॥ चौपाई ॥
कलबल बचन अधर अरुनारे। दुइ दुई दसन बिसद बर बारे।। ललित कपोल मनोहर नासा। सकल सुखद ससि कर सम हासा।।2।
भावार्थ:-कलबल (तोतले) वचन हैं, लाल-लाल ओंठ हैं। उज्ज्वल, सुन्दर और छोटी-छोटी [ऊपर और नीचे] दो दो दैँतुलियाँ हैं, सुन्दर गाल, मनोहर नासिका और सब सुखों को देनेवाली चन्द्रमा की [अथवा सुख देने वाली समस्त कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा की] किरणों के समान मधुर मुसकान है।।2।।
नील कंज लोचन भव मोचन। भ्राजत भाल तिलक गोरोचन॥ बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए। कुंचित कच मेचक छबि छाए।।3।।
भावार्थ:-नीले कमलके समान नेत्र जन्म-मृत्यु [के बन्धन] से छुड़ानेवाले हैं। ललाटपर गोरोचनका तिलक सुशोभित है। भौंहे टेढ़ी हैं। कान सम और सुन्दर हैं। काले और घूँघराले केशोंकी छवि छा रही है।।3।
पीत झीनि झगुली तन सोही। किलकनि चितवनि भावति मोही।। रूप रासि नृप अजिर बिहारी। नाचहिं निज प्रति बिंब निहारी।।4।।
भावार्थ:-पीली और महीन झँगली शरीर पर शोभा दे रही है। उनकी किलकारी और चितवन मुझे बहुत ही प्रिय लगती है। राजा दशरथजी के आँगन में विहार करनेवाली रूप की राशि श्रीरामचन्द्रजी अपनी परछाहीं देखकर नाचते हैं।।4।।
मोहि सन करहिं बिबिधि बिधि क्रीड़ा। बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा।। किलकत मोहि धरन जब धावहिं। चलउँ भागि तब पूप देखावहिं।।5।।
भावार्थ:-और मुझसे बहुत प्रकार के खेल करते हैं, जिन चरित्रों का वर्णन करते मुझे लज्जी आती है। किलकारी मारते हुए जब वे मुझे पकड़ने दौड़ते और मैं भाग चलता तब मुझे पुआ दिखलाते थे।।5।।
॥ दोहा ॥
आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं।। जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं।।77क।।
भावार्थ:-मेरे निकट आने पर प्रभु हँसते हैं और भाग जाने पर रोते हैं। और जब मैं उनका चरण स्पर्श करने के लिये पास जाता हूँ, तब वे पीछे फिर-फिरकर मेरी ओर देखते हैं हुए भाग जाते हैं।। 77(क)।।
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह। कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह।।77ख।।
भावार्थ:-साधारण बच्चों जैसी लीला देखकर मुझे (शंका) हुआ कि सच्चिदानन्दघन प्रभु यह कौन [महत्त्व का] चरित्र (लीला) कर रहे हैं।। 77(ख)।।
एतना मन आनत खगराया। रघुपति प्रेरित ब्यापी माया।। सो माया न दुखद मोहि काहीं। आन जीव इव संसृत नाहीं।। 4।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज ! मन में इतनी (शंका) लाते ही श्रीरघुनाथजी के द्वारा प्रेरित माया मुझपर छा गयी है। परंतु वह माया न तो मुझे दुःख देने वाली हुई और न दूसरे जीवों की भाँति संसार में डालने वाली हुई॥ नाथ इहाँ कछु कारन आना। सुनह्ठ सो सावधान हरिजाना॥ ग्यान अखंड एक सीताबर। माया बस्य जीव सचराचर।।2।। हे नाथ ! यहाँ कुछ दूसरा ही कारण है। हे भगवान् के वाहन गरुड़जी ! उसे सावधान होकर सुनिये। एक सीतापति श्रीरामजी ही अखण्ड ज्ञानस्वरुप हैं और जड़-चेतन सभी जीव माया के वश हैं।।2।।
॥ चौपाई ॥
जौं सब कें रह ग्यान एकरस। ईस्वर जीवहि भेद कहह कस।। माया बस्य जीव अभिमानी। ईस बस्य माया गुन खानी।।3।।
भावार्थ:-यदि जीवों को एकरस (अखण्ड) ज्ञान रहे तो कहिये, फिर ईश्घर और जीवमें भेद ही कैसा ? अभिमानी जीव मायाके वश है और वह [सत्त्व, रज, तम-इन] तीनों गुणों की खान माया ईश्वर के वशमें है।।3।
परबस जीव स्वबस भगवंता। जीव अनेक एक श्रीकंता।। मुधा भेद जद्यपि कृत माया। बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया।।4।।
भावार्थ:-जीव परतंत्र है, भगवान् स्वतत्र हैं। जीव अनेक हैं, श्रीपति भगवान् एक हैं। यद्यपि माया का किया हुआ यह भेद असत् है तथापि वह भगवान् के भजन के बिना करोड़ों उपाय करनेपर भी नहीं जा सकता।।4।।
॥ दोहा ॥
रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान।। ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।। 78क।।
भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी के भजन बिना जो मोक्षपद चाहता है, वह मनुष्य ज्ञानवान् होनेपर भी बिना पूँछ और सींग का पशु है।। 78(क)।।
राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ। सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ।।78ख।।
भावार्थ:-सभी तारागणों के साथ सोलह कलाओं से पूर्ण चन्द्रमा उदय हो और जितने पर्वत हैं, उन सबमें दावाय़ि लगा दी जाय, तो भी सूर्य के उदय हुए बिना रात्रि नहीं जा सकती।। 78(ख)।।
ऐसेहिं हरि बितु भजन खगेसा। मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा।। हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या। प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या।। ।
भावार्थ:-हे पक्षिराज ! इसी प्रकार श्री हरि के भजन बिना जीवोंका क्लेश नहीं मिटता। श्रीहरि के सेवक को अविद्या नहीं व्यापती। प्रभु की प्रेरणा से उसे विद्या व्यापती है।।4।।
ताते नास न होइ दास कर। भेद भगति बाढ़इ बिहंगबर।। भ्रम तें चकित राम मोहि देखा। बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा।।2।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज ! इसी से दास का नाष नहीं होता और भेद-भक्ति बढ़ती है। श्रीरामजीने मुझे जब भ्रम से चकित देखा, तब वे हैँसे। वह विशेष चरित्र सुनिये।।2।।
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ। जाना अनुज न मातु पिताहूँ।। जानु पानि धाए मोहि धरना। स्यामल गात अरुन कर चरना।।3।
भावार्थ:-उस खेल का मर्म किसी ने नहीं जाना, न छोटे भाइयों ने और न माता पिता ने ही। वे श्याम शरीर और लाल-लाल हथेली और चरणतल वाले बालरूप श्रीरामजी घुटने और हाथों के बल मुझे पकड़ने को दौड़े।।3।।
तब मैं भागि चलेउँ उरगारी। राम गहन कहँ भुजा पसारी।। जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा। तहैँ भुज हरि देखउँ निज पासा।।4।।
भावार्थ:-हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी ! तब मैं भाग चला। श्रीरामजी ने मुझे पकड़ने के लिये भुजा फैलायी। मैं जैसे-जैसे आकाशमें दूर उड़ता, वैसे-वैसे ही वहाँ श्रीहरि की भुजा को अपने पास देखता था।।4।।
ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात। जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात।।79क।।
भावार्थ:-मैं ब्रह्मालोक तक गया और जब उड़ते हुए मैंने पीछे की ओर देखा, तो हे तात ! श्रीरामजी की भुजा में और मुझमें केवल दो अंगुल का बीच था।।
79(क)॥ सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि। गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयरउँ बहोरि।। 79ख।।
भावार्थ:-सातों आवरणों को भेदकर जहाँतक मेरी गति थी वहाँतक मैं गया। पर वहाँ भी प्रभुकी भुजा को [अपने पीछे] देखकर व्याकुल हो गया।। 79(ख)।।
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयऊँ। पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ।। मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं। बिहँसत तुरत गयँ मुख माहीं।।।।
भावार्थ:-जब मैं भयभीत हो गया, तब मैंने आँखें मूँद लीं। फिर आँखे खोलकर देखते ही अवधपुरी में पहुँच गया। मुझे देखकर श्रीरामजी मुसकाने लगे। उनके हँसते ही मैं तुरंत उनके मुख में चला गया॥ उदर माझ सुनु अंडज राया। देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया।।
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका। रचना अधिक एक ते एका।।2।
भावार्थ:-हे पक्षिराज ! सुनिये, मैंने उनके पेट में बहुत से ब्रह्माण्डोंके समूह देखे। वहाँ उन (ब्रह्माण्डों में) अनेकों विचित्र लोक थे, जिनकी रचना एक-से-एक बढ़कर थी।।2।।
कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा। अगनित उडगन रबि रजनीसा।। अगनित लोकपाल मन काला। अगनित भूधर भूमि बिसाला।।3॥।
भावार्थ:-करोड़ों ब्रह्मा जी और शिवजी, अनगिनत तारागण, सूर्य और चन्द्रमा, अनगिनत लोकपाल, यम और काल, अनगिनत विशाल पर्वत और भूमि।।3।
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा॥ सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर। चारि प्रकार जीव सचराचर।।4।।
भावार्थ:-असंख्य समुद्रस नदीस तालाब और वन तथा और भी नाना प्रकार की सृष्टि का विस्तार देखा। देवता, मुनि, सिद्ध, नाग, मनुष्य, किन्नर, तथा चारों प्रकार के जड़ और चेतन जीव देखे।।4।।
जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ। सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ।।80क।।
भावार्थ:-जो कभी न देखा था, न सुना था और जो मन में भी नहीं समा सकता था (अर्थात् जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी), वही सभी अद्भुत सृष्टि मैंने देखी। तब उनका किस प्रकार वर्णन किया जाय !।। 80(क)।।
एक एक ब्रह्मांड महूँ रहउँ बरष सत एक। एहि बिधि देखत फिउँ मैं अंड कटाह अनेक।।80ख।। मैं एक-एक ब्रह्माड में एक-एक सौ वर्षतक रहता। इस प्रकार मैं अनेकों ब्रह्माण्ड देखता फिरा।। 80(ख)।।
