उत्तरकाण्डसप्तम सोपान
॥ श्लोक ॥
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥1॥
भावार्थ:-मोर के कण्ठ की आभा के समान (हरिताभ) नीलवर्ण, देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमलनेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथों में बाण और धनुष धारण किये हुए वानरसमूह से युक्त भाई लक्ष्मणजी से सेवित स्तुति किये जाने योग्य, श्रीजानकीजी के पति रघुकुल श्रेष्ठ पुष्पक-विमान पर सवार श्रीरामचन्द्रजी को मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ॥1॥
कोसलेन्द्रपदकंजमंजुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ। जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृंगसंगिनौ॥2॥
भावार्थ:-कोसलपुरी के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर और कोमल दोनों चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजी के द्वारा वन्दित हैं, श्रीजानकीजी के करकमलों से दुलराये हुए हैं और चिन्तन करने वाले मनरूपी भौरे के नित्य संगी हैं अर्थात् चिन्तन करने वालों का मनरूपी भ्रमर सदा उन चरणकमलों में बसा रहता है॥2॥
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्। कारुणीककलकंजलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम्॥3॥
भावार्थ:-कुन्द के फूल, चन्द्रमा और शंख के समान सुन्दर गौरवर्ण, जगज्जननी श्रीपार्वतीजी के पति, वांछित फल के देनेवाले, [दुखियों पर सदा] दया करनेवाले, सुन्दर कमल के समान नेत्रवाले, कामदेव से छुड़ानेवाले, [कल्याणकारी] श्रीशंकरजी को मैं नमस्कार करता हूँ॥3॥
॥ चौपाई ॥
रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग। जहैँ तहँ सोचहिं नारि नर कूस तन राम बियोग।।
भावार्थ:-[श्रीरामजीके लौटने की] अवधिका एक ही दिन बाकी रह गया, अतएव नगरके लोग बहुत आतुर (अधीर) हो रहे हैं। राम के वियोग में दुबले हुए स्त्री-पुरुष जहाँ-तहाँ सोच (विचार) कर रहे हैं [कि क्या बात है, श्रीरामजी क्यों नहीं आये]। सगुन होहिहं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर। प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहूँ फेर।। इतने में ही सब सुन्दर शकुन होने लगे और सबके मन प्रसन्न हो गये। नगर भी चारो ओर से रमणीक हो गया। मानो ये सब-के- सब चिह्न प्रभु के [शुभ] आगमन को जना रहे हैं। कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ। आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोई।। कौसल्या आदि सब माताओं के मन में ऐसा आनन्द हो रहा है जैसे अभी कोई कहना ही चाहता है कि सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी आ गये।। भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार। जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥ भरतजी की दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मनमें अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे-रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा॥।
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ॥ प्राणों की आधाररूप अवधि का एक दिन शेष रह गया! यह सोचते ही भरत जी के मनमें अपार दुःख हुआ। क्या कारण हुआ कि नाथ नहीं आये ? प्रभु ने कुटिल जानकर मुझे कहीं भुला तो नहीं दिया ?।4।। अहह धन्य लछ़िमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।। कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।2।।
भावार्थ:-अहा ! लक्ष्मण बड़े धन्य एवं बड़भागी हैं; जो श्रीरामचन्द्रजी के चरणारविन्द के प्रेमी हैं (अर्थात् उनसे अलग नहीं हुए)। मुझे तो प्रभु ने कपटी और कुटिल पहचान लिया, इसी से नाथ ने मुझे साथ नहीं लिया!।।2।।
जौं करनी समुझ्नै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।। जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।3।।
भावार्थ:-[बात भी ठीक ही है, क्योंकि] यदि प्रभु मेरी करनी पर ध्यान दें तो सौ करोड़ (असंख्य) कल्पोंतक भी मेरा निस्तार (छुटकारा) नहीं हो सकता। [परन्तु आशा इतनी ही है कि] प्रभु सेवक का अवगुण कभी नहीं मानते। वे दीनबन्धु हैं और अत्यन्त ही कोमल स्वभाव के हैं।।3।।
मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।। बीतें अवधि रहहिं जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।4।।
भावार्थ:-अतएव मेरे हृदय में ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे [क्योंकि] मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं। किन्तु अवधि बीत जानेपर यदि मेरे प्राण रह गये तो जगत् में मेरे समान नीच कौन होगा ?।4।।
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत। बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत।।क।।
भावार्थ:-श्रीरामजी के विरह-समुद्र में भरत जी का मन डूब रहा था, उसी समय पवन पुत्र हनुमान् जी ब्राह्मण का रूप धरकर इस प्रकार आ गये, मानो [उन्हें डूबने से बचाने के लिये] नाव आ गयी हो।।
(क)।। बैठे देखि कुसासन जटा मुकुट कूस गात। राम राम रघुपति जपत ख्रवत नयन जलपात।।ख।।
भावार्थ:-हनुमान् जी ने दुर्बल शरीर भरतजी को जटाओं का मुकुट बनाये, राम ! राम ! रघुपति ! जपते और कमल के समान नेत्रों से [प्रेमाश्रुओं का] जल बहाते कुश के आसन पर बैठे देखा।।
(ख)।। देखत हनूमान अति हरषेउ। पुलक गात लोचन जल बरघेउ।। मन महँ बहुत भाँति सुख मानी। बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी।। १।।
भावार्थ:-उन्हें देखते ही हनुमान् जी अत्यन्त हर्षित हुए। उनका शरीर पुलकित हो गया, नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओं का] जल बरसने लगा। मन में बहुत प्रकार से सुख मानकर वे कानों के लिये अमृतके समान वाणी बोले-।4।।
जासु बिरहैँ सोचह दिन राती। रटटह् निरंतर गुन गन पाँती।। रघुकुल तिलक सुजन सुखादात। आयउ कुसल देव मुनि त्राता।।2।
भावार्थ:-जिनके विरह में आप दिन-रात सोच करते (घुलते) रहते हैं और जिनके गुण-समूहोंकी पंक्तियोंको आप निरन्तर रटते रहते हैं, वे ही रघुकुल के तिलक, सज्जनों को सुख देनेवाले और देवताओं तथा मुनियों के रक्षक श्रीरामजी सकुशल आ गये।।2।।
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत। सीता सहित अनुज प्रभु आवत।। सुनत बचन बिसरे सब दूखा। तृषावंत जिमि पाइ पियूषा।।3।।
भावार्थ:-शत्रु को रण में जीतकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु आ रहे हैं; देवता उनका सुन्दर यश गान कर रहे हैं। ये वचन सुनते ही [भरतजीको] सारे दुःख भूल गये। जैसे प्यासा आदमी अमृत पाकर प्यासके दुःख को भूल जाय।।3।।
को तुम्ह तात कहाँ ते आए। मोहि परम प्रिय बचन सुनाए।। मारुत सुत मैं कपि हनूमाना। नामु मोर सुनु कृपानिधाना।।4।
भावार्थ:-[भरतजीने पूछा-] हे तात ! तुम कौन हो ? और कहाँ से आये हो ? [जो] तुमने मुझको [ये] परम प्रिय (अत्यन्त आनन्द देने वाले) वचन सुनाये, [हनुमान् जी ने कहा-] हे कृपानिधान ! सुनिये; मैं पवन का पुत्र और जाति का वानर हूँ; मेरा नाम हनुमान् है।।4।।
दीनबंधु रघुपति कर किंकर। सुनत भरत भेंटेड उठि सादर।। मिलत प्रेम नहिं हृदय समाता। नयन ख्रवत जल पुलकित गाता।।5।।
भावार्थ:-मैं दीनों के बन्धु श्रीरघुनाथजी का दास हूँ। यह सुनते ही भरत जी उठकर आदरपूर्वक हनुमान् जी से गले लगकर मिले। मिलते समय प्रेम हृदय में नहीं समाता। नेत्रों से [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया।।5।।
कपि तव दरस सकल दुख बीते। मिले आजु मोहि राम पिरीते।। बार बार बूझी कुसलाता। तो कहूँ देउँ काह सुनु भ्राता।।6।।
भावार्थ:-[भरतजीने कहा-] हे हनुमान् ! तुम्हारे दर्शन से मेरे समस्त दुःख समाप्त हो गये (दुःखों का अन्त हो गया)। [तुम्हारे रूपमें] आज मुझे प्यारे राम जी मिल गये। भरतजी ने बार बार कुशल पूछी [और कहा-] हे भाई ! सुनो; [इस शुभ संवाद के बदले में] तुम्हें क्या दूँ ?।6।।
एह् संदेस सरिस जग माहीं। करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं।। नाहिन तात उरिन मैं तोही। अब प्रभु चरित सुनावह मोही।।7।।
भावार्थ:-इस सन्देश के समान (इसके बदल में देने लायक पदार्थ) जगत् में कुछ भी नहीं है, मैंने यह विचार कर देख लिया है। [इसलिये] हे तात ! मैं तुमसे किसी प्रकार भी उऋण नहीं हो सकता। अब मुझे प्रभु का चरित्र (हाल) सुनाओ।।7॥।
तब हनुमंत नाइ पद माथा। कहे सकल रघुपति गुन गाथा।। कह कपि कबहूँ कृपाल गोसाईं। सुमिरहिं मोहि दास की नाईं।।8।।
भावार्थ:-तब हनुमान् जी ने भरत जी के चरणों में मस्तक नवाकर श्रीरघुनाथजी की सारी गुणगाथा कही। [भरतजीने पूछा-] है हनुमान् ! कहो, कृपालु स्वामी श्रीरामचन्द्रजी कभी मुझे अपने दास की तरह याद भी करते हैं ?।।8।।
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहूँ मम सुमिरन कर्यों। सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकि तन चरनन्हि पर्यो।। रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो। काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंध सो।।
भावार्थ:-रघुवंश के भूषण श्रीरामजी क्या कभी अपने दासकी भाँति मेरा स्मरण करते रहे हैं ? भरतजी के अत्यन्त नम्र वचन सुनकर हनुमान् जी पुलकित शरीर होकर उनके चरणोंपर गिर पड़े [और मन में विचारने लगे कि] जो चराचर के स्वामी हैं वे श्रीरघुवीर अपने श्रीमुख से जिनके गुणसमूहों का वर्णन करते हैं, वे भरतजी ऐसे विनम्र, परम पवित्र और सद्गुणों के समुद्र क्यों न हों ?राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात। पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदय समात।।2क।। [हनुमान् जी ने कहा-] हे नाथ ! आप श्रीरामजी को प्राणों के समान प्रिय हैं, हे तात ! मेरा वचन सत्य है। यह सुनकर भरत जी बार-बार मिलते हैं, हृदय हर्ष समाता नहीं है।। 2(क)।।
॥ दोहा ॥
भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं। कही कुसल सब जाइ हरघि चलेउ प्रभु जान चढ़ि।।2ख।।
भावार्थ:-फिर भरत जी के चरणों में सिर नवाकर हनुमान् जी तुरंत ही श्रीरामजी के पास [लौट] गये और जाकर उन्होंने सब कुशल कही। तब प्रभु हर्षित होकर विमान पर चढ़कर चले।। 2(ख)।।
हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए।। पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई॥ इधर भरतजी हर्षित होकर अयोध्यापुरी आये और उन्होंने गुरु जी को सब समाचार सुनाया ! फिर राजमहल में खबर जनायी कि श्रीरघुनाथजी कुशलपूर्वक नगरको आ रहे हैं॥ सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाईं।। समाचार पुरबासिन्ह पाए। नर अरु नारि हरघषि सब धाए।।2॥।
भावार्थ:-खबर सुनते ही सब माताएँ उठ दौड़ीं। भरत जीने प्रभु की कुशल कहकर सबको समझाया। नगरवासियों ने यह समाचार पाया, तो स्त्री-पुरुष सभी हर्षित होकर दौड़े।।2।।
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला।। भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलि सिंधुरगामिनि।। 3।।
भावार्थ:-[श्रीरघुनाथजी के स्वागत के लिये] दही, दूब, गोरोचन, फल, फूल और मंगल के मूल नवीन तुलसीदल आदि वस्तुएँ सोने के थालोंमें भर-भरकर हथिनीकी-सी चालवली सौभाग्यवती स्त्रियाँ [उन्हें लेकर] गाती हुई चलीं।।3।
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहैँ संग न लावहिं।। एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई।।4।।
भावार्थ:-जो जैसे हैं (जहाँ जिस दशामें हैं)। वे वैसे ही (वहीं उसी दशामें) उठ दौड़ते हैं। [देर हो जाने के डर से] सबालकों और बूढ़ों को कोई साथ नहीं लाते। एक दूसरे से पूछते हैं-भाई ! तुमने दयालु श्रीरघुनाथजीको देखा है?।।4।।
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल शोभा कै खानी।। बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा।। 5।। प्रभुको आते जानकर अवधपुरी सम्पूर्ण शोभाओंकी खान हो गयी। तीनों प्रकारकी सुन्दर वायु बहने लगी। सरयूजी अति जलवाली हो गयीं (अर्थात् सरयूजीका जल अत्यन्त निर्मल हो गया)।।5।। हरघषित गुर परिजन अनुज भूसुर बूंद समेत। चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत।। 3क।।
भावार्थ:-गुरु वसिष्तजी, कुटुम्बी, छोटे भाई शत्रुघ्न तथा ब्राह्मणों के समूहके साथ हर्षित होकर भरतजी अत्यन्त प्रेमपूर्ण मन से कृपाधाम श्रीरामजीके सामने (अर्थात् अगवानीके लिये) चले।। 3(क)।।
बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान। देखि मधुर सुर हरघषित करहिं सुमंगल गान।।3ख।।
भावार्थ:-बहुत-सी स्त्रियाँ अटारियों पर चढ़ी आकाशमें विमान देख रही है और उसे देखकर हर्षित होकर मीठे स्वर से सुन्दर मंगलगीत गा रही हैं।। 3(ख)।।
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखु हरषान। बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान।।3ग॥।
भावार्थ:-श्रीरघुनाथजी पूर्णिमा के चन्द्रमा हैं, तथा अवधपुर समुद्र है, जो उस पूर्णचन्द्रको देखकर हर्षित हो रहा है और शोक करता हुआ बढ़ रहा है [इधर-उधर दौड़ती हुई] स्त्रियाँ उसी तरंगोंके समान लगती है।। 3(ग)।।
इहाँ भातुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर।। सुतु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा।।4।
भावार्थ:-यहाँ (विमान पर से) सूर्यकुलरूपी कमल के प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजी वानरोंको मनोहर नगर दिखला रहे हैं। [वे कहते है-] हे सुग्रीव ! हे अंगद ! हे लंकापति विभीषण ! सुनो। यह पुरी पवित्र है और यह देश सुन्दर है॥ जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदितजगु जाना।।
॥ चौपाई ॥
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ।।2।।
भावार्थ:-यद्यपि सबने वैकुण्ठकी बड़ाई की है-यह वेद पुराणोंमें प्रसिद्ध है और जगत् जानता है, परन्तु अवधपुरीके समान मुझे वह भी प्रिय नहीं है। यह बात (भेद) कोई-कोई (विरले ही) जानते हैं।।2।।
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनी। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि।। जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा।। 3।।
भावार्थ:-यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। उसके उत्तर दिशामें [जीवोंको] पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें खान करने से मनुष्य बिना ही परिश्रम मेरे समीप निवास (सामीप्य मुक्ति) पा जाते हैं।।3।।
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी।। हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी।।4।।
