श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून
श्रीरामचरितमानस

उत्तरकाण्ड · भाग ४

उत्तरकाण्ड · भाग ४ / ५
भाग ४ / ५
॥ श्लोक ॥

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं॥1॥

भावार्थ:-हे मोक्षस्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेदस्वरूप, ईशान दिशा के ईश्वर तथा सबके स्वामी श्रीशिवजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निजस्वरूप में स्थित (अर्थात्‌ मायादिरहित), [मायिक] गुणों से रहित, भेदरहित, इच्छारहित, चेतन आकाशरूप एवं आकाश को ही वस्त्ररूप में धारण करनेवाले दिगम्बर [अथवा आकाश को भी आच्छादित करनेवाले] आपको मैं भजता हूँ॥1॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं॥2॥

भावार्थ:-निराकार, ओंकार के मूल, तुरीय (तीनों गुणों से अतीत), वाणी, ज्ञान और इन्द्रियों से परे, कैलासपति, विकराल, महाकाल के भी काल, कृपालु, गुणों के धाम, संसार से परे आप परमेश्वर को मैं नमस्कार करता हूँ॥2॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा॥3॥

भावार्थ:-जो हिमाचल के समान गौरवर्ण तथा गम्भीर हैं, जिनके शरीर में करोड़ों कामदेवों की ज्योति एवं शोभा है, जिनके सिर पर सुन्दर नदी गंगाजी विराजमान हैं, जिनके ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा और गले में सर्प सुशोभित हैं॥3॥

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि॥4॥

भावार्थ:-जिनके कानों के कुण्डल हिल रहे हैं, सुन्दर भृकुटी और विशाल नेत्र हैं; जो प्रसन्नमुख, नीलकण्ठ और दयालु हैं; सिंहचर्म का वस्त्र धारण किये और मुण्डमाला पहने हैं; उन सबके प्यारे और सबके नाथ [कल्याण करनेवाले] श्रीशंकरजी को मैं भजता हूँ॥4॥

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं। त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं॥5॥

भावार्थ:-प्रचण्ड (रुद्ररूप), श्रेष्ठ, तेजस्वी, परमेश्वर, अखण्ड, अजन्मा, करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाशवाले, तीनों प्रकार के शूलों (दुःखों) को निर्मूल करनेवाले, हाथ में त्रिशूल धारण किये, भाव (प्रेम) के द्वारा प्राप्त होनेवाले भवानी के पति श्रीशंकरजी को मैं भजता हूँ॥5॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनानन्ददाता पुरारि। चिदानन्द संदोह मोहापहारि। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारि॥6॥

भावार्थ:-कलाओं से परे, कल्याणस्वरूप, कल्प का अन्त (प्रलय) करनेवाले, सज्जनों को सदा आनन्द देनेवाले, त्रिपुर के शत्रु, सच्चिदानन्दघन, मोह को हरनेवाले, मन को मथ डालनेवाले कामदेव के शत्रु, हे प्रभो ! प्रसन्न हूजिये, प्रसन्न हूजिये॥6॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं॥7॥

भावार्थ:-जबतक पार्वती के पति आपके चरणकमलों को मनुष्य नहीं भजते, तबतक उन्हें न तो इहलोक और परलोक में सुख-शान्ति मिलती है और न उनके तापों का नाश होता है। अतः हे समस्त जीवों के अन्दर (हृदय में) निवास करनेवाले प्रभो ! प्रसन्न हूजिये॥7॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो॥8॥

भावार्थ:-मैं न तो योग जानता हूँ, न जप और न पूजा ही। हे शम्भो ! मैं तो सदा-सर्वदा आपको ही नमस्कार करता हूँ। हे प्रभो ! बुढ़ापा तथा जन्म [मृत्यु] के दुःखसमूहों से जलते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिये। हे ईश्वर ! हे शम्भो ! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥8॥

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शंभुः प्रसीदति॥9॥

भावार्थ:-भगवान्‌ रुद्र की स्तुति का यह अष्टक उन शंकरजी की तुष्टि (प्रसन्नता) के लिये ब्राह्मण द्वारा कहा गया। जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक पढ़ते हैं, उनपर भगवान्‌ शम्भु प्रसन्न होते हैं॥9॥

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप। कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप।।07क।।

भावार्थ:-शिवजी का भयानक शाप सुनकर गुरुजीने हाहाकार किया। मुझे काँपता हुआ देखकर उनके हृदय में बड़ा संताप उत्पन्न हुआ।। 07(क)।।

करिं दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि।।407ख।।

भावार्थ:-प्रेम सहित दण्डवत्‌ करके वे ब्राह्मण श्रीशिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी भयंकर गति (दण्ड) का विचार कर गदूद वाणी से विनती करने लगे।। 07(ख)।।

सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि बिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।। 08क।।

भावार्थ:-सर्वज्ञ शिवजीने विनती सुनी और ब्राह्मण का प्रेम देखा। तब मन्दिर में आकाशवाणी हुई कि हे द्विजश्रेष्ठ ! वर माँगो।। 08(क)।।

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहू। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देह।।08ख।।

भावार्थ:-[ब्राह्मणने कहा-] हे प्रभो ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और हे नाथ ! यदि इस दीनपर आपका स्रेह है, तो पहले अपने चरणों की भक्ति देकर फिर दूसरा वर दीजिये।। 408(ख)।।

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।। तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।08ग।।

भावार्थ:-हे प्रभों यह अज्ञानी जीव आपकी माया के वश होकर निरन्तर भूला फिरता है। हे कृपा के समुद्र भगवान्‌ ! उसपर क्रोध न कीजिये।। 08(ग)।।

संकर दीनदयाल अब एहि पर होह कृपाल। साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।। 08घ।। हे दीनों पर दया करने वाले (कल्याणकारी) शंकर ! अब इसपर कृपालु होइये (कृपा कीजिये), जिससे हे नाथ ! थोड़े ही समय में इसपर शापके बाद अनुग्रह (शाप से मुक्ति) हो जाय।। 08(घ)।। एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करह अब कृपानिधाना।। बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।।

भावार्थ:-हे कृपा के निधान ! अब वही कीजिये, जिससे इसका परम कल्याण हो। दूसरेके हितसे सनी हुई ब्राह्मणकी वाणी सुनकर फिर आकाश वाणी हुई-एवमस्तु (ऐसा ही हो)।।१।।

जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्हि कोप करि सापा।। तदपि तुम्हारि साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।।2।।

भावार्थ:-यद्यपि इसने भयानक पाप किया है और मैंने भी इसे क्रोध करके शाप दिया है, तो भी तुम्हारी साधुता देखकर मैं इसपर विशेष कृपा करूँगा।।2।।

छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।। मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।। 3।।

भावार्थ:-हे द्विज ! जो क्षमाशील एवं परोपकारी होते हैं, वे मुझे वैसे ही प्रिय हैं जैसे खरारि श्रीरामचन्द्रजी । हे द्विज ! मेरा शाप व्यर्थ नहीं जायगा यह हजार जन्म अवश्य पावेगे।।3।

जनमत मरत दुसह दुख होई। एहि स्वल्पउ नहिं ब्यपिहि सोई।। कवनेउ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।।4।।

भावार्थ:-परन्तु जन्मने में और मरने में जो दुःसह दुःख होता है, इसको वह दुःख जरा भी न व्यापेगा और किसी भी जन्म में इसका ज्ञान नहीं मिटेगा। हे शूद्र ! मेरा प्रमाणिक (सत्य) बचन सुन।।4।।

रघुपति पुरी जन्म तव भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।। पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।।5।।

भावार्थ:-[प्रथम जो] तेरा जन्म श्रीरघुनाथजी की पुरी में हुआ। फिर तूने मेरी सेवा में मन लगाया। पुरी के प्रभाव और मेरी कृपासे तेरे हृदय में रामभक्ति होगी।।5।।

सुतु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।। अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेसु संत अनंत समाना।। 6।।

भावार्थ:-हे भाई ! अब मेरा सत्य वचन सुन। द्विजोंकी सेवा ही भगवान्‌ को प्रसन्न करने वाला ब्रत है। अब कभी ब्राह्मण का अपमान न करना। संतों को अनन्त श्रीभगवान्‌ ही के समान जानना।।6।।

