श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
श्रीरामचरितमानस

लंकाकाण्ड · भाग ३

लंकाकाण्ड · भाग ३ / ५
भाग ३ / ५
॥ दोहा ॥

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार। राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार॥56॥

भावार्थ:- उसकी ये बातें सुनकर रावण बहुत ही क्रोधित हुआ। तब कालनेमि ने मन में विचार किया कि (इसके हाथ से मरने की अपेक्षा) श्री रामजी के दूत के हाथ से ही मरूँ तो अच्छा है। यह दुष्ट तो पाप समूह में रत है॥56॥
॥ चौपाई ॥

अस कहि चला रचिसि मग माया। सर मंदिर बर बाग बनाया॥ मारुतसुत देखा सुभ आश्रम। मुनिहि बूझ्ि जल पियौँ जाइ श्रम॥॥

भावार्थ:- वह मन ही मन ऐसा कहकर चला और उसने मार्ग में माया रची। तालाब, मंदिर और सुंदर बाग बनाया। हनुमानजी ने सुंदर आश्रम देखकर सोचा कि मुनि से पूछकर जल पी लूँ, जिससे थकावट दूर हो जाए॥

राच्छस कपट बेष तहैँ सोहा। मायापति दूतहि चह मोहा॥ जाइ पवनसुत नायउ माथा। लाग सो कहै राम गुन गाथा॥2॥

भावार्थ:-राक्षस वहाँ कपट (से मुनि) का वेष बनाए विराजमान था। वह मूर्ख अपनी माया से मायापति के दूत को मोहित करना चाहता था। मारुति ने उसके पास जाकर मस्तक नवाया। वह श्री रामजी के गुणों की कथा कहने लगा॥2॥।

होत महा रन रावन रामहिं। जितिहहिं राम न संसय या महिं॥ इहाँ भरएँ मैं देखउँ भाई। ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई॥3॥

भावार्थ:-(वह बोला-) रावण और राम में महान्‌ युद्ध हो रहा है। रामजी जीतेंगे, इसमें संदेह नहीं है। हे भाई! मैं यहाँ रहता हुआ ही सब देख रहा हूँ। मुझे ज्ञानदृष्टि का बहुत बड़ा बल है॥3॥।

मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल। कह कपि नहिं अघाऊँ थोरें जल॥ सर मज्जन करि आतुर आवह। दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु॥4॥।

भावार्थ:- हनुमानजी ने उससे जल माँगा, तो उसने कमण्डलु दे दिया। हनुमानजी ने कहा- थोड़े जल से मैं तृप्त नहीं होने का। तब वह बोला- तालाब में खान करके तुरंत लौट आओ तो मैं तुम्हे दीक्षा दूँ, जिससे तुम ज्ञान प्राप्त करो॥4॥
॥ दोहा ॥

सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान। मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान॥57॥

भावार्थ:- तालाब में प्रवेश करते ही एक मगरी ने अकुलाकर उसी समय हनुमानजी का पैर पकड़ लिया। हनुमानजी ने उसे मार डाला। तब वह दिव्य देह धारण करके विमान पर चढ़कर आकाश को चली॥57॥
॥ चौपाई ॥

कपि तव दरस भउँ निष्पापा। मिटा तात मुनिबर कर सापा॥ मुनि न होइ यह निसिचर घोरा। मानह सत्य बचन कपि मोरा॥॥

भावार्थ:- (उसने कहा-) हे वानर! मैं तुम्हारे दर्शन से पापरहित हो गई। हे तात! श्रेष्ठ मुनि का शाप मिट गया। हे कपि! यह मुनि नहीं है, घोर निशाचर है। मेरा वचन सत्य मानो॥

अस कहि गई अपछरा जबहीं। निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं॥ कह कपि मुनि गुरदछिना लेह। पाछें हमहिं मंत्र तुम्ह देहू॥2॥

भावार्थ:- ऐसा कहकर ज्यों ही वह अप्सरा गई, त्यों ही हनुमानजी निशाचर के पास गए। हनुमानजी ने कहा- हे मुनि! पहले गुरुदक्षिणा ले लीजिए। पीछे आप मुझे मंत्र दीजिएगा॥2॥

सिर लंगूर लपेटि पछारा। निज तनु प्रगटेसि मरती बारा॥ राम राम कहि छाड़ेसि प्राना। सुनि मन हरघि चलेउ हनुमाना॥3॥

भावार्थ:- हनुमानजी ने उसके सिर को पूँछ में लपेटकर उसे पछाड़ दिया। मरते समय उसने अपना (राक्षसी) शरीर प्रकट किया। उसने राम-राम कहकर प्राण छोड़े। यह (उसके मुँह से राम-राम का उच्चारण) सुनकर हनुमान्‌जी मन में हर्षित होकर चले॥3॥

देखा सैल न औषध चीन्हा। सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा॥ गहि गिरि निसि नभ धावक भयऊ। अवधपुरी ऊपर कपि गयऊ॥4॥

भावार्थ:- उन्होंने पर्वत को देखा, पर औषध न पहचान सके। तब हनुमानजी ने एकदम से पर्वत को ही उखाड़ लिया। पर्वत लेकर हनुमान्‌जी रात ही में आकाश मार्ग से दौड़ चले और अयोध्यापुरी के ऊपर पहुँच गए॥4॥। भरतजी के बाण से हनुमान्‌ का मूर््छित होना, भरत-हनुमान्‌ संवाद
॥ दोहा ॥

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि। बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि॥58॥

भावार्थ:- भरतजी ने आकाश में अत्यंत विशाल स्वरूप देखा, तब मन में अनुमान किया कि यह कोई राक्षस है। उन्होंने कान तक धनुष को खींचकर बिना फल का एक बाण मारा॥58॥
॥ चौपाई ॥

परेउ मुरुछि महि लागत सायक। सुमिरत राम राम रघुनायक।॥ सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए। कपि समीप अति आतुर आए॥॥

भावार्थ:- बाण लगते ही हनुमानजी 'राम, राम, रघुपति' का उच्चारण करते हुए मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। प्रिय वचन (रामनाम) सुनकर भरतजी उठकर दौड़े और बड़ी उतावली से हनुमानजी के पास आए॥ ॥।

बिकल बिलोकि कीस उर लावा। जागत नहिं बहु भाँति जगावा॥ मुख मलीन मन भए दुखारी। कहत बचन भरि लोचन बारी॥2॥

भावार्थ:-हनुमान्‌जी को व्याकुल देखकर उन्होंने हृदय से लगा लिया। बहुत तरह से जगाया, पर वे जागते न थे! तब भरतजी का मुख उदास हो गया। वे मन में बड़े दुःखी हुए और नेत्रों में (विषाद के आँसुओं का) जल भरकर ये वचन बोले-॥2॥

जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा। तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा॥ जौं मोरें मन बच अरु काया॥ प्रीति राम पद कमल अमाया॥3॥

भावार्थ:- जिस विधाता ने मुझे श्री राम से विमुख किया, उसी ने फिर यह भयानक दुःख भी दिया। यदि मन, वचन और शरीर से श्री रामजी के चरणकमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो,॥3॥।

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला। जौं मो पर रघुपति अनुकूला॥ सुनत बचन उठि बैठ कपीसा। कहि जय जयति कोसलाधीसा॥4॥

भावार्थ:- और यदि श्री रघुनाथजी मुझ पर प्रसन्न हों तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित हो जाए। यह वचन सुनते ही कपिराज हनुमानजी 'कोसलपति श्री रामचंद्रजी की जय हो, जय हो' कहते हुए उठ बैठे॥4॥।
॥ सोरठा ॥

लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल। प्रीति न हृदय समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक॥59॥

भावार्थ:- भरतजी ने वानर (हनुमान्‌जी) को हृदय से लगा लिया, उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में (आनंद तथा प्रेम के आँसुओं का) जल भर आया। रघुकुलतिलक श्री रामचंद्रजी का स्मरण करके भरतजी के हृदय में प्रीति समाती न थी॥59॥
॥ चौपाई ॥

तात कुसल कह सुखनिधान की। सहित अनुज अरु मातु जानकी॥। लकपि सब चरित समास बखाने। भए दुखी मन महूँ पछ्िताने॥॥

भावार्थ:- (भरतजी बोले-) हे तात! छोटे भाई लक्ष्मण तथा माता जानकी सहित सुखनिधान श्री रामजी की कुशल कहो। वानर (हनुमान्‌जी) ने संक्षेप में सब कथा कही। सुनकर भरतजी दुःखी हुए और मन में पछधताने लगे॥ ॥

अहह दैव मैं कत जग जायउँ। प्रभु के एकह्ठ काज न आयरऊँ॥ जानि कुअवसरु मन धरि धीरा। पुनि कपि सन बोले बलबीरा॥2॥।

भावार्थ:- हा दैव! मैं जगत्‌ में क्यों जन्मा? प्रभु के एक भी काम न आया। फिर कुअवसर (विपरीत समय) जानकर मन में धीरज धरकर बलवीर भरतजी हनुमानजी से बोले-॥2॥

तात गहरु होइहि तोहि जाता। काजु नसाइहि होत प्रभाता॥ चढ्ठ मम सायक सैल समेता। पठवाँ तोहि जहँ कृपानिकेता॥ 3॥

भावार्थ:-हे तात! तुमको जाने में देर होगी और सबेरा होते ही काम बिगड़ जाएगा। (अतः) तुम पर्वत सहित मेरे बाण पर चढ़ जाओ, मैं तुमको वहाँ भेज दूँ जहाँ कृपा के धाम श्री रामजी हैं॥3॥।