भावार्थ:-लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्तु सिव मनु दिसित्राता॥ नर गंधर्ब भूत बेताला। किंनर निसिचर पसु खग ब्याला॥ प्रत्येक लोक में भिन्न-भिन्न ब्रह्मा, भिन्न-भिन्न बिष्णु, शिव, मनु, दिक्पल, मनुष्य गन्धर्व, भूत, वैताल, किन्नर, राक्षस, पशु, पक्षी, सर्प।।
देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहूँ आनहि भाँती।। महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब पंच तहँ आनइ आना।।2।।
भावार्थ:-तथा नाना जाति के देवता एवं दैत्यगण थे। सभी जीव वहाँ दूसरे ही प्रकार के थे। अनेक पृथ्वी, नदी, समुद्र, तालाब, पर्वत तथा सब सृष्टि वहाँ दूसरी-ही-दूसरी प्रकार की थी।।2।।
अंडकोस प्रति प्रति निज रूपा। देखेउँ जिनस अनेक अनूपा।। अवधपुरी प्रति भुवन निनारी। सरजू भिन्न भिन्न नर नारी।।3।।
भावार्थ:-प्रत्येक ब्रह्माण्ड-ब्रह्माण्ड में मैंने अपना रूप देखा तथा अनेकों अनुपम वस्तुएँ देखीं। प्रत्येक भुवन में न्यारी ही अवधपुरी, भिन्न ही सरयूजी और भिन्न प्रकार के नर-नारी थे।।3।।
दसरथ कौसल्या सुनु ताता। बिबिध रूप भरतादिक भ्राता।। प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा। देखऊँ बालबिनोद अपारा।।4।।
भावार्थ:-हे तात ! सुनिये, दशरथजी, कौसल्याजी और भरतजी आदि भाई भी भिन्न-भिन्न रूपोंके थे। मैंने प्रत्येक ब्रहाण्डमें रामावतार और उनकी अपार बाललीलाएँ देखता फिरता।।4।।
भिन्न भिन्न मैं दीख सबु अति बिचित्र हरिजान।। अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन।।8 क।।
भावार्थ:-हे हरिवाहन ! मैंने सभी कुछ भिन्न-भिन्न और अत्यन्त विचित्र देखा। मैं अनगिनत ब्रह्माण्डोंमें फिरा, पर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को मैंने दूसरी तरह का नहीं देखा।। 8(क)।।
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर। भुवन भुवन देखत फिर प्रेरित मोह समीर।।8ख।।
भावार्थ:-सर्वत्र वही शिशुपन, वही शोभा और वही कृपालु श्रीरघुवीर ! इस प्रकार मोह रूपी पवन प्रेरणा से मैं भुवन-भुवन में देखता- फिरता था।।
84(ख)।। भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहूँ कल्प सत एका।। फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहैँ पुनि रहि कछ्ध काल गवाँयउँ।।।।
भावार्थ:-अनेक ब्रह्माण्डों में भटकते हुए मानो एक सौ कल्प बीत गये फिरता-फिरता मैं अपने आश्रम में आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया।। 4।
॥ चौपाई ॥
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ। निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ।। देखऊँ जन्म महोत्सव जाई। जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई।।2।
भावार्थ:-फिर जब अपने प्रभु का अवधपुरी में जन्म (अवतार) सुन पाया, तब प्रेम से परिपूर्ण होकर मैं हर्षपूर्वक उठ दौड़ा। जाकर मैंने जन्म-महोत्सव देखा, जिस प्रकार मैं पहले वर्णन कर चुका हूँ।।2।
राम उदर देखेउँ जग नाना। देखत बनइ न जाइ बखाना।। तहैँ पुनि देखेउँ राम सुजाना। माया पति कृपाल भगवाना।।3।
भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी के पेट में मैंने बहुत-से जगत् देखे, जो देखते ही बनते थे, वर्णन नहीं किये जा सकते। वहाँ फिर मैंने सुजान मायाके स्वामी कृपालु भगवान् श्रीरामजी को देखा।।3।
करउँ बिचार बहोरि बहोरी। मोह कलिल ब्यापित मति मोरी॥। उभय घरी महँ मैं सब देखा। भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा।।4।।
भावार्थ:-मैं बार-बार विचार करता था। मेरी बुद्धि मोह रूपी कीचड़ से व्याप्त थी। यह सब मैंने दो ही घड़ीमें देखा। मनमें विशेष मोह होने से मैं भ्रमित हो गया था।।4।।
॥ दोहा ॥
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर। बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुतु मतिधीर।।82क।।
भावार्थ:-मुझे व्याकुल देखकर तब कृपालु श्रीरघुवीर हँस दिये। हे धीरबुद्धि गरुड़जी! सुनिये, उनके हँसते ही मैं मुँहसे बाहर आ गया।। 82(क)।।
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम।। कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम।।82ख।।
भावार्थ:-श्रीरामचन्द्रजी मेरे साथ फिर वही लड़कपन करने लगे। मैं करोड़ों (असंख्य) प्रकारसे मन को समझता था, पर वह शान्ति नहीं पाता था।। 82(ख)।।
देखि चरित यह सो प्रभुताई। समुझत देह दसा बिसराई।। धरनि परेउँ मुख आव न बाता। त्राहि त्राहि आरत जन त्राता।। ।
भावार्थ:-यह [बाल] चरित्र देखकर और [पेटके अंदर देखी हुई] उस प्रभुता का स्मरण कर शरीरकी सुध भूल गया और 'हे आर्तजनोंके रक्षक ! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये, पुकारता हुआ पृथ्वी पर गिर पड़ा। मुख से बात नहीं निकलती थी!।।१।
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी। निज माया प्रभुता तब रोकी।। कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ। दीनदयाल सकल दुख हरेऊ।।2।।
भावार्थ:-तदनन्तर प्रभुने मुझे प्रेमविहवय देखकर अपनी मायाकी प्रभुता (प्रभाव) को रोक लिया। प्रभुने अपना कर-कमल मेरे सिर पर रक््खा। दीनदयालु ने मेरा सम्पूर्ण दुःख हर लिया।।2।।
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा। सेवक सुखद कृपा संदोहा।। प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी। मन महँ होइ हरष अति भारी।।3।।
भावार्थ:-सेवकों को सुख देने वाले, कृपा के समूह (कृपामय) श्रीरामजीने मुझे मोह से सर्वथा रहित कर दिया। उनकी पहले वाली प्रभुता को विचार-विचारकर (याद कर-करके) मेरे मन में बड़ा भारी हर्ष हुआ।।3।।
भगत बछलता प्रभु कै देखी। उपजी मम उर प्रीति बिसेषी।। सजल नयन पुलकित कर जोरी। कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बिहोरी।।4।।
भावार्थ:-प्रभु की भक्तवत्सलता देखकर मेरे हृदय में बहुत ही प्रेम उत्पन्न हुआ। फिर मैंने [आनन्दसे] नेत्रों जल भरकर, पुलकित होकर और हाथ जोड़कर बहुत प्रकार से विनती की।।4।।
सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास। बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास।।83क।।
भावार्थ:-मेरी युक्त वाणी सुनकर और अपने दासको दीन देखकर रमानिवास श्रीरामजी सुखदायक गम्भीर और कोमल वचन बोले-83(क)।।
काकभुसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि। अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि।।83ख।।
भावार्थ:-हे काकभुशुण्डि ! तू मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानकर वर माँग। अणिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ, दूसरी ऋद्धियाँ तथा सम्पूर्ण सुखों की खान मोक्ष।। 83(ख)।।
ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना। मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना।। आजु देउँ सब संसय नाहीं। मागु जो तोहि भाव मन माहीं।। ।।
भावार्थ:-ज्ञान, विवेक, वैराग्य, विज्ञान, (तत्त्वज्ञान) और वे अनेकों गुण जो जगत् में मुनियों के लिये भी दुर्लभ हैं, ये सब मैं आज तुझे दूँगा, इसमें सन्देह नहीं। जो तेरे मन भावे, सो माँग ले।।१।।
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउऊँ। मन अनुमान करन तब लागेउँ।। प्रभु कह देनसकल सुख सही। भगति आपनी देन न कही।।2।।
भावार्थ:-प्रभु के वचन सुनकर मैं बहुत ही प्रेममें भर गया। तब मन में अनुमान करने लगा कि प्रभुने सब सुखों के देनेकी बात कही, यह तो सत्य है; पर अपनी भक्ति देने की बात नहीं कही।।2।।
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे। लवन बिना बहु बिंजन जैसे।। भजन हीन सुख कवने काजा। अस बिचारि बोलेउँ खगराजा।। 3।।
भावार्थ:-भक्तिसे रहित सब गुण और सब सुख वैसे ही (फी के) हैं, जैसे नमकके बिना बहुत प्रकारके भोजन के पदार्थ ! भजन से रहित सुख किस काम के ? हे पक्षिराज ! ऐसा विचारकर मैं बोला-।।3।।
जौ प्रभु होइ प्रसन्न बर देह। मो पर करह्ठ कृपा अरु नेहू॥। मन भावत बर मागउँ स्वामी। तुम्ह उदार उर अंतरजामी।।4।।
भावार्थ:-हे प्रभो ! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देते हैं और मुझपर कृपा और सखेह करते हैं, तो हे स्वामी ! मैं अपना मन-भाया वर माँगता हूँ। आप उदार हैं और हृदय के भीतरकी जाननेवाले हैं।।4।।
अबिरल भगति बिसुद्ध तव श्रुति पुरान जो गाव। जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव।।84क।।
भावार्थ:-आपकी जिस अविरल (प्रगाढ़) एवं विशुद्ध (अनन्य निष्काम) भक्तिको श्रुति और पुराण गाते हैं, जिसे योगीश्वर मुनि खोते हैं और प्रभु की कृपा से कोई विरला ही जिसे पाता है।। 84(क)।।
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम। सोइ निज भगति मोहि प्रभु देह दया करि राम।।84ख।।
भावार्थ:-हे भक्तोंके [मन-इच्छित फल देनेवाले] कल्पवृक्ष ! हे शरणागतके हितकारी ! हे कृपा सागर। हे सुखधाम श्रीरामजी ! दया करके मुझे अपनी वही भक्ति दीजिये।। 84(ख)।।
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक। बोले बचन परम सुखदायाक।। सुनु बायस तैं सहज सयाना। काहे न मागसि अस बरदाना॥ "एवमस्तु' (ऐसा ही हो) कहकर रघुकुल के स्वामी परम सुख देनेवाले वचन बोले-हे काक ! सुन, तू स्वाभव से ही बुद्धिमान् है। ऐसा वरदान कैसे न माँगता ?॥ सब सुख खानि भगति तैं मागी। नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी।। जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं। जे जप जोग अनल तन दहहीं।।2।।