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला॥ जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।।7॥।

भावार्थ:-इन्द्र के वज्र, मेरा विशाल त्रिशूल, कालके दण्ड और श्रीहरिके विकराल चक्रके मारे भी जो नहीं मरता, वह भी विप्रद्रोहीरूपी अग्ि से भस्म हो जाता है।।7॥।

अस बिबेक राखेह मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।8।।

भावार्थ:-ऐसा विवेक मन में रखना। फिर तुम्हारे लिये जगत्‌ में कुछ भी दुर्लभ न होगा। मेरा एक और भी आशीर्वाद है कि तुम्हारी सर्वत्र अबाध गति होगी (अर्थात्‌ तुम जहाँ जाना चाहोगे, वहीं बिना रोक-टोक के जा सकोगे)।।8।।

सुनि सिव बचन हरघि गुर एवमस्तु इति भाषि॥। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि।।09क।।

भावार्थ:-[आकाशवाणीके द्वारा] शिवजी के वचन गुरुजी सुनकर हर्षित होकर ऐसा ही हो यह कहकर मुझे बहुत समझाकर और शिवजी के चरणोको हृदय में रखकर अपने घर गये।। 09(क)।।

प्रेरित काल बिंधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल। पुनि प्रयास बिनु सो तनु तजेउँ गएँ कछू काल।।09ख।।

भावार्थ:-काल की प्रेरणासे मैं विन्ध्याचलमें जाकर सर्प हुआ। फिर कुछ काल बीतने पर बिना ही परिश्रम (कष्ट) के मैंने वह शरीर त्याग दिया।। 09(ख)।।

जोइ तनु धउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान।। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान।।09ग।।

भावार्थ:-हे हरिवाहन ! मैं जो भी शरीर धारण करता, उसे बिना ही परिश्रम वैसे ही सुखपूर्वक त्याग देता था जैसे मनुष्य पुराना वस्त्र त्याग देता है और नया पहिन लेता है।।

409(ग)। सिउँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस। एहि बिधि धरेउँ बिबिधि तनु ग्यान न गयउ खगेस।।09घ।।

भावार्थ:-शिवजीने वेदकी मर्यादा की रक्षा की और मैंने क्लेश भी नहीं पाया। इस प्रकार हे पक्षिराज ! मैंने बहुत-से शरीर धारण किये, पर मेरा ज्ञान नहीं गया।। 09(घ)।।

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरऊँ। तहैँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।।

भावार्थ:-एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ॥ तिर्यक्‌ योनि (पशु-पक्षी) देवता या मनुष्य का, जो भी शरीर धारण करता, वहाँ-वहाँ (उस-उस शरीरमें) मैं श्रीरामजी का भदजन जारी रखता। [इस प्रकार मैं सुखी हो गया ] परन्तु एक शूल मुझे बना रहा। गुरुजी का कोमल, सुशील स्वभाव मुझे कभी नहीं भूलता (अर्थात्‌ मैंने ऐसा कोमल स्वभाव दयालु गुरुका अपमान किया, यह दुःख मुझे सदा बना रहा)।4।।

चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।। खेलऊँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।।2।

भावार्थ:-मैंने अन्तिम शरीर ब्राह्मण का पाया, जिसे पुराण और वेद देवताओं को भी दुर्लभ बताते हैं। मैं वहाँ (ब्राह्मण-शरी रमें) भी बालकोंमें मिलकर खेलता तो श्रीरघुनाथजीकी ही सब लीलाएँ किया करता।।2।।

प्रौह भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझरऊँ सुनऊँ गुनउँ नहिं भावा।। मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।।3।।

भावार्थ:-सयाना होनेपर पिता जी मुझे पढ़ाने लगे। मैं समझता, सुनता और विचारता, पर मुझे पढ़ना अच्छा नहीं लगता था। मेरे मन से सारी वासनाएँ भाग गयीं। केवल श्रीरामजी के चरणों में लव लग गयी।।3।

कह खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।। प्रेम मगन मोहि कछ्ध न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।।4।।

भावार्थ:-हे गरुड़जी ! कहिये, ऐसा कौन अभागा होगा जो कामधेनु को छोड़कर गदहीकी सेवा करेगा ? प्रेममें मय रहने के कारण मुझे कुछ भी नहीं सुहाता। पिताजी पढ़ा-पढ़ाकर हार गये।।4।।

भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयरउँ भजन जनत्राता॥ जहूँ तहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।।5।।

भावार्थ:-जब पिता-माता कालवाश हो गये (मर गये), तब मैं भक्तों की रक्षा करनेवाले श्रीरामजीका भजन करने के लिये वन में चलता गया। वन में जहाँ-जहाँ मुनीश्वरों के आश्रम पाता वहाँ-वहाँ जा- जाकर उन्हें सिर नवाता।।5।।

बूझउँ तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनऊउँ हरषित खगनाहा।। सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।।6।।

भावार्थ:-उनसे मैं श्रीरामजी के गुणों की कथाएँ पूछता। वे कहते और मैं हर्षित होकर सुनता। इस प्रकार मैं सदा-सर्वदा श्रीहरि के गुणानुवाद सुनता फिरता। शिवजी की कृपासे मेरी सर्वत्र अबाधित गति थी (अर्थात्‌ मैं जहाँ चाहता वहीं जा सकता था)।। 6।।

छूटी त्रिबिधि ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी। राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।।7।।

भावार्थ:-मेरी तीनों प्रकार की (पुत्रकी, धनकी और मानकी) गहरी प्रबल वासनाएँ छूट गयीं। और हृदय में एक ही लालसा अत्यन्त बढ़ गयी कि जब श्रीरामजीके चरणकमलों के दर्शन करूँ तब अपना जन्म सफल हुआ समझूँ।।7।।

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।। निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।8।

भावार्थ:-जिनसे मैं पूछता, वे ही मुनि ऐसा कहते कि ईश्वर सर्वभूतमय है। यह निर्गुण मत मुझे नहीं सुहाता था। हृदय में सगुण ब्रह्मपर प्रीति बढ़ रही थी।।8।।

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिउँ छन छन नव अनुराग।।40क।।

भावार्थ:-गुरुजीके वचनों का स्मरण करके मेरा मन श्रीरामजीके चरणों में लग गया। मैं क्षण-क्षण नया-नया प्रेम प्राप्त करता हुआ श्रीरघुनाथजीका यश गाता फिरता था।। 0(क)।।

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायऊउँ बचन कहेउऊँ अति दीन।।0ख।।

भावार्थ:-सुमेरुपर्वतके शिखरपर बड़ी छाया में लोमश मुनि बैठे थे। उन्हें देखकर मैंने उनके चरणों में सिर नवाया और अत्यन्त दीन वचन कहे।। 40(ख)।।

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज।।40ग।।

भावार्थ:-हे पक्षिराज ! मेरे अत्यन्त नम्र और कोमल वचन सुनकर कृपालु मुनि मुझसे आदरके साथ पूछने लगे-हे ब्राह्मण ! आप किस कार्य से यहाँ आये हैं।। 40(ग)।।

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान।। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहटह् भगवान।। घ।।

भावार्थ:-तब मैंने कहा हे कृपानिधि ! आप सर्वज्ञ हैं और सुजान है। है भगवान्‌ ! मुझे सगुण ब्रह्मकी आराधना [की प्रक्रिया] कहिये। 40(घ)।।

तब मुनीस रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।। ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानी। मोहि परम अधिकारी जानी।। ।

भावार्थ:-तब हे पक्षिराज ! मुनीश्वर ने श्रीरघुनाथजी के गुणों की कुछ कथाएँ आदर सहित कहीं। फिर वे ब्रह्मज्ञानपरायण विज्ञानवान्‌ मुनि मुझे परम अधिकारी जानकर-॥ लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्रैत अगुन हृदयेसा।।

अकल अनीह अनाम अरूपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।।2।।

भावार्थ:-ब्रह्मका उपदेश करने लगे कि वह अजनमा है, अद्वैत है, निर्गण है और हृदय का स्वामी (अन्तर्यामी) है। उसे कोई बुद्धि के द्वारा माप नहीं सकता, वह इच्छारहित, नामरहित, रूपरहित, अनुभवसे जानने योग्य, अखण्ड और उपमारहित है,।।2।।

मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहिं बेदा।।3।

भावार्थ:-वह मन और इन्द्रियों से परे, निर्मल, विनाशरहित, निर्विकार, सीमारहित और सुख की राशि है। वेद ऐसा गाते हैं कि वही तू है (तत्त्वमसि), जल और जल की लहर की भाँति उसमें और तुझमें कोई भेद नहीं है।।3।।

बिबिधि भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम ह्ृदयँ न आवा॥ पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहह् मुनीसा।।4।।

भावार्थ:-मुनिने मुझे अनेकों प्रकार से समझाया, पर निर्गुण मत मेरे हृदय में नहीं बैठा। मैंने फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर कहा-हे मुनीश्वर ! मुझे सगुण ब्रह्म की उपासना कह्िये।।4।।

राम भगति जन मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। सोइ उपदेस कहट्ट करि दाया। निज नयनन््हि देखौं रघुराया।।5।।

भावार्थ:-मेरा मन राम भक्तिरूपी जलमें मछली हो रहा है [उसीमें रम रहा है]। हे चतुर मुनीश्वर ! ऐसी दशा में वह उससे अलग कैसे हो सकता है ? आप दया करके मुझे वही उपदेश (उपाय) कह्हिये जिससे मैं श्रीरघुनाथजीको अपनी आँखोंसे देख सकूँ।।5।।

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहर्उँ निर्गुन उपदेसा।। मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।।6।।

भावार्थ:-[पहले] नेत्र भरकर श्रीअयोध्यानाथ को देखकर, तब निर्गणका उपदेश सुनूँगा। मुनिने फिर अनुपम हरिकथा कहकर, सगुण मतका खण्डन करके निर्गुण का निरूपण किया।। 6।।

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपऊँ करि हठ भूरी।। उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्‍्हा।।7॥।

भावार्थ:-तब मैं निर्गुण मत को हटाकर (काटकर) बहुत हठ करके सगुणका निरूपण करने लगा। मैंने उत्तर-प्रत्युत्तर किया, इससे मुनिके शरीरमें क्रोध के चिह्न उत्पन्न हो गये।। 7।।

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।। अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।8।।

भावार्थ:-हे प्रभो ! सुनिये, बहुत अपमान करने पर ज्ञानी के भी हृदय में क्रोध उत्पन्न हो जाता है यदि कोई चन्दन की लकड़ी को बहुत अधिक रगड़े, तो उससे भी अग्ि प्रकट हो जायगी।।8।।

बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान। मैं अपनें मन बैठ तब कउँ बिबिधि अनुमान।। 4क।।

भावार्थ:-मुनि बार-बार क्रोध सहित ज्ञानका निरूपण करने लगे। तब मैं बैठा-बैठा अपने मनमें अनेकों प्रकारके अनुमान करने लगा।। 7(क)।।

क्रोध कि ट्रैतबुद्धि बिनु ट्रैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान।।4ख।।

भावार्थ:-बिना ट्रैतबुद्धिके क्रोध कैसा और बिना अज्ञानके कया ट्रैतबुद्धि हो सकती है ?माया के वश रहने वाला परिच्छिन्न जड़ जीव क्या ईश्वर के समान हो सकता है ?।। 77(ख)।।

कबहूँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।। परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।। ।।

भावार्थ:-सबका हित चाहने से क्या कभी दुःख हो सकता है ? जिसके पास पारसमणि है, उसके पास क्या दरिद्रता रह सकती है ? दूसरे से द्रोह करनेवाले क्या निर्भय हो सकते हैं? और कामी क्या कलंकरहित (बेदाग) रह सकते हैं ?।।१।।

बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरुपहिं चीन्हें।। काह् सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।।2।

भावार्थ:-ब्राह्मण का बुरा करने से क्या वंश रह सकता है ? स्वरूपकी पहिचान (आत्मज्ञान) होने पर क्या [आसक्तिपूर्वक] कर्म हो सकते हैं? दुष्टोंके संगसे क्या किसीके सुबुद्धि उत्पन्न हुई है ? परस्त्रीगामी क्या उत्तम गति पा सकता है ?।2।।

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहूँ हरिनिंदक।। राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।।3।।

भावार्थ:-परमात्मा को जानने वाले कहीं जन्म-मरण [के चक्कर] में पड़ सकते हैं? भगवान्‌ की निन्‍्दा करनेवाले कभी सुखी हो सकते हैं ? नीति बिना जाने क्या राज्य रह सकता है ? श्रीहरिके चरित्र वर्णन करनेपर क्या पाप रह सकते हैं ?।।3।।

पावन जस कि पुन्य होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।। लाभु कि किछि हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।।4।।

भावार्थ:-बिना पुण्य के क्या पवित्र यश [प्राप्त] हो सकता है ? बिना पापके भी क्या कोई अपयश पा सकता है ? जिसकी महिमा वंद संत और पुराण गाते हैं उस हरि-भक्ति के समान क्या कोई दूसरा भी है ?।04।।

हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।। अघ कि पिसुनता सम कछ्ध आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।।5।।

भावार्थ:-हे भाई ! जगत्‌ में क्या इसके समान दूसरी भी कोई हानि है कि मनुष्य का शरीर पाकर भी श्रीरामजीका भजन न किया जाय ? चुगलखोरी के समान क्या कोई दूसरा पाप है ? और हे गरुड़जी ! दया के समान क्या कोई दूसरा धर्म है ?॥5।।

एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनरऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ॥। पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।। 6।।

भावार्थ:-इस प्रकार मैं अनगिनत युक्तियाँ मन में विचारता था और आदर के साथ मुनिका उपदेश नहीं सुनता था। जब मैंने बार-बार सगुण का पक्ष स्थापित किया, तब मुनि क्रोधयुक्त वचन बोले-।6।।

मूढ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहू आनसि।। सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।।7॥

भावार्थ:-अरे मूढ़ ! मैं तुझे सर्वोत्तम शिक्षा देता हूँ, तू भी तो उसे हीं मानता और बहुत-से उत्तर प्रत्युत्तर (दलीलें) लाकर रखता है। मेरे सत्य वचन पर विस्वास नहीं करता ! कौए की भाँति सभी से डरता है।।7।।

सठ स्वपच्छ तव ह्ृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।। लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछू भय न दीनता आई।।8।।

भावार्थ:-अरे मूर्ख ! तेरे हृदय में अपने पक्ष का बड़ा भारी हठ है अतः तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनन्द के साथ मुनि के श्राप को सिर पर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आयी।।8।।

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।। सुमिरि राम रघुबंस मनि हरघित चलेउँ उड़ाइ।।2क।।

भावार्थ:-तब मैं तुरन्त ही कौआ हो गया। फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर और रघुकुलशिरोमणि श्रीरामजीका स्मरण करके मैं हर्षित होकर उड़ चला।। 2(क)।।

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।।42ख।।

भावार्थ:-[शिव जी कहते है-] हे उमा ! जो श्रीहरिके चरणों के प्रेमी हैं, और काम, अभिमान तथा क्रोध से रहित हैं, वे जगत्‌ को अपने प्रभु से भरा हुआ देखते हैं, फिर वे किससे वैर करें।। 442(ख)।।

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।। कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी।। ।।

भावार्थ:-[काकभुशुण्डिजीने कहा-] हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये, इसमें ऋषिका कुछ भी दोष नहीं था। रघुवंशके विभूषण श्रीरामजी ही सबके हृदय में प्रेरणा करनेवाले हैं। कृपासागर प्रभु ने मुनिकी बुद्धिको भोली करके (भुलावा देकर) मेरे प्रेम की परी क्षा ली।।।।

मन बच क्रम मोहि जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।। रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।।2।।

भावार्थ:-मन, वचन और कर्म से जब प्रभु ने मुझे अपना दास जान लिया तब भगवान्‌ ने मुनि की बुद्धि फिर से पलट दी। ऋषिने मेरा महान्‌ पुरुषों को-सा स्वभाव (धैर्य, अक्रोध विनय आदि) और श्रीरामजीके चरणोंमें विशेष विश्वास देखा।।2।।