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना। मोरें भार चलिहि किमि बाना॥ राम प्रभाव बिचारि बहोरी। बंदि चरन कह कपि कर जोरी॥4॥

भावार्थ:-भरतजी की यह बात सुनकर (एक बार तो) हनुमानजी के मन में अभिमान उत्पन्न हुआ कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा? (किन्तु) फिर श्री रामचंद्रजी के प्रभाव का विचार करके वे भरतजी के चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर बोले-॥4॥।
॥ दोहा ॥

तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहउँ नाथ तुरंत। अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत॥60 क॥

भावार्थ:- हे नाथ! हे प्रभो! मैं आपका प्रताप हृदय में रखकर तुरंत चला जाऊँगा। ऐसा कहकर आज्ञा पाकर और भरतजी के चरणों की वंदना करके हनुमान्‌ूजी चले॥60 (क)॥

भरत बाह बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार। मन महूँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥60 ख॥

भावार्थ:-भरतजी के बाहुबल, शील (सुंदर स्वभाव), गुण और प्रभु के चरणों में अपार प्रेम की मन ही मन बारंबार सराहना करते हुए मारुति श्री हनुमानजी चले जा रहे हैं॥60 (ख)॥। श्री रामजी की प्रलापलीला, हनुमानजी का लौटना, लक्ष्मणजी का उठ बैठना
॥ चौपाई ॥

उहाँ राम लछ्धिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥ अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायउ॥॥

भावार्थ:- वहाँ लक्ष्मणजी को देखकर श्री रामजी साधारण मनुष्यों के अनुसार (समान) वचन बोले- आधी रात बीत चुकी है, हनुमान्‌ नहीं आए। यह कहकर श्री रामजी ने छोटे भाई लक्ष्मणजी को उठाकर हृदय से लगा लिया॥

सकह न दुखित देखि मोहि काउ। बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ॥। मम हित लागि तजेह पितु माता। सहेह बिपिन हिम आतप बाता॥2॥

भावार्थ:- (और बोले-) हे भाई! तुम मुझे कभी दुःखी नहीं देख सकते थे। तुम्हारा स्वभाव सदा से ही कोमल था। मेरे हित के लिए तुमने माता- पिता को भी छोड़ दिया और वन में जाड़ा, गरमी और हवा सब सहन किया॥2॥

सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठह न सुनि मम बच बिकलाई॥ जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥3॥।

भावार्थ:-हे भाई! वह प्रेम अब कहाँ है? मेरे व्याकुलतापूर्वक वचन सुनकर उठते क्यों नहीं? यदि मैं जानता कि वन में भाई का विछोह होगा तो मैं पिता का वचन (जिसका मानना मेरे लिए परम कर्तव्य था) उसे भी न मानता॥3॥।

सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा॥ अस बिचारि जियँ जागह ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥4॥।

भावार्थ:-पुत्र, धन, स्त्री, घर और परिवार- ये जगत्‌ में बार-बार होते और जाते हैं, परन्तु जगत्‌ में सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता। हृदय में ऐसा विचार कर हे तात! जागो ॥र4॥

जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥ अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥5॥

भावार्थ:- जैसे पंख बिना पक्षी, मणि बिना सर्प और सूँड बिना श्रेष्ठ हाथी अत्यंत दीन हो जाते हैं, हे भाई! यदि कहीं जड़ दैव मुझे जीवित रखे तो तुम्हारे बिना मेरा जीवन भी ऐसा ही होगा॥5॥

जैहउँ अवध कौन मुह लाई। नारि हेतु प्रिय भाई गँवाई॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥6॥।

भावार्थ:- स्त्री के लिए प्यारे भाई को खोकर, मैं कौन सा मुँह लेकर अवध जाऊँगा? मैं जगत्‌ में बदनामी भले ही सह लेता (कि राम में कुछ भी वीरता नहीं है जो स्त्री को खो बैठे)। स्त्री की हानि से (इस हानि को देखते) कोई विशेष क्षति नहीं थी॥6॥

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥ निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥7॥

भावार्थ:- अब तो हे पुत्र! मेरे निष्ठर और कठोर हृदय यह अपयश और तुम्हारा शोक दोनों ही सहन करेगा। हे तात! तुम अपनी माता के एक ही पुत्र और उसके प्राणाधार हो॥7॥

सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥ उतरु काह दैहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावह भाई॥8॥।

भावार्थ:- सब प्रकार से सुख देने वाला और परम हितकारी जानकर उन्होंने तुम्हें हाथ पकड़कर मुझे सौंपा था। मैं अब जाकर उन्हें क्या उत्तर दूँगा? हे भाई! तुम उठकर मुझे सिखाते (समझाते) क्यों नहीं? ॥8॥।

बह बिधि सोचत सोच बिमोचन। ख्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥ उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥9॥

भावार्थ:-सोच से छुड़ाने वाले श्री रामजी बहुत प्रकार से सोच कर रहे हैं। उनके कमल की पंखुड़ी के समान नेत्रों से (विषाद के आँसुओं का) जल बह रहा है। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! श्री रघुनाथजी एक (अद्वितीय) और अखंड (वियोगरहित) हैं। भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान्‌ ने (लीला करके) मनुष्य की दशा दिखलाई है॥9॥
॥ सोरठा ॥

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर। आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस॥64॥।

भावार्थ:-प्रभु के (लीला के लिए किए गए) प्रलाप को कानों से सुनकर वानरों के समूह व्याकुल हो गए। (इतने में ही) हनुमानजी आ गए, जैसे करुणरस (के प्रसंग) में वीर रस (का प्रसंग) आ गया हो॥64॥
॥ चौपाई ॥

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना॥ तुरत बैद तब कीन्ह उपाई। उठि बैठे लद्धिमन हरघषाई॥ ॥

भावार्थ:-श्री रामजी हर्षित होकर हनुमान्‌जी से गले मिले। प्रभु परम सुजान (चतुर) और अत्यंत ही कृतज्ञ हैं। तब वैद्य (सुषेण) ने तुरंत उपाय किया, (जिससे) लक्ष्मणजी हर्षित होकर उठ बैठे॥

ह्रदयेँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता॥ कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा॥2॥

भावार्थ:-प्रभु भाई को हृदय से लगाकर मिले। भालू और वानरों के समूह सब हर्षित हो गए। फिर हनुमान्‌जी ने वैद्य को उसी प्रकार वहाँ पहुँचा दिया, जिस प्रकार वे उस बार (पहले) उसे ले आए थे॥2॥। रावण का कुम्भकर्ण को जगाना, कुम्भकर्ण का रावण को उपदेश और विभीषण-कुम्भकर्ण संवाद
॥ चौपाई ॥

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥ ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥3॥

भावार्थ:- यह समाचार जब रावण ने सुना, तब उसने अत्यंत विषाद से बार-बार सिर पीटा। वह व्याकुल होकर कुंभकर्ण के पास गया और बहुत से उपाय करके उसने उसको जगाया॥3॥

जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहूँ कालु देह धरि बैसा॥ कुंभकरन बूझा कह भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई॥4॥।

भावार्थ:- कुंभकर्ण जगा (उठ बैठा) वह कैसा दिखाई देता है मानो स्वयं काल ही शरीर धारण करके बैठा हो। कुंभकर्ण ने पूछा- हे भाई! कहो तो, तुम्हारे मुख सूख क्यों रहे हैं?॥4॥।

कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥ तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे॥5॥

भावार्थ:-उस अभिमानी (रावण) ने उससे जिस प्रकार से वह सीता को हर लाया था (तब से अब तक की) सारी कथा कही। (फिर कहा-) है तात! वानरों ने सब राक्षस मार डाले। बड़े-बड़े योद्धाओं का भी संहार कर डाला॥5॥

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी ॥ अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥6॥

भावार्थ:-दुर्मुख, देवशत्रु (देवान्तक), मनुष्य भक्षक (नरान्तक), भारी योद्धा अतिकाय और अकम्पन तथा महोदर आदि दूसरे सभी रणधीर वीर रणभूमि में मारे गए॥6॥
॥ दोहा ॥

सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान। जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान॥62॥।

भावार्थ:- तब रावण के वचन सुनकर कुंभकर्ण बिलखकर (दुःखी होकर) बोला- अरे मूर्ख! जगज्जननी जानकी को हर लाकर अब कल्याण चाहता है?॥62॥
॥ चौपाई ॥

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा। अब मोहि आइ जगाएहि काहा॥ अजहूँ तात त्यागि अभिमाना। भजह राम होइहि कल्याना॥॥

भावार्थ:- हे राक्षसराज! तूने अच्छा नहीं किया। अब आकर मुझे क्यों जगाया? हे तात! अब भी अभिमान छोड़कर श्री रामजी को भजो तो कल्याण होगा॥॥

हैं दससीस मनुज रघुनायक। जाके हनूमान से पायक।॥ अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई। प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई॥2॥

भावार्थ:- हे रावण! जिनके हनुमान्‌ सरीखे सेवक हैं, वे श्री रघुनाथजी क्या मनुष्य हैं? हाय भाई! तूने बुरा किया, जो पहले ही आकर मुझे यह हाल नहीं सुनाया॥2॥

कीन्हेह प्रभु बिरोध तेहि देवक। सिव बिरंचि सुर जाके सेवक॥ नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा। कहतेउँ तोहि समय निरबाहा॥3॥।

भावार्थ:- हे स्वामी! तुमने उस परम देवता का विरोध किया, जिसके शिव, ब्रह्मा आदि देवता सेवक हैं। नारद मुनि ने मुझे जो ज्ञान कहा था, वह मैं तुझसे कहता, पर अब तो समय जाता रहा॥3॥।