भावार्थ:-तूने सब सुखों की खान भक्ति माँग ली, जगत् में तेरे समान बड़भागी कोई नहीं है। वे मुनि जो जप और योगकी अग्िसे शरीर जलाते रहते हैं, करोड़ों यत्र करके भी जिसको (जिस भक्तिको नहीं) पाते।।2।
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई। मागेह भगति मोहि अति भाई॥ सुतु बिहंग प्रसाद अब मोरें।। सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें।।3।
भावार्थ:-वही भक्ति तूने माँगी। तेरी चतुरता देखकर मैं रीझ गया। यह चतुरता मुझे बहुत अच्छी लगी। हे पक्षी ! सुन, मेरी कृपासे अब समस्त शुभ गुण तेरे हृदय में बसेंगे।।3।।
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। जोग चरित्र रहस्य बिभागा।। जानब तैं सबही कर भेदा। मम प्रसाद नहिं साधन खेदा।।4।।
भावार्थ:-भक्ति, ज्ञान, विज्ञान, वैराग्य, योग, मेरी लीलाएँ और उसके रहस्य तथा विभाग-इन सबके भेदको तू मेरी कृपासे ही जान जायगा। तुझे साधन का कष्ट नहीं होगा।।4।।
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।। जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि।।85क।।
भावार्थ:-माया से उत्पन्न सब भ्रम अब तुझको नहीं व्यापेंगे। मुझे अनादि, अजन्मा, अगुण, (प्रकृतिके गुणोंसे रहित) और [गुणातीत दिव्य] गुणों की खान ब्रह्म जानना।। 85(क)।।
मोहि भगति प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग। कार्य बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग।।85ख।।
भावार्थ:-हे काक ! सुन, मुझे भक्ति निरंतर प्रिय हैं, ऐसा विचारकर शरीर, वचन और मन से मेरे चरणों में अटल प्रेम करना।। 85(ख)।।
अब सुनु परम बिमल मम बानी। सत्य सुगम निगमादि बखानी।।
भावार्थ:-निज सिद्धांत सुनावउँ तोही। सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही॥ अब मेरी सत्य, सुगम, वेदादि के द्वारा वर्णित परम निर्मल वाणी सुन। मैं तुझको यह “निज सिद्धान्त' सुनाता हूँ। सुनकर मन में धारण कर और सब तजकर मेरा भजन कर॥ मम माया संभव संसारा। जीव चराचर बिबिधि प्रकारा।।
सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए।।2।।
भावार्थ:-यह सारा संसार मेरी माया से उत्पन्न है। [इसमें] अनेकों प्रकार के चराचर जीव हैं। वे सभी मुझे प्रिय हैं; क्यों कि सभी मेरे उत्पन्न किये हुए हैं। [किन्तु] मनुष्य मुझको सबसे अधिक अच्छ लगते हैं।।2।।
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी। तिन्ह महूँ निगम धरम अनुसारी।। तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी। ग्यानिह ते अति प्रिय बिग्यानी।। 3।।
भावार्थ:-उन मनुष्यों में भी द्विज, द्विजों में भी वेदों को [कण्ठमें] धारण करने वाले, उनमें भी वेदान्त धर्मपर चलने वाले, उनमें भी विरक्त (वैराग्यवान्) मुझे प्रिय हैं। वैराग्यवानोंमें फिर ज्ञानी और ज्ञानियों से भी अत्यन्त प्रिय विज्ञानी हैं।।3।।
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा। जेहि गति मोरि न दूसरि आसा।। पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं। मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं।।4।।
भावार्थ:-विज्ञानियों से भी प्रिय मुझे अपना दास है, जिसे मेरी ही गति (आश्रय) है, कोई दूसरी आशा नहीं है। मैं तुमसे बार-बार सत्य ('निज सिद्धात”) कहता हूँ कि मुझे अपने सेवकके समान प्रिय कोई नहीं है।।4।।
भगति हीन बिरंचि किन होई। सब जीवह सम प्रिय मोहि सोई।। भगतिवंत अति नीचउ प्रानी। मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी।।5।।
भावार्थ:-भक्तिहीन बह्मा ही क्यों न हो, वह मुझे सब जीवों के समान ही प्रिय है। परन्तु भक्ति मान् अत्यन्त नीच भी प्राणी मुझे प्राणों के समान प्रिय है, यह मेरी घोषणा है।।5।।
सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कह काहि न लाग। श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग।।86।।
भावार्थ:-पवित्र, सुशील और सुन्दर बुद्धिवाला सेवक, बता किसको प्यारा नहीं लगता ? वेद और पुराण ऐसी ही नीति कहते हैं। हे काक ! सावधान होकर सुन।।86।।
॥ चौपाई ॥
एक पिता के बिपुल कुमारा। होहिं पृथक गुन सील अचारा॥ कोउ पंडित कोउ तापस ग्याता। कोउ धनवंत सूर कोउ दाता॥ एक पिता के बहुत-से पुत्र पृथक्-पृथक् गुण, स्वभाव और आचरण वाले होते हैं। कोई पण्डित होता है, कोई तपस्वी, कोई ज्ञानी, कोई धनी, कोई शूरवीर, कोई दानी।। 4।। कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई। सब पर पितह प्रीति सम होई।। कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा। सपनेहूँ जान न दूसर धर्मा।।2।।
भावार्थ:-कोई सर्वज्ञ और कोई धर्मपरायण होता है। पिताका प्रेम इन सभी पर समान होता है। परंतु इनमें से यदि कोई मन, वचन और कर्म से पिता का ही भक्त होता है, स्वप्न में भी दूसरा धर्म नहीं जानता।।2।
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना। जद्यपि सो सब भाँति अयाना। एहि बिधि जीव चराचर जेते। त्रिजग देव नर असुर समेते।।3।।
भावार्थ:-वह पुत्र पिता को प्राणों के समान होता है, यद्यपि (चाहे) वह सब प्रकार से अज्ञान (मूर्ख) ही हो इस प्रकार तिर्यक् (पशु-पक्षी), देव, मनुष्य और असुरोंसमेत जितने भी चेतन और जड़ जीव हैं।।3।।
अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहिं बराबरि दाया।। तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया। भजै मोहि मन बच अरु काया।।4।।
भावार्थ:-[उनसे भरा हुआ] यह सम्पूर्ण विश्व मेरा ही पैदा किया हुआ है। अतः सब पर मेरी बराबर दया है। परंतु इनमेंसे जो मद और माया छोड़कर मन, वचन और शरीरसे मुझको भजता है।।4।।
॥ दोहा ॥
पुरुष नपुसंक नारि वा जीव चराचर कोइ॥ सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ।।87क।।
भावार्थ:-वह पुरुष नपुसंक हो, स्त्री हो अथवा चर-अचर कोई भी जीव हो, कपट छोड़कर जो भी सर्वभाव से मुझे भाजता है वह मुझे परम प्रिय है।। 87(क)।।
सौ.-सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय।। अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब।।87ख।।
भावार्थ:-हे पक्षी ! मैं तुझसे सत्य कहता हूँ, पवित्र (अनन्य एवं निष्काम) सेवक मुझे प्राणों के समान प्यारा है। ऐसा विचार कर सब आशा-भरोसा छोड़कर मुझीको भज।। 87(ख)।।
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही। सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही।। प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ। तनु पुलकित मन अति हरघषाऊँ।। ।।
भावार्थ:-तुझे काल भी नहीं व्यापेगा। निरन्तर मेरा स्मरण और भजन करते रहना। प्रभुके वचनामृत सुनकर मैं तृप्त नहीं होता था। मेरा शरीर पुलकित था और मनमें मैं अत्यन्त, हर्षित हो रहा था।। 4।
सो सुख जानइ मन अरु काना। नहिं रसना पहिं जाइ बखाना।। प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना। कहि किमि सकहिं तिन्हहिं नहिं बयना।।2।।
भावार्थ:-वह सुख मन और कान ही जानते हैं। जीभ से उसका बखान नहीं किया जा सकता। प्रभु की शोभा का वह सुख नेत्र ही जानते हैं। पर वे कह कैसे सकते हैं ? उनके वाणी तो ही नहीं है।।2।
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई। लगे करन सिसु कौतुक तेई।। सजल नयन कछु मुख करि रूखा। चितइ मातु लागी अति भूखा।।3।
भावार्थ:-मुझे बहुत प्रकार से भली भाँति समझाकर और सुख देकर प्रभु फिर वही बालकों के खेल करने लगे। नेत्रों में जल भरकर और मुख को कुछ रूखा [-सा] बनाकर उन्होंने माताकी ओर देखा- [और मुखाकृति तथा चितवनसे माताको समझा दिया कि] बहुत भूख लगी है।।3।।
देखि मातु आतुर उठि धाई। कह्ठि मृदु बचन लिए उर लाई।। गोद राखि कराव पय पाना। रघुपति चरित ललित कर गाना।।4।।
भावार्थ:-यह देखकर माता तुरंत उठ दौड़ी और कोमल वचन कहकर उन्होंने श्रीरामजीको छाती से लगा लिया। वे गोद में लेकर उन्हें दूध पिलाने लगीं और श्रीरघुनाथजी (उन्हीं) की ललित लीलाएँ गाने लगीं।।4।।
जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद। अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महूँ संतत मगन।।88क।।
भावार्थ:-जिस सुख के लिये [सबको] सुख देनेवाले कल्याणरूप त्रिपुरारि शिवजी ने अशुभ वेष धारण किया, उस सुख में अवधपुरी के नर- नारी निरन्तर निमग्र रहते हैं।। 88(क)।।
सोई सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहूँ लहेउ। ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति।।88ख।। उस सुख का लवलेशमात्र जिन्होंने एक बार स्वप्रमें भी प्राप्त कर लिया, हे पक्षिराज ! वे सुन्दर बुद्धि वाले सज्जन पुरुष उसके सामने ब्रह्मसुखको भी कुछ नहीं गिनते।। 88(ख)।। मैं पुनि अवध रहेउँ कछ काला। देखेउँ बालबिनोद रसाला।। राम प्रसाद भगति बर पायउँ। प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ।।।।
भावार्थ:-मैं और कुछ समय तक अवधपुरी में रहा और मैंने श्रीरामजी की रसीली बाललीलाएँ देखीं। श्रीरामजी की कृपा से मैंने भक्ति का वरदान पाया। तदनन्तर प्रभु के चरणों की वन्दना करके मैं अपने आश्रमपर लौट गया॥ तब ते मोहि न ब्यापी माया। जब ते रघुनायक अपनाया।।