भावार्थ:-यहाँ के निवासी मुझे बहुत ही प्रिय हैं। यह पुरी सुख की राशि और मेरे परमधामको देनेवाली है। प्रभुकी वाणी सुनकर सब वानर हर्षित हुए [और कहने लगे कि] जिस अवध की स्वयं श्रीरामजीने बड़ाई की, वह [अवश्य ही] धन्य है।।4।।
॥ दोहा ॥
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान। नगर निकट प्रभु प्रेरेठ भूमि बिमान।।4क।।
भावार्थ:-कृपासागर भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने सब लोगों को आते देखा, तो प्रभुने विमानको नगरके समीप उतरने की प्रेरणा की। तब वह पृथ्वी पर उतरा।। 4(क)।।
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाह। प्रेरित राम चलेउ सो हरघषु बिरह अति ताहु।।4ख।।
भावार्थ:-विमान से उतरकर प्रभुने पुष्पकविमानसे कहा कि तुम अब कुबेर के पास जाओ। श्रीरामजीकी प्रेरणा से वाहक चले। उसे, [अपने स्वमीके पास जानेका] हर्ष है और प्रभु श्रीरामचन्द्रजीसे अलग होनेका अत्यन्त दुःख भी।। 4(ख)।।
आए भरत संग सब लोगा। कूस तन श्रीरघुबीर बियोगा।। बामदेव बसिष्ट मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक।। १।।
भावार्थ:-भरतजीके साथ सब लोग आये। श्रीरघुवीरके वियोगसे सबके शरीर दुबले हो रहे हैं। प्रभुने वामदेव, वसिष्ठ आदि मुनिश्रेष्ठों को देखा, तो उन्होंने धनुष-बाण पृथ्वीपर रखकर-।7।।
धाइ धरे गुर चरन सरोरूह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह।। भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया।।2।।
भावार्थ:-छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित दौड़कर गुरु जी के चरणकमल पकड़ लिये; उनके रोम-रोम अत्यन्त पुलकित हो गये हैं। मुनिराज वसिष्ठजी ने [उठाकर] उन्हें गले लगाकर कुशल पूछी। [प्रभु ने कहा-] आपह्ीकी दयामें हमारी कुशल है।।2।।
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा।। गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज।।3॥।
भावार्थ:-धर्मकी धुरी धारण करनेवाले रघुकुलके स्वामी श्रीरामजीने सब ब्राह्मणों से मिलकर उन्हें मस्तक नवाया। फिर भरतजीने प्रभुके चरणकमल पकड़े जिन्हें देवता, मुनि, शंकरजी और ब्रह्मा जी [भी] नमस्कार करते हैं।।3।
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए।। स्यामल गात रोम भण ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े।।4।।
भावार्थ:-भरतजी पृथ्वी पर पड़े हैं, उठाये उठते नहीं। तब कृपासिंधु श्रीरामजीने उन्हें जबर्दस्ती उठाकर ह्वृदय से लगा लिया। [उनके] साँवले शरीर पर रोएँ खड़े हो गये। नवीन कमलके समान नेत्रओंमें [प्रेमाश्रुओंके] जलकी बाढ़ आ गयी।।4।।
राजीव लोचन ख्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी। अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी।।
भावार्थ:-प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही। जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लह्ी॥ कमलके समान नेत्रों से जल बह रहा है। सुन्दर शरीर से पुलकावली [अत्यन्त] शोभा दे रही है। त्रिलोकी के स्वामी प्रभु श्रीरामजी छोटे भाई भरत जी को अत्यन्त प्रेमसे हृदय से लगाकर मिले। भाई से मिलते समय प्रभु जैसे शोभित हो रहे हैं उसकी उपमा मुझसे कहीं नहीं जाती। मानो प्रेम और श्रृंगार शरीर धारण करके मिले और श्रेष्ठ शोभाको प्राप्त हुए।। ।।
॥ चौपाई ॥
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई। सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई।। अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो। बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो।।2।।
भावार्थ:-कृपानिधान श्रीरामजी भरतजी से कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजीके मुखसे वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजीने कहा-] हे पार्वती ! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजीको मिल रहा था) वचन और मन से परे हैं; उसे वही जानता है जो उसे पाता है। [भरतजीने कहा-] हे कोसलनाथ ! आपने आर्त (दुखी) जानकर दासको दर्शन दिये है, इससे अब कुशल है। विरहसमुद्रमें डूबते हुए मुझको कृपानिधान हाथ पकड़कर बचा लिया !।2।।
पुनि प्रभु हरघषि सच्रुहन भेंटे हृदय लगाइ।। लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ।।5।।
भावार्थ:-फिर प्रभु हर्षित होकर शत्रुन्नजीको हृदय से लगाकर उनसे मिले। तब लक्ष्मणजी और भरतजी दोनों भाई परम प्रेम से मिले।।5।।
भरतानुज लछ्िमन पुनि भेंटे। दुसह बिरह संभव दुख मेटे।।
भावार्थ:-सीता चरन भरत सिरु नावा। अनुज समेत परम सुख पावा॥ फिर लक्ष्मणजी शत्रुघ्न जी से गले लगकर मिले और इस प्रकार विरहसे उत्पन्न दुःखका नाश किया। फिर भाई शत्रुन्नजीसहित भरतजीने सीताजीके चरणोंमें सिर नवाया और परम सुख प्राप्त किया।।१।।
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी। जनित बियोगबिपति सब नासी।। प्रेमातुर सब लोग निहारी। कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी।।2।।
भावार्थ:-प्रभुको देखकर अयोध्यावासी सब हर्षित हुए। वियोगसे उत्पन्न सब दुःख नष्ट हो गये। सब लोगों को प्रेमविहलय [और मिलने के लिये अत्यन्त आतुर] देखकर खरके शत्रु कृपालु श्रीरामजीने एक चमत्कार किया।।2।
अमित रूप प्रगटे तेह्ि काला। जथाजोग मिले सबहि कृपाला।। कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी। किए सकल नर नारि बिसोकी।। 3।।
भावार्थ:-उसी समय कृपालु श्रीरामजी असंख्य रूपों में प्रकट हो गये और सबसे [एक ही साथ] यथायोग्य मिले। श्रीरघुवीरने कृपाकी दृष्टिसे देखकर सब नर-नारियों को शोकसे रहित कर दिया।।3।
छन महिं सबहिं मिले भगवाना। उमा मरम यह काहूँ न जाना।। एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा। आगें चले सील गुन धामा।।4।।
भावार्थ:-भगवान् क्षण मात्र में सबसे मिल लिये। हे उमा! यह रहस्य किसी ने नहीं जाना। इस प्रकार शील और गुणों के धाम श्रीरामजी सबको सुखी करके आगे बढ़े।।4।।
कौसल्यादि मातु सब धाई। निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई।।5।।
भावार्थ:-कौसल्या आदि माताएँ ऐसे दौड़ीं मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने बछड़ों को देखकर दौंड़ी हों।।5।।
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं। दिन अंत पुर रुख ्रवत थन हुंकार करि धावत भईं।।
भावार्थ:-अति प्रेम प्रभु सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे। गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे॥ मानो नयी ब्यायी हुई गौएँ अपने छोटे बछड़ों को घर पर छोड़ परवश होकर वनमें चरने गयी हों और दिन का अन्त होने पर [बछधड़ोंसे मिलने के लिये] हंकार करके थन से दूध गिराती हुई नगर की ओर दौड़ीं हों। प्रभु ने अत्यन्त प्रेमसे सब माताओंसे मिलकर उनसे बहुत प्रकार के कोलल वचन कहे। वियोगसे उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने [भगवान् से मिलकर और उनके वचन सुनकर] अगणित सुख और हर्ष प्राप्त किये।भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि। रामहि मिलत कैकई हृदय बहुत सकुचानि।।6क।। सुमित्राजी अपने पुत्र लक्ष्मणजीकी श्रीरामजी के चरणों में प्रीति जानकर उनसे मिलीं। श्रीरामजीसे मिलते समय कैकेयीजी हृदय में बहुत सकुचायीं।। 6(क)।।
॥ दोहा ॥
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ। कैकइ कहैँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ।।6ख।।
भावार्थ:-लक्ष्मणजी भी सब माताओंसे मिलकर और आशीर्वाद पाकर हर्षित हुए। वे कैकेयी जी से बार-बार मिले, परन्तु उनके मनका क्षोभ (रोष) नहीं जाता।। 6(ख)।।
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही। चरनन्हि लागि हरषु अति तेही।। देहिं असीस बूझि कुसलाता। होइ अचल तुम्हार अहिवाता।।4।।
भावार्थ:-जानकीजी सब सासुओं से मिलीं और उनके चरणों लगकर उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। सासुएँ कुशल पूछकर आशिष दे रही हैं कि तुम्हारा सुहाग अचल हो॥ सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं। मंगल जानि नयन जल रोकहिं।।
॥ चौपाई ॥
कनक थार आरती उतारहिं। बार बार प्रभु गात निहारहिं।।2।।
भावार्थ:-सब मातएँ श्रीरघुनाथजीका कमल-सा मुखड़ा देख रही हैं। [नेत्रों से प्रेमके आँसू उमड़े आते हैं; परन्तु] मंगलका समय जानकर वे आँसुओंके जलको नेत्रोंमें ही रोक रखती हैं। सोनेके थाल से आरती उतारती हैं और बार-बार प्रभुके श्री अंगोकी ओर देखती हैं।।2।।
नाना भाँति निछावरि करहीं। परमानंद हरष उर भरहीं।। कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि। चितवति कृपासिंधु रनधीरहि।। 3।।
भावार्थ:-अनेकों प्रकार की निछावरें करती हैं और ह्वृदय में परमानन्द तथा हर्ष भर रही हैं। कौसल्याजी बार-बार कृपाके समुद्र और रणधीर श्रीरघुवीर को देख रही हैं।।3।।
हृदय बिचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा।। अति सुकुमार जुगल मेरे बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे।।4।।
भावार्थ:-वे बार-बार हृदय में विचारती हैं कि इन्होंने लंका पति रावणको कैसे मारा ? मेरे ये दोनों बच्चे बड़े ही सुकुमार हैं और राक्षस तो बड़े भारी योद्धा और महान् बली थे।।4।।
लछ्धिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकित मातु। परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु।। 7॥।
भावार्थ:-लक्ष्मणजी और सीताजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको माता देख रही हैं। उनका मन परमानन्द में मगर है और शरीर बार बार पुलकित हो रहा है।।7॥।
लंकापति कपीस नल नीला। जामवंत अंगद सुभसीला।। हनुमदादि सब बानर बीरा। धरे मनोहर मनुज सरीरा।।।।
भावार्थ:-लंकापति विभीषण, वानरराज सुग्रीव, नल, नील, जाम्बवान् और अंगद तथा हनुमान् जी आदि सभी उत्तम स्वभाव वाले वीर वानरोंने मनुष्योंके मनोहर शरीर धारण कर लिये।। ।
भरत सनेह सील ब्रत नेमा। सादर सब बरनहिं अति प्रेमा।। देखि नगरबासिन्ह कै रीती। सकल सराहहिं प्रभु पद प्रीति।।2।।
भावार्थ:-वे सब भरत जी के प्रेम, सुन्दर स्वभाव, [त्यागके] व्रत और नियमों की अत्यन्त प्रेमसे आदरपूर्वक बड़ाई कर रहे हैं। और नगरनिवासियों की [प्रेम, शील और विनयसे पूर्ण] रीति देखकर वे सब प्रभुके चरणों में उनके प्रेमकी सराहना कर रहे हैं।।2।।
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए। मुनि पद लागह सकल सिखाए॥
भावार्थ:-गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे। इन्ह की कृपाँ दतुज रन मारे।।3। फिर श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया और सबको सिखाया कि मुनि के चरणों में लगो। ये गुरु वसिष्ठतजी हमारे कुलभर के पूज्य हैं। इन्हीं की कृपा से रणमें राक्षस मारे गये हैं।।3।।
ए सब सखा सुनह मुनि मेरे। भए समर सागर कहूँ बेरे।। मम हित लागि जन्म इन्ह हारे। भरतह् ते मोहि अधिक पिआरे।।4।।
भावार्थ:-[फिर गुरुजीसे कहा-] हे मुनि ! सुनिये। ये सब मेरे सखा हैं। ये संग्रामरूपी समुद्र में मेरे लिये बेड़े (जहाज) के समान हुए। मेरे हित के लिये इन्होंने अपने जन्मतक हार दिये। (अपने प्राणों तक को होम दिया)। ये मुझे भरतसे भी अधिक प्रिय हैं।।4।।
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। निमि। निमिष उपजत सुख नए।।5।।
भावार्थ:-प्रभुके वचन सुनकर सब प्रेम और आनन्द में मगर हो गये। इस प्रकार पल-पल में उन्हें नये-नये सुख उत्पन्न हो रहे हैं।।5।।
॥ दोहा ॥
कौसल्या के चरनन््हि पुनि तिन्ह नायउ माथ। आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ।।8क।।
भावार्थ:-फिर उन लोगों ने कौसल्या जी के चरणों में मस्तक नवाये। कौसल्याजीने हर्षित होकर आशिषें दीं [और कहा-] तुम मुझे रघुनाथ के समान प्यारे हो।। 8(क)।।
सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद। चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बूंद।।8ख।।
भावार्थ:-आनन्दकन्द श्रीरामजी अपने महल को चले, आकाश फूलों की बृष्टि से छा गया। नगरके स्त्री-पुरुषों के समूह अटारियों पर चढ़कर उनके दर्शन कर रहे हैं।। 8(ख)।।
कंचन कलस बिचित्र संवारे। सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे।। बंदनवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।।
भावार्थ:-सोनेके कलशों को विचित्र रीतिसे [मणि-रत्वादिसे] अलंकृत कर और सजाकर सब लोगोंने अपने-अपने दरवाजों पर रख लिया। सब लोगों ने मंगलके लिये बंदनवार, ध्वजा और पताकाएँ लगायीं।। ।।
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई। गजमनि रचि बहु चौक पुराईं।। नाना भाँति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बह बाजे।।2।।
भावार्थ:-सारी गलियाँ सुगन्धित द्रवोंसे सिंचायी गयीं। गजमुक्ताओंसे रचकर बहुत-सी चौकें पुरायी गयीं अनेकों प्रकारके के सुन्दर मंगल-साज सजाये गये और हर्षपूर्वक नगरमें बहुत-से डंके बजने लगे।।2।।
जहूँ तहँ नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।। कंचन थार आरतीं नाना। जुबतीं स्जें करहिं सुभ गाना।।3।।
भावार्थ:-स्त्रियाँ जहाँ-तहाँ निछावर कर रही है, और हृदय में हर्षित होकर आशीर्वाद देती है। बहुत-सी युवती [सौभाग्यवती] स्त्रियाँ सोने के थालोंमें अनेकों प्रकारकी आरती सजकर मंगलगान कर रही है।। 3।।
करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें।। पुर शोभा संपति कल्याना। निगम सेष सारदा बखाना।।4।।
भावार्थ:-वे आर्तिहर (दुःखोंको हरनेवाले) और सूर्यकुलरूपी कमलवनके प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामजीकी आरती कर रही हैं। नगरकी शोभा, सम्पत्ति और कल्याणका वेद शेषजी और सरस्वती वर्णन करते हैं-।4।।
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं। उमा तासु गुन नर किमि कहह्ीं।।5।।
भावार्थ:-परन्तु वे भी यह चरित्र देखकर ठगे-से रह जाते हैं (स्तम्भित हो रहते हैं)। [शिवजी कहते हैं-] हे उमा ! तब भला मनुष्य उनके गुणोंको कैसे कह सकते हैं।।5।।
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस। अस्त भरएँ बिगसत भई निरखि राम राकेस।। 9क।।
भावार्थ:-स्त्रियाँ कुमुदनीं हैं, अयोध्या सरोवर है और श्रीरघुनाथजीका विरह सूर्य है [इस विरह सूर्य के ताप से वे मुरझा गयी थीं]। अब उस विरह रूपी सूर्य के अस्त होनेपर श्रीरामरूपी पूर्णचन्द्रको निरखकर वे खिल उठीं।। 9(क)।।