अब भरि अंक भेंट मोहि भाई। लोचन सुफल करों मैं जाई॥ स्याम गात सरसीरुह लोचन। देखौं जाइ ताप त्रय मोचन॥4॥।

भावार्थ:-हे भाई! अब तो (अन्तिम बार) अँकवार भरकर मुझसे मिल ले। मैं जाकर अपने नेत्र सफल करूँ। तीनों तापों को छुड़ाने वाले श्याम शरीर, कमल नेत्र श्री रामजी के जाकर दर्शन करूँ॥4॥
॥ दोहा ॥

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक। रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक॥63॥।

भावार्थ:-श्री रामचंद्रजी के रूप और गुणों को स्मरण करके वह एक क्षण के लिए प्रेम में मम्र हो गया। फिर रावण से करोड़ों घड़े मदिरा और अनेकों भैंसे मँगवाए॥63॥
॥ चौपाई ॥

महिषखाइ करि मदिरा पाना। गर्जा बज्ाघात समाना॥ कुंभकरन दुर्भद रन रंगा। चला दुर्ग तजि सेन न संगा॥॥

भावार्थ:-भैंसे खाकर और मदिरा पीकर वह वज्जघात (बिजली गिरने) के समान गरजा। मद से चूर रण के उत्साह से पूर्ण कुंभकर्ण किला छोड़कर चला। सेना भी साथ नहीं ली॥॥

देखि बिभीषतु आगें आयउ। परेउ चरन निज नाम सुनायउ॥ अनुज उठाइ ह्ृदयँ तेहि लायो। रघुपति भक्त जानि मन भायो॥2॥

भावार्थ:-उसे देखकर विभीषण आगे आए और उसके चरणों पर गिरकर अपना नाम सुनाया। छोटे भाई को उठाकर उसने ह्वृदय से लगा लिया और श्री रघुनाथजी का भक्त जानकर वे उसके मन को प्रिय लगे॥2॥

तात लात रावन मोहि मारा। कहत परम हित मंत्र बिचारा॥ तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ। देखि दीन प्रभु के मन भायउँ॥ 3॥।

भावार्थ:-(विभीषण ने कहा-) हे तात! परम हितकर सलाह एवं विचार करने पर रावण ने मुझे लात मारी। उसी ग्लानि के मारे मैं श्री रघुनाथजी के पास चला आया। दीन देखकर प्रभु के मन को मैं (बहुत) प्रिय लगा॥3॥।

सुनु भयउ कालबस रावन। सो कि मान अब परम सिखावन॥ धन्य धन्य तैं धन्य विभीषन। भयह तात निसिचर कुल भूषन॥4॥

भावार्थ:-(कुंभकर्ण ने कहा-) हे पुत्र! सुन, रावण तो काल के वश हो गया है (उसके सिर पर मृत्यु नाच रही है)। वह क्या अब उत्तम शिक्षा मान सकता है? हे विभीषण! तू धन्य है, धन्य है। हे तात! तू राक्षस कुल का भूषण हो गया॥4॥

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर। भजेह राम सोभा सुख सागर॥5॥।

भावार्थ:-हे भाई! तूने अपने कुल को दैदीप्यमान कर दिया, जो शोभा और सुख के समुद्र श्री रामजी को भजा॥5॥
॥ दोहा ॥

बचन कर्म मन कपट तजि भजेह राम रनधीर। जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर॥64॥।

भावार्थ:-मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर रणधीर श्री रामजी का भजन करना। हे भाई! मैं काल (मृत्यु) के वश हो गया हूँ, मुझे अपना- पराया नहीं सूझता, इसलिए अब तुम जाओ॥64॥ कुम्भकर्ण युद्ध और उसकी परमगति
॥ चौपाई ॥

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन। आयउ जहैँ त्रैलोक बिभूषन॥ नाथ भूधराकार सरीरा। कुंभकरन आवत रनधीरा॥

भावार्थ:- भाई के वचन सुनकर विभीषण लौट गए और वहाँ आए, जहाँ त्रिलोकी के भूषण श्री रामजी थे। (विभीषण ने कहा-) हे नाथ! पर्वत के समान (विशाल) देह वाला रणधीर कुंभकर्ण आ रहा है॥

एतना कपिन्ह सुना जब काना। किलकिलाइ धाए बलवाना॥ लिए उठाइ बिटप अरु भूधर। कटकटाइ डारहिं ता ऊपर॥2॥

भावार्थ:- वानरों ने जब कानों से इतना सुना, तब वे बलवान्‌ किलकिलाकर (हर्षध्वनि करके) दौड़े। वृक्ष और पर्वत (उखाड़कर) उठा लिए और (क्रोध से) दाँत कटकटाकर उन्हें उसके ऊपर डालने लगे॥2॥

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा। करहिं भालु कपि एक एक बारा॥ मुरयो न मनु तनु टर्‌यो न टार्‌यो। जिमि गज अर्क फलनि को मार्‌यो॥3॥

भावार्थ:- रीछ-वानर एक-एक बार में ही करोड़ों पहाड़ों के शिखरों से उस पर प्रहार करते हैं, परन्तु इससे न तो उसका मन ही मुड़ा (विचलित हुआ) और न शरीर ही टाले टला, जैसे मदार के फलों की मार से हाथी पर कुछ भी असर नहीं होता! ॥3॥।

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो। परयो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो॥ पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता। घुर्मित भूतल परेउ तुरंता॥4॥

भावार्थ:- तब हनुमान्‌जी ने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और सिर पीटने लगा। फिर उसने उठकर हनुमानजी को मारा। वे चक्कर खाकर तुरंत ही पृथ्वी पर गिर पड़े॥4॥

पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि। जहैँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि॥ चली बलीमुख सेन पराई। अति भय त्रसित न कोउ समुहाई॥5॥

भावार्थ:-फिर उसने नल-नील को पृथ्वी पर पछाड़ दिया और दूसरे योद्धाओं को भी जहाँ-तहाँ पटककर डाल दिया। वानर सेना भाग चली। सब अत्यंत भयभीत हो गए, कोई सामने नहीं आता॥5॥
॥ दोहा ॥

अंगदादि कपि मुरुद्धित करि समेत सुग्रीव। काँख दाबि कपिराज कहूँ चला अमित बल सींव॥65॥

भावार्थ:-सुग्रीव समेत अंगदादि वानरों को मूर्छित करके फिर वह अपरिमित बल की सीमा कुंभकर्ण वानरराज सुग्रीव को काँख में दाबकर चला॥65॥।
॥ चौपाई ॥

उमा करत रघुपति नरलीला। खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला॥ भूकुटि भंग जो कालहि खाई। ताहि कि सोहइ ऐसि लराई॥॥

भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! श्री रघुनाथजी वैसे ही नरलीला कर रहे हैं, जैसे गरुड़ सर्पों के समूह में मिलकर खेलता हो। जो भौंह के इशारे मात्र से (बिना परिश्रम के) काल को भी खा जाता है, उसे कहीं ऐसी लड़ाई शोभा देती है?॥

जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं। गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहृहिं॥ मुरुछा गइ मारुतसुत जागा। सुग्रीवहि तब खोजन लागा॥2॥।

भावार्थ:-भगवान्‌ (इसके द्वारा) जगत्‌ को पवित्र करने वाली वह कीर्ति फैलाएँगे, जिसे गा-गाकर मनुष्य भवसागर से तर जाएँगे। मूर्च्छां जाती रही, तब मारुति हनुमानजी जागे और फिर वे सुग्रीव को खोजने लगे॥2॥।

सुग्रीवहु कै मुरुछ्ा बीती। निबुकि गयउ तेहि मृतक प्रतीती॥ काटेसि दसन नासिका काना। गरजि अकास चलेउ तेहिं जाना॥3॥

भावार्थ:- सुग्रीव की भी मूर्च्छां दूर हुई, तब वे (मुर्द से होकर) खिसक गए (काँख से नीचे गिर पड़े)। कुम्भकर्ण ने उनको मृतक जाना। उन्होंने कुम्भकर्ण के नाक-कान दाँतों से काट लिए और फिर गरज कर आकाश की ओर चले, तब कुम्भकर्ण ने जाना॥3॥

गहेउ चरन गहि भूमि पछारा। अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा॥ पुनि आयउ प्रभु पहिं बलवाना। जयति जयति जय कृपानिधाना॥4॥

भावार्थ:-उसने सुग्रीव का पैर पकड़कर उनको पृथ्वी पर पछाड़ दिया। फिर सुग्रीव ने बड़ी फुर्ती से उठकर उसको मारा और तब बलवान्‌ सुग्रीव प्रभु के पास आए और बोले- कृपानिधान प्रभु की जय हो, जय हो, जय हो॥4॥

नाक कान काटे जियँ जानी। फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी॥ सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा। देखत कपि दल उपजी त्रासा॥5॥

भावार्थ:- नाक-कान काटे गए, ऐसा मन में जानकर बड़ी ग्लानि हुई और वह क्रोध करके लौटा। एक तो वह स्वभाव (आकृति) से ही भयंकर था और फिर बिना नाक-कान का होने से और भी भयानक हो गया। उसे देखते ही वानरों की सेना में भय उत्पन्न हो गया॥5॥
॥ दोहा ॥

जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह। एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह॥66॥

भावार्थ:-'रघुवंशमणि की जय हो, जय हो' ऐसा पुकारकर वानर हृह करके दौड़े और सबने एक ही साथ उस पर पहाड़ और वृक्षों के समूह छोड़े॥66॥
॥ चौपाई ॥

