श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
श्रीरामचरितमानस

उत्तरकाण्ड · भाग २

उत्तरकाण्ड · भाग २ / ५
भाग २ / ५

एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।। नर तनु पाइ बिषयेँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।।4।

भावार्थ:-हे भाई ! इस शरीर को प्राप्त होने का फल विषयभोग नहीं है। [इस जगत्‌ के भोगों की तो बात ही क्या] स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्त में दुःख देने वाला है। अतः जो लोग मनुष्य शरीर पाकर विषयों में मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृत को बदलकर विष ले लेते हैं।। ।

ताहि कबहूँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रह परस मनि खोई।। आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।।2।

भावार्थ:-जो पारसमणि को खोकर बदलेमें घुँघची ले लेता है, उसको कभी कोई भला (बुद्धिमान) नहीं कहता। यह अविनाशी जीव [अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्धिज्ज] चार खानों और चौरासी लाख योनियों में चक्कर लगाता रहता है।।2।।

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।। कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।।3।।

भावार्थ:-माया की प्रेरणा से काल, कर्म, स्वभाव और गुण से घिरा हुआ (इनके वशमें हुआ) यह सदा भटकता रहता है। बिना ही कारण ख्रेह करनेवाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्यका शरीर देते हैं।।3।।

नर तनु भव बारिधि कहूँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।। करनधार सद्‌गुर दूढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।4।।

भावार्थ:-यह मनुष्य का शरीर भवसागर [से तारने] के लिये (जहाज) है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। सद्गुरु इस मजबूत जहाज के कर्णधार (खेनेवाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनतासे मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपासे सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं,।।4।।

जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ।।44।।

भावार्थ:-जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागर से न तरे, वह कृतध्र और मन्द-बुद्धि है और आत्महत्या करनेवाले की गति को प्राप्त होता है।।44।

जौं परलोक इहाँ सुख चहह। सुनि मम बचन ह्वदयेँ दूढ़ गहहू।। सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।। ।।

भावार्थ:-यदि परलोक में और [यहाँ दोनों] सुख जगह चाहते हो, तो मेरे वचन सुनकर उन्हें हृदय में दूढतासे पकड़ रकक्‍्खो। हे भाई ! यह मेरी भक्ति का मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वदोंने इसे गाया है॥ ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहूँ टेका।।

करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।।2।।

भावार्थ:-ज्ञान अगम (दुर्गम) है, [और] उसकी प्राप्ति में अनेकों वि्व हैं। उसका साधन कठिन है और उसमें मनके लिये कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करनेपर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होनेसे मुझको प्रिय नहीं होता।।2।।

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।। पुन्य पुंज बिनु मिलहिं संता। सतसंगति संसृति कर अंता।।3।।

भावार्थ:-भक्ति स्वतंत्र है और सब सुखों की खान है। परन्तु सत्संग (संतोके संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते। और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरणके चक्र) का अन्त करती है।।3।।

पुन्य एक जग महूँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।। सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।।4।।

भावार्थ:-जगत्‌ में पुण्य एक ही है, [उसके समान] दूसरा नहीं। वह है-मन, कर्म और वचन से ब्राह्मणों के चरणोंकी पूजा करना। जो कपटका त्याग करके ब्राह्मणों की सेवा करता है उस पर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं।।4।।

औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥45।।

भावार्थ:-और भी एक गुप्त मत है, मैं सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि शंकरजी के भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता।।45।।

कहह भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥ सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।।।।

भावार्थ:-कहो तो, भक्तिमार्गमें कौन-सा परिश्रम है ? इसमें न योगकी आवश्यकता है, न यज्ञ जप तप और उपवास की ! [यहाँ इतना ही आवश्यक है कि] सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो जो कुछ मिले उसीमें सदा सन्तोष रकक्‍्खे।।4।।

मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहह कहा बिस्वासा॥ बहुत कहरउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।।2।।

भावार्थ:-मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्यों की आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है ? (अर्थात्‌ उसकी मुझपर आस्था बहुत ही निर्बल है)। बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ ? भाइयों ! मैं तो इसी आचरण के वश में हूँ।।2।।

बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥ अनारंभ अनिकेत अमानी।। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।।3।

भावार्थ:-न किसी से वैर करे, न लड़ाई-झगड़ा करे, न आशा रक्‍्खे, न भय ही करे। उसके लिये सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं। जो कोई भी आरम्भ (फलकी इच्छासे कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घरमें ममता नहीं है); जो मानहीन पापहीन और क्रोधहीन है, जो [भक्ति करनेमें] निपुण और विज्ञानवान्‌ है।। 3।।

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तून सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा॥। भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।4।।

भावार्थ:-संतजनो के संसर्ग (सत्संग) से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मन में सब विषय यहाँतक कि स्वर्ग और मुक्तितक [भक्तिके समाने] तृणके समान हैं, जो भक्तिके पक्षमें हठ करता है, पर [दूसरेके मतका खण्डन करनेकी] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतर्कों को दूर बहा दिया है।।4।।

मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह। ता कर सुख सोइ जानइ परमानंद संदोह।।46।।

भावार्थ:-जो मेरे गुणसमूहों के और मेरे नाम के परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [परमात्मारूप परमानन्दराशिको प्राप्त है]।।46।।

सुनत सुधासम बचन राम के। गहे सबनि पद कृपाधाम के।। जननि जनक गुर बंधु हमारे। कृपा निधान प्रान ते प्यारे।।।।

भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी के अमृत के समान वचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये। [और कहा-] हे कृपानिधान ! आप हमारे माता, पिता, गुरु, भाई सब कुछ हैं और प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं।।।।

तनु धनु धाम राम हितकारी। सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी। असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ। मातु पिता स्वारथ रत ओऊ।।2।।

भावार्थ:-और हे शरणागत के दुःख हरने वाले रामजी ! आप ही हमारे शरीर, धन, घर-द्वार और सभी प्रकार के हित करनेवाले हैं। ऐसी शिक्षा आपके अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता। माता-पिता [हितैषी हैं और शिक्षा नहीं देते]।।2।।

हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।। स्वारथ मीत सकल जग माहीं। सपनेहूँ प्रभु परमारथ नाहीं।।3।।

भावार्थ:-हे असुरों के शत्रु ! जगत्‌ में बिना हेतु के (निःस्वार्थ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं-एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत में [शेष] सभी स्वार्थ मित्र हैं। हे प्रभो ! उनमें स्वप्र में भी परमार्थ का भाव नहीं है।।3।।

सब के बचन प्रेम रस साने। सुनि रघुनाथ ह्ृदयँ हरषाने।। निजद निज गृह गए आयसु पाई। बरनत प्रभु बतकही सुहाई।।4।।

भावार्थ:-सबके प्रेमरस में सने हुए वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी हृदय में हर्षित हुए। फिर आज्ञा पाकर सब प्रभु की सुन्दर बातचीत का वर्णन करते हुए अपने-अपने घर गये।।4।।

उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप।। ब्रह्म सब्चिदानंद घन रघुनायक जहैँ भूप।।47।।

भावार्थ:-[शिव जी कहते हैं-] हे उमा ! अयोध्यामें रहनेवाले पुरुष और स्त्री सभी कृतार्थस्व रूप हैं; जहाँ स्वयं सच्चिदानन्दघन ब्रह्म श्रीरघुनाथजी राजा हैं।।47।।

एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए।।

भावार्थ:-अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा॥ एक बार मुनि वसिष्तजी वहाँ आये जहाँ सुन्दर सुखके धाम श्रीरामजी थे। श्रीरघुनाथजी ने उनका बहुत ही आदर-सत्कार किया और उनके चरण धोकर चरणाममृत लिया।। ।।

राम सुनह मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी।। देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हिदय अपारा।।2।।

भावार्थ:-मुनिने हाथ जोड़कर कहा-हे कृपासागर श्रीरामजी! मेरी विनती सुनिये ! आपके आचरणों (मुनुष्योचित चरित्रों) को देख-देखकर मेरे हृदय में अपार मोह (भ्रम) होता है।।2।।

महिमा अमिति बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहऊँ भगवाना।। उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा।।3।।

भावार्थ:-हे भगवान्‌ ! आपकी महिमा की सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते। फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ ? पुरोहिति का कर्म (पेशा) बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निन्‍्दा करते हैं।।3।।

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही॥। परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा। । 4।।

भावार्थ:-जब मैं उसे (सूर्यवंश की पुरोहितीका काम) नहीं लेता था, तब ब्रह्माजीने मुझे कहा था-हे पुत्र ! इससे तुमको आगे चलकर बहुत लाभ होगा। स्वयं ब्रह्म परमात्मा मनुष्य रूप धारण कर रघुकुलके भूषण राजा होंगे।।4।।

तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान। जा कहूँ करिअ सो पैहँ धर्म न एहि सम आन।।48।।

भावार्थ:-तब मैंने हृदय में विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, व्रत और दान किये जाते हैं उसे मैं इसी कर्म से पा जाऊँगा; तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है।।48।।

जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा।।

भावार्थ:-ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहैँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन॥ जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [वर्णाश्रिमके] धर्म श्रुतियों से उत्पन्न (वेदविहित) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह), तीर्थस्रान आदि जहाँतक वेद और संतजनों ने धर्म कहे हैं [उनके करनेका]-।।

आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका।। तव पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर।।2।।

भावार्थ:-[तथा] हे प्रभो ! अनेक, तन्त्र वेद और पुराणोंके पढ़ने और सुनने का सर्वोतम फल एक ही है और सब साधनों का भी यही एक सुन्दर फल हैं कि आपके चरणकमलों में सदा-सर्वदा प्रेम हो।।2।। छूट मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ।।

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहूँ न जाई।।3।।

भावार्थ:-मैलसे धोनेसे कया मैल छूटता है ? जल के मथने ये क्या कोई घी पा सकता है ? [उसी प्रकार] हे रघुनाथजी ! प्रेम-भक्तिरूपी [निर्मल] जलके बिना अन्तःकरण का मल कभी नहीं जाता।।3।।

सोइ सर्बग्य तग्य सोई पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित।। दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई।।4।।

भावार्थ:-वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणोंका घर और अखण्ड विज्ञानवान्‌ हैं; वही चतुर और सब सुलक्षणोंसे युक्त है, जिसका आपके चरणकमलों में प्रेम हैं।।4।।

नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देह। जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहूँ घटै जनि नेहु।।49।

भावार्थ:-हे नाथ ! हे श्रीरामजी ! मैं आपसे एक वर माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये। प्रभु (आप) के चरणकमलों में मेरा प्रेम जन्म-जन्मान्तर में भी कभी न घटे।।49।

अस कह्हि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए।। हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता।। 4।।

भावार्थ:-ऐसा कहकर मुनि वसिष्ट जी घर आये। वे कृपासागर श्रीरामजी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। तदनन्तर सेवकों सुख देनेवाले श्रीरामजी ने हनुमान्‌ जी तथा भरतजी भाइयों को साथ लिया।। 4।।

पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए।। देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह् तिन्ह तेइ चाहे।।2।।

भावार्थ:-और फिर कृपालु श्रीरामजी नगर के बाहर गये और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगवाये। उन्हें देखकर, कृपा करके प्रभुने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिसने चाहा, उस-उसको उचित जानकर दिया।।2।

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवैँराई।। भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई।।3।।

भावार्थ:-संसार के सभी श्रमों को हरनेवाले प्रभु ने [हाथी, घोड़े आदि बाँटनेमें] श्रमका अनुभव किया और [श्रम मिटाने को] वहाँ गये जहाँ शीतल अमराई (आमोंका बगीचा) थी। वहाँ भरत जी ने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उसपर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे।।3।।

मारुतसुत तब मारुत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई॥ हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोऊ राम चरन अनुरागी।।4।। गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।5।।

भावार्थ:-उस समय पवन पुत्र हनुमान्‌ जी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमे [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे-] हे गिरिजे ! हनुमान्‌ जी के समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजी के चरणों का प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवा की [स्वयं] प्रभुने अपने श्रीमुख से बार-बार बड़ाई की है।।

4-5।। तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन।।50।।

भावार्थ:-उसी अवसर पर नारद मुनि हाथ में वीणा लिये हुए आये। वे श्रीरामजी की सुन्दर और नित्य नवीन रहनेवाली कीर्ति गाने लगे।।50।।

मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन।।

भावार्थ:-नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि॥ कृपापूर्वक देख लेनेमात्र से शोक के छुड्ानेवाले हे कमलनयन ! मेरी ओर देखिये (मुझपर भी कृपादृष्टि कीजिये) हे हरि ! आप नीलकमल के समान श्यामवर्ण और कामदेवके शत्रु महादेवजी के हृदयकमल के मकरन्द (प्रेम-रस) के पान करनेवाले भ्रमर हैं।। 4।।

जातुधान बरुथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन।। भूसुर ससि नव बूंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक।।2।।

भावार्थ:-आप राक्षसों की सेना के बल को तोड़नेवाले हैं। मुनियों और संतजनों को आनन्द देनेवाले और पापों के नाश करनेवाले हैं। ब्राह्मणरूपी खेती के लिये आप नये मेघसमूह हैं और शरणहीनों को शरण देनेवाले तथा दीन जनों को अपने आश्रय में ग्रहण करनेवाले हैं।।2।।

भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित।। रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर।।3।।

भावार्थ:-अपने बाहुबल से पृथ्वी के बड़े भारी बोझ को नष्ट करनेवाले, खर-दूषन और विराधके वध करने में कुशल, रावण के शत्रु, आनन्दस्वरूप, राजाओं में श्रेष्ठ और दशरथजी के कुलरूपी कुमुदिनी के चन्द्रमा श्रीरामजी ! आपकी जय हो।।3।।

सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम।। कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन।।4।।

भावार्थ:-आपका सुन्दर यश पुराणों, वेदों में और तन्त्रादि शास्त्रों में प्रकट है ! देवता, मुनि और संतों के समुदाय उसे गाते हैं। आप करुणा करनेवाले और झूठे मद का नाश करनेवाले, सब प्रकार से कुशल (निपुण) और श्रीअयोध्याजी के भूषण ही है।।4।।

कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन।।5।।

भावार्थ:-आपका नाम कलियुग के पापों को मथ डालनेवाला और ममता को मारनेवाला है। हे तुलसीदासके प्रभु ! शरणागतकी रक्षा कीजिये।।5।।

प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम। सोभासिंधु ह्ृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम।।5।

भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी गुणसमूहों का प्रेमपूर्वक वर्णन करके मुनि नारदजी शोभारके समुद्र प्रभुको हृदय में धरकर जहाँ ब्रह्मलोक है, वहाँ चले गये।57।।

गिरिजा सुनह बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा।। राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा।। 4।।

भावार्थ:-[शिवजी कहते हैं-] हे गिरिजे ! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल कथा जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली। श्रीरामजी के चरित्र सौ करोड़ [अथवा] अपार हैं। श्रुति और शारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते।। 4।।

राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी।। जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं।।2।।

भावार्थ:-भगवान्‌ श्रीराम अनन्त हैं; उनके गुण अनन्त हैं; जन्म कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जलकी बूँदे और पृथ्वीके रज-कण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्रीरघुनाथजी के चरित्र वर्णन करने से नहीं चुकते।।2।।

बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होई सुनि अनपायनी।। उमा कह्ठिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई।।3।।

भावार्थ:-यह पवित्र कथा भगवान्‌ के परमपद को देने वाली है। इसके सुनने से अविचल भक्ति प्राप्त होती है। हे उमा ! मैंने वह सब सुन्दर कथा कही जो काकभुशुण्डिजीने गरुड़जी को सुनायी थी।।3।।

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहाँ सो कहह भवानी।। सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी।।4।।

भावार्थ:-मैंने श्रीरामजी के कुछ थोड़े-से गुण बखानकर कहे हैं। हे भवानी ! सो कहो, अब और क्या कहूँ ? श्रीरामजी की मंगलमयी कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुई और अत्यन्त विनम्र तथा कोमल वाणी बोलीं।।4।।

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेऊउँ राम गुन भव भय हारी।।5।।

भावार्थ:-हे त्रिपुरारि ! मै धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ, जो मैंने जन्म-मृत्यु के हरण करनेवाले श्रीरामजी के गुण (चरित्र) सुने।।5।।
॥ दोहा ॥

तुम्हरी कृपाँ कृूपायतन अब कृतकृत्य न मोह। जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह।।52क।।

भावार्थ:-हे कृपाधाम ! अब आपकी कृपा से मैं कृतकृत्य हो गयी। अब मुझे मोह नहीं रह गया। हे प्रभु ! मैं सच्चिदानन्दघन प्रभु श्रीरामजी के प्रताप को जान गयी।। 52(क)।।

नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर। श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर।।52ख।।

भावार्थ:-हे नाथ ! आपकी मुखरूपी चन्द्रमा श्रीरघुवीरकी कथारूपी अमृत बरसाता है। हे मतिधीर ! मेरा मन कर्णपुटोंसे उसे पीकर तृप्त नहीं होता।। 52(ख)।।

राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिनन्‍्ह नाहीं।। जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहिं निरंतर तेऊ।।।।

भावार्थ:-श्रीरामजी के चरित्र सुनते-सुनते जो तृप्त हो जाते हैं (बस कर देते हैं), उन्होंने तो उसका विशेष रस जाना ही नहीं। जो जीवन्मुक्त महामुनि हैं, वे भी भगवान्‌ के गुण निरन्तर सुनते रहते हैं।। 4।।

भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहैँ दृढ़ नावा।। बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा।।2।

भावार्थ:-जो संसाररूपी सागर का पार पाना चाहता है, उसके लिये तो श्रीरामजी की कथा दृढ़ नौका के समान है। श्रीहरि के गुणसमूह तो विषयी लोगों के लिये भी कानों को सुख देनेवाले और मनको आनन्द देनेवाले हैं।।2।।

श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं।। ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती।।3।।

भावार्थ:-जगत्‌ में कान वाला ऐसा कौन है जिसे श्रीरघुनाथजी के चरित्र न सुहाते हों। जिन्हें श्रीरघुनाथजी की कथा नहीं सुहाती, वे मूर्ख जीव तो अपनी आत्मा की हत्या करनेवाले हैं।।3।।

हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा।। तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभुसुंडि गरुड़ प्रति गाई।।4।।