अति बिसमय पुनि पुनि पद्धिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।। मम परितोष बिबिधि बिधि कीन्हा। हरघषित राममंत्र तब दीन्हा।।3।।

भावार्थ:-तब मुनि ने बहुत दुःख के साथ बार-बार पछताकर मुझे आदरपूर्वक बुला लिया। उन्होंने अनेकों प्रकार से मेरा सन्तोष किया और तब हर्षित होकर मुझे राममन्त्र दिया।।3।।

बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।। सुंदर सुखद मोहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।।4।।

भावार्थ:-कृपानिधान मुनि ने मुझे बालकरूप श्रीरामजीका ध्यान (ध्यान की विधि) बतलाया। सुन्दर और सुख देनेवाला यह ध्यान मुझे बहुत ही अच्छा लगा। वह ध्यान मैं आपको पहले ही सुना चुका हूँ।।4।।

मुनि मोहि कछुक काल तहैँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा।। सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।।5।।

भावार्थ:-मुनि ने कुछ समय तक मुझको वहाँ (अपने पास) रक्‍्खा। तब उन्होंने रामचरित मानस वर्णन किया। आदरपूर्वक मुझे यह कथा सुनाकर फिर मुनि मुझसे सुन्दर वाणी बोले।।5।।

रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।। तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।। 6।।

भावार्थ:-हे तात ! यह सुन्दर और गुप्त रामचरितमानस मैंने शिवजी की कृपा से पाया था। तुम्हें श्रीरामजी का 'निज भक्त' जाना, इसीसे मैंने तुमसे सब चरित्र विस्तार के साथ कहा।। 6।।

राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहूँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।। मुनि मोहि बिबिधि भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।।7॥।

भावार्थ:-हे तात ! जिनके हृदय में श्रीरामजी का भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी नहीं कहना चाहिये। मुनि ने मुझे बहुत प्रकार से समझाया। तब मैंने प्रेम के साथ मुनि के चरणों में सिर नवाया।।7।।

निज कर कमल परसि मम सीसा। हषित आसिष दीन्ह मुनीसा।। राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।।8।।

भावार्थ:-मुनीश्वर ने अपने कर-कमलोंसे मेरा सिर स्पर्श करके हर्षित होकर आशीर्वाद दिया कि अब मेरी कृपासे तेरे हृदय में सदा प्रगाढ़ राम-भक्ति बसेगी।।8।।

सदा राम प्रिय होह तुम्ह सुभ गुन भवन अमान। कामरूप इच्छामरन ग्यान बिराग निधान।।3क।।

भावार्थ:-तुम सदा श्रीरामजीको प्रिय होओ और कल्याण रूप गुणोंके धाम, मानरहित इच्छानुसार रूप धारण करनेमें समर्थ, इच्छामृत्यु (जिसकी शरीर छोड़नेकी इच्छा करने पर ही मृत्यु हो, बिना इच्छाके मृत्यु न हो), एवं ज्ञान और वैराग्य के भण्डार होओ।। 3(क)।।

जेहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत। ब्यापिह्धि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत।। 443ख।। इतना ही नहीं, श्रीभगवान्‌ को स्मरण करते हुए तुम जिस आश्रम में निवास करोगे वहाँ एक योजन (चार कोस) तक अविद्या (माया-मोह) नहीं व्यापेगी।। 3(ख)।। काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहिस काऊ।। राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।।4।।

भावार्थ:-काल, कर्म, गुण दोष और स्वभाव से उत्पन्न कुछ भी दुःख तुमको कभी नहीं व्यापेगा। अनेकों प्रकार से सुन्दर श्रीरामजी के रहस्य (गुप्त मर्म के चरित्र और गुण) जो इतिहास और पुराणोंमें गुप्त और प्रकट हैं (वर्णित और लक्षित हैं)।।।।

बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।। जो इच्छा करिहह मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।।2।।

भावार्थ:-तुम उन सबको भी बिनाही परिश्रम जान जाओगे। श्रीरामजी के चरणोंमें तुम्हारा नित्य नया प्रेम हो। अपने मनमें तुम जो कुछ इच्छा करोगे, श्रीहरिकी कृपा से उसकी पूर्ति कुछ भी दुर्लभ नहीं होगी।।2।।

सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।। एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।।3।।

भावार्थ:-हे धीरबुद्धि गरुड़जी ! सुनिये, मुनिका आशीर्वाद सुनकर आकाशमें गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई कि हे ज्ञानी मुनि तुम्हारा वचन ऐसा ही (सत्य) हो। यह कर्म, मन और वचन से मेरा भक्त है।।3।।

सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।। करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिर नाई।।4।।

भावार्थ:-आकाशवाणी सुनकर मुझे बड़ा हर्ष हुआ। मैं प्रेम में मय्र हो गया और मेरा सब सन्देह जाता रहा। तदनन्तर मुनिकी विनती करके, आज्ञा पाकर और उनके चरणकमलों में बार-बार सिर नवाकर-।।4।

हरष सहित एहिं आश्रम आयर। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायँ।। इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।।5।।

भावार्थ:-मैं हर्षिसहित इस आश्रममें आया। प्रभु श्रीरामजीकी कृपासे मैंने दुर्लभ वर पा लिया। हे पक्षिराज ! मुझे यहाँ निवास करते सत्ताईस कल्प बीत गये।।5।।

करऊउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।। जब जब अवधपुरी रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।। 6।।

भावार्थ:-मैं यहाँ सदा श्रीरघुनाथजी के गुणों का गान किया करता हूँ और चतुर पक्षी उसे आदरपूर्वक सुनते हैं। अयोध्यापुरीमें जब-जब श्रीरघुवीर भक्तों के [हितके] लिये मनुष्यशरीर धारण करते हैं,।।6।।

तब तब जाइ राम पुर रहउँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।। पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।। 7।।

भावार्थ:-तब-तब मैं जाकर श्रीरामजी की नगरी में रहता हूँ और प्रभु की शिशु लीला देखकर सुख प्राप्त करता हूँ। फिर हे पक्षिराज ! श्रीरामजीके शिशुरूपको हृदय में रखकर मैं अपने आश्रममें आ जाता हूँ।।7॥।

कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।। कह्ठिउँ तात सब प्रस्र तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।।8।।

भावार्थ:-जिस कारण से मैंने कौए की देह पायी, वह सारी कथा आपको सुना दी। हे तात ! मैंने आपके सब प्रश्नों के उत्तर कहे। अहा ! राभक्तिकी बड़ी भारी महिमा है।।8।।

ताते यह प्रन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह। निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह।। 4क।।

भावार्थ:-मुझे अपना यह काक शरीर इसिलिये प्रिय है कि इसमें मुझे श्रीरामजीके चरणों का प्रेम प्राप्त हुआ। इसी शरीर से मैंने अपने प्रभु के दर्शन पाये और मेरे सब सन्देह जाते रहे (दूर हुए)।। 4 (क)।।

मासपारायण, उन्तीसवाँ विश्राम

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप।मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप।।4ख।।

भावार्थ:-मैं हठ करके भक्तिपक्ष पर अड़ रहा, जिससे महिर्ष लोमश ने मुझेशाप दिया। परंतु उसका फल यह हुआ कि जो मुनियों को भीदुलर्भ है, वह वरदान मैंने पाया। भजनका प्रताप तो देखिये।। 4(ख)।।

जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।।

भावार्थ:-ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी॥ जो भक्ति की ऐसी महिमा जानकर भी उसे छोड़ देते हैं और केवल ज्ञान के लिये श्रम (साधन) करते हैं, वे मूर्ख घर पर पड़ी हुई कामधेनु को छोड़कर दूध के लिये मदार के पेड़ को खोजते फिरते हैं।। 4।

सुतु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।। ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहृहिं जड़ करनी।।2।

भावार्थ:-हे पक्षिराज ! सुनिये, जो लोग श्री हरिकी भक्ति छोड़कर दूसरे उपायों से सुख चाहते हैं, वे मूर्ख और जड़ करनीवाले (अभागे) बिना ही जहाजके तैरकर महासमुद्र के पार जाना चाहते हैं।।2।।

सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।। तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।।3।

भावार्थ:-[शिव जी कहते हैं] हे भवानी ! भुशुण्डिके वचन सुनकर गरुड़जी हर्षित होकर कोमल वाणीसे बोले-हे प्रभो ! आपके प्रसादसे मेरे हृदय में अब सन्देह, शोक, मोह और भ्रम कुछ भी नहीं रह गया।।3।

सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।। एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहह बुझाइ कृपानिधि मोही।।4।।

भावार्थ:-मैंने आपकी कृपा से श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र गुणों समूहों को सुना और शान्ति प्राप्त की। हे प्रभो ! अब मैं आपसे एक बात और पूछता हूँ, हे कृपासागर ! मुझे समझाकर कह्िये।।4।।

कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना।। सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेह भगति की नाईं।।5।।

भावार्थ:-संत मुनि वेद और पुराण यह कहते हैं कि ज्ञान के समान दुर्लभ कुछ भी नहीं है। हे गोसाईं ! वही ज्ञान मुनिने आपसे कहा; परंतु आपने भक्तिके समान उसका आदर नहीं किया।।5।।

ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहह्ट प्रभु कृपा निकेता।। सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना।।6।।

भावार्थ:-हे कृपा धाम ! हे प्रभो ! ज्ञान और भक्तिमें कितना अन्तर है ? यह सब मुझसे कहिये। गरुड़जी के वचन सुनकर सुजान काकभुशुण्डिजीने सुख माना और आदरके साथ कहा-।।6।।

भगतिहि ग्यानहिं नहिं कछ भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।। नाथ मुनीस कहहिं कछू अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगब।।7॥।

भावार्थ:-भक्ति और ज्ञान में कुछ भी भेद नहीं है। दोनों ही संसार से उत्पन्न क्लेशों को हर लेते हैं। हे नाथ ! मुनीश्वर इसमें कुछ अंतर बतलाते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ ! उसे सावधान होकर सुनिये।।7।।

ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनह हरिजाना।। पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।।8।।

भावार्थ:-हे हरिवाहन ! सुनिये ; ज्ञान, वैराग्य, योग, विज्ञान-ये सब पुरुष हैं; पुरुषका प्रताप सब प्रकार से प्रबल होता है। अबला (माया) स्वाभाविक ही निर्बल और जाति (जन्म) से ही जड़ (मूर्ख) होती है।।8।।

पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।775क।।

भावार्थ:-परंतु जो वैराग्यवान्‌ और धीरबुद्धि पुरुष हैं वही स्त्री को त्याग सकते हैं, न कि वे कामी पुरुष जो विषयों के वश में है। (उनके गुलाम हैं) और श्रीरघुवीरके चरणों से विमुख हैं।। 5(क)।।

सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्तु माया प्रगट।। 5ख।।

भावार्थ:-वे ज्ञान के भण्डार मुनि भी मृगनयनी (युवती स्त्री) के चन्द्रमुखको देखकर विवश (उसके अधीन) हो जाते हैं। हे गरुड़जी ! साक्षात्‌ भगवान्‌ विष्णुकी की माया ही स्त्रीरूप से प्रकट है।। 5(ख)।।

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।। मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।। ५॥।

भावार्थ:-यहाँ मैं कुछ पक्षपात नहीं रखता। वेद, पुराण और संतों का मत (सिद्धांत) ही कहता हूँ। हे गरुड़जी ! यह अनुपम (विलक्षण) रीति है कि एक स्त्री के रूप पर दूसरी स्त्री मोहित नहीं होती॥ माया भगति सुनह तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।।
॥ चौपाई ॥

पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।।2।।

भावार्थ:-आप सुनिये, माया और भक्ति-ये दोंनों ही स्त्रीवर्ग हैं; यह सब कोई जानते हैं। फिर श्रीरघुनाथजी को भक्ति प्यारी है। माया बेचारी तो निश्चय ही नाचने वाली (नटिनीमात्र) है।।2।।

भगतहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया। राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।।3।

भावार्थ:-श्रीरघुनाथजी भक्तिके विशेष अनुकूल रहते हैं। इसी से माया उससे अत्यन्त डरती रहती है। जिसके हृदय में उपमा रहित और उपाधिरहित (विशुद्ध) रामभक्ति सदा बिना किसी बाधा (रोक- टोक) के बसती है;।।3।।

तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।। अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहिं भगति सकल सुख खानी।।4।।

भावार्थ:-उसे देखकर माया सकुचा जाती है। उस पर वह अपनी प्रभुता कुछ भी नहीं कर (चला) सकती। ऐसा विचार कर ही जो विज्ञानी मुनि हैं, वे सभी सुखों की खनि भक्ति की ही याचना करते हैं।।4।।
॥ दोहा ॥

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ॥ जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहूँ मोह न होइ।।46क।।

भावार्थ:-श्रीरघुनाथजी का यह रहस्य (गुप्त मर्म) जल्दी कोई भी नहीं जान पाता। श्रीरघुनाथजी की कृपा से जो इसे जान जाता है, उसे स्वप्न में भी मोह नहीं होता।। 6(क)।।

और, ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन।। 46ख।।

भावार्थ:-हे सुचतुर गरुड़जी ! ज्ञान और भक्ति का और भी भेद सुनिये, जिसके सुनने से श्रीरामजी के चरणों में सदा अविच्चछिन्न (एकतार) प्रेम हो जाता है।। 46(ख)।।

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।।

भावार्थ:-ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥ हे तात ! यह अकथनीय कहानी (वार्ता) सुनिये। यह समझते ही बनती है, कही नहीं जा सकती। जीव ईश्वर का अंश है। [अतएव] वह अविनाशी, चेतन, निर्मल और स्वभाव से ही सुख की राशि है।।।।

सो मायावश भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाईं।। जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।2।।

भावार्थ:-हे गोसाईं ! वह माया के वशी भूत होकर तोते और वानों की भाँति अपने-आप ही बँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतन में ग्रन्थि (गाँठ) पड़ गयी। यद्यपि वह ग्रन्थि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटने में कठिनता है।।2।

तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।। श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।3॥।

भावार्थ:-तभी से जीव संसारी (जन्मने-मरनेवाला) हो गया। अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणों ने बहुत-से उपाय बतलाये हैं, पर वह (ग्रंथि) छूटती नहीं वरं अधिकाधिक उलझती ही जाती है।।3॥।

जीव ह्वृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।। अस संजोग ईस जब करई। तबहूँ कदाचित सो निरुअरई।।4।।

भावार्थ:-जीवे के हृदय में अज्ञान रूप अन्धकार विशेष रूप से छा रहा है, इससे गाँठ देख ही नहीं पड़ती, छूटे तो कैसे ? जब कभी ईश्वर ऐसा संयोग (जैसा आगे कहा जाता है) उपस्थित कर देते हैं तब भी वह कदाचित्‌ ही वह (ग्रन्थि) छूट पाती है।।4।।

सात््विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदय बस आई।। जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।।5।।

भावार्थ:-श्रीहरि की कृपा से यदि सात्त्विकी श्रद्धारूपी सुन्दर गौ हृदयरूपी घरमें आकर बस जाय; असंख्यों जप, तप, व्रत, यम और नियमादि शुभ धर्म और आचार (आचरण), जो श्रुतियों ने कहे हैं,।।5।।

तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई॥ नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।। 6।।

भावार्थ:-उन्हीं [धर्माचाररूपी] हरे तृणों (घास) को जब वह गौ चरे और आस्तिक भावरूपी छोटे बछड़े को पाकर वह पेन्हावे। निवृत्ति (सांसारिक बिषयोंसे और प्रपंच से हटना) नोई (गौके दुतहे समय पिछले पैर बाँधने की रस्सी) है, विश्वास [दूध दूहनेका] बरतन है, निर्मल (निष्पाप) मन जो स्वयं अपना दास है। (अपने वशभमें है), दुहनेवाला अहीर है।।6।।

परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई॥ तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।।7।।