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा। सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा॥ कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई। जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई॥ ॥

भावार्थ:-रण के उत्साह में कुंभकर्ण विरुद्ध होकर (उनके) सामने ऐसा चला मानो क्रोधित होकर काल ही आ रहा हो। वह करोड़-करोड़ वानरों को एक साथ पकड़कर खाने लगा! (वे उसके मुँह में इस तरह घुसने लगे) मानो पर्वत की गुफा में टिड्टियाँ समा रही हों॥॥

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा। कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा॥ मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा। निसरि पराह्ं भालु कपि ठाटा॥2॥

भावार्थ:- करोड़ों (वानरों) को पकड़कर उसने शरीर से मसल डाला। करोड़ों को हाथों से मलकर पृथ्वी की धूल में मिला दिया। (पेट में गए हुए) भालू और वानरों के ठट्ट के ठट्ट उसके मुख, नाक और कानों की राह से निकल-निकलकर भाग रहे हैं॥2॥।

रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु ऐहि बिधि अर्पा॥ मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे॥3॥।

भावार्थ:-रण के मद में मत्त राक्षस कुंभकर्ण इस प्रकार गर्वित हुआ, मानो विधाता ने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो और उसे वह ग्रास कर जाएगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाए भी नहीं लौटते। आँखों से उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारने से सुनते नहीं! ॥3॥

कुंभकरन कपि फौज बिडारी। सुनि धाई रजनीचर धारी॥ देखी राम बिकल कटकाई। रिपु अनीक नाना बिधि आई॥4॥।

भावार्थ:- कुंभकर्ण ने वानर सेना को तितर-बितर कर दिया। यह सुनकर राक्षस सेना भी दौड़ी। श्री रामचंद्रजी ने देखा कि अपनी सेना व्याकुल है और शत्रु की नाना प्रकार की सेना आ गई है॥4॥
॥ दोहा ॥

सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेह सैन। मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन॥67॥

भावार्थ:- तब कमलनयन श्री रामजी बोले- हे सुग्रीव! हे विभीषण! और हे लक्ष्मण! सुनो, तुम सेना को संभालना। मैं इस दुष्ट के बल और सेना को देखता हूँ॥67॥
॥ चौपाई ॥

कर सारंग साजि कटि भाथा। अरि दल दलन चले रघुनाथा॥ प्रथम कीन्ति प्रभु धनुष टंकोरा। रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा॥

भावार्थ:- हाथ में शार्गधनुष और कमर में तरकस सजाकर श्री रघुनाथजी शत्रु सेना को दलन करने चले। प्रभु ने पहले तो धनुष का टंकार किया, जिसकी भयानक आवाज सुनते ही शत्रु दल बहरा हो गया॥॥

सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा। कालसर्प जनु चले सपच्छा॥ जहैँ तहँ चले बिपुल नाराचा। लगे कटन भट बिकट पिसाचा॥2॥

भावार्थ:- फिर सत्यप्रतिज्ञ श्री रामजी ने एक लाख बाण छोड़े। वे ऐसे चले मानो पंखवाले काल सर्प चले हों। जहाँ-तहाँ बहुत से बाण चले, जिनसे भयंकर राक्षस योद्धा कटने लगे॥2॥

कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा। बहुतक बीर होहिं सत खंडा॥ घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं। उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं॥3॥

भावार्थ:- उनके चरण, छाती, सिर और भुजदण्ड कट रहे हैं। बहुत से वीरों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खा-खाकर पृथ्वी पर पड़ रहे हैं। उत्तम योद्धा फिर संभलकर उठते और लड़ते हैं॥3॥

लागत बान जलद जिमि गाजहिं। बहुतक देखि कठिन सर भाजहिं॥ रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं। धरु धरु मारु मारु धुनि गावहिं॥4॥

भावार्थ:-बाण लगते ही वे मेघ की तरह गरजते हैं। बहुत से तो कठिन बाणों को देखकर ही भाग जाते हैं। बिना मुण्ड (सिर) के प्रचण्ड रुण्ड (धड़) दौड़ रहे हैं और 'पकड़ो, पकड़ो, मारो, मारो' का शब्द करते हुए गा (चिल्ला) रहे हैं॥4॥
॥ दोहा ॥

छुन महूँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच। पुनि रघुबीर निषंग महूँ प्रबिसे सब नाराच॥68॥

भावार्थ:- प्रभु के बाणों ने क्षण मात्र में भयानक राक्षसों को काटकर रख दिया। फिर वे सब बाण लौटकर श्री रघुनाथजी के तरकस में घुस गए॥68॥।
॥ चौपाई ॥

कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति छन माझ निसाचर धारी॥ भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा॥

भावार्थ:-कुंभकर्ण ने मन में विचार कर देखा कि श्री रामजी ने क्षण मात्र में राक्षसी सेना का संहार कर डाला। तब वह महाबली वीर अत्यंत क्रोधित हुआ और उसने गंभीर सिंहनाद किया॥

कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहैँ मर्कट भट भारी ॥ आवत देखि सैल प्रभु भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे॥2॥

भावार्थ:-वह क्रोध करके पर्वत उखाड़ लेता है और जहाँ भारी-भारी वानर योद्धा होते हैं, वहाँ डाल देता है। बड़े-बड़े पर्वतों को आते देखकर प्रभु ने उनको बाणों से काटकर धूल के समान (चूर-चूर) कर डाला॥2॥

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक।॥ तनु महूँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं॥3॥

भावार्थ:-फिर श्री रघुनाथजी ने क्रोध करके धनुष को तानकर बहुत से अत्यंत भयानक बाण छोड़े। वे बाण कुंभकर्ण के शरीर में घुसकर (पीछे से इस प्रकार) निकल जाते हैं (कि उनका पता नहीं चलता), जैसे बिजलियाँ बादल में समा जाती हैं॥3॥

सोनित ख्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे॥ बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए॥4॥

भावार्थ:- उसके काले शरीर से रुधिर बहता हुआ ऐसे शोभा देता है, मानो काजल के पर्वत से गेरु के पनाले बह रहे हों। उसे व्याकुल देखकर रीछ वानर दौड़े। वे ज्यों ही निकट आए, त्यों ही वह हँसा,॥4॥।
॥ दोहा ॥

महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस। महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस॥69॥।

भावार्थ:- और बड़ा घोर शब्द करके गरजा तथा करोड़-करोड़ वानरों को पकड़कर वह गजराज की तरह उन्हें पृथ्वी पर पटकने लगा और रावण की दुहाई देने लगा॥69॥
॥ चौपाई ॥

भागे भालु बलीमुख जूथा। बूकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा॥ चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी॥॥

भावार्थ:-यह देखकर रीछ-वानरों के झुंड ऐसे भागे जैसे भेड़िये को देखकर भेड़ों के झुंड! (शिवजी कहते हैं-) हे भवानी! वानर-भालू व्याकुल होकर आर्तवाणी से पुकारते हुए भाग चले॥॥

यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई॥ कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी॥2॥

भावार्थ:-(वे कहने लगे-) यह राक्षस दुर्भिक्ष के समान है, जो अब वानर कुल रूपी देश में पड़ना चाहता है। हे कृपा रूपी जल के धारण करने वाले मेघ रूप श्री राम! हे खर के शत्रु! हे शरणागत के दुःख हरने वाले! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए!॥2॥।

सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना॥ राम सेन निज पाछें घाली। चले सकोप महा बलसाली॥3॥

भावार्थ:- करुणा भरे वचन सुनते ही भगवान्‌ धनुष-बाण सुधारकर चले। महाबलशाली श्री रामजी ने सेना को अपने पीछे कर लिया और वे (अकेले) क्रोधपूर्वक चले (आगे बढ़े)॥3॥।

खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने॥ लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा॥र4॥

भावार्थ:- उन्होंने धनुष को खींचकर सौ बाण संधान किए। बाण छूटे और उसके शरीर में समा गए। बाणों के लगते ही वह क्रोध में भरकर दौड़ा। उसके दौड़ने से पर्वत डगमगाने लगे और पृथ्वी हिलने लगी॥4॥

लीन्ह एक तेंहि सैल उपाटी। रघुकुलतिलक भुजा सोइ काटी॥ धावा बाम बाह गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी॥5॥।

भावार्थ:-उसने एक पर्वत उखाड़ लिया। रघुकुल तिलक श्री रामजी ने उसकी वह भुजा ही काट दी। तब वह बाएँ हाथ में पर्वत को लेकर दौड़ा। प्रभु ने उसकी वह भुजा भी काटकर पृथ्वी पर गिरा दी॥5॥

कार्टे भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा॥ उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहूँ त्रैलोका॥ 6॥।

भावार्थ:-भुजाओं के कट जाने पर वह दुष्ट कैसी शोभा पाने लगा, जैसे बिना पंख का मंदराचल पहाड़ हो। उसने उग्र दृष्टि से प्रभु को देखा। मानो तीनों लोकों को निगल जाना चाहता हो॥6॥
॥ दोहा ॥

करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि। गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि॥70॥।

भावार्थ:- वह बड़े जोर से चिग्घाड़ करके मुँह फैलाकर दौड़ा। आकाश में सिद्ध और देवता डरकर हा! हा! हा! इस प्रकार पुकारने लगे॥70॥।
॥ चौपाई ॥

सभय देव करुनानिधि जानयो। श्रवन प्रजंत सरासुन तान्यो॥ बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ॥॥