भावार्थ:-हे नाथ ! आपने श्रीरामचरितमानस का गान किया, उसे सुनकर मैंने अपार सुख पाया। आपने जो यह कहा कि यह सुन्दर कथा काकभुशुण्डिजी ने गरुड़जी से कहीं थी-।।4।।

बिरति ग्यान बिग्यान दूढ़ राम चरन अति नेह। बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह।।53।।

भावार्थ:-सौ कौए का शरीर पाकर भी काकभुशुण्डि वैराग्य, ज्ञान और विज्ञान में दृढ़ हैं, उनका श्रीरामजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम है और उन्हें श्रीरघुनाथजी की भक्ति भी प्राप्त है, इस बात का मुझे परम सन्देह हो रहा है।।53।।

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी।।

भावार्थ:-धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई॥ हे त्रिपुरारि ! सुनिये, हजारों मनुष्योंमें कोई एक धर्म के व्रत का धारण करनेवाला होता है और करोड़ों धर्मात्माओं में कोई एक विषय से विमुख (विषयोंका त्यागी) और वैराग्यपरायण होता है।। 4।।
॥ चौपाई ॥

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई।। ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवमुक्त सकृत जग सोऊ।।2।।

भावार्थ:-श्रुति कहती है कि करोड़ों विरक्तों में कोई एक ही सम्यक्‌ (यथार्थ) ज्ञान को प्राप्त करता है और करोड़ों ज्ञानियों में कोई एक ही जीवन्मुक्त होता है। जगत्‌ में कोई विरला ही ऐसा (जीवन्मुक्त) होगा।।2।।

तिन्ह सहस्त्र महँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्म लीन बिग्यानी।। धर्मशील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी।।3।।

भावार्थ:-हजारों जीवन्मुक्त में भी सब सुखों की खान, ब्रह्म में लीन विज्ञानवान्‌ पुरुष और भी दुर्लभ है। धर्मात्मा, वैराग्यवान्‌, ज्ञानी, जीवन्मुक्त और ब्रह्मलीन।।3।।

सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया।। सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहह बुझाई।।4।।

भावार्थ:-इन सबमें भी हे देवाधिदेव महादेवजी ! वह प्राणी अत्यन्त दुर्लभ है जो मद और मायासे रहित होकर श्रीरामजी की भक्तिके परायण हो। विश्वनाथ ! ऐसी दुर्लभ हरिभक्त को कौआ कैसे पा गया, मुझे समझाकर कहिये।।4।।

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर। नाथ कहह् केहि कारन पायउ काक सरीर।।54।।

भावार्थ:-हे नाथ ! कहिये, [ऐसे] श्रीरामपरायण, ज्ञानरहित, गुणधाम और धीरबुद्धि भुशुण्डिजी ने कौए का शरीर किस कारण पाया ?।।54।।

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहह् कृपाल काग कहँ पावा॥ तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहह मोहि अति कौतुक भारी।।4।।

भावार्थ:-हे कृपालु ! बताइये, उस कौएने प्रभु का यह पवित्र और सुन्दर चरित्र कहाँ पाया ! और हे कामदेव के शत्रु ! यह भी बताइये, आपने इसे किस प्रकार ? मुझे बड़ा भारी कौतूहल हो रहा है।।।।

गरुड़ महाग्यनी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी। तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई।।2।

भावार्थ:-गरुड़जी तो महानज्ञानी, सद्गुणों की राशि श्रीहरिके सेवक और उनके अत्यन्त निकट रहनेवाले (उनके वाहन ही) हैं। उन्होंने मुनियों के समूह को छोड़कर, कौए से जाकर हरिकथा किस कारण सुनी ?।।2।

कहह् कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा।। गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई।। 3।।

भावार्थ:-कह्ये, काकभुशुण्डि और गरुड़ इन दोनों हरिभक्तों की बातचीत किस प्रकार हुई? पार्वतीजी की सरल, सुन्दर वाणी सुनकर शिवजी सुख पाकर आदरके साथ बोले-3।।

धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी।। सुनह परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा।।4।।

भावार्थ:-हे सती ! तुम धन्य हो; तुम्हारी बुद्धि अत्यन्त पवित्र है। श्रीरघुनाथजी के चरणों में तुम्हारा कम प्रेम नहीं है (अत्याधिक प्रेम है) अब वह परम पवित्र इतिहास सुनो, जिसे सुनने से सारे लोक के भ्रम का नाश हो जाता है।।4।।

उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।5।।

भावार्थ:-तथा श्रीरामजी के चरणों में विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्र से तर जाता है।।5।।

एसिअ प्रत्र बिहंगपति कीन्हि काग सन जाइ। सो सब सादर कह्िहउँ सुनह उमा मन लाइ।।55।। पक्षिराज गरुड़जीने भी जाकर काकभुशुण्डिजीसे प्रायः ऐसे ही प्रश्न किये थे। हे उमा ! मैं वह सब आदरसहित कहूँगा, तुम मन लगाकर सुनो।।55।। मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि।।

भावार्थ:-प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा॥ मैंने जिस प्रकार वह भव (जन्म-मृत्यु) से छुड़ानेवाली कथा सुनी, हे सुमुखी! हे सुलोचनी ! वह प्रसंग सुनो। पहले तुम्हारा अवतार दक्ष के घर हुआ था। तब तुम्हारा नाम सती था।।4।।

दच्छ जग्य तव भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना।। मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानह् तुम्ह सो सकल प्रसंगा।। 2।।

भावार्थ:-दक्ष के यज्ञ में तुम्हारा अपमान हुआ। तब तुमने अत्यन्त क्रोध करके प्राण त्याग दिये थे और फिर मेरे सेवकों ने यज्ञ विध्वंस कर दिया था। वह सारा प्रसंग तुम जानती ही हो।।2।

तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें।। सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा।।3।।

भावार्थ:-तब मेरे मन में बड़ा सोच हुआ और हे प्रिये ! मैं तुम्हारे वियोग से दुखी हो गया। मैं विरक्तभाव से सुन्दर वन, पर्वत, नदी, और तालाबों का कौतुक (दृश्य) देखता फिरता था।।3।।

गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुंदर भूरी।। तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए।।4।।

भावार्थ:-सुमेरु पर्वत की उत्तर दिशा में, और भी दूर, एक बहुत ही सुन्दर नील पर्वत हैं। उसके सुन्दर सुवर्णमय शिखर हैं, [उनमेंसे] चार सुन्दर शिखर मेरे मन को बहुत ही अच्छे लगे।।4।।

तिन्ह पर एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला।। सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा।।5।।

भावार्थ:-उन शिखरों में एक-एक पर बरगद, पीपल, पाकर और आम का एक-एक विशाल वृक्ष है। पर्वत के ऊपर एक सुन्दर तालाब शोभित है; जिसकी सीढ़ियाँ देखकर मन मोहित हो जाता है।।5।।

सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग।। कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भूंग।।56।।

भावार्थ:-उसका जल शीतल, निर्मल और मीठा है; उसमें रंग-बिरंगे बहुत- से कमल खिले हुए हैं। हंसगण मधुर स्वर से बोल रहे हैं और भौरे सुन्दर गुंजार कर रहे रहे हैं।।56।।

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।।

भावार्थ:-माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।।।। उस सुन्दर पर्वत पर वही पक्षी (काकभुशुण्डि) बसता है। उसका नाश कल्प के अन्त में भी नहीं होता। मायारचित अनेकों गुण- दोष, मोह, काम आदि अविवेक।। ।।

रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहूँ नहिं जाहीं॥ तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।। 2।।

भावार्थ:-जो सारे जगत्‌ में छा रहे हैं, उस पर्वत के पास भी कभी नहीं फटकते। वहाँ बसकर जिस प्रकार वह काक हरि को भजता है, हे उमा ! उसे प्रेमसहित सुनो।।2।।

पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।। आँब छाँह कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।।3।।

भावार्थ:-वह पीपल के वृक्ष के नीचे ध्यान धरता है। पाकर के नीचे जपयज्ञ करता है। आम की छाया में मानसिक पूजा करता है। श्रीहरि के भजन को छोड़कर उसे दूसरा कोई काम नहीं है।।3।

बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहि अनेक बिहंगा।। राम चरित बिचित्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।।4।।

भावार्थ:-बरगद के नीचे वह श्री हरि की कथाओं के प्रसंग कहता है। वहाँ अनेकों पक्षी आते और कथा सुनते हैं। वह विचित्र रामचरित्र को अनेकों प्रकार से प्रेमसहित आदरपूर्वक गान करता है।।4।।

सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।। जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।। 5।।

भावार्थ:-सब निर्मल बुद्धिवाले हंस, जो सदा उस तालाब पर बसते हैं, उसे सुनते हैं। जब मैंने वहाँ जाकर यह कौतुक (दृश्य) देखा, तब मेरे हृदय में विशेष आनन्द उत्पन्न हुआ।। 5।।

तब कछु काल मराल तनु धरि तहैँ कीन्ह निवास। सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास।।57।।

भावार्थ:-तब मैंने हंस का शरीर धारण कर कुछ समय वहाँ निवास किया और श्रीरघुनाथजी के गुणों को आदरसहित सुनकर फिर कैलास को लौट आया।।57।।