यब सब गुप्त चरित मैं गावा। हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा।।2।।
भावार्थ:-इस प्रकार जब से श्रीरघुनाथजी ने मुझको अपनाया, तबसे मुझे माया कभी नहीं व्यापी। श्रीहरि की माया ने मुझे जैसे नचाया, वह सब गुप्त चरित्र मैंने कहा।।2।।
निज अनुभव अब कहरउँ खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा।। राम कृपा बिनु सुनु खगराई। जानि न जाइ राम प्रभुताई।। 3।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज गरुड़ ! अब मैं आपसे अपना निज अनुभव कहता हूँ। [वह यह है कि] भगवान् के भजन के बिना क्लेश दूर नहीं होते। है पक्षिराज ! सुनिये, श्रीरामजी की कृपा बिना श्रीरामजी की प्रभुता नहीं जानी जाती।।3।
जानें बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीति।। प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई।।4।।
भावार्थ:-प्रभुता जाने बिना उनपर विश्वास नहीं जमता, विश्वास के बिना प्रीति नहीं होती और प्रीति बिना भक्ति वैसे ही दूढ़ नहीं होती जैसे हे पक्षिराज ! जलकी चिकनाई ठहरती नहीं।।4।।
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु॥। हावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।।89क।।
भावार्थ:-गुरु के बिना कहीं ज्ञान हो सकता है ? अथवा वैराग्य के बिना कहीं ज्ञान हो सकता है ? इसी तरह वेद और पुराण कहते हैं कि श्रीहरिकी भक्तिके बिना क्या सुख मिल सकता है ?।। 89(क)।।
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु। चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ।।89ख।।
भावार्थ:-हे तात ! स्वाभाविक सन्तोष के बिना क्या कोई शान्ति पा सकता है ? [चाहे] करोड़ों उपाय करके पच-पच मरिये; [फिर भी] क्या कभी जलके बिना नाव चल सकती है ?।। 89(ख)।।
बिनु संतोष न काम नसाहीं। काम अछत सुख सपनेहूँ नाहीं।।
भावार्थ:-राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा। थल बिहीन तरु कबहूँ कि जामा॥ सन्तोष के बिना कामना का नाश नहीं होता और कामनाओं के रहते स्वप्न में भी सुख नहीं हो सकता। और श्रीराम के भजन बिना कामनाएँ कहीं मिट सकती हैं ? बिना धरती के भी कहीं पेड़ उग सकते हैं ?॥7।।
बिनु बिग्यान कि समता आवइ। कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ।। श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई। बिनु महि गंध कि पावइ कोई।।2।।
भावार्थ:-विज्ञान (तत्त्वज्ञान) के बिना क्या समभाव आ सकता है ? आकाश के बिना क्या कोई अवकाश (पोल) पा सकता है ? श्रद्धा के बिना धर्म [का आचरण] नहीं होता। क्या पृथ्वीतत्त्व के बिना कोई गन्ध पा सकता है ?।।2।।
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा। जल बिनु रस कि होइ संसारा॥। सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई। जिमि बिनु तेज न रूप गोसाँईं।।3।
भावार्थ:-तप के बिना क्या तेज फैल सकता है ? जल-तत्त्वके बिना संसारमें क्या रस हो सकता है? पण्डितजनोंकी सेवा बिना क्या शील (सदाचार) प्राप्त हो सकता है ? हे गोसाईं ! जैसे बिना तेज (अग्ि-तत्त्व) के रूप नहीं मिलता।। 3।।
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा। परस कि होइ बिहीन समीरा।। कवनिउयझ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा। बिनुहरि भजन न भव भय नासा।।4।।
भावार्थ:-निज-सुख (आत्मानन्द) के बिना क्या मन स्थिर हो सकता है? वायु-तत्त्वके बिना क्या स्पर्श हो सकता है ? क्या विश्वास के विना कोई भी सिद्धि हो सकती है ? इसी प्रकार श्रीहरि के भजन बिना जन्म-मृत्यु के भय का नाश नहीं होता।।4।।
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु। राम कृपा बिनु सपनेहूँ जीव न लह बिश्रामु।।90क।।
भावार्थ:-बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती, भक्तिके बिना श्रीरामजी पिघलते (ढरते) नहीं और श्रीरामजी की कृपा के बिना जीव स्वप्न में भी शान्ति नहीं पाता।। 90(क)।।
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद।। 90ख।।
भावार्थ:-हे धीरबुद्धि ! ऐसा विचार कर सम्पूर्ण कुतर्कों और सन्देहों को छोड़कर करुणा की खान सुन्दर और सुख देनेवाले श्रीरघुवीर का भजन कीजिये।। 90(ख)।।
निज मति सरिस नाथ मैं गाई। प्रभु प्रताप महिमा खगराई।। कहरउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी। यह सब मैं निज नयनन्हि देखी।।।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज ! हे नाथ ! मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार प्रभुके प्रताप और महिमाका गान किया। मैंने इसमें कोई बात युक्ति से बढ़ाकर नहीं कहीं है यह सब अपनी आँखों देखी कही है।।१।।
महिमा नाम रुप गुन गाथा। सकल अमित अनंत रघुनाथा।। निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं। निगम सेष सिव पार न पावहिं।।2।।
भावार्थ:-श्रीरघुनाथजी की महिमा, नाम, रुप और गुणों की कथा सभी अपार और अनन्त है तथा श्रीरघुनाथजी स्वयं अनन्त हैं। मुनिगण अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार श्रीहरि के गुण गाते हैं। वेद, और शिवजी भी उनका पार नहीं पाते।।2।
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता। नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता।। तिमि रघुपति महिमा अवगाहा। तात कबहूँ कोउ पाव कि थाहा।।3।।
भावार्थ:-आपसे लेकर मच्छरपर्यन्त सभी छोटे-बड़े जीव आकाशमें उड़ते हैं, किन्तु आकाश का अन्त कोई नहीं पाते। इसी प्रकार हे तात ! श्रीरघुनाथजीकी महिमा भी अथाह है। क्या कभी कोई उसकी थाह पा सकता है ?।।3।
रामु काम सत कोटि सुभग तन। दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन।। सक्र कोटि सत सरिस बिलासा। नभ सत कोटि अमित अवकासा।।4।।
भावार्थ:-श्रीरामजीका अरबों कामदेवों के समान सुन्दर शरीर है। वे अनन्त कोटि दुर्गाओंके समान शत्रुनाशक हैं। अरबों इन्द्र के समान उनका विलास (ऐश्वर्य) है। अरबों आकाशों के समान उनमें अनन्त अवकाश (स्थान) है।।4।।
मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास। ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास।।94क।।
भावार्थ:-अरबों पवन के समान उनमें महान् बल है और अरबों सूर्यों के समान प्रकाश है। अरबों चन्द्रमाओं के समान वे शीतल और संसारके समस्त भयों का नाश करनेवाले हैं।। 9(क)।।
काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत। धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत।।9ख।।
भावार्थ:-अरबों कालों के समान वे अत्यन्त दुस्तर, दुर्गम और दुरन्त हैं। वे भगवान् अरबों ध्ूमकेतुओं (पुच्छल तारों) के समान अत्यन्त प्रबल हैं।। 9(ख)।। प्रभु अगाध सत कोटि पताला। समन कोटि सत सरिस कराला॥ तीरथ अमित कोटि सम पावन। नाम अखिल अघ पूग नसावन॥ अरबों पतालों के समान प्रभु अथाह हैं। अरबों यमराजोंके समान भयानक हैं। अनन्तकोटि तीर्थों के समान वे पवित्र करनेवाले हैं। उनका नाम सम्पूर्ण पापसमूह का नाश करनेवाला है॥ हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा। सिंधु कोटि सत सम गंभीरा।।
कामधेनु सत कोटि समाना। सकल काम दायक भगवाना।।2।
भावार्थ:-श्रीरघुवीर करोड़ों हिमालयोंके समान अचल (स्थिर) हैं और अरबों समुद्रों के समान गहरे हैं। भगवान् अरबों कामधेनुओं के समान सब कामनाओं (इच्च्छि पदार्थों) के देनेवाले हैं।।2।।
सारद कोटि अमित चतुराई। बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई।। बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता। रुद्र कोटि सत सम संहर्ता।।3।।
भावार्थ:-उनमें अनन्तकोटि सरस्वतियोंके समान चतुरता हैं। अरबों ब्रह्माओं के समान सृष्टिरचचिनाकी निपुणता है। वे करोड़ों विष्णुओं के समान पालन करनेवाले और अरबों रुद्रों के समान संहार करनेवाले हैं।।3।।
धनद कोटि सत सम धनवाना। माया कोटि प्रपंच निधाना।। भार धरन सत कोटि अहीसा। निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा।।4।।
भावार्थ:-वे अरबों कुबेरों के समान सृष्टि धनवान और करोड़ों मायाओं के समान के खजाने हैं। बोझ उठाने में वे अरबों शेषोंके समान हैं [अधिक क्या] जगदीश्वर प्रभु श्रीरामजी [सभी बातोंमें] सीमारहित और उपमारहित हैं।।4।।
निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै। जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहीै।। एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनीस हरिहि बखानहीं। प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं।।
भावार्थ:-श्रीरामजी उपमारहित हैं, उनकी कोई दूसरी उपमा है ही नहीं। श्रीरामके समान श्रीराम ही हैं, ऐसा वेद कहते हैं। जैसे अरबों जुगुनुओंके समान कहने से सूर्य [प्रशंसाको नहीं वरं] अत्यन्त लघुता को ही प्राप्त होता है (सूर्य की निन््दा ही होती है)। इसी प्रकार अपनी-अपनी बुद्धिके विकासके अनुसार मुनीश्वर श्रीहरिका वर्णन करते हैं किन्तु प्रभु भक्तों के भावमात्र को ग्रहण करनेवाले और अत्यन्त कृपालु हैं। वे उस वर्णनको प्रेमसहित सुनकर सुख मानते हैं।रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ। संतन्ह सन जस किछ सनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ।।92क।। श्रीरामजी अपार गुणोंके समुद्र हैं, क्या उनकी कोई थाह पा सकता है ? संतों से मैंने जैसा कुछ सुना था, वही आपको सुनाया।। 92(क)।।
भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन। तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन।।92ख।।
भावार्थ:-सुख के भण्डार, करुणाधाम भगवान् (प्रेम) के वश हैं। [अतएव] ममता, मद और मनको छोड़कर सदा श्रीजानकीनाथजी का ही भजन करना चाहिये।। 92(ख)।।
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए। हरषित खगपति पंख फुलाए।। नयन नीर मन अती हरषाना। श्रीरघुपति प्रताप उर आना।। 4।।
भावार्थ:-भुशुण्डिजीके सुन्दर वचन सुनकर पक्षिराजने हर्षित होकर अपने पंख फुला लिये। उनके नेत्रोंमें [प्रेमानन्द के आँसुओं का] जल आ गया और मन अत्यन्त हर्षित हो गया। उन्होंने श्रीरघुनाथजी का प्रताप हृदय में धारण किया।।।।
॥ चौपाई ॥
पाछ्धिल मोह समुझि पछ्िताना। ब्रह्म अनादि मनुज करि माना।। पुनि पुनि काग चस सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा।।2।।
भावार्थ:-वे अपने पिछले मोहको समझकर (याद करके) पछताने लगे कि मैंने आनादि ब्रह्मको मनुष्य करके माना। गरुड़जी बार बार काकभुशुण्डिजी के चरणों पर सिर नवाया और उन्होंने श्रीरामजी के ही समान जानकर प्रेम बढ़ाया।।2।।
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई। जौं बिरंचि संकर सम होई॥ संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता। दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता।।3।।
भावार्थ:-गुरु के बिना कोई भवसागर नहीं तर सकता, चाहे वह ब्रह्मा जी और शंकरजीके समान ही क्यों न हो। [गरुड़जीने कहा-] हे तात ! मुझे सन्देहरूपी सर्पने डस लिया था और [साँपके डसनेपर जैसे विष चढ़नेसे लहरें आती है वैसे ही] बहुत-सी कुतर्करूपी दुःख देने वाली लहरें आ रही थीं।।3।
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक। मोहि जिआयउ जन सुखदायक।। तव प्रसाद मम मोह नसाना। राम रहस्य अनूपम जाना।।4।।
भावार्थ:-आपके स्वरुप रूपी गारुड्टी (साँपका विष उतारनेवाले) के द्वारा भक्तोंको सुख देनेवाले श्रीरघुनाथजीने मुझे जिला लिया। आपकी कृपा से मेरा मोह नाश हो गया और मैंने श्रीरामजी का अनुपम रहस्य जाना।।4।।
॥ दोहा ॥
ताहि प्रसंसि बिबिधि बिधि सीस नाइ कर जोरि॥ बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि।।93क।।
भावार्थ:-उनकी (भुशुण्डिजीकी) बहुत प्रकार से प्रशंसा करके, सिर नवाकर और हाथ जोड़कर फिर गरुड़जी प्रेमपूर्वक विनम्र और कोमल वचन बोले-93(क)।।
प्रभु अपने अबिबेक ते बूझँ स्वामी तोहि। कृपार्सिंधु सादर कहह जानि दास निज मोहि।।93ख।।
भावार्थ:-हे प्रभो ! हे स्वामी ! मैं अपने अविवेकके कारण आपसे पूछता हूँ। हे कृपाके समुद्र ! मुझे अपना “निज दास' जानकर आदरपूर्वक (विचारपूर्वक) मेरे प्रश्न का उत्तर कहिये।। 93(ख)।।
तुम्ह सर्बग्य तग्य तम पारा। सुमति सुसील सरल आचारा।। ग्यान बिरति बिग्यान निवासा। रघुनायकके तुम्ह प्रिय दासा।। १।।
भावार्थ:-आप सब कुछ जानने वाले हैं, तत्त्वके ज्ञाता है, अन्धकार (माया) से परे, उत्तम बुद्धि से युक्ति, सुशील, सरल, आचरणवाले, ज्ञान, वैराग्य और विज्ञान करके धाम और श्रीरघुनाथीजी के प्रिय दास हैं।।।।
कारन कवन देह यह पाई। तात सकल मोहि कहह बुझाई। राम चरित सर सुंदर स्वामी। पायह कहाँ कहह नभगामी।।2।
भावार्थ:-आपने यह काक शरीर किस कारण से पाया ? हे तात ! सब समझाकर मुझसे कहिये। हे स्वामी ! हे आकाशगामी ! यह सुन्दर रामचरित मानस आपने कहाँ पाया, सो कह्िये।।2।।
नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं। महा प्रलयहूँ नास तव नाहीं।। मुधा बचन नहिं ईश्वर कहई। सोउ मोरें मन संसय अहई।।3। हे नाथ ! मैंने शिवजीसे ऐसा सुना है कि महाप्रलयमें आपका नाश नहीं होता और ईश्वर (शिवजी) कभी मिथ्या वचन कहते नहीं। वह भी मेरे मन में संदेह है।।3॥। अग जग जीव नाग नर देवा। नाथ सकल जगु काल कलेवा।। अंड कटाह अमित लय कारी। कालु सदा दुरतिक्रम भारी।।4।।
भावार्थ:-[क्योंकि] हे नाथ ! नाग, मनुष्य, देवता आदि चर-अचर जीव तथा यह सारा जगत् कालका कलेवा है। असंख्य ब्रह्माण्डोंका नाश करनेवाला काल सदा बड़ा ही अनिवार्य है।।4।।
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन। मोहि सो कहह् कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल।। 94क।।
भावार्थ:-[ऐसा वह] अत्यन्त भयंकर काल आपको नहीं व्यापता (आपपर प्रभाव नहीं दिखलाता)- इसका कारण क्या है ? हे कृपालु ! मुझे कहिये, यह ज्ञान का प्रभाव है या योग का बल है ?।। 94(क)।।
प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग।। कारन कवन सो नाथ सब कहह सहित अनुराग।।94ख।।
भावार्थ:-हे प्रभो ! आपके आश्रममें आते ही मेरा मोह और भ्रम भाग गया। इसका क्या कारण है ? हे नाथ ! यह सब प्रेमसहित कहिये।। 94(ख)।।
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा। बोलेउ उमा परम अनुरागा।। धन्य धन्य तव मति उरगारी। प्रस्र तुम्हारि मोहि अति प्यारी॥ हे उमा ! गरुड़जी की वाणी सुनकर काकभुशुण्डिजी हर्षित हुए और परम प्रेम से बोले-हे सर्पों के शत्रु ! आपकी बुद्धि धन्य है ! धन्य है ! आपके प्रश्न मुझे बहुत ही प्यारे लगे॥ सुनि तव प्रस्र सप्रेम सुहाई। बहुत जनम कै सुधि मोहि आई।। सब निज कथा कहरउँ मैं गाई। तात सुनह् सादर मन लाई।।20।
भावार्थ:-आपके प्रेम युक्त सुन्दर प्रश्न सुनकर मुझे अपने बहुत जन्मोंकी याद आ गयी। मैं अपनी सब कथा विस्तार से कहता हूँ। हे तात ! आदरसहित मन लगाकर सुनिये।।2।।
॥ चौपाई ॥
जप तप मख सम दम ब्रत दाना। बिरति बिबेक जोग बिग्याना।। सब कर फल रघुपति पद प्रेमा। तेहि बितु कोउ न पावइ छेमा।। 3।।
भावार्थ:-अनेक जप, तप, यज्ञ, शम (मनको रोकना), दम (इन्द्रियों के रोकना), व्रत, दान, वैराग्य, विवेक, योग, विज्ञान आदि सबका फल श्रीरघुनाथजी के चरणोंमें प्रेम होना है। इसके बिना कोई कल्याण नहीं पा सकता।।3।
एहिं तन राम भगति मैं पाई। ताते मोहि ममता अधिकाई।। जेहि तें कछ निज स्वारथ होई। तेहि पर ममता कर सब कोई।।4।।
भावार्थ:-मैंने इसी शरीर से श्रीरामजी की भक्ति प्राप्त की है। इसी से इसपर मेरी ममता अधिक है। जिससे अपना कुछ स्वार्थ होता है, उस पर सभी कोई प्रेम करते हैं।।4।।
॥ दोहा ॥
सौ.-पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं।। अति नीचह सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित।।95क।।
भावार्थ:-हे गरुड़जी ! वेदों में मानी हुई ऐसी नीति है और सज्जन भी कहते हैं कि अपना परम हित जानकर अत्यन्त नीच से भी प्रेम करना चाहिये।। 95(क)।।
पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर। कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम।।95ख।।
भावार्थ:-रेशम कीड़े से होता है, उससे सुन्दर रेशमी वस्त्र बनते हैं। इसी से उस परम अपवित्र कीड़े को भी सब कोई प्राणों के समान पालते हैं।। 95(ख)।।
स्वारथ साँच जीव कहूँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।। सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।। १।।
भावार्थ:-जीव के लिये सच्चा स्वार्थ यही है कि मन, वचन और कर्म से श्रीरामजी के चरणोंमें प्रेम हो। वही शरीर पवित्र और सुन्दर है जिस शरीर को पाकर श्रीरघुवीर का भजन किया जाय।।।।
राम बिमुख लह् बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।। राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।2।।
भावार्थ:-जो श्रीरामजीके विमुख है वह यदि ब्रह्माजी के समान शरीर पा जाय तो भी कवि और पण्डित उसकी प्रशंसा नहीं करते । इसी शरीर से मेरे हृदय में रामभक्ति उत्पन्न हुई। इसी से हे स्वामी ! यह मुझे परम प्रिय है।।2।।
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।। प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहूँ न सोवा।।3।
भावार्थ:-मेरा मरण अपनी इच्छा पर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता; क्योंकि वेदोंने वर्णन किया है कि शरीरके बिना भजन नहीं होता। पहले मोहने मेरी बड़ी दुर्दशा की। श्रीरामजी के विमुख होकर मैं कभी सुख से नहीं सोया।।3।
नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।। कवन जोनि जनमेउँ जहैँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।।4।।
भावार्थ:-अनेकों जन्मों में मैंने अनेकों प्रकार के योग जप तप यज्ञ और दान आदि कर्म किये। हे गरुड़जी ! जगत् में ऐसी कौन योनि है, जिसमें मैंने [बार-बार ] घूम फिरकर जन्म न लिया हो।।4।।
देखउँ करि सब करम गोसाईं। सुखी न भयउँ अबहिं की नाईं।। सुधि मोहि नाथ जनम बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहैँ न घेरी।।5।।
भावार्थ:-हे गोसाईं ! मैंने सब कर्म करके देख लिये, पर अब (इस जन्म) की तरह मैं कभी सुखी नहीं हुआ। हे नाथ ! मुझे बहुत-से जन्मों की याद है। [क्योंकि] श्रीशिवजी की कृपा से मेरी बुद्धि मोहने नहीं घेरा।।5।।