भावार्थ:-हे भाई ! इस प्रकार (धर्माचारमें प्रवृत्त सात््विकी श्रद्धा रूपी गौसे भाव, निवृत्ति और वश में किये हुए निर्मल मन की यहायता से) परम धर्ममय दूध दुहकर उसे निष्काम भावरूपी अग्रि पर भलीभाँति औटावे। फिर क्षमा और संतोष रूपी हवा से उसे ठंढा करे और धैर्य तथा शम (मनका निग्रह) रूपी जामन देकर उसे जमावे।।7।।

मुदिताँ मथै बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी॥। तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।8।।

भावार्थ:-तब मुदिता (प्रसन्नता) रूपी कमोरी में तत्त्वविचाररूपी मथानीसे दम (इन्द्रिय-दमन) के आधार पर (दमरूपी खम्भे आदि के सहारे) सत्य और सुन्दर वाणीरुपी रस्सी लगाकर उसे मथे और मथकर तब उसमें से निर्मल, सुन्दर और अत्यन्त पवित्र बैराग्यरूपी मक्खन निकाल ले।।8।।

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावै ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।47क।।

भावार्थ:-तब योग रुपी अग्ि प्रकट करके उसमें समस्त शुभाशुभ कर्मरूपी ईंधन लगा दे (सब कर्मोको योगरूपी अग्िमें भस्म कर दे)। जब [वैराग्यरूपी मक्खन का] ममता रूपी मल जल जाय, तब [बचे हुए] ज्ञानरूपी घी को निश्चयात्मिका बुद्धि ठंडा करे॥47(क)॥ तब बिग्यानरूपिनी बुद्धि बिसद घृत पाइ॥ चित्त दिया भरि धरै दूढ़ समता दिअटि बनाइ।।7ख।। तब विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस [ज्ञानरूपी] निर्मल घी को पाकर चित्तरूपी दियेको भरकर, समता की दीवट बनाकर उसपर उसे दूढ़तापूर्वक (जमाकर) रक्खे।। 7(ख)।।

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काह़ि। तूल तुरीय सैँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।। 7ग।।

भावार्थ:-[जाग्रत्‌ स्वप्र और सुषुप्ति] तीनों अवस्थाएँ और [सत्त्व, रज और तम] तीनों गुणरूपी कपाससे तुरीयावस्थारूपी रूईको निकालकर और फिर उसे सँवारकर उसकी सुन्दर कड़ी बत्ती बनावें।। 7(ग)।।

एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय। जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।47घ।।

भावार्थ:-इस प्रकार तेज की राशि विज्ञानमय दीपक को जलावे, जिसके समीप जाते ही मद आदि सब पतंगे जल जायेँ।। 7(घ)।।

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।। आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।।।।

भावार्थ:-सोऽहमस्मि (वह ब्रह्म मैं ह) यह तो अखण्ड (तैलधारावत्‌ कभी न टूटनेवाली) वृति है, वही [उस ज्ञानदीपककी] परम प्रचण्ड दीपशिखा (लौ) है। [इस प्रकार] जब आत्मानुभवके सुखका सुन्दर प्रकाश फैलता है, तब संसार के मूल भेद रूपी भ्रमका नाश हो जाता है।। 4।। प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तग मिटइ अपारा॥।

तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गूँह बैठि ग्रंथि निरुआरा।।2।।

भावार्थ:-और महान्‌ बलवती अविद्या के परिवार मोह आदि का अपार अन्धकार मिट जाता है। तब वही (विज्ञानरूपिणी) बुद्धि [आत्मानुभवरूप] प्रकाश को पाकर ह्ृदयरूपी घरमें बैठकर उस जड़-चेतन की गाँठ को खोलती है।2।।

छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।। छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्र अनेक करइ तब माया।।3।।

भावार्थ:-यदि वह विज्ञानरूपिणी बुद्धि उस गाँठको खोलने पावे, तब यह जीव कृतार्थ हो। परंतु हे पक्षिराज गरुड़जी ! गाँठ खोलते हुए जानकर माया फिर अनेकों विज्न करती है।।3॥।

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई।। कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुन्ावहिं दीपा।।4।।

भावार्थ:-हे भाई ! वह बहुत-सी ऋद्धि-सिद्धियों को भेजती है, जो आकर बुद्धि को लोभ दिखाती है। और वे ऋद्धि-सिद्धियाँ कल (कला), बल और छल करके समीप जाती और आँचल की वायु से उस ज्ञानरूपी दीपकको बुझा देती हैं।।4।।

होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।। जौं तेहि बिघ्र बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।।5।।

भावार्थ:-यदि बुद्धि बहुत ही सयानी हुई तो वह उन (ऋद्धि-सिद्धियों) को अहितकर (हानिकर) समझाकर उनकी और ताकती नहीं। इस प्रकार यदि माया के विद्वों से बुद्धि को बाधा न हुई, तो फिर देवता उपाधि (विज्न) करते हैं।।5।।

इंद्री द्वार झरोखा नाना। तहैँ तहैँ सुर बैठे करि थाना।। आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देहिं कपाट उघारी।।6।।

भावार्थ:-इन्द्रियों के द्वारा हृदय रूपी घरके अनेकों झरोखे हैं वहाँ-वहाँ (प्रत्येक झरोखेपर) देवता थाना किये (अड्डा जमाकर) बैठे हैं। ज्यों ही वे विषयरूपी हवाको देखते हैं, त्यों ही हठपूर्वक किवाड़ खोल देते हैं।।6।।

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।। ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।। 7॥।

भावार्थ:-ज्यों ही वह तेज हवा ह्ृदयरूपी घरमें जाती है, त्यों ही वह विज्ञानरूपी दीपक बुझ जाता है। गाँठ भी नहीं छूटी और वह (आत्मानुभवरूप) प्रकाश भी मिट गया। विषयरूपी हवासे बुद्धि व्याकुल हो गयी (सारा किया-कराया चौपट हो गया)।। 7॥।

इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।। विषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।8।।

भावार्थ:-इन्द्रियों और उनके देवताओंको ज्ञान [स्वाभाविक ही] नहीं सुहाता; क्योंकि उनकी विषय-भोगोंमें सदा ही प्रीति रहती है। और बुद्धिको भी विषयरूपी हवाने बावली बना दिया। तब फिर (दुबारा) उस ज्ञानदीपकको उसी प्रकार से कौन जलावे ?।8।।

तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस।।8क।।

भावार्थ:-[इस प्रकार ज्ञानदीपक के बुझ जानेपर] तब फिर जीव अनेकों प्रकार से संसृति (जन्म-मरणादि) के क्लेश पाता है। हे पक्षिराज ! हरिकी माया अत्यन्त दुस्तर है, वह सहज ही में तरी नहीं जा सकती।। 48(क)।।

कहत कठिन समुझत कठिन साधत कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक।। 48ख।।

भावार्थ:-ज्ञान कहने (समझने) में कठिन, समझनेमें कठिन और साधनेमें भी कठिन है। यदि घुणाक्षरन्यायसे (संयोगवश) कदाचित्‌ यह ज्ञान हो भी जाय, तो फिर [उसे बचाये रखनेमें] अनेकों विश्व हैं॥8(ख)।।

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।।

भावार्थ:-जो निर्बिधघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई॥ ज्ञान का मार्ग कृपाण (दुधारी तलवार) की धारके समान है। है पक्षिराज ! इस मार्गसे गिरते देर नहीं लगती। जो इस मार्गको निर्विघ्न निबाह ले जाता है, वही कैवल्य (मोक्ष) रूप परमपदको प्राप्त करता है।।4।।

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।। राम भगत सोइ मुकुति गोसाईं। अनइच्छित आवइ बरिआईं।।2।।

भावार्थ:-संत, पुराण, वेद और [तन्त्र आदि] शास्त्र [सब] यह कहते हैं कि कैवल्यरूप परमपद अत्यन्त दुर्लभ है; किंतु गोसाईं ! वही [अत्यन्त दुर्लभ] मुक्ति श्रीरामजी को भजने से बिना इच्छा किये भी जबरदस्ती आ जाती है।।2।।

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।। तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ भगति बिहाई।।3।