भावार्थ:- करुणानिधान भगवान्‌ ने देवताओं को भयभीत जाना। तब उन्होंने धनुष को कान तक तानकर राक्षस के मुख को बाणों के समूह से भर दिया। तो भी वह महाबली पृथ्वी पर न गिरा॥॥

सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा॥ तब प्रभु कोपि तीव्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा॥2॥

भावार्थ:-मुख में बाण भरे हुए वह (प्रभु के) सामने दौड़ा। मानो काल रूपी सजीव तरकस ही आ रहा हो। तब प्रभु ने क्रोध करके तीक्षण बाण लिया और उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया॥2॥

सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें॥ धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुद खंडा॥3॥

भावार्थ:- वह सिर रावण के आगे जा गिरा उसे देखकर रावण ऐसा व्याकुल हुआ जैसे मणि के छूट जाने पर सर्प। कुंभकर्ण का प्रचण्ड धड़ दौड़ा, जिससे पृथ्वी धँसी जाती थी। तब प्रभु ने काटकर उसके दो टुकड़े कर दिए॥3॥।

परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर॥ तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना॥4॥

भावार्थ:-वानर-भालू और निशाचरों को अपने नीचे दबाते हुए वे दोनों टुकड़े पृथ्वी पर ऐसे पड़े जैसे आकाश से दो पहाड़ गिरे हों। उसका तेज प्रभु श्री रामचंद्रजी के मुख में समा गया। (यह देखकर) देवता और मुनि सभी ने आश्चर्य माना॥र4॥

सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं॥ करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए॥5॥

भावार्थ:- देवता नगाड़े बजाते, हर्षित होते और स्तुति करते हुए बहुत से फूल बरसा रहे हैं। विनती करके सब देवता चले गए। उसी समय देवर्षि नारद आए॥5॥।

गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए।॥ बेगि हतह खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए।॥6॥।

भावार्थ:-आकाश के ऊपर से उन्होंने श्री हरि के सुंदर वीर रसयुक्त गुण समूह का गान किया, जो प्रभु के मन को बहुत ही भाया। मुनि यह कहकर चले गए कि अब दुष्ट रावण को शीघ्र मारिए। (उस समय) श्री रामचंद्रजी रणभूमि में आकर (अत्यंत) सुशोशित हुए॥6॥ छंदः

संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी। श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी॥ भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चह्ट दिसि बने। कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने॥

भावार्थ:- अतुलनीय बल वाले कोसलपति श्री रघुनाथजी रणभूमि में सुशोभित हैं। मुख पर पसीने की बूँदें हैं, कमल समान नेत्र कुछ लाल हो रहे हैं। शरीर पर रक्त के कण हैं, दोनों हाथों से धनुष-बाण फिरा रहे हैं। चारों ओर रीछ-वानर सुशोभित हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु की इस छबि का वर्णन शेषजी भी नहीं कर सकते, जिनके बहुत से (हजार) मुख हैं।
॥ दोहा ॥

निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम। गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम॥ 7॥

भावार्थ:-(शिवजी कहते हैं-) हे गिरिजे! कुंभकर्ण, जो नीच राक्षस और पाप की खान था, उसे भी श्री रामजी ने अपना परमधाम दे दिया। अतः वे मनुष्य (निश्चय ही) मंदबुद्धि हैं, जो उन श्री रामजी को नहीं भजते॥74॥
॥ चौपाई ॥

दिन के अंत फिरीं द्वौ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी॥ राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा॥॥

भावार्थ:- दिन का अन्त होने पर दोनों सेनाएँ लौट पड़ीं। (आज के युद्ध में) योद्धाओं को बड़ी थकावट हुई, परन्तु श्री रामजी की कृपा से वानर सेना का बल उसी प्रकार बढ़ गया, जैसे घास पाकर अग्ि बहुत बढ़ जाती है॥॥(घ)॥

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती॥ बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई॥2॥

भावार्थ:-उधर राक्षस दिन-रात इस प्रकार घटते जा रहे हैं, जिस प्रकार अपने ही मुख से कहने पर पुण्य घट जाते हैं। रावण बहुत विलाप कर रहा है। बार-बार भाई (कुंभकर्ण) का सिर कलेजे से लगाता है॥2॥

रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी॥ मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कह बह कथा पिता समुझायउ॥3॥।

भावार्थ:-स्त्रियाँ उसके बड़े भारी तेज और बल को बखान करके हाथों से छाती पीट-पीटकर रो रही हैं। उसी समय मेघनाद आया और उसने बहुत सी कथाएँ कहकर पिता को समझाया॥3॥।

देखेह कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई॥ इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ॥4॥

भावार्थ:- (और कहा-) कल मेरा पुरुषार्थ देखिएगा। अभी बहुत बड़ाई क्या करूँ? हे तात! मैंने अपने इष्टदेव से जो बल और रथ पाया था, वह बल (और रथ) अब तक आपको नहीं दिखलाया था॥4॥।

एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहूँ दुआर लागे कपि नाना॥ इति कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा॥5॥

भावार्थ:-इस प्रकार डींग मारते हुए सबेरा हो गया। लंका के चारों दरवाजों पर बहुत से वानर आ डटे। इधर काल के समान वीर वानर- भालू हैं और उधर अत्यंत रणधीर राक्षस॥5॥।

लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू॥6॥

भावार्थ:->दोनों ओर के योद्धा अपनी-अपनी जय के लिए लड़ रहे हैं। हे गरुड़ उनके युद्ध का वर्णन नहीं किया जा सकता॥6॥। मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश में बँधना
॥ दोहा ॥

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास। गर्जउ अट्रहास करि भइ कपि कटकहि त्रास॥72॥

भावार्थ:-मेघनाद उसी (पूर्वोक्त) मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में चला गया और अट्रहास करके गरजा, जिससे वानरों की सेना में भय छा गया॥72॥
॥ चौपाई ॥

सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना॥ डारइ परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृुष्टि करै बहु बाना॥॥

भावार्थ:- वह शक्ति, शूल, तलवार, कृपाण आदि अस्त्र, शास्त्र एवं वज्ध आदि बहुत से आयुध चलाने तथा फरसे, परिघ, पत्थर आदि डालने और बहुत से बाणों की वृष्टि करने लगा॥॥

दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहूँ मघा मेघ झरि लाई॥ धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना॥2॥

भावार्थ:- आकाश में दसों दिशाओं में बाण छा गए, मानो मघा नक्षत्र के बादलों ने झड़ी लगा दी हो। 'पकड़ो, पकड़ो, मारो' ये शब्द सुनाई पड़ते हैं। पर जो मार रहा है, उसे कोई नहीं जान पाता॥2॥

गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहिं तेहि न दुखित फिरि आवहिं॥ अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर॥3॥

भावार्थ:- पर्वत और वृक्षों को लेकर वानर आकाश में दौड़कर जाते हैं। पर उसे देख नहीं पाते, इससे दुःखी होकर लौट आते हैं। मेघनाद ने माया के बल से अटपटी घाटियों, रास्तों और पर्वतों-कन्दराओं को बाणों के पिंजरे बना दिए (बाणों से छा दिया) ॥3॥

जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर॥ मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला॥4॥

भावार्थ:-अब कहाँ जाएँ, यह सोचकर (रास्ता न पाकर) वानर व्याकुल हो गए। मानो पर्वत इंद्र की कैद में पड़े हों। मेघनाद ने मारुति हनुमान, अंगद, नल और नील आदि सभी बलवानों को व्याकुल कर दिया॥4॥।

पुनि लछ्विमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन॥ पुनि रघुपति सैं जूबनै लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा॥5॥।

भावार्थ:-फिर उसने लक्ष्मणजी, सुग्रीव और विभीषण को बाणों से मारकर उनके शरीर को छलनी कर दिया। फिर वह श्री रघुनाथजी से लड़ने लगा। वह जो बाण छोड़ता है, वे साँप होकर लगते हैं॥5॥

ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी॥ नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना॥6॥।

भावार्थ:- जो स्वतंत्र, अनन्त, एक (अखंड) और निर्विकार हैं, वे खर के शत्रु श्री रामजी (लीला से) नागपाश के वश में हो गए (उससे बँध गए) श्री रामचंद्रजी सदा स्वतंत्र, एक, (अद्वितीय) भगवान्‌ हैं। वे नट की तरह अनेकों प्रकार के दिखावटी चरित्र करते हैं॥6॥

रन सोभा लगि प्रभुहिं बैँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो॥7॥।

भावार्थ:-रण की शोभा के लिए प्रभु ने अपने को नागपाश में बाँध लिया, किन्तु उससे देवताओं को बड़ा भय हुआ॥ 7॥
॥ दोहा ॥

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास। सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास॥73॥

भावार्थ:- (शिवजी कहते हैं-) हे गिरिजे! जिनका नाम जपकर मुनि भव (जन्म-मृत्यु) की फाँसी को काट डालते हैं, वे सर्वव्यापक और विश्च निवास (विश्व के आधार) प्रभु कहीं बंधन में आ सकते हैं?॥73॥
॥ चौपाई ॥

चरित राम के सगुन भवानी। तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी॥ अस बिचारि जे तग्य बिरागी। रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी॥॥

भावार्थ:-हे भवानी! श्री रामजी की इस सगुण लीलाओं के विषय में बुद्धि और वाणी के बल से तर्क (निर्णय) नहीं किया जा सकता। ऐसा विचार कर जो तत्त्वज्ञानी और विरक्त पुरुष हैं, वे सब तर्क (शंका) छोड़कर श्री रामजी का भजन ही करते हैं॥

ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा। पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा॥ जामवंत कह खल रह ठाढ़ा। सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा॥2॥

भावार्थ:- मेघनाद ने सेना को व्याकुल कर दिया। फिर वह प्रकट हो गया और दुर्वचन कहने लगा। इस पर जाम्बवान्‌ ने कहा- अरे दुष्ट! खड़ा रह। यह सुनकर उसे बड़ा क्रोध बढ़ा॥2॥

बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही। लागेसि अधम पचारै मोही॥ अस कह तरल त्रिसूल चलायो। जामवंत कर गहि सोइ धायो॥3॥।

भावार्थ:-अरे मूर्ख! मैंने बूढ़ा जानकर तुझको छोड़ दिया था। अरे अधम! अब तू मुझे ही ललकारने लगा है? ऐसा कहकर उसने चमकता हुआ त्रिशूल चलाया। जाम्बवान्‌ उसी त्रिशूल को हाथ से पकड़कर दौड़ा॥3॥

मारिसि मेघनाद कै छाती। परा भूमि घुर्मित सुरघाती॥ पुनि रिसान गहि चरन फिरायो। महि पछारि निज बल देखरायो॥4॥

भावार्थ:-और उसे मेघनाद की छाती पर दे मारा। वह देवताओं का शत्रु चक्कर खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जाम्बवान्‌ ने फिर क्रोध में भरकर पैर पकड़कर उसको घुमाया और पृथ्वी पर पटककर उसे अपना बल दिखलाया॥4॥

बर प्रसाद सो मरइ न मारा। तब गहि पद लंका पर डारा॥ इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो। राम समीप सपदि सो आयो॥5॥

भावार्थ:-(किन्तु) वरदान के प्रताप से वह मारे नहीं मरता। तब जाम्बवान्‌ ने उसका पैर पकड़कर उसे लंका पर फेंक दिया। इधर देवर्षि नारदजी ने गरुड् को भेजा। वे तुरंत ही श्री रामजी के पास आ पहुँचे॥5॥
॥ दोहा ॥

खगपति सब धरि खाए माया नाग बरुथ। माया बिगत भए सब हरघे बानर जूथ॥ 74 क॥

भावार्थ:-पक्षीराज गरुड़जी सब माया-सर्पों के समूहों को पकड़कर खा गए। तब सब वानरों के झुंड माया से रहित होकर हर्षित हुए॥74 (क)॥

गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ। चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ॥74 ख॥।

भावार्थ:- पर्वत, वृक्ष, पत्थर और नख धारण किए वानर क्रोधित होकर दौड़े। निशाचर विशेष व्याकुल होकर भाग चले और भागकर किले पर चढ़ गए॥74 (ख)॥। मेघनाद यज्ञ विध्वंस, युद्ध और मेघनाद उद्धार
॥ चौपाई ॥

मेघनाद कै मुरछा जागी। पितहि बिलोकि लाज अति लागी॥। तुरत गयउ गिरिबर कंदरा। करौं अजय मख अस मन धरा॥

भावार्थ:- मेघनाद की मूर्न्छां छूटी, (तब) पिता को देखकर उसे बड़ी शर्म लगी। मैं अजय (अजेय होने को) यज्ञ करूँ, ऐसा मन में निश्चय करके वह तुरंत श्रेष्ठ पर्वत की गुफा में चला गया॥॥

इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा। सुनह नाथ बल अतुल उदारा॥ मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन॥2॥

भावार्थ:- यहाँ विभीषण ने सलाह विचारी (और श्री रामचंद्रजी से कहा- ) हे अतुलनीय बलवान्‌ उदार प्रभो! देवताओं को सताने वाला दुष्ट, मायावी मेघनाद अपवित्र यज्ञ कर रहा है॥2॥।

जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि। नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि॥ सुनि रघुपति अतिसय सुख माना। बोले अंगदादि कपि नाना॥3॥

भावार्थ:- हे प्रभो! यदि वह यज्ञ सिद्ध हो पाएगा तो हे नाथ! फिर मेघनाद जल्दी जीता न जा सकेगा। यह सुनकर श्री रघुनाथजी ने बहुत सुख माना और अंगदादि बहुत से वानरों को बुलाया (और कहा-)॥3॥।

लछ्िमन संग जाह सब भाई। करह बिधंस जग्य कर जाई॥ तुम्ह लछिमन मारेहू रन ओही। देखि सभय सुर दुख अति मोही॥4॥।

भावार्थ:- हे भाइयों! सब लोग लक्ष्मण के साथ जाओ और जाकर यज्ञ को विध्वंस करो। हे लक्ष्मण! संग्राम में तुम उसे मारना। देवताओं को भयभीत देखकर मुझे बड़ा दुःख है॥4॥।

मारेह तेहि बल बुद्धि उपाई। जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई॥ जामवंत सुग्रीव बिभीषन। सेन समेत रहेह तीनिउ जन॥5॥

भावार्थ:-हे भाई! सुनो, उसको ऐसे बल और बुद्धि के उपाय से मारना, जिससे निशाचर का नाश हो। हे जाम्बवान, सुग्रीव और विभीषण! तुम तीनों जन सेना समेत (इनके) साथ रहना॥5॥।

जब रघुबीर दीन्हि अतुसासन। कटि निषंग कसि साजि सरासन॥। प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा। बोले घन इव गिरा गँभीरा॥6॥

भावार्थ:-(इस प्रकार) जब श्री रघुवीर ने आज्ञा दी, तब कमर में तरकस कसकर और धनुष सजाकर (चढ़ाकर) रणधीर श्री लक्ष्मणजी प्रभु के प्रताप को हृदय में धारण करके मेघ के समान गंभीर वाणी बोले-॥6॥

जौं तेहि आजु बंधे बिनु आवौं। तौ रघुपति सेवक न कहावाँ॥ जौं सत संकर करहिं सहाई। तदपि हतऊँ रघुबीर दोहाई॥7॥

भावार्थ:- यदि मैं आज उसे बिना मारे आऊँ, तो श्री रघुनाथजी का सेवक न कहलाऊँ। यदि सैकड़ों शंकर भी उसकी सहायता करें तो भी श्री रघुवीर की दुहाई है, आज मैं उसे मार ही डालूँगा॥7॥
॥ दोहा ॥

रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत। अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत॥ 75॥।

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी के चरणों में सिर नवाकर शेषावतार श्री लक्ष्मणजी तुरंत चले। उनके साथ अंगद, नील, मयंद, नल और हनुमान आदि उत्तम योद्धा थे॥75॥।
॥ चौपाई ॥

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा। आहति देत रुघिर अरु भैंसा॥ कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा। जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा॥ १॥

भावार्थ:- वानरों ने जाकर देखा कि वह बैठा हुआ खून और भैंसे की आहुति दे रहा है। वानरों ने सब यज्ञ विध्वंस कर दिया। फिर भी वह नहीं उठा, तब वे उसकी प्रशंसा करने लगे॥

तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई। लातन्हि हति हति चले पराई॥ लै त्रिसूल धावा कपि भागे। आए जहूँ रामातुज आगे॥2॥।

भावार्थ:-इतने पर भी वह न उठा, (तब) उन्होंने जाकर उसके बाल पकड़े और लातों से मार-मारकर वे भाग चले। वह त्रिशूल लेकर दौड़ा, तब वानर भागे और वहाँ आ गए, जहाँ आगे लक्ष्मणजी खड़े थे॥2॥

आवा परम क्रोध कर मारा। गर्ज घोर रव बारहिं बारा॥ कोपि मरुतसुत अंगद धाए। हति त्रिसूल उर धरनि गिराए॥3॥

भावार्थ:- वह अत्यंत क्रोध का मारा हुआ आया और बार-बार भयंकर शब्द करके गरजने लगा। मारुति (हनुमान्‌) और अंगद क्रोध करके दौड़े। उसने छाती में त्रिशूल मारकर दोनों को धरती पर गिरा दिया॥3॥

प्रभु कहँ छाँडेसि सूल प्रचंडा। सर हति कृत अनंत जुग खंडा॥ उठि बहोरि मारुति जुबराजा। हृतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा॥4॥।

भावार्थ:-फिर उसने प्रभु श्री लक्ष्मणजी पर त्रिशूल छोड़ा। अनन्त (श्री लक्ष्मणजी) ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिए। हनुमान्‌जी और युवराज अंगद फिर उठकर क्रोध करके उसे मारने लगे, उसे चोट न लगी॥4॥

फिरे बीर रिपु मरइ न मारा। तब धावा करि घोर चिकारा॥ आवत देखि कुरद्ध जनु काला। लछ़िमन छाड़े बिसिख कराला॥5॥

भावार्थ:-शत्रु (मेघनाद) मारे नहीं मरता, यह देखकर जब वीर लौटे, तब वह घोर चिग्घाड़ करके दौड़ा। उसे करुद्ध काल की तरह आता देखकर लक्ष्मणजी ने भयानक बाण छोड़े॥5॥।

देखेसि आवत पबि सम बाना। तुरत भयउ खल अंतरधाना॥ बिबिध बेष धरि करइ लराई। कबहुँक प्रगट कबहूँ दुरि जाई॥6॥।

भावार्थ:- वज्ज के समान बाणों को आते देखकर वह दुष्ट तुरंत अंतर्धान हो गया और फिर भाँति-भाँति के रूप धारण करके युद्ध करने लगा। वह कभी प्रकट होता था और कभी छिप जाता था॥6॥