प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनह बिहगेस। सुनि प्रभु पद रति उपज जातें मिटहिं कलेस।।96क।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज ! सुनिये, अब मैं अपने प्रथम जन्म के चरित्र कहता हूँ, जिन्हें सुनकर प्रभु के चरणों में प्रीति उत्पन्न होती है, जिससे सब क्लेश मिट जाते हैं।। 96(क)।।
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलियुग मल मूल। नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल।।96ख।।
भावार्थ:-हे प्रभो ! पूर्वके एक कल्प में पापोंका मूल युग कलियुग था, जिसमें पुरुष और स्त्री सभी अधर्मपरायण और वेद के विरोधी थे।। 96(ख)।।
तेहिं कलिजुग कोलसपुर जाई। जमन्त भयउँ सूद्र तनु पाई।। सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निदंक अभिमानी।। ।।
भावार्थ:-उस कलियुग में मैं अयोध्या पुरी में जाकर शूद्र का शरीर पाकर जनमा। मैं मन वचन और कर्म से शिवजीका सेवक और दूसरे देवताओंकी निन््दा करनेवाला अभिमानी था।। ॥।
धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।। जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।।2।
भावार्थ:-मैं धन के मदसे मतवाला बहुत ही बकवादी और उग्रबुद्धिवाला था; मेरे हृदय में बड़ा भारी दम्भ था। यद्यपि मैं श्रीरघुनाथजी की राजधानीमें रहता था, तथापि मैंने उस समय उसकी महिमा कुछ भी नहीं जानी।।2।।
अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा॥ कवनेहूँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।।3॥।
भावार्थ:-अब मैंने अवध का प्रभाव जाना। वेद शास्त्र और पुराणों ने ऐसा गाया है कि किसी भी जन्म में जो कोई भी अयोध्या में बस जाता है, वह अवश्य ही श्रीरामजी के परायण हो जायगा।। 3।।
अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।। सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।4।।
भावार्थ:-अवधका प्रभाव जीव तभी जानता है, जब हाथ में धनुष धारण करनेवाले श्रीरामजी उसके हृदय में निवास करते हैं। हे गरुड़जी ! वह कलिकाल बड़ा कठिन था। उसमें सभी नर-नारी पापपरायण (पापों में लिप्त) थे। 4कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदयग्रथ।।
दंभिन््ह निज गति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ।।97क।।
भावार्थ:-कलियुग के पापों ने सब धर्मों को ग्रस लिया, सदून्थ लुप्त हो गये। दम्भियों ने अपनी बुद्धि से कल्पना कर-करके बहुत-से पंथ प्रकट कर दिये।।
97(क)॥ भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म।। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहरउँ कछूुक कलिधर्म।।97ख।।
भावार्थ:-सभी लोग मोह के वश हो गये, शुभकर्मों को लोभ ने हड़प लिया। हे ज्ञान के भण्डार ! हे श्रीहरिके वाहन ! सुनिये, अब मैं कलि के कुछ धर्म कहता हूँ।। 97(ख)।।
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी॥। द्विज श्रुति बेचक भूपप्रजालन कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।। ।।
भावार्थ:-कलियुग में न वर्ण धर्म रहता है, न चारों आश्रम रहते हैं। सब स्त्री पुरुष वेद के विरोध में लगे रहते हैं। ब्राह्मण वेदों के बेचने वाले और राजा प्रजा को खा डालने वाले होते हैं। वेद की आज्ञा कोई नहीं मानता।।१।
मारग सोइ जा कहूँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा॥। मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कह संत कहइ सब कोई।।2।।
भावार्थ:-जिसको जो अच्छा लग जाय, वही मार्ग है। जो डींग मारता है, वही पण्डित है। जो मिथ्या आरम्भ करता (आडम्बर रचता) है और जो दम्भमें रत हैं, उसीको सब कोई संत कहते हैं।।2।।
सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।। जो कह झूँठ मसखरी जाना। कलियुजु सोई गुनवंत बखाना।। 3।
भावार्थ:-जो [जिस किसी प्रकार से] दूसरे का धन हरण करले, वही बुद्धिमान् है। जो दम्भ करता है, वही बड़ा आचारी है। जो झूठ बोलता है और हँसी-दिल््लगी करना जानता है, कलियुग में वही गुणवान् कहा जाता है।।3।।
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी॥ जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।4।।
भावार्थ:-जो आचारहीन है और वेदमार्ग के छोड़े हुए है, कलियुग में वही ज्ञानी और वही वैराग्यवान् है। जिसके बड़े-बड़े नख और लम्बी- लम्बी जटाएँ हैं, वही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी है।।4।।
असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं।।98क।।
भावार्थ:-जो अमंगल वेष और अमंगल भूषण धारण करते हैं और भक्ष्य- अभक्ष्य (खाने योग्य और न खाने योग्य) सब कुछ खा लेते हैं, वे ही सिद्ध हैं और वे ही मनुष्य कलियुग में पूज्य हैं।। 98(क)।।
जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महूँ।।98ख।।
भावार्थ:-जिनके आचरण दूसरों का अपकार (अहित) करनेवाले हैं, उन्हें ही बड़ा गौरव होता है। और वे ही सम्मान के योग्य होते हैं। जो मन, वचन और कर्म से लबार (झूठ बकनेवाले) है, वे ही कलियुग में वक्ता माने जाते हैं।। 98(ख)।।
नारि बिबस नर सकल गोसाईं। नाचहिं नट सर्कट की नाईं।। सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊँ लेहिं कुदाना।। 4।।
भावार्थ:-हे गोसाई ! सभी मनुष्य स्त्रियों के विशेष वश में हैं और बाजीगर के बंदर की तरह [उनके नचाये] नाचते हैं। ब्रह्माणों को शुद्र ज्ञानोपदेश करते हैं और गले में जनेऊ डालकर कुत्सित दान लेते हैं।।।।
॥ चौपाई ॥
सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।। गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।।2।।
भावार्थ:-सभी पुरुष काम और लोभ में तत्पर और क्रोधी होते हैं। देवता, ब्राह्मण, वेद और संतों के विरोधी होते हैं। अभागिनी स्त्रियाँ गुणों के धाम सुन्दर पति को छोड़कर परपुरुष का सेवन करती हैं।।2।। सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।।
गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।।3।।
भावार्थ:-सुहागिनी स्त्रियाँ तो आभूषणों से रहित होती हैं, पर विधवाओं के नित्य नये श्रृंगार होते हैं। शिष्य और गुरु में बहरे और अंधे का- सा हिसाब होता है। एक (शिष्य) गुरुके उपदेश को सुनता नहीं, एक (गुरु) देखता नहीं, (उसे ज्ञानदृष्टि प्राप्त नहीं है)।।3।।
हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महूँ परई।। मातु पिता बालकन्टि बोलावहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।।4।।
भावार्थ:-जो गुरु शिष्य का धन हरण करता है, पर शोक नहीं हरण करता, वह घोर नरक में पड़ता है। माता-पिता बालकोंको बुलाकर वहीं धर्म सिखलाते हैं, जिससे पेट भरे।।4।।
॥ दोहा ॥
ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहि न दूसरि बात। कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात।।99क।।
भावार्थ:-स्त्री-पुरुष ब्रह्म ज्ञान के सिवा दूसरी बात नहीं करते, पर वे लोभवश कौड़ियों (बहुत थोड़े लाभ) के लिये ब्राह्मण और गुरुओं की हत्या कर डालते हैं।। 99(क)।।
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछू घाटि।। जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।।99ख।।
भावार्थ:-शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं [और कहते हैं] कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं ? जो ब्रह्म को जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है। [ऐसा कहकर] वे उन्हें डाँटकर आँखें दिखलाते हैं।। 99(ख)।।
पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।। तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा मैं चरित्र कलिजुग कर।।
भावार्थ:-+। जो परायी स्त्री में आसक्त, कपट करने में चतुर और मोह, द्रोह और ममता में लिपटे हुए हैं, वे ही मनुष्य अभेद वादी (ब्रह्म और जीवको एक बतानेवाले) ज्ञानी हैं। मैंने उस कलियुग का यह चरित्र देखा॥ आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहूँ सत मारग प्रतिपालहिं।।
कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।।2।।
भावार्थ:-वे स्वयं तो नष्ट हुए ही रहते हैं; जो कहीं सन्मार्ग का प्रतिपालन करते हैं, उनको भी वे नष्ट कर देते हैं। जो तर्क करके वेद भी निन््दा करते हैं, वे लोग कल्प-कल्पभर एक-एक नरक में पड़े रहते हैं।।2।।
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।। नारि मुई गृह संपति नासी। मूड मुड़ाइ होहिं संन्यासी।।3।।
भावार्थ:-तेली, कुम्हार, चाण्डाल भील कोल और कलवार आदि जो वर्ण्में नीचे हैं, स्त्री के मरने पर अथवा घर की सम्पत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँडाकर संन्यासी हो जाते हैं।।3।।
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।। बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बुषली स्वामी।।4।।
भावार्थ:-वे अपने को ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं। ब्राह्मण, अनपढ़, लोभी, कामी, आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्याभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं।।4।।
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।। सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।5।।
