा रूप धरकर गए और सुषेण को उसके घर समेत तुरंत ही उठा लाए।॥4॥।
॥ दोहा ॥
राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन। कहा नाम गिरि औषधी जाह्ट पवनसुत लेन ॥55॥।
भावार्थ:- सुषेण ने आकर श्री रामजी के चरणारविन्दों में सिर नवाया। उसने पर्वत और औषध का नाम बताया, (और कहा कि) हे पवनपुत्र! औषधि लेने जाओ॥55॥।
॥ चौपाई ॥
राम चरन सरसिज उर राखी। चला प्रभंजनसुत बल भाषी॥। उहाँ दूत एक मरमु जनावा। रावनु कालनेमि गृह आवा॥॥
भावार्थ:-श्री रामजी के चरणकमलों को हृदय में रखकर पवनपुत्र हनुमानजी अपना बल बखानकर (अर्थात् मैं अभी लिए आता हूँ, ऐसा कहकर) चले। उधर एक गुप्तचर ने रावण को इस रहस्य की खबर दी। तब रावण कालनेमि के घर आया॥॥
दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना। पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना॥ देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा। तासु पंथ को रोकन पारा॥2॥
भावार्थ:-रावण ने उसको सारा मर्म (हाल) बतलाया। कालनेमि ने सुना और बार-बार सिर पीटा (खेद प्रकट किया)। (उसने कहा-) तुम्हारे देखते-देखते जिसने नगर जला डाला, उसका मार्ग कौन रोक सकता है?॥2॥
भजि रघुपति करु हित आपना। छाँड़ह नाथ मृषा जल्पना॥ नील कंज तनु सुंदर स्यामा। हृदयँ राखु लोचनाभिरामा॥3॥
भावार्थ:- श्री रघुनाथजी का भजन करके तुम अपना कल्याण करो! है नाथ! झूठी बकवाद छोड़ दो। नेत्रों को आनंद देने वाले नीलकमल के समान सुंदर श्याम शरीर को अपने हृदय में रखो॥ 3॥
मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू। महा मोह निसि सूतत जागू॥ काल ब्याल कर भच्छक जोई। सपनेहूँ समर कि जीतिअ सोई॥4॥।
भावार्थ:- मैं-तू (भेद-भाव) और ममता रूपी मूढ़ता को त्याग दो। महामोह (अज्ञान) रूपी रात्रि में सो रहे हो, सो जाग उठो, जो काल रूपी सर्प का भी भक्षक है, कहीं स्वप्न में भी वह रण में जीता जा सकता है? ॥4॥