होहिं सगुन सुभ बिबिधि बिधि बाजहिं गगन निसान। पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान।।9ख।।
भावार्थ:-अनेक प्रकार के शुभ शकुन हो रहे हैं, आकाशमें नगाड़े बज रहे हैं। नगर के पुरुषों और स्त्रियों को सनाथ (दर्शनद्वारा कृतार्थ) करके भगवान् श्रीरामचन्द्रजी महल को चले।। 9(ख)।।
प्रभु जानी कैकई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी।। ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीनन््हा।।१।
भावार्थ:-[शिवजी कहते हैं-] हे भवानी ! प्रभुने जान लिया कि माता कैकेयी लज्नित हो गयी हैं। [इसलिये] वे पहले उन्हीं के महल को गये और उन्हें समझा-बुझाकर बहुत सुख दिया। फिर श्रीहरिने अपने महलको गमन किया।।१।।
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए।। गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई।।2।।
भावार्थ:-कृपाके समुद्र श्रीरामजी जब अपने महल को गये, तब नगरके स्त्री-पुरुष सब सुखी हुए। गुरु वसिष्ठ जीने ब्राह्मणों को बुला लिया [और कहा-] आज शुभ घड़ी, सुन्दर दिन आदि सभी शुभ योग हैं।।2।।
सब द्विज देह हरघषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन।। मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए।।3।।
भावार्थ:-आप सब ब्राह्मण हर्षित होकर आज्ञा दीजिये, जिसमें श्रीरामचन्द्रजी सिंहासनपर विराजमान हों। वसिष्ठ मुनिके सुहावने वचन सुनते ही सब ब्राह्मणोंको बहुत ही अच्छे लगे।।3।।
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका।। अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजै। महाराज कहँ तिलक करीजै।।4।।
भावार्थ:-वे सब अनेकों ब्राह्मण कोमल वचन कहने लगे कि श्रीरामजीका राज्याभिषेक सम्पूर्ण जगत् को आनन्द देनेवाला है। हे मुनिश्रेष्ठ ! अब विलम्ब न कीजिये और महाराजका तिलक शीघ्र कीजिये।।4।।
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ। रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ।।0क।।
भावार्थ:-तब मुनिने सुमन्त्र जी से कहा, वे सुनते ही हर्षित हो चले। उन्होंने तुरंत ही जाकर अनेकों रथ, घोड़े और हाथी सजाये;।। 0(क)।।
जहैँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ। हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ।।0ख।।
भावार्थ:-और तहाँ-तहाँ [सूचना देनेवाले] दूतों को भेजकर मांगलिक वस्तुएँ मैँगाकर फिर हर्षके साथ आकर वसिष्ट जी के चरणों में सिर नवाया।। 0(ख)।।
नवाह्नपारायण, आठवाँ विश्राम
अवधपुरी अति रुचिर बनाई। देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई॥ राम कहा सेवकन्ह बुलाई। प्रथम सखन्ह अन्हवावह जाई।। ।। अवधपुरी बहुत ही सुन्दर सजायी गयी देवताओंने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी। श्रीरामन्द्रजीने सेवकोंको बुलाकर कहा कि तुमलोग जाकर पहले मेरे सखाओंको खान कराओ॥ सुनत बचन जहूँ तहँ जन धाए। सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए॥ पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे। निज कर राम जटा निरुआरे।।2।
भावार्थ:-भगवान् के वचन सुनते ही सेवक जहाँ-तहाँ और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादि को खान कराया। फिर करुणानिधान श्रीरामजीने भरतजी को बुलाया और उनकी जटाओंको अपने हाथोंसे सुलझाया।।2।।
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई। भगत बछल कृपाल रघुराई।। भरत भाग्य प्रभु कोमलताई। सेष कोटि सत सकहिं न गाई।।3।
भावार्थ:-तदनन्तर भक्तवत्सल कृपालु प्रभु श्रीरघुनाथजीने तीनों भाइयों को खान कराया। भरत जी का भाग्य कोमलताका वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते।।3।
पुनि निज जटा राम बिबराए। गुर अनुसासन मागि नहाए।। करि मज्जन प्रभु भूषण साजे। अंग अनंग देखि सत लाजे।।4।।
भावार्थ:-फिर श्रीरामजीने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजीकी आज्ञा माँगकर ख्रान किया। खान करके प्रभुने आभूषण धारण किये। उनके [सुशोभित] अंगोंको देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गये।।4।।
सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ॥ दिव्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ।।4क।।
भावार्थ:-[इधर] सासुओंने जानकीजी को आदरके साथ तुरंत ही खान कराके उनके अंग-अंगमें दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भलीभाँति सजा दिये (पहना दिये)।।
(क)।। राम बाम दिसि सोभति रमा रुप गुन खानि। देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि।।44ख।।
भावार्थ:-श्रीरामजीके बायीं ओर रूप और गुणोंकी खान रमा (श्रीजानकीजी) शोभित हो रही हैं। उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं।। 7(ख)।।
सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद। चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद।। 4ग।।
भावार्थ:-[काकभुशुण्डिजी कहते हैं-] हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये; उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियों के समूह तथा विमानोंपर चढ़कर सब देवता आनन्दकन्द भगवान् के दर्शन करने के लिये आये।। 4 (ग)।।
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिव्य सिंघासन मागा।।
भावार्थ:-रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई॥ प्रभुको देखकर मुनि वसिष्ट जी के मन में प्रेम भर आया। उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्यके समान था। उसका सौन्दर्य वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मणों को सिर नवाकर श्रीरामचन्द्रजी उसपर विराज गये।।4।।
जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई।। बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे।।2।।
भावार्थ:-श्रीजानकीजीके सहित श्रीरघुनाथजीको देखकर मुनियों का समुदाय अत्यन्त ही हर्षित हुआ। तब ब्राह्मणों ने वेदमन्त्रों का उच्चारण किया। आकाशमें देवता और मुनि जय हो, जय हो ऐसी पुकार करने लगे।।2।।
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा।। सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी।।3।।
भावार्थ:-[सबसे] पहले मुनि वसिष्तजीने तिलक किया। फिर उन्होंने सब ब्राह्मणों को [तिलक करनेकी] आज्ञा दी। पुत्रको राजसिंहासनपर देखकर माताएँ हर्षित हुई और उन्होंने बार-बार आरती उतारी।।3।।
बिप्रन्ह दान बिबिधि बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीनहे।। सिंघासन पर त्रिभुवन साईं। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं।।4।।
भावार्थ:-उन्होंने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकारके दान दिये और सम्पूर्ण याचकों को अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)। त्रिभुवन के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी को [अयोध्या के ] सिंहासन पर [विराजित] देखकर देवताओंने नगाड़े बजाये।।4।।
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं। नाचहिं अपछरा बूंद परमानंद सुर मुनि पावहीं।।
भावार्थ:-भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते। गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते॥ आकाशमें बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं। अप्सराओंके झुंड-के-झुंड नाच रहे हैं। देवता और मुनि परमानन्द प्राप्त कर रहे हैं। भरत, लक्ष्मण और शत्रुन्नजी, विभीषण, अंगद, हनुमान् और सुग्रीव आदिसहित क्रमशः छत्र, चैवर, पंखा, धनुष, तलवार, ढाल और सक्ति लिये हुए सुशोभित हैं।।।।
॥ चौपाई ॥
श्री सहित दिनकर बंस भूषन काम बहु छबि सोहई। नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई।। मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हद्ि प्रति सजे। अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे।।2।।
भावार्थ:-श्रीसीताजी सहित सूर्यवंश के विभूषण श्रीरामजीके शरीर में अनेकों कामदेवों छवि शोभा दे रही है। नवीन जलयुक्त मेघों के समान सुन्दर श्याम शरीरपर पीताम्बर देवताओंके के मन को मोहित कर रहा है मुकुट बाजूबंद आदि बिचित्र आभूषण अंग अंग में सजे हुए है। कमल के समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं; जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं।।2।।
॥ दोहा ॥
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस। बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस।।2क।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज गरुड़जी ! वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता। सरस्वतीजी, शेषजी और वेद निरन्तर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनन्द) महादेवजी ही जानते हैं।। 2(क)।।
भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम। बंदी बेष बेद तब आए जहैँ श्रीराम।।2ख।।
भावार्थ:-सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गये। तब भाटों का रूप धारण करके चारों वेद पहाँ आये जहाँ श्रीरामजी थे।। 2(ख)।।
प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान। लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान।।2ग।।
भावार्थ:-कृपानिधान सर्वज्ञ प्रभुने [उन्हें पहचानकर] उनका बहुत ही आदर किया। इसका भेद किसी ने कुछ भी नहीं जाना। वेद गुणवान करने लगे।। 2(ग)।।
जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने। दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।। अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।।
भावार्थ:-जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संयुक्त सक्ति नमामहे॥ हे सगुण और निर्गणरूप ! हे अनुपम रूप-लावण्ययुक्त ! है राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरोंको अपनी भुजाओंके बल से मार डाला। आपने मनुष्य-अवतार लेकर संसारके भारको नष्ट करके अत्यन्त कठोर दुःखों को भस्म कर दिया। हे दयालु ! है शरणागतकी रक्षा करनेवाले प्रभो ! आपकी जय हो। मैं शक्ति (सीताजी) सहित शक्तिमान आपको नमस्कार करता हूँ॥ तव बिष माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे। भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।।
जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे। भव खेद छेदन दच्छ हम कहूँ रच्छ राम नमामहे।।2।।
भावार्थ:-हे हरे ! आपकी दुस्तर मायाके वशीभूत होनेके कारण देवता, राक्षस, नाग, मनुष्य और चर अचर सभी काल, कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए) दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं। हे नाथ ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टिसे) देख लिया, वे [माया-जनित] तीनों प्रकारके दुःखोंसे छूट गये। हे जन्म मरणके श्रमको काटने में कुशल श्रीरामजी ! हमारी रक्षा कीजिये। हम आपको नमस्कार करते हैं।।2।।
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी। ते पाइ सुर दुर्लभ पददापि परम हम देखत हरी।। बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे। जपि नाम तव बिनु श्रम तरहीं भव नाथ सो समरामहे।।3।।
भावार्थ:-जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेषरूपसे मतवाले होकर जन्म-मृत्यु [के भय] को हरनेवाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि ! उन्हें देव-दुर्लभ (देवताओंको भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होनेवाले, ब्रह्मा आदिके) पदको पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं। [परन्तु] जो सब आशाओं को छोड़कर आपपर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागरसे तर जाते हैं। हे नाथ ! ऐसे हम आपका स्मरण करते हैं।।3।
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी। नख निर्गता मुनि बंदिता त्रिलोक पावनि सुरसरी।। ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे। पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।
भावार्थ:-जो चरण शिवजी और ब्रह्मा जी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणोंकी कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर [शिव बनी हुई] गौतमऋषि की पत्नी अहल्या तर गयी; जिन चरणों के नखसे मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्यको पवित्र करनेवाली देवनदी गंगाजी निकलीं और ध्वजा, वज्ज अकुंश और कमल, इन चिहनोंसे युक्त जिन चरणोंमें वनमें फिरते समय काँटे चुभ जानेसे घठुटे पड़ गये हैं; हे मुकुन्द ! हे राम ! हे रमापति ! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलोंको नित्य भजते रहते हैं।।4।।
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने। षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।। फल जुगल बिधि कट मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे। पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।।
भावार्थ:-वेद शास्त्रोंने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) हैं; जो [प्रवाहरूपसे] अनादि है; जिसके चार त्वचाएँ छः तने, पचीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत से फूल हैं; जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं; जिस पर एक ही बेल है, जो उसीके आश्रित रहती है; जिसमें नित्य नये पत्ते और फूल निकलते रहते हैं; ऐसे संसारवृक्षस्वरूप (विश्वरूपमें प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं।।5।।
जे ब्रह्म अजमद्रैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।। ते कहहूँ जानहूँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।। करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं। मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।
भावार्थ:-ब्रह्म अजन्म है, अद्वैत है केवल अनुभवसे ही जाना जाना जाता है और मन से परे है-जो [इस प्रकार कहकर उस] ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किन्तु हे नाथ ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं। हे करुणा के धाम प्रभो ! है सद्गुणोंकी खान ! हे देव ! हम यह बर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्यागकर आपके चरणोंमें ही प्रेम करें।। 6।।
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्ट्ि उदार। अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।3क।।