भावार्थ:-जैसे स्थल के बिना जल नहीं रह सकता, चाहे कोई करोड़ों प्रकारके उपाय क्यों न करे। वैसे ही, हे पक्षिराज ! सुनिये, मोक्षसुख भी श्रीहरिकी भक्तिको छोड़कर नहीं रह सकता।। 3।।

अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।। भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।।4।।

भावार्थ:-ऐसा विचरकर बुद्धिमान्‌ हरिभक्त भक्तिपर लुभाये रहकर मुक्तिका तिरस्कार कर देते हैं। भक्ति करनेसे संसृति (जन्म- मृत्युरूप संसार) की जड़ अविद्या बिना ही यत्र और परिश्रम के (अपने-आप) वैसे ही नष्ट हो जाती है,।।4।।

भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचत्रै जठरागी।। असि हरि भगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।5।।

भावार्थ:-जैसे भोजन किया तो जाता है तृप्तिके लिये और उस भोजनको जठराय़्ि अपने-आप (बिना हमारी चेष्टाके ) पचा डालती है, ऐसी सुगम और परम सुख देनेवाली हरिभक्ति जिसे न सुहावे, ऐसा मूढ़ कौन होगा ?।।5।।

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि। भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।9क।।

भावार्थ:-हे सर्पों शभु गरुड़जी ! मैं सेवक हूँ और भगवान्‌ मेरे सेव्य (स्वामी) हैं, इस भावके बिना संसाररूपी समुद्रसे तरना नहीं हो सकता। ऐसा सिद्धात विचारकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलोंका भजन कीजिये।। 49(क)।।

जो चेतन कहँ जड़ करइ जड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनायकहि भजहिं जीव ते धन्य।। 9ख।।

भावार्थ:-जो चेतन को जड़ कर देता है और जड़ को चेतन कर देता है, ऐसे समर्थ श्रीरघुनाथजीको जो जीव भजते हैं, वे धन्य हैं।। 49(ख)।।

कहेउँ ग्यान सिद्धातं बुझाई। सुनह भगति मनि कै प्रभुताई।। राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर॥ मैंने ज्ञानका सिद्धान्त समझाकर कहा। अब भक्तिरूपी प्रभुता (महिमा) सुनिये। श्रीरामजीकी भक्ति सुन्दर चिन्तामणि है। हे गरुड़जी ! यह किसके ह्ृदयके अंदर बसती है॥ परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती॥ मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।।2।।

भावार्थ:-वह दिन-रात [अपने-आप ही] परम प्रकाशरूप रहता है। उसको दीपक, घी और बत्ती कुछ भी नहीं चाहिये। [इस प्रकार मणिका एक तो स्वाभाविक प्रकार रहता है] फिर मोहरूपी दरिद्रता समीप नहीं आती है [क्योंकि मणि स्वयं धनरूप है]; और [तीसरे] लोभरूपी हवा उस मणिमय दीपको बुझा नहीं सकती [क्योंकि मणि स्वयं प्रकाशरूप है, वह किसी दूसरे की सहायता से नहीं प्रकाश करती]।2।।

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई।। खल कामदि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।।3।।

भावार्थ:-[उसके प्रकाशसे] अविद्या का प्रबल अन्धकार निज जाता है। मदादि पतंगोंका सारा समूह हार जाता है। जिसके ह्ृदयमें भक्ति बसती है, काम, क्रोध और लोभ आदि दुष्ट तो पास भी नहीं आते जाते।।3।।

गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।। ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस जीव दुखारी।।4।।

भावार्थ:-उसके लिये विष अमृतके समान और शत्रु मित्र के समान हो जाता है। उस मणि के बिना कोई सुख नहीं पाता। बड़े-बड़े मानस-रोग, जिसके वश होकर सब जीव दुखी हो रहे हैं, उसको नहीं व्यापते।।4।।

राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहूँ ताकें।। चतुर सिरेमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं।। 5।।

भावार्थ:-श्रीरामभक्तिरूपी मणि जिसके ह्वरदयमें बसती है, उसे स्वप्रमें भी लेशमात्र दुःख नहीं होता। जगत्‌ में वे ही मनुष्य चतुरों के शिरोमणि हैं जो उस भक्तिरूपी मणि के लिये भली भाँति यत्र करते हैं।।5।।

सो मनि जदपि प्रगच जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।। सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटभेरे।।6।।

भावार्थ:-यद्यपि वह मणि जगत में प्रकट (प्रत्यक्ष) है, पर बिना श्रीरामजीकी कृपाके उसे कोई पा नहीं सकता। उनके पाने उपाय भी सुगम ही हैं, पर अभागे मनुष्य उन्हें ठुकरा देते हैं।।6।।

पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना।। मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी।।7॥

भावार्थ:-वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्रीरामजीकी नाना प्रकारकी कथाएँ उन पर्वतों में सुन्दर खानें हैं। संत पुरुष [उनकी इन खानों के रहस्यको जाननेवाले] मर्मी हैं और सुन्दर बुद्धि [खोदनेवाली ] कुदाल है। हे गरुड़जी ! ज्ञान और वैराग्य- ये दो उनके नेत्र हैं।।7।।

भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मान सब सुख खानी।। मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।। 8।।

भावार्थ:-जो प्राणी उसे प्रेम के साथ खोजता हैं, वह सब सुखों की खान इस भक्तिरूपी मणिको पा जाता है। हे प्रभो ! मेरे मन में तो ऐसा विश्वास है कि श्रीरामजी के दास श्रीरामजीसे भी बढ़कर हैं।।8।।

राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।। सब कर फलर हरिस भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।।9॥।

भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्रीहरि चन्दनके वृक्ष हैं तो संत पवन हैं। सब साधनों का फल सुन्दर हरि भक्ति ही है। उसे संतके बिना किसी ने नहीं पाया।।9।।
॥ चौपाई ॥

अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहिं सुलभ बिहंगा।।0।

भावार्थ:-ऐसा विचार कर जो भी संतों का संग करता है, हे गरुड़जी ! उसके लिये श्रीरामजीकी भक्ति सुलभ हो जाती है।।0।
॥ दोहा ॥

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहििं।। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।।20क।।

भावार्थ:-ब्रह्म (वेद) समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है और संत दवता है। जो उस समुद्रको मथकर अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्ति रूपी मधुरता बसी रहती है।। 420(क)।।

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि॥ जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि।।20ख।।

भावार्थ:-वैराग्यरूपी ढाल से अपने को बचाते हुए और ज्ञान रूपी तलवार से मद, लोभ और मोहरूपी वैरियोंको मारकर जो विजय-प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज ! इस विचार कर देखिये।।

20(ख)।। पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।। नाथ मोहि निज सेवक जानी। सस्त प्रस्र मम कहह बिचारी।।2।।

भावार्थ:-पक्षिराज गरुड़जी फिर प्रेमसहित बोले-हे कृपालु ! यदि मुझपर आपका प्रेम है, तो हे नाथ ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखानकर कहिये।।।।
॥ चौपाई ॥

प्रथमहिं कहह नाथ मतिधारा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।। बड़ दुख कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहह बिचारी।। 2।।

भावार्थ:-हे नाथ ! हे धीरबुद्धि ! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है ? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिये।।2।।

संत असंत मरम तुम्ह जानह। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहू॥ कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहह कवन अघ परम कराला।।3।।

भावार्थ:-संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिये। फिर कहिये कि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध सबसे महान पुण्य कौन-सा है और सबसे महान्‌ भयंकर पाप कौन है।।3॥।

मानस रोग कहट् समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।। तात सुनह सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।।4।।

भावार्थ:-फिर मानस रोगों को समझाकर कहिये। आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी बहुत है [काकभुशुण्डिजीने कहा-] हे तात ! अत्यन्त आदर और प्रेमके साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेप में कहता हूँ।।4।।

नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही। नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।।5।।

भावार्थ:-मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देनेवाला है।।5।।

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥ काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं।।6।।

भावार्थ:-ऐसे मनुष्य-शरीरको धारण (प्राप्त) करके जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदलेमें काँचके टुकड़े ले लेते हैं।।6।।

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।। पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।। 7॥।

भावार्थ:-जगत्‌ में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलने के समान जगत्‌ में सुख नहीं है। और हे पक्षिराज ! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना यह संतोंका सहज स्वभाव है।।7।।