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा॥। अस सो कथा सुनह जेहि हेतू। गयउ काग पहिहिं खग कुल केतू।। ।।

भावार्थ:-हे गिरिजे ! मैंने वह सब इतिहास कहा कि जिस समय मैं काकभुशुण्डि के पास गया था। अब वह कथा सुनो जिस कारण से पक्षिकुलके ध्वजा गरुड़जी उस काक के पास गये थे।। ।।

जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।। इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।।2।।

भावार्थ:-जब श्रीरघुनाथजी ने ऐसी रणलीला की जिस लीला का स्मरण करनेसे मुझे लज्जा होती है-मेघनाद के हाथों अपने को बँधा लिया- तब नारद मुनि ने गरुड़ को भेजा।।2।।

बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा ह्ृदयेँ प्रचंड बिषादा।। प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।। 3॥।

भावार्थ:-सर्पों के भक्षक गरुड़जी बन्धन काटकर गये, तब उनके ह्ृदय में बड़ा भारी विषाद उत्पन्न हुआ। प्रभु के बन्धन को स्मरण करके सर्पों के शुभ गरुड़जी बहुत प्रकार से विचार करने लगे-।3।

ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा॥ सो अवतार सुनेउऊँ जग माहीं। देखेऊँ सो प्रभाव कछु नाहीं।।4।।

भावार्थ:-जो व्यापक, विकाररहित, वाणी के पति और माया-मोहसे परे ब्रह्म परमेश्वर हैं, मैंने सुना था कि जगत्‌ में उन्हीं का अवतार है। पर मैंने उस (अवतार) का प्रभाव कुछ भी नहीं देखा।।5।।

भव बंधन ते छटहिं नर जपि जा कर नाम। खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोई राम।।58।।

भावार्थ:-जिनका नाम जयकर मनुष्य संसार के बन्धन से छूट जाते हैं उन्हीं राम को एक तुच्छ राक्षस ने नागपाश से बाँध लिया।।58।।

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान ह्ृदयेँ भ्रम छावा।। खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।।4।।

भावार्थ:-गरुड़जी ने अनेक प्रकार से अपने मन को समझाया। पर उन्हें ज्ञान नहीं हुआ, हृदय में श्रम और भी अधिक छा गया। [सन्देहजनित] दुःखसे दुखी होकर, मनमें कुतर्क बढ़ाकर वे तुम्हारी ही भाँति मोहवश हो गये।। 4।।

ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।। सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।।2।।

भावार्थ:-व्याकुल होकर वे देवर्षि नारदजीके पास गये और मनमें जो सन्देह था, वह उनसे कहा। उसे सुनकर नारदको अत्यन्त दया आयी। [उन्होंने कहा-] हे गरुड़ ! सुनिये ! श्रीरामजी की माया बड़ी ही बलवती है।।2।।

जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआईं बिमोह मन करई।। जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।।3।।

भावार्थ:-जो ज्ञानियों के चित्त को भी भलीभाँति हरण कर लेती है और उनके मन में जबर्दस्ती बड़ा भारी मोह उत्पन्न कर देती है तथा जिसने मुझको भी बहुत बार नचाया है, हे पक्षिराज ! वही माया आपको भी व्याप गयी है।।3।

महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।। चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेह जेहि होइ निदेसा।।4।।

भावार्थ:-हे गरुड़ ! आपके हृदय में बड़ा भारी मोह उत्पन्न हो गया है। यह मेरे समझाने से तुरंत नहीं मिटेगा अतः हे पक्षिराज ! आप ब्रह्माजीके पास जाइये और वहाँ जिस काम के लिये आदेश मिले, वही कीजियेगा।।4।।

अस कह्ठि चले देवरिषि करत राम गुन गान। हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान।।59।।

भावार्थ:-ऐसा कहकर परम सुजान देवर्षि नारदजी श्रीरामजीका गुणगान करते हुए और बारंबार श्रीहरि की मायाका बल वर्णन करते हुए चले।।59।।

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।। सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझ्नि प्रताप प्रेम अति छावा।। ।।

भावार्थ:-तब पक्षिराज गरुड़ ब्रह्माजीके पास गये और अपना सन्देह उन्हें कह सुनाया। उसे सुनकर ब्रह्माजी ने श्रीरामचन्द्रजी को सिर नवाया और उनके प्रताप को समझकर उनके अत्यन्त प्रेम छा गया॥ मन महूँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता।।

हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।।2।।

भावार्थ:-ब्रह्माजी मन में विचार करने लगे कि कवि, कोविद और ज्ञानी सभी मायाके वश हैं। भगवान्‌ की माया का प्रभाव असीम है, जिसने मुझतक को अनेकों बार नचाया है।।2।।

अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा। तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई।।3।।

भावार्थ:-यह सार चराचर जगत्‌ तो मेरा रचा हुआ है। जब मैं ही मायावश नाचने लगता हूँ, तब पक्षिराज गरुड़को मोह होना कोई आश्चर्य [की बात] नहीं है। तदनन्तर ब्रह्माजी सुन्दर वाणी बोले- श्रीरामजीकी महिमाको महादेवजी जानते हैं।।3।।

बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछह जनि काहू।। तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी।।4।।

भावार्थ:-हे गरुड़ ! तुम शंकरजीके पास जाओ। हे तात ! और कहीं किसी से न पूछना। तुम्हारे सन्देहका नाश वहीं होगा। ब्रह्माजीका वचन सुनते ही गरुड़ चल दिये।।4।।

परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास। जात रहेउँ कुबेर गृह रहिह् उमा कैलास।।60।।

भावार्थ:-तब बड़ी आतुरता (उतावली) से पक्षिराज गरुड़ मेरे पाय आये। है उमा ! उस समय मैं कुबेर के घर जा रहा था और तुम कैलासपर थीं।।60।।

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।। सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। प्रेम सहित मैं कहेउँ भवानी।। ।।

भावार्थ:-गरुड़जी ने आदरपूर्वक मेरे चरणों में सिर नवाया और फिर मुझको अपना सन्देह सुनाया। हे भवानी ! उनकी विनती और कोमल वाणी सुनकर मैंने प्रेमसहित उनसे कहा-।।

मिलेह गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही।। तबहिं होइ सब संसय भंगा। जब बह काल करिअ सतसंगा।।2।।

भावार्थ:-हे गरुड़ ! तुम मुझे रास्ते में मिले हो। राह चलते मैं तुम्हें किस प्रकार समझाऊँ ? सब सन्देहों का तो तभी नाश हो जब दीर्घ कालतक सत्संग किया जाय।।2।।

सुनिअ तहाँ हरिकथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई।।

भावार्थ:-जेहिं महँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।।3।। और वहां (सत्संग में) सुन्दर हरि कथा सुनी जाय, जिसे मुनियोंने अनेकों प्रकारसे गाया है और जिसके आदि, मध्य और अन्त में भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी ही प्रतिपाद्य प्रभु हैं।।3।।

नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनह तुम्ह जाई।। जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा।।4।।

भावार्थ:-हे भाई ! जहाँ प्रतिदिन हरिकथा होती है, तुमको मैं वहीं भेजता हूँ, तुम जाकर उसे सुनो। उसे सुनते ही तुम्हारा सब सन्देह दूर हो जायगा और तुम्हें श्रीरामजीके चरणोंमें अत्यन्त प्रेम होगा।।4।।

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दूढ़ अनुराग।।6।।

भावार्थ:-सत्संगके बिना हरि की कथा सुननेको नहीं मिलती, उसके बिना मोह नहीं भागता और मोह के गये बिना श्रीरामचन्द्रजी के चरणोंमें दूढ़ (अचल) प्रेम नहीं होता।।6।

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।। उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहैँ रह काकभुसुंडि सुसीला।। 4।

भावार्थ:-बिना प्रेम के केवल योग, तप, ज्ञान और वैराग्यादिके करनेसे श्रीरधुनाथजी नहीं मिलते। [अतएव तुम सत्संग के लिये वहाँ जाओ जहाँ] उत्तर दिशा में एक सुन्दर नील पर्वत है। वहाँ परम सुशील काकभुशुण्डिजी रहते हैं।।।।

राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।। राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।।2।।

भावार्थ:-वे रामभक्ति के मार्ग में परम प्रवीण हैं, ज्ञानी हैं, गुणों के धाम हैं, और बहुत कालके हैं। वे निरन्तर श्रीरामचन्द्रजी की कथा कहते रहते हैं, जिसे भाँति-भाँति के श्रेष्ठ पक्षी आदरसहित सुनते हैं।।2।।

जाइ सुनह तहैँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी।। मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरघषि मम पद सिरु नाई।।3।।

भावार्थ:-वहाँ जाकर श्रीहरि के गुण समूहों को सुनो। उनके सुनने से मोह से उत्पन्न तुम्हारा दुःख दूर हो जायगा। मैंने उसे जब सब समझाकर कहा, तब वह मेरे चरणों में सिर नवाकर हर्षित होकर चला गया।।3।।

ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा।। होइहि कीन्ह कबहूँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना।।4।।

भावार्थ:-हे उमा ! मैंने उसको इसीलिये नहीं समझाया कि मैं श्रीरघुनाथजीकी कृपासे उसका मर्म (भेद) पा गया था। उसने कभी अभिमान किया होगा, जिसको कृपानिधान श्रीरामजी नष्ट करना चाहते हैं।।4।।

कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा।। प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।।5।।

भावार्थ:-फिर कुछ इस कारण भी मैंने उसको अपने पास नहीं रक्‍्खा कि पक्षी पक्षी की हो बोली समझते हैं। हे भवानी ! प्रभु की माया [बड़ी ही] बलवती है, ऐसा कौन ज्ञानी है, जिसे वह न मोह ले ?।।5।।
॥ दोहा ॥

ग्यानी भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान। ताहि मोह माया नर पावर करहिं गुमान।।62क।।

भावार्थ:-जो ज्ञानीयोंमें और भक्तोंमें शिरोमणि हैं एवं त्रिभुवनपति भगवान्‌ के वाहन हैं, उन गरुड़ को भी माया ने मोह लिया। फिर भी नीच मनुष्य मूर्खतावश घमंड किया करते हैं।। 62(क)।।

मासपारायण, अट्ठाईसवाँ विश्राम

सिव बिरंचि कहूँ मोहइ को है बपुरा आन।अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान।।62ख।।

भावार्थ:-यह माया जब शिव जी और ब्रह्माजी को भी मोह लेती है, तबदूसरा बेचारा क्या चीज है ? जी में ऐसा जानकर ही मुनिलोगउस माया के स्वामी भगवान्‌ का भजन करते हैं।। 62(ख)।।

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।। देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ।। ।।

भावार्थ:-गरुड़जी वहाँ गये जहाँ निर्बाध बुद्धि और पूर्ण भक्तिवाले काकभुशुण्डि बसते थे। उस पर्वत को देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया और [उसके दर्शनसे ही] सबसे माया, मोह तथा सोच जाता रहा।। ॥।

करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ ह्ृदयेँ हरषाना।। बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए।।2।

भावार्थ:-तालाब में खान और जलपान करके वे प्रसन्नचित्त से वटवृक्ष के नीचे गये। वहाँ श्रीरामजी के सुन्दर चरित्र सुनने के लिये बूढ़े-बूढ़े पक्षी आये हुए थे।।2।।

कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा।। आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।।3।।

भावार्थ:-भुशुण्डिजी कथा आरम्भ करना ही चाहते थे कि उस समय पक्षिराज गरुड़जी वहाँ जा पहुँचे। पक्षियों के राजा गरुड़जी को आते देखकर काकभुशुण्डिजीसहित सारा पक्षिसमाज हर्षित हुआ।। 3॥।

अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछ्धि सुआसन दीन्हा।। करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा।।4॥

भावार्थ:-उन्होंने पक्षिराज गरुड़जी का बहुत ही आदर-सत्कार किया और स्वागत (कुशल) पूछकर बैठने के लिये सुन्दर आसन दिया फिर प्रेमसहित पूजा करके काकभुशुण्डिजी मधुर वचन बोले-।4।।

नाथ कृतारथ भयउँ मैं तब दरसन खगराज। आयसु देह सो करौं अब प्रभु आयहु केहिं काज।।63क।।

भावार्थ:-हे नाथ ! हे पक्षिराज ! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया। आप जो आज्ञा दें, मैं अब वही करूँ। हे प्रभो ! आप किस कार्य के लिये आये हैं?।। 63(क)।।

सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस। जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस।।63ख।।

भावार्थ:-पक्षिराज गरुड़जीने कोमल वचन कहे-आप तो सदा ही कृतार्थरूप हैं, जिनकी बड़ाई स्वयं महादेवजी ने आदरपूर्वक अपने श्रीमुख से की है।। 63(ख)।।

सुनह तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।। देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।।१।। हे तात ! सुनिये, मैं जिस कारणसे आया था, वह सब कार्य तो यहाँ आते ही पूरा हो गया। फिर आपके दर्शन भी प्राप्त हो गये। आपका परम पवित्र आश्रम देखकर ही मेरा मोह, सन्देह और अनेक प्रकारके भ्रम सब जाते रहे॥ अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।। सादर तात सुनावह मोही। बार बार बिनयउँ प्रभु तोही।।2।।

भावार्थ:-अब हे तात ! आप मुझे श्रीरामजीकी अत्यन्त पवित्र करने वाली, सदा सुख देनेवाली और दुःखसमूह का नाश करनेवाली कथा आदरसहित सुनाइये। हे प्रभो ! मैं बार-बार आपसे यही विनती करता हूँ।।2।

सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।। भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा।।3।।

भावार्थ:-गरुड़जी की विनम्र, सरल, सुन्दर, प्रेमयुक्त, सुख, प्रद और अत्यन्त पवित्रवाणी सुनते ही भुशुण्डिजी के मनमें परम उत्साह हुआ और वे श्रीरघुनाथजी के गुणों की कथा कहने लगे।।3।।

प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।। पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।।4।।

भावार्थ:-हे भवानी ! पहले तो उन्होंने बड़े ही प्रेम से रामचरितमानस सरोवर का रूपक समझाकर कहा। फिर नारद जी का अपार मोह और फिर रावण का अवतार कहा।।4।।

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई।।5।।

भावार्थ:-फिर प्रभु के अवतारकी कथा वर्णन की। तदनन्तर मन लगाकर श्रीरामजीकी बाललीलाएँ कहीं।।5।।

बालचरित कहि बिबिधि बिधि मन महँ परम उछाह।। रिषि आवगन कहेसि पुनि श्रीरघुबीर बिबाह।।64।।

भावार्थ:-मनमें परम उत्साह भरकर अनेकों प्रकारकी बाललीलाएँ कहकर, फिर ऋषि विश्वामित्रजी का अयोध्या आना और श्रीरघुवीरका विवाह वर्णन किया।। 64।।
॥ चौपाई ॥

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृूप बचन राज रस भंगा।। पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।। १।।

भावार्थ:-फिर श्रीरामजी के राज्याभिषेक का प्रसंग, फिर राजा दशरथजी के वचन से राजरस (राज्याभिषेकके आनन्द) में भंग पड़ना, फिर नगर निवासियों का विरह, विषाद और श्रीराम-लक्ष्मण का संवाद (बातचीत) कहा।।१।

बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।। बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।।2।।

भावार्थ:-श्रीराम का वनगमन, केवट का प्रेम, गंगाजी से पार उतरकर प्रयाग में निवास, वाल्‍्मीकिजी और प्रभु श्रीरामजीका मिलन और जैसे भगवान्‌ चित्रकूटमें बसे, वह सब कहा।।2।।

सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।। करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहूैँ प्रभु सुख रासी।।3।।

भावार्थ:-फिर मन्त्री सुमन्त्रजी का नगर में लौटना, राजा दशरथजी का मरण, भरतजी का [ननिहालसे] अयोध्या में आना और उनके प्रेम का बहुत वर्णन किया। राजाकी अन्त्येष्टि क्रिया करके नगरवासियों को साथ लेकर भरतजी वहाँ गये, जहाँ सुख की राशि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी थे।।3।।

पुनि रघुपति बह बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए!।। भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अन्रि भेंट बरनी।।4।।

भावार्थ:-फिर श्रीरघुनाथजी ने उनको बहुत प्रकार से समझाया; जिससे वे खड़ाऊँ लेकर अयोध्यापुरी लौट आये, यह सब कथा कही। भरतजी की नन्दिग्राम में रहने की रीति, इन्द्रपुत्र जयन्त की नीच करनी और फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी और आत्रिजी का मिलाप वर्णन किया।।4।।

कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।। बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सत्संग।।65।।

भावार्थ:-जिस प्रकार विराध का वध हुआ और शरभंगजीने शरीर त्याग किया, वह प्रसंग कह-कर, फिर सुतीक्षणजी का प्रेम वर्णन करके प्रभु और अगस्त्यजीका सत्संग वृत्तान्त कहा।।65।।

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।। पुनि प्रभु पंचबटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्‍्ह की त्रासा।।4।।

भावार्थ:-दण्डकवन का पवित्र करना कहकर फिर भुशुण्डिजी ने गृध्वराज के साथ मित्रता का वर्णन किया। फिर जिस प्रकार प्रभुने पंचवटी में निवास किया और सब मुनियों के भय का नाश किया।। ।।

पुनि लब्िमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन््हि कुरूपा।। खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।।2।

भावार्थ:-और फिर जैसे लक्ष्मणजीको अनुपम उपदेश दिया और शूर्पणखा को कुरूप किया, वह सब वर्णन किया। फिर खर-दूषण-वध और जिस प्रकार रावण ने सब समाचार जाना, वह बखानकर कहा।।20।

दसकंधर मारीच बतकही। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।। पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछ्ध बरना।।3।।

भावार्थ:-तथा जिस प्रकार रावण और मारीच की बातचीत हुई, वह सब उन्होंने कही। फिर मायासीता का हरण और श्रीरघुवीर के विरह का कुछ वर्णन किया।।3।।

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्‍्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही।। बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा।।4।।

भावार्थ:-फिर प्रभुने गिद्ध जटायुकी जिस प्रकार क्रिया की, कबन्ध का बध करके शबरी को परमगति दी और फिर जिस प्रकार विरह-वर्णन करते हुए श्रीरघुवीरजी पंपासर के तीरपर गये, वह सब कहा।।4।।
॥ दोहा ॥

प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग। पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग।।66क।।