भावार्थ:-वेदोंने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की। फिर वे अन्तर्धान हो गये और ब्रह्मलोक को चले गये।। 3(क)।।
बैनतेय सुतु संभु तब आए जहूँ रघुबीर। बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।43ख।।
भावार्थ:-[काकभुशुण्डिजी कहते हैं-] हे गरुड़जी ! सुनिये, तब शिवजी वहाँ आये जहाँ श्रीरघुवीर जी थे और गदूद वाणीसे स्तुति करने लगे। उनका शरीर पुलकावली से पूर्ण हो गया-43(ख)।।
जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहिं जनं।। अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।। ।।
भावार्थ:-हे राम ! हे रमारणय (लक्ष्मीकान्त) ! हे जन्म-मरणके संतापका नाश करनेवाले! आपकी जय हो; आवागमनके भयसे व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिये। हे अवधिपति! हे देवताओं के स्वामी ! हे रमापति ! हे विभो ! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये॥ दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा मह्ि भूरि रुजा।।
रजनीचर बूंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।
भावार्थ:-हे दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावणका विनाश करके पृथ्वीके सब महान् रोगों (कष्टों) को दूर करने वाले श्रीरामजी ! राक्षस समूह रूपी जो पतंगे थे, वे सब आपको बाणरूपी अग्ि के प्रचण्ड तेजसे भस्म हो गये।।2।।
मह्ि मंडल मंडन चारुतरं। धत सायक चाप निषंग बरं॥। मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।
भावार्थ:-आप पृथ्वी मण्डल के अत्यन्त आभूषण हैं; आप श्रेष्ठ बाण, धनुश और तरकस धारण किये हुए हैं। महान् मद मोह और ममतारूपी रात्रिके अन्धकार समूहके नाश करनेके लिये आप सूर्य तेजोमय किरणसमूह हैं।।3।।
मनजात किरात निपातकिए। मृग लोक कुभोग सरेन हिए।। हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावर भूलि परे।।4।।
भावार्थ:-कामदेवरूपी भीलने मनुष्यरूपी हिरनों के हृदय में कुभोग रूपी बाँण मारकर उन्हें गिरा दिया है। हे नाथ ! हे [पाप-तापका हरण करनेवाले] हरे ! उसे मारकर विषयरूपी वनमें भूले पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवोंकी रक्षा कीजिये।।4।। बहुरोग बियोगन्हि लोग हए। भववदंध्ि निरादर के फल ए।।
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।
भावार्थ:-लोग बहुत-से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं। ये सब आपके चरणों के निरादर के फल हैं। जो मनुष्य आपके चरणकमलोंमें प्रेम नहीं करते, वे अथाह भव सागर में पड़े रहते हैं।।5।।
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं।। अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें। प्रिय संत अनंत सदा तिन््ह कें।।6।।
भावार्थ:-जिन्हें आपके चरणकमलोंमें प्रीति नहीं है, वे नित्य ही अत्यन्त दीन, मलीन (उदास) और दुखी रहते हैं। और जिन्हें आपकी लीला कथा का आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं।।6।।
नहिं राग न लोभ न मान मदा। तिन््ह कें सम बैभव वा बिषदा।। एह्हि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7॥।
भावार्थ:-उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ; न मन है, न मद। उनको सम्पत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) समान है। इसीसे मुनि लोग योग (साधन) का भरोसा सदा के लिये त्याग देते है और प्रसन्नताके साथ आपके सेवक बन जाते हैं।।7॥
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।। सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही।।8।।
भावार्थ:-वे प्रेम पूर्वक नियम लेकर निरन्तर शुद्ध हृदय से आपके चरणकमलोंकी सेवा करते रहते हैं। और निरादर और आदरको समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वीपर विचरते हैं।।8।।
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।। तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9॥।
भावार्थ:-हे मुनियों के मनरूपी कमलके भ्रमर ! हे रघुबीर महान् रणधीर एवं अजेय श्रीरघुवीर ! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ)। हे हरि ! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। आप जन्म-मरणरूपी रोग की महान औषध और अभिमान के शत्रु हैं।।9॥।
॥ चौपाई ॥
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्री रमनं।। रघुनंद निकंदय द्वंद्रधनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।0।।
भावार्थ:-आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान है। आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरन्तर प्रणाम करता हूँ। हे रघुनन्दन ! [आप जन्म- मरण सुख-दुःख राग-द्वेषादि] द्वन्द्व समूहोंका नाश कीजिये। है पृथ्वीकी पालना करनेवाले राजन् ! इस दीन जनकी ओर भी दृष्टि डालिये।।0।।
॥ दोहा ॥
बार बार बर मागउँ हरि देह श्रीरंग। पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।44क।
भावार्थ:-मैं आपसे बार-बार यही वरदान मांगता हूँ कि मुझे आपके चरणकमलोंकी अचलभक्ति और आपके भक्तोंका सत्संग सदा प्रात हो। हे लक्ष्मीपते ! हर्षित होकर मुझे यही दीजिये। बरनि उमापति राम गुन हरघषि गए कैलास। तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास।। 44ख।। श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलासको चले गये, तब प्रभुने वानरोंको सब प्रकाश से सुख देनेवाले डेरे दिलिवाये।। 44(ख)।।
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव दावनी।। महाराज कर सुख अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका।।।।
भावार्थ:-हे गरुड़जी ! सुनिये, यह कथा [सबको] पवित्र करनेवाली है, [दैहिक, दैविक, भौतिक] तीनों प्रकारके तापोंका और जन्म- मृत्युके भयका नाश करनेवाली है। महाराज श्री रामचन्द्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेकका चरित्र [निष्कामभावसे] सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं।।।।
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं।। सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं।।2।।
भावार्थ:-और जो मनुष्य सकाम भाव से सुनते और गाते हैं, वे अनेकों प्रकार के सुख और सम्पत्ति पाते हैं। वे जगत् में देव दुर्लभ सुखोंको भोगकर अन्तकाल में श्रीरघुनाथजीके परमाधाम को जाते हैं।।2।
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई।। खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी।।3।।
भावार्थ:-इसे जो जीवन्मुक्त विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे [क्रमशः] भक्ति, मुक्ति और नवीन सम्पत्ति (नित्य नये भोग) पाते हैं। है पक्षिराज गरुड़जी ! मैं अपनी बुद्धिकी पहुँचके अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो [जन्म-मरणके] भय और दुःखोंको हरनेवाली है।।3।।
बिरति बिबेक भगति दूढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी।। नित नव मंगल कौसलपुरी। हरघित रहहिं लोग सब कुरी।।4।।
भावार्थ:-यह वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करनेवाली है तथा मोहरूपी नदी के [पार करनेके] लिये सुन्दर नाव है। अवधपुरी में नित-नये मंगलोत्सव होते हैं। सभी वर्गोके लोग हर्षित रहते हैं।।4।।
नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सब कें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज।। मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए।।5।।
भावार्थ:-श्रीरामजीके चरणकमलोंमें-जिन्हें श्रीशिवजी, मुनिगण और ब्रह्मा जी भी नमस्कार करते हैं-सबकी नित्य नवीन प्रीति है। भिक्षुओंको बहुत प्रकारके वस्त्राभूण पहनाये गये और ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के दान पाये।।5।।
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।। जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति।। 5।।
भावार्थ:-वानर सब ब्रह्मानन्द में मगन हैं। प्रभु के चरणों में सबका प्रेम हैं ! उन्होंने दिन जाते जाने ही नहीं और [बात-की-बातमें] छः महीने बीत गये।।5।।
बिसरे गृह सपनेहूँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माहीं।।
भावार्थ:-तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए॥ उन लोगों को अपने घर भूल ही गये। [जगत् की तो बात ही क्या] उन्हें स्वप्न में भी घरकी सुध (याद) नहीं आती, जैसे संतोंके मनमें दूसरों से द्रोह करनेकी बात कभी नहीं आती। तब श्रीरघुनाथजीने सब सखाओंको बुलाया। सबने आकर आदर सहित सिर नवाया॥ परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे।।
तुम्ह अति कीन्हि मोरि सेवकाई। मुख पर केहिं बिधि करों बड़ाई।।2।।
भावार्थ:-बड़े ही प्रेम से श्रीरामजीने उनको पास बैठाया और भक्तों को सुख देने वाले कोमल बचन कहे- तुमलोगोंने मेरी बड़ी सेवा की है। मुँहपर किस प्रकार तुम्हारी बड़ाई करूँ ?।।2।।
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे।। अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही।। 3।।
भावार्थ:-मेरे हित के लिये तुम लोगों ने घरों को तथा सब प्रकारके सुखों को त्याग दिया। इससे तुम मुझे अत्यन्त ही प्रिय लग रहे हो। छोटे भाई, राज्य, सम्पत्ति, जानकी, अपना शरीर, घर, कुटुम्ब और मित्र-3।।
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहरउँ मोर यह बाना।। सब कें प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती।।4।।
भावार्थ:-ये सभी मुझे प्रिय हैं, परन्तु तुम्हारे समान नहीं। मैं झूठ नहीं कहता, यह मेरा स्वभाव है। सेवक सभी को प्यारे लगते हैं, यह नीति (नियम) हैं। [पर] मेरा तो दासपर [स्वभाविक ही] विशेष प्रेम है।।4।।
अब गृह जाह सखा सब भजेह मोहि दूढ़ नेम। सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेह अति प्रेम।।46।।
भावार्थ:-हे सखागण ! अब सब लोग घर जाओ; वहाँ दृढ़ नियम से मुझे भजते रहना मुझे सदा सर्वव्यापक और सबका हित करनेवाला जानकर अत्यन्त प्रेम करना है।।6।।
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए।। एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछ कहि अति अनुरागे।। ।।
भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर सब-के-सब प्रेममग्र हो गये। हम कौन है और कहाँ है ? यह देह की सुध भी भूल गयी। वे प्रभु के सामने हाथ जोड़कर टकटकी लगाये देखते ही रह गये। अत्यन्त प्रेमके कारण कुछ कह नहीं सकते।। ।।
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिधि बिधि ग्यान बिसेषा।। प्रभु सन्मुख कछ कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं।।2।।
भावार्थ:-प्रभुने उनका अत्यन्त प्रेम देखा, [तब] उन्हें अनेकों प्रकारसे विशेष ज्ञान का उपदेश दिया। प्रभु के सम्मुख वे कुछ नहीं कह सकते। बार-बार प्रभुके चरणकमलोंको देखते हैं।।2।।
तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए।। सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए।।3।।
भावार्थ:-तब प्रभु ने अनेकों रंग के अनुपम और सुन्दर गहने-कपड़े मँगवाये। सबसे पहले भरतजी ने अपने हाथ से सँवारकर सुग्रीवको वस्त्राभूषण पहनाये।।3।।
प्रभु प्रेरित लद्िमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥ अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला।।4।।
भावार्थ:-फिर प्रभु की प्रेरणा से लक्ष्मणजीने विभीषणको गहने-कपड़े पहनाये, जो श्रीरघुनाथजी के मनको बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगह से हिलेतक नहीं। उनका उत्कट प्रेम देखकर प्रभुने उनको नहीं बुलाया।।4।।
॥ दोहा ॥
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ। हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ।। 47क।।
भावार्थ:-जाम्बवान् और नील आदि सबको श्रीरघुनाथजीने स्वयं भूषण- वस्त्र पहनाये। वे सब अपने हृदयों में श्रीरामचन्द्रजी के रूपको धारण करके उनके चरणों में मस्तक नवाकर चले।। 7(क)।।
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि। अति बिनीत बोलेउ बचन मनहूँ प्रेम रस बोरि।। 7ख।।
भावार्थ:-तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रोंगें जल भरकर और हाथ जोड़कर अत्यन्त विनम्र तथा मानो प्रेमके रसमें डुबोये हुए (मधुर) वचन बोले।। 7(ख)।।
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो। मरती बेर नाथ मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोछें घाली।।।।
भावार्थ:-हे सर्वज्ञ ! हे कृपा और सुख के समुद्र ! हे दीनों पर दया करनेवाले ! हे आतोंकि बन्धु ! सुनिये। हे नाथ ! मरते समय मेरा पिता बालि मुझे आपकी ही गोदमें डाल गया था !।।
असरन सरन बिरदु संभारी। मोहि जनि तजह भगत हितकारी।। मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता।।2।।
भावार्थ:-अतः हे भक्तों के हितकारी ! अपना अशरण-शरण विरद (बाना) याद करके मुझे त्यागिये नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, माता सब कुछ आप ही हैं आपके चरणकमलोंको छोड़कर मैं कहाँ जाऊँ ?02।।
तुम्हहि बिचारि कहटह्ट नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥। बालक ग्यान बुद्धि बल हीना। राखह सरन नाथ जन दीना।।3।।
भावार्थ:-हे महाराज ! आप ही विचार कर कह्ठिये, प्रभु (आप) को छोड़कर घर में मेरा क्या काम है ? हे नाथ ! इस ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन बालक तथा दीन सेवकको शरणमें रखिये।।3।।
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ।। अस कहि चरन परेउ प्रभु पाहीं। अब जनि नाथ कहह् गृह जाही।।4।।
भावार्थ:-मैं घर की सब नीची-से-नीची सेवा करूँगा और आपके चरणकमलोंको देख-देखकर भवसागरसे तर जाऊँगा। ऐसा कहकर वे श्रीरामजी के चरणों में गिर पड़े [और बोले-] हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये ! हे नाथ ! अब यह न कहिये कि तू घर जा।।4।।
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव॥ प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव।। 8क।।
भावार्थ:-अंगद के विनम्र वचन सुनकर करुणाकी सीमा प्रभु श्रीरघुनाथजीने उनको उठाकर हृदय से लगा लिया। प्रभुके नेत्रकमलोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया।। 8(क)।।
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ॥ बिदा कीन्हि भगवान तब बह प्रकार समुझाइ।। 8ख।।
भावार्थ:-तब भगवान् ने अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि (रवतों के आभूषण) बालि-पुत्र अंगद को पहनाकर और बहुत प्रकार से समझाकर उनकी बिदाई की।। 48(ख)।।