देखि अजय रिपु डरपे कीसा। परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा॥ लछ्िमन मन अस मंत्र दूढ़ावा। ऐहि पापिहि मैं बहुत खेलावा॥7॥

भावार्थ:-शत्रु को पराजित न होता देखकर वानर डरे। तब सर्पराज शेषजी (लक्ष्मणजी) बहुत क्रोधित हुए। लक्ष्मणजी ने मन में यह विचार दूढ़ किया कि इस पापी को मैं बहुत खेला चुका (अब और अधिक खेलाना अच्छा नहीं, अब तो इसे समाप्त ही कर देना चाहिए।)॥7॥

सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा। सर संधान कीन्ह करि दापा॥ छाड़ा बान माझ उर लागा। मरती बार कपटु सब त्यागा॥8॥

भावार्थ:- कोसलपति श्री रामजी के प्रताप का स्मरण करके लक्ष्मणजी ने वीरोचित दर्प करके बाण का संधान किया। बाण छोड़ते ही उसकी छाती के बीच में लगा। मरते समय उसने सब कपट त्याग दिया॥8॥
॥ दोहा ॥

रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाड़ेसि प्रान। धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान॥76॥

भावार्थ:- राम के छोटे भाई लक्ष्मण कहाँ हैं? राम कहाँ हैं? ऐसा कहकर उसने प्राण छोड़ दिए। अंगद और हनुमान कहने लगे- तेरी माता धन्य है, धन्य है (जो तू लक्ष्मणजी के हाथों मरा और मरते समय श्री राम- लक्ष्मण को स्मरण करके तूने उनके नामों का उच्चारण किया।)॥76॥।
॥ चौपाई ॥

बिनु प्रयास हनुमान उठायो। लंका द्वार राखि पुनि आयो॥। तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा। चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा॥॥

भावार्थ:- हनुमानजी ने उसको बिना ही परिश्रम के उठा लिया और लंका के दरवाजे पर रखकर वे लौट आए। उसका मरना सुनकर देवता और गंधर्व आदि सब विमानों पर चढ़कर आकाश में आए॥

बरघषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं। श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिहं॥ जय अनंत जय जगदाधारा। तुम्ह प्रभु सब देवन्तहि निस्तारा॥2॥

भावार्थ:- वे फूल बरसाकर नगाड़े बजाते हैं और श्री रघुनाथजी का निर्मल यश गाते हैं। हे अनन्त! आपकी जय हो, हे जगदाधार! आपकी जय हो। हे प्रभो! आपने सब देवताओं का (महान्‌ विपत्ति से) उद्धार किया॥2॥

अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए। लद्धिमन कृपासिंधु पहिं आए॥ सुत बध सुना दसानन जबहीं। मुरुद्धित भयउ परेउ महि तबहीं॥3॥

भावार्थ:-देवता और सिद्ध स्तुति करके चले गए, तब लक्ष्मणजी कृपा के समुद्र श्री रामजी के पास आए। रावण ने ज्यों ही पुत्रवध का समाचार सुना, त्यों ही वह मूर््छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा॥3॥।

मंदोदरी रुदन कर भारी। उर ताड़न बहु भाँति पुकारी॥ रनगर लोग सब ब्याकुल सोचा। सकल कहह्हिं दसकंधर पोचा॥4॥

भावार्थ:-मंदोदरी छाती पीट-पीटकर और बहुत प्रकार से पुकार- पुकारकर बड़ा भारी विलाप करने लगी। नगर के सब लोग शोक से व्याकुल हो गए। सभी रावण को नीच कहने लगे॥4॥।
॥ दोहा ॥

तब दसकंठ बिबिधि बिधि समुझाईं सब नारि। नस्वर रूप जगत सब देखह ह्ृदयँ बिचारि॥77॥

भावार्थ:- तब रावण ने सब स्त्रियों को अनेकों प्रकार से समझाया कि समस्त जगत्‌ का यह (दृश्य)रूप नाशवान्‌ है, हृदय में विचारकर देखो॥77॥।
॥ चौपाई ॥

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन। आपुन मंद कथा सुभ पावन॥ पर उपदेस कुसल बहुतेरे। जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥॥

भावार्थ:- रावण ने उनको ज्ञान का उपदेश किया। वह स्वयं तो नीच है, पर उसकी कथा (बातें) शुभ और पवित्र हैं। दूसरों को उपदेश देने में तो बहुत लोग निपुण होते हैं। पर ऐसे लोग अधिक नहीं हैं, जो उपदेश के अनुसार आचरण भी करते हैं॥

निसा सिरानि भयउ भिनुसारा। लगे भालु कपि चारिहूँ द्वारा॥ सुभट बोलाइ दसानन बोला। रन सन्मुख जाकर मन डोला॥2॥

भावार्थ:- रात बीत गई, सबेरा हुआ। रीछ-वानर (फिर) चारों दरवाजों पर जा डटे। योद्धाओं को बुलाकर दशमुख रावण ने कहा- लड़ाई में शत्रु के सम्मुख मन डाँवाडोल हो,॥2॥।

सो अबहीं बरु जाउ पराई। संजुग बिमुख भएँ न भलाई॥ निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा। देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा॥3॥।

भावार्थ:- अच्छा है वह अभी भाग जाए। युद्ध में जाकर विमुख होने (भागने) में भलाई नहीं है। मैंने अपनी भुजाओं के बल पर बैर बढ़ाया है। जो शत्रु चढ़ आया है, उसको मैं (अपने ही) उत्तर दे लूँगा॥3॥

अस कह मरुत बेग रथ साजा। बाजे सकल जुझाऊ बाजा॥ चले बीर सब अतुलित बली। जनु कज्जल कै आँधी चली॥4॥।

भावार्थ:-ऐसा कहकर उसने पवन के समान तेज चलने वाला रथ सजाया। सारे जुझाऊ (लड़ाई के) बाजे बजने लगे। सब अतुलनीय बलवान्‌ वीर ऐसे चले मानो काजल की आँधी चली हो॥4॥
॥ दोहा ॥

असगुन अमित होहिं तेहि काला। गनइ न भुज बल गर्ब बिसाला॥5॥

भावार्थ:- उस समय असंख्य अपशकुन होने लगे। पर अपनी भुजाओं के बल का बड़ा गर्व होने से रावण उन्हें गिनता नहीं है॥5॥ छंदः

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्रवहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते॥ गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने॥

भावार्थ:-अत्यंत गर्व के कारण वह शकुन-अपशकुन का विचार नहीं करता। हथियार हाथों से गिर रहे हैं। योद्धा रथ से गिर पड़ते हैं। घोड़े, हाथी साथ छोड़कर चिग्घाड़ते हुए भाग जाते हैं। स्यार, गीध, कौए और गदहे शब्द कर रहे हैं। बहुत अधिक कुत्ते बोल रहे हैं। उल्लू ऐसे अत्यंत भयानक शब्द कर रहे हैं, मानो काल के दूत हों। (मृत्यु का संदेसा सुना रहे हों)। रावण का युद्ध के लिए प्रस्थान और श्री रामजी का विजयरथ तथा वानर-राक्षसों का युद्ध
॥ दोहा ॥

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहूँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम॥78॥

भावार्थ:- जो जीवों के द्रोह में रत है, मोह के बस हो रहा है, रामविमुख है और कामासक्त है, उसको क्या कभी स्वप्न में भी सम्पत्ति, शुभ शकुन और चित्त की शांति हो सकती है?॥78॥
॥ चौपाई ॥

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बह धारा॥ बिबिधि भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना॥॥

भावार्थ:- राक्षसों की अपार सेना चली। चतुरंगिणी सेना की बहुत सी टुकडियाँ हैं। अनेकों प्रकार के वाहन, रथ और सवारियाँ हैं तथा बहुत से रंगों की अनेकों पताकाएँ और ध्वजाएँ हैं॥॥

चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे॥ बरन बरन बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया॥2॥।

भावार्थ:- मतवाले हाथियों के बहुत से झुंड चले। मानो पवन से प्रेरित हुए वर्षा ऋतु के बादल हों। रंग-बिरंगे बाना धारण करने वाले वीरों के समूह हैं, जो युद्ध में बड़े श्रवीर हैं और बहुत प्रकार की माया जानते हैं॥2॥

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी॥ चलत कटक दिगसिंधुर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं॥3॥

भावार्थ:- अत्यंत विचित्र फौज शोभित है। मानो वीर वसंत ने सेना सजाई हो। सेना के चलने से दिशाओं के हाथी डिगने लगे, समुद्र क्षुभित हो गए और पर्वत डगमगाने लगे॥3॥

उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई॥ पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं॥4॥

भावार्थ:-इतनी धूल उड़ी कि सूर्य छिप गए। (फिर सहसा) पवन रुक गया और पृथ्वी अकुला उठी। ढोल और नगाड़े भीषण ध्वनि से बज रहे हैं, जैसे प्रलयकाल के बादल गरज रहे हों ॥4॥

भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई॥। केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चुरहीं॥5॥

भावार्थ:-भेरी, नफीरी (तुरही) और शहनाई में योद्धाओं को सुख देने वाला मारू राग बज रहा है। सब वीर सिंहनाद करते हैं और अपने- अपने बल पौरुष का बखान कर रहे हैं॥5॥।

कह दसानन सुनहू सुभट्टा। मर्दह भालु कपिन्ह के ठट्टा॥ हों मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कह सन्मुख फौज रेंगाई॥6॥।

भावार्थ:- रावण ने कहा- हे उत्तम योद्धाओं! सुनो तुम रीछ-वानरों के ठ्ट्ट को मसल डालो और मैं दोनों राजकुमार भाइयों को मारूँगा। ऐसा कहकर उसने अपनी सेना सामने चलाई॥6॥

यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई॥7॥।

भावार्थ:-जब सब वानरों ने यह खबर पाई, तब वे श्री राम की दुहाई देते हुए दौड़े॥7॥। छंदः

धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते। मानहूँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बूंद नाना बान ते॥ नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं। जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं॥

भावार्थ:- वे विशाल और काल के समान कराल वानर-भालू दौड़े। मानो पंख वाले पर्वतों के समूह उड़ रहे हों। वे अनेक वर्णों के हैं। नख, दाँत, पर्वत और बड़े-बड़े वृक्ष ही उनके हथियार हैं। वे बड़े बलवान्‌ हैं और किसी का भी डर नहीं मानते। रावण रूपी मतवाले हाथी के लिए सिंह रूप श्री रामजी का जय-जयकार करके वे उनके सुंदर यश का बखान करते हैं।
॥ दोहा ॥

दुह दिसि जय जयकार करि निज जोरी जानि। भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि॥79॥

भावार्थ:-दोनों ओर के योद्धा जय-जयकार करके अपनी-अपनी जोड़ी जान (चुन) कर इधर श्री रघुनाथजी का और उधर रावण का बखान करके परस्पर भिड़ गए॥79॥
॥ चौपाई ॥

रावतु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥ अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥॥

भावार्थ:- रावण को रथ पर और श्री रघुवीर को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गए। प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया (कि वे बिना रथ के रावण को कैसे जीत सकेंगे)। श्री रामजी के चरणों की वंदना करके वे ख्रेह पूर्वक कहने लगे॥॥

नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥ सुनह सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥2॥।

भावार्थ:-हे नाथ! आपके न रथ है, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न जूते ही हैं। वह बलवान्‌ वीर रावण किस प्रकार जीता जाएगा? कृपानिधान श्री रामजी ने कहा- हे सखे! सुनो, जिससे जय होती है, वह रथ दूसरा ही है॥2॥

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥ बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥3॥।

भावार्थ:-शौर्य और धैर्य उस रथ के पहिए हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा और पताका हैं। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं॥3॥

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥ दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥4॥

भावार्थ:- ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है॥4॥

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥ कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥5॥

भावार्थ:-निर्मल (पापरहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है॥5॥।

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहूँ न कतहूँ रिपु ताकें॥6॥

भावार्थ:- हे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिए जीतने को कहीं शत्रु ही नहीं है॥6॥
॥ दोहा ॥

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। जारकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर॥80 क॥।

भावार्थ:- हे धीरबुद्धि वाले सखा! सुनो, जिसके पास ऐसा दृढ़ रथ हो, वह वीर संसार (जन्म-मृत्यु) रूपी महान्‌ दुर्जय शत्रु को भी जीत सकता है (रावण की तो बात ही क्या है)॥80 (क)॥

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरघि गहे पद कंज। एहि मिस मोहि उपदेसेह राम कृपा सुख पुंज॥80 ख

भावार्थ:- प्रभु के वचन सुनकर विभीषणजी ने हर्षित होकर उनके चरण कमल पकड़ लिए (और कहा-) हे कृपा और सुख के समूह श्री रामजी! आपने इसी बहाने मुझे (महान्‌) उपदेश दिया॥80 (ख)॥

उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान। लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन॥80 ग॥

भावार्थ:- उधर से रावण ललकार रहा है और इधर से अंगद और हनुमान्‌। राक्षस और रीछ-वानर अपने-अपने स्वामी की दुहाई देकर लड़ रहे हैं॥80 (ग)॥।
॥ चौपाई ॥

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना॥ हमह उमा रहे तेहिं संगा। देखत राम चरित रन रंगा॥

भावार्थ:-ब्रह्मा आदि देवता और अनेकों सिद्ध तथा मुनि विमानों पर चढ़े हुए आकाश से युद्ध देख रहे हैं। (शिवजी कहते हैं-) हे उमा! मैं भी उस समाज में था और श्री रामजी के रण-रंग (रणोत्साह) की लीला देख रहा था॥॥

सुभट समर रस दुह दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते॥ एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं॥2॥

भावार्थ:-दोनों ओर के योद्धा रण रस में मतवाले हो रहे हैं। वानरों को श्री रामजी का बल है, इससे वे जयशील हैं (जीत रहे हैं) एक-दूसरे से भिड़ते और ललकारते हैं और एक-दूसरे को मसल-मसलकर पृथ्वी पर डाल देते हैं॥2॥

मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं॥ उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं॥3॥।

भावार्थ:- वे मारते, काटते, पकड़ते और पछाड़ देते हैं और सिर तोड़कर उन्हीं सिरों से दूसरों को मारते हैं। पेट फाड़ते हैं, भुजाएँ उखाड़ते हैं और योद्धाओं को पैर पकड़कर पृथ्वी पर पटक देते हैं॥3॥

निसिचर भट महि गाड़हिं भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू॥ बीर बलीमुख जुद्ध बिरुद्ध। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्ध॥4॥

भावार्थ:- राक्षस योद्धाओं को भालू पृथ्वी में गाड़ देते हैं और ऊपर से बहुत सी बालू डाल देते हैं। युद्ध में शत्रुओं से विरुद्ध हुए वीर वानर ऐसे दिखाई पड़ते हैं मानो बहुत से क्रोधित काल हों॥4॥ छंदः

क्रुद्ध कृतांत समान कपि तन स्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं॥ मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं॥॥

भावार्थ:- क्रोधित हुए काल के समान वे वानर खून बहते हुए शरीरों से शोभित हो रहे हैं। वे बलवान्‌ वीर राक्षसों की सेना के योद्धाओं को मसलते और मेघ की तरह गरजते हैं। डाँटकर चपेटों से मारते, दाँतों से काटकर लातों से पीस डालते हैं। वानर-भालू चिग्घाड़ते और ऐसा छल- बल करते हैं, जिससे दुष्ट राक्षस नष्ट हो जाएँ॥

धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं॥ धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही॥2॥

भावार्थ:- वे राक्षसों के गाल पकड़कर फाड़ डालते हैं, छाती चीर डालते हैं और उनकी अँतड़ियाँ निकालकर गले में डाल लेते हैं। वे वानर ऐसे दिख पड़ते हैं मानो प्रहलाद के स्वामी श्री नूसिंह भगवान्‌ अनेकों शरीर धारण करके युद्ध के मैदान में क्रीड़ा कर रहे हों। पकड़ो, मारो, काटो, पछाड़ो आदि घोर शब्द आकाश और पृथ्वी में भर (छा) गए हैं। श्री रामचंद्रजी की जय हो, जो सचमुच तृण से वज़ और वज् से तृण कर देते हैं (निर्बल को सबल और सबल को निर्बल कर देते हैं)॥2॥।
॥ दोहा ॥

निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप। रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरह फिरह करि दाप॥8॥।

भावार्थ:-अपनी सेना को विचलित होते हुए देखा, तब बीस भुजाओं में दस धनुष लेकर रावण रथ पर चढ़कर गर्व करके 'लौटो, लौटो' कहता हुआ चला॥8॥।
॥ चौपाई ॥

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हृह दै बंदर॥ गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा॥

भावार्थ:-रावण अत्यंत क्रोधित होकर दौड़ा। वानर हुँकार करते हुए (लड़ने के लिए) उसके सामने चले। उन्होंने हाथों में वृक्ष, पत्थर और पहाड़ लेकर रावण पर एक ही साथ डाले॥

लागहिं सैल बज तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू॥ चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी॥2॥।

भावार्थ:-पर्वत उसके वज्तुल्य शरीर में लगते ही तुरंत टुकड़े-टुकड़े होकर फूट जाते हैं। अत्यंत क्रोधी रणोन्मत्त रावण रथ रोककर अचल खड़ा रहा, (अपने स्थान से) जरा भी नहीं हिला॥2॥।

इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा॥ चले पराइ भालु कपि नाना। त्राह्ि त्राहि अंगद हनुमाना॥3॥।

भावार्थ:-उसे बहुत ही क्रोध हुआ। वह इधर-उधर झपटकर और डपटकर वानर योद्धाओं को मसलने लगा। अनेकों वानर-भालू 'हे अंगद! है हनुमान्‌! रक्षा करो, रक्षा करो' (पुकारते हुए) भाग चले॥3॥।

पाहि पाहि रघुबीर गोसाईं। यह खल खाइ काल की नाईं॥ तेहिं देखे कपि सकल पराने। दसहूँ चाप सायक संधाने॥4॥

भावार्थ:-हे रघुवीर! हे गोसाईं! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए। यह दुष्ट काल की भाँति हमें खा रहा है। उसने देखा कि सब वानर भाग छूटे, तब (रावण ने) दसों धनुषों पर बाण संधान किए॥4॥ छंदः

संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदिसि कहँ कपि भागहीं॥ भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे॥

भावार्थ:-उसने धनुष पर सन्धान करके बाणों के समूह छोड़े। वे बाण सर्प की तरह उड़कर जा लगते थे। पृथ्वी-आकाश और दिशा-विदिशा सर्वत्र बाण भर रहे हैं। वानर भागें तो कहाँ? अत्यंत कोलाहल मच गया। वानर-भालुओं की सेना व्याकुल होकर आर्त्त पुकार करने लगी- हे रघुवीर! हे करुणासागर! हे पीड़ितों के बन्धु! हे सेवकों की रक्षा करके उनके दुःख हरने वाले हरि! लक्ष्मण-रावण युद्ध