भावार्थ:-प्रभु और नारद जी का संवाद और मारुतिके मिलने का प्रसंग कहकर फिर सुग्रीवसे मित्रता और बालि के प्राणनाश का वर्णन किया।। 66(क)।।

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास। बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास।।66ख।।

भावार्थ:-सुग्रीव का राज तिलक करके प्रभु ने प्रवर्षण पर्वतपर निवास किया, तथा वर्षा और शरद्‌ का वर्णन, श्रीरामजीका सुग्रीवपर रोष और सुग्रीव का भय आदि प्रसंग कहे।। 66(ख)।।

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए। सीता खोज सकल दिसि धाए।। बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती। कपिन्ह बहोरि मिला संपाती।।।।

भावार्थ:-जिस प्रकार वानर राज सुग्रीव ने वानरों को भेजा और वे सीता जी की खोज में जिस प्रकार सब दिशाओं में गये, जिस प्रकार उन्होंने बिल में प्रवेश किया और फिर जैसे वानरों को सम्पाती मिला, वह कथा कही।। ।।

सुनि सब कथा समीरकुमारा। नाघत भयउ पयोधि अपारा।। लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीनन्‍्हा। पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा।।2।।

भावार्थ:-संपातीसे सब कथा सुनकर पवनपुत्र हनुमान्‌ जी जिस तरह अपार समुद्र को लाँघ गये, फिर हनुमान्‌ जी ने जैसे लंका में प्रवेश किया और फिर जैसे सीताजी को धीरज दिया सो सब कहा।।2।

बन उजारि रावनहि प्रबोधी। पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी।। आए कपि सब जहूँ रघुराई। बैदेही की कुसल सुनाई।।3।

भावार्थ:-अशोकवन को उजाड़कर, रावण को समझाकर, लंकापुरी को जलाकर फिर जैसे उन्होंने समुद्रको लाँघा और जिस प्रकार सब वानर वहाँ आये, जहाँ श्रीरघुनाथजी थे और आकर श्रीजानकीजी की कुशल सुनायी,।।3।।

सेन समेति सथा रघुबीरा। उतरे जाइ बारिनिधि तीरा।। मिला बिभीषन जेहि बिधि आई। सागर निग्रह कथा सुनाई।।4।।

भावार्थ:-फिर जिस प्रकार सेनासहित श्रीरघुवीर जाकर समुद्रको तटपर उतरे और जिस प्रकार विभीषण जी आकर उनसे मिले, वह सब और समुद्रकी बाँधनेकी कथा उसने सुनायी।।4।।

सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार। गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार।।67क।।

भावार्थ:-पुल बाँधकर जिस प्रकार वानरों की सेना समुद्र के पार उतरी और जिस प्रकार वीरश्रेष्ठ बालिपुत्र अंगद दूत बनकर गये, वह सब कहा।। 67(क)।।

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार। कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार।।67ख।।

भावार्थ:-फिर राक्षसों और वानरोंके युद्धका अनेकों प्रकारसे वर्णन किया। फिर कुम्भकर्ण और मेघनाद के बल, पुरुषार्थ और संहारकी कथा कही।। 67(ख)।।

निसिचर निकर मरन बिधि नाना। रघुपति रावन समर बखाना।। रावन बध मंदोदरि सोका। राज बिभीषन देव असोका।।।।

भावार्थ:-नाना प्रकार के राक्षस समूहों के मरण तथा श्रीरघुनाथजी और रावण के अनेक प्रकार के युद्धा का वर्णन किया। रावणवध, मंदोदरी का शोक, विभीषण का राज्यभिषेक और देवताओं का शोकरहित होना कहकर, ॥ सीता रघुपति मिलन बहोरी। सुरन्ह कीन्हि अस्तुति कर जोरी॥।

पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता। अवध चले प्रभु कृपा निकेता।।2।।

भावार्थ:-फिर सीताजी और श्रीरघुनाथजीका मिलाप कहा। जिस प्रकार देवताओंने हाथ जोड़कर स्तुति की और फिर जैसे वानरोंसमेत पुष्पकविमानपर चढ़कर कृपाधाम प्रभु अवधपुरी को चले, वह कहा।।2।

जेहि बिधि राम नगर निज आए। बायस बिसद चरित सब गाए॥ कहेसि बहोरि राम अभिषेका। पुर बरनत नृपनीति अनेका।।3।

भावार्थ:-जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी अपने नगर (अयोध्या) में आये, वे सब उज्ज्वल चरित्र काकभुशुण्डिजीने विस्तारपूर्वक वर्णन किये। फिर उन्होंने श्रीरामजीका राज्यभिषेक कहा। [शिवजी कहते हैं-] अयोध्यापुरीका और अनेक प्रकारकी राजनीतिका वर्णन करते हुए-॥3।।

कथा समस्त भुसुंड बखानी। जो मैं तुम्ह सन कही भवानी।। सुनि सब राम कथा खगनाहा। कहत बचन मन परम उद्धाहा।।4।। भुशुण्डिजीने वह सब कथा कही जो हे भवानी ! मैंने तुमसे कही ! सारी रामकथा सुनकर पक्षिराज गरुड़जी मनमें बहुत उत्साहित (आनन्दित) होकर वचन कहने लगे।।4।। गयउ मोर संदेह सुनेऊउँ सकल रघुपति चरित।। भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक।।68क।।

भावार्थ:-श्रीरघुनाथजीके सब चरित्र मैंने सुने, जिससे मेरा सन्देह जाता रहा। हे काकशिरोमणि ! आपके अनुग्रह से श्रीरामजी के चरणों में मेरा प्रेम हो गया।। 68(क)।।

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महूँ निरखि। चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन।।68ख।।

भावार्थ:-युद्धमें प्रभुका नागपाशसे बन्धन देखकर मुझे अत्यन्त मोह हो गया था कि श्रीरामजी तो सच्चिदानन्दघन हैं, वे किस कारण व्याकुल हैं।। 68(ख)।।

देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी॥। सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।।।। बिल्कुल ही लौकिक मनुष्यों का-सा चरित्र देखकर मेरे हृदय में सन्देह हो गया। मैं अब उस भ्रम (सन्देह) को अपने लिये हित करके समझता हूँ। कृपानिधान ने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया।।।। जो अति आतप ब्याकुल होई। तरु छाया सुख जानइ सोई।। जौं नहिं होत मोह अति मोही। मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही।।2।

भावार्थ:-जो ध्रूप से अत्यन्त व्याकुल होता है, वही वृक्ष की छाया का सुख जानता है। हे तात ! यदि मुझे अत्यन्त मोह न होता तो मैं आपसे किस प्रकार मिलता ?।।2।

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई। अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई।। निगमागम पुरान मत एहा। कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा।। 3।।

भावार्थ:-और कैसे अत्यन्त विचित्र यह सुन्दर हरिकथा सुनाता; जो आपने बहुत प्रकार से गायी है ? वेद, शास्त्र और पुराणोंका यही मत है; सिद्ध और मुनि भी यही कहते हैं, इसमें सन्देह नहीं कि-।3।।

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही। चितवहिं राम कृपा करि जेही।। राम कृपाँ तव दरसन भयऊ। तव प्रसाद सब संसय गयऊ।।4।।

भावार्थ:-शुद्ध (सच्चे) संत उसी को मिलते हैं, जिसे श्रीरामजी कृपा करके देखते हैं। श्रीरामजीकी कृपासे मुझे आपके दर्शन हुए और आपकी कृपासे मेरा सन्देह चला गया।।4।।

सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग। पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग।।69क।।

भावार्थ:-पक्षिराज गरुड़जी का विनय और प्रेम युक्त वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजीका शरीर पुलकित हो गया, उनके नेत्रोंमें जल भर आया और वे मन में अत्यन्त हर्षित हुए।। 69(क)।।

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास। पाइ उमा पति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास।।69ख।।

भावार्थ:-हे उमा ! सुन्दर बुद्धिवाले, सुशील, पवित्र कथा के प्रेमी और हरि के सेवक श्रोता को पाकर सज्जन अत्यन्त गोपनीय (सबके सामने प्रकट न करने योग्य) रहस्य को प्रकट कर देते हैं।। 69(ख)।।

बोलेउ काकभुसंड बहोरी। नभग नाथ पर प्रीति न थोरी।।

भावार्थ:-सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे। कृपापात्र रघुनायक केरे॥ काकभुशुण्डिजीने कहा-पक्षिराजपर उनका प्रेम कम न था (अर्थात्‌ बहुत था)- हे नाथ ! आप सब प्रकार से मेरे पूज्य हैं और श्रीरघुनाथजी के कृपापात्र हैं।।।।

तुम्हहि न संसय मोह न माया। मो पर नाथ कीन््हि तुम्ह दाया।। पठइ मोह मिस खगपति तोही। रघुपति दीन्टहि बड़ाई मोही।।2।।

भावार्थ:-आपको न सन्देह है और न मोह अथवा माया ही है। हे नाथ ! आपने तो मुझपर दया की है। पक्षिराज ! मोह के बहाने श्रीरघुनाथजीने आपको यहाँ भेजकर मुझे बड़ाई दी है।।2।।

तुम्ह निज मोह कही खग साईं। सो नहिं कछू आचरज गोसाई।। नारद भव बिरंचि सनकादी। जे मुनिनायक आमतबादी।।3।।