भरत अनुज सौमित्रि समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।। अंगद हृदयेँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।।॥।
भावार्थ:-भक्त की करनी को याद करके भरतजी छोटे भाई शत्रुन्नजी और लक्ष्मणजी सहित उनको पहुँचाने चले। अंगदके हृदय में थोड़ा प्रेम नहीं है (अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है)। वे फिर-फिर कर श्रीरामजी की ओर देखते हैं।।॥।
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।। राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।।2।।
भावार्थ:-और बार-बार दण्डवत् प्रणाम करते हैं। मन में ऐसा आता है कि श्रीरामजी मुझे रहने को कह दें। वे श्रीरामजी के देखने की, बोलने की, चलने की तथा हँसकर मिलने की रीति को याद कर-करके सोचते हैं (दुखी होते हैं)।।2।।
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ ह्ृदयेँ पद पंकज राखी।। अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए॥3॥
भावार्थ:-किन्तु प्रभुका रुख देखकर, बहुत-से विनय-वचन कहकर तथा हृदय में चरण-कमलों को रखकर वे चले। अत्यन्त आदर के साथ सब वानरों को पहुँचाकर भाइयोंसहित भरतजी लौट आये।।3॥।
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।। दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।।4।।
भावार्थ:-तब हनुमान जी ने सुग्रीव के चरण पकड़कर अनेक प्रकार से विनती की और कहा- हे देव ! दस (कुछ) दिन श्रीरघुनाथजी की चरणसेवा करके फिर मैं आकर आपके चरणों के दर्शन करूँगा।।4।।
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।। अस कहि कपिसब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनह हनुमंता।।5।।
भावार्थ:-[सुग्रीव ने कहा-] हे पवनकुमार ! तुम पुण्य की राशि हो [जो भगवान् ने तुमको अपनी सेवा में रख लिया]। जाकर कृपाधाम श्रीरामजी की सेवा करो ! सब वानर ऐसा कहकर तुरंत चल पड़े। अंगद ने कहा- हे हनुमान् ! सुनो-।5।।
कहेह दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि। बार बार रघुनायकह्ि सुरति कराएह मोरि।।9क।।
भावार्थ:-मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ, प्रभु मेरी दण्डवत् कहना और श्रीरघुनाथजी को बार-बार मेरी याद कराते रहना।। 49(क)।।
अस कह चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत। तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत।। 9ख।।
भावार्थ:-ऐसा कहकर बालि पुत्र अंगद चले, तब हनुमान् जी लौट आये और आकर प्रभु से उनका प्रेम वर्णन किया। उसे सुनकर भगवान् प्रेममय्र हो गये।। 9(ख)।।
कुलिसह चाहि कठोर अति कोमल कुसुमह चाहि। चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कह काहि।।9ग।।
भावार्थ:-[काकभुशुण्डिजी कहते हैं-] हे गरुड़जी ! श्रीरामजीका चित्त वद्ध से भी अत्यन्त कठोर और फूल से भी अत्यन्त कोमल है। तब कहिये, वह किसकी समझ में आ सकता है ?।। 9(ग)।।
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।
भावार्थ:-जाह भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू॥ फिर कृपालु श्रीरामजीने निषादराजको बुला लिया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसादमें दिये। [फिर कहा-] अब तुम भी घर जाओ, वहाँ मेरा स्मरण करते रहना और मन, वचन तथा धर्म के अनुसार चलना।। ।
तुम्ह मम सखा भरत सम शभ्राता। सदा रहेह पुर आवत जाता।। बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।।2।।
भावार्थ:-तुम मेरे मित्र हो और भरत के समान भाई हो। अयोध्या में सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसको भारी सुख उत्पन्न हुआ। नेत्रोंमें [आनन्द और प्रेमके आँसुओंका] जल भरकर वह चरणों में गिर पड़ा।।2।।
चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन््हि सुनावा।। रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।।3।।
भावार्थ:-फिर भगवान् के चरणकमलों को हृदय में रखकर वह घर आया और आकर अपने कुटुम्बियों को उसने प्रभु का स्वभाव सुनाया। श्रीरघुनाथजी का यह चरित्र देखकर अवध-पुरवासी बार-बार कहते हैं कि सुख की राशि श्रीरामचन्द्रजी धन्य हैं।।3।।
राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।। बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता सोई।।4।।
भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी के राज्य पर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसीसे वैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजी के प्रतापसे सबकी बिषमता (आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी।।4।।
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग।।20।।
भावार्थ:-सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रम के अनुकूल धर्म में तत्पर हुए सदा वेद-मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बात का भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सतात है।।20।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।। सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।। ।।
भावार्थ:-राम-राज्य में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और श्रुति में बतायी हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।।।।
॥ चौपाई ॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहूँ अघ नाहीं।। राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी।।2।।
भावार्थ:-धर्म अपने चारों चरणों (सत्य शौच दया और दान) से जगत में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्रमें भी कहीं पाप नहीं हैं। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्ति के परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष) के अधिकारी है।।2।।
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा।। नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना।।3।।
भावार्थ:-छोटी अवस्था में मृत्यु नहीं होती, न किसी को कोई पीड़ा होती है। सभी के शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी हैन और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है।।3।
सब निर्दभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी।। सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी।।4।।
भावार्थ:-सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणों का आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरेके किये हुए उपकार को माननेवाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसीमें नहीं हैं।।4।।
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिऊउं। काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं।।2।
भावार्थ:-[काकभुशुण्डिजी कहते हैं-] हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये ! श्रीरामजी के राज्य में जड़, चेतन सारे जगत् में काल, कर्म, स्वभाव और गुणों से उत्पन्न हुए दुःख किसी को भी नहीं होते (अर्थात् इनके बन्धन में कोई नहीं है)।।2।
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला।। भुवन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू।। 4॥।
भावार्थ:-अयोध्या में श्रीरघुनाथजी सात समुद्रों की मेखला (करधनी) वाली पृथ्वीके एकमात्र राजा हैं। जिनके एक-एक रोम में अनेकों ब्रह्माण्ड हैं, उनके लिये सात द्वीपों की यह प्रभुता कुछ अधिक नहीं है।।
सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी।। सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरि एहिं चरित तिन्हहैँ रति मानी।।2।।
भावार्थ:-बल्कि प्रभु की उस महिमाको समझ लेनेपर तो यह कहने में [कि वे सात समुद्रों से घिरी हुई सप्तद्वीपमयी पृथ्वीके एकच्छत्र सम्राट हैं] उनकी बड़ी हीनता होती है। परंतु हे गरुड़जी ! जिन्होंने वह महिमा जान भी ली है, वे भी फिर इस लीलामें बड़ा प्रेम मानते हैं।।2।।
सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला।। राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा।।3।।
भावार्थ:-क्योंकि उस महिमा को जानने का फल यह लीला (इस लीला का अनुभव) ही है, इन्द्रियों का दमन करने वाले श्रेष्ठ महामुनि ऐसा कहते हैं। रामराज्यकी सुखसम्पत्ति का वर्णन शेषजी और सरस्वती जी भी नहीं कर सकते।।3।।
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी॥। एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी।।4।।
भावार्थ:-सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणों के चरणों के सेवक हैं। सभी पुरुषमात्र एकपत्नीब्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पति का हित करनेवाली हैं।।4।।
दंड जतिन्ह कर भेद जहैँ नर्तक नृत्य समाज। जीतह मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज।।22।।
भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी के राज्य में दण्ड केवल संन्यासियों के हाथों में है और भेद नाचनेवालों के नृत्यसमाज में है और जीतो शब्द केवल मनके जीतने के लिये ही सुनायी पड़ता है (अर्थात् राजनीति में शत्रुओं को जीतने तथा चोर-डाकुओं आदि को दमन करने के लिये साम, दान, दण्ड और भेद-ये चार उपाय किये जाते हैं। रामराज्य में कोई शत्रु है ही नहीं इसलिये जीतो शब्द केवल मनके जीतने के लिये कहा जाता है। कोई अपराध करता ही नहीं, इसलिये दण्ड किसीको नहीं होता; दण्ड शब्द केवल संन्यासियों के हाथमें रहनेवाले दण्डके लिये ही रह गया है तथा सभी अनुकूल होने के कारण भेदनीति की आवश्यकता ही नहीं रह गयी; भेद शब्द केवल सुर-तालके भेद के लिये ही कामों में आता है।)।।22।।
फूलहिं फरहिं सदा तरु कारन। रहृहिं एक सँग गज पंचानन।। खग मृग सहज बयरु बिसराई। सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई।।।।
भावार्थ:-वनों में वृक्ष सदा फूलते और फलते हैं। हाथी और सिंह [वैर भूलकर] एक साथ रहते हैं। पक्षी और पशु सभीने स्वभाविक वैर भुलाकर आपसभें प्रेम बढ़ा लिया है।। ।।
कूजहिं खग मृग नाना बुंदा। अभय चरहिं बन करहिं अनंदा। सीतल सुरभि पवन बह मंदा। गुंजत अलि लै चलि मकरंदा।।2।।
भावार्थ:-पक्षी कूजते (मीठी बोली बोलते) हैं, भाँति-भाँतिके पशुओं के समूह वनमें निर्भय विचरते और आनन्द करते हैं। शीतल, मन्द, सुगन्धित पवन चलता रहता है। भौरे पुष्पोंका रस लेकर चलते हुए गुंजार करते जाते हैं।।2।।
लता बिटप मागें मधु चवहीं। मनभावतो धेनु पय ख्रवहीं।। ससि संपन्न सदा रह धरनी। त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी।।3।।
भावार्थ:-बेलें और वृक्ष माँगने से ही मधु (मकरन्द) टपका देते हैं। गौएँ मनचाहा दूध देती हैं। धरती सदा खेती से भरी रहती है। त्रेता में सत्ययुगकी करनी (स्थिति) हो गयी।।3।
प्रगटी गिरिन्ह बिबिधि मनि खानी। जगदातमा भूप जग जानी।। सरिता सकल बहहिं बर बारी। सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।4।।
भावार्थ:-समस्त जगत् के आत्मा भगवान् को जगत् का राजा जानकर पर्वतों ने अनेक प्रकार की मणियों की खाने प्रकट कर दीं। सब नदियाँ श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल और सुखप्रद स्वादिष्ट जल बहने लगीं।।4।।
सागर निज मरजादाँ रहहीं। डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं।। सरसिज संकुल सकल तड़ागा। अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।। 5।।
भावार्थ:-समुद्र अपनी मर्यादा में रहते हैं। वे लहरों के द्वारा किनारों पर रत्र डाल देते हैं, जिन्हें मनुष्य पा जाते हैं। सब तालाब कमलों से परिपूर्ण हैं। दसों दिशाओं के विभाग (अर्थात् सभी प्रदेश) अत्यन्त प्रसन्न हैं।।5।।
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज। मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र कें राज।।23।।
भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी के राज्यमें चन्द्रमा अपनी [अमृतमयी] किरणों से पृथ्वीको पूर्ण कर देते हैं। सूर्य उतना ही तपते हैं जितने की आवश्यकता होती है और मेघ माँगने से [जब जहाँ जितना चाहिये उतना ही] जल देते हैं।।23।
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन््हे।।
भावार्थ:-श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर॥ प्रभु श्रीरामजी ने करोड़ों अश्वमेध यज्ञ किये और ब्राह्मणों को अनेकों दान दिये। श्रीरामचन्द्रजी वेदमार्ग के पालनेवाले, धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले, [प्रकृतिजन्य सत्त्व रज और तम] तीनों गुणों से अतीत और भोगों (ऐश्घर्य) में इन्द्र के समान हैं।। 4।।
पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता।। जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई।।2।।
भावार्थ:-शोभा की खान, सुशील और विनम्र सीताजी सदा पति के अनुकूल रहती हैं। वे कृपासागर श्रीरामजीकी प्रभुता (महिमा) को जानती हैं और मन लगाकर उनके चरणकमलों की सेवा करती हैं।।2।।
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिघधि गुनी।। निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई।।3।
भावार्थ:-यद्यपि घर में बहुत-से (अपार) दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधिमें कुशल हैं, तथापि [स्वामीकी सेवा का महत्त्व जाननेवाली] श्रीसीताजी घरकी सब सेवा अपने ही हाथों से करती है और श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका अनुसरण करती हैं।।3।।
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ।। कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं।।4।।
भावार्थ:-कृपासागर श्रीरामचन्द्रजी जिस प्रकारसे सुख मानते हैं, श्रीजी वही करती हैं; क्योंकि वे सेवा की विधि को जाननेवाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है।।4।।
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततनिंदिता।।5।।
भावार्थ:-[शिवजी कहते हैं-] हे उमा ! जगज्जननी रमा (सीताजी) ब्रह्मा आदि देवताओं से वन्दित और सदा अनिन्दित (सर्वगुणसम्पन्न) हैं।।5।।
जासु कृपा कटाच्छ सुर चाहत चितव न सोई। राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोई।।24।।
भावार्थ:-देवता जिनका कृपा कटाक्ष चाहते हैं, परंतु वे उनकी ओर देखती भी नहीं, वे ही लक्ष्मीजी जानकीजी अपने [महामहिम] स्वभावको छोड़कर श्रीरामचन्द्रजी के चरणारविन्दमें प्रीति करती हैं।।24।।