संत सहहिं दुख पर हित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी।। भूर्ज तरू सम संत कृपाला। पर हित निति सह बिपति बिसाला।।8।।

भावार्थ:-संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिये। कृपालु संत भोजके वृक्षके समान दूसरों के हित के लिये भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खालतक उधड़वा लेते हैं)।।8।

सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।। खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अह्ि मूषक इव सुनु उरगारी।।9।।

भावार्थ:-किंतु दुष्ट लोग सनकी भाँति दूसरों को बाँधते हैं और [उन्हें बाँधनेके लिये] अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सर्पोके शत्रु गरुड़जी ! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थके साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं।।9।।

पर संमपदा बिनासि नाहीं। जिमि ससि हति उपल बिलाहीं।। दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू। १0।

भावार्थ:-वे परायी सम्पत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम केतू के उदय की भाँति जगत्‌ के दुःख के लिये ही होता है।।40क।।

संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।।

भावार्थ:-परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा।पर निंदा सम अघ न गरीसा॥ और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिये सुख दायक है। वेदोंमें अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥ हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई।।

द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।।2।।

भावार्थ:-शंकरजी और गुरुकी निंदा करनेवाला मनुष्य [अगले जन्ममें] मेढक होता है और वह हजार जन्मतक वही मेढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निन्‍्दा करनेवाला व्यक्ति बहुत-से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है।।2।।

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।। होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।3।।

भावार्थ:-जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निन्‍्दा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतोंकी निन्‍्दा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हे मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये बीत गया (अस्त हो गया) रहता है।।3।।

सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥। सुनह तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।। 4।।

भावार्थ:-जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन्‍्दा करते हैं, वे चमगीदड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात ! अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं।। 4।।

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्हे ते पुनि उपजहिं बहु सूला।। काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।।5।।

भावार्थ:-सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वाद है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है।। 5।।

प्रीति करहिं जौं तीनउ भाई। उपजई सन्यपात दुखदाई।। बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।। 6।।

भावार्थ:-प्रीति कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जायेँ) दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्नय होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होनेवाले जो विषयोंके मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) है; उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्‌ वे अपार हैं)।।6।।

ममता दादु कंड इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।। पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।।7।।

भावार्थ:-ममता दाद, और ईर्ष्या (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले की रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्टमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराये सुखको देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है । दुष्टता और मनकी कुटिलता ही कोढ़ है।।7।।

अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।। तृस्णा उदरबुद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी।8।।

भावार्थ:-अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू (गाँठका) रोग है। दम्भ, कपट मद, और मान नहरुआ (नसोंका) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजोरी हैं।। 8।।

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहाँ कुरोग अनेका।।9।

भावार्थ:-मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ।।9।
॥ दोहा ॥

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए साधि बहु ब्याधि। पीड़हिं संतत जीव कहूँ सो किमि लहै समाधि।।27 क।।

भावार्थ:-एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शान्ति) को कैसे प्राप्त करे ?।। 424(क)।।

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।। भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान।।2ख।।

भावार्थ:-निमय, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों ओषधियाँ हैं, परंतु हे गरुड़जी ! उनसे ये रोग नहीं जाते।। 42(ख)।।

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।। मानस रोग कछुक मैं गाए। हृहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।।4।।

भावार्थ:-इस प्रकार जगत्‌ में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोगके दुःखसे और भी दुखी हो रहे हैं। मैंने ये थोड़े- से मानस रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परंतु इन्हें जान पाये हैं कोई विरले ही॥ जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिहं जन परितापी।।
॥ चौपाई ॥

विषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिह हृदयँ का नर बापुरे।।2।।

भावार्थ:-प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोग) जान लिये जानेसे कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं; परंतु नाश को नहीं प्राप्त होते। विषयरूप कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदयों में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं।।2।।

राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा।। सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।।3।

भावार्थ:-यदि श्रीरामजीकी कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाये तो ये सब रोग नष्ट हो जायँ।सद्गुरुरूपी वैद्य के वचनमें विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो।।3।।

रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।। एहि बिधि भलेहिं सो रोग नासाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।।4।।

भावार्थ:-श्रीरघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवाके साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायेँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते।।4।।

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बत बिराग अधिकाई।। सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।।5।।

भावार्थ:-हे गोसाईं ! मनको निरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयों की आशारूपी दुर्बलता मिट जाय।।5।।

बिल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।। सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।।6।।

भावार्थ:-[इस प्रकार सब रोगों से छटकर] जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जलमें खान कर लेता है, तब उसके हृदय में राम भक्ति छा रहती है। शिवजी, ब्रह्मा, जी शुकदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचारमें परम निपुण जो मुनि हैं।।6।।

सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।। श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।।7॥।

भावार्थ:-हे पक्षिराज ! उन सब का मत यही है कि श्रीरामजी के चरणों कमलों में प्रेम करना चाहिये। श्रुति पुराण और सभी ग्रन्थ कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्ति के सुख नहीं है।।7।।

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा॥। फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।।8।।

भावार्थ:-कछुए की पीठपर भले ही बाल उग आयवें, बाँझ का पुत्र भले ही किसी को मार डाले, आकाशमें भले ही अनेकों फूल खिल उर्ठें; परंतु श्रीहरि से विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता।।8।।

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।। अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।। 9॥।

भावार्थ:-मृगतृष्णाके जलको पीने से ही प्यास बुझ जाय, खरगोशके भले ही सींग निकल आवें, अन्धकार भले ही सूर्य का नाश कर दे; परंतु श्रीराम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता।।9।
॥ दोहा ॥

हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।।0।। बर्फ से भले ही अग्ि प्रकट हो जाय (ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जायेँ), परंतु श्रीरामसे विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता।।0। बारि मथें घृत बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।422क।।

भावार्थ:-जलको मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [को पेरने] से भले ही तेल निकल आवे; परंतु श्रीहरि के भजन बिना संसाररूपी समुद्र से नहीं तरा जा सकता यह सिद्धान्त अटल है।। 22(क)।।

मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन।। 22ख।।

भावार्थ:-प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी तुच्छ बना सकते हैं। ऐसा विचारकर चुतर पुरुष सब सन्देह त्यागकर श्रीरामजीको ही भजते हैं।। 422(ख)।।

श्लोक-विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे। हरि नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।422ग।।

भावार्थ:-मैं आपसे भली भाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ-मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं है कि जो मनुष्य श्रीहरिका भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागरको [सहज ही] पार कर जाते हैं।।

422(ग)।कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा।। श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।।4।।

भावार्थ:-हे नाथ ! मैंने श्रीहरि का चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार कहीं विस्तारसे और कहीं संक्षेपसे कहा। हे सर्पोके शत्रु गरुड़जी ! श्रुतियोंका यही सिंद्धांत है कि सब काम भुलाकर (छोड़कर) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये।।१।।
॥ चौपाई ॥

प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥। तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्टि मो पर अति छोहा।।2।

भावार्थ:-प्रभु श्रीरघुनाथजीको छोड़कर और किसका सेवन (भजन) किया जाय, जिनका मुझ-जैसे मूर्खपर भी ममत्व (स्रेह) है। हे नाथ ! आप विज्ञानरूप हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझपर बड़ी कृपा की है।।2।

पूँछिह राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।। सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।।3॥।

भावार्थ:-जो आपने मुझे से शुकदेवजी, सनकादि और शिवजीके मनको प्रिय लगनेवाली अति पवित्र रामकथा पूछी। संसारमें घड़ी भरका अथवा पलभरका एक-बारका भी सत्संग दुर्लभ है।।3।

देखु गरुड़ निज ह्ृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।। सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।।4।।

भावार्थ:-हे गरुड़जी ! अपने हृदय में विचार कर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजी के भजनका अधिकारी हूँ ? पक्षियोंमें सबसे नीच और सब प्रकार से अपवित्र हूँ। परंतु ऐसा होनेपर भी प्रभुने मुझको सारे जगत्‌ को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया। [अथवा प्रभुने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया]।।4।।