भावार्थ:-हे पक्षियों के स्वामी ! आपने अपना मोह कहा, सो हे गोसाई ! यह कुछ आश्चर्य नहीं है। नारदजी, शिवजी, बह्माजी और सनकादि जो आत्मतत्त्वके मर्मज्ञ और उसका उपदेश करनेवाले श्रेष्ठ मुनि हैं।।3।।

मोह न अंध कीन्ह केहि केही। को जग काम नचाव न जेही।। तूख्राँ केहि न कीन्ह बौराहा। केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा।।4।।

भावार्थ:-उनमें से भी किस-किसको मोह ने अंधा (विवेकशून्य) नहीं किया ? जगत्‌ में ऐसा कौन है जिसे काम ने न नचाया हो ? तृष्णा ने किसको मतवाला नहीं बनाया ? क्रोध ने किसका हृदय न जलाया ?।।4।।

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार। केहि कै लोभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार।।70क।।

भावार्थ:-इस संसार में ऐसा कौन सा ज्ञानी, तपस्वी, शूरवीर, कपि, विद्वान और गुणों का धाम है, जिसकी लोभने बिडम्बना (मिट्टी पलीद) न की हो।। 70(क)।।

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहिहि। मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि।।70ख।।

भावार्थ:-लक्ष्मी के मदने किसको टेढ़ा और प्रभुताने किसको बहरा नहीं कर दिया ? ऐसा कौन है, जिसे मृगनयनी (युवती स्त्री) के नेत्र- बाण न लगे हों।। 70(ख)।।

गुन कृत सन्यपात नहिं केही। कोउ न मान मद तजेउ निबेही।।

भावार्थ:-जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा। ममता केहि कर जस न नसावा॥ [रज, तम आदि] गुणों का किया हुआ सच्निपात किसे नहीं हुआ ? ऐसा कोई नहीं है जिसे मान और मद ने अछूता छोड़ा हो। यौवन के ज्वर ने किसे आपे से बाहर नहीं किया ? ममता ने किसके यश का नाश नहीं किया ?।4।।

मच्छर काहि कलंक न लावा। काहि न सोक समीर डोलावा।। चिंता साँपिनि को नहिं खाया। को जग जाहि न ब्यापी माया।।2।।

भावार्थ:-मत्सर (डाह) ने किसको कलंक नहीं लगाया ? शोकरूपी पवन ने किसे नहीं हिला दिया ? चिन्तारूपी साँपिन ने किसे नहीं खा लिया ? जगत्‌ में ऐसा कौन है, जिसे माया ने व्यापी हो ?।2।।

कीट मनोरथ दारु सरीरा। जेहि न लाग घुन को अस धीरा॥ सुत बित लोक ईषना तीनी। केहि कै मति इन्ह कृत न मलीनी।।3।।

भावार्थ:-मनोरथ कीड़ा है, शरीर लकड़ी है। ऐसा धैर्यवान कौन है, जिसके शरीर में यह कीड़ा न लगा हो ? पुत्र की, धन की और लोक प्रतिष्ठा की-इन तीन प्रबल इच्छाओं ने किसकी बुद्धि को मलिन नहीं कर दिया (बिगाड़ नहीं दिया) ?।।3।।

यह सब माया कर परिवारा। प्रबल अमिति को बरनै पारा।। सिव चतुरानन जाहि डेराही। अपर जीव केहि लेखे माहीं।।4।।

भावार्थ:-यह सब माया का बड़ा बलवान्‌ परिवार है। यह अपार है, इसका वर्णन कौन कर सकता है ? शिवजी और ब्रह्माजी भी जिससे डरते हैं, तब दूसरे जीव तो किस गिनती में है?।।4।।

ब्यापि रहेउ संसार महूँ माया कटक प्रचंड। सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड।।7क।।

भावार्थ:-मायाकी प्रचण्ड सेना संसारभर में छायी हई है। कामादि (काम, क्रोध और लोभ) उसके सेना पति हैं और दम्भ, कपट और पाखण्ड योद्धा हैं।। 7 (क)।।

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।। छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहरउँ पद रोपि।।74ख।।

भावार्थ:-वह माया श्रीरघुवीर की दासी है। यद्यपि समझ लेने पर वह मिथ्या ही है, किन्तु वह श्रीरामजीकी कृपाके बिनी छूटती नहीं। हे नाथ ! यह मैं प्रतिज्ञा करके कहता हूँ।। 7(ख)।।

जो माया सब जागहि नचावा। जासु चरित लखि काहूँ न पावा।।

भावार्थ:-सोइ प्रभु भू बिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥ जो माया सारे जगत्‌ को नचाती है और जिसका चरित्र (करनी) किसी ने नहीं लख पाया, हे खगराज गरुड़जी ! वही माया प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की भ्रकुटी के इशारेपर अपने समाज (परिवार) सहित नटी की तरह नाचती है।।4॥।

सोइ सच्चिदानंद घन रामा। अज बिग्यान रूप बल धामा।। ब्यापक ब्याप्प अखंड अनंता। अखिल अमोघसक्ति भगवंता।।2।

भावार्थ:-श्रीरामजी वही सच्चिदानन्दघन हैं जो अजन्मा, विज्ञानस्वरूप, रूप और बलके धाम, सर्वव्यापक एवं व्याप्य (सर्वरूप) अखण्ड, अनन्त, सम्पूर्ण अमोघशक्ति (जिसकी शक्ति कभी व्यर्थ नहीं होती) और छः ऐशर्यों से युक्त भगवान्‌ हैं।।2।।

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता। सबदरसी अनवद्य अजीता।। निर्मम निराकार निरमोहा। नित्य निरंजन सुख संदोहा।।3।

भावार्थ:-वे निर्गुण (माया के गणों से रहित), महान्‌ वाणी और इन्दियोंसे परे सब कुछ देखनेवाले, निर्दोष, अजेय, ममतारहित, निराकार (मायिक आकारसे रहित), मोहरहित, नित्य, मायारहित, सुख की राशि,।।3।

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।। इहाँ मोह कर कारन नाहीं। रबि सन्मुख तम कबहूँ कि जाहीं।।4।।

भावार्थ:-प्रकृति से परे, प्रभु (सर्वसमर्थ) सदा सबके ह्वृदय में बसने वाले, इच्छारहित, विकाररहित, अविनाशी ब्रह्म हैं। यहाँ (श्रीराम में) मोह का कारण ही नहीं है। क्या अन्धकार का समूह कभी सूर्य के सामने जा सकता है ?।।4।।

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप। किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप।।72क।।

भावार्थ:-भगवान्‌ प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने भक्तों के लिये राजाका शरीर धारण किया और साधारण मनुष्योंके-से अनेकों परम पावन चरित्र किये।। 72(क)।।

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ। सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ।।72ख।।

भावार्थ:-जैसे कोई नट (खेल करनेवाला) अनेक वेष धारण करके नृत्य करता है, और वही-वही (जैसा वेष होता है, उसीके अनुकूल) भाव दिखलाता है; पर स्वयं वह उनमेंसे कोई हो नहीं जाता।। 72(ख)।।

असि रघुपति लीला उरगारी। दनुज बिमोहनि जन सुखकारी।।

भावार्थ:-जे मति मलिन बिषय बस कामी। प्रभु पर मोह धरहिं इमि स्वामी॥ हे गरुड़जी ! ऐसी ही श्रीरघुनाथजी की यह लीला है, जो राक्षसों को विशेष मोहित करनेवाली और भक्तों को सुख देनेवाली है। है स्वामी ! जो मनुष्य मलिन बुद्धि, विषयों के वश और कामी हैं, वे ही प्रभु पर इस प्रकार मोह का आरोप करते हैं।।।।

नयन दोष जा कहँ जब होई। पीत बरन ससि कहूँ कह सोई।। जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा। सो कह पच्चछिम उयउ दिनेसा।।2।।

भावार्थ:-जब जिसको [कैंवल आदि] नेत्र दोष होता है, तब वह चन्द्रमा को पीले रंग का कहता है। हे पक्षिराज ! जब जिसे दिशाभ्रम होता है, तब वह कहता है कि सूर्य पश्चिम में उदय हुआ है।।2।

नौकारूढ़ चलत जग देखा। अचल मोह बस आपुहि लेखा।। बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादी। कहहिं परस्पर मिथ्याबादी।। 3।।

भावार्थ:-नौका पर चढ़ा हुआ मनुष्य जगत्‌ को चलता हुआ देखता है और मोह वश अपने को अचल समझता है।।3।।

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा। सपनेहूँ नहिं अग्यान प्रसंगा।। मायाबस मतिमंद अभागी। ह्वृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी।।4।।

भावार्थ:-हे गरुड़जी ! श्रीहरिके बिषय में मोह की कल्पना भी ऐसी ही है, भगवान्‌ में तो स्वप्रमें भी अज्ञानका प्रसंग (अवसर) नहीं है। किन्तु जो माया के वश, मन्दबुद्धि और भाग्यहीन हैं और जिनके हृदय पर अनेकों प्रकारके परदे पड़े हैं।।4।।

ते सठ हठ बस संसय करहीं। निज अग्यान राम पर धरहीं।।5।।

भावार्थ:-वे मूर्ख हठ के वश होकर सन्देह करते हैं और अपना अज्ञान श्रीरामजी पर आरोपित करते हैं।।5।।