भावार्थ:-शूद्र नाना प्रकार के जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यासगद्दी) पर बैठकर पुराण करते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीतिकी वर्णन नहीं किया जा सकता।।5।।
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग।। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग।।00क।।
भावार्थ:-कलियुग में सब लोग वर्णसंकर और मर्यादा से च्युत हो गये। वे पाप करते हैं और [उनके फलस्वरुप] दुःख, भय, रोग, शोक और [प्रिय वस्तुका] वियोग पाते हैं।। १00(क)।।
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहिं न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।00ख।।
भावार्थ:-वेद तथा सम्मत वैराग्य और ज्ञान से युक्त जो हरिभक्ति का मार्ग है, मोहवश मनुष्य उसपर नहीं चलते और अनेकों नये-नये पंथोंकी कल्पना करते हैं।। 400(ख)।।
बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्टि न रहि बिरती।। तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।।१।
भावार्थ:-संन्यासी बहुत धन लगाकर घर सजाते हैं। उनमें वैराग्य नहीं रहा, उसे विषयों ने हर लिया। तपस्वी धनवान् हो गये और गृहस्थ दरिद्र । हे तात! कलियुग की लीला कुछ कही नहीं जाती॥ कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनहिं चेरि निबेरि गती।।
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।।2।।
भावार्थ:-कुलवती और सती स्त्री को पुरुष घर से निकाल देते हैं और अच्छी चाल को छोड़कर घरमें दासी को ला रखते हैं। पुत्र अपने माता-पिता को तभी तक मानते हैं, जब तक स्त्री का मुँह नहीं दिखायी पड़ा।।20।
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें।। नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।।3॥।
भावार्थ:-जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तबसे कुटुम्बी शत्रुरूप हो गये। राजा लोग पापपरायण हो गये, उनमें धर्म नहीं रहा। वे प्रजा को नित्य ही [बिना अपराध] दण्ड देकर उसकी विडम्बना (दुर्दशा) किया करते हैं।।3।।
धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।। नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।।4।।
भावार्थ:-धनी लोग मलिन (नीच जाति के होनेपर भी) कुलीन माने जाते हैं। द्विजका चिह्न जनेऊमात्र रह गया और नंगे बदन रहना तपस्वी का। जो वेदों और पुराणों को नहीं मानते, कलियुग में वे ही हरिभक्त और सच्चे संत कहलाते हैं।।4।
कबि बूंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।। कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।5।।
भावार्थ:-कवियों के तो झुंड हो गये, पर दुनिया में उदार (कवियों का आश्रय-दाता) सुनायी नहीं पड़ता। गुण में दोष लगाने वाले बहुत हैं, पर गुणी कोई भी नहीं है। कलियुग में बार-बार अकाल पड़ते हैं। अन्न के बिना सब लोग दुखी होकर मरते हैं।।5।।
सुतु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्रेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड।।0क।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये, कलियुग में कपट, हठ (दुराग्रह), दम्भ, द्वेषघ, पाखण्ड, मान, मोह और काम आदि (अर्थात् काम क्रोध और लोभ) और मद ब्रह्माण्डभरमें व्याप्त हो गये (छा गये)।। 07(क)।।
तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान।।0ख।।
भावार्थ:-मनुष्य जप, तप, यज्ञ, ब्रत और दान आदि मर्म तामसी भाव से करने लगे। देवता (इन्द्र) पृथ्वी पर जल नहीं बरसाते और बोया हुआ अन्न उगता नहीं।। 07(ख)।।
अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।। सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता। 4।।
भावार्थ:-स्त्रियों के बाल ही भूषण है (उनके शरीरपर कोई आभूषण नहीं रह गया) और उनको भूख बहुत लगती है (अर्थात् वे सदा अतृप्त ही रहती हैं)। वे धनहीन और बहुत प्रकार की ममता होने के कारण दुखी रहती हैं। वे मूर्ख सुख चाहती हैं, पर धर्म में उनका प्रेम नहीं है। बुद्धि थोड़ी है और कठोर है; उनमें कोमलता नहीं है।।।।
॥ चौपाई ॥
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।। लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।
भावार्थ:-मनुष्य रोगों से पीड़ित है, भोग (सुख) कहीं नहीं है। बिना ही कारण अभिमान और विरोध करते हैं। दस-पाँच वर्षका थोड़ा-सा जीवन है; परन्तु घमंड ऐसा है मानो कल्पान्त (प्रलय) होनेपर भी उनका नाश नहीं होगा।।2।।
कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्लौ अनुजा तनुजा।। नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।
भावार्थ:-कलिकालने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला । कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। [लोगोंमें] न सन्तोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगनेवाले हो गये।। 3।।
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।। सब लोग बियोग बिसोक हए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।।
भावार्थ:-ईर्ष्या (डाह) कड़वे वचन और लालच भरपूर हो रहे हैं, समता चली गयी। सब लोग वियोग और विशेष शोक से मरे पड़े हैं। वर्णाश्रिम-धर्मके आचारण नष्ट हो गये।।4।।
दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।। तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।
भावार्थ:-इन्द्रियों का दमन, दान, दया और समझदारी किसी में नहीं रही। 'मूर्खता और दूसरों को ठगना यह बहुत अधिक बढ़ गया। स्त्री - पुरुष सभी शरीर के ही पालन-पोषण में लगे रहते हैं। जो परायी निन््दा करने वाले हैं, जगत् में वे ही फैले हैं।।5।।
॥ दोहा ॥
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार।।02क।।
भावार्थ:-हे सर्पोके शत्रु गरुड़जी ! सुनिये, कलिकाल पाप और अवगुणों का घर है। किन्तु कलियुग में एक गुण भी बड़ा है कि उसमें बिना ही परिश्रम भवबन्धनसे छुटकारा मिल जाता है।। 02(क)।।
कृतजुग त्रेताँ द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग।।02ख।।
भावार्थ:-सतयुग, त्रेता और द्वापरमें जो गति पूजा, यज्ञ और योग से प्राप्त होती है, वही गति कलियुग में लोग केवल भगवान् के नाम से पा जाते हैं।। 02(ख)।।
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहिं समर्पि कर्म भव तरहीं।।।।
भावार्थ:-सतयुगमें सब योगी और विज्ञानी होते हैं। हरि का ध्यान करके सब प्राणी भवसागर से तर जाते हैं। त्रेता में मनुष्य अनेक प्रकार के यज्ञ करते हैं और सब कर्मों को प्रभु के समर्पण करके भवसागर से पार हो जाते हैं।। ॥।
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।2।।
भावार्थ:-द्वापर में श्रीरघुनाथजी के चरणों की पूजा करके मनुष्य संसार से तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है और कलियुग में तो केवल श्रीहरि की गुणगाथाओं का गान करने से ही मनुष्य भवसागर की थाह पा जाते हैं।।2।।
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना॥ सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।।3।
भावार्थ:-कलियुग में न तो योग यज्ञ है और न ज्ञान ही है। श्रीरामजी का गुणगान ही एकमात्र आधार है। अतएव सारे भरोसे त्यागकर जो श्रीरामजी को भजता है और प्रेमसहित उनके गुणसमूहों को गाता है।।3।
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।। कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।4।।
भावार्थ:-वही भवसागर से तर जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। नामका प्रताप कलियुगमें प्रत्यक्ष है। कलियुगका एक पवित्र प्रताप (महिमा) है कि मानसिक पुण्य तो होते हैं, पर [मानसिक] पाप नहीं होते।।4।।
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमल भव तर बिनहिं प्रयास।।03क।।
भावार्थ:-यदि मनुष्य विश्वास करे, तो कलियुग के समान दूसरा युग नहीं है। [क्योंकि] इस युगमें श्रीरामजी के निर्मल गुणों समूहों को गा- गाकर मनुष्य बिना ही परिश्रम संसार [रूपी समुद्र] से तर जाता है।। 03(क)।।
प्रगट चारि पद धर्म के कलि महूँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।।03ख।।
भावार्थ:-धर्म के चार चरण (सत्य, दया तप और दान) प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कलि में एक [दानरूपी] चरण ही प्रधान है। जिस-किसी प्रकारसे भी दिये जानेपर दान कल्याण ही करता है।। 03(ख)।। नित जुग धर्म होहिं सब केरे। ह्ृदयँ राम माया के प्रेरे।।
सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। ।
भावार्थ:-श्रीरामजी की माया से प्रेरित होकर सबके ह्ृदयों में सभी युगों के धर्म नित्य होते रहते हैं। शुद्ध सत्त्वगुण, समता, विज्ञान और मनका प्रसन्न होना, इसे सत्यसुग का प्रभाव जाने।। १।।
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। बह रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।।2।।
भावार्थ:-सत्त्वगुण अधिक हो, कुछ रजो गुण हो, कर्मों में प्रीति हो, सब प्रकार से सुख हो, यह त्रेता का धर्म है। रजोगुण बहुत हो, सत्त्वगुण बहुत ही थोड़ा हो, कुछ तमों गुण हो, मनमें हर्ष और भय हों, यह द्वापर का धर्म है।।2।
तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहूँ ओरा।। बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।।3।।
भावार्थ:-तमोगुण बहुत हो, रजोगुण थोड़ा हो, चारों ओर वैर विरोध हो, यह कलियुग का प्रभाव है। पण्डित लोग युगों के धर्म को मन में जान (पहिचान) कर, अधर्म छोड़कर धर्म से प्रीति करते हैं।।3।।
काल धर्म नहिं व्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।। नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।4।।
भावार्थ:-जिसका श्रीरघुनाथजी के चरणों में अत्यन्त प्रेम है, उसको कालधर्म (युगधर्म) नहीं व्यापते। हे पक्षिराज ! नट (बाजीगर) का किया हुआ कपट चरित्र (इन्द्रजाल) देखनेवालों हैं के लिये बड़ा विकट (दुर्गम) होता है, पर नट के सेवक (जंभूरे) को उसकी माया नहीं व्यापती है।।4।।
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहें। भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं।।404क।।
भावार्थ:-श्रीहरि की माया द्वारा रचे हुए दोष और गुण श्रीहरि के भजन के बिना नहीं जाते। मन में ऐसा विचारकर, सब कामनाओं को छोड़कर (निष्कामभावसे) श्रीहरि का भजन करना चाहिये।। 04(क)।।
तेहिं कलिकाल बरस बहु बसेउँ अवध बिहगेस। परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयऊँ बिदेस।। 04ख।।
भावार्थ:-हे पक्षिराज ! उस कलिकाल में मैं बहुत वर्षोतक अयोध्या में रहा। एक बार वहाँ अकाल पड़ा, तब मैं बिपत्ति का मारा विदेश चला गया।। 04(ख)।।
गयउँ उजेनी सुतु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।। गएँ काल कछु संपति पाई। तहैँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।। ।।
भावार्थ:-हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी ! सुनिये, मैं दीन, मलिन (उदास), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतने पर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर म वहीं भगवान् शंकर की आराधना करने लगा॥ बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहिं काजु न दूजा।।
परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।।2।।
भावार्थ:-एक ब्राह्मण देवविधिसे सदा शिवजीकी पूजा करते, उन्हें दूसरा कोई काम न था। वे परम साधु और परमार्थके ज्ञाता थे। वे शम्भुके उपासक थे, पर श्रीहरिकी निन््दा करनेवाले न थे।।2।।
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता॥। बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।।3।।
भावार्थ:-मैं कपटपूर्वक उनकी सेवा करता। ब्राह्मण बड़े ही दयालु और नीति के घर थे। हे स्वामी ! बाहर से नम्र देखकर ब्राह्मण मुझे पुत्र की भाँति मानकर पढ़ाते थे।।3।
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीनन््हा॥ जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। ह्ृदयेँ दंभ अहमिति अधिकाई।।4।।
भावार्थ:-उन ब्राह्मणश्रेष्ठ ने मुझको शिवजी का मन्त्र दिया और अनेकों प्रकार के शुभ उपदेश किये। मैं शिवजी के मन्दिर में जाकर मन्त्र जपता। मेरे हृदय में दम्भ और अहंकार बढ़ गया।।4।।
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्तु कर द्रोह।।405क।।
भावार्थ:-मैं दुष्ट, नीच जाति और पापमयी मलिन बुद्धिवाला मोहवश श्रीहरिके भक्तों और द्विजों को देखते ही जल उठता और विष्णुभगवान् से द्रोह करता था।। 05(क)।।
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम॥ मोहि उपज अति क्रोध दंभिहि नीति की भावई।।05ख।।
भावार्थ:-गुरुजी मेरे आचरण देखकर दुखित थे। वे मुझे नित्य ही भलीभाँति समझाते, पर [मैं कुछ भी नहीं समझता] उलट् मुझे अत्यन्त क्रोध उत्पन्न होता। दम्भीको कभी नीति अच्छी लगती है ?।। 05(ख)।।
एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।।
भावार्थ:-सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई॥ एक बार गुरु जी ने मुझे बुला लिया और बहुत प्रकार से [परमार्थ] नीतिकी शिक्षा दी कि हे पुत्र ! शिवजीकी सेवा का फल यही है कि श्रीरामजीके चरणों में प्रगाढ़ भक्ति हो।। ।।
रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावर कै केतिक बाता।। जासु चरन अज सिव अनुरागी। तासु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।।2।।
भावार्थ:-हे तात ! शिवजी और ब्रह्माजी भी श्रीरामजी को भजते हैं, [फिर] नीच मनुष्य की तो बात ही कितनी है ? ब्रह्माजी और शिव जी जिनके चरणों के प्रेमी हैं, अरे अभागे ! उनसे द्रोह करके तू सुख चाहता है ?॥2।।
हर कहूँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।। अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अह्टि दूध पिआएँ।। 3।।
भावार्थ:-गुरुजीने शिवजी को हरि का सेवक कहा। यह सुनकर हे पक्षिराज ! मेरा हृदय जल उठा। नीच जाति का विद्या पाकर ऐसा हो गया जैसे दूध पिलाने से साँप।।3।
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।। अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।।4।।
भावार्थ:-अभिमानी, कुटिल, दुर्भाग्य और कुजाति मैं दिन-रात गुरुजीसे द्रोह करता। गुरुजी अत्यन्त दयालु थे। उनको थोड़ा-सा भी क्रोध नहीं आता। [मेरे द्रोह करने पर भी] वे बार-बार मुझे उत्तम ज्ञानकी शिक्षा देते थे।।4।।
जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हृति ताहि नसावा।। धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।।5।।
भावार्थ:-नीच मनुष्य जिससे बड़ाई पाता है, वह सबसे पहले उसी को मारकर उसी का नाश करता है। हे भाई ! सुनिये, आगसे उत्पन्न हुआ धुआँ मेघकी पदवी पाकर उसी अग्ि को बुझा देता है।।5।।
रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।। मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।।6।।
भावार्थ:-धूल रास्ते में निरादर से पड़ी रहती है और सदा सब [राह चलने वालों] के लातों की मार सहती है पर जब पवन उसे उड़ाता (ऊँचा उठाता) है, तो सबसे पहले वह उसी (पवन) को भर देती है और फिर राजाओं के नेत्रों और किरीटों (मुकुटों) पर पड़ती है।।6।।
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिंअधम कर संगा।। कबि कोबिद गावहिं असि नीति। खल सन कलह न भल नहेिं प्रीती।। 7॥।
भावार्थ:-हे पक्षिराज गरुड़जी ! सुनिये, बात समझकर बुद्धिमान् लोग अधम (नीच) का संग नहीं करते। कवि और पण्डित ऐसी नीति कहते हैं कि दुष्ट से न कलह ही अच्छा है, न प्रेम ही।।7।। उदासीन नित रहिअ गोसाई। खल परिहरिअ स्वान की नाईं॥।
मैं खल ह्ृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।8।।
भावार्थ:-हे गोसाईं ! उससे तो सदा उदासीन ही रहना चाहिये। दुष्ट को कुत्ते की तरह दूरसे ही त्याग देना चाहिये। मैं दुष्ट था, हृदय में कपट और कुटिलता भरी थी। [इसलिये यद्यपि] गुरु जी हित की बात कहते थे, पर मुझे वह सुहाती न थी।।8।।
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम।।06क।।
भावार्थ:-एक दिन मैं शिव जी के मन्दिर में शिवनाम जप कर रहा था। उसी समय गुरुजी वहाँ आये, पर अभिमानके मारे मैंने उठकर उनको प्रणाम नहीं किया।। 06(क)।।
सो दयाल नहिं कहेउ कछ्ध उर न रोष लवलेस।। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस।। 06ख।।
भावार्थ:-गुरुजी दयालु थे, [मेरा दोष देखकर भी] उन्होंने कुछ नहीं कहा; उनके हृदय में लेश मात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरु का अपमान बहुत बड़ा पाप है; अतः महादेवजी उसे नहीं सह सके।। 06(ख)।।
मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।। जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।।१।।
भावार्थ:-मन्दिर में आकाश वाणी हुई कि अरे हतभाग्य ! मूर्ख ! अभिमानी ! यद्यपि तेरे गुरु को क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्त के हैं और उन्हें [पूर्ण तथा] यथार्थ ज्ञान हैं, ॥ तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।।
जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।।2।।
भावार्थ:-तो भी हे मूर्ख ! तुझको मैं शाप दूँगा। [क्योंकि] नीति का विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। अरे दुष्ट ! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेद मार्ग ही भ्रष्ट हो जाय।।2।
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।। त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।।3।।
भावार्थ:-जो मूर्ख गुरु से ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं। फिर (वहाँ से निकल कर) वे तिर्यग् (पशु, पक्षी आदि) योनियों में शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मों तक दुःख पाते रहते हैं।।3।
बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥। महा बिटप कोटर महूँ जाई। रह अधमाधम अधगति पाई।।4।।
भावार्थ:-अरे पापी ! तू गुरु के सामने अजगर की भाँति बैठा रहा ! रे दुष्ट ! तेरी बुद्धि पाप से ढक गयी है, [अतः] तू सर्प हो जा। और, अरे अधम से भी अधम ! इस अद्योगति (सर्प की नीची योनि) को पाकर किसे बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह।।4।।