सेवहिं सानुकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई।। प्रभु सुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहूँ कृपाल हमहि कछ कहहीं।। ।।
भावार्थ:-सब भाई अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में उनकी अत्यन्त अधिक प्रीति है। वे सदा प्रभु का मुखारविन्द ही देखते रहते हैं कि कृपाल श्रीरामजी कभी हमें कुछ सेवा करने को कहें।।१।।
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती।। हरघित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा।।2।।
भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी भी भाइयों पर प्रेम करते हैं और उन्हें नाना प्रकारकी नीतियाँ सिखलाते हैं। नगर के लोग हर्षित होते रहते हैं और सब प्रकारके देवदुर्लभ (देवताओंको भी कठिनतासे प्राप्त होने योग्य) भोग भोगते हैं।।2।।
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं॥ दुइ सुत सुंदर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरान्ह गाए।।3।।
भावार्थ:-वे दिन रात ब्रह्मा जी को मानते रहते हैं और [उनसे] श्रीरघुवी रके चरणोंमें प्रीति चाहते हैं। सीताजी के लव और कुश-ये दो पुत्र उत्पन्न हुए, जिनका वेद पुराणों ने वर्णन किया है।।3।।
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहूँ अति सुंदर।। दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे।।4।।
भावार्थ:-वे दोनों ही विजयी (विख्यात योद्धा), नम्र और गुणोंके धाम हैं और अत्यन्त सुन्दर हैं, मानो श्री हरि के प्रतिबिम्ब ही हों। दो-दो पुत्र सभी भाइयों के हुए, जो बड़े ही सुन्दर, गुणवान् और सुशील थे। । 4।।
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार। सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार।।25।।
भावार्थ:-जो [बौद्धिक] ज्ञान, वाणी और इन्दियों से परे और अजनमा हैं तथा माया, मन और गुणोंके परे हैं, वही सच्चिदादन्घन भगवान् श्रेष्ठ तर-लीला करते हैं।।25।।
प्रातकाल सरजू करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन।। बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि जब जानहिं।।।।
भावार्थ:-प्रातः काल सरयू में खान करके ब्राह्मणों और सज्जनोंके साथ सभा में बैठते हैं। वसिष्ठजी वेद और पुराणों की कथाएँ वर्णन करते हैं और श्रीरामजी सुनते हैं, यद्यपि वे सब जानते हैं।। 4।।
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं।। भरत सच्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई।।2।।
भावार्थ:-वे भाइयों को साथ लेकर भोजन करते हैं। उन्हें देखकर सभी माताएँ आनन्द से भर जाती है। भरतजी और शत्रुघ्नजी दोनों सहित हनुमान् जी सहित उपवनों में जाकर।।2।।
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा।। सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिहिं।।3।।
भावार्थ:-वहाँ बैठकर श्रीरामजी के गुणोंकी कथाएँ पूछते हैं और हनुमान् जी अपनी सुन्दर बुद्धिसे उन गुणोंमें गोता लगाकर उनका वर्णन करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के निर्मल गुणोंकोसुनकर दोनों भाई अत्यन्त सुख पाते हैं और विनय करके बार-बार कहलवाते हैं।।3।।
सब कें गृह गृह होहिं पुराना। राम चरित पावन बिधि नाना॥ नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं।।4।।
भावार्थ:-सबके यहाँ घर-में पुराणों और अनेक प्रकार के पवित्र रामचरित्रों की कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजी का गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन-रातका बीतना भी नहीं जान पाते।।4।।
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज।।26।।
भावार्थ:-जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरी के निवासियों के सुख-सम्पत्ति के सुमुदायका वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते।।26।।
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा।।
भावार्थ:-दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं॥ नारद आदि और सनक आदि मुनीश्वर सब कोसलराज श्रीरामजी के दर्शनके लिये प्रतिदिन अयोध्या आते हैं और उस [दिव्य] नगरको देखकर वैराग्य भुला देते हैं।।4।।
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं।। पुर चहूँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर।।2।।
भावार्थ:-[दिव्य] स्वर्ण और रतवों से भरी हुई अटारियाँ हैं। [मणि-रव्ों की] अनेक रंगोंकी सुन्दर ढली हुई फर्श हैं। नगर के चारों ओर अत्यन्त सुन्दर परकोटा बना है, जिसपर सुन्दर रंग-बिरंगे कँगूरे बने हैं।।2।।
नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई।। महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा।।3।
भावार्थ:-मानो नवग्रहों ने बड़ी भारी सेना बनाकर अमरावती को आकर घेर लिया हो। पृथ्वी (सड़कों) पर अनेकों रंगों के (दिव्य) काँचों (रतों) की गच बनायी (ढाली) गयी है, जिसे देखकर श्रेष्ठ मुनियोंके भी मन नाच उठते हैं।।3।।
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहूँ रबि ससि दुति निंदत।। बह मनि रचित झरोखा शभ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं।।4।।
भावार्थ:-उज्जवल महल ऊपर आकाशको चूम (छू) रहे हैं। महलों पर के कलश [अपने दिव्य प्रकाशसे] मानो सूर्य, चन्द्रमाके प्रकाशकी भी निन््दा (तिरस्कार) करते हैं। [महलोंमें] बहुत-सी मणियोंसे रचे हुए झरोखे सुशोभित हैं और घर-घरमें मणियोंके दीपक शोभा पा रहे हैं।।4।।
मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची। मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची।। सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे। प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहू बज्न्हि खचे।।
भावार्थ:-घरों में मणियों के दीपक शोभा दे रहे हैं। मूँगों की बनी हुई देहलियाँ चमक रही हैं। मणियों (रत्नों) के खम्भे हैं। मरकतमणियों (पन्नों) से जड़ी हुई सोने की दीवारें ऐसी सुन्दर हैं मानो ब्रह्मा ने खास तौर से बनायी हों। महल सुन्दर, मनोहर और विशाल हैं। उनमें सुन्दर स्फटिक के आँगन बने हैं। प्रत्येक द्वार पर बहुत-से खरादे हुए हीरों से जड़े हुए सोने के किवाड़ हैं।।
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ। राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ।।27।।
भावार्थ:-घर-घर में सुन्दर चित्रशालाएँ हैं, जिनमें श्रीरामजी के चरित्र बड़ी सुन्दरता के साथ सँवार-कर अंकित किये हुए हैं। जिन्हें मुनि देखते हैं, तो वे उनके भी चित्त को चुरा लेते हैं।।27।।
सुमन बाटिका सबहिं लगाईं। बिबिध भांति करि जतन बनाईं।। लता ललित बहु जाति सुहाईं। फूलहिं सदा बसंत कि नाईं।।।।
भावार्थ:-सभी लोगों ने भिन्न-भिन्न प्रकार की पुष्पोंकी वाटिकाएँ यत्र करके लगा रक्खी हैं, जिनमें बहुत जातियों की सुन्दर और ललित लताएँ सदा वसंतकी तरह फूलती रहती हैं।। ।
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिधि सदा बह सुंदर।। नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए।।2।।
भावार्थ:-भौरें मनोहर स्वर से गुंजार करते हैं। सदा तीनों प्रकार की सुन्दर वायु बहती रहती है। बालकों ने बहुत-से पक्षी पाल रकक््खे हैं, जो मधुर बोली बोलते हैं और उड़ने में सुन्दर लगते हैं।।2।।
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर शोभा अति पावत।। जहूँ तहैँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं।। 3।।
भावार्थ:-मोर, हंस, सारस और कबूतर घरोंके ऊपर बड़ी ही शोभा पाते हैं। वे पक्षी [मणियोंकी दीवारोंमें और छतमें] जहाँ-तहाँ अपनी परछाई देखकर [वहाँ दूसरे पक्षी समझकर] बहुत प्रकारसे मधुर बोली बोलते और नृत्य करते हैं।।3।।
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहह राम रघुपति जनपालक।। राज दुआर सकल बिधि चारु। बीथीं चौहट रुचिर बजारू।।4।।
भावार्थ:-बालक तोता-मैना को पढ़ाते हैं कि कहो-राम रघुपति जनपालक। राजद्वार सब प्रकारसे सुन्दर है। गलियाँ, चौराहे और बाजार सभी सुन्दर हैं।।4।।
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए। जहैँ भूप रमानिवास तहैँ की संपदा किमि गाइए।। बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहूँ कुबेर ते। सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे॥।
भावार्थ:-सुन्दर बाजार है, जो वर्णन नहीं करते बनता; वहाँ वस्तुएँ बिना ही मूल्य मिलती हैं। जहाँ स्वयं लक्ष्मीपति राजा हों, वहाँ की सम्पत्ति का वर्णन कैसे किया जाय ? बजाज (कपड़ेका व्यापार करनेवाले), सराफ (रुपये-पैसेका लेन-देन करनेवाले) आदि वणिक् (व्यापारी) बैठे हुए ऐसे जान पड़ते हैं मानो अनेक कुबेर हों। स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े जो भी हैं, सभी सुखी, सदाचारी और सुन्दर हैं।उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर। बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर।।28।। नगर के उत्तर दिशा में सरयूजी बह रही हैं, जिनका जल निर्मल और गहरा है। मनोहर घाँट बँधे हुए हैं, किनारे पर जरा भी कीचड़ नहीं है।।28।।
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा॥। पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अख्राना। 4॥।
भावार्थ:-अलग कुछ दूरी पर वह सुन्दर घाट है, जहाँ घोड़ों और हाथियों के ठट्ट-के-ठट्ठ जल पिया करते हैं। पानी भरने के लिये बहुत-से [जनाने] घाट हैं, जो बड़े ही मनोहर हैं; वहाँ पुरुष खान नहीं करते।। 4।।
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।
भावार्थ:-तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहूँ दिसि तिन्ह के उपवन सुंदर।।2।। राजघाट सब प्रकारसे सुन्दर और श्रेष्ठ हैं, जहाँ चारों वर्णोके पुरुष ख्रान करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे देवताओंके मन्दिर हैं, जिनके चारों ओर सुन्दर उपवन (बगीचे) हैं।।2।।
कहूँ कहूँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि सन्यासी॥। तीर तीर तुलसिका सुहाई। बूंद बूंद बहु मुनिन््ह लगाई।।3।
भावार्थ:-नदी के किनारे कहीं कहीं विरक्त और ज्ञानपरायण मुनि और संन्यासी निवास करते हैं। सरयूजी के किनारे-किनारे सुंदर तुलसी के झुंड-के-झुंड बहुत से पेड़ मुनियों ने लगा रखे हैं।।3।।
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई।। देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा।।4।।
भावार्थ:-नगर की शोभा तो कुछ कही नहीं जाती। नगर के बाहर भी परम सुन्दरता है। श्रीअयोध्यापुरी के दर्शन करते ही सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं। [वहाँ] वन उपवन बावलियाँ और तालाब सुशोभित हैं।।4।।
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहिं। सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहिं।। बह रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।। आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं।।
भावार्थ:-अनुपम बावलियाँ, तालाब और मनोहर तथा विशाल कुएँ शोभा दे रहे हैं, जिनकी सुन्दर [रत्नोंकी] सीढ़ियाँ और निर्मल जल देखकर देवता और मुनितक मोहित हो जाते हैं। [तालाबों में] अनेक रंगोंके कमल खिल रहे हैं, अनेकों पक्षी पूज रहे हैं और भौरे गुंजार कर रहे हैं। [परम] रमणीय बगीचे कोयल आदि पक्षियोंकी [सुन्दर बोली से] मानो राह चलनेवालों को बुला रहे हैं।।
रमानाथ जहैँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ।।29।
भावार्थ:-स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् जहाँ राजा हों, उस नगर का कहीं वर्णन किया जा सकता है ? अणिमा आदि आठों सिद्धियाँ और समस्त सुख-सम्पत्तियाँ अयोध्यामें छा रही हैं।।29।।
जहैँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परस्पर इहइ सिखावहिं।।
भावार्थ:-भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि॥ लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजी के गुण गाते हैं और बैठकर एक दूसरे को यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करने वाले श्रीरामजी को भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजी को भजो॥ जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि।।
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि।।2।।
भावार्थ:-कमलनयन और साँवले शरीरवाले को भजो। पलक जिस प्रकार नेत्र की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार अपने सेवकों की रक्षा करनेवालेको भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवाले को भजो। संतरूपी कमलवनके [खिलानेके] लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजी को भजो।।2।।
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि। लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि।। 3।।
भावार्थ:-कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो। निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो। कामदेवरूपी हाथी के लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो।।3।
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दतुज गहन घन दहन कूसानुहि।। जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजह भंजन भव भीरहि।।4।।
भावार्थ:-संशय और शोकरूपी घने अन्ककार के नाश करनेवाले श्रीरामरूप सूर्यको भजो। राक्षसरूपी घने वनको जलाने वाले श्रीरामरूप अग्ि को भजो। जन्म-मृत्युके भय को नाश करनेवाले श्रीजानकीजीसमेत श्रीरघुवीर को क्यों नहीं भजते ?।।4।।
बह बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अजद अबिनासिहि।।
भावार्थ:-मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि।।5।। बहुत-सी वासनाओं रूपी मच्छरों को नाश करनेवाले श्रीरामरूप हिमराशि (बर्फके ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजीको भजो। मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वी का भार उतारने वाले और तुलसीदास के उदार (दयालु) स्वामी श्रीरामजीको भजो।।5।।
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सबह पर रहहिं संतत कृपानिधान।।30।
भावार्थ:-इस प्रकार नगर के स्त्री-पुरुष श्रीरामजी का गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्रीरामजी सदा सबपर अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं।।30।
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा।।