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप। ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप।।73क।।

भावार्थ:-जो काम, क्रोध, मद और लोभ में रत हैं और दुःखरूप घरमें आसक्त हैं, वे श्रीरघुनाथजी को कैसे जान सकते हैं ? वे मूर्ख तो अन्धकार रूपी कुएँ में पड़े हुए हैं।। 73(क)।।

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोई। सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ।।73ख।।

भावार्थ:-निर्गुण रूप अत्यन्त सुलभ (सहज ही समझ में आ जाने वाला) है, परंतु [गुणातीत दिव्य] सगुण रूपको कोई नहीं जानता। इसलिये उन सगुण भगवान्‌ को अनेक प्रकार के सुगम और अगम चरित्रों को सुनकर मुनियों के भी मन को भ्रम हो जाता है।। 73(ख)।।

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई। कहउँ जथामति कथा सुहाई। जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही। सोउ सब कथा सुनावउँ तोही।।१।

भावार्थ:-हे पक्षीराज गरुड़जी ! श्रीरघुनाथजी की प्रभुता सुनिये। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वह सुहावनी कथा कहता हूँ। हे प्रभो ! मुझे जिस प्रकार मोह हुआ है, वह सब कथा भी आपको सुनाता हूँ।।।।

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता। हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता।। ताते नहिं कछ तुम्हहिं दुरावउँ। परम रहस्य मनोहर गावउँ।।2।।

भावार्थ:-हे तात ! आप श्रीरामजी के कृपा पात्र है। श्रीहरिके गुणों में आपकी प्रीति है, इसीलिये आप मुझे सुख देनेवाले हैं। इसी से मैं आपसे कुछ भी नहीं छिपाता और अत्यन्त रहस्य की बातें आपको गाकर सुनाता हूँ।।2।।

सुनह राम कर सहज सुभाऊ। जन अभिमान न राखहिं काऊ।। संसृत मूल सूलप्रद नाना। सकल सोक दायक अभिमाना।।3।।

भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजीका सहज स्वभाव सुनिये; वे भक्तों में अभिमान कभी नहीं रहने देते। क्योंकि अभिमान जन्म-मरणरूप संसारका मूल है और अनेक प्रकार के क्लेशों तथा समस्त शोकों को देनेवाला है।।3।।

ताते करहिं कृपानिधि दूरी। सेवक पर ममता अति भूरि॥। जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं। मातु चिराव कठिन की नाईं।।4।।

भावार्थ:-इसीलिये कृपानिधि उसे दूर कर देते हैं; क्योंकि सेवक पर उनकी बहुत ही अधिक ममता है। हे गोसाईं ! जैसे बच्चे के शरीर में फोड़ा हो जाता है, तो माता उसे कठोर हृदय की भाँति चिरा डालती है।।4।।

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवद बाल अधीर। ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर।।74क।।

भावार्थ:-यद्यपि बच्चा पहले (फोड़ा चिराते समय) दुःख पाता है और अधीर होकर रोता है, तो भी रोगके नाश के लिये माता बच्चे की उस पीड़ा को कुछ भी नहीं गिनती (उसकी परवा नहीं करती और फोड़े कों चिरवा ही डालती है)।। 74(क)।।

तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि। तुलसिदास ऐसे प्रभुद्ठि कस न भजहु भ्रम त्यागि।।74ख।।

भावार्थ:-उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दास का अभिमान उसके हितके लिये हर लेते हैं तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते।। 74(ख)।।

राम कृपा आपनि जड़ताई। कहरउँ खगेस सुनह मन लाई।।

भावार्थ:-जब जब राम मनुज तनु धरहीं। भक्त हेतु लीला बहु करहीं॥ हे पक्षिराज गरुड़जी ! श्रीरामजीकी कृपा और अपनी जड़ता (मूर्खता) की बात कहता हूँ, मन लगाकर सुनिये। जब-जब श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य शरीर धारण करते हैं और भक्तों के लिये बहुत-सी लीलाएँ करते हैं,।। ।

तब तब अवधपुरी मैं जाऊँ। बालचरित बिलोकि हरषाऊँ। जन्म महोत्सव देखरऊँ जाई। बरष पाँच तहैँ रहउँ लोभाई।।2।।

भावार्थ:-तब-तब मैं अयोध्यापुरी जाता हूँ और उनकी बाल लीला देखकर हर्षित होता हूँ। वहाँ जाकर मैं जन्म महोत्व देखता हूँ और [भगवान्‌ की शिशुलीलामें] लुभाकर पाँच वर्ष तक वहीं रहता हूँ।।2।।

इष्टदेव मम बालक रामा। सोभा बपुष कोटि सत कामा।। निज प्रभु बदन निहारि निहारी। लोचन सुफल कउँ उरगारी।।3।।

भावार्थ:-बालक रूप श्रीरामचन्द्रजी मेरे इष्ट देव हैं, जिनके शरीर में अरबों कामदेवों की शोभा है। हे गरुड़जी ! अपने प्रभु का मुख देख- देखकर मैं नेत्रों को सफल करता हूँ।।3।।

लघु बायस बपु धरि हरि संगा। देखउँ बालचरित बह रंगा।।4।।

भावार्थ:-छोटे-से कौए का शरीर धरकर और भगवान्‌ के साथ-साथ फिर कर मैं उनके भाँति-भाँति के बालचरित्रों को देखा करता हूँ।।4।।

लरिकाई जहैँ जहैँ फिरहिं तहैँ तहैँ संग उड़ाएँ। जूठनि परइ अजिर महूँ सो उठाइ करि खाउँ।।75क।।

भावार्थ:-लड़कपन में वे जहाँ-जहाँ फिरते हैं, वहाँ-वहाँ मैं साथ-साथ उड़ता हूँ और आँगन में उनकी जो जूठन पड़ती है, वही उठाकर खाता हूँ।। 75(क)।।

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर। सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर।।75ख।।

भावार्थ:-एक बार श्रीरघुबीर जी ने सब चरित्र बहुत अधिकता से किये। प्रभु की उस लीला का स्मरण करते ही काकभुशुण्डिजी का शरीर [प्रेमानन्दवश] पुलकित हो गया।। 75(ख)।।

कहइ भुसुंड सुनह खगनायक। राम चरित सेवक सुखदायक।। नृप मंदिर सुंदर सब भाँती। खचित कनक मनि नाना जाती।।१।

भावार्थ:-भुशुण्डिजी कहने लगे-हे पक्षिराज ! सुनिये, श्रीरामजी का चरित्र सेवकोंको सुख देनेवाला है। [अयोध्याका] राजमहल सब प्रकारसे सुन्दर है। सोने के महल में नाना प्रकार के रत्न जड़े हुए हैं।। ।।

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई। जहैँ खेलहिं नित चारिउ भाई।। बालबिनोद करत रघुराई। बिचरत अजिर जननि सुखदाई।।2।

भावार्थ:-सुन्दर आँगन का वर्णन नही किया जा सकता, जहाँ चारो भाई नित्य खेलते हैं। माताको सुख देनेवाले बाल-विनोद करते हुए श्रीरघुनाथजी ऑआँगनमें विचर रहे हैं।2।।

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा। अंग अंग प्रति छबि बहु कामा।। नव राजीव अरुन मृदु चरना। पदज रुचिर नख ससि दुति हरना।।3।।

भावार्थ:-मरकत मणि के समान हरिताभ श्याम और कोमल शरीर है। अंग-अंग में बहुत से काम देवों की शोभा छायी हुई है। नवीन [लाल] कमलके समान लाल-लाल कोमल चरण है। सुन्दर अँगुलियाँ हैं और नख अपनी ज्योति से चन्द्रमा की कान्ति को हरने वाले हैं।।3।

ललित अंक कुलिसादिक चारी। नूपुर चारु मधुर रवकारी॥ चारु पुरट मनि रचित बनाई। कटि किंकिन कल मुखर सुहाई।।4।।

भावार्थ:-[तलवे में] वज़ादि (वज्ध, अंकुश, ध्वजा और कमल) के चार सुन्दर चिह्न है। चरणों में मधुर शब्द करनेवाले सुन्दर नुपूर हैं। मणियों (रतों) से जड़ी हुई सोने की बनी हुई सुन्दर करधनीका शब्द सुहावना लग रहा है।।4।।

रेखा त्रय सुंदर उदर नाभी रुचिर गँभीर।। उर आयत शभ्राजत बिबिधि बाल बिभूषन चीर।।76।।

भावार्थ:-उदरपर सुन्दर तीन रेखाएँ (त्रिवली) हैं, नाभि सुन्दर और गहरी है। विशाल वक्षःस्थल पर अनेकों प्रकार के बच्चों के आभूषण और वस्त्र सुभोभित हैं।।76।।

अरुन पानि नख करज मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।। कंध बाल केहरि दर ग्रीवा। चारु चिबुक आनन छबि सींवा।। ।।

भावार्थ:-लाल-लाल हथेलियाँ, नख और अँगुलियाँ मनको हरने वाले है और विशाल भुजाओं पर सुन्दर आभूषण हैं। बालसिंह (सिंहके बच्चे) के-से कंधे और शंख के समान (तीन रेखाओं से युक्त) गला है। सुन्दर ठुट्डी है और मुख तो छवि की सीमा है।।१।।