भावार्थ:-पूरि प्रकास रहेउ तिहूँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका॥ [काकभुशुण्डिजी कहते हैं-] हे पक्षिराज गरुड़जी ! जबसे रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तब से तीनों लोकों में पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतों को सुख और बहुतों के मनमें शोक हुआ।। ।।
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी।। अघ उलूक जहैँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने।।2।।
भावार्थ:-जिन-जिनके शोक हुआ, उन्हें मैं बबानकर कहता हूँ [सर्वत्र प्रकाश छा जाने से] पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पापरूपी उल्लू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुँद गये।।2।।
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ।। मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहूँ ओरा।।3।।
भावार्थ:-भाँति-भाँति के [बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव-ये चकोर हैं, जो [रामप्रतापरूपी सूर्यके प्रकाशमें] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह) मान, मोह और मदरूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चल पाता।।3।।
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना।। सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका।।4।।
भावार्थ:-धर्मरूपी तालाबों में ज्ञान, विज्ञान- ये अनेकों प्रकार के कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक-ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गये।।4।।
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़िहिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास।।34।
भावार्थ:-यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदय में जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछे से किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाश को प्राप्त होते (नष्ट हो जाते) हैं।।3।।
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा।। सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए।। ।।
भावार्थ:-एक बार भाइयों सहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमान् जी को साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये। वहाँ के सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तोंसे युक्त थे।। ।
जानि समय सनकादिक आए! तेज पुंज गुन सील सुहाए।। ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना।।2।
भावार्थ:-सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आये, जो तेजके पुंज सुन्दर गुण और शीलसे युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्द में लवलीन रहते हैं। देखने में तो वे बालक लगते हैं; परंतु हैं बहुत समय के।।2।।
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा।। आसा बसन ब्यसन यह तिन््हहीं। रघुपति चरित होइ तहूँ सुनहीं।।3।
भावार्थ:-मानो चारों वेद ही बालकरूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजी की चरित्र-कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं।।3।।
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहैँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी।। राम कथा मुनिबर बह बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी।।4।।
भावार्थ:-[शिवजी कहते हैं-] हे भवानी ! सनकादि मुनि वहाँ गये थे (वहीं से चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्य जी रहते थे। श्रेष्ठ मुनि ने श्रीरामजी की बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करने में उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ी से अग्ि उत्पन्न होती है।।4।।
देखि राम मुनि आवत हरि दंड़वत कीनन््ह। स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहैँ दीन्ह।।32।
भावार्थ:-सनकादि मुनियोंको आते देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने हर्षित होकर दण्डवत् की और स्वागत (कुशल) पूछकर प्रभुने [उनके] बैठने के लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया है।।32।।
कीन्ह दंडवत तीनिरउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई।। मुनि रघुपति छवबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी।।4।।
भावार्थ:-फिर हनुमान् जी सहित तीनों भाइयों ने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजी की अतुलनीय छवि देखकर उसीमें मगर हो गये। वे मन को रोक न सके।। 4।।
स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन।। एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं।।2।।
भावार्थ:-वे जन्म-मृत्यु [के चक्र] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरता के धाम श्रीरामजी को टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते। और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं।।2।।
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्रवत नयन जल पुलक सरीरा॥ कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे।।3।।
भावार्थ:-उनकी [प्रेमविहलल] दशा देखकर [उन्हीं की भाँति] श्रीरघुनाथजी के नेत्रों से भी [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभु ने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियों को बैठाया और परम मनोहर वचन कहे-॥।3।
आजु धन्य मैं सुनह मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा।। बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा।।4।।
भावार्थ:-हे मुनीश्वरों ! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनों ही से [सारे] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्य से सत्संग की प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्यु का चक्र नष्ट हो जाता है।।4।।
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कबि कोबिद श्रुत्रि पुरान पदग्रंथ।।33।।
भावार्थ:-संतका संग मोक्ष (भव-बन्धनसे छूटने) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़ने का मार्ग है। संत, कवि और पण्डित तथा वेद-पुराण [आदि] सभी सदून्थ ऐसा कहते हैं।।33।
सुनि प्रभु बचन हरि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी।। जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय।। 4।।
भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीर से स्तुति करने लगे-हे भगवान् आपकी जय हो। आप अन्तरहित, पापरहित अनेक (सब रूपों में प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं॥ जय निर्मुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर।।
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर।।2।।
भावार्थ:-हे निर्गण ! आपकी जय हो। हे गुणों के समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुख के धाम [अत्यन्त] सुन्दर और अति चतुर हैं। है लक्ष्मीपति ! आपकी जय हो। हे पृथ्वी के धारण करनेवाले ! आपकी जय हो। आप उपमारहित अजनमा अनादि और शोभाकी खान हैं।।2।।
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद।। तग्य कृतम्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन।।3।।
भावार्थ:-आप ज्ञान के भण्डार, [स्वयं] मानरहित और [दूसरों को] मान देनेवाले हैं। वेद और पुराण आपका पावन सुन्दर यश गाते हैं। आप तत्त्व के जाननेवाले, की हुई सेवा को मानने वाले और अज्ञान का नाश करने वाले हैं। हे निरंजन (मायारहित) ! आपके अनेकों (अनन्त) नाम हैं और कोई नाम नहीं है (अर्थात् आप सब नामों के परे हैं)।।3।।
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहूँ परिपालय।। ट्ूंद बिपति भव फंद बिभंजय। ट्लदि बसि राम काम मद गंजय।।4।।
भावार्थ:-आप सर्वरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं और सब के ह्ृदयरूपी घरमें सदा निवास करते हैं; [अतः] आप हमारा परिपालन कीजिये। [राग- द्रेष,अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्र, विपत्ति और जन्म-मृत्यु के जाल को काट दीजिये। हे रामजी ! आप हमारे हृदय में बसकर काम और मद का नाश कर दीजिये।।4।।
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम। प्रेम भगति अनपायनी देह हमहि श्रीराम।।34।।
भावार्थ:-आप परमानन्दस्वरूप कृपाके धाम और मनकी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले हैं। हे श्रीरामजी ! हमको अपनी अविचल प्रेमा भक्ति दीजिये।। 34।। देह भगति रघुपति अति पावनि। त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि। प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु। होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु॥ हे रघुनाथजी ! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकार के तापों और जन्म-मरणके क्लेशों का नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतोंकी कामना पूर्ण करने के लिये कामधेनु और कल्पवृक्ष रूप प्रभो ! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये।।।।
भव बारिधि कुंभज रघुनायक। सेवत सुलभ सकल सुख दायक।। मन संभव दारुन दुख दारय। दीनबंधु समता बिस्तारय।।2।।
भावार्थ:-हे रघुनाथजी ! आप जन्म-मृत्युरूप समुद्र को सोखने के लिये अगस्त्य मुनिके समान हैं। आप सेवा करने में सुलभ हैं तथा सब सुखों के देनेवाले हैं हे दीनबन्धों ! मन से उत्पन्य दारुण दुःखोंका नाश कीजिये और [हममें] समदृष्टि का विस्तार कीजिये।।2।।
आस त्रास इरिषादि निवारक। बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक।। भूप मौलि मनि मंडन धरनी। देहि भगति संसृति सरि तरनी।।3।।
भावार्थ:-आप [विषयोंकी] आशा, भय और ईर्ष्या आदि के निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्य विस्तार करनेवाले हैं। हे राजाओं के शिरोमणि एवं पृथ्वी के भूषण श्रीरामजी ! संसृति (जन्म-मृत्युके प्रवाह) रूपी नदीके लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये।। 3।।
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित संकर।। रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।।4।।
भावार्थ:-हे मुनियों के मन रूपी मानसरोवर में निरन्तर निवास करनेवाले हंस ! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजी द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुलके केतु, वेदमर्यादा के राक्षक और काल कर्म स्वभाव तथा गुण [रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं।।4।।
तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन।।5।।
भावार्थ:-आप तरन-तारन (स्वयं तरे हुए और दूसरोंको तारनेवाले) तथा अपना सब दोषोंको हरनेवाले हैं। तीनों लोकोंके विभ्ूषण आप ही तुलसीदास के स्वामी हैं।।5।।
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ। ब्रह्म भवन सनकादिक गे अति अभीष्ट बर पाइ।।35।।
भावार्थ:-प्रेमसहित बार-बार स्तुति करके और सिर नवाकर तथा अपना अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको गये।।35।।
सनकादिक बिधि लोक सिधाए। शभ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए।। पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं।। ।
भावार्थ:-सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको चले गये। तब भाइयोंने श्रीरामजी के चरणों में सिर नवाया। सब भाई प्रभु से पूछते सकुचाते हैं। [इसलिये] सब हनुमान् जी की ओर देख रहे हैं।।।।
सुनी चहृहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होई सकल भ्रम हानी।। अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहह काह हनुमाना।।2।।
भावार्थ:-वे प्रभु के श्रीमुख की वाणी सुनना चाहते हैं, जिसे सुनकर सारे भ्रमों का नाश हो जाता है। अन्तर्यामी प्रभु सब जान गये और पूछने लगे-कहो, हनुमान् ! क्या बात है ?।।2।।
जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता।। नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस् करत मन सकुचत अहहीं।।3।। तब हनुमान जी हाथ जोड़कर बोले-हे दीनदयालु भगवान् ! सुनिये। हे नाथ ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मनमें सकुचा रहे हैं।।3।। तुम्ह जानह कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ।। सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनह नाथ प्रनतारति हरना।।4।।
भावार्थ:-[भगवान् ने कहा-] हनुमान् ! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरत के और मेरे बीचमें कभी भी कोई अन्तर (भेद) है ? प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने उनके चरण पकड़ लिये [और कहा-] हे नाथ ! हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले ! सुनिये।।4।।
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहूँ सोक न मोह। केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह।। 36।।
भावार्थ:-हे नाथ ! न तो कुछ सन्देह है और न स्वप्रमें भी शोक और मोह है। हे कृपा और आनन्दके समूह ! यह केवल आपकी ही कृपाका फल है।।36।।
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।।
भावार्थ:-संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥ तथापि हे कृपानिधान ! मैं आपसे एक धूष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवक को सुख देनेवाले हैं [इससे मेरी धृष्टताको क्षमा कीजिये और मेरे प्रश्न का उत्तर देकर सुख दीजिये]। हे रघुनाथजी ! वेद पुराणों ने संतों की महिमा बहुत प्रकार से गायी है॥ श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।।
सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।।2।।
भावार्थ:-आपने भी अपने श्रीमुखसे उनकी बड़ाई की है और उनपर प्रभु (आप) का प्रेम भी बहुत है। हे प्रभो ! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। आप कृपाके समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञानमें अत्यन्त निपुण हैं।।2।।
संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहह बुझाई।। संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।।3।।
भावार्थ:-हे शरणागत का पालन करनेवाले ! संत और असंत के भेद अलग- अलग करके मुझको समाझकर कह्ठिये। [श्रीरामजीने कहा-] है भाई ! संतों के लक्षण (गुण) असंख्य है, जो वेद और पुराणों में प्रसिद्ध हैं।।3।।
संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।। काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देई सुगंध बसाई।।4।।
भावार्थ:-संत और असंतों की करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दन का आचरण होता है। हे भाई ! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दन को काटती है [क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षोंको काटना है]; किन्तु चन्दन [अपने स्वभाववश] अपना गुण देकर उसे (काटने वाली कुल्हाड़ी को) सुगन्ध से सुवासित कर देता है।।4।।
ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड। अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड।।37।।
भावार्थ:-इसी गुणके कारण चन्दन देवताओं के सिरों पर चढ़ता है और जगत् का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ी के मुखको यह दण्ड मिलता है कि उसको आग में जलाकर फिर घन से पीटते हैं।।37।।
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।। सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।। १।
भावार्थ:-संत विषयों में लंपट (लिप्त) नहीं होते, शील और सद्गुणोंकी खान होते है। उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता है। वे [सबमें, सर्वत्र, सब समय] समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है, वे मदसे रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध हर्ष और भयका त्याग किये हुए रहते हैं।। 4।।
कोमलचित दीनन्ह पर दया। मन बच क्रम मम भगति अयामा।। सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।।2।।
भावार्थ:-उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनोंपर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्मसे मेरी निष्कपट (विशुद्ध) भक्ति करते हैं। सबको सम्मान देते हैं, पर स्वयं मानरहित होते हैं। हे भरत ! वे प्राणी (संतजन) मेरे प्राणोंके समान हैं।।2।।
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।। सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।।3।
भावार्थ:-उनको कोई कामना नहीं होती। वे मेरे नाम के परायण होते हैं। शान्ति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नताके घर होते हैं। उनमें शीतलता, सरलता, सबके प्रति मित्रभाव और ब्राह्मणके चरणोंमें प्रीति होती है, जो धर्मों को उत्पन्न करनेवाली है।।3।।
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेह तात संत संतत फुर।। सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।4।।
भावार्थ:-हे तात ! ये सब लक्षण जिसके हृदय में बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना। जो शम (मनके निग्रह), दम, (इन्द्रियों के निग्रह), नियम और नीति से कभी विचलित नहीं होते और मुख से कभी कठोर वचन नहीं बोलते;।।4।।
निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज। ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज।।38।।
भावार्थ:-जिन्हें निन््दा और स्तुति (बड़ाई) दोनों समान हैं और मेरे चरणकमलों में जिनकी ममता है, वे गुणों के धाम और सुख की राशि संतजन मुझे प्राणों के समान प्रिय हैं।।38।।
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहूँ संगति करिअ न काऊ।।
भावार्थ:-तिंन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि धालइ हरहाई॥ अब असंतों (दुष्टों) का स्वभाव सुनो; कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिये। उनका संग सदा दुःख देनेवाला होता है। जैसे हरहाई (बुरी जातिकी) गाय कपिला (सीधी और दुधार) गायको अपने संग से नष्ट कर डालती है॥ खलन्ह ह्ृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।।
जहूँ कहूँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहूँ परी निधि पाई।।2।।
भावार्थ:-दुष्टों के हृदय में बहुत अधिक संताप रहता है। वे पराई सम्पत्ति (सुख) देखकर सदा जलते रहते हैं। वे जहाँ कहीं दूसरे की निन्दा सुन पाते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्तेमें पड़ी निधि (खजाना) पा ली हो।।2।
काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।। बयरु अकारन सब काह् सों। जो कर हित अनहित ताह् सों।।3॥।
भावार्थ:-वे काम क्रोध, मद और लोभ के परायण तथा निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापों के घर होते हैं। वे बिना ही कारण सब किसी से वैर किया करते हैं। जो भलाई करता है उसके साथ भी बुराई करते हैं।।3।।
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।। बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अह्ि हृदय कठोरा।।4।।
भावार्थ:-उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है। झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है। (अर्थात् वे लेने-देनेके व्यवहारमें झूठका आश्रय लेकर दूसरो का हक मार लेते हैं अथा झूठी डींग हाँका करते हैं कि हमने लाखों रुपये ले लिये, करोड़ों का दान कर दिया। इसी प्रकार खाते है चनेकी रोटी और कहते हैं कि आज खूब माल खाकर आये। अथवा चबेना चबाकर रह जाते हैं और कहते हैं हमें बढ़िया भोजन से वैराग्य है, इत्यादि। मतलब यह कि वे सभी बातों में झूठ ही बोला करते हैं)। जैसे मोर [बहुत मीठा बोलता है, परन्तु उस] का हृदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान् विषैले साँपोंको भी खा जाता है। वैसे ही वे भी ऊपर से मीठे वचन बोलते हैं [परन्तु हृदय के बड़े ही निर्दयी होते हैं]।।4।।
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद। ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद।।39।।
भावार्थ:-वे दूसरों से द्रोह करते हैं और परायी स्त्री पराये धन तथा परायी निन््दा में आसक्त रहते हैं। वे पामर और पापमय मनुष्य नर- शरीर धारण किये हुए राक्षस ही हैं।।39।।
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिख्रोदर पर जमपुर त्रास न।।
भावार्थ:-काह् की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूडी आई॥ लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है (अर्थात् लोभही से सदा घिरे हुए रहते हैं)। वे पशुओं के समान आहार और मैथुनके ही परायण होते हैं, उन्हें यम पुर का भय नहीं लगता। यदि किसीकी बड़ाई सुन पाते हैं, तो वे ऐसी [दुःखभरी] साँस लेते हैं, मानो जूड़ी आ गयी हो।।4।
जब कह कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहूँ जग नृपती।। स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।।2।।
भावार्थ:-और जब किसीकी विपत्ति देखते हैं, तब ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत् भर के राजा हो गये हों। वे स्वार्थपरायण, परिवाखालों के विरोधी काम और लोभके कारण लंपट और अत्यन्त क्रोधी होते हैं।।2।।
मातु पिता गुर बिप्र मानहिं। आपु गए अरु धालहिं आनहिं।। करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।।
भावार्थ:-3 वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसी को नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, [साथ ही अपने संगसे] दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं। उन्हें संतोंका संग अच्छा लगता है, न भगवान् की कथा ही सुहाती है।।3।।
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी॥ बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियेँ धरें सुबेषा।।4।।
भावार्थ:-वे अवगुणों के समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी (रागयुक्त), वेदोंके निन्दक और जबर्दस्ती पराये धनके स्वामी (लूटनेवाले) होते हैं। वे दूसरों से द्रोह तो करते ही हैं; परन्तु ब्राह्मण-द्रोह विशेषतासे करते हैं। उनके हृदय में दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे [ऊपरसे] सुन्दर वेष धारण किये रहते हैं।।4।।
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेताँ नाहिं। द्वापर कछुक बूंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं।।40।।
भावार्थ:-ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेता में नहीं होते द्वापर में थोड़े-से होगें और कलियुगमें तो इनके झुंड-के-झुंड होंगे।।40।।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।।
भावार्थ:-निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर॥ हे भाई ! दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को दुःख पहुँचाने के समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। हे तात ! समस्त पुराणों और वेदोंका यह निर्णय (निश्चित सिद्धांत) मैंने तुमसे कहा है, इस बातको पण्डित लोग जानते हैं॥ नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सट्लहिं महा भव भीरा।।
करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।।2।।
भावार्थ:-मनुष्य का शरीर धारण करके जो लोग दूसरोंको दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्यु के महान् संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसी से उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है।।2।।
कालरूप तिन््ह कहैँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।। अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।।3।।
भावार्थ:-हे भाई ! मैं उनके लिये कालरूप (भयंकर) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मों का [यथायोग्य] फल देनेवाला हूँ ! ऐसा विचार कर जो लोग परम चतुर हैं, वे संसार [के प्रवाह] को दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं।।3॥।
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायकू।। संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।4।।
भावार्थ:-इसी से वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मों को त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियों के नायक मुझको भजते हैं। [इस प्रकार] मैंने संतों और असंतोंके गुण कहे। जिन लोगों ने इन गुणोंको समझ रक््खा है, वे जन्म-मरण के चक्कर में नहीं पड़ते।।4।
सुनह तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक।।47।।
भावार्थ:-हे तात ! सुनो, माया से ही रचे हुए अनेक (सब) गुण और दोष हैं (इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है)। गुण (विवेक) इसी में हैं कि दोनों ही न देखे जायें, इन्हें देखना यही अविवेक है।।4।
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।।
भावार्थ:-करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियेँ हरष अपारा॥ भगवान् के श्रीमुख से ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गये। प्रेम उनके ह्वृदय में समाता नहीं। वे बार-बार विनती करते हैं। विशेषकर हनुमान् जी के हृदय में अपार हर्ष है।। ॥।
पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए॥
भावार्थ:-बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।।2। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी अपने महलको गये। इस प्रकार वे नित्य नयी लीला करते हैं। नारद मुनि अयोध्या में बार-बार आते हैं और आकर श्रीरामजी के पवित्र चरित्र गाते हैं।।2।।
नित नव चरित देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मनोक सब कथा कहाहीं।। सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करह्ट गुन गानहिं।।3।।
भावार्थ:-मुनि यहाँ से नित्य नये-नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रह्मलोक में जाकर सब कथा कहते हैं। ब्रह्माजी सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं [और कहते हैं-] हे तात ! बार-बार श्रीरामजीके गुणोंका गान करो।। 3।।
सनकादिक नारदह्ि सराहह्ं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहृहिं।। सुनि गुन गान समाधि बिसारी। सादर सुनहिं परम अधिकारी।।4।।
भावार्थ:-सनकादि मुनि नारद जी सराहना करते हैं। यद्यपि वे (सनकादि) मुनि ब्रह्मनिष्ठ हैं, परन्तु श्रीरामजीका गुणगान सुनकर वे भी अपनी ब्रह्मसमाधिको भूल जाते हैं और आदरपूर्वक उसे सुनते हैं। वे [रामकथा सुननेके] श्रेष्ठ अधिकारी हैं।।4।।
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाघान।।42।।
भावार्थ:-सनकादि मुनि-जैसे जीवन्मुक्त और ब्रह्मनिष्ठ पुरुष भी ध्यान (ब्रहमसमाधि) छोड़कर श्रीरामजी के चरित्र सुनते हैं। यह जानकर कर भी जो श्रीहरि की कथा से प्रेम नहीं करते, उनके हृदय [सचमुच ही] पत्थर [के समान] हैं।।42।। एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥ बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥ एक बार श्रीरघुनाथजी के बुलाये हुए गुरु वसिष्तजी, ब्राह्मण और अन्य सब नगरनिवासी सभामें आये। जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण तथा अन्य सब सज्जन यथा योग्य बैठ गये, तब भक्तों के जन्म-मरणको मिटानेवाले श्रीरामजी वचन बोले-।।
सुनह सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कुछ ममता उर आनी॥ नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनह करह जो तुम्हहि सोहाई।।2।।
भावार्थ:-हे समस्त नगर निवासियों ! मेरी बात सुनिये। यह बात मैं हृदय में कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ। न अनीति की बात ही करता हूँ और न इससे कुछ प्रभुता ही है इसलिये [संकोच और भय छोड़कर ध्यान देकर] मेरी बातों को सुन लो और [फिर] यदि तुम्हें अच्छी लगे, तो उनके अनुसार करो !।।2।।
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।। जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौ मोहि बरजह भय बिसराई।।3।
भावार्थ:-वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई ! यदि मैं कुछ अनीति की बात कहूँ तो भय भुलाकर (बेखटके) मुझे रोक देना।।3।
बड़े भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथहि गावा।। साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।4।।
भावार्थ:-बड़े भाग्य से यह मनुष्य-शरीर मिला है। सब ग्रन्थों ने यही कहा है कि यह शरीर देवताओं को भी दुर्लभ है (कठिनतासे मिलता है)। यह साधन का धाम और मोक्ष का दरवाजा है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया,।।4।।
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ।।43।।
भावार्थ:-वह परलोक में दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है तथा [अपना दोष न समझकर] काल पर, कर्म पर और ईश्वरपर मिथ्या दोष लगाता है